श्रीगणेशाय नमः।
शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 851–860
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 851–860
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अ ० ४ ] रुद्रसंहिता ( सनत्कुमार उवाच
ततः प्रणम्य तं मायी शिष्ययुक्तः स्वयं तदा ।
जगाम त्रिपुरं सद्यः शिवेच्छाकारिणं मुदा ॥ ३७
प्रविश्य तत्पुरं तूर्णं विष्णुना नोदितो वशी ।
महामायाविना तेन ऋषिर्मायां तदाकरोत् ॥ ३८
नगरोपवने कृत्वा शिष्यैर्युक्तः स्थितिं तदा ।
मायां प्रवर्तयामास मायिनामपि मोहिनीम् ॥ ३ ९
शिवार्चनप्रभावेण तन्माया सहसा मुने ।
त्रिपुरे न चचालाशु निर्विण्णोऽभूत्तदा यतिः ॥ ४०
अथ विष्णुं स सस्मार तुष्टाव च हृदा बहु ।
नष्टोत्साहो विचेतस्को हृदयेन विदूयता ॥ ४१
तत्स्मृतस्त्वरितं विष्णुः सस्मार शंकरं हृदि ।
प्राप्याज्ञां मनसा तस्य स्मृतवान्नारदं द्रुतम् ॥ ४२
स्मृतमात्रेण विष्णोश्च नारदः समुपस्थितः ।
नत्वा स्तुत्वा पुरस्तस्य स्थितोऽभूत्साञ्जलिस्तदा ॥ ४३
अथ तं नारदं प्राह विष्णुर्मतिमतां वरः ।
लोकोपकारनिरतो देवकार्यकरः सदा ॥ ४४
शिवाज्ञयोच्यते तात गच्छ त्वं त्रिपुरं द्रुतम् ।
ऋषिस्तत्र गतः शिष्यैर्मोहार्थं तत्सुवासिनाम् ॥ ४५
सनत्कुमार उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य नारदो मुनिसत्तमः ।
गतस्तत्र द्रुतं यत्र स ऋषिर्मायिनां वरः ॥ ४६
नारदोऽपि तथा मायी नियोगान्मायिनः प्रभोः ।
प्रविश्य तत्पुरं तेन मायिना सह दीक्षितः ॥ ४७
ततश्च नारदो गत्वा त्रिपुराधीशसन्निधौ ।
क्षेमप्रश्नादिकं कृत्वा राज्ञे सर्वं न्यवेदयत् ॥ ४८
कश्चित्समागतश्चात्र नारद उवाच
यतिर्धर्मपरायणः ।
सर्वविद्याप्रकृष्टो हि वेदविद्यापरान्वितः ॥ ४ ९
दृष्ट्वा च बहवो धर्मा नैतेन सदृशाः पुनः । युद्धखण्ड ) ८४१ सनत्कुमार बोले- इसके बाद विष्णुको प्रणाम करके वह मायावी अपने शिष्योंके साथ प्रसन्नतापूर्वक शीघ्र ही शिवकी इच्छाके अनुसार कार्य करनेवाले त्रिपुरके पास गया । महामायावी विष्णुद्वारा प्रेरित वह जितेन्द्रिय ऋषि त्रिपुरमें शीघ्र प्रविष्ट होकर मायाचार करने लगा । उसने शिष्योंके सहित नगरके उपवनमें निवासकर बड़े - बड़े मायावियोंको भी मोहित करनेवाली माया फैलायी ॥ ३७–३९ ॥ हे मुने! जब शिवजीके अर्चनके प्रभावके कारण उसकी माया त्रिपुरमें सहसा न चल सकी, तो यति व्याकुल हो उठा । इसके बाद उत्साहहीन तथा चेतनारहित उसने दुखी मनसे विष्णुका स्मरण किया और हृदयसे उनकी स्तुति की । उसके द्वारा स्मरण किये गये विष्णुजीने हृदयमें शंकरजीका ध्यान किया और उनकी आज्ञा प्राप्तकर शीघ्र ही मनसे नारदजीका स्मरण किया ॥ ४०–४२ ॥ विष्णुजीके स्मरण करते ही नारदजी उपस्थित हुए और उन्हें प्रणामकर तथा उनकी स्तुतिकर हाथ जोड़े हुए वे उनके आगे खड़े हो गये । तब बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ विष्णुजीने नारदजीसे कहा- आप तो सर्वदा लोकोपकारमें निरत तथा देवताओंका कार्य करनेवाले हैं । हे तात! मैं शिवजीकी आज्ञासे कहता हूँ कि आप शीघ्र ही त्रिपुरमें जायँ, उस पुरके निवासियोंको मोहित करनेके लिये एक ऋषि अपने शिष्योंके साथ वहाँ गये हैं ॥ ४३–४५ ॥ सनत्कुमार बोले — उनका यह वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ नारदजी बड़ी शीघ्रतासे वहाँ गये, जहाँ मायावियोंमें श्रेष्ठ वह ऋषि था । नारदजी भी बड़े मायावी थे, उन्होंने मायावी प्रभु [ विष्णु ] की आज्ञासे उस पुरमें प्रवेशकर उस मायावीसे दीक्षा ग्रहण कर ली । उसके बाद नारदजीने त्रिपुराधिपतिके पास जाकर उसका कुशल - मंगल आदि पूछकर राजासे सारा वृत्तान्त कहा ॥ ४६-४८ ॥ सभी नारदजी बोले - [ हे राजन्! ] धर्मपरायण विद्याओंमें पारंगत और वेदविद्यामें प्रवीण कोई यति आपके नगरमें आया है । हमने बहुत धर्म देखे हैं, परंतु इसके समान नहीं । इसके सनातनधर्मको देखकर हमने
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८४२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४ वयं सुदीक्षिताश्चात्र दृष्ट्वा धर्मं सनातनम् ॥५०
तवेच्छा यदि वर्तेत तद्धर्मे दैत्यसत्तम ।
तद्धर्मस्य महाराज ग्राह्या दीक्षा त्वया पुनः ॥ ५१
सनत्कुमार उवाच
तदीयं स वचः श्रुत्वा महदर्थसुगर्भितम् ।
विस्मितो हृदि दैत्येशो जगौ तत्र विमोहितः ॥ ५२
नारदो दीक्षितो यस्माद्वयं दीक्षामवाप्नुमः ।
इत्येवं च विदित्वा वै जगाम स्वयमेव ह ॥ ५३
तद्रूपं च तदा दृष्ट्वा मोहितो मायया तथा ।
उवाच वचनं तस्मै नमस्कृत्य महात्मने ॥५४
त्रिपुराधिप उवाच
दीक्षा देया त्वया मह्यं निर्मलाशय भो ऋषे ।
अहं शिष्यो भविष्यामि सत्यं सत्यं न संशयः ॥ ५५
इत्येवं तु वचः श्रुत्वा दैत्यराजस्य निर्मलम् ।
प्रत्युवाच सुयत्नेन ऋषिः स च सनातनः ॥ ५६
मदीया करणीया स्याद्यद्याज्ञा दैत्यसत्तम ।
तदा देया मया दीक्षा नान्यथा कोटियत्नतः ॥ ५७
इत्येवं तु वचः श्रुत्वा राजा मायामयोऽभवत् ।
उवाच वचनं शीघ्रं यतिं तं हि कृताञ्जलिः ॥ ५८
दैत्य उवाच
यथाज्ञां दास्यसि त्वं हि तत्तथैव न चान्यथा ।
त्वदाज्ञां नोल्लंघयिष्ये सत्यं सत्यं न संशयः ॥ ५ ९
सनत्कुमार उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य त्रिपुराधीशितुस्तदा ।
दूरीकृत्य मुखाद्वस्त्रमुवाच ऋषिसत्तमः ॥ ६०
दीक्षां गृह्णीष्व दैत्येन्द्र सर्वधर्मोत्तमोत्तमाम् ।
येन दीक्षाविधानेन प्राप्स्यसि त्वं कृतार्थताम् ॥ ६१
इत्युक्त्वा स तु मायावी दैत्यराजाय सत्वरम् ।
ददौ दीक्षां स्वधर्मोक्तां तस्मै विधिविधानतः ॥ ६२
दैत्यराजे दीक्षिते च तस्मिन्ससहजे मुने । सर्वे च दीक्षिता जातास्तत्र त्रिपुरवासिनः ॥ ६३ | इससे दीक्षा ले ली है 1 । अतः हे दैत्यसत्तम! हे | यदि आपकी भी इच्छा उस धर्ममें हो, तो आप महाराज! धर्मकी दीक्षा ग्रहण कर लें ॥ ४ ९ -५१ ॥ भी उस सनत्कुमार बोले- नारदजीका विशद | अर्थगर्भित वचन सुनकर वह दैत्याधिपति | विस्मित हो उठा और मोहित होकर मनमें कहने बड़ा कि जब नारदजीने स्वयं दीक्षा ली है, तो हम लगा भी उससे दीक्षा ग्रहण कर लें - ऐसा सोचकर वह स्वयं वहाँ गया॥५२-५३ ॥ उसके स्वरूपको देखकर उसकी मायासे मोहित दैत्यने उस महात्माको नमस्कार करके यह वचन कहा— ॥ ५४ ॥
त्रिपुराधिप बोला - पवित्र अन्तःकरणवाले हे ऋषे! आप मुझे भी दीक्षा दीजिये, मैं आपका शिष्य बनूँगा, यह सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं है ॥ ५५ ॥
दैत्यराजके इस निर्मल वचनको सुनकर उस सनातन ऋषिने प्रयत्नके साथ कहा- हे दैत्यसत्तम! यदि तुम मेरी आज्ञाका सर्वथा पालन करोगे, तभी मैं दीक्षा दे सकता हूँ, अन्यथा करोड़ों यत्न करनेपर भी दीक्षा नहीं दूँगा । इस प्रकार यह वचन सुनकर राज्य मायाके अधीन हो गया और हाथ जोड़कर बड़ी शीघ्रता से यतिसे यह वचन कहने लगा— ॥ ५६–५८ ॥ दैत्यराज बोला — आप जैसी आज्ञा देंगे, मैं वैसा ही करूँगा । उसके विपरीत नहीं करूँगा, मैं आपकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं करूँगा, यह सत्य है — सत्य है, इसमें संशय नहीं है ॥५ ९ ॥ सनत्कुमार बोले- त्रिपुराधिपतिका यह वचन | सुनकर उस ऋषिश्रेष्ठने अपने मुखसे वस्त्र हटाकर उससे कहा- हे दैत्येन्द्र! आप सभी धर्मोंमें परम | उत्तम इस दीक्षाको ग्रहण कीजिये, जिस दीक्षा विधानसे तुम कृतार्थ हो जाओगे ॥ ६०-६१ ॥ [ सनत्कुमार बोले- ] ऐसा कहकर उस मायावीने | विधि - विधानके साथ अपने धर्ममें बतायी गयी । दीक्षा उस दैत्यराजको शीघ्र ही प्रदान की । हे मुने! | अपने सहोदरोंके सहित दैत्यराजके दक्षि | हो जानेपर सभी उस धर्ममें दीक्षित त्रिपुरवासी भी उस हो गये ॥ ६२-६३ ॥
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अ ०५ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड ) ८४३ मुनेः शिष्यैः प्रशिष्यैश्च व्याप्तमासीद् द्रुतं तदा । हे मुने! उस समय महामायावी उस ऋषिके शिष्यों तथा प्रशिष्योंसे वह सम्पूर्ण त्रिपुर शीघ्र ही महामायाविनस्तत्तु त्रिपुरं सकलं मुने ॥ ६४ व्याप्त हो गया ॥६४ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे सनत्कुमारपाराशर्य-संवादे त्रिपुरदीक्षाविधानं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें सनत्कुमारपाराशर्यसंवादमें त्रिपुरदीक्षाविधानवर्णन नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः मायावी यतिद्वारा अपने धर्मका उपदेश, त्रिपुरवासियोंका उसे स्वीकार करना, वेदधर्मके नष्ट हो जानेसे त्रिपुरमें अधर्माचरणकी प्रवृत्ति व्यास उवाच
दैत्यराजे दीक्षिते च मायिना तेन मोहिते ।
किमुवाच तदा मायी किं चकार स दैत्यपः ॥ १
सनत्कुमार उवाच
दीक्षां दत्त्वा यतिस्तस्मा अरिहन्नारदादिभिः ।
शिष्यैः सेवितपादाब्जो दैत्यराजानमब्रवीत् ॥ २
अरिहन्नुवाच
शृणु दैत्यपते वाक्यं मम संज्ञानगर्भितम् ।
वेदान्तसारसर्वस्वं रहस्यं परमोत्तमम् ॥ ३
अनादिसिद्धः संसारः कर्तृकर्मविवर्जितः ।
स्वयं प्रादुर्भवत्येव स्वयमेव विलीयते ॥ ४
ब्रह्मादिस्तंबपर्यन्तं यावद्देहनिबंधनम् ।
आत्मैवैकेश्वरस्तत्र न द्वितीयस्तदीशिता ॥ ५
यद् ब्रह्मविष्णुरुद्राख्यास्तदाख्या देहिनामिमाः ।
आख्या यथास्मदादीनामरिहन्नादिरुच्यते ॥ ६
देहो यथास्मदादीनां स्वकालेन विलीयते ।
ब्रह्मादिमशकांतानां स्वकालाल्लीयते तथा ॥ ७
। विचार्यमाणे देहेऽस्मिन्न किंचिदधिकं क्वचित् ।
आहारो मैथुनं निद्रा भयं सर्वत्र यत्समम् ॥ ८
। निराहारपरीमाणं प्राप्य सर्वो हि देहभृत् ।
सदृशीमेव संतृप्तिं प्राप्नुयान्नाधिकेतराम् ॥ ९
। यथा वितृषिताः स्याम पीत्वा पेयं मुदा वयम् । व्यासजी बोले – उस मायावीके द्वारा मोहित दैत्यराजके दीक्षित हो जानेपर उस मायावीने क्या कहा और दैत्यराजने क्या किया? ॥१ ॥
सनत्कुमार बोले — उसे दीक्षा देकर नारदादि शिष्योंके द्वारा सेवित चरणकमलोंवाले अरिहन् यतिने दैत्यराजसे कहा- ॥२ ॥
अरिहन् बोले — हे दैत्यराज! मेरे वचनको सुनो, जो वेदान्तका सार - सर्वस्व, परमोत्तम तथा रहस्यमय है । यह संसार कर्ता तथा कर्मसे रहित और अनादिकालसे स्वयंसिद्ध है । यह स्वयं उत्पन्न होता है तथा स्वयं विनष्ट भी हो जाता है । ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त जितने भी शरीरधारी हैं, उनका एक आत्मा ही ईश्वर है, कोई दूसरा उनका शासक नहीं है । जिस प्रकार हम शरीरधारियोंके नाम हैं, उसी प्रकार ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश आदि — ये नाम उन नामधारियोंके हैं, अनादि तो एक अरिहन् ही है॥३–६ ॥ जिस प्रकार हमलोगोंका शरीर समय आनेपर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार ब्रह्मासे लेकर मच्छरतकका शरीर अपने समयसे नष्ट हो जाया करता है ॥ ७ ॥
विचार करनेपर ज्ञात होता है कि शरीरमें कहीं भी कोई विशेषता नहीं है; क्योंकि सभी जीवधारियोंमें आहार, मैथुन, निद्रा तथा भय समान हैं ॥ ८ ॥
सभी शरीरधारी निराहार रहनेके उपरान्त भोजन प्राप्त करनेपर समान रूपसे तृप्त होते हैं, कम पा अधिक नहीं । जैसे जब हम प्यासे होते हैं, तब प्रसन्नतापूर्वक जल पीकर तृप्त होते हैं, उसी प्रकार
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८४४ तृषितास्तु तथान्येऽपि न विशेषोऽल्पकोऽधिकः सन्तु नार्यः सहस्त्राणि रूपलावण्यभूमयः परं निधुवने काले ह्यैकेवेहोपयुज्यते अश्वाः पराः शताः सन्तु सन्त्वनेकेऽप्यनेकधा । अधिरोहे तथाप्येको न द्वितीयस्तथात्मनः
पर्यङ्कशायिनां स्वापे सुखं यदुपजायते ।
तदेव सौख्यं निद्राभिर्भूतभूशायिनामपि ॥
यथैव मरणाद्भीतिरस्मदादिवपुष्मताम् ।
ब्रह्मादिकीटकांतानां तथा मरणतो भयम् ॥
सर्वे तनुभृतस्तुल्या यदि बुद्ध्या विचार्य्यते ।
इदं निश्चित्य केनापि नो हिंस्यः कोऽपि कुत्रचित् ॥
धर्मो जीवदयातुल्यो न क्वापि जगतीतले । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कार्या जीवदया नृभिः एकस्मिन् रक्षिते जीवे त्रैलोक्यं रक्षितं भवेत् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ५ ॥ १० अन्य प्राणी भी तृप्त होते हैं, किसीमें न्यूनाधिक्य । होता । रूप - लावण्यसे युक्त चाहे सहस्रों स्त्रियाँ नहीं । क्यों ॥ ११ । न हों, किंतु सहवासकालमें एक ही स्त्रीका उपभोग सम्भव है ॥ ९ -११ ॥ अनेक प्रकारके घोड़े चाहे सौ हों, चाहे ॥ १२ हजार हों, किंतु अपने अधिरोहणके समय एकका ही उपयोग सम्भव है, दूसरेका नहीं । निद्राकालमें पलंगपर सोनेवालेको जो सुख प्राप्त होता है, वही सुख निद्रासे १३ व्याकुल हो पृथ्वीपर सोनेवालेको भी प्राप्त होता है । जैसे हम शरीरधारियोंको मरनेका भय है, उसी १४ प्रकार ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सभीको मृत्युसे भय होता है॥१२–१४ ॥ यदि बुद्धिसे विचार किया जाय, तो १५ सभी शरीरधारी समान हैं - ऐसा निश्चय करके किसीको भी कभी किसी जीवकी हिंसा नहीं करनी चाहिये । पृथ्वीतलपर जीवोंपर दया करनेके समान ॥ १६ कोई दूसरा धर्म नहीं है, अतः ऐसा जानकर सभी प्रकारके प्रयत्नोंद्वारा मनुष्योंको जीवोंपर दया करनी चाहिये । एक जीवकी भी रक्षा करनेसे जैसे तीनों घातिते घातितं तद्वत्तस्माद्रक्षेन्न घातयेत् ॥ १७ लोकोंकी रक्षा हो जाती है, उसी प्रकार एक जीवके
अहिंसा परमो धर्मः पापमात्मप्रपीडनम् ।
अपराधीनता मुक्तिः स्वर्गोऽभिलषिताशनम् ॥
पूर्वसूरिभिरित्युक्तं सत्प्रमाणतया ध्रुवम् ।
तस्मान्न हिंसा कर्त्तव्या नरैर्नरकभीरुभिः ॥
न हिंसासदृशं पापं त्रैलोक्ये सचराचरे ।
हिंसको नरकं गच्छेत्स्वर्गं गच्छेदहिंसकः ॥
सन्ति दानान्यनेकानि किं तैस्तुच्छफलप्रदैः ।
अभीतिसदृशं दानं परमेकमपीह न ॥
इह चत्वारि दानानि प्रोक्तानि परमर्षिभिः ।
विचार्य नानाशास्त्राणि शर्मणेऽत्र परत्र च ॥
मारनेसे त्रैलोक्यवधका पाप लगता है, इसलिये । जीवोंकी रक्षा करनी चाहिये, हिंसा नहीं । अहिंसा १८ सर्वश्रेष्ठ धर्म है तथा आत्माको पीड़ा पहुँचाना पाप है, दूसरोंके अधीन न रहना ही मुक्ति है और । अभिलषित भोजनकी प्राप्ति ही स्वर्ग है । प्राचीन १ ९ विद्वानोंने उत्तम प्रमाणके साथ ऐसा कहा है, इसलिये । नरकसे डरनेवाले मनुष्योंको हिंसा नहीं करनी चाहिये । इस चराचर जगत्में हिंसाके समान कोई पाप नहीं है । २० हिंसक नरकमें जाता है तथा अहिंसक स्वर्गको जाता है ॥ १५–२० ॥ संसारमें अनेक प्रकारके दान हैं, परंतु तुच्छ फल २१ देनेवाले उन दानोंसे क्या लाभ? अभयदानके सदृश कोई दूसरा दान नहीं है । मनीषियोंने अनेक शास्त्रोंका | विचारकर इस लोक तथा परलोकमें कल्याणके लिये २२ चार दानोंका वर्णन किया है ॥ २१-२२ ॥
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५ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड ) ८४५ अ ० भीतेभ्यश्चाभयं देयं व्याधितेभ्यस्तथौषधम् । भयभीत लोगोंको अभय प्रदान करना | विद्यार्थिनां विद्या देयमन्नं क्षुधातुरे ॥ २३ चाहिये, रोगियोंको औषधि देनी चाहिये, विद्यार्थियोंको | देया
यानि यानीह दानानि बहु मुन्युदितानि च ।
जीवाभयप्रदानस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ २४
अविचिन्त्यप्रभावं हि मणिमंत्रौषधं बलम् ।
तदभ्यस्यं प्रयत्नेन नामार्थोपार्जनाय वै ॥ २५
अर्थानुपार्ण्य बहुशो द्वादशायतनानि वै ।
परितः परिपूज्यानि किमन्यैरिह पूजितैः ॥ २६
पंचकर्मेन्द्रियग्रामाः पंच बुद्धीन्द्रियाणि च ।
मनो बुद्धिरिह प्रोक्तं द्वादशायतनं शुभम् ॥२७
इहैव स्वर्गनरकौ प्राणिनां नान्यतः क्वचित् ।
सुखं स्वर्गः समाख्यातो दुःखं नरकमेव हि ॥ २८
सुखेषु भुज्यमानेषु यत्स्याद्देहविसर्जनम् ।
अयमेव परो मोक्षो विज्ञेयस्तत्त्वचिंतकैः ॥ २ ९
वासनासहिते क्लेशसमुच्छेदे सति ध्रुवम् ।
अज्ञानोपरमो मोक्षो विज्ञेयस्तत्त्वचिंतकैः ॥ ३०
प्रामाणिकी श्रुतिरियं प्रोच्यते वेदवादिभिः ।
न हिंस्यात्सर्वभूतानि नान्या हिंसाप्रवर्तिका ॥३१
अग्निष्टोमीयमिति या भ्रामिका साऽसतामिह ।
न सा प्रमाणं ज्ञातॄणां पश्वालंभनकारिका ॥ ३२
वृक्षांश्छित्वा पशून् हत्वा कृत्वा रुधिरकर्द्दमम् ।
दग्ध्वा वह्नौ तिलाज्यादि चित्रं स्वर्गोऽभिलष्यते ॥ ३३
इत्येवं ।
स्वमतं प्रोच्य यतिस्त्रिपुरनायकम् ॥ ३४
पौरानुवाच पुनरादरात् श्रावयित्वाखिलान् विद्या देनी चाहिये तथा भूखोंको अन्न प्रदान करना चाहिये । अनेक मुनियोंने जो - जो दान कहे हैं, वे अभयदानकी सोलहवीं कलाकी भी बराबरी नहीं कर सकते ॥ २३-२४ ॥ मणि, मन्त्र एवं औषधिके प्रभाव तथा बलको अविचिन्त्य समझकर केवल यश तथा अर्थके उपार्जनके लिये ही उसका प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करना चाहिये ॥ २५ ॥
बहुत धन उपार्जितकर द्वादशायतनोंका ही चारों ओरसे पूजन करना चाहिये, दूसरोंके पूजनसे क्या लाभ? पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, मन एवं बुद्धि - यही शुभ द्वादशायतन कहा गया है ॥ २६-२७ ॥ प्राणियोंके लिये यहींपर स्वर्ग तथा नरक है, अन्यत्र कहीं नहीं । सुखका ही नाम स्वर्ग है तथा दुःखको नरक कहा गया है । सुखोंका भोग कर लेनेपर जो इस देहका परित्याग होता है, तत्त्वचिन्तकोंको इसे ही परम मोक्ष जानना चाहिये । वासनासहित समस्त क्लेशोंके नष्ट हो जानेपर अज्ञानके नाशको तत्त्वचिन्तकोंको मोक्ष जानना चाहिये ॥ २८–३० ॥ वेदवेत्ता इस श्रुतिको प्रामाणिक कहते हैं कि भी प्राणीकी हिंसा न करे । हिंसामें प्रवर्तन किसी करनेवाली अन्य कोई श्रुति उपलब्ध नहीं है । अग्निष्टोमादि यज्ञोंसे सम्बद्ध जो पश्वालम्भन - श्रुति है, वह तो भ्रम उत्पन्न करनेवाली है और असज्जनोंके । लिये है । पशुवधसे सम्बन्धित श्रुति तो ज्ञानियोंके लिये प्रमाण नहीं है । यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है कि वृक्षोंको काटकर, पशुओंका वधकर, उनके रुधिरका कीच बनाकर तथा आगमें तिल - घी आदिको जलाकर लोग स्वर्गकी अभिलाषा करते हैं ॥ ३१ - ३३ ॥ इस प्रकार उस त्रिपुराधिपतिसे अपना विचार सुनाकर वह यति कहकर समस्त त्रिपुरवासियोंको आदरसे वेदोंके विपरीत, देहमात्रको सुख देनेवाले और प्रत्यक्षपर ही विश्वास करनेवाले धर्मोंका पुनः
दृष्टार्थप्रत्ययकरान्देहसौख्यैकसाधकान् 1 ॥ ३५ । वर्णन करने लगा — ॥ ३४-३५ ॥
बौद्धागमविनिर्दिष्टान्धर्मान्वेदपरांस्ततः
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८४६ आनंदं ब्रह्मणो रूपं श्रुत्यैवं यन्निगद्यते तत्तथैवेह मंतव्यं मिथ्या नानात्वकल्पना यावत्स्वस्थमिदं वर्ष्म यावन्नेन्द्रियविक्लवः यावज्जरा च दूरेऽस्ति तावत्सौख्यं प्रसाधयेत् अस्वास्थ्येन्द्रियवैकल्ये वार्द्धके तु कुतः सुखम् शरीरमपि दातव्यमर्थिभ्योऽतः सुखेप्सुभिः याचमानमनोवृत्तिप्रीणने यस्य नो जनिः तेन भूर्भारवत्येषा समुद्रागद्रुमैर्न हि ॥ सत्वरं गत्वरो देहः संचयाः सपरिक्षयाः इति विज्ञाय विज्ञाता देहसौख्यं प्रसाधयेत् श्ववायसकृमीणां च प्रातर्भोज्यमिदं वपुः भस्मान्तं तच्छरीरं च वेदे सत्यं प्रपठ्यते मुधा जातिविकल्पोऽयं लोकेषु परिकल्प्यते मानुष्ये सति सामान्ये कोऽधमः कोऽथ चोत्तमः ब्रह्मादिसृष्टिरेषेति प्रोच्यते वृद्धपूरुषैः तस्य जातौ सुतौ दक्षमरीची चेति विश्रुतौ
मारीचेन कश्यपेन दक्षकन्याः सुलोचनाः ।
धर्मेण किल मार्गेण परिणीतास्त्रयोदश ॥
अपीदानींतनैर्मत्यैरल्पबुद्धिपराक्रमैः अपि गम्यस्त्वगम्योऽयं विचारः क्रियते मुधा ॥ मुखबाहूरुसञ्जातं चातुर्वर्ण्य सहोदितम् । कल्पनेयं कृता पूर्वन घटेत विचारतः एकस्यां च तनौ जाता एकस्माद्यदि वा क्वचित् । चत्वारस्तनयास्तत्किं भिन्नवर्णत्वमाप्नुयुः
वर्णावर्णविभागोऽयं तस्मान्न प्रतिभासते ।
अतो भेदो न मंतव्यो मानुष्ये केनचित्क्वचित् ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ५ । श्रुति जो ऐसा कहती है कि आनन्द ही ॥ ३६ रूप है, उसे सही मानना चाहिये, अनेक ब्रह्मका धर्मोकी । कल्पना मिथ्या है । जबतक यह शरीर स्वस्थ । जबतक इन्द्रियाँ निर्बल नहीं होतीं और जबतक है, ॥ ३७ वृद्धावस्था दूर है, तबतक सुखका उपभोग करते रहना चाहिये ॥ ३६-३७ ॥ । अस्वस्थ हो जानेपर, इन्द्रियोंके विकल हो ॥ ३८ जानेपर एवं वृद्धावस्था आ जानेपर सुखकी प्राप्ति किस प्रकारसे हो सकती है? इसलिये सुख चाहने-वालोंको अपना शरीर भी याचना करनेवालोंको प्रदान कर देना चाहिये ॥ ३८ ॥
। जिसका जन्म माँगनेवालोंकी मनोवृत्तिको प्रसन्न ३ ९ करनेके लिये नहीं हुआ, उसीसे यह पृथ्वी भारयुक्त है, समुद्रों, पर्वतों तथा वृक्षोंसे नहीं ॥ ३ ९ ॥ । यह शरीर शीघ्र ही नष्ट होनेवाला है तथा संचित ॥ ४० धन विनष्ट हो जानेवाले हैं - ऐसा जानकर ज्ञानवान्को देहसुखका उपाय करते रहना चाहिये ॥४० ॥
। यह शरीर कुत्तों, कौवों तथा कीटोंका प्रात: कालीन ॥ ४१ भोजन है और शरीर अन्तमें भस्म होनेवाला है - ऐसा वेदमें ठीक ही कहा गया है । लोकोंमें जाति - कल्पना । व्यर्थ ही की गयी है, सभी मनुष्य समान हैं तो कौन ॥ ४२ उच्च है और कौन नीच है!॥ ४१-४२ ॥ । प्राचीन पुरुष कहते हैं कि इस सृष्टिके आदिमें ॥ ४३ ब्रह्मा उत्पन्न हुए, उनके विख्यात दक्ष तथा मरीचि दो पुत्र उत्पन्न हुए ॥४३ ॥
जब मरीचिपुत्र कश्यपने दक्षकी सुन्दर नेत्रवाली ४४ तेरह कन्याओंसे धर्मपूर्वक विवाह किया तो फिर इसक | समयके अल्पबुद्धि तथा अल्प पराक्रमवाले लोगों के ४५ द्वारा यह गम्य है, यह अगम्य है - ऐसा विचार व्यर्थ ही । किया जाता है । मुख, बाहु, जंघा एवं चरणसे चारों वर्ण उत्पन्न हुए हैं - पूर्व पुरुषोंने यह कल्पना की है, जो ॥ ४६ कि विचार करनेपर ठीक नहीं लगती है ॥ ४४–४६ ॥ एक ही पुरुषसे एक ही शरीरसे यदि चार पुत्र ॥ ४७ उत्पन्न हुए तो वै भिन्न - भिन्न वर्णोंके किस प्रकार • हो । सकते हैं । अतः वर्ण एवं अवर्णका यह विभाग उचित | नहीं प्रतीत होता है और इसलिये किसीको भी ४८ मनुष्यमें कोई भेद नहीं मानना चाहिये ॥ ४७-४८ ॥
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रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड ) ८४७ अ ० ५ ] सनत्कुमार उवाच दैत्येशं पौरांश्च स यतिर्मुने । | इत्थमाभाष्य वेदधर्मांश्च नाशयामास चादरात् ॥ सशिष्यो खंडयामास पातिव्रत्यपरं महत् । स्त्रीधर्मं स्वामिन्द्रियत्वं सर्वेषां पुरुषाणां तथैव सः ॥
देवधर्मान्विशेषेण श्राद्धधर्मांस्तथैव च ।
मखधर्मान् व्रतादींश्च तीर्थश्राद्धं विशेषतः ॥
शिवपूजां विशेषेण लिंगाराधनपूर्विकाम् ।
विष्णु सूर्यगणेशादिपूजनं विधिपूर्वकम् ॥
स्नानदानादिकं सर्वं पर्वकाले विशेषतः ।
खंडयामास स यतिर्मायी मायाविनां वरः ॥
किं बहूक्तेन विप्रेन्द्र त्रिपुरे तेन मायिना ।
वेदधर्माश्च ये केचित्ते सर्वे दूरतः कृताः ॥
यतिधर्माश्रयाः सर्वा मोहितास्त्रिपुरांगनाः ।
भर्तृशुश्रूषणवर्ती विजहुर्मतिमुत्तमाम् ॥
अभ्यस्याकर्षणीं विद्यां वशीकृत्यमयीमपि ।
पुरुषाः सफलीचक्रुः परदारेषु मोहिताः ॥
अंत: पुरचरा नार्यस्तथा राजकुमारकाः ।
पौराः पुरांगनाश्चापि सर्वे तैश्च विमोहिताः ॥
एवं पौरेषु सर्वेषु निजधर्मेषु सर्वथा ।
पराङ्मुखेषु जातेषु प्रोल्ललास वृषेतरः ॥
माया च देवदेवस्य विष्णोस्तस्याज्ञया प्रभो ।
अलक्ष्मीश्च स्वयं तस्य नियोगात्त्रिपुरं गता ॥
या लक्ष्मीस्तपसा तेषां लब्धा देवेश्वराद्वरात् । बहिर्गता परित्यज्य नियोगाद्ब्रह्मणः प्रभोः बुद्धिमोहं तथाभूतं विष्णोर्मायाविनिर्मितम् । तेषां दत्त्वा क्षणादेव कृतार्थोऽभूत्स नारदः नारदोऽपि तथारूपो यथा मायी तथैव सः तथापि विकृतो नाभूत्पारमेशादनुग्रहात् आसीत्कुंठितसामर्थ्यो दैत्यराजोऽपि भो मुने भ्रातृभ्यां सहितस्तत्र मयेन च शिवेच्छया सनत्कुमार बोले- हे मुने! दैत्यपति तथा पुरवासियोंसे आदरपूर्वक ऐसा कहकर शिष्यों-४ ९ सहित उस यतिने वेदधर्मोंका नाश कर दिया । पातिव्रत्यरूपी महान् स्त्रीधर्मको तथा समस्त पुरुषोंके ५० जितेन्द्रियत्वधर्मको खण्डित कर दिया । देवधर्म, ५१ श्राद्धधर्म, यज्ञधर्म, व्रत - तीर्थ विशेषरूपसे श्राद्ध, शिवपूजा, लिंगार्चन, विष्णु - सूर्य - गणेश आदिका ५२ विधिपूर्वक पूजन और विशेष रूपसे पर्वकालमें किये जानेवाले स्नान - दान आदि इन सबका खण्डन किया । ५३ हे विप्रेन्द्र! बहुत कहनेसे क्या लाभ! मायावियोंमें श्रेष्ठ उस मायावी यतिने त्रिपुरमें जो कुछ भी धर्म थे, ५४ उन सबको दूर कर दिया ॥४ ९ –५४ ॥ त्रिपुरकी सभी स्त्रियाँ उस यतिके धर्मका आश्रय ५५ लेकर मोहमें पड़ गयीं और उन्होंने पतिकी सेवाके उत्तम विचारका त्याग कर दिया । आकर्षण एवं वशीकरण ५६ विद्याका अभ्यासकर मोहित हुए पुरुष दूसरोंकी स्त्रियोंमें अपने मनोरथ सफल करने लगे ॥ ५५-५६ ॥ अन्तःपुरकी स्त्रियाँ, राजकुमार, पुरवासी, पुरकी ५७ स्त्रियाँ आदि सभी मोहित हो गये ॥५७ ॥
इस प्रकार सभी पुरवासियोंके अपने धर्मोंसे सर्वथा ५८ विमुख हो जानेपर अधर्मकी वृद्धि होने लगी ॥ ५८ ॥
हे प्रभो! उन देवाधिदेव विष्णुजीकी मायासे ५ ९ और उनकी आज्ञासे स्वयं दरिद्रताने त्रिपुरमें प्रवेश किया ॥५ ९ ॥ उन लोगोंने जिस महालक्ष्मीको तपस्याके द्वारा ॥ ६० श्रेष्ठ देवेश्वरसे प्राप्त किया था, प्रभु ब्रह्मदेवकी आज्ञासे उन्हें छोड़कर वह बाहर चली गयी ॥ ६० ॥
इस प्रकार विष्णुकी मायासे निर्मित उस प्रकारके बुद्धिमोहको उन्हें क्षणभरमें देकर वे नारदजी ॥ ६१ कृतार्थ हो गये । उन नारदने भी उस मायावी जैसा रूप । धारण कर लिया था, फिर भी परमेश्वरके अनुग्रहसे ॥ 11 ६२ । वे विकारयुक्त नहीं हुए । हे मुने! दोनों भाइयों तथा । मयसहित वह दैत्यराज भी शिवजीकी इच्छासे ॥ ६३ पराक्रमहीन हो गया ॥ ६१–६३ ॥ पञ्चमे युद्धखण्डे त्रिपुरमोहनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्ड ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥
त्रिपुरमोहनवर्णन
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८४८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०६ अथ षष्ठोऽध्यायः त्रिपुरध्वंसके लिये देवताओंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति व्यास उवाच
तस्मिन् दैत्याधिपे पौरे सभ्रातरि विमोहिते ।
सनत्कुमार किं चासीत्तदाचक्ष्वाखिलं विभो ॥
सनत्कुमार उवाच त्रिपुरे च तथाभूते दैत्ये त्यक्तशिवार्चने स्त्रीधर्मे निखिले नष्टे दुराचारे व्यवस्थिते ॥
कृतार्थ इव लक्ष्मीशो देवैः सार्द्धमुमापतिम् ।
निवेदितुं तच्चरित्रं कैलासमगमद्धरिः ॥
तस्योपकंठं स्थित्वाऽसौ देवैः सह रमापतिः ।
ततो भूरि स च ब्रह्मा परमेण समाधिना ॥
मनसा प्राप्य सर्वज्ञं ब्रह्मणा स हरिस्तदा ।
तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः शंकरं पुरुषोत्तमः ॥
विष्णुरुवाच
महेश्वराय देवाय नमस्ते परमात्मने ।
नारायणाय रुद्राय ब्रह्मणे ब्रह्मरूपिणे ॥
एवं कृत्वा महादेवं दंडवत् प्रणिपत्य ह ।
जजाप रुद्रमंत्रं च दक्षिणामूर्तिसंभवम् ॥
जले स्थित्वा सार्द्धकोटिप्रमितं तन्मनाः प्रभुः ।
संस्मरन् मनसा शंभुं स्वप्रभुं परमेश्वरम् ॥
तावद्देवास्तदा सर्वे तन्मनस्का महेश्वरम् ॥
देवा ऊचुः
नमः सर्वात्मने तुभ्यं शंकरायार्तिहारिणे ।
रुद्राय नीलकंठाय चिद्रूपाय प्रचेतसे ॥
गतिर्नः सर्वदा त्वं हि सर्वापद्विनिवारकः ।
त्वमेव सर्वदास्माभिर्वद्यो देवारिसूदन ॥
त्वमादिस्त्वमनादिश्च स्वानंदश्चाक्षयः प्रभुः ।
प्रकृतेः पुरुषस्यापि साक्षात्स्त्रष्टा जगत्प्रभुः ॥
त्वमेव जगतां कर्ता भर्ता हर्ता त्वमेव हि । व्यासजी बोले- हे सनत्कुमार! हे विभो! | भाइयों तथा पुरवासियोंसहित उस दैत्यराजके मोहित १ हो जानेपर क्या हुआ, वह सारा वृत्तान्त कहिये ॥१३ ॥
सनत्कुमार बोले – त्रिपुरके वैसा हो जानेपर, उस दैत्यके शिवार्चनका त्याग कर देनेपर २ और वहाँका सम्पूर्ण स्त्रीधर्म नष्ट हो जानेपर तथा दुराचारके फैल जानेपर लक्ष्मीपति विष्णु कृतार्थ ३ होकर देवताओंके साथ उसके चरित्रको शिवजीसे कहनेके लिये कैलास पहुँचे ॥ २-३ ॥ देवताओंके साथ ब्रह्मासहित उनके पास स्थित ४ होकर उन पुरुषोत्तम रमापति विष्णुने समाधिसे तथा मनसे प्राप्त होनेवाले उन सर्वज्ञ परमेश्वर सदाशिवकी ५ इष्ट वाणीसे स्तुति की॥४-५ ॥ विष्णुजी बोले- आप महेश्वर, देव, परमात्मा, नारायण, रुद्र, ब्रह्मा तथा परब्रह्मस्वरूपको नमस्कार है । ६ ऐसा कहकर महादेवको दण्डवत् प्रणाम करके शिवमें अपना मन लगाये हुए प्रभु विष्णुने अपने स्वामी उन परमेश्वर शिवका मनसे स्मरण करते हुए जलमें स्थित हो ७ दक्षिणामूर्तिसे उत्पन्न हुए रुद्रमन्त्रका डेढ़ करोड़ जप किया । उस समय सभी देवता भी उन महेश्वरमें अपना ८ ९ मन लगाकर उनकी स्तुति करने लगे— ॥ ६ – ९ ॥ देवता बोले — सबमें आत्मरूपसे विराजमान, | सबके दुःखोंको दूर करनेवाले, रुद्र, नीलकण्ठ, । चैतन्यरूप एवं प्रचेता आप शंकरको नमस्कार है ॥ १० ॥
१० हैं आप हम सबकी आपत्तियोंको दर करनेवाले तथा हम सबकी गति हैं । हे दैत्यसूदन! आप सर्वद ११ हमलोगोंसे वन्दनीय हैं । आप आदि अनादि, स्वात्मानन्द, | अक्षयरूप तथा, तथा
१२ प्रभु है । आप ही जगत्प्रभु ॥
साक्षात् प्रकृति एवं पुरुषके भी स्रष्टा हैं ॥ ११-१२ आप ही रज, सत्त्व तथा तमोगुणसे युक्त होकर ब्रह्मा, ब्रह्मा विष्णुर्हरो भूत्वा रजःसत्त्वतमोगुणैः ॥ १३ विष्णु तथा रुद्रस्वरूप होकर जगत्का सृजन, पालन, । तथा संहार करते हैं । आप इस जगत्में सबको तारनेवाले, तारकोऽसि जगत्यस्मिन् सर्वेषामधिपोऽव्ययः । । सबके स्वामी अविनाशी, वाच्य वरदो वाङ्मयो वाच्यो वाच्यवाचकवर्जितः ॥ १४ और वाच्य,, वर देनेवाले, वाणीमय ॥ - वाचकभावसे रहित भी हैं ॥ १३-१४
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अ ० ६ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड ) ८४ ९
याच्यो मुक्त्यर्थमीशानो योगिभिर्योगवित्तमैः ।
योगिनां त्वं हि संस्थितः ॥ १५
हृत्पुंडरीकविवरे
वदंति वेदास्त्वां संतः परब्रह्मस्वरूपिणम् ।
भवन्तं तत्त्वमित्यद्य तेजोराशिं परात्परम् ॥ १६
परमात्मानमित्याहुरस्मिन् जगति यद्विभो ।
त्वमेव शर्व सर्वात्मन् त्रिलोकाधिपते भव ॥ १७
दृष्टं श्रुतं स्तुतं सर्वं ज्ञायमानं जगद्गुरो ।
अणोरल्पतरं प्राहुर्महतोऽपि महत्तरम् ॥ १८ ।
सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रवणघ्राणं त्वां नमामि च सर्वतः ॥ १ ९
सर्वज्ञं सर्वतो व्यापिन् सर्वेश्वरमनावृतम् ।
विश्वरूपं विरूपाक्षं त्वां नमामि च सर्वतः ॥ २०
सर्वेश्वरं भवाध्यक्षं सत्यं शिवमनुत्तमम् ।
कोटिभास्करसंकाशं त्वां नमामि च सर्वतः ॥ २१
विश्वदेवमनाद्यन्तं षट्त्रिंशत्कमनीश्वरम् ।
प्रवर्तकं च सर्वेषां त्वां नमामि च सर्वतः ॥ २२
प्रवर्तकं च प्रकृतेः सर्वस्य प्रपितामहम् ।
सर्वविग्रहमीशं हि त्वां नमामि च सर्वतः ॥ २३
एवं वदंति वरदं सर्वावासं स्वयम्भुवम् ।
श्रुतयः श्रुतिसारज्ञं श्रुतिसारविदश्च ये ॥ २४
अदृश्यमस्माभिरनेकभूतं लोके । त्वया कृतं यद्भवताथ त्वामेव देवासुरभूसुराश्च ॥ २५ अन्ये च वै स्थावरजंगमाश्च
पाह्यनन्यगतीन् शंभो सुरान्नो देववल्लभ ।
॥ २६
नष्टप्रायांस्त्रिपुरतो विनिहत्यासुरान्क्षणात् योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ योगिजन मुक्तिके लिये आप ईशानसे ही याचना करते हैं । आप ही योगियोंके हृदयरूप कमलमें विराजमान हैं ॥ १५ ॥
सभी वेद एवं सन्तगण आपको ही तेजोराशि, परात्परस्वरूप और तत्त्वमसि इत्यादि वाक्यसे जाननेयोग्य परब्रह्मस्वरूप कहते हैं ॥ १६ ॥
हे विभो! हे शर्व! हे सर्वात्मन्! हे त्रिलोकाधिपते! हे भव! इस संसारमें जिसे परमात्मा कहा जाता है, वह आप ही हैं ॥ १७ ॥
हे जगद्गुरो! आपको ही दृष्ट, श्रुत, जाननेयोग्य, छोटेसे भी छोटा एवं महान्से भी महान् कहा गया है ॥ १८ ॥
आपके हाथ, चरण, नेत्र, सिर, मुख, कान तथा नासिका सभी दिशाओंमें व्याप्त हैं, अतः मैं आपको सभी ओरसे नमस्कार करता हूँ ॥१ ९ ॥ हे सर्वव्यापिन्! आप सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, अनावृत, विश्वरूप, विरूपाक्षको मैं सब ओरसे नमस्कार करता हूँ ॥ २० ॥
सर्वेश्वर, संसारके अधिष्ठाता, सत्य, कल्याणकारी, सर्वोत्तम, करोड़ों सूर्यके समान प्रकाशमान आपको मैं सब ओरसे नमस्कार करता हूँ ॥२१ ॥
विश्वदेव, आदि - अन्तसे रहित, छत्तीस तत्त्वोंवाले, सबसे महान् और सबको प्रवृत्त करनेवाले - आपको मैं सब ओरसे नमस्कार करता हूँ ॥२२ ॥
प्रकृतिको प्रवृत्त करनेवाले, सबके प्रपितामह, सर्वविग्रह तथा ईश्वर आपको मैं सब ओरसे नमस्कार करता हूँ ॥२३ ॥
जो श्रुतियाँ तथा श्रुतिसिद्धान्तवेत्ता हैं, वे आपको ही वरद, सबका निवासस्थान, स्वयम्भू तथा श्रुतिसारज्ञाता कहते हैं ॥ २४ ॥
आपने इस लोकमें जो अनेक प्रकारकी सृष्टि की है, वह हमलोगोंके दृष्टिपथमें नहीं आ सकती । देवता, असुर, ब्राह्मण, स्थावर, जंगम तथा अन्य जो भी हैं, उनका कर्ता आपको ही कहते हैं ॥ २५ ॥
हे शम्भो! हे देववल्लभ! क्षणभरमें असुरोंका वध करके त्रिपुराधिपके द्वारा विनष्ट किये जा रहे हम । अनन्यगतिवाले देवताओंकी रक्षा कीजिये ॥ २६ ॥
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८५० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ६ मायया मोहितास्तेऽद्य भवतः परमेश्वर । हे परमेश्वर! हे प्रभो! इस समय वे विष्णुना प्रोक्तयुक्त्या त उज्झिता धर्मतः प्रभो ॥ २७ विष्णुजीके द्वारा बताये गये उपायसे असुर संत्यक्तसर्वधर्माश्च बौद्धागमसमाश्रिताः अस्मद्भाग्यवशाज्जाता दैत्यास्ते भक्तवत्सल सदा त्वं कार्यकर्त्ता हि देवानां शरणप्रद वयं ते शरणापन्ना यथेच्छसि तथा कुरु सनत्कुमार उवाच इति स्तुत्वा महेशानं देवास्तु पुरतः स्थिताः कृतांजलिपुटा दीना आसन् संनतमूर्तयः स्तुतश्चैवं सुरेन्द्राद्यैर्विष्णोर्जाप्येन चेश्वरः अगच्छत्तत्र सर्वेशो वृषमारुह्य हर्षितः विष्णुमालिंग्य नंदीशादवारुह्य प्रसन्नधीः ददर्श सुदृशा तत्र नन्दीदत्तकरोऽखिलान् ॥ अथ देवान् समालोक्य कृपादृष्ट्या हरिं हरः प्राह गंभीरया वाचा प्रसन्नः पार्वतीपतिः शिव उवाच ज्ञातं मयेदमधुना देवकार्यं सुरेश्वर । विष्णोर्मायाबलं चैव नारदस्य च धीमतः
तेषामधर्मनिष्ठानां दैत्यानां देवसत्तम ।
पुरत्रयविनाशं च करिष्येऽहं न संशयः ॥
परन्तु ते महादैत्या मद्भक्ता दृढमानसाः ।
अथ वध्या मयैव स्युर्व्याजत्यक्तवृषोत्तमाः ॥
विष्णुर्हन्यात्परो वाथ यत्त्याजितवृषाः कृताः ।
दैत्या मद्भक्तिरहिताः सर्वे त्रिपुरवासिनः ॥
इति शंभोस्तु वचनं श्रुत्वा सर्वे दिवौकसः ।
विमनस्का बभूवुस्ते हरिश्चापि मुनीश्वर ॥
आपकी | मायाद्वारा मोहित हो रहे हैं और धर्मसे हो रहे हैं ॥ २७ ॥ बहिर्मुख
। हे भक्तवत्सल! उन दैत्योंने हमलोगोंके भाग्यसे ॥ २८ समस्त धर्मोंका त्याग कर दिया है और वेदविरुद्ध धर्मोंका आश्रय ले लिया है ॥ २८ ॥
। हे शरणप्रद! आप तो सदासे ही देवताओंका ॥ २ ९ कार्य करनेवाले हैं और इस समय हम आपकी शरणमें आये हुए हैं, आप जैसा चाहें, वैसा करें ॥ २ ९ ॥ सनत्कुमार बोले- इस प्रकार महेश्वरकी । स्तुतिकर वे देवता दीन हो हाथ जोड़कर, सिर ॥ ३० झुकाकर उनके आगे खड़े हो गये ॥ ३० ॥
। इस प्रकार इन्द्रादि देवताओंके द्वारा स्तुति किये ॥ ३१ जानेपर तथा विष्णुके जपसे प्रसन्न हुए भगवान् सर्वेश्वर बैलपर सवार हो वहाँ गये ॥ ३१ ॥
। वहाँपर नन्दीश्वरसे उतरकर विष्णुका आलिंगन ३२ करके प्रसन्नचित्तवाले प्रभु नन्दीश्वरपर हाथ रखकर । सभीकी ओर मनोहर दृष्टिसे देखने लगे ॥३२ ॥
। तत्पश्चात् पार्वतीपति शंकर प्रसन्न होकर ॥ ३३ कृपादृष्टिसे देवताओं एवं विष्णुजीकी ओर देखकर । गम्भीर वाणीमें कहने लगे —॥३३ ॥
शिवजी बोले — हे सुरेश्वर! इस समय मैंने | देवताओंका कार्य भलीभाँति जान लिया है तथा ॥ ३४ महाबुद्धिमान् विष्णु एवं नारदके मायाबलको भी मैं अच्छी तरह जानता हूँ ॥ ३४ ॥
हे देवसत्तम! मैं उन अधर्मी दैत्यों तथा त्रिपुरका ३५ विनाश करूँगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ३५ ॥
किंतु दृढ़ मनवाले वे महादैत्य मेरे भक्त हैं, ३६ यद्यपि मायासे मोहित होकर उन्होंने धर्मका त्याग कर | दिया है, इसलिये मैं किस प्रकार उनका वध कर सकता हूँ ॥ ३६ ॥
जब त्रिपुरमें रहनेवाले सभी दैत्य मेरी भक्तिसे ३७ रहित हो गये हैं, तो उनका वध विष्णु करेंगे, | जिन्होंने बहानेसे दैत्योंको भगवान् किया है ॥ ३७ ॥
धर्मच्युत हे मुने! इस प्रकार शिवजीके वचनको सुनकर ३८ । सभी देवता तथा विष्णु अनमने हो गये ॥ ३८ ॥