शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 891–900

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 891–900

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अ ० १५ ] रुद्रसंहिता ( जलंधर उवाच

केनेदं विहितं राहोः शिरश्च्छेदनकं प्रभो ।

तद्ब्रूहि निखिलं वृत्तं यथावत्तत्त्वतो गुरो ॥ ७

सनत्कुमार उवाच

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य सिन्धुपुत्रस्य भार्गवः ।

स्मृत्वा शिवपदांभोजं प्रत्युवाच यथार्थवत् ॥ ८

शुक्र उवाच

जलंधर महावीर सर्वासुरसहायक ।

शृणु वृत्तांतमखिलं यथावत्कथयामि ते ॥ ९

पुराऽभवद् बलिर्वीरो विरोचनसुतो बली ।

हिरण्यकशिपोश्चैव प्रपौत्रो धर्मवित्तम ॥ १०

पराजिताः सुरास्तेन रमेशं शरणं ययुः ।

सवासवाः स्ववृत्तांतमाचख्युः स्वार्थसाधकाः ॥ ११

तदाज्ञयाऽसुरैः सार्द्धं चक्रुः संधिमथो सुराः 1 स्वकार्यसिद्धये तात छलकर्मविचक्षणाः ॥ १२

अथामृतार्थं सिंधोश्च मंथनं चक्रुरादरात् ।

विष्णोः सहायिनस्ते हि सुराः सर्वेऽसुरैस्सह ॥ १३

ततो रत्नोपहरणमकार्षुर्दैत्यशत्रवः ।

जगृहुर्यत्नतो देवाः पपुरप्यमृतं छलात् ॥ १४

ततः पराभवं चक्रुरसुराणां सहायतः ।

विष्णोः सुराः सशक्रास्तेऽमृतपानाद्बलान्विताः ॥ १५

शिरश्छेदं चकारासौ पिबतश्चामृतं हरिः ।

राहोर्देवसभायां वै पक्षपाती हरेस्सदा ॥ १६

सनत्कुमार उवाच

एवं कविस्तस्य शिरश्छेदं राहोः शशंस च ।

अमृतार्थे समुद्रस्य मंथनं देवकारितम् ॥ १७

रत्नोपहरणं चैव दैत्यानां च पराभवम् ।

देवैरमृतपानं च कृतं सर्वं च विस्तरात् ॥ १८

तदाकर्ण्य महावीरोऽम्बुधिबालः प्रतापवान् ।

चुक्रोध क्रोधरक्ताक्षः स्वपितुर्मथनं तदा ॥ १ ९

अथ दूतं समाहूय घस्मराभिधमुत्तमम् ।

सर्वं शशंस चरितं यदाह गुरुरात्मवान् ॥ २०

युद्धखण्ड ) ८८१ जलन्धर बोला- हे प्रभो! हे गुरो! राहुके सिरको किसने काटा है? हे गुरो! उस सम्पूर्ण वृत्तान्तको मुझे ठीक - ठीक बताइये ॥ ७ ॥

सनत्कुमार बोले- समुद्रपुत्र जलन्धरका यह वचन सुनकर भृगुपुत्र शुक्राचार्य शिवजीके चरणकमलोंका स्मरण करके यथार्थरूपमें कहने लगे -॥८ ॥

शुक्र बोले- हे जलन्धर! हे महावीर! हे असुरोंके सहायक! तुम सुनो, मैं सारा वृत्तान्त तुमसे यथार्थ रूपसे कह रहा हूँ । पूर्व समयमें विरोचनका पुत्र तथा हिरण्यकशिपुका प्रपौत्र वीर, बलवान् और धर्मात्मा बलि [ नामक दैत्य ] हुआ था॥९ -१० ॥ उससे पराजित हुए इन्द्रसहित सभी देवता, जो स्वार्थसाधनमें अत्यन्त निपुण थे, विष्णुकी शरणमें गये और उन्होंने अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त उनसे कहा ॥ ११ ॥

हे तात! तब छलकर्ममें निपुण उन देवताओंने उन विष्णुकी आज्ञासे अपने कार्यकी सिद्धिहेतु असुरोंके साथ सन्धि कर ली । इसके बाद विष्णुके सहायक उन सभी देवताओंने अमृतके लिये असुरोंके साथ आदरपूर्वक समुद्रमन्थन किया । तत्पश्चात् दैत्यशत्रु देवताओंने [ समुद्रमन्थनसे उत्पन्न हुए ] रत्न स्वयं हरण कर लिये और यत्नपूर्वक छलसे अमृत ग्रहण कर लिया तथा उसका पान भी कर लिया । तदनन्तर अमृतपानसे बलशाली हुए इन्द्रसहित उन देवताओंने विष्णुकी सहायतासे असुरोंको पराजित कर दिया ॥ १२–१५ ॥ इन्द्रके सर्वदा पक्षपाती उन विष्णुने देवताओंकी सभामें अमृत पीते हुए राहुका शिरश्छेदन कर दिया ॥ १६ ॥

सनत्कुमार बोले — इस प्रकार शुक्राचार्यने अमृतके लिये देवताओंद्वारा कराये गये समुद्रमन्थन, राहुके शिरश्छेदन, रत्नोंके अपहरण, दैत्योंके पराभव और देवोंद्वारा किये गये अमृतपान - इन सबका विस्तारपूर्वक वर्णन किया ॥ १७-१८ ॥ तब अपने पिता [ समुद्र ] -का मन्थन सुनकर क्रोधके कारण रक्त नेत्रोंवाला वह महावीर तथा महाप्रतापी समुद्रपुत्र जलन्धर कुपित हो उठा । इसके बाद उसने शीघ्र ही घस्मर नामक [ अपने ] उत्तम | दूतको बुलाकर उससे सारा वृत्तान्त कहा, जिसे

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८८२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १५

अथ तं प्रेषयामास स्वदूतं शक्रसन्निधौ ।

संमान्य बहुशः प्रीत्याऽभयं दत्त्वा विशारदम् ॥

दूतस्त्रिविष्टपं तस्य जगामारमलं सुधीः ।

घस्मरोऽम्बुधिबालस्य सर्वदेवसमन्वितम् ॥

तत्र गत्वा स दूतस्तु सुधर्मां प्राप्य सत्वरम् ।

गर्वादखर्वमौलिर्हि देवेन्द्रं वाक्यमब्रवीत् ॥

घस्मर उवाच

जलंधरोऽब्धितनयः सर्वदैत्यजनेश्वरः ।

सुप्रतापी महावीरः स्वयं कविसहायवान् ॥

दूतोऽहं तस्य वीरस्य घस्मराख्यो न घस्मरः ।

प्रेषितस्तेन वीरेण त्वत्सकाशमिहागतः ॥

अव्याहताज्ञः सर्वत्र जलंधर उदग्रधीः ।

निर्जिताखिलदैत्यारिः स यदाह शृणुष्व तत् ॥

जलंधर उवाच

कस्मात्त्वया मम पिता मथितः सागरोऽद्रिणा ।

नीतानि सर्वरत्नानि पितुर्मे देवताधम ॥

उचितं न कृतं तेऽद्य तानि शीघ्रं प्रयच्छ मे ।

ममायाहि विचार्येत्थं शरणं दैवतैः सह ॥

अन्यथा ते भयं भूरि भविष्यति सुराधम ।

राज्यविध्वंसनं चैव सत्यमेतद्ब्रवीम्यहम् ॥

सनत्कुमार उवाच

इति दूतवचः श्रुत्वा विस्मितस्त्रिदशाधिपः ।

उवाच तं स्मरन्निन्द्रो भयरोषसमन्वितः ॥

अद्रयो मद्भयात् त्रस्ताः स्वकुक्षिस्था यतः कृताः ।

अन्येऽपि मद् द्विषस्तेन रक्षिता दितिजाः पुरा ॥

तस्मात्तद्रत्नजातं तु मया सर्वं हृतं किल ।

न तिष्ठति मम द्रोही सुखं सत्यं ब्रवीम्यहम् ॥

। आत्मवान् गुरु शुक्राचार्यने बताया था । तत्पश्चात् २१ बहुत प्रकारसे सम्मानित करके तथा अभय देकर | अपने उस कुशल दूतको उसने प्रेमपूर्वक इन्द्रके समीप भेजा ॥ १ ९ - २१ ॥ उस समुद्रपुत्र जलन्धरका वह बुद्धिमान् २२ दूत घस्मर बड़ी शीघ्रतासे सभी देवगणोंसे युक्त स्वर्गलोकको गया ॥ २२ ॥

वहाँ जाकर वह दूत शीघ्र ही सुधर्मा सभामें २३ पहुँचकर बड़े अहंकारके साथ देवराज इन्द्रसे यह वचन कहने लगा —॥२३ ॥

घस्मर बोला - समुद्रपुत्र जलन्धर सभी दैत्योंका अधिपति, महाप्रतापी एवं महावीर है तथा शुक्राचार्य २४ उसके सहायक हैं । मैं उसी वीरका घस्मर नामक दूत हूँ और वस्तुतः घस्मर ( भक्षक ) नहीं हूँ, उसी वीरके द्वारा भेजे जानेपर मैं आपके पास आया हूँ । सर्वत्र २५ अप्रतिहत आज्ञावाले महान् बुद्धिमान् तथा सम्पूर्ण देवताओंको जीतनेवाले उस जलन्धरने जो कहा है, २६ उसे आप सुनिये ॥ २४–२६ ॥ जलन्धर बोला – हे देवाधम! तुमने किस कारणसे पर्वतके द्वारा मेरे पिता समुद्रका मन्थन २७ किया? और मेरे पिताके सारे रत्नोंका अपहरण किया? तुमने यह उचित नहीं किया, उन रत्नोंको अभी शीघ्र लौटा दो और विचार करके देवताओंसहित २८ मेरी शरणमें आ जाओ । अन्यथा हे सुराधम! तुम्हारे समक्ष बहुत बड़ा भय उपस्थित होगा तथा तुम्हारा । राज्य नष्ट - भ्रष्ट हो जायगा । मैं यह सत्य कह रहा २ ९ हूँ ॥ २७–२९ ॥ सनत्कुमार बोले- - - दूतकी यह बात सुनकर | देवराज इन्द्र विस्मित हो गये और वे भय तथा रोषसे ३० युक्त हो उसे ( पूर्ववृत्तान्तको ) याद करते हुए कहने लगे - ॥ ३० ॥

[ हे दूत! ] मेरे भयसे भागे हुए पर्वतोंको तथा ३१ अन्य मेरे दानवशत्रुओंको पूर्वकालमें उस समुद्र | शरण दी थी, इसीलिये मैंने उसके सारे रत्नोंका नहीं रह । अपहरण कर लिया है । मेरा द्रोही सुखसे ३२ सकता है, में यह सत्य कह रहा हूँ ॥ ३१-३२ ॥

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अ ० १५ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड )

खोऽप्येवं पुरा दैत्यो मां द्विषन्सागरात्मजः ।

अभवन्मूढचित्तस्तु साधुसंगात्समुज्झितः ॥

ममानुजेन हरिणा निहतः स हि पापधीः ।

हिंसकः साधुसंघस्य पापिष्ठः सागरोदरे ॥

तद् गच्छ दूत शीघ्रं त्वं कथयस्वास्य तत्त्वतः ।

अब्धिपुत्रस्य सर्वं हि सिंधोर्मंथनकारणम् ॥

सनत्कुमार उवाच

इत्थं विसर्जितो दूतो घस्मराख्यः सुबुद्धिमान् ।

तदेन्द्रेणागमत्तूर्णं यत्र वीरो जलंधरः ॥

तदिदं वचनं दैत्यराजो हि तेन धीमता ।

कथितो निखिलं शक्रप्रोक्तं दूतेन वै तदा ॥

तन्निशम्य ततो दैत्यो रोषात्प्रस्फुरिताधरः ।

उद्योगमकरोत्तूर्णं सर्वदेवजिगीषया ॥

तदोद्योगेऽसुरेन्द्रस्य दिग्भ्यः पातालतस्तथा ।

दितिजाः प्रत्यपद्यन्ते कोटिशः कोटिशस्तथा ॥

अथ शुंभनिशुंभाद्यैर्बलाधिपतिकोटिभिः ।

निर्जगाम महावीरः सिन्धुपुत्रः प्रतापवान् ॥

प्राप त्रिविष्टपं सद्यः सर्वसैन्यसमावृतः ।

दध्मौ शंखं जलधिजो नेदुर्वीराश्च सर्वतः ॥

गत्वा त्रिविष्टपं दैत्यो नन्दनाधिष्ठितोऽभवत् ।

सर्वसैन्यं समावृत्य कुर्वाणः सिंहवद्रवम् ॥

पुरमावृत्य तिष्ठत्तद् दृष्ट्वा सैन्यबलं महत् ।

निर्ययुस्त्वमरावत्या देवा युद्धाय दंशिताः ॥

ततः समभवद्युद्धं देवदानवसेनयोः । पुसलैः परिघैर्बाणैर्गदापरशुशक्तिभिः ८८३ पहले भी इसी सागरके शंख नामक मूर्ख ३३ पुत्रने मुझसे विरोध किया था, इसलिये साधुओंने उसे अपने साथ नहीं रखा । वह साधुओंका हिंसक और बड़ा पापी था, वह समुद्रमें छिपा रहता था, ३४ अतः मेरे छोटे भाई विष्णुने उसका संहार कर दिया ॥ ३३-३४ ॥ अतः हे दूत! तुम शीघ्र जाओ और उस

३५ समुद्रपुत्रसे सागरमन्थनका समस्त कारण ठीक-। ठीकं कह दो ॥ ३५ ॥

सनत्कुमार बोले- इस प्रकार इन्द्रके द्वारा विसर्जित किया गया वह महाबुद्धिमान् दूत शीघ्र ही ३६ वहाँ पहुँचा, जहाँ वीर जलन्धर था । उस बुद्धिमान् दूतने इन्द्रद्वारा कही गयी सभी बातोंको दैत्यराज ३७ जलन्धरसे कह दिया ॥ ३६-३७ ॥ इन्द्रके वचनको सुनकर दैत्यके ओष्ठ ३८ क्रोधसे फड़कने लगे और वह शीघ्र ही सभी देवताओंको जीतनेकी इच्छासे उद्योग करने लगा । उस दैत्येन्द्रके उद्योग करते ही सभी दिशाओंसे तथा ३ ९ पातालसे करोड़ों - करोड़ दैत्य आकर उपस्थित हो गये ॥ ३८-३९ ॥ तत्पश्चात् वह महावीर तथा प्रतापशाली ४० समुद्रपुत्र जलन्धर शुम्भ - निशुम्भ आदि करोड़ों सेनापतियोंके साथ [ देवताओंपर विजय करनेके लिये ] निकल पड़ा ॥ ४० ॥

इस प्रकार अपनी सम्पूर्ण सेनाओंको साथ ४१ लेकर वह जलन्धर शीघ्र ही स्वर्गमें पहुँच गया । उसने शंख बजाया तथा सभी वीर चारों ओरसे गरजने लगे ॥४१ ॥

इन्द्रलोक पहुँचकर उस दैत्यने सम्पूर्ण सेनाके ४२ साथ सिंहनाद करते हुए नन्दव दिया ॥ ४२ ॥

नगरको चारों ओरसे घेरकर स्थित उसकी बड़ी ४३ सेनाको देखकर देवता कवच धारणकर युद्धके लिये अमरावतीपुरीसे निकल पड़े ॥४३ ॥

इसके बाद देवों और दैत्योंकी सेनाओंके बीच मूसल, परिघ, बाण, गदा, परशु एवं शक्तियोंसे युद्ध ॥ ४४ | होने लगा ॥ ४४ ॥

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८८४ तेऽन्योऽन्यं समधावेतां जघ्नतुश्च परस्परम् क्षणेनाभवतां सेने रुधिरौघपरिप्लुते पतितैः पात्यमानैश्च गजाश्वरथपत्तिभिः व्यराजत रणे भूमिः संध्याभ्रपटलैरिव

तत्र युद्धे मृतान्दैत्यान्भार्गवस्तानजीवयत् ।

विद्ययामृतजीविन्या मंत्रितैस्तोयबिन्दुभिः ॥

देवानपि तथा युद्धे तत्राजीवयदंगिराः ।

दिव्यौषधैः समानीय द्रोणाद्रेः स पुनः पुनः ॥

दृष्टवान्स तथा युद्धे पुनरेव समुत्थितान् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १५ । वे एक - दूसरे की ओर दौड़ने लगे और ॥ ४५ दूसरेपर प्रहार करने लगे, थोड़ी ही देरमें दोनों सेनाएँ एक-रुधिरसे लथपथ हो गयीं । हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल । । सेनाओंके गिरने तथा गिरानेसे सारी रणभूमि सन्ध्याकालीन ॥ ४६ बादलोंके समान प्रतीत होने लगी ॥ ४५-४६ ॥ शुक्राचार्य अमृतसंजीवनी विद्याके द्वारा ४७ अभिमन्त्रित जलबिन्दुओंसे युद्धमें मरे हुए दैत्योंका जिलाने लगे ॥ ४७ ॥

अंगिरा ( बृहस्पति ) भी द्रोणपर्वतसे बारंबार ४८ दिव्य औषधियोंको लाकर उनके द्वारा युद्धमें देवताओंको जिलाने लगे ॥ ४८ ॥

तब जलन्धरने देवताओंको पुनर्जीवित होते जलंधरः क्रोधवशो भार्गवं वाक्यमब्रवीत् ॥४ ९ देखकर क्रोधमें भरकर शुक्राचार्यसे यह वचन जलंधर उवाच

मया देवा हता युद्धे उत्तिष्ठन्ति कथं पुनः ।

त्वत्तः संजीवनी विद्या नैवान्यत्रेति वै श्रुता ॥

सनत्कुमार उवाच

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य सिन्धुपुत्रस्य भार्गवः ।

प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा गुरुः शुक्रो जलंधरम् ॥

शुक्र उवाच

दिव्यौषधीः समानीय द्रोणाद्रेरंगिराः सुरान् ।

जीवयत्येष वै तात सत्यं जानीहि मे वचः ॥

जयमिच्छसि चेत्तात शृणु मे वचनं शुभम् ।

ततः सोऽरं भुजाभ्यां त्वं द्रोणमब्धावुपाहर ॥

सनत्कुमार उवाच

इत्युक्तः स तु दैत्येन्द्रो गुरुणा भार्गवेण ह ।

द्रुतं जगाम यत्रासावास्ते चैवाद्रिराट् च सः ॥

भुजाभ्यां तरसा दैत्यो नीत्वा द्रोणं च तं तदा ।

प्राक्षिपत्सागरे तूर्णं चित्रं न हरतेजसि ॥

पुनरायान्महावीरस्सिन्धुपुत्रो महाहवम् ।

जघानास्त्रैश्च विविधैः सुरान्कृत्वा बल महत् ॥

कहा —॥४ ९ ॥

जलन्धर बोला - [ हे गुरो! ] मेरे द्वारा युद्धमें मारे गये देवता कैसे जीवित होते जा रहे हैं? मैंने तो ५० सुन रखा है कि संजीवनीविद्या आपके अतिरिक्त और किसीके पास है ही नहीं ॥ ५० ॥

सनत्कुमार बोले- सिन्धुपुत्रकी यह बात सुनकर गुरु शुक्राचार्यने प्रसन्नचित्त होकर जलन्धरसे ५१ | कहा —॥५१ ॥

शुक्र बोले- हे तात! ये अंगिरा ( बृहस्पति ) द्रोणपर्वतसे औषधियोंको लाकर देवताओंको जीवित ५२ कर रहे हैं, मेरी बात सत्य मानो । हे तात! यदि तुम विजय चाहते हो, तो मेरी हितकारी बात सुनो, तुम शीघ्र ही उस द्रोणपर्वतको अपनी भुजाओंसे उखाड़कर ५३ समुद्रमें डाल दो ॥ ५२-५३ ॥ सनत्कुमार बोले— गुरु शुक्राचार्यके द्वारा इस प्रकार कहा गया वह दैत्येन्द्र शीघ्र ही वहाँ पहुँचा, ५४ जहाँ वह पर्वतराज [ द्रोण ] था ॥५४ ॥

उसने वेगपूर्वक अपनी भुजाओंसे उस द्रोण ५५ । पर्वतको लेकर शीघ्र ही समुद्रमें डाल दिया । शिवजीके नहीं | तेजके सम्बन्धमें यह कोई आश्चर्यकी बात थी ॥ ५५ ॥ सेना

इसके बाद वह महावीर जलन्धर विशाल | लेकर पुनः युद्धस्थलमें लौट आया और अनेक प्रकार ५६ शस्त्रोंसे देवगणोंका संहार करने लगा ॥५६ ॥

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अ ० १५ ] रुद्रसंहिता (

अथ देवान्हतान्दृष्ट्वा द्रोणाद्रिमगमद् गुरुः ।

तावत्तत्र गिरींद्रं तं न ददर्श सुरार्चितः ॥ ५७

ज्ञात्वा दैत्यहृतं द्रोणं धिषणो भयविह्वलः ।

आगत्य देवान्प्रोवाच जीवो व्याकुलमानसः ॥ ५८

गुरुरुवाच

पलायध्वं सुराः सर्वे द्रोणो नास्ति गिरिर्महान् ।

ध्रुवं ध्वस्तश्च दैत्येन पाथोधितनयेन हि ॥ ५ ९

जलंधरो महादैत्यो नायं जेतुं क्षमो यतः ।

रुद्रांशसंभवो ह्येष सर्वामरविमर्दनः ॥ ६०

मया ज्ञातः प्रभावोऽस्य यथोत्पन्नः स्वयं सुराः ।

शिवापमानकृच्छक्रचेष्टितं स्मरताखिलम् ॥ ६१

सनत्कुमार उवाच

श्रुत्वा तद्वचनं देवाः सुराचार्यप्रकीर्तितम् ।

जयाशां त्यक्तवन्तस्ते भयविह्वलितास्तथा ॥ ६२

दैत्यराजेन तेनातिहन्यमानाः समन्ततः ।

धैर्यं त्यक्त्वाऽपलायन्त दिशो दश सवासवाः ॥ ६३

देवान्विद्रावितान्दृष्ट्वा दैत्यः सागरनंदनः ।

शंखभेरीजयरवैः प्रविवेशामरावतीम् ॥ ६४

प्रविष्टे नगरीं दैत्ये देवाः शक्रपुरोगमाः ।

सुवर्णाद्रिगुहां प्राप्ता न्यवसन्दैत्यतापिताः ॥ ६५

तदैव सर्वेष्वसुरोऽधिकारे-ष्विन्द्रादिकानां विनिवेश्य सम्यक् । शुंभादिकान्दैत्यवरान् पृथक्पृथक् स्वयं सुवर्णाद्रिगुहां व्यगान्मुने ॥ ६६ युद्धखण्ड ) ८८५ तब देवताओंको मरा हुआ देखकर देवपूजित देवगुरु द्रोणपर्वतपर गये, परंतु उन्होंने उस पर्वतराजको वहाँ नहीं देखा । दैत्यके द्वारा पर्वतको अपहृत जानकर देवगुरु भयसे विह्वल हो उठे और आकरके व्याकुलचित्त होकर देवताओंसे वे कहने लगे— ॥ ५७-५८ ॥ गुरु बोले – हे देवताओ! तुमलोग भाग जाओ, महापर्वत द्रोण अब नहीं है, निश्चय ही समुद्रपुत्र जलन्धरने उसे ध्वस्त कर दिया है ॥५ ९ ॥ सभी देवताओंका मर्दन करनेवाला यह महादैत्य जलन्धर जीता नहीं जा सकता है; क्योंकि यह रुद्रके अंशसे उत्पन्न है । हे देवताओ! यह जिस प्रकार उत्पन्न हुआ है तथा जैसा इसका प्रभाव है, उसे मैं जानता हूँ । शिवजीका अपमान करनेवाले इन्द्रकी सम्पूर्ण चेष्टाको आपलोग स्मरण कीजिये ॥ ६०-६१ ॥ सनत्कुमार बोले- देवताओंके आचार्य बृहस्पतिके द्वारा कहे गये उस वचनको सुनकर भयसे व्याकुल हुए उन देवगणोंने विजयकी आशा त्याग दी और उस दैत्यराजके द्वारा चारों ओरसे मारे जाते हुए इन्द्रसहित सभी देवता धैर्य त्यागकर दसों दिशाओंमें भाग गये ॥ ६२-६३ ॥ तब देवगणोंको पलायित देखकर सागरपुत्र दैत्य जलन्धरने शंख, भेरी तथा जयध्वनिके साथ अमरावतीपुरीमें प्रवेश किया । तब उस दैत्यके नगरीमें प्रविष्ट होनेपर इन्द्र आदि देवता उस दैत्यसे पीड़ित होकर सुमेरु पर्वतकी गुफामें छिप गये ॥ ६४-६५ ॥ हे मुने! तब वह असुर इन्द्रादिकोंके सभी अधिकारोंपर श्रेष्ठ शुम्भादि दैत्योंको भलीभाँति पृथक्-पृथक् नियुक्तकर स्वयं [ देवताओंको खोजते हुए ] । मेरु पर्वतकी गुफामें जा पहुँचा ॥६६ ॥

द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे जलंधरवधोपाख्याने इति श्रीशिवमहापुराणे नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

॥ इस प्रकार देवजलंधरयुद्धवर्णनं अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें जलन्धरवधोपाख्यानमें देव-श्रीशिवमहापुराणके नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥

जलन्धरयुद्धवर्णन

पृष्ठ 896

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८८६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १६ अथ षोडशोऽध्यायः जलन्धरसे भयभीत देवताओंका विष्णुके समीप जाकर स्तुति करना, विष्णुसहित देवताओंका जलन्धरकी सेनाके साथ भयंकर युद्ध सनत्कुमार उवाच सनत्कुमार बोले- इन्द्रसहित सभी देवता उस पुनर्दैत्यं समायान्तं दृष्ट्वा देवाः सवासवाः । दैत्यको पुनः आता हुआ देखकर भयसे काँप उठे और भयात्प्रकंपिताः सर्वे सहैवादुद्रुवुर्द्रुतम् ॥ १ शीघ्र ही एक साथ भाग गये । प्रजापतिको आगेकर वे वैकुंठं प्रययुः सर्वे पुरस्कृत्य प्रजापतिम् तुष्टुवुस्ते सुरा नत्वा सप्रजापतयोऽखिलाः देवा ऊचुः हृषीकेश महाबाहो भगवन् मधुसूदन नमस्ते देवदेवेश सर्वदैत्यविनाशक मत्स्यरूपाय ते विष्णो वेदान्नीतवते नमः सत्यव्रतेन सद्राज्ञा प्रलयाब्धिविहारिणे कुर्वाणानां सुराणां च मंथनायोद्यमं भृशम् बिभ्रते मंदरगिरिं कूर्मरूपाय ते नमः नमस्ते भगवन्नाथ क्रतवे सूकरात्मने वसुंधरां जनाधारां मूर्द्धतो बिभ्रते नमः वामनाय नमस्तुभ्यमुप्रेन्द्राख्याय विष्णवे विप्ररूपेण दैत्येन्द्रं बलिं छलयते विभो नमः परशुरामाय क्षत्रनिःक्षत्रकारिणे मातुर्हितकृते तुभ्यं कुपितायासतां द्रुहे रामाय लोकरामाय मर्यादापुरुषाय ते रावणांत करायाशु सीतायाः पतये नमः नमस्ते ज्ञानगूढाय कृष्णाय परमात्मने राधाविहारशीलाय नानालीलाकराय च नमस्ते गूढदेहाय वेदनिंदाकराय च योगाचार्याय जैनाय बौद्धरूपाय मापते । सब वैकुण्ठमें गये और फिर प्रजापतिसहित सभी देवता ॥ २ प्रणामकर विष्णुकी स्तुति करने लगे— ॥ १-२ ॥ देवता बोले- हे हृषीकेश! हे महाबाहो! । हे भगवन्! हे मधुसूदन! हे देवदेवेश! हे सर्वदैत्य-॥ ३ विनाशक! आपको नमस्कार है । मत्स्यरूप धारणकर । सत्यव्रत राजाके साथ प्रलयाब्धिमें विहार करनेवाले ॥ ४ तथा वेदोंको लानेवाले मत्स्यरूप हे विष्णो! आपको नमस्कार है॥३-४ ॥ । समुद्रमन्थनके लिये देवताओंके महान् उद्योग ॥ ५ करते समय मन्दराचलपर्वतको धारण करनेवाले कच्छपरूप आपको नमस्कार है । मनुष्योंको आश्रय देनेवाली इस । वसुन्धराको दाढ़पर धारण करनेवाले यज्ञवाराहस्वरूप ॥ ६ हे भगवन्! आपको नमस्कार है॥५-६ ॥ । विप्ररूपसे दैत्येन्द्र बलिको छलनेवाले उपेन्द्र ॥ ७ नामक वामनरूपधारी हे विष्णु! हे विभो! आपको नमस्कार है ॥७ ॥

। क्षत्रियोंके क्षत्रका अन्त करनेवाले, माताका हित ॥ ८ करनेवाले, कुपित होनेवाले तथा दुष्टजनोंका विनाश करनेवाले और परशुरामके रूपसे अवतार धारण । करनेवाले आपको नमस्कार है । लोकको प्रसन्न । करनेवाले, मर्यादापुरुष तथा शीघ्र रावणका वध

॥ ९ करनेवाले और सीतापति रामके रूपमें अवतार ग्रहण ।

करनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ८ - ९ ॥

। गूढ़ ज्ञानवाले, राधाके साथ विहार करनेवाले आप ॥ १० तथा विविध लीला करनेवाले कृष्णरूपधारी, । परमात्माको नमस्कार है । गुप्त शरीर धारण करनेवाले । | योगके आचार्य तथा वेदविरुद्ध जैनरूप एवं बौद्ध-। | रूपको धारण करनेवाले आप लक्ष्मीपतिको नमस्कार ॥ ११ है ॥ १०-११ ॥

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अ ० १६ ] रुद्रसंहिता (

नमस्ते कल्किरूपाय म्लेच्छानामन्तकारिणे ।

अनन्तशक्तिरूपाय सद्धर्मस्थापनाय च ॥ १२

नमः कपिलरूपाय देवहूत्यै महात्मने ।

वदते सांख्ययोगं च सांख्याचार्याय वै प्रभो ॥ १३

नमः परमहंसाय ज्ञानं संवदते परम् ।

विधात्रे ज्ञानरूपाय येनात्मा संप्रसीदति ॥ १४

वेदव्यासाय वेदानां विभागं कुर्वते नमः ।

हिताय सर्वलोकानां पुराणरचनाय च ॥ १५

एवं मत्स्यादितनुभिर्भक्तकार्योद्यताय ते ।

सर्गस्थितिध्वंसकर्त्रे नमस्ते ब्रह्मणे प्रभो ॥ १६

आर्तिहन्त्रे स्वदासानां सुखदाय शुभाय च ।

पीताम्बराय हरये तार्क्ष्ययानाय ते नमः ।

सर्वक्रियायैककर्त्रे शरण्याय नमो नमः ॥ १७

दैत्यसंतापितामर्त्यदुःखादिध्वंसवज्रक 1 शेषतल्पशयायार्कचन्द्रनेत्राय ते नमः ॥ १८

कृपासिन्धो रमानाथ पाहि नः शरणागतान् ।

जलंधरेण देवाश्च स्वर्गात्सर्वे निराकृताः ॥ १ ९

सूर्यो निस्सारितः स्थानाच्चन्द्रो वह्निस्तथैव च ।

पातालान्नागराजश्च धर्मराजो निराकृतः ॥ २०

विचरंति यथा मर्त्याः शोभंते नैव ते सुराः ।

शरणं ते वयं प्राप्ता वधस्तस्य विचिन्त्यताम् ॥ २१

इति सनत्कुमार उवाच

दीनवचः श्रुत्वा देवानां मधुसूदनः ।

जगाद करुणासिन्धुर्मेघनिर्ह्रादया गिरा ॥ २२

| भयं विष्णुरुवाच | जलंधरेण

त्यजत हे देवा गमिष्याम्यहमाहवम् ।

। दैत्येन करिष्यामि पराक्रमम् ॥ २३

इत्युक्त्वा सहसोत्थाय दैत्यारिः खिन्नमानसः । | आरोहद्गरुडं वेगात्कृपया भक्तवत्सलः ॥ २४ । युद्धखण्ड ) ८८७ सद्धर्मकी स्थापनाके लिये म्लेच्छोंका विनाश करनेवाले, अनन्त शक्तिसे सम्पन्न तथा कल्किरूप धारण करनेवाले आपको नमस्कार है । हे प्रभो! देवहूतिके लिये कपिलरूप धारणकर सांख्ययोगका उपदेश करनेवाले आप महात्मा सांख्याचार्यको नमस्कार है ॥ १२-१३ ॥ परमहंसरूपसे आत्ममुक्तिपरक परम ज्ञानका उपदेश करनेवाले, ज्ञानरूप विधाता आपको नमस्कार है ॥ १४ ॥

समस्त लोकोंके हितके लिये पुराणोंकी रचना करनेवाले तथा वेदोंका विभाग करनेवाले वेदव्यासरूपधारी आपको नमस्कार है । इस प्रकार मत्स्यादिरूपोंसे भक्तोंके कार्यके लिये तत्पर रहनेवाले तथा सृष्टि, पालन एवं प्रलय करनेवाले ब्रह्मरूप हे प्रभो! आपको नमस्कार है॥१५-१६ ॥ अपने दासोंके दुःखोंको दूर करनेवाले, सुखद, शुभस्वरूप, गरुड़पर सवारी करनेवाले, पीताम्बरधारी आप विष्णुको नमस्कार है । सभी क्रियाओंके एकमात्र कर्ता तथा शरणागतरक्षक आपको बार - बार नमस्कार है ॥ १७ ॥

दैत्योंके द्वारा सन्तप्त देवताओंके दुःखका नाश करनेवाले हे वज्रस्वरूप! शेषरूपी शय्यापर शयन करनेवाले तथा सूर्यचन्द्रनेत्रवाले आपको नमस्कार है ॥१८ ॥

हे कृपासागर! हे रमानाथ! हम शरणागतोंकी रक्षा कीजिये, जलन्धरने सभी देवताओंको स्वर्गसे निकाल दिया है । उसने सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्निको उनके स्थानसे हटा दिया है तथा पातालसे नागराजको और धर्मराजको भी निकाल दिया है ॥१ ९ -२० ॥ वे देवता मनुष्योंके समान भटक रहे हैं, इससे वे शोभित नहीं हो रहे हैं । इसलिये हम आपकी शरणमें आये हुए हैं, आप उसके वधका उपाय सोचिये ॥ २१ ॥

सनत्कुमार बोले- तब करुणासिन्धु मधुसूदन देवताओंका यह दीन वचन सुनकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहने लगे- ॥ २२ ॥

विष्णुजी बोले — हे देवताओ! आपलोग भयका त्याग कीजिये, मैं स्वयं युद्धमें जाऊँगा और दैत्य जलन्धरसे युद्ध करूँगा । इस प्रकार कहकर दुखी मनवाले भक्तवत्सल दैत्यारि विष्णु अनुग्रहपूर्वक सहसा उठकर गरुड़पर वेगसे सवार हो गये ॥ २३-२४ ॥

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८८८ गच्छन्तं वल्लभं दृष्ट्वा देवैस्सार्द्धं समुद्रजा सांजलिर्बाष्पनयना लक्ष्मीर्वचनमब्रवीत् लक्ष्म्युवाच अहं ते वल्लभा नाथ भक्ता यदि च सर्वदा तत्कथं ते मम भ्राता युद्धे वध्यः कृपानिधे ॥ विष्णुरुवाच जलंधरेण दैत्येन करिष्यामि पराक्रमम् । तैः संस्तुतो गमिष्यामि युद्धाय त्वरितान्वितः रुद्रांशसंभवत्वाच्च ब्रह्मणो वचनादपि प्रीत्या च तव नैवायं मम वध्यो जलंधरः सनत्कुमार उवाच इत्युक्त्वा गरुडारूढः शंखचक्रगदासिभृत् विष्णुर्वेगाद्ययौ योद्धुं देवैः शक्रादिभिस्सह द्रुतं स प्राप तत्रैव यत्र दैत्यो जलंधरः कुर्वन् सिंहरवं देवैर्ज्वलद्भिर्विष्णुतेजसा श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १६ । उस समय देवताओंके साथ जाते हुए अपने ॥ २५ पति को | हाथ जोड़कर समुद्रपुत्री लक्ष्मीजीने यह वचन कहा— ॥ २५ ॥

लक्ष्मीजी बोलीं- हे नाथ! यदि मैं आपकी प्रिया । और सदा आपकी भक्त हूँ, तो हे कृपानाथ! आप मेरे २६ भाईका वध युद्धमें कैसे कर सकते हैं? ॥ २६ ॥

विष्णुजी बोले- मैं उस जलन्धरके साथ अपना पराक्रम करूँगा, देवोंने मेरी स्तुति की है, अत: ॥ २७ मैं शीघ्र ही युद्धके लिये जाऊँगा, किंतु रुद्रांशसे उसके । उत्पन्न होने, ब्रह्माको वचन देने तथा तुम्हारी प्रीतिके ॥ २८ कारण इस जलन्धरका वध नहीं करूँगा ॥ २७-२८ ॥ सनत्कुमार बोले- यह कहकर विष्णु शंख, । चक्र, गदा तथा तलवार धारणकर गरुड़पर सवार हो ॥ २ ९ गये और इन्द्रादि देवताओंको साथ लेकर युद्ध करनेके लिये वेगपूर्वक चल पड़े । विष्णुके तेजसे प्रकाशित । होते देवताओंके साथ सिंहनाद करते हुए वे [ विष्णु ] ॥ ३० शीघ्र वहाँ पहुँचे, जहाँ वह जलन्धर था । उस समय अरुणके लघु भ्राता गरुड़के पंखोंके वायुवेगसे पीड़ित अथारुणानुजजवपक्षवातप्रपीडिताः 1 हुए दैत्य इस प्रकार चक्कर काटने लगे, जैसे वायुके वात्याविवर्तिता दैत्या बभ्रमुः खे यथा घनाः ॥

ततो जलंधरो दृष्ट्वा दैत्यान् वात्याप्रपीडितान् ।

उद्धृत्य वचनं क्रोधाद् द्रुतं विष्णुं समभ्यगात् ॥

एतस्मिन्नन्तरे देवाश्चकुर्युद्धं प्रहर्षिताः । तेजसा च हरेः पुष्टा महाबलसमन्विताः

युद्धोद्यतं समालोक्य देवसैन्यमुपस्थितम् ।

दैत्यानाज्ञापयामास समरे चातिदुर्मदान् ॥

जलंधर उवाच भो भो दैत्यवरा यूयं युद्धं कुरुत दुस्तरम् शक्राद्यैरमरैरद्य प्रबलैः कातरैः सदा मौर्यास्तु लक्षसंख्याता धौम्रा हि शतसंख्यकाः । असुराः कोटिसंख्याताः कालकेयास्तथैव च कालकानां दौर्हृदानां कंकानां लक्षसंख्यया अन्येऽपि स्वबलैर्युक्ता विनियतु ममाज्ञया ॥ ३१ द्वारा उड़ाये गये बादल आकाशमण्डलमें घूमने लगते हैं ॥ २ ९ –३१ ॥ तब वायुके वेगसे पीड़ित हुए दैत्योंको देखक ३२ अमर्षयुक्त वचन कहता हुआ जलन्धर बड़ी तेजीसे । विष्णुपर झपटा । इसी बीच विष्णुके तेजसे देदीप्यमान | महाबलशाली देवता भी प्रसन्न होकर युद्ध करने ॥ ३३ लगे ॥ ३२-३३ ॥ तब वहाँपर उपस्थित देवसेनाको युद्धके दैत्योंको । ३४ लिये उद्यत देखकर जलन्धरने युद्धमें दुर्मद आज्ञा दी ॥ ३४ ॥

जलन्धर बोला- हे श्रेष्ठ दैत्यो! तुमलोग । । सदासे कायर, किंतु प्रबल इन इन्द्रादि देवताओंके ॥ ३५ साथ आज अत्यन्त कठिन युद्ध करो ॥ ३५ ॥

एक लाख संख्यावाले मौर्य, सौ संख्यावाले लाखकी ॥ ३६ धौम्र, करोड़ोंकी संख्यावाले कालकेय, एक - असुर । । संख्यावाले कालक - दौर्हृद तथा कंक नामक - अपनी ३७ | तथा अन्य असुर भी मेरी आज्ञासे अपनी

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अ ० १७ ] रुद्रसंहिता (

एवं सजा विनिर्यात बहुसेनाभिसंयुताः ।

नानाशस्त्रास्त्रसंयुक्ता निर्भया गतसंशयाः ॥ ३८

भो भो शुंभनिशुंभौ च देवान्समरकातरान् ।

क्षणेन सुमहावीर्यौ तुच्छान्नाशयतं युवाम् ॥ ३ ९

सनत्कुमार उवाच

दैत्या जलंधराज्ञप्ता इत्थं युद्धविशारदाः ।

युयुधुस्तेऽसुराः सर्वे चतुरंगबलान्विताः ॥ ४०

गदाभिस्तीक्ष्णबाणैश्च शूलपट्टिशतोमरैः ।

केचित्परशुशूलैश्च निजघ्नुस्ते परस्परम् ॥ ४१

नानायुधैः परैस्तत्र निजघ्नुस्ते बलान्विताः ।

देवास्तथा महावीरा हृषीकेशबलान्विताः ।

युयुधुस्तीक्ष्णबाणाश्च क्षिपन्तः सिंहवद्रवाः ॥ ४२

केचिद्बाणैः सुतीक्ष्णैश्च केचिन्मुसलतोमरैः ।

केचित्परशुशूलैश्च निजघ्नुस्ते परस्परम् ॥ ४३

इत्थं सुराणां दैत्यानां संग्रामः समभून्महान् ।

अत्युल्बणो मुनीनां हि सिद्धानां भयकारकः ॥ ४४

युद्धखण्ड ) ८८ ९ सेनाओंके साथ निकलें । सभी लोग सज्जित होकर विशाल सेनाओंसे युक्त हो अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण किये हुए निर्भय एवं संशयरहित होकर निकल पड़ें । हे शुम्भ एवं निशुम्भ! महाबलवान् तुम दोनों क्षणमात्रमें युद्ध करनेमें कायर तथा तुच्छ देवताओंका विनाश कर दो॥३६–३९ ॥ सनत्कुमार बोले- - जब जलन्धरने इस प्रकार दैत्योंको आज्ञा दी, तब युद्धविशारद वे समस्त असुर अपनी चतुरंगिणी सेना लेकर युद्ध करने लगे ॥ ४० ॥

वे गदा, तीक्ष्ण बाण, शूल, पट्टिश, तोमर, परशु और शूलादि अस्त्रोंसे एक - दूसरेपर प्रहार करने लगे ॥ ४१ ॥

विष्णुके बलसे युक्त वे महाबलवान् देवगण सेनाओंको साथ लेकर अनेक प्रकारके श्रेष्ठ आयुधोंसे प्रहार करने लगे । वे सिंहके समान गर्जन करते हुए तथा बाणोंको छोड़ते हुए युद्ध कर रहे थे । कोई तीक्ष्ण बाणोंसे, कोई मूसलों और तोमरोंसे तथा कोई परशुसे एवं त्रिशूलसे एक - दूसरेपर प्रहार कर रहे थे । इस प्रकार देव - दानवोंमें महाभयंकर संग्राम छिड़ गया, जो मुनियों तथा सिद्धोंमें भय उत्पन्न करनेवाला था ॥४२–४४ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे जलन्धरवधोपाख्याने देवयुद्धवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

|| इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें जलन्धरवधोपाख्यानके अन्तर्गत देवयुद्धवर्णन नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १६ ॥

अथ सप्तदशोऽध्यायः विष्णु और जलन्धरके युद्धमें जलन्धरके पराक्रमसे सन्तुष्ट विष्णुका देवों एवं लक्ष्मीसहित उसके नगरमें निवास करना सनत्कुमार उवाच

अथ दैत्या महावीर्याः शूलैः परशुपट्टिशैः ।

। निजघ्नुः सर्वदेवांश्च ॥ १

भयव्याकुलमानसान्

दैत्यायुधैः समाविद्धदेहा देवाः सवासवाः ।

रणाद्विदुद्रुवुः सर्वे ॥ २

भयव्याकुलमानसाः | पलायनपरान् । दृष्ट्वा हृषीकेशः सुरानथ ३ विष्णुवै सनत्कुमार बोले- इसके बाद महापराक्रमी दैत्य शूल, परशु और पट्टिशोंसे भयसे व्याकुल चित्तवाले देवताओंपर प्रहार करने लगे । तब दैत्यों के आयुधोंसे छिन्न - भिन्न शरीरवाले इन्द्रसहित सभी देवता भयसे व्याकुलचित्त हो उठे और रणसे भागने लगे । तत्पश्चात् देवताओंको भागते हुए देखकर हृषीकेश विष्णु गरुड़पर सवार होकर शीघ्र ही युद्ध करनेके | लिये आ गये ॥ १-३ ॥

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८ ९ ० श्रीशिवमहापुराण [ अ ] ० १७

सुदर्शनेन चक्रेण सर्वतः प्रस्फुरन् रुचा ।

सुशोभितकराब्जश्च रेजे भक्ताभयंकरः ॥

शंखखड्गगदाशार्ङ्गधारी क्रोधसमन्वितः ।

कठोरास्त्रो महावीरः सर्वयुद्धविशारदः ॥

धनुषं शार्ङ्गनामानं विस्फूर्य्य विननाद ह ।

तस्य नादेन त्रैलोक्यं पूरितं महता मुने ॥

शार्ङ्गनिस्सृतबाणैश्च दितिजानां शिरांसि वै ।

चकर्त्त भगवान् विष्णुः कोटिशो रुट्समाकुलः ॥

अथारुणानुजजवपक्षवातप्रपीडिताः वात्याविवर्त्तिता दैत्या बभ्रमुः खे यथा घनाः ॥

ततो जलंधरो दृष्ट्वा दैत्यान्वात्याप्रपीडितान् ।

चुक्रोधाति महादैत्यो देववृन्दभयंकरः ॥

मर्द्दयन्तं च तं दृष्ट्वा दैत्यान् प्रस्फुरिताधरः ।

योद्धुमभ्याययौ वीरो वेगेन हरिणा सह ॥

स चकार महानादं देवासुरभयंकरम् ।

दैत्यानामधिपः कर्णा विदीर्णाः श्रवणात्ततः ॥

भयङ्करेण दैत्यस्य नादेनापूरितं तदा ।

जलंधरस्य महता चकम्पे सकलं जगत् ॥

ततः समभवद्युद्धं विष्णुदैत्येन्द्रयोर्महत् ।

आकाशं कुर्वतोर्बाणैस्तदा निरवकाशवत् ॥

तयोश्च तेन युद्धेन परस्परमभून्मुने ।

देवासुरर्षिसिद्धानां भीकरेणातिविस्मयः ॥

विष्णुर्दैत्यस्य बाणौघैर्ध्वजं छत्रं धनुः शरान् ।

चिच्छेद तं च हृदये बाणेनैकेन ताडयन् ॥

ततो दैत्यः समुत्पत्य गदापाणिस्त्वरान्वितः ।

आहत्य गरुडं मूर्ध्नि पातयामास भूतले ॥

विष्णुं जघान शूलेन तीक्ष्णेन प्रस्फुरद्रुचा ।

हृदये क्रोधसंयुक्तो दैत्यः प्रस्फुरिताधरः ॥

भक्तोंको अभय देनेवाले वे विष्णु चारों ४ प्रकाश फैलाते हुए सुदर्शन चक्रको हाथमें ओर धारण । करनेके कारण अत्यन्त शोभायमान हो रहे थे । हे मुने! समस्त युद्धोंमें विशारद, शंख - खड्ग - गदा एवं ५ शार्ङ्ग धनुष धारण किये हुए, कठोर अस्त्रोंसे युक्त तथा अत्यन्त कुपित उन महावीर विष्णुने शार्ङ्ग नामक ६ धनुष चढ़ाकर उसकी टंकार की, उसके महान् नादसे त्रिलोकी व्याप्त हो गयी॥४-६ ॥ क्रोधमें भरे हुए भगवान् विष्णुने धनुषसे छोड़े ७ गये बाणोंके द्वारा करोड़ों दैत्योंके सिर काट डाले ॥७ ॥

उस समय अरुणके छोटे भाई गरुड़के पंखोंकी ८ वायुके वेगसे पीड़ित हुए दैत्य आकाशमें पवनप्रेरित बादलोंके समान चक्कर काटने लगे । तब दैत्योंको गरुड़के पंखोंकी आँधीसे पीड़ित देखकर देवताओंमें ९ भय उत्पन्न करनेवाले महादैत्य जलन्धरने अत्यधिक क्रोध किया ॥ ८ - ९ ॥ उन्हें दैत्योंको मर्दित करता हुआ देखकर १० फड़कते हुए ओठोंवाला वह जलन्धर विष्णुसे युद्ध करनेके लिये वेगपूर्वक आ गया । उस दैत्यपतिने देवताओं तथा असुरोंको भय उत्पन्न करनेवाला ११ महानाद किया, उससे [ सुननेवालोंके ] कान विदीर्ण हो गये॥१०-११ ॥ दैत्य जलन्धरके महाभयंकर नादसे सारा जगत् १२ व्याप्त हो गया और काँप उठा ॥१२ ॥

इसके बाद बाणोंसे आकाशको पूर्ण करते हुए १३ विष्णु तथा उस दैत्येन्द्रमें घमासान युद्ध होने लगा ॥ १३ ॥

हे मुने! परस्पर उन दोनोंके उस भयंकर १४ युद्धसे देवों, असुरों, ऋषियों तथा सिद्धोंको बड़ा । आश्चर्य उत्पन्न हुआ । विष्णुने दैत्यकी छातीमें एक । उसके ध्वज, । । बाणसे प्रहार करते हुए बाणसमूहोंसे उस । १५ छत्र, धनुष तथा बाणोंको काट दिया । इसी बीच । | दैत्यने भी बडी शीघ्रतासे हाथमें गदा लेकर उछलकर उसे । [ उस गदासे ] गरुड़के सिरपर प्रहार करके १६ पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ १४–१६ ॥ कुपित । फड़कते हुए ओठोंवाले उस दैत्यने | होकर अपने चमचमाते हुए तीक्ष्ण शूलसे भगवान् १७ विष्णुकी छातीपर भी प्रहार किया ॥ १७ ॥