श्रीगणेशाय नमः।

शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 901–910

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 901–910

पृष्ठ 901

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अ ० १७ ] रुद्रसंहिता (

विष्णुर्गदां च खड्गेन चिच्छेद प्रहसन्निव ।

तं विव्याध शरैस्तीक्ष्णैः शार्ङ्गं विस्फूर्य दैत्यहा ॥ १८

विष्णुर्जलंधरं दैत्यं भयदेन शरेण ह ।

क्रोधाविष्टोऽतितीक्ष्णेन जघानाशु सुरारिहा ॥ १ ९

आगतं तस्य तं बाणं दृष्ट्वा दैत्यो महाबलः ।

छित्त्वा बाणेन विष्णुं च जघान हृदये द्रुतम् ॥ २०

केशवोऽपि महाबाहुं विक्षिप्तमसुरेण तम् ।

शरं तिलप्रमाणेन च्छित्त्वा वीरो ननाद ह ॥ २१

पुनर्बाणं समाधत्त धनुषि क्रोधवेपितः ।

महाबलोऽथ बाणेन चिच्छेद स शिलीमुखम् ॥ २२

वासुदेव: पुनर्बाणं नाशाय विबुधद्विषः ।

क्रोधेनाधत्त धनुषि सिंहवद्विननाद ह ॥ २३

जलंधरोऽथ दैत्येन्द्रः कोपाच्छिन्नाधरो बली ।

शरेण स्वेन शार्ङ्गख्यं धनुश्चिच्छेद वैष्णवम् ॥ २४

पुनर्बाणैः सुतीक्ष्णैश्च जघान मधुसूदनम् ।

उग्रवीर्यो महावीरो देवानां भयकारकः ॥ २५

स च्छिन्नधन्वा भगवान् केशवो लोकरक्षकः ।

जलंधरस्य नाशाय चिक्षेप स्वगदां पराम् ॥ २६

सा गदा हरिणा क्षिप्ता ज्वलज्ज्वलनसन्निभा ।

अमोघगतिका शीघ्रं तस्य देहे ललाग ह ॥ २७

तया हतो महादैत्यो न चचालापि किंचन ।

जलंधरो मदोन्मत्तः पुष्पमालाहतो यथा ॥ २८

। ततो जलंधरः क्रोधी देवत्रासकरोऽक्षिपत् ।

त्रिशूलमनलाकारं हरये रणदुर्म्मदः ॥ २ ९

अथ विष्णुस्तत्त्रिशूलं चिच्छेद तरसा द्रुतम् ।

। नंदकाख्येन खड्गेन शिवपदाम्बुजम् ॥ ३०

स्मृत्वा । छिन्ने त्रिशूले । दैत्येन्द्र उत्प्लुत्य सहसा द्रुतम् आगत्य हृदये विष्णुं जघान दृढमुष्टिना ॥ ३१ युद्धखण्ड ) ८ ९ १ उसके बाद दैत्यनाशक विष्णुने हँसते हुए अपने खड्गसे उसकी गदा काट दी और शार्ङ्ग धनुषकी प्रत्यंचा चढ़ाकर तीक्ष्ण बाणोंसे उसे बेध दिया ॥ १८ ॥

इस प्रकार देवताओंके शत्रुओंका वध करनेवाले विष्णु क्रोधमें भरकर अत्यन्त तीक्ष्ण एवं भयदायक बाणसे जलन्धर दैत्यपर शीघ्रतासे प्रहार करने लगे ॥ १ ९ ॥ तब महाबली दैत्यने उनके बाणको आया हुआ देखकर अपने बाणसे उसे काटकर बड़ी शीघ्रतासे विष्णुकी छातीपर प्रहार किया ॥२० ॥

महाबाहु वीर विष्णु भी असुरके द्वारा छोड़े गये, उस बाणको तिलके समान काटकर गर्जन करने लगे ॥ २१ ॥

फिर क्रोधसे काँपते हुए विष्णुने जब दूसरा बाण धनुषपर रखा, तभी महाबली उस दैत्यने अपने बाणसे उस बाणको काट डाला । तब वासुदेव विष्णुने क्रोधपूर्वक उस राक्षसके विनाशके लिये पुनः धनुषपर बाण चढ़ाया और सिंहकी भाँति गर्जना की । बलशाली दैत्येन्द्र जलन्धरने भी क्रोधसे अपने ओठोंको काटते हुए अपने बाणसे विष्णुके उस शार्ङ्ग नामक धनुषको काट डाला॥२२–२४ ॥ इसके बाद देवताओंको भय देनेवाला, उग्र पराक्रमवाला तथा महावीर वह दैत्य तीक्ष्ण बाणोंसे मधुसूदनपर प्रहार करने लगा । तब कटे हुए धनुषवाले लोकरक्षक भगवान् विष्णुने जलन्धरके विनाशके लिये अपनी विशाल गदा चलायी । जलती हुई अग्निके समान विष्णुके द्वारा चलायी गयी वह अमोघ गदा बड़ी शीघ्रतासे उस राक्षसके शरीरमें लगी ॥ २५–२७ ॥ वह महादैत्य उसके प्रहारसे पुष्पमालासे आहत हुए मदोन्मत्त हाथीके समान कुछ भी विचलित नहीं हुआ ॥२८ ॥

तदनन्तर देवताओंमें भय उत्पन्न करनेवाले रणदुर्मद उस जलन्धरने क्रोधमें भरकर अग्निके सदृश त्रिशूल विष्णुपर चलाया । तब विष्णुने शिवजीके चरणकमलोंका स्मरण करके अपने नन्दक नामक शीघ्र ही बड़ी तेजीसे उस त्रिशूलको का | खड्गसे दिया । त्रिशूलके कट जानेपर उस दैत्यने सहसा शीघ्रतापूर्वक आकर अपनी दृढ़ मुष्टिसे उछलकर छातीपर प्रहार किया ॥ २ ९ -३१ ॥ | विष्णुकी

पृष्ठ 902

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८ ९ २ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १७

सोऽपि विष्णुर्महावीरोऽविगणय्य च तद्व्यथाम् ।

जलंधरं च हृदये जघान दृढमुष्टिना ॥

ततस्तौ बाहुयुद्धेन युयुधाते महाबलौ ।

बाहुभिर्मुष्टिभिश्चैव जानुभिर्नादयन्महीम् ॥

एवं हि सुचिरं युद्धं कृत्वा तेनासुरेण वै ।

विस्मितोऽभून्मुनिश्रेष्ठ हृदि ग्लानिमवाप ह ॥

अथ प्रसन्नो भगवान्मायी मायाविदां वरः ।

उवाच दैत्यराजानं मेघगंभीरया गिरा ॥

विष्णुरुवाच

भो भो दैत्यवरश्रेष्ठ धन्यस्त्वं रणदुर्मदः ।

महायुधवरैर्यत्त्वं न भीतो हि महाप्रभुः ॥

एभिरेवायुधैरुग्रैर्दैत्या हि बहवो हताः ।

महाजौ दुर्मदा वीराश्छिन्नदेहा मृतिं गताः ॥

युद्धेन ते महादैत्य प्रसन्नोऽस्मि महान्भवान् ।

न दृष्टस्त्वत्समो वीरस्त्रैलोक्ये सचराचरे ॥

वरं वरय दैत्येन्द्र प्रीतोऽस्मि तव विक्रमात् ।

अदेयमपि ते दद्मि यत्ते मनसि वर्तते ॥

सनत्कुमार उवाच

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य विष्णोर्मायाविनो हरेः ।

प्रत्युवाच महाबुद्धिदैत्यराजो जलंधरः ॥

जलंधर उवाच

यदि भावुक तुष्टोऽसि वरमेतं ददस्व मे ।

मद्भगिन्या मया सार्द्धं मद्रेहे सगणो वस ॥

सनत्कुमार उवाच

तदाकर्ण्य वचस्तस्य महादैत्यस्य खिन्नधीः ।

तथास्त्विति च देवेशो जगाद भगवान् हरिः ॥

उवास स ततो विष्णुः सर्वदेवगणैस्सह ।

जलंधरं नाम पुरमागत्य रमया सह ॥

अथो जलंधरो दैत्यः स्वभगिन्या च विष्णुना ।

उवास स्वालयं प्राप्तो हर्षाकुलितमानसः ॥

तब उन महावीर विष्णुने भी उस व्यथाकी ३२ चिन्ता न करके अपनी दृढ़ मुष्टिसे जलन्धरके । हृदयपर प्रहार किया । तदनन्तर जानुओं, बाहुओं एवं मुष्टियोंसे पृथ्वीको शब्दायमान करते हुए उन दोनों ३३ महावीरोंका बाहुयुद्ध होने लगा । हे मुनिश्रेष्ठ! इस | प्रकार उस दैत्यसे बहुत देरतक युद्ध करके विष्णु ३४ विस्मित हो गये और मनमें दुःखका अनुभव करने लगे । इसके बाद मायाविदोंमें श्रेष्ठ तथा माया करनेवाले विष्णुने प्रसन्न होकर मेघके समान गम्भीर ३५ वाणीमें दैत्यराजसे कहा- ॥ ३२–३५ ॥ विष्णुजी बोले – हे दैत्यश्रेष्ठ! तुम महाप्रभु, रणदुर्मद तथा धन्य हो, जो इन उत्तम आयुधोंसे तनिक ३६ भी भयभीत नहीं हुए । मैंने इन्हीं उग्र आयुधोंसे महायुद्धमें बहुत - से दुर्मद तथा वीर दैत्योंको मारा ३७ है, वे छिन्नदेह होकर मृत्युको प्राप्त हो गये । हे महादैत्य! मैं तुम्हारे युद्धसे प्रसन्न हो गया हूँ, तुम ३८ महान् हो, तुम्हारे समान वीर चराचरसहित त्रिलोकीमें आजतक दिखायी नहीं पड़ा॥३६–३८ ॥ हे दैत्यराज! तुम्हारे पराक्रमसे मैं प्रसन्न हूँ, ३ ९ तुम्हारे मनमें जो भी हो, उस वरको माँगो, वह - अदेय हो, तो भी तुम्हें दूँगा ॥ ३ ९ ॥ सनत्कुमार बोले- उन महामायावी विष्णुका | यह वचन सुनकर महाबुद्धिमान् दैत्यराज जलन्धरने ४० कहा— ॥ ४० ॥

जलन्धर बोला- हे भावुक! यदि आप प्रसन्न हैं, तो मुझे यह वरदान दीजिये कि आप मेरी बहन ४१ ( महालक्ष्मी ) तथा अपने गणोंके साथ मेरे घरमें निवास करेंगे ॥ ४१ ॥

सनत्कुमार बोले — उस महादैत्यके इस वचनको ' ऐसा । सुनकर खिन्न मनवाले देवेश भगवान् विष्णुने-४२ ही हो ' यह कहा ॥ ४२ ॥ एवं

उसके बाद विष्णुजी सभी देवताओं निवास ४३ महालक्ष्मीके साथ जलन्धरके नगरमें आकर करने लगे ॥ ४३ ॥ अपने

भी तब हर्षसे पूर्ण मनवाला वह जलन्धर साथ | घर आकर अपनी बहन लक्ष्मी और विष्णुके ४४ । निवास करने लगा ॥ ४४ ॥

पृष्ठ 903

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अ ० १८ ] रुद्रसंहिता (

जलंधरोऽथ देवानामधिकारेषु दानवान् ।

स्थापयित्वा सहर्षः सन् पुनरागान्महीतलम् ॥ ४५

देवगंधर्वसिद्धेषु यत्किंचिद्रत्नसंचितम् ।

तदात्मवशगं कृत्वाऽतिष्ठत्सागरनंदनः ॥ ४६

पातालभवने दैत्यं निशुंभं सुमहाबलम् ।

स्थापयित्वा स शेषादीनानयद्भूतलं बली ॥ ४७

देवगंधर्वसिद्धौघान् सर्पराक्षसमानुषान् ।

स्वपुरे नागरान्कृत्वा शशास भुवनत्रयम् ॥ ४८

एवं जलंधरः कृत्वा देवान्स्ववशवर्तिनः ।

धर्मेण पालयामास प्रजाः पुत्रानिवौरसान् ॥ ४ ९

न कश्चिद् व्याधितो नैव दुःखितो न कृशस्तथा ।

न दीनो दृश्यते तस्मिन्धर्माद्राज्यं प्रशासति ॥ ५०

युद्धखण्ड ) ८ ९ ३ वह जलन्धर देवताओंके अधिकारपर दानवोंको नियुक्तकर हर्षित होकर पुनः पृथ्वीपर लौट आया ॥ ४५ ॥

वह सागरपुत्र जलन्धर देव, गन्धर्व एवं सिद्धोंके पास जो रत्न संचित था, उसे अपने अधीन करके रहने लगा । वह महाबली पाताललोकमें महाबलवान् निशुम्भ नामक दैत्यको स्थापितकर शेषादिको पृथ्वीपर ले आया और देव, गन्धर्व, सिद्ध, सर्प, राक्षस तथा मनुष्योंको अपने पुरमें नागरिक बनाकर तीनों लोकोंपर शासन करने लगा ॥ ४६–४८ ॥ इस प्रकार देवगणोंको अपने वशमें करके जलन्धर धर्मपूर्वक प्रजाओंका पालन वैसे ही करने लगा, जैसे पिता अपने औरस पुत्रोंका पालन करता है । उसके धर्मपूर्वक राज्यका शासन करते रहनेपर कोई भी रोगी, दुखी, दुर्बल और दीन नहीं दिखायी | पड़ता था ॥४ ९ -५० ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे जलंधरोपाख्याने विष्णुजलंधरयुद्धवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें जलन्धरोपाख्यानमें विष्णु - जलन्धरयुद्धवर्णन नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १७ ॥

अथाष्टादशोऽध्यायः जलन्धरके आधिपत्यमें रहनेवाले दुखी देवताओंद्वारा शंकरकी स्तुति, शंकरजीका देवर्षि नारदको जलन्धरके पास भेजना, वहाँ देवोंको आश्वस्त करके नारदजीका जलन्धरकी सभामें जाना, उसके ऐश्वर्यको देखना तथा पार्वतीके सौन्दर्यका वर्णनकर उसे प्राप्त करनेके लिये जलन्धरको सनत्कुमार उवाच

एवं शासति धर्मेण महीं तस्मिन्महासुरे ।

बभूवुर्दुःखिनो देवा भर्व्यभावान्मुनीश्वर ॥ १

दुःखितास्ते सुराः सर्वे शिवं शरणमाययुः ।

मनसा शंकरं देवदेवं सर्वप्रभुं प्रभुम् ॥ २

तुष्टुवुर्वाग्भिरिष्टाभिर्भगवन्तं महेश्वरम् ।

निवृत्तये स्वदुःखस्य सर्वदं भक्तवत्सलम् ॥ ३

आहूय स महादेवो भक्तानां सर्वकामदः ।

। नारदं प्रेरयामास ॥ ४

देवकार्यचिकीर्षया परामर्श देना सनत्कुमार बोले – हे मुनीश्वर! इस प्रकार उस महान् असुरके धर्मपूर्वक पृथ्वीका शासन करते रहनेपर उसके स्वामित्वमें रहनेके कारण देवता दुखी हुए ॥१ ॥

वे सभी दुखित देवता मन - ही - मन देवाधिदेव सर्वप्रभु भगवान् सदाशिवकी शरणमें आये और अपने दुःखको दूर करनेके लिये सब कुछ देनेवाले भक्तवत्सल भगवान् महेश्वरकी मनोहर वाणीसे स्तुति करने लगे ॥२-३ ॥ तब भक्तजनोंके सभी मनोरथ पूर्ण करनेवाले महादेवने देवकार्य करनेकी इच्छासे नारदको बुलाकर वहाँ जानेहेतु ] प्रेरित किया । इसके बाद ज्ञानी, | [

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८ ९ ४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १८

अथ देवमुनिर्ज्ञानी शंभुभक्तः सतां गतिः ।

शिवाज्ञया ययौ दैत्यपुरे देवान्स नारदः ॥

व्याकुलास्ते सुराः सर्वे वासवाद्या द्रुतं मुनिम् ।

आगच्छन्तं समालोक्य समुत्तस्थुर्हि नारदम् ॥

ददुस्त आसनं नत्वा मुनये प्रीतिपूर्वकम् ।

नारदाय सुराः शक्रमुखा उत्कंठिताननाः ॥

सुखासीनं मुनिवरमासने सुप्रणम्य तम् ।

पुनः प्रोचुः सुरा दीना वासवाद्या मुनीश्वरम् ॥

देवा ऊचुः

भो भो मुनिवरश्रेष्ठ दुःखं शृणु कृपाकर ।

श्रुत्वा तन्नाशय क्षिप्रं प्रभुस्त्वं शंकरप्रियः ॥

जलंधरेण दैत्येन सुरा विद्राविता भृशम् ।

स्वस्थानाद्भर्तृभावाच्च दुःखिता वयमाकुलाः ॥

स्वस्थानादुष्णरश्मिश्च चन्द्रो निस्सारितस्तथा ।

वह्निश्च धर्मराजश्च लोकपालास्तथेतरे ॥

सुबलिष्ठेन वै तेन सर्वे देवाः प्रपीडिताः ।

दुःखं प्राप्ता वयं चाति शरणं त्वां समागताः ॥

संग्रामे स हृषीकेशं स्ववशं कृतवान् बली ।

जलंधरो महादैत्यः सर्वामरविमर्दकः ॥

तस्य वश्यो वराधीनो ऽवात्सीत्तत्सदने हरिः ।

स लक्ष्म्या सहितो विष्णुर्यो नः सर्वार्थसाधकः ॥

जलंधरविनाशाय यत्नं कुरु महामते ।

त्वं नो दैववशात्प्राप्तः सदा सर्वार्थसाधकः ॥

सनत्कुमार उवाच

इत्याकर्ण्य वचस्तेषाममराणां स नारदः ।

आश्वास्य मुनिशार्दूलस्तानुवाच कृपाकरः ॥

नारद उवाच

जानेऽहं वै सुरा यूयं दैत्यराजपराजिताः ।

दुःखं प्राप्ताः पीडिताश्च स्थानान्निस्सारिताः खलु ॥

स्वशक्त्या भवतां स्वार्थं करिष्ये नात्र संशयः ।

अनुकूलोऽहमिह वो दुःखं प्राप्ता यतोऽमराः ॥

| शिवजीके भक्त तथा सज्जनोंका उद्धार करनेवाले ५ | देवर्षि नारद शिवजीकी आज्ञासे देवताओंके पास दैत्यपुरीमें गये॥४-५ ॥ उस समय व्याकुल इन्द्रादि सभी देवता मुनि नारदको ६ आते देखकर शीघ्रतासे उठ गये । उत्कण्ठापूर्ण मुखवाले | इन्द्र आदि देवताओंने नारद मुनिको नमस्कार करके ७ प्रीतिपूर्वक उन्हें आसन प्रदान किया । तदनन्तर सुखपूर्वक आसनपर बैठे हुए उन मुनिको पुनः प्रणाम करके इन्द्रादि ८ दुखित देवताओंने मुनीश्वरसे कहा- ॥ ६–८ ॥ देवता बोले – हे मुनिश्रेष्ठ! हे कृपाकर! [ हमलोगोंके ] दुःखको सुनिये और सुनकर उसे शीघ्र दूर कीजिये, आप प्रभु हैं तथा शंकरप्रिय हैं । दैत्य ९ जलन्धरने देवताओंको [ पराजितकर ] उन्हें अपने स्थानसे हटा दिया है । इस समय उसके स्वामित्वमें १० रहनेके कारण हमलोग दुखी तथा व्याकुल हैं । उसके द्वारा सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, धर्मराज, लोकपाल तथा ११ अन्य देवता भी अपने स्थानोंसे हटा दिये गये हैं । उस महाबलवान् दैत्यने हम सभी देवताओंको बहुत १२ पीड़ित किया है, अतः हम सभी अत्यन्त दुखी होकर आपकी शरणमें आये हैं । सभी देवताओंका मर्दन करनेवाले उस बलवान् महादैत्य जलन्धरने संग्राममें १३ विष्णुको भी अपने वशमें कर लिया है ॥ ९ -१३ ॥ हमलोगोंके समस्त कार्यको सिद्ध करनेवाले १४ विष्णु वर देनेके कारण उसके वशमें होकर लक्ष्मीसहित उसके घरमें निवास कर रहे हैं । हे महामते! आप सदा सर्वार्थसाधक हैं, हमलोगोंके भाग्यसे ही आप १५ | यहाँ आये हैं, अतः जलन्धरके विनाशके लिये कोई उपाय कीजिये ॥ १४-१५ ॥ बोले- उन देवताओंकी यह बात सनत्कुमार उन्हें | सुनकर कृपा करनेवाले वे मुनिश्रेष्ठ नारदजी १६ आश्वस्त करके कहने लगे— ॥ १६ ॥ कि

नारदजी बोले – हे देवताओ! मैं जानता हूँ और आपलोग दैत्यराज जलन्धरसे पराजित हो गये हैं अपने - अपने स्थानोंसे हटा दिये गये हैं, अतः आपलोग १७ । दुखित तथा पीड़ित हैं । मैं अपनी शक्तिके अनुसार संश | आपलोगोंका कार्य सिद्ध करूँगा, इसमें कोई है मैं , । नहीं है । आपलोगोंने बड़ा दुःख उठाया १८ । आपलोगोंके अनुकूल हूँ ॥ १७-१८ ॥

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अ ० १८ ] रुद्रसंहिता ( सनत्कुमार उवाच

एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठो द्रष्टुं दानववल्लभम् ।

आश्वास्य सकलान्देवाञ्जलंधरसभां ययौ ॥ १ ९

अथागतं मुनिश्रेष्ठं दृष्ट्वा दैत्यो जलंधरः ।

उत्थाय परया भक्त्या ददौ श्रेष्ठासनं वरम् ॥ २०

स तं संपूज्य विधिवद्दानवेन्द्रोऽतिविस्मितः ।

सुप्रहस्य तदा वाक्यं जगाद मुनिसत्तमम् ॥ २१

जलंधर उवाच

कुत आगम्यते ब्रह्मन् किं च दृष्टं त्वया क्वचित् ।

यदर्थमिह आयातस्तदाज्ञापय मां मुने ॥ २२

सनत्कुमार उवाच

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य दैत्येन्द्रस्य महामुनिः ।

प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा नारदो हि जलंधरम् ॥ २३

नारद उवाच

सर्वदानवदैत्येन्द्र जलंधर महामते ।

धन्यस्त्वं सर्वलोकेश रत्नभोक्ता त्वमेव हि ॥ २४

मदागमनहेतुं वै शृणु दैत्येन्द्रसत्तम ।

यदर्थमिह चायातस्त्वहं वक्ष्येऽखिलं हि तत् ॥ २५

गतः कैलासशिखरं दैत्येन्द्राहं यदृच्छया ।

योजनायुतविस्तीर्णं कल्पद्रुममहावनम् ॥ २६

कामधेनुशताकीर्णं चिंतामणिसुदीपितम् ।

सर्वरुक्ममयं दिव्यं सर्वत्राद्भुतशोभितम् ॥ २७

तत्रोमया सहासीनं दृष्टवानस्मि शंकरम् ।

सर्वाङ्गसुन्दरं गौरं त्रिनेत्रं चन्द्रशेखरम् ॥ २८

तं

दृष्ट्वा महदाश्चर्यं वितर्कों मेऽभवत्तदा ।

क्वापीदृशी भवेद् वृद्धिस्त्रैलोक्ये वा न वेति च ॥ २ ९

तावत्तवापि दैत्येन्द्र समृद्धिः संस्मृता मया ।

तद्विलोकनकामोऽहं त्वत्सांनिध्यमिहागतः ॥ ३०

युद्धखण्ड ) ८ ९ ५ सनत्कुमार बोले — ऐसा कहकर मुनिश्रेष्ठ नारदजी सभी देवताओंको आश्वस्त करके उस दानवप्रिय जलन्धरको देखनेके लिये उसकी सभामें गये ॥१ ९ ॥ तदनन्तर दैत्य जलन्धरने मुनिश्रेष्ठ नारदको आया हुआ देखकर बड़ी भक्तिके साथ उठकर उन्हें श्रेष्ठ तथा उत्तम आसन प्रदान किया । तत्पश्चात् विधिपूर्वक उनकी पूजाकर वह दानवेन्द्र बहुत आश्चर्यमें पड़ गया और हँस करके मुनिवरसे यह वचन कहने लगा - ॥ २०-२१ ॥ जलन्धर बोला – हे ब्रह्मन्! आपका आगमन कहाँसे हो रहा है, आपने कहींपर कुछ देखा है क्या! हे मुने! आप यहाँ जिसलिये आये हैं, उसे मुझको बताइये ॥२२ ॥

सनत्कुमार बोले — उस दैत्येन्द्रका यह वचन सुनकर महामुनि नारदजी प्रसन्नचित्त होकर जलन्धरसे | कहने लगे —॥२३ ॥

नारदजी बोले – सम्पूर्ण दैत्यों तथा दानवोंके अधिपति हे जलन्धर! तुम धन्य हो, हे सर्वलोकेश! तुम्हीं सारे रत्नोंका उपभोग करनेयोग्य हो ॥ २४ ॥

हे दैत्येन्द्रसत्तम! मेरे आनेका कारण सुनो, मैं जिस निमित्तसे यहाँ आया हूँ, मैं वह सब कह रहा हूँ ॥ २५ ॥

हे दैत्येन्द्र! मैं अपनी इच्छासे कैलासपर्वतपर गया था, जो दस हजार योजन विस्तारवाला, कल्पवृक्षके महान् वनसे युक्त, सैकड़ों कामधेनुओंसे समन्वित, चिन्तामणिसे प्रकाशित, सम्पूर्णरूपसे सुवर्णमय, दिव्य तथा सभी प्रकारकी अद्भुत वस्तुओंसे सुशोभित हो रहा है ॥ २६-२७ ॥ वहाँपर मैंने पार्वतीके साथ बैठे हुए गौरवर्ण, सर्वांगसुन्दर, त्रिनेत्र एवं चन्द्रमाको मस्तकपर धारण किये हुए भगवान् शंकरको देखा ॥२८ ॥

महान् आश्चर्यसे परिपूर्ण उस कैलासको देखकर मैंने अपने मनमें विचार किया कि त्रिलोकीमें / कहीं कोई ऐसी समृद्धि है अथवा नहीं । हे दैत्येन्द्र! उसी समय मुझे तुम्हारी समृद्धिका स्मरण हुआ और उसीको देखनेकी इच्छासे मैं तुम्हारे पास यहाँ आया हूँ ॥ २ ९ -३० ॥

पृष्ठ 906

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८ ९ ६ सनत्कुमार उवाच इति नारदतः श्रुत्वा स दैत्येन्द्रो जलंधरः स्वसमृद्धिं समग्रां वै दर्शयामास सादरम् दृष्ट्वा स नारदो ज्ञानी देवकार्यसुसाधकः प्रभुप्रेरणया प्राह दैत्येन्द्रं तं जलंधरम् नारद उवाच

तवास्ति सुसमृद्धिर्हि वरवीराखिलाधुना ।

त्रैलोक्यस्य पतिस्त्वं हि चित्रं किं चात्र संभवम् ॥

मणयो रत्नपुंजाश्च गजाद्याश्च समृद्धयः ।

ते गृहेऽद्य विभांतीह यानि रत्नानि तान्यपि ॥

गजरत्नं त्वयानीतं शक्रस्यैरावतस्तथा । अश्वरत्नं महावीर सूर्यस्योच्चैःश्रवा हयः

कल्पवृक्षस्त्वयानीतो निधयो धनदस्य च ।

हंसयुक्तविमानं च त्वयानीतं हि वेधसः ॥

इत्येवं वररत्नानि दिवि पृथ्व्यां रसातले । यानि दैत्येन्द्र ते भांति गृहे तानि समन्ततः

त्वत्समृद्धिमिमां पश्यन्सम्पूर्णां विविधामहम् ।

प्रसन्नोऽस्मि महावीर गजाश्वादिसुशोभिताम् ॥

जायारत्नं महाश्रेष्ठं जलंधर न ते गृहे ।

तदानेतुं विशेषेण स्त्रीरत्नं वै त्वमर्हसि ॥

यस्य गेहे सुरत्नानि सर्वाणि हि जलंधर ।

जायारत्नं न चेत्तानि न शोभंते वृथा ध्रुवम् ॥

सनत्कुमार उवाच

इत्येवं वचनं श्रुत्वा नारदस्य महात्मनः ।

उवाच दैत्यराजो हि मदनाकुलमानसः ॥

जलंधर उवाच

भो भो नारद देवर्षे नमस्तेऽस्तु महाप्रभो ।

जायारत्नवरं कुत्र वर्तते तद्वदाधुना ॥

ब्रह्मांडे यत्र कुत्रापि तद्रलं यदि वर्त्तते ।

तदानेष्ये ततो ब्रह्मन्सत्यं सत्यं न संशयः ॥

नारद उवाच

कैलासे ह्यतिरम्ये च सर्वर्द्धिसुसमाकुले ।

योगरूपधरः शंभुरस्ति तत्र दिगम्बरः ॥

तस्य भार्या सुरम्या हि सर्वलक्षणलक्षिता ।

सर्वांगसुन्दरीनाम्ना पार्वतीति मनोहरा ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १८ सनत्कुमार बोले- नारदजीसे ऐसा सुनकर । । दैत्यपति जलन्धरने बड़े आदरके साथ उन्हें अपनी उस सारी ॥ ३१ समृद्धि दिखायी । तब देवगणोंका कार्य सिद्ध करनेवाले । वे ज्ञानी नारदजी उसे देखकर शंकरजीकी प्रेरणासे उस ॥ ३२ दैत्येन्द्र जलन्धरसे कहने लगे- ॥ ३१-३२ ॥ नारदजी बोले - – हे श्रेष्ठ वीर! तुम्हारे पास इस समय नि: सन्देह सारी सम्पत्ति है, तुम त्रिलोकीके पति भी ३३ हो । अतः इसमें आश्चर्य क्या हो सकता है । मणि, रत्नोंकी राशियाँ, घोड़े, हाथी आदि समृद्धियाँ तथा जो अन्य रत्न ३४ हैं, वे सब तुम्हारे घरमें सुशोभित हो रहे हैं ॥ ३३-३४ ॥ हे महावीर! तुमने इन्द्रके हाथियोंमें रत्नभूत ऐरावतको ॥ ३५ ले लिया है तथा सूर्यका अश्वरत्न उच्चैःश्रवा घोड़ा भी ले लिया है । तुम कल्पवृक्ष भी ले आये हो तथा कुबेरकी ३६ सारी निधियाँ भी तुम्हारे पास हैं । तुम ब्रह्माजीका हंसयुक्त विमान भी ले आये हो । इस प्रकार हे दैत्येन्द्र! पृथ्वी, पाताल तथा स्वर्गलोकमें जो भी उत्तम रत्न हैं, वे सब ॥ ३७ तुम्हारे घरमें सुशोभित हो रहे हैं ॥ ३५-३७ ॥ हे महावीर! गज, अश्वादिसे सुशोभित तुम्हारी ३८ इस सम्पूर्ण समृद्धिको देखता हुआ मैं प्रसन्न हूँ ॥ ३८ ॥

किंतु हे जलन्धर! तुम्हारे घरमें सर्वश्रेष्ठ स्त्रीरल ३ ९ नहीं है, इसलिये तुम विशेषरूपसे स्त्रीरत्नको लानेका प्रयत्न करो । हे जलन्धर! जिसके घरमें सभी सुन्दर रत्न हों, किंतु यदि स्त्रीरत्न न हो, तो वे सब शोभित नहीं ४० होते हैं और निश्चय ही वे सभी रत्न व्यर्थ हो जाते हैं ॥ ३ ९ -४० ॥ सनत्कुमार बोले — महात्मा नारदकी इस ४१ सुनकर दैत्यराज कामसे व्याकुलचित्त होकर कहने लगा— ॥ ४१ ॥

जलन्धर बोला- हे देवर्षे! हे नारद! आपको ४२ नमस्कार है । हे महाप्रभो! इस समय वह श्रेष्ठ स्त्रीरत्न जहाँ । । कहाँ है? मुझे बताइये । हे ब्रह्मन्! इस ब्रह्माण्डमें यह ४३ कहीं भी वह स्त्रीरत्न है, तो मैं उसे वहाँसे लाऊँगा, ॥ । सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४२-४३ नारदजी बोले – अत्यन्त मनोहर सर्वसमृद्धिसम्पन्न ४४ कैलास पर्वतपर योगीका रूप धारण किये हुए दिगम्बर । । शम्भु रहते हैं । सुरम्य, सभी लक्षणोंसे सम्पन्न, सर्वांगसुन्दरी ॥ ४५ । तथा मनोहर पार्वती नामक उनकी भार्या है ॥। ४४-४५

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अ ० १ ९ ] रुद्रसंहिता ( तदीदृशं रूपमनन्यसंगतं दृष्टं न कुत्रापि कुतूहलाढ्यम् । मोहनकृत्सुयोगिनां अत्यद्भुतंसुदर्शनीयं परमर्द्धिकारि ॥ ४६

स्वचित्ते कल्पयाम्यद्य शिवादन्यः समृद्धिमान् ।

जायारत्नान्विताद्वीर त्रिलोक्यां न जलंधर ॥ ४७

यस्या लावण्यजलधौ निमग्नश्चतुराननः ।

स्वधैर्य्यं मुमुचे पूर्वं तया कान्योपमीयते ॥ ४८

गतरागोऽपि हि यया मदनारिः स्वलीलया ।

निजतंत्रोऽपि हि यतः स स्वात्मवशगः कृतः ॥ ४ ९

यथा स्त्रीरत्नसंभोक्तुः समृद्धिस्तस्य साभवत् ।

तथा न तव दैत्येन्द्र सर्वरत्नाधिपस्य च ॥ ५०

सनत्कुमार उवाच

इत्युक्त्वा स तु देवर्षिर्नारदो लोकविश्रुतः ।

ययौ विहायसा देवोपकारकरणोद्यतः ॥ ५१

युद्धखण्ड ) ८ ९ ७ हाव - भावसे पूर्ण ऐसा मनोहर रूप अन्यत्र कहीं भी देखनेको नहीं मिलता । वह अत्यन्त अद्भुत रूप | परम योगियोंको भी मोहित करनेवाला, दर्शनके योग्य और सम्पूर्ण समृद्धियोंको प्रदान करनेवाला है ॥ ४६ ॥

हे वीर! हे जलन्धर! मैं अपने मनमें अनुमान करता हूँ कि स्त्रीरत्नसे युक्त शिवजीसे बढ़कर अन्य कोई भी इस समय तीनों लोकोंमें समृद्धिशाली नहीं है ॥ ४७ ॥

पूर्वकालमें जिसके लावण्यसमुद्रमें डूबकर ब्रह्माजीने अपना धैर्य खो दिया था, उससे किसी दूसरी स्त्रीकी उपमा कैसे की जा सकती है । जिसने अपनी लीलासे कामके शत्रु, रागरहित तथा स्वतन्त्र शंकरको भी अपने वशमें कर लिया है । हे दैत्येन्द्र! | उस स्त्रीरत्नका सेवन करनेवाले शिवकी जैसी समृद्धि है, वैसी समृद्धि सम्पूर्ण रत्नोंके अधिपति होनेपर भी तुम्हारे पास नहीं है॥४८–५० ॥ सनत्कुमार बोले- ऐसा कहकर देवताओंका उपकार करनेके लिये उद्यत लोकविख्यात वे देवर्षि नारद आकाशमार्गसे चले गये ॥५१ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे जलंधरवधोपाख्याने देवर्षिजलंधरसंवादो नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥॥। इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें जलन्धरवधोपाख्यानमें

देवर्षि - जलन्धरसंवादवर्णन नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १८ ॥

अथैकोनविंशोऽध्यायः प्राप्त करनेके लिये जलन्धरका शंकरके पास दूतप्रेषण, उसके वचनसे पार्वतीको एक भयंकर पुरुषकी उत्पत्ति, उससे भयभीत उत्पन्न क्रोधसे शम्भुके भ्रूमध्यसे नामसे शिवगणोंमें दूतका पलायन, उस पुरुषका कीर्तिमुख जलन्धरके होना तथा शिवद्वारपर स्थित रहना प्रतिष्ठित व्यासजी बोले- हे सर्वज्ञ सनत्कुमार! देवर्षि व्यास उवाच नारदके स्वर्गलोक चले जानेपर उस दैत्यराजने क्या

सनत्कुमार सर्वज्ञ नारदे हि गते दिवि । मुझसे कहिये ॥ १ ॥

दैत्यराट् किमकार्षीत्स तन्मे वद सुविस्तरात् ॥ १ किया? उसे विस्तारपूर्वक कहकर नारदजीके सनत्कुमार बोले — उस दैत्यसे तमामन्त्र्य सनत्कुमार उवाच । स्वर्गलोक चले जानेपर पार्वतीके रूपके श्रवणसे वह गते दैत्यं नारदे दिवि दैत्यराट् जलन्धर कामज्वरसे पीड़ित हो गया ॥ २ ॥

तद्रूपश्रवणादासीदनंगज्वरपीडितः ॥। २ दैत्यराज अधीन होनेसे उसकी बुद्धि उसके बाद कालके नष्ट हो गयी और मोहको प्राप्त हो उसने सैंहिकेय अथो जलंधरो दैत्यः कालाधीनः प्रनष्टधीः । ॥ ३ ॥

दूतमाह्वाययामास विमोहितः ॥ ३ नामक दूतका बुलाया सैंहिकेयं 2223 Shivmaha Dart Section 30_1_Front

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८ ९ ८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ ९ आगतं तं समालोक्य कामाक्रांतमनाः स हि । उसे आया हुआ देखकर कामसे आक्रान्त सुसंबोध्य समाचष्ट सिंधुपुत्रो जलंधरः ॥ ४ मनवाला वह सागरपुत्र जलन्धर उसे समझाकर कहने लगा — ॥ ४ ॥

जलंधर उवाच जलन्धर बोला- हे दूतोंमें श्रेष्ठ! हे भो भो दूतवरश्रेष्ठ सर्वकार्यप्रसाधक । | कार्य सिद्ध करनेवाले! हे महाप्राज्ञ सिंहिकापुत्र सभी सैंहिकेय महाप्राज्ञ कैलासं गच्छ पर्वतम् ॥ ५ कैलास पर्वतपर जाओ, वहाँपर जटाधारण किये! हुए तुम, तत्रास्ति योगी शंभ्वाख्यस्तपस्वी च जटाधरः भस्मभूषितसर्वाङ्गो विरक्तो विजितेन्द्रियः तत्र गत्वेति वक्तव्यं योगिनं दूत शंकरम् जटाधरं विरक्तं तं निर्भयेन हृदा त्वया हे योगिंस्ते दयासिन्धो जायारत्नेन किं भवेत् । भूतप्रेतपिशाचादिसेवितेन वनौकसा मन्नाथे भुवने योगिन्नोचिता गतिरीदृशी ॥ सर्वांगमें भस्म लपेटे हुए, परम विरक्त, तपस्वी एवं ॥ ६ जितेन्द्रिय शिव नामक योगी रहता है॥५-६ ॥ । हे दूत! उस जटाधारी परम विरक्त योगी ॥ ७ शंकरके पास जाकर भयरहित मनसे तुम [ मेरा सन्देश ] इस प्रकार कहना - हे योगिन्! हे दयासिन्धो! वनमें निवास करनेवाले और भूत - प्रेत - पिशाचादिसे ॥ ८ सेवित आपको स्त्रीरत्नसे क्या प्रयोजन है? हे योगिन्! जब समस्त भुवनाधिपति मुझ जैसा स्वामी विद्यमान जायारत्नमतस्त्वं मे देहि रत्नभुजे निजम् ॥ है, तब तुम्हें ऐसा करना उचित नहीं है, अतः तुम

यानि यानि सुरत्नानि त्रैलोक्ये तानि सन्ति मे ।

मदधीनं जगत्सर्वं विद्धि त्वं सचराचरम् ॥

इन्द्रस्य गजरत्नं चोच्चैःश्रवोरत्नमुत्तमम् ।

बलाद्गृहीतं सहसा पारिजातस्तरुस्तथा ॥

विमानं हंससंयुक्तमंगणे मम तिष्ठति । रत्नभूतं महादिव्यमुत्तमं वेधसोद्भुतम् ९ अपना स्त्रीरत्न सभी रत्नोंका सेवन करनेवाले मुझे दे दो ॥७ – ९ ॥ तुम इस बातको जान लो कि सारा चराचर १० जगत् मेरे अधीन है और त्रिलोकीमें जो - जो उत्तम रत्न हैं, वे सब मेरे अधीन हैं ॥१० ॥

मैंने इन्द्रका ऐरावत हाथी, उच्चैःश्रवा घोड़ा ११ एवं पारिजात वृक्ष बलपूर्वक सहसा छीन लिया है ॥११ ॥

ब्रह्माका हंसयुक्त विमान मेरे आँगनमें विद्यमान ॥१२ है, जो रलस्वरूप महादिव्य एवं अद्भुत

महापद्मादिकं दिव्यं निधिरत्नं स्वदस्य च ।

छत्रं मे वारुणं गेहे कांचनस्त्रावि तिष्ठति ॥

किञ्जल्किनी महामाला सर्वदाऽम्लानपंकजा ।

मत्पितुः सा ममैवास्ति पाशश्च कपतेस्तथा ॥

मृत्योरुत्क्रांतिदा शक्तिर्मया नीता बलाद्वरा ।

ददौ मह्यं शुचिर्दिव्ये शुचिशौचे च वाससी ॥

एवं योगीन्द्र रत्नानि सर्वाणि विलसंति मे । अतस्त्वमपि है ॥ १२५ कुबेरके महापद्म आदि दिव्य निधिरन तथा १३ सुवर्णकी वर्षा करनेवाला वरुणका छत्र मेरे घरमें है । | सर्वदा विकसित कमलोंवाली किंजल्किनी नामक मेरे | पिताकी माला तो मेरी ही है और जलाधिपति १४ वरुणका पाश भी मेरे यहाँ ही है । मृत्युकी सर्वश्रेष्ठ | शक्ति, जिसका नाम उत्क्रान्तिदा है, उसे भी मैंने । मृत्युसे बलपूर्वक छीन लिया है । अग्निदेवने मुझे दिव्य १५ परम पवित्र तथा कभी भी मलिन न होनेवाले दो वस्स । दिये हैं । इस प्रकार हे योगीन्द्र! सभी रत्न मेरे पास । शोभित हो रहे हैं । अतः हे जटाधर! तुम भी मुझे मे देहि स्वस्त्रीरत्नं जटाधर ॥ १६ । अपना स्त्रीरत्न प्रदान करो॥१३–१६ ॥ 2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_30_1_Back

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अ ० १ ९ ] रुद्रसंहिता ( सनत्कुमार उवाच

इति श्रुत्वा वचस्तस्य नन्दिना स प्रवेशितः ।

जगामोग्रसभां राहुर्विस्मयोद्भुतलोचनः ॥ १७

तत्र गत्वा शिवं साक्षाद्देवदेवं महाप्रभुम् ।

स्वतेजोध्वस्ततमसं भस्मलेपविराजितम् ॥ १८

महाराजोपचारेण विलसन्तं महाद्भुतम् ।

सर्वाङ्गसुन्दरं दिव्यभूषणैर्भूषितं हरम् ॥ १ ९

प्रणनाम च तं गर्वात्तत्तेजः क्रांतविग्रहः ।

निकटं गतवान् शंभोः स दूतो राहुसंज्ञकः ॥ २०

अथो तदग्र आसीनो वक्तुकामो हि सैंहिकः ।

त्र्यंबकं स तदा संज्ञाप्रेरितो वाक्यमब्रवीत् ॥ २१

राहुरुवाच

दैत्यपन्नगसेव्यस्य त्रैलोक्याधिपतेः सदा ।

दूतोऽहं प्रेषितस्तेन त्वत्सकाशमिहागतः ॥ २२

जलंधरोऽब्धितनयः सर्वदैत्यजनेश्वरः ।

त्रैलोक्यस्येश्वरस्सोऽथाभवत्सर्वाधिनायकः ॥ २३

स दैत्यराजो बलवान्देवानामन्तकोपमः ।

योगिनं त्वां समुद्दिश्य स यदाह शृणुष्व तत् ॥ २४

महादिव्यप्रभावस्य तस्य दैत्यपतेः प्रभोः ।

सर्वरत्नेश्वरस्य त्वमाज्ञां शृणु वृषध्वज ॥ २५

श्मशानवासिनो नित्यमस्थिमालाधरस्य च ।

दिगंबरस्य ते भार्या कथं हैमवती शुभा ॥ २६

अहं रत्नाधिनाथोऽस्मि सा च स्त्रीरत्नसंज्ञिता ।

तस्मान्ममैव सा योग्या नैव भिक्षाशिनस्तव ॥ २७

मम वश्यास्त्रयो लोका भुंजेऽहं मखभागकान् ।

यानि संति त्रिलोकेऽस्मिन् रत्नानि मम सद्मनि ॥ २८

वयं रत्नभुजस्त्वं तु योगी खलु दिगम्बरः ।

स्वस्त्रीरत्नं देहि मह्यं प्रजाः ॥ २ ९

राज्ञः सुखकराः 2223 Shivmahaar Dost I Section 30 2 Front युद्धखण्ड ) ८ ९९ सनत्कुमार ' बोले- - उसका यह वचन सुनकर नन्दीने उसे भीतर प्रवेश कराया, तब अद्भुत नेत्रोंवाला वह ( सिंहिकापुत्र ) राहु विस्मित होकर शिवजीकी सभाकी ओर चला । उसने उस सभामें जाकर अपने तेजसे समस्त अन्धकारको दूर करनेवाले, भस्मका लेप लगाये हुए, महाराजोपचारसे सुशोभित होते हुए, अत्यन्त अद्भुत, दिव्य भूषणोंसे भूषित तथा सर्वांगसुन्दर साक्षात् देवदेव महाप्रभु शिवजीको देखा, उनके तेजसे पराभूत शरीरवाले राहु नामक उस दूतने गर्वसे शिवजीको प्रणाम किया और उनके समीप गया ॥ १७–२० ॥ इसके बाद वह सिंहिकापुत्र शिवके आगे बैठकर उनसे कुछ कहनेकी इच्छा करने लगा, तब उनका संकेत पाकर उसने यह वचन कहा— ॥ २१ ॥

राहु बोला – दैत्य एवं सर्पोंसे सदा सेवित तथा तीनों लोकोंके अधिपति जलन्धरका मैं दूत हूँ और उनके द्वारा भेजे जानेपर आपके पास आया हूँ । वे जलन्धर समुद्रके पुत्र हैं, सभी दैत्योंके स्वामी हैं और अब वे त्रिलोकीके अधिपति हैं, सभीके अधिनायक हैं ॥ २२-२३ ॥ वे बलवान् दैत्यराज देवगणोंके लिये महाकालके समान हैं । आप योगीको उद्देश्य करके उन्होंने जो कहा है, उसे श्रवण कीजिये ॥ २४ ॥

हे वृषध्वज! महादिव्य प्रभाववाले तथा सभी रत्नोंके स्वामी उन प्रभु दैत्यपतिकी आज्ञाको आप सुनिये ॥ २५ ॥

श्मशानमें निवास करनेवाले, सदा अस्थियोंकी माला धारण करनेवाले तथा दिगम्बर रहनेवाले तुम्हारी भार्या वह शुभ हिमालयपुत्री [ पार्वती ] कैसे हो सकती है? ॥२६ ॥

वह स्त्रीरत्न है और मैं समस्त रत्नोंका अधिपति हूँ अतः वह मेरे ही योग्य है, भिक्षा माँगकर खानेवाले , तुम्हारे योग्य वह नहीं है । तीनों लोक मेरे वशमें हैं, मैं ही यज्ञभागोंको ग्रहण करता हूँ । इस त्रिलोकीमें जो भी रत्न हैं, वे सभी मेरे घरमें हैं । रत्नोंका उपभोग करनेवाले हम हैं, तुम तो दिगम्बर योगी हो, तुम अपना स्त्रीरत्न मुझे प्रदान करो; क्योंकि प्रजाएँ राजाको सुख देनेवाली होती हैं ॥ २७–२९ ॥

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९ ०० सनत्कुमार उवाच वदत्येवं तथा राहौ भ्रूमध्याच्छूलपाणिनः अभवत्पुरुषो रौद्रस्तीव्राशनिसमस्वनः सिंहास्यप्रचलज्जिह्वः सज्ज्वालनयनो महान् ऊर्ध्वकेशः शुष्कतनुर्नृसिंह इव चापरः ॥ महातनुर्महाबाहुस्तालजंघो भयंकरः अभिदुद्राव वेगेन राहुं स पुरुषो द्रुतम् ॥

स तं खादितुमायान्तं दृष्ट्वा राहुर्भयातुरः ।

अधावदतिवेगेन बहिः स च दधार तम् ॥

राहुरुवाच

देवदेव महेशान पाहि मां शरणागतम् ।

सुराऽसुरैस्सदा वन्द्यः परमैश्वर्यवान् प्रभुः ॥

ब्राह्मणं मां महादेव खादितुं समुपागतः ।

पुरुषोऽयं तवेशान सेवकोऽतिभयंकरः ॥

एतस्माद्रक्ष देवेश शरणागतवत्सलः ।

न खादेत यथायं मां नमस्तेऽस्तु मुहुर्मुहुः ॥

सनत्कुमार उवाच

महादेवो वचः श्रुत्वा ब्राह्मणस्य तदा मुने ।

अब्रवीत्स्वगणं तं वै दीनानाथप्रियः प्रभुः ॥

महादेव उवाच प्रभुं च ब्राह्मणं दूतं राह्वाख्यं शरणागतम् । शरण्या रक्षणीया हि श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ] १ ९ सनत्कुमार बोले- अभी राहु अपनी । ही रहा था कि शंकरके भ्रू - मध्यसे वज्रके बात कह ॥ ३० करता हुआ एक महाभयंकर पुरुष प्रकट समान हो शब्द सिंहके समान उसका मुख था, उसकी जीभ गया ॥ रही थी, नेत्रोंसे अग्नि निकल रही थी; ऊर्ध्वकेश लपलपा तथा ३१ सूखे शरीरवाला वह पुरुष दूसरे सिंहके समान जान पड़ता था ॥ ३०-३१ ॥ । विशाल शरीर तथा भुजाओंवाला, ताड़ ३२ वृक्षके समान जाँघवाला तथा भयंकर वह पुरुष [ प्रकट होते ही ] बड़े वेगसे शीघ्रताके साथ राहुपर झपट पड़ा ॥३२ ॥

तब खानेके लिये उसे आता हुआ देखकर ३३ भयभीत वह राहु बड़े वेगसे भागने लगा, किंतु सभाके बाहर ही उस पुरुषने उसे पकड़ लिया ॥ ३३ ॥

राहु बोला - हे देवदेव! हे महेशान! मुझ शरणागतकी रक्षा कीजिये । आप देवताओं तथा ३४ असुरोंसे सदा वन्दनीय, महान् ऐश्वर्य तथा प्रभुतासे सम्पन्न हैं ॥ ३४ ॥

हे महादेव! हे ईशान! आपका यह महाभयंकर ३५ सेवक पुरुष मुझ ब्राह्मणको खानेके लिये आया हुआ है ॥ ३५ ॥

हे देवेश! हे शरणागतवत्सल! इस पुरुषसे मेरी ३६ रक्षा कीजिये, जिससे यह मुझे खा न सके, आपको बार - बार नमस्कार है ॥ ३६ ॥

सनत्कुमार बोले – - हे मुने! तब ब्राह्मणकी बात सुनकर दीनों तथा अनाथोंसे प्रेम करनेवाले प्रभु ३७ महादेवने अपने उस गणसे कहा- ॥ ३७ ॥

महादेवजी बोले — हे गणसत्तम! शरणमें आये हुए राहु नामक ब्राह्मण दूतको छोड़ दो; क्योंकि ऐसे न दण्ड्या गणसत्तम ॥ ३८ लोग शरणके योग्य रक्षाके पात्र होते हैं, दण्ड , सनत्कुमार उवाच योग्य नहीं होते हैं ॥ ३८ ॥

इत्युक्तौ गिरिजेशेन सगणः करुणात्मना । सनत्कुमार बोले- करुणामय हृदयवाले राहु तत्याज सहसा ब्राह्मणेति श्रुताक्षरः | गिरिजापतिके ऐसा कहनेपर उस गणने ' ब्राह्मण ' यह ॥ 11 ३ ९ राहुं त्यक्त्वाम्बरे सोऽथ पुरुषो दीनया तब राहुको आकाशमें छोड़कर व शिवोपकंठमागत्य गिरा । । पुरुष महादेवजीके पास आकर दीनवाणीमें कहने महादेवं व्यजिज्ञपत् ॥ ४० लगा- ॥ ४० ॥

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