श्रीगणेशाय नमः।

शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 881–890

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 881–890

पृष्ठ 881

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अ ० १२ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड ) ८७१ कृतं दुष्कर्म चास्माभिर्हे हरे हे विधे सुराः । हे हरे! हे विधे! हे देवो! हमलोगोंने दुष्कर्म दैत्यानां शिवभक्तानां शिवभक्तिर्विनाशिता ॥ २३ किया है, जो कि शिवजीमें भक्ति रखनेवाले दानवोंकी

कोटिकल्पानि नरके नो वासस्तु भविष्यति ।

नोद्धारो भविता नूनं शिवभक्तविरोधिनाम् ॥

परन्तु भवदिच्छात इदं दुष्कर्म नः कृतम् ।

तच्छान्तिं कृपया ब्रूत वयं वः शरणागताः ॥

सनत्कुमार उवाच

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा विष्णुब्रह्मादयः सुराः ।

अब्रुवन्पुंडिनस्तांस्ते स्थितानग्रे कृतांजलीन् ॥

विष्ण्वादय ऊचुः

न भेतव्यं भवद्भिस्तु मुंडिनो वै कदाचन ।

शिवाज्ञयेदं सकलं जातं चरितमुत्तमम् ॥

युष्माकं भविता नैव कुगतिर्दुःखदायिनी ।

शिवदासा यतो यूयं देवर्षिहितकारकाः ॥

सुरर्षिहितकृच्छंभुः सुरर्षिहितकृत्प्रियः ।

सुरर्षिहितकृन्नृणां कदापि कुगतिर्न हि ॥

अद्यतो मतमेतं हि प्रविष्टानां नृणां कलौ ।

कुगतिर्भविता ब्रूमः सत्यं नैवात्र संशयः ॥

भवद्भिर्मुण्डिनो धीरा गुप्तभावान्ममाज्ञया तावन्मरुस्थली सेव्या कलिर्यावत्समाव्रजेत् ॥ आगते च कलौ यूयं स्वमतं स्थापयिष्यथ । शिवभक्तिको विनष्ट किया । [ इस पापके फलस्वरूप ] करोड़ों कल्पोंतक नरकमें हमलोगोंका वास होगा । २४ शिवभक्तोंका विरोध करनेवाले हमलोगोंका उद्धार निश्चितरूपसे नहीं होगा, किंतु हमलोगोंने आपलोगोंकी इच्छासे ही यह दुष्कर्म किया है । अतः कृपापूर्वक २५ आपलोग उसकी शान्तिका मार्ग बतायें, हम आपलोगोंके शरणागत हैं॥२३–२५ ॥ सनत्कुमार बोले – उनका वह वचन सुनकर विष्णु, ब्रह्मादि देवता अपने आगे हाथ जोड़कर खड़े २६ उन मुण्डियोंसे कहने लगे— ॥ २६ ॥

विष्णु आदि [ देवता ] बोले- हे मुण्डियो! तुमलोग किसी प्रकारका भय मत करो, यह सारा २७ उत्तम चरित्र शिवजीकी आज्ञासे हुआ है । तुमलोगोंको दुःख देनेवाली दुर्गति कदापि न होगी; क्योंकि तुमलोग शिवजीके दास हो और देवताओं एवं २८ ऋषियोंके हितकारी हो ॥ २७-२८ ॥ शंकरजी देवगणों एवं ऋषियोंके हितकर्ता हैं २ ९ और देवताओं तथा ऋषियोंका हित करनेवाले लोग उन्हें प्रिय हैं, अतः देवताओं तथा ऋषियोंका हित करनेवाले मनुष्योंकी कदापि दुर्गति नहीं होती । इसके विपरीत मतको स्वीकार करनेवाले मनुष्योंकी ३० कलियुगमें दुर्गति होगी, हम यह सत्य कहते हैं, इसमें । सन्देह नहीं है ॥ २ ९ -३० ॥ हे मुण्डियो! तुमलोग मेरी आज्ञासे धैर्य धारणकर । ३१ गुप्तरूपसे कलियुगके आनेतक मरुस्थलमें निवास करो । कलियुगके आनेपर तुमलोग अपना मत स्थापित करना; क्योंकि कलियुगमें लोग मोहमें पड़कर कलौ तु मोहिता वो मतम् ॥ ३२ तुमलोगोंका मत स्वीकार कर लेंगे ॥ ३१-३२ ॥ मूढाः संग्रहीष्यन्ति इत्याज्ञप्ताः सुरेशैश्च मुंडिनस्ते मुनीश्वर नमस्कृत्य ततः स भगवान् रुद्रो दग्ध्वा त्रिपुरवासिनः कृतकृत्यो महायोगी ब्रह्माद्यैरभिपूजितः हे मुनीश्वर! उन सुरेश्वरोंके द्वारा इस । आज्ञा प्राप्तकर वे मुण्डी उन्हें प्रणामकर ३३ प्रकारकी यथानिर्दिष्ट अपने आश्रमको चले गये । इसके अनन्तर [ हे व्यास! ] त्रिपुरवासियोंको भस्म करनेके बाद कृतकृत्य हुए वे महायोगी भगवान् रुद्र ब्रह्मा आदिके । ॥ ३४ द्वारा पूजित हुए ॥ ३३-३४ ॥

पृष्ठ 882

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८७२ स्वगणैर्निखिलैर्देव्या शिवया सहितः प्रभुः कृत्वामरमहत्कार्यं ससुतोऽन्तरधादथ

ततश्चान्तर्हिते देवे परिवारान्विते शिवे ।

धनुः शररथाद्यैश्च प्राकारोऽन्तर्द्धिमागमत् ॥

ततो ब्रह्मा हरिर्देवा मुनिगंधर्वकिन्नराः ।

नागाः सर्पाश्चाप्सरसः संहृष्टाश्चाथ मानुषाः ॥

स्वं स्वं स्थानं मुदा जग्मुः शंसन्तः शांकरं यशः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ०१३ । इस प्रकार देवताओंका महान् कार्य सम्पन्नकर ॥ ३५ । वे प्रभु अपने गणों, देवी पार्वती तथा पुत्रोंसहित । अन्तर्धान हो गये । तदनन्तर परिवारसहित महादेव ३६ | शंकरके अन्तर्धान हो जानेपर धनुष - बाण, रथ आदिसहित समस्त सामग्री विलुप्त हो गयी ॥ ३५-३६ ॥ इसके बाद ब्रह्मा, विष्णु, सभी देवता मुनि ,, ३७ गन्धर्व, किन्नर, नाग, सर्प, अप्सराएँ तथा मनुष्य प्रसन्न हो गये और प्रसन्नतापूर्वक शिवजीका यशोगान करते हुए अपने - अपने स्थानोंको चले गये स्वं स्वं स्थानमनुप्राप्य निर्वृतिं परमां ययुः ॥ ३८ एवं अपने - अपने स्थानोंपर पहुँचकर परम शान्तिको

एतत्ते कथितं सर्वं चरितं शशिमौलिनः ।

त्रिपुरक्षयसंसूचि परलीलान्वितं महत् ॥

धन्यं यशस्यमायुष्यं धनधान्यप्रवर्द्धकम् ।

स्वर्गदं मोक्षदं चापि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥

इदं हि परमाख्यानं यः पठेच्छृणुयात्सदा ।

इह भुक्त्वाखिलान्कामान् अन्ते मुक्तिमवाप्नुयात् ॥

प्राप्त हुए ॥ ३७-३८ ॥

[ हे वेदव्यास! ] इस प्रकार मैंने आपसे त्रिपुरके ३ ९ वधको सूचित करनेवाले, महालीलासे परिपूर्ण तथा उत्कृष्ट सम्पूर्ण शिव - चरित्रका वर्णन कर दिया, जो धन्य, यशको फैलानेवाला, आयुकी वृद्धि करनेवाला, धन - धान्यको बढ़ानेवाला, स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला है, अब आप और क्या सुनना चाहते ४० हैं ॥ ३ ९ -४० ॥ जो इस उत्तम वृत्तान्तको सदा पढ़ता है तथा सुनता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण सुखोंको भोगकर ४१ । अन्तमें मुक्ति प्राप्त करता है ॥४१ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे सनत्कुमारपाराशर्य्यसंवादे त्रिपुर-वधानंतरदेवस्तुतिमयस्तुतिमुंडिनिवेशनदेवस्वस्थानगमनवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें सनत्कुमारव्याससंवादके अन्तर्गत त्रिपुरवधके पश्चात् देवस्तुति - मयस्तुति - मुण्डिनिवेशन तथा देवताओंका स्वस्थानगमनवर्णन नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥

अथ त्रयोदशोऽध्यायः बृहस्पति तथा इन्द्रका शिवदर्शनके लिये कैलासकी ओर शिवका उनकी परीक्षा लेनेके लिये दिगम्बर जटाधारी प्रस्थान, सर्वज्ञ वज्रप्रहारकी चेष्टा रूप धारणकर मार्ग रोकना, क्रुद्ध इन्द्रद्वारा उनपर , शंकरद्वारा उनकी भुजाको स्तम्भित कर देना बृहस्पतिद्वारा उनकी स्तुति, शिवका प्रसन्न होना और अपनी नेत्राग्निको, व्यास उवाच भो ब्रह्मन्भगवन्पूर्वं श्रुतं मे ब्रह्मपुत्रक । जलंधरं महादैत्यमवधीच्छंकरः प्रभुः ॥ तत्त्वं वद महाप्राज्ञ चरितं शशिमौलिनः । विस्तारपूर्वकं शृण्वन्कस्तृप्येत्तद्यशोऽमलम् ॥ क्षार - समुद्रमें फेंकना व्यासजी बोले- हे ब्रह्मन्! हे भगवन्! हे ब्रह्मपुत्र! | मैंने सुना है कि पूर्वकालमें प्रभु शंकरजीने महादैत्य । जलन्धरका वध किया था । हे महाप्राज्ञ! आप शंकरजीके | उस चरित्रको विस्तारपूर्वक कहिये, उनके पावन २ चरित्रको सुनता हुआ कौन तृप्त हो सकता है ॥ १-२ ॥

पृष्ठ 883

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अ ० १३ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड ) ८७३ सूत उवाच

व्याससंपृष्टो ब्रह्मपुत्रो महामुनिः ।

। इत्येवं वाक्यं वाक्यविशारदः ॥

वाचार्थवदव्यग्रं सनत्कुमार उवाच

एकदा जीवशक्रौ च भक्त्या परमया मुने ।

दर्शनं कर्तुमीशस्य कैलासं जग्मतुर्भृशम् ॥

अथ गुर्विन्द्रयोर्ज्ञात्वाऽऽगमनं शंकरः प्रभुः ।

परीक्षितुं तयोर्ज्ञानं स्वदर्शनरतात्मनोः ॥

दिगम्बरोऽथ तन्मार्गमारुद्व्य सद्गतिः सताम् ।

जटाबद्धेन शिरसातिष्ठत्संशोभिताननः ॥

अथ तौ गुरुशक्रौ च कुर्वन्तौ गमनं मुदा ।

आलोक्य पुरुषं भीमं मार्गमध्येऽद्भुताकृतिम् ॥

महातेजस्विनं शांतं जटासंबद्धमस्तकम् ।

महाबाहुं महोरस्कं गौरं नयनभीषणम् ॥

अथो पुरंदरोऽपृच्छत्स्वाधिकारेण दुर्मदः ।

पुरुषं तं स्वमार्गान्तःस्थितमज्ञाय शंकरम् ॥

पुरन्दर उवाच

कस्त्वं भोः कुत आयातः किं नाम वद तत्त्वतः ।

स्वस्थाने संस्थितः शंभुः किं वान्यत्र गतः प्रभुः ॥

सनत्कुमार उवाच

शक्रेणेत्थं स पृष्टस्तु किंचिन्नोवाच तापसः ।

शक्रः पुनरपृच्छद्वै नोवाच स दिगंबरः ॥

पुनः पुरंदरोऽपृच्छल्लोकानामधिपेश्वरः ।

लीलारूपधरः प्रभुः ॥

तूष्णीमास महायोगी

इत्थं पुनः पुनः पृष्टः शक्रेण स दिगम्बरः ।

नोवाच किंचिद्भगवान् शक्रज्ञानपरीक्षया ॥

अथ चुक्रोध देवेशस्त्रैलोक्यैश्वर्यगर्वितः उवाच वचनं चैव तं निर्भर्त्स्य जटाधरम् ॥ इन्द्र उवाच रे मया पृच्छ्यमानोऽपि नोत्तरं दत्तवानसि अतस्त्वां हन्मि वज्रेण कस्ते त्रातास्ति दुर्मते सूतजी बोले- महामुनि व्यासजीके द्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर बोलनेमें प्रवीण महामुनि सनत्कुमारजी ३ शान्तिपूर्वक अर्थमय वचन कहने लगे— ॥ ३ ॥

सनत्कुमार बोले - हे मुने! एक बार बृहस्पति एवं इन्द्र परम भक्तिसे युक्त हो शंकरजीका दर्शन ४ करनेके लिये कैलासको गये थे ॥४ ॥

तब बृहस्पति तथा इन्द्रके आगमनको जानकर ५ अपने दर्शनके लिये तत्पर मनवाले उन दोनोंके ज्ञानकी परीक्षा लेनेके लिये सिरपर जटाजूट बाँधकर प्रसन्नमुख ६ तथा दिगम्बर होकर सज्जनोंको सद्गति देनेवाले प्रभु शंकर उनका मार्ग रोककर खड़े हो गये॥५-६ ॥ उसके बाद आनन्दपूर्वक जाते हुए इन्द्र एवं ७ बृहस्पतिने मार्गमें स्थित, भयंकर, अद्भुत आकारवाले, महातेजस्वी, सिरपर जटाजूट बाँधे हुए, शान्त, विशाल भुजाओंवाले, चौड़े वक्षःस्थलवाले, गौरवर्णवाले तथा ८ भयावह नेत्रवाले पुरुषको देखा॥७-८ ॥ तब अपने अधिकारसे मदमत्त इन्द्रने मार्गमें स्थित ९ उस शंकररूप पुरुषको न पहचानकर पूछा— ॥ ९ ॥

इन्द्र बोले- तुम कौन हो, कहाँसे आये हो और तुम्हारा नाम क्या है? प्रभु शिवजी अपने १० स्थानपर स्थित हैं अथवा कहीं अन्यत्र गये हुए हैं, ठीक - ठीक बताओ ॥ १० ॥

सनत्कुमार बोले — इन्द्रके द्वारा इस प्रकार पूछे गये उस तपस्वीने कुछ नहीं कहा । तब इन्द्रने पुनः ११ पूछा, किंतु वह दिगम्बर कुछ नहीं बोला ॥११ ॥

तब लोकाधीश्वर इन्द्रने पुनः पूछा, किंतु महायोगी प्रभु शंकरजी मौन ही रहे । १२ लीलारूपधारी प्रकार इन्द्रके द्वारा बार - बार पूछे गये वे दिगम्बर इस शिव इन्द्रके ज्ञानकी परीक्षा लेनेके लिये कुछ भगवान् १३ नहीं बोले ॥ १२-१३ ॥ इन्द्रको तत्पश्चात् तीनों लोकोंके ऐश्वर्यसे गर्वित । क्रोध उत्पन्न हुआ और उन जटाधारी दिगम्बरक १४ | महान् भर्त्सना करते हुए उन्होंने यह वचन कहा —॥१४ ॥

इन्द्र बोले – हे दुर्मते! मेरे द्वारा पूछे जानेपर भी तुमने उत्तर नहीं दिया । अतः मैं इस वज्रसे वध करता हूँ, देखता हूँ कि कौन तुम्हारी । तुम्हारा ॥ १५ । रक्षा करता है ॥१५ ॥

पृष्ठ 884

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८७४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १३ सनत्कुमार उवाच सनत्कुमार बोले- ऐसा कहकर उन इत्युदीर्य ततो वज्री संनिरीक्ष्य क्रुधा हि तम् । | क्रोधसे उस दिगम्बरकी ओर देखकर उसे मारनेके इन्द्रने हन्तुं दिगंबरं वज्रमुद्यतं स चकार ह ॥ १६ लिये [ हाथमें ] वज्र उठा लिया ॥ १६ ॥

पुरंदरं वज्रहस्तं दृष्ट्वा देवस्सदाशिवः चकार स्तंभनं तस्य वज्रपातस्य शंकरः ततो रुद्रः क्रुधाविष्टः करालाक्षो भयंकरः द्रुतमेव प्रजज्वाल तेजसा प्रदहन्निव बाहुप्रतिष्टंभभुवा मन्युनान्तः शचीपतिः समदह्यत भोगीव मंत्ररुद्धपराक्रमः

दृष्ट्वा बृहस्पतिस्तूर्णं प्रज्वलन्तं स्वतेजसा ।

पुरुषं तं धिया ज्ञात्वा प्रणनाम हरं प्रभुम् ॥

कृतांजलिपुटो भूत्वा ततो गुरुरुदारधीः ।

नत्वा च दंडवद्भूमौ प्रभुं स्तोतुं प्रचक्रमे ॥

गुरुरुवाच

नमो देवाधिदेवाय महादेवाय चात्मने ।

महेश्वराय प्रभवे त्र्यम्बकाय कपर्दिने ॥

दीनानाथाय विभवे नमोऽन्धकनिषूदिने ।

त्रिपुरघ्नाय शर्वाय ब्रह्मणे परमेष्ठिने ॥

विरूपाक्षाय रुद्राय बहुरूपाय शंभवे । विरूपायातिरूपाय । तब सदाशिव प्रभु शंकरने इन्द्रको हाथमें ॥ १७ । लिये हुए देखकर उस वज्रपातको स्तम्भित वज्र दिया ॥ १७ ॥ कर

। तत्पश्चात् अत्यन्त भयंकर तथा विकराल ॥ १८ नेत्रवाले रुद्र क्रुद्ध हो अपने तेजसे शीघ्र ही प्रज्वलित हो उठे, मानो जला डालेंगे ॥१८ ॥

। भुजाके स्तम्भित हो जानेसे इन्द्र मन - ही - मन ॥१ ९ इस प्रकार प्रज्वलित हो गये, जैसे मन्त्र एवं औषधिसे अपने पराक्रमको रुद्ध देखकर सर्प प्रज्वलित होता है ॥ १ ९ ॥ तब अपने तेजसे प्रज्वलित होते हुए उस २० पुरुषको देखकर और बुद्धिसे उन्हें प्रभु शंकर जानकर बृहस्पतिने प्रणाम किया । उसके बाद उदारबुद्धिवाले बृहस्पति हाथ जोड़कर पृथ्वीपर दण्डवत् प्रणाम २१ करके प्रभुकी स्तुति करने लगे- ॥ २०-२१ ॥ गुरु बोले- देवाधिदेव, महादेव, परमात्मस्वरूप, सर्वसमर्थ, तीन नेत्रवाले तथा जटाजूटधारी महेश्वर २२ आपको प्रणाम है । दीनोंके नाथ, सर्वव्यापक, अन्धका-सुरका वध करनेवाले, त्रिपुरका वध करनेवाले, शर्व, २३ परमेष्ठी तथा ब्रह्मस्वरूप आप [ शिव ] -को नमस्कार है ॥ २२-२३ ॥ विरूपाक्ष, रुद्र, बहुरूप, विरूप, अतिरूप तथा रूपातीताय ते नमः ॥२४ रूपसे अतीत आप शम्भुको नमस्कार यज्ञविध्वंसकर्त्रे च यज्ञानां फलदायिने । नमस्ते मखरूपाय परकर्मप्रवर्तिने ॥

कालांतकाय कालाय कालभोगिधराय च ।

नमस्ते परमेशाय सर्वत्र व्यापिने नमः ॥

नमो ब्रह्मशिरोहंत्रे ब्रह्मचंद्रस्तुताय च ।

ब्रह्मण्याय नमस्तेऽस्तु नमस्ते परमात्मने ॥

है ॥ २४ ॥

दक्षयज्ञका विध्वंस करनेवाले, यज्ञोंका २५ फल देनेवाले, यज्ञस्वरूप तथा श्रेष्ठ कर्ममें प्रवृत्त । करनेवाले आप [ शिव ] -को नमस्कार है । कालान्तक, | कालस्वरूप, कालरूप सर्पको धारण करनेवाले, परमेश्वर २६ तथा सर्वत्र व्यापक आप [ शिव ] -को नमस्कार है ॥ २५-२६ ॥ ब्रह्माके सिरको काटनेवाले, ब्रह्मा तथा । चन्द्रमासे स्तुत आपको नमस्कार है । ब्राह्मणोंका हित करनेवाले आपको नमस्कार है, आप परमात्माको २७ | नमस्कार है ॥२७ ॥

पृष्ठ 885

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अ ० १३ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड ) ८७५

त्वमग्निरनिलो व्योम त्वमेवापो वसुंधरा ।

त्वं सूर्यश्चन्द्रमा भानि ज्योतिश्चक्रं त्वमेव हि ॥ २८

त्वमेव विष्णुस्त्वं ब्रह्मा तत्स्तुतस्त्वं परेश्वरः । मुनयः सनकाद्यास्त्वं नारदस्त्वं तपोधनः । २ ९

त्वमेव सर्वलोकेशस्त्वमेव जगदात्मकः । ।

सर्वान्वयः सर्वभिन्नस्त्वमेव प्रकृतेः परः ॥ ३०

त्वं वै सृजसि लोकांश्च रजसा विधिनामभाक् ।

सत्त्वेन हरिरूपस्त्वं सकलं पासि वै जगत् ॥ ३१

त्वमेवासि महादेव तमसा हररूपधृक् ।

लीलया भुवनं सर्वं निखिलं पांचभौतिकम् ॥ ३२

त्वद्ध्यानबलतः सूर्यस्तपते विश्वभावन ।

अमृतं च्यवते लोके शशी वाति समीरणः ॥ ३३

त्वद्ध्यानबलतो मेघाश्चांबु वर्षन्ति शंकर ।

त्वद्ध्यानबलतः शक्रस्त्रिलोकीं पाति पुत्रवत् ॥ ३४

त्वद्ध्यानबलतो मेघाः सर्वे देवा मुनीश्वराः ।

स्वाधिकारं च कुर्वन्ति चकिता भवतो भयात् ॥ ३५

त्वत्पादकमलस्यैव सेवनाद्भुवि मानवाः ।

नाद्रियन्ते सुरान् रुद्र लोकैश्वर्यं च भुंजते ॥ ३६

त्वत्पादकमलस्यैव सेवनादगमन्पराम् ।

गतिं योगधनानामप्यगम्यां सर्वदुर्लभाम् ॥ ३७

सनत्कुमार उवाच बृहस्पतिरिति स्तुत्वा शंकरं लोकशंकरम् । आप ही अग्नि, वायु तथा आकाश हैं । आप ही जल तथा पृथ्वी हैं । आप ही सूर्य, चन्द्रमा तथा नक्षत्र हैं । आप ही समस्त तारागण हैं । आप ही विष्णु हैं तथा आप ही उनसे स्तुत परमेश्वर हैं । आप ही सनकादि मुनि हैं, आप ही ब्रह्मा हैं तथा आप ही तपोधन नारद हैं । आप ही सारे जगत्के ईश्वर हैं तथा आप ही जगत्स्वरूप हैं । आप ही सबसे अन्वित, सबसे भिन्न एवं प्रकृतिसे परे हैं ॥ २८-३० ॥ आप ही ब्रह्मा नाम धारणकर रजोगुणसे युक्त होकर सभी लोकोंकी सृष्टि करते हैं । आप ही विष्णुरूप होकर सत्त्वगुणयुक्त हो सम्पूर्ण जगत्का पालन करते हैं ॥ ३१ ॥

हे महादेव! आप ही हरका रूप धारण करके तमोगुणसे युक्त होकर सम्पूर्ण पांचभौतिक जगत्का लीलापूर्वक संहार करते हैं ॥३२ ॥

हे विश्वभावन! आपके ही ध्यानबलसे सूर्य तपता है, चन्द्रमा लोकमें अमृत बरसाता है और पवन बहता है ॥३३ ॥

हे शंकर! आपके ही ध्यानबलसे मेघ जलकी वृष्टि करते हैं और आपके ही बलसे इन्द्र पुत्रके समान त्रिलोकीकी रक्षा करते हैं । मेघ, सभी देवता एवं मुनीश्वर आपके ध्यानबलसे तथा आपके भयसे चकित होकर अपने - अपने कर्तव्यका पालन करते हैं ॥ ३४-३५ ॥ हे रुद्र! आपके चरणकमलके सेवनके प्रभावसे ही मनुष्य इस पृथ्वीपर अन्य देवताओंकी उपासना नहीं करते हैं और इस त्रिलोकके ऐश्वर्यका भोग करते हैं । इतना ही नहीं, वे आपके चरणकमलोंकी सेवासे ही योगियोंके लिये भी अगम्य तथा दुर्लभ गति प्राप्त करते हैं ॥ ३६-३७ ॥ सनत्कुमार बोले- [ हे व्यासजी! ] इस प्रकार बृहस्पतिने लोककल्याणकारी शिवजीकी स्तुति करके चरणोंपर इन्द्रको गिराया ॥ ३८ ॥

पादयोः पातयामास तस्येशस्य पुरंदरम् ॥ ३८ उन ईश्वरके सिर नीचा किये हुए इन्द्रको शिवजीके पातयित्वा च देवेशमिन्द्रं नतशिरोधरम् । चरणोंमें गिराकर विनयावनत बृहस्पतिने शिवजीसे बृहस्पतिरुवाचेदं प्रश्रयावनतश्शिवम् ॥ ३ ९ यह कहा - ॥३ ९ ॥ बृहस्पति बोले – हे दीनानाथ! हे महादेव! बृहस्पतिरुवाच आपके चरणोंपर गिरे हुए इन्द्रका उद्धार कीजिये और

दीनानाथ महादेव प्रणतं तव पादयोः । नेत्रज क्रोधको शान्त कीजिये ॥ ४० ॥

समुद्धर च शांतं स्वं क्रोधं नयनजं कुरु ॥ ४० अपने

पृष्ठ 886

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८७६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०

तुष्टो भव महादेव पाहीन्द्रं शरणागतम् ।

अग्निरेष शमं यातु भालनेत्रसमुद्भवः ॥ ४१

सनत्कुमार उवाच

इत्याकर्ण्य गुरोर्वाक्यं देवदेवो महेश्वरः ।

उवाच करुणासिन्धुर्मेघनिर्ह्रादया गिरा ॥ ४२

महेश्वर उवाच

क्रोधं च निस्सृतं नेत्राद्धारयामि बृहस्पते ।

कथं हि कञ्चुकीं सर्पः संधत्ते नोज्झितां पुनः ॥ ४३

सनत्कुमार उवाच

इति श्रुत्वा वचस्तस्य शंकरस्य बृहस्पतिः ।

उवाच क्लिष्टरूपश्च भयव्याकुलमानसः ॥ ४४

बृहस्पतिरुवाच

हे देव भगवन्भक्ता अनुकंप्याः सदैव हि ।

भक्तवत्सलनामेति त्वं सत्यं कुरु शंकर ॥ ४५

क्षेप्तुमन्यत्र देवेश स्वतेजोऽत्युग्रमर्हसि ।

उद्धर्तः सर्वभक्तानां समुद्धर पुरंदरम् ॥४६

सनत्कुमार उवाच

इत्युक्तो गुरुणा रुद्रो भक्तवत्सलनामभाक् ।

प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा सुरेज्यं प्रणतार्त्तिहा ॥ ४७

शिव उवाच

प्रीतः स्तुत्यानया तात ददामि वरमुत्तमम् ।

इन्द्रस्य जीवदानेन जीवेति त्वं प्रथां व्रज ॥ ४८

|

समुद्भूतोऽनलो योऽयं भालनेत्रात्सुरेशहा ।

एनं त्यक्ष्याम्यहं दूरे यथेन्द्रं नैव पीडयेत् ॥ ४ ९

सनत्कुमार उवाच इत्युक्त्वा तं करे धृत्वा स्वतेजोऽनलमद्भुतम् । | भालनेत्रात्समुद्भूतं प्राक्षिपल्लवणांभसि ॥ ५० ततश्चान्तर्दधे रुद्रो महालीलाकरः प्रभुः । ॥ गुरुशक्रौ भयान्मुक्तौ जग्मतुः सुखमुत्तमम् ॥ ५१ १३ हे महादेव! आप प्रसन्न हो जाइये और आये हुए इन्द्रकी रक्षा कीजिये, आपके ललाटस्थित शरणमें नेत्रसे उत्पन्न हुई यह अग्नि शान्त हो ॥४१ ॥

सनत्कुमार बोले- -गुरु बृहस्पतिकी यह बात | सुनकर करुणासिन्धु देवदेव महेश्वरने मेघके समान गम्भीर वाणीसे कहा —॥४२ ॥

महेश्वर बोले — हे बृहस्पते! मैं अपने नेत्रसे उत्पन्न हुए क्रोधको किस प्रकार धारण करूँ, सर्प अपनी छोड़ी गयी केंचुलको पुनः धारण नहीं करता है ॥ ४३ ॥

सनत्कुमार बोले- शिवका यह वचन सुनकर क्लेशयुक्त तथा भयसे व्याकुल चित्तवाले बृहस्पतिने कहा- ॥ ४४ ॥

बृहस्पति बोले — हे देव! हे भगवन्! आपको भक्तोंपर सर्वदा दया करनी चाहिये । हे शंकर! आप अपने भक्तवत्सल नामको सत्य कीजिये । हे देवेश! आप अपने इस अत्यन्त उग्र तेजको अन्यत्र छोड़ दीजिये । हे समस्त भक्तोंका उद्धार करनेवाले! आप इन्द्रका उद्धार कीजिये ॥ ४५-४६ ॥ सनत्कुमार बोले — बृहस्पतिके ऐसा कहनेपर भक्त - वत्सल नामवाले तथा भक्तोंका दुःख दूर करनेवाले रुद्र प्रसन्नचित्त होकर देवपूज्य बृहस्पतिसे कहने लगे- ॥ ४७ ॥

शिवजी बोले — हे तात! मैं [ तुम्हारी ] इस स्तुतिसे प्रसन्न होकर उत्तम वर देता हूँ । इन्द्रको जीवनदान देनेके कारण तुम ' जीव ' - इस नामसे विख्यात होओ । मेरे भालस्थित नेत्रसे इन्द्रको मारनेवाली जो यह अग्नि उत्पन्न हुई है, इसे मैं दूर फेंक देता हूँ, जिससे यह इन्द्रको पीड़ा न पहुँचाये ॥ ४८-४९ ॥ सनत्कुमार बोले- ऐसा कहकर शंकरजीने अपने तृतीय नेत्रसे उत्पन्न अपने तेजरूप अद्भुत अग्निको हाथमें लेकर क्षारसमुद्रमें फेंक दिया । तत्पश्चात् महालीला करनेवाले शंकर अन्तर्धान हो गये । इन्द्र एवं बृहस्पति भगवान् भयसे मुक्त हो परम सुखी हुए ॥ ५०-५१ ॥

पृष्ठ 887

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अ ० १४ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड ) ८७७ यदर्थं गमनोद्युक्तौ दर्शनं प्राप्य तस्य वै । इस प्रकार जिनके दर्शनके लिये इन्द्र एवं बृहस्पति जा रहे थे, उनका दर्शन पाकर वे कृतार्थ हो कृतार्थौ गुरुशक्रौ हि स्वस्थानं जग्मतुर्मुदा ॥ ५२ गये और प्रसन्नतापूर्वक अपने स्थानको लौट गये ॥ ५२ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे जलंधरवधोपाख्याने शक्रजीवनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें जलन्धरवधोपाख्यानके अन्तर्गत शक्रजीवनवर्णन नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥

अथ चतुर्दशोऽध्यायः क्षारसमुद्रमें प्रक्षिप्त भगवान् शंकरकी नेत्राग्निसे समुद्रके पुत्रके रूपमें जलन्धरका प्राकट्य, कालनेमिकी पुत्री वृन्दाके साथ उसका विवाह व्यास उवाच

सनत्कुमार सर्वज्ञ ब्रह्मपुत्र नमोऽस्तु ते ।

श्रुतेयमद्भुता मेऽद्य कथा शंभोर्महात्मनः ॥

क्षिप्ते स्वतेजसि ब्रह्मन्भालनेत्रसमुद्भवे ।

लवणांभसि किं ताताभवत्तत्र वदाशु तत् ॥

सनत्कुमार उवाच

शृणु तात महाप्राज्ञ शिवलीलां महाद्भुताम् ।

यच्छ्रुत्वा श्रद्धया भक्तो योगिनां गतिमाप्नुयात् ॥

अथो शिवस्य तत्तेजो भालनेत्रसमुद्भवम् ।

क्षिप्तं च लवणाम्भोधौ सद्यो बालत्वमाप ह ॥

तत्र वै सिंधुगंगायाः सागरस्य च संगमे ।

रुरोदोच्चैः स वै बालः सर्वलोकभयंकरः ॥

रुदतस्तस्य शब्देन प्राकंपद्धरणी मुहुः 1 स्वर्गश्च सत्यलोकश्च तत्स्वनाद् बधिरीकृतः ॥

बालस्य रोदनेनैव सर्वे लोकाश्च तत्रसुः ।

सर्वतो लोकपालाश्च विह्वलीकृतमानसाः ॥

किं बहूक्तेन विप्रेन्द्र चचाल सचराचरम् ।

भुवनं निखिलं तात रोदनात्तच्छिशोर्विभो ॥

अथ ते व्याकुलाः सर्वे देवाः समुनयो द्रुतम् ।

पितामहं लोकगुरुं ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥

तत्र गत्वा च ते देवा मुनयश्च सवासवाः ।

प्रणम्य च प्रोचुस्तं परमेष्ठिनम् ॥

सुसंस्तुत्य व्यासजी बोले — हे सनत्कुमार! हे सर्वज्ञ! हे ब्रह्मपुत्र! आपको नमस्कार है, मैंने आज १ महात्मा शंकरकी यह अद्भुत कथा सुनी । हे ब्रह्मन्! शिवजीके द्वारा भालनेत्रसे उत्पन्न हुए अपने तेजको क्षारसमुद्रमें फेंक दिये जानेपर क्या हुआ? हे तात! २ उसे शीघ्र कहिये ॥ १-२ ॥ सनत्कुमार ' बोले- हे तात! हे महाप्राज्ञ! अब आप शिवकी परम अद्भुत लीलाको सुनिये, जिसे श्रद्धासे ३ सुनकर भक्त योगियोंकी गति प्राप्त करते हैं । शिवजीके तीसरे नेत्रसे उत्पन्न वह तेज, जो खारे समुद्रमें फेंक ४ दिया गया था, शीघ्र ही बालकरूप हो गया॥३-४ ॥ सभी लोकोंको भय देनेवाला वह बालक वहाँ गंगा - सागरके संगमपर स्थित हो बड़े ऊँचे स्वरमें रोने ५ लगा ॥५ ॥

उस रोते हुए बालकके शब्दसे पृथ्वी बारंबार ६ कम्पित हो उठी और स्वर्ग तथा सत्यलोक उसके स्वरसे बहरे हो गये । उस बालकके रुदनसे सभी लोक भयभीत हो उठे और समस्त लोकपाल ७ व्याकुलचित्त हो गये॥६-७ ॥ हे विप्रेन्द्र! हे तात! हे विभो! अधिक कहनेसे ८ क्या प्रयोजन, उस शिशुके रुदनसे चराचरसहित सम्पूर्ण जगत् चलायमान हो उठा ॥८ ॥

उसके बाद मुनियोंके सहित व्याकुल समस्त देवता पितामह ब्रह्माकी शरण में गये । वहाँ जाकर ९ लोकगुरु सभी देवताओं तथा मुनियोंने ब्रह्माको प्रणामकर इन्द्रसहित उनसे कहा- ॥ ९ -१० ॥ १० | तथा उनकी स्तुतिकर

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८७८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १४ देवा ऊचुः देवता बोले- हे लोकाधीश! हे लोकाधीश सुराधीश भयं नः समुपस्थितम् । । हमलोगोंके समक्ष भय उपस्थित हो गया सुराधीश है! तन्नाशय महायोगिन् जातोऽयं ह्यद्भुतो रवः सनत्कुमार उवाच इत्याकर्ण्य वचस्तेषां ब्रह्मा लोकपितामहः गंतुमैच्छत्ततस्तत्र किमेतदिति विस्मितः ततो ब्रह्मा सुरैस्तातावतरत्सत्यलोकतः रसां तज्ज्ञातुमिच्छन्स समुद्रमगमत्तदा ॥

यावत्तत्रागतो ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ।

तावत्समुद्रस्योत्संगे तं बालं स ददर्श ह ॥

आगतं विधिमालोक्य देवरूप्यथ सागरः ।

प्रणम्य शिरसा बालं तस्योत्संगे न्यवेशयत् ॥

ततो ब्रह्माब्रवीद्वाक्यं सागरं विस्मयान्वितः ।

जलराशे द्रुतं ब्रूहि कस्यायं शिशुरद्भुतः ॥

सनत्कुमार उवाच

ब्रह्मणो वाक्यमाकर्ण्य मुदितः सागरस्तदा ।

प्रत्युवाच प्रजेशं स नत्वा स्तुत्वा कृतांजलिः ॥

समुद्र उवाच

भो भो ब्रह्मन्मया प्राप्तो बालकोऽयमजानता ।

प्रभवं सिंधुगंगायामकस्मात्सर्वलोकप ॥

जातकर्मादिसंस्कारान्कुरुष्वास्य जगद्गुरो ।

जातकोत्तफलं सर्वं विधातर्वक्तुमर्हसि ॥

सनत्कुमार उवाच

एवं वदति पाथोधौ स बालः सागरात्मजः ।

ब्रह्माणमग्रहीत्कण्ठे विधुन्वन्तं मुहुर्मुहुः ॥ ॥

विधूननं च तस्यैवं सर्वलोककृतो विधेः । पीडितस्य च कालेय नेत्राभ्यामगमज्जलम् ॥

कराभ्यामब्धिजातस्य तत्सुतस्य महौजसः ।

कथंचिन्मुक्तकण्ठस्तु ब्रह्मा प्रोवाच सादरम् ॥

। हे ॥ ११ महायोगिन्! उसका विनाश कीजिये, यह अद्भुत ध्या उत्पन्न हुई है ॥११ ॥

सनत्कुमार बाल — तब उनका यह वचन । लोकपितामह ब्रह्माजी आश्चर्यचकित हो उठे कि'यह सुनकर ॥ १२ क्या है ' और वहाँ जानेकी इच्छा करने लगे ॥ १२ ॥

। हे तात! तब ब्रह्माजी देवताओंके साथ सत्यलोकसे १३ पृथ्वीपर उतरे और उसका पता लगाते हुए समुद्र के किनारे गये । सभी लोकोंके पितामह ब्रह्मा ज्यों ही वहाँ आये, त्यों ही उन्होंने समुद्रकी गोदमें उस १४ बालकको देखा । ब्रह्माको आया हुआ देखकर देवरूप धारणकर सागरने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम करके १५ उस बालकको उनकी गोदमें डाल दिया । तदनन्तर विस्मयमें पड़े हुए ब्रह्माजीने समुद्रसे यह वचन कहा — हे जलराशे! शीघ्र बताओ कि यह अद्भुत १६ बालक किसका पुत्र है? ॥१३–१६ ॥ सनत्कुमार बोले — तब ब्रह्माजीका वचन सुनकर समुद्र बड़ा प्रसन्न हुआ और वह हाथ जोड़कर नमस्कारकर १७ स्तुति करनेके उपरान्त ब्रह्माजीसे कहने लगा— ॥ १७ ॥

समुद्र बोला — हे ब्रह्मन्! हे सर्वलोकस्वामिन्! मुझे गंगासागरके संगमपर यह बालक अकस्मात् १८ प्राप्त हुआ है और मैं नहीं जानता कि यह किसका बालक है ॥ १८ ॥

हे जगद्गुरो! आप इसका जातकर्मादि संस्कार १ ९ कीजिये और हे विधाता! इसके जातकसम्बन्धी समस्त फलोंको बताइये ॥ १ ९ । सनत्कुमार बोले- जब समुद्र ब्रह्माजीसे | इस बातको कह रहा था, तभी उस बालकने ब्रह्माका २० कण्ठ पकड़ लिया, यद्यपि वे अपना गला बारंबार । उससे छुड़ा रहे थे । हे व्यासजी! ब्रह्माजी गला छुड़ानेका बहुत प्रयत्न कर रहे थे, किंतु उस बालकने २१ इतने जोरसे उनका कण्ठ दबाया कि पीड़ित ब्रह्मा नेत्रोंसे जल टपकने लगा ॥ २०-२१ ॥ तब ब्रह्माजीने किसी प्रकार उस महातेजस्वी वे | समुद्रपुत्रके दोनों हाथोंसे अपना गला छुड़ाया और २२ आदरपूर्वक समुद्रसे कहने लगे- ॥ २२ ॥

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अ ० १४ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड ) ८७ ९ ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले — हे सागर! सुनो, मैं तुम्हारे शृणु सागर वक्ष्यामि तवास्य तनयस्य हि इस पुत्रका समस्त जातकोक्त फल विचारकर कहता जातकोत्तफलं सर्वं समाधानरतः खलु ॥ २३ ।

नेत्राभ्यां विधृतं यस्मादनेनैव जलं मम ।

तस्माज्जलंधरेतीह ख्यातो नाम्ना भवत्वसौ ॥ २४ ।

अधुनैवैष तरुणः सर्वशास्त्रार्थपारगः ।

महापराक्रमो धीरो योद्धा च रणदुर्मदः ॥ २५

भविष्यति च गंभीरः त्वं यथा समरे गुहः ।

सर्वजेता च संग्रामे सर्वसंपद्विराजितः ॥ २६

दैत्यानामधिपो बालः सर्वेषां च भविष्यति ।

विष्णोरपि भवेज्जेता न कुतश्चित्पराभवः ॥ २७

अवध्यः सर्वभूतानां विना रुद्रं भविष्यति ।

यत एष समुद्भूतस्तत्रेदानीं गमिष्यति ॥ २८

पतिव्रतास्य भविता पत्नी सौभाग्यवर्द्धिनी ।

सर्वाङ्गसुन्दरी रम्या प्रियवाक्छीलसागरा ॥ २ ९

सनत्कुमार उवाच

इत्युक्त्वा शुक्रमाहूय राज्ये तं चाभ्यषेचयत् ।

आमन्त्र्य सरितां नाथं ब्रह्मान्तर्द्धानमन्वगात् ॥ ३०

अथ तद्दर्शनोत्फुल्लनयनः सागरस्तदा ।

तमात्मजं समादाय स्वगेहमगमन्मुदा ॥ ३१

अपोषयन्महोपायैः स्वबालं मुदितात्मकः ।

सर्वांगसुन्दरं रम्यं महाद्भुतसुतेजसम् ॥ ३२

अथाम्बुधिः समाहूय कालनेमिं महासुरम् ।

वृन्दाभिधां सुतां तस्य तद्भार्यार्थमयाचत ॥ ३३

• कालनेम्यसुरो वीरोऽसुराणां प्रवरः सुधीः ।

साधु मेनेम्बुधेर्याच्यां स्वकर्मनिपुणो मुने ॥ ३४

जलंधराय वीराय सागरप्रभवाय च ।

ददौ ब्रह्मविधानेन स्वसुतां प्राणवल्लभाम् ॥ ३५

तदोत्सवो महानासीद्विवाहे च तयोस्तदा ।

सुखं प्रापुर्नदा मुने ॥ ३६

नद्योऽसुराचैवाखिला

समुद्रोऽति सुखं प्राप सुतं दृष्ट्वा हि सस्त्रियम् ।

हू ॥ २३ ॥

इसने मेरे नेत्रोंसे निकले हुए जलको धारण किया है, इसलिये यह जलन्धर - इस नामसे प्रसिद्ध होगा ॥ २४ ॥

यह इसी समय तरुण, सर्वशास्त्रार्थवेत्ता, महापराक्रमी, धैर्यवान् तथा रणदुर्मद योद्धा है । तुम्हारे तथा कार्तिकेयके समान यह युद्धमें गम्भीर होगा, यह संग्राममें सबको जीत लेगा तथा समस्त ऐश्वर्यसे परिपूर्ण होगा ॥ २५-२६ ॥ यह बालक समस्त दैत्योंका अधिपति होगा तथा विष्णुको भी जीतनेवाला होगा, इसका पराभव कभी नहीं होगा । रुद्रको छोड़कर यह सभी प्राणियोंसे अवध्य होगा । जहाँसे इसकी उत्पत्ति हुई है, अन्तमें यह वहीं जायगा । इसकी पत्नी महापतिव्रता, सौभाग्यको बढ़ानेवाली, सर्वांगसुन्दरी, मनोहर, प्रिय वचन बोलनेवाली तथा शीलका सागर होगी॥२७–२९ ॥ सनत्कुमार बोले- ऐसा कहकर [ दैत्यगुरु ] शुक्रको बुलाकर ब्रह्माजीने उस बालकको राज्यपर अभिषिक्त करवाया और समुद्रसे आज्ञा लेकर वे अन्तर्धान हो गये । तदनन्तर उसके दर्शनसे प्रफुल्लित नेत्रवाला समुद्र उस पुत्रको लेकर प्रसन्नतासे अपने घर चला गया और प्रसन्नचित्त होकर अनेक उपायोंद्वारा सर्वांगसुन्दर, मनोहर, अत्यन्त अद्भुत एवं परम तेजस्वी अपने पुत्रका पालन - पोषण करने लगा॥३०–३२ ॥ उसके बाद सागरने महान् असुर कालनेमिको बुलाकर उसकी वृन्दा नामक पुत्रीको उसकी भायके निमित्त माँगा । हे मुने! वीर असुरोंमें श्रेष्ठ, बुद्धिमान् तथा अपने कार्य - साधनमें कुशल असुर कालनेमिने | समुद्रकी याचना स्वीकार कर ली और ब्राह्मविवाहकी विधिसे समुद्रपुत्र वीर जलन्धरको अपनी प्राणप्रिय

पुत्री प्रदान कर दी । ३३ - ३५ ॥

उस समय उन दोनोंके विवाहमें महान् उत्सव । हे मुने! समस्त नदों, नदियों एवं असुरोंको सुख हुआ पुत्रको देखकर समुद्रको भी प्राप्त हुआ । स्त्रीसहित तथा अत्यधिक सुखकी प्राप्ति हुई और उसने ब्राह्मणों

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८८० दानं ददौ द्विजातिभ्योऽप्यन्येभ्यश्च यथाविधि ये देवैर्निर्जिताः पूर्वं दैत्याः पातालसंस्थिताः तेहि भूमंडलं याता निर्भयाः तमुपाश्रिताः ते कालनेमिप्रमुखास्ततोऽसुराः तस्मै सुतां सिंधुसुताय दत्त्वा । बभूवुरत्यन्तमुदान्विता हि तमाश्रिता देवविनिर्जयाय ॥ स चापि वीरोऽम्बुधिबालकोऽसौ जलंधराख्योऽसुरवीरवीरः 1 संप्राप्य भार्यामतिसुन्दरीं वशी चकार राज्यं हि कविप्रभावात् ॥ श्रीशिवमहापुराण [ अ ] ० १५ ॥ ३७ अन्य लोगोंको यथाविधि दान दिया । तब पातालमें । । रहनेवाले दैत्य, जो देवताओंके द्वारा पहले जीत ॥ ३८ । गये थे, वे पृथ्वीपर चले गये और निडर होकर लिये उसके आश्रयमें रहने लगे ॥ ३६–३८ ॥ [ उस समय ] कालनेमि आदि वे असुर उस समुद्रपुत्रको कन्या देकर परम प्रसन्न और देवताओंको जीतनेके लिये उसके आश्रित हुए ३ ९ हो गये ॥३ ९ ॥ असुरवीरोंमें मुख्य वीर वह समुद्रपुत्र जितेन्द्रिय जलन्धर अति सुन्दरी भार्याको प्राप्तकर शुक्राचार्यके ४० । प्रभावसे राज्य करने लगा ॥ ४० ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे जलंधरवधोपाख्याने जलंधरोत्पत्तिविवाहवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें जलन्धरवधोपाख्यानके अन्तर्गत जलन्धरोत्पत्तिविवाहवर्णन नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४ ॥

अथ पञ्चदशोऽध्यायः राहुके शिरश्छेद तथा समुद्रमन्थनके समयके देवताओंके छलको जानकर जलन्धरद्वारा क्रुद्ध होकर स्वर्गपर आक्रमण, इन्द्रादि देवोंकी पराजय, अमरावतीपर जलन्धरका आधिपत्य, भयभीत देवताओंका सुमेरुकी गुफामें छिपना सनत्कुमार उवाच

एकदा वारिधिसुतो वृन्दापतिरुदारधीः ।

सभार्यः संस्थितो वीरोऽसुरैः सर्वैः समन्वितः ॥

तत्राजगाम सुप्रीतः सुवर्चास्त्वथ भार्गवः ।

तेज: पुंजो मूर्त इव भासयन्सकला दिशः ॥

तं दृष्ट्वा गुरुमायान्तमसुरास्तेऽखिला द्रुतम् ।

प्रणेमुः प्रीतमनसः सिंधुपुत्रोऽपि सादरम् ॥

दत्त्वाशीर्वचनं तेभ्यो भार्गवस्तेजसां निधिः ।

निषसादासने रम्ये संतस्थुस्तेऽपि पूर्ववत् ॥

अथ सिंध्वात्मजो वीरो दृष्ट्वा प्रीत्या निजां सभाम् । जलंधरः प्रसन्नोऽभूदनष्टवरशासनः ॥

तत्स्थितं छिन्नशिरसं दृष्ट्वा राहुं स दैत्यराट् ।

पप्रच्छ भार्गवं शीघ्रमिदं सागरनन्दनः ॥

सनत्कुमार बोले — एक बार वृन्दाका पति वह वीर तथा उदार बुद्धिवाला समुद्रपुत्र जलन्धर अपनी १ पत्नी वृन्दा एवं समस्त असुरोंके साथ बैठा था ॥१ ॥

उसी समय अत्यन्त प्रसन्न, महातेजस्वी, २ | मूर्तस्वरूप तेजपुंजके समान भासित होते हुए शुक्राचार्य दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए वहाँ आये । उन गुरुको आते हुए देखकर प्रसन्न मनवाले उन सभी ३ | असुरों तथा जलन्धरने भी शीघ्र आदरपूर्वक उन्हें प्रणाम किया ॥ २-३ ॥ तब तेजोनिधि भार्गव उन्हें आशीर्वाद देकर ४ रम्य आसनपर बैठ गये और वे [ असुरगण ] भी । पूर्ववत् बैठ गये । उसके बाद स्थिर तथा उत्तम | शासनवाला वह वीर सिन्धुपुत्र जलन्धर प्रेमसे अपनी ५ । सभाको देखकर प्रसन्न हुआ । वहाँ बैठे हुए सिरकटे | राहुको देखकर उस दैत्यराज समुद्रपुत्रने शीघ्रतापूर्वक ६ । शुक्राचार्यसे यह पूछा -॥४–६ ॥