शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 931–940

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 931–940

पृष्ठ 931

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अ ० २४ ] रुद्रसंहिता (

रथोपरिगतां बद्धां रुदन्तीं पार्वतीं शिवः ।

निशुंभशुंभदैत्यैश्च वध्यमानां ददर्श सः ॥ ७

गौरीं तथाविधां दृष्ट्वा लौकिकीं दर्शयन् गतिम् ।

बभूव प्राकृत इव शिवोऽप्युद्विग्नमानसः ॥ ८

अवाङ्मुखस्थितस्तूष्णीं नानालीलाविशारदः ।

शिथिलांगो विषण्णात्मा विस्मृत्य स्वपराक्रमम् ॥ ९

ततो जलंधरो वेगात् त्रिभिर्विव्याध सायकैः ।

आपुंखमग्नैस्तं रुद्रं शिरस्युरसि चोदरे ॥ १०

ततो रुद्रो महालीलो ज्ञाततत्त्वः क्षणात्प्रभुः ।

रौद्ररूपधरो जातो ज्वालामालातिभीषणः ॥ ११

तस्यातीव महारौद्ररूपं दृष्ट्वा महासुराः ।

न शेकुः प्रमुखे स्थातुं भेजिरे ते दिशो दश ॥ १२

निशुंभशुंभावपि यौ विख्यातौ वीरसत्तमौ ।

अपि तौ शेकतुनैव रणे स्थातुं मुनीश्वर ॥ १३

जलंधरकृता मायान्तर्हिताभूच्च तत्क्षणम् ।

हाहाकरो महानासीत्संग्रामे सर्वतोमुखे ॥ १४

ततः शापं ददौ रुद्रस्तयोः शुंभनिशुंभयोः ।

पलायमानौ तौ दृष्ट्वा धिक्कृत्य क्रोधसंयुतः ॥ १५

रुद्र उवाच

युवां दुष्टावतिखलावपराधकरौ मम ।

पार्वतीदंडदातारौ रणादस्मात्पराङ्मुखौ ॥ १६

पराङ्मुखो न हन्तव्य इति वध्यौ न मे युवाम् ।

मम युद्धादतिक्रांती गोर्खा वध्यौ भविष्यतः ॥ १७

एवं वदति गौरीशे सिन्धुपुत्रो जलंधरः ।

चुक्रोधातीव रुद्राय ज्वलज्ज्वलनसन्निभः ॥ १८

रुद्रे रणे महावेगाद्ववर्ष निशितान् शरान् ।

बाणांधकारसंछन्नं तथा भूमितल ह्यभूत् ॥ १ ९

। यावद् रुद्रः प्रचिच्छेद तस्य बाणगणान् द्रुतम् ।

। तावत्स परिघेणाशु वृषभं बली ॥ २०

जघान युद्धखण्ड ) ९ २१ शिवजीने रथपर स्थित, बँधी हुई, विलाप करती हुई एवं शुम्भ तथा निशुम्भके द्वारा मारी जाती हुई पार्वतीको देखा । तब उस स्थितिवाली पार्वतीको देखकर लौकिक गति प्रदर्शित करते हुए शिवजी सामान्यजनोंकी तरह अत्यन्त व्याकुल हो उठे॥७-८ ॥ उस समय अनेक प्रकारकी लीलाओंमें प्रवीण शंकरजीके अंग शिथिल हो गये और अपना पराक्रम भूलकर वे दुखी होकर मुख नीचे करके मौन हो गये ॥ ९ ॥

उसके बाद जलन्धरने पुंखतक धँसनेवाले तीन बाणोंसे वेगपूर्वक शिवजीके सिर, हृदय तथा उदरप्रदेशपर प्रहार किया । तब महालीला करनेवाले तथा ज्ञानतत्त्ववाले भगवान् रुद्रने क्षणभरमें अग्निज्वालाके समूहसे युक्त अत्यन्त भयंकर रौद्ररूप धारण कर लिया । उनके इस अतिमहारौद्ररूपको देखकर महादैत्यगण सम्मुख खड़े रहनेमें असमर्थ हो गये और दसों दिशाओंमें भागने लगे॥१०–१२ ॥ हे मुनीश्वर! उस समय वीरोंमें विख्यात महावीर जो शुम्भ एवं निशुम्भ थे, वे भी रणमें स्थित न रह सके । जलन्धरके द्वारा रची गयी माया क्षणभरमें विलुप्त हो गयी । उस संग्राममें चारों ओर महान् हाहाकार होने लगा । तब उन दोनोंको भागते हुए देखकर क्रुद्ध हुए रुद्रने धिक्कारकर उन शुम्भ-निशुम्भको इस प्रकार शाप दिया- ॥ १३-१५ ॥ रुद्र बोले- तुम दोनों दैत्य महान् दुष्ट हो, तुम दोनों पार्वतीको दण्ड देनेवाले हो, मेरा महान् अपराध करनेवाले हो और इस संग्रामसे भाग रहे हो ॥ १६ ॥

युद्धसे भागनेवालेको नहीं मारना चाहिये, अतः मैं तुम दोनोंका वध नहीं करूँगा, किंतु गौरी मेरे युद्धसे भागे हुए तुम दोनोंका वध अवश्य करेंगी । अभी शंकरजी यह बात कह ही रहे थे कि जलती हुई अग्निके समान । समुद्रपुत्र जलन्धर अत्यधिक क्रुद्ध हो उठा ॥ १७-१८ ॥ उसने बड़े वेगके साथ शिवजीपर तीक्ष्ण बाणोंकी वर्षा करना प्रारम्भ कर दिया, जिससे पृथ्वीतल बाणोंके अन्धकारसे ढँक गया ॥१ ९ ॥ अभी रुद्र उसके बाणोंको काटनेमें लगे ही थे कि इतनेमें उस बलशालीने परिघसे वृषभपर प्रहार | किया ॥ २० ॥

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९ २२ वृषस्तेन प्रहारेण परावृत्तो रणांगणात् । रुद्रेण कृश्यमाणोऽपि न तस्थौ रणभूमिषु अथ लोके महारुद्रः स्वीयं तेजोऽतिदुःसहम् दर्शयामास सर्वस्मै सत्यमेतन्मुनीश्वर ततः परमसंक्रुद्धो रुद्रो रौद्रवपुर्धरः ॥ प्रलयानलवद् घोरो बभूव सहसा प्रभुः

दृष्ट्वा पुरः स्थितं दैत्यं मेरुकूटमिव स्थितम् ।

अवध्यत्वमपि श्रुत्वाप्यन्यैरभ्युद्यतोऽभवत् ॥

ब्रह्मणो वचनं रक्षन् रक्षको जगतां प्रभुः ।

हृदानुग्रहमातन्वंस्तद्वधाय मनो दधत् ॥

कोपं कृत्वा परं शूली पादांगुष्ठेन लीलया ।

महांभसि चकाराशु रथांगं रौद्रमद्भुतम् ॥

कृत्वार्णवांभसि शितं भगवान् रथाङ्गं स्मृत्वा जगत्त्रयमनेन हतं पुरारिः । दक्षान्धकांतकपुरत्रययज्ञहंता लोकत्रयांतककरः प्रहसन्नुवाच ॥ महारुद्र उवाच

पादेन निर्मितं चक्रं जलंधर महाम्भसि ।

बलवान्यदि चोद्धतुं तिष्ठ योद्धुं न चान्यथा ॥

सनत्कुमार उवाच

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा क्रोधेनादीप्तलोचनः ।

प्रदहन्निव चक्षुर्भ्यां प्राहालोक्य स शंकरम् ॥

जलंधर उवाच

रेखामुद्धृत्य हत्वा च सगणं त्वां हि शंकर ।

हत्वा लोकान्सुरैः सार्धं स्वभागं गरुडो यथा ॥

हन्तुं चराचरं सर्वं समर्थोऽहं सवासवम् । को महेश्वर मद्बाणैरभेद्यो भुवनत्रये ॥ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २४ उस प्रहारसे आहत हुआ वृषभ ॥ २१ पीछेकी ओर हटने लगा । शंकरजीके द्वारा रणभूमि जानेपर भी वह युद्धभूमिमें स्थित न रह सका खींचे । है । । मुनीश्वर! उस समय महारुद्रने सभीके लिये ॥ २२ दुःसह अपना तेज लोकमें दिखाया — यह सत्य अति है । | उन प्रभु रुद्रने अत्यधिक क्रुद्ध होकर रौद्ररूप धारण ॥ २३ कर लिया और वे सहसा प्रलयकालकी अग्निका समान अत्यन्त भयंकर हो गये ॥ २१-२३ ॥ मेरुशृंगके समान अचल उस दैत्यको अपने आगे २४ स्थित देखकर तथा उसे दूसरेसे अवध्य जानकर वे । स्वयं उस दैत्यको मारनेके लिये उद्यत हो गये ॥२४ ॥

जगत्की रक्षा करनेवाले उन महाप्रभुने ब्रह्माके २५ | वचनकी रक्षा करते हुए और हृदयमें दयाका भाव रखते हुए उस दैत्यके वधके लिये मनमें निश्चय किया ॥ २५ ॥

उस समय क्रोध करके अपनी लीलासे त्रिशूलधारी २६ भगवान् शंकरने महासमुद्रमें अपने पैरके अँगूठेसे शीघ्र ही भयानक तथा अद्भुत रथ - चक्रका निर्माण किया ॥ २६ ॥

उन्होंने उस महासमुद्रमें अत्यन्त जाज्वल्यमान रथचक्रका निर्माण करके तथा यह स्मरणकर कि निश्चय ही इससे तीनों लोकोंका वध किया जा २७ | सकता है, वे दक्ष, अन्धक, त्रिपुर तथा यज्ञका विनाश करनेवाले भगवान् शंकर हँसते हुए बोले- ॥ २७ ॥

महारुद्र बोले — हे जलन्धर! मैंने महासमुद्रमें अपने पैरके अँगूठेसे इस चक्रका निर्माण किया है, यदि तुम २८ बलवान् हो तो इस चक्रको पानीके बाहर करके मुझसे युद्ध करनेके लिये ठहरो, अन्यथा भाग जाओ ॥ २८ ॥

सनत्कुमार बोले- उनके उस वचनको सुनकर | जलन्धरकी आँखें क्रोधसे जलने लगीं और वह अपने २ ९ क्रोधभरे नेत्रोंसे शंकरजीको जलाता हुआ - सा उनकी ओर देखकर कहने लगा- ॥ २ ९ ॥ जलन्धर बोला- हे शंकर! मैं रेखाके समान एवं | इस चक्र सुदर्शनको उठाकर गणोंसहित तुम्हारा ३० ! मैं । समान अपना भाग ग्रहण करूँगा । हे महेश्वर । | इन्द्रसहित चर - अचर सभीका नाश करनेमें समर्थ हूँ | इस त्रिलोकीमें ऐसा कौन है, जो मेरे बाणोंके द्वारा ३१ अभेद्य हो? ॥३०-३१ ॥

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अ ० २४ ] रुद्रसंहिता (

बालभावेन भगवांस्तपसैव विनिर्जितः ।

ब्रह्मा बलिष्ठः स्थाने मे मुनिभिः सुरपुङ्गवैः ॥ ३२

दग्धं क्षणेन सकलं त्रैलोक्यं सचराचरम् ।

तपसा किं त्वया रुद्र निर्जितो भगवानपि ॥ ३३

इन्द्राग्नियमवित्तेशवायुवारीश्वरादयः न सेहिरे यथा नागा गंधं पक्षिपतेरिव ॥ ३४

न लब्धं दिवि भूमौ च वाहनं मम शंकर ।

समस्तान्पर्वतान्प्राप्य धर्षिताश्च गणेश्वराः ॥ ३५

गिरीन्द्रो मन्दरः श्रीमान्नीलो मेरुः सुशोभनः ।

धर्षितो बाहुदण्डेन कण्ड्वा उत्सर्पणाय मे ॥ ३६

गंगा निरुद्धा बाहुभ्यां लीलार्थं हिमवद्गिरौ ।

अरीणां मम भृत्यैश्च जयो लब्धो दिवौकसाम् ॥ ३७

वडवाया मुखं बद्धं गृहीत्वा तां करेण तु ।

तत्क्षणादेव सकलमेकार्णवमभूत्तदा ॥ ३८

ऐरावतादयो नागाः क्षिप्ताः सिन्धुजलोपरि ।

सरथो भगवानिन्द्रः क्षिप्तश्च शतयोजनम् ॥३ ९

गरुडोऽपि मया बद्धो नागपाशेन विष्णुना ।

उर्वश्याद्या मयानीता नार्यः कारागृहांतरम् ॥ ४०

मां न जानासि रुद्र त्वं त्रैलोक्यजयकारिणम् ।

जलंधरं महादैत्यं सिंधुपुत्रं महाबलम् ॥ ४१

सनत्कुमार उवाच

इत्युक्त्वाथ महादेवं तदा वारिधिनन्दनः ।

न चचाल न सस्मार निहतान्दानवान्युधि ॥ ४२

दुर्मदेनाविनीतेन दोर्भ्यामास्फोट्य दोर्बलात् । ४३ युद्धखण्ड ) ९ २३ मैंने अपनी बाल्यावस्थामें ही तपस्याके प्रभावसे भगवान् ब्रह्माको भी जीत लिया था और वे बलवान् ब्रह्मा मुनियों एवं देवताओंके साथ मेरे घरमें हैं ॥३२ ॥

हे रुद्र! मैंने चराचरसहित सम्पूर्ण त्रिलोकीको क्षणमात्रमें जला दिया और अपनी तपस्यासे भगवान् विष्णुको भी जीत लिया है, फिर मैं तुम्हें क्या समझता हूँ? ॥ ३३ ॥

इन्द्र, अग्नि, यम, कुबेर, वायु, वरुण आदि भी मेरे पराक्रमको उसी प्रकार नहीं सह सकते, जिस प्रकार सर्प गरुड़की गन्धको भी सहन नहीं कर सकते ॥ ३४ ॥

हे शंकर! स्वर्ग तथा भूलोकमें मेरे लिये कोई वाहन नहीं मिला, मैंने समस्त पर्वतोंपर जाकर सभी गणेश्वरोंको परास्त किया है । मैंने अपनी खुजली मिटानेके लिये पर्वतराज हिमालय, मन्दर, शोभामय नीलपर्वत तथा सुन्दर मेरु पर्वतको अपने बाहुदण्डसे घिस डाला है॥३५-३६ ॥ मैंने हिमालय पर्वतपर लीला करनेहेतु अपनी भुजाओंसे गंगाजीको रोक दिया था । मेरे भृत्योंने शत्रु देवताओंपर विजय प्राप्त की है । मैंने बड़वानलका मुख अपने हाथोंसे पकड़कर जब बन्द कर दिया, उसी क्षण सम्पूर्ण जगत् जलमय हो गया था । मैंने ऐरावत आदि हाथियोंको समुद्रके जलपर फेंक दिया तथा रथसहित भगवान् इन्द्रको सैकड़ों योजन दूर फेंक दिया ॥ ३७ - ३ ९ ॥ मैंने विष्णुजीके सहित गरुड़को भी नागपाशमें बाँध लिया तथा उर्वशी आदि अप्सराओंको अपने कारागारमें बन्दी बना लिया । हे रुद्र! त्रिलोकीपर विजय प्राप्त करनेवाले मुझ सिन्धुपुत्र महाबलवान् महादैत्य जलन्धरको तुम नहीं जानते ॥ ४०-४१ ॥ सनत्कुमार बोले — उस समय महादेवसे ऐसा कहकर उस समुद्रपुत्र [ जलन्धर ] -ने युद्धमें मारे गये दानवोंका स्मरण नहीं किया और न तो वह [ इधर-उधर ] हिला - डुला ही । उस दुर्विनीत एवं मदान्ध दैत्यने दोनों बाहुओंको ठोककर अपने बाहुबलसे तथा कटु वचनोंसे रुद्रका अपमान किया ॥ ४२-४३ ॥

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९ २४ तच्छ्रुत्वा दैत्यवचनममंगलमतीरितम् विजहास महादेवः परमं क्रोधमादधे सुदर्शनाख्यं यच्चक्रं पादांगुष्ठविनिर्मितम् जग्राह तत्करे रुद्रस्तेन हन्तुं समुद्यतः सुदर्शनाख्यं तच्चक्रं चिक्षेप भगवान्हरः कोटिसूर्यप्रतीकाशं प्रलयानलसन्निभम्

प्रदहद्रोदसी वेगात्तदासाद्य जलंधरम् ।

जहार तच्छिरो वेगान्महदायतलोचनम् ॥

रथात्कायः पपातोर्व्यां नादयन्वसुधातलम् ।

शिरश्चाप्यब्धिपुत्रस्य हाहाकारो महानभूत् ॥

द्विधा पपात तद्देहो ह्यंजनाद्रिरिवाचलः ।

कुलिशेन यथा वारांनिधौ गिरिवरो द्विधा ॥

तस्य रौद्रेण रक्तेन सम्पूर्णमभवज्जगत् ।

ततः समस्ता पृथिवी विकृताभून्मुनीश्वर ॥

तद्रक्तमखिलं रुद्रनियोगान्मांसमेव च ।

महारौरवमासाद्य रक्तकुंडमभूदिह ॥

तत्तेजो निर्गतं देहाद् रुद्रे च लयमागमत् ।

वृन्दादेहोद्भवं यद्वद्गौर्य्यां हि विलयं गतम् ॥

जलंधरं हतं दृष्ट्वा देवगन्धर्वपन्नगाः ।

अभवन्सुप्रसन्नाश्च साधु देवेति चाब्रुवन् ॥

सर्वे प्रसन्नतां याता देवसिद्धमुनीश्वराः ।

पुष्पवृष्टिं प्रकुर्वाणास्तद्यशो जगुरुच्चकैः ॥

देवांगना महामोदान्ननृतुः प्रेमविह्वलाः ।

कलस्वराः कलपदं किन्नरैः सह संजगुः ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २४ । उस दुष्टके द्वारा कहे गये अमंगल वचनको ॥ ४४ सुनकर महादेव हँसे तथा बहुत क्रोधित हो गये उन्होंने अपने पैरके अँगूठेसे जिस ॥ ४४ ॥

सुदर्शन । । नामक चक्रका निर्माण किया था, उसको अपने हाथमें ॥ ४५ ले लिया और उससे उसको मारनेके लिये रुद्र उद्यत हो गये ॥४५ ॥

। भगवान् शिवने प्रलयकालकी अग्निके सदृश ॥ ४६ एवं करोड़ों सूर्योंके समान देदीप्यमान उस सुदर्शन-चक्रको उसपर फेंका । आकाश तथा भूमिको प्रज्वलित करते हुए उस चक्रने वेगसे जलन्धरके पास आकर ४७ बड़े - बड़े नेत्रोंवाले उसके सिरको वेगपूर्वक काट दिया ॥ ४६-४७ ॥ उस सिन्धुपुत्र दैत्यका शरीर एवं सिर भूतलको ४८ नादित करता हुआ रथसे पृथ्वीपर गिर पड़ा और चारों ओर महान् हाहाकार होने लगा ॥ ४८ ॥

काले पहाड़के समान उसका शरीर दो टुकड़े ४ ९ होकर उसी प्रकार गिर पड़ा, जैसे वज्रके प्रहारसे अति विशाल पर्वत दो टुकड़े होकर समुद्रमें गिर पड़ता है ॥ ४ ९ ॥ हे मुनीश्वर! उसके भयंकर रक्तसे सारा जगत् ५० व्याप्त हो गया और उससे पृथ्वी [ लाल हो जानेसे ] विकृत हो गयी । शिवजीकी आज्ञासे उसका सम्पूर्ण रक्त एवं मांस महारौरव [ नरक ] -में जाकर रक्तका ५१ कुण्ड बन गया ॥ ५०-५१ ॥ उसके शरीरसे निकला हुआ तेज शंकरमें उसी ५२ प्रकार समा गया, जिस प्रकार वृन्दाके शरीरसे उत्पन्न । तेज गौरीमें प्रविष्ट हो गया था I । जलन्धरको मरा हुआ देखकर उस समय देव, गन्धर्व तथा नागगण ५३ अत्यन्त प्रसन्न हो उठे और शंकरजीको साधुवाद देने द लगे ॥ ५२-५३ ॥ सभी देव, सिद्ध एवं मुनीश्वर भी प्रसन्न हो ५४ गये और पुष्पवृष्टि करते हुए उच्च स्वरमें उनका । यशोगान करने लगे । देवांगनाएँ प्रेमसे विह्वल होकर | अति आनन्दपूर्वक करने लगीं और मनोहर नृत्य गाने | रागयुक्त शब्दोंसे किन्नरोंके साथ सुन्दर पदोंको

५५ | लगीं ॥। ५४-५५ ॥

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अ ० २५ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड )

दिशः प्रसेदुः सर्वाश्च हते वृन्दापतौ मुने ।

ववुः पुण्याः सुखस्पर्शा वायवस्त्रिविधा अपि ॥

चन्द्रमाः शीततां यातो रविस्तेपे सुतेजसा ।

अग्नयो जज्वलुः शांता बभूवाविकृतं नभः ॥

एवं त्रैलोक्यमखिलं स्वास्थ्यमापाधिकं मुने । हब्धितनये तस्मिन्हरेणानन्तमूर्तिना । ९ २५ हे मुने! उस समय वृन्दापति जलन्धरके मर ५६ जानेपर सभी ओर पवित्र तथा सुखद स्पर्शवाली दिशाएँ प्रसन्न हो गयीं, [ शीतल, मन्द, सुगन्ध ] तीनों प्रकारकी वायु चलने लगी । चन्द्रमा शीतलतासे युक्त हो गया, सूर्य परम तेजसे तपने लगा, शान्त अग्नि ५७ जलने लगी और आकाश निर्मल हो गया । इस प्रकार हे मुने! अनन्तमूर्ति सदाशिवके द्वारा उस समुद्रपुत्र जलन्धरके मारे जानेपर सम्पूर्ण त्रैलोक्य अत्यधिक ५८ | शान्तिमय हो गया ॥ ५६–५८ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे जलंधरवधोपाख्याने जलंधरवधवर्णनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें जलन्धरवधोपाख्यानके अन्तर्गत जलन्धरवधवर्णन नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २४ ॥

अथ पञ्चविंशोऽध्यायः जलन्धरवधसे प्रसन्न देवताओं सनत्कुमार उवाच

अथ ब्रह्मादयो देवा मुनयश्चाखिलास्तथा ।

तुष्टुवुर्देवदेवेशं वाग्भिरिष्टाभिरानताः ॥ १

देवा ऊचुः

देवदेव महादेव शरणागतवत्सल ।

साधुसौख्यप्रदस्त्वं हि सर्वदा भक्तदुःखहा ॥ २

त्वं महाद्भुतसल्लीलो भक्तिगम्यो दुरासदः ।

दुराराध्योऽसतां नाथ प्रसन्नः सर्वदा भव ॥ ३

वेदोऽपि महिमानं ते न जानाति हि तत्त्वतः ।

यथामति महात्मानः सर्वे गायन्ति सद्यशः ॥ ४

माहात्म्यमतिगूढं ते सहस्त्रवदनादयः ।

सदा गायन्ति सुप्रीत्या पुनन्ति स्वगिरं हि ते ॥ ५ ।

कृपया तव देवेश ब्रह्मज्ञानी भवेज्जडः ।

भक्तिगम्यः सदा त्वं वा इति वेदा ब्रुवन्ति हि ॥ ६

त्वं वै दीनदयालुश्च सर्वत्र व्यापकः सदा ।

आविर्भवसि सतां गतिः ॥ ७

सद्भक्त्या निर्विकारः द्वारा भगवान् शिवकी स्तुति सनत्कुमार बोले - – [ हे व्यास! ] इसके बाद ब्रह्मा आदि सभी देवता एवं मुनिगण सिर झुकाकर प्रिय वाणीसे देवदेवेशकी स्तुति करने लगे— ॥ १ ॥

देवता बोले- हे देवदेव! हे महादेव! हे शरणागतवत्सल! आप सदा सज्जनोंको सुख देनेवाले तथा भक्तोंका दुःख दूर करनेवाले हैं ॥२ ॥

आप अद्भुत उत्तम लीला करनेवाले, [ एकमात्र ] भक्तिसे प्राप्त होनेवाले, दुर्लभ तथा दुष्टजनोंके द्वारा दुराराध्य हैं । हे नाथ! आप सर्वदा प्रसन्न रहें ॥३ ॥

हे प्रभो! वेद भी यथार्थ रूपसे आपकी महिमाको नहीं जानते, महात्मालोग अपनी बुद्धिके अनुसार आपके उत्तम यशका गान करते हैं । हजार मुखोंवाले शेषनाग आदि प्रेमपूर्वक सदा आपकी अत्यन्त गूढ़ महिमाका गान करते हैं एवं वे अपनी वाणीको पवित्र करते हैं॥४-५ ॥ हे देवेश! आपकी कृपासे जड़ भी ब्रह्मज्ञानी हो जाता है और आप सदा भक्तिसे ही प्राप्य हैं - ऐसा वेद कहते हैं ॥ ६ ॥

हे प्रभो! आप दीनदयाल तथा सदा सर्वत्र व्यापक, निर्विकार तथा सज्जनोंके रक्षक हैं, आप आविर्भूत होते हैं । हे महेशान! आपकी सद्भक्तिसे

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९ २६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २५ भक्त्यैव ते महेशान बहवः सिद्धिमागताः । | भक्तिसे बहुत लोग इस लोकमें सभी प्रकारके सुखका दुःखिता निर्विकारतः ॥ ८ उपभोग करके सिद्धिको प्राप्त हुए हैं और निराकार इह सर्वसुखं भुक्त्वा उपासनासे दुखित हुए हैं ॥ ७-८ ॥ पुरा यदुपतिर्भक्तो दाशार्हः सिद्धिमागतः । हे प्रभो! पूर्व समयमें यदुवंशी भक्त दाशार्ह तथा कलावती च तत्पत्नी भक्त्यैव परमां प्रभो ॥ ९ उनकी पत्नी कलावतीने आपकी भक्तिसे ही परम

तथा मित्रसहो राजा मदयन्ती च तत्प्रिया ।

भक्त्यैव तव देवेश कैवल्यं परमं ययौ ॥

सौमिनी नाम तनया कैकेयाग्रभुवस्तथा ।

तव भक्त्या सुखं प्राप परं सद्योगिदुर्लभम् ॥

विमर्षणो नृपवरः सप्तजन्मावधि प्रभो ।

भुक्त्वा भोगांश्च विविधांस्त्वद्भक्त्या प्राप सद्गतिम् ॥

चन्द्रसेनो नृपवरः त्वद्भक्त्या सर्वभोगभुक् ।

दुःखमुक्तः सुखं प्राप परमत्र परत्र च ॥

गोपीपुत्रः श्रीकरस्ते भक्त्या भुक्त्वेह सद्गतिम् ।

परं सुखं महावीरशिष्यः प्राप परत्र वै ॥

त्वं सत्यरथभूजानेर्दुःखहर्ता गतिप्रदः ।

धर्मगुप्तं राजपुत्रमतार्षीः सुखिनं त्विह ॥

तथा शुचिव्रतं विप्रमदरिद्रं महाप्रभो ।

त्वद्भक्तिवर्तिनं मात्रा ज्ञानिनं कृपया करोः ॥

चित्रवर्मा नृपवरस्त्वद्भक्त्या प्राप सद्गतिम् ।

इह लोके सदा भुक्त्वा भोगानमरदुर्लभान् ॥

चन्द्रांगदो राजपुत्रः सीमंतिन्या स्त्रिया सह ।

विहाय सकलं दुःखं सुखी प्राप महागतिम् ॥

द्विजो मंदरनामापि वेश्यागामी खलोऽधमः ।

त्वद्भक्तः शिव संपूज्य तया सह गतिं गतः ॥

। सिद्धि प्राप्त कर ली थी । हे देवेश! इसी प्रकार राजा मित्रसह तथा उनकी पत्नी मदयन्तीने भी आपकी १० भक्तिसे ही परम कैवल्यपदको प्राप्त किया था । केकयनरेशकी सौमिनी नामक कन्याने आपकी भक्तिसे महायोगियोंके लिये भी दुर्लभ परम सुख प्राप्त किया ११ था॥९ -११ ॥ हे प्रभो! राजाओंमें श्रेष्ठ विमर्षणने आपकी १२ भक्तिसे सात जन्मपर्यन्त अनेक प्रकारके सुखोंका उपभोग करके सद्गति प्राप्त की थी । नृपश्रेष्ठ चन्द्रसेनने आपकी भक्तिद्वारा दुःखसे छुटकारा पाया १३ तथा इस लोकमें एवं परलोकमें नाना प्रकारके भोग प्राप्त करते हुए वे आनन्द करते रहे ॥ १२-१३ ॥ महावीरके शिष्य गोपीपुत्र श्रीकरने भी आपकी १४ भक्तिसे इस लोकमें परम सुख भोगकर परलोकमें सद्गति प्राप्त की ॥१४ ॥

आपने [ प्रसन्न होकर ] सत्यरथ नामक भूपतिका १५ दुःख हरण किया तथा उन्हें सद्गति प्रदान की । आपने राजपुत्र धर्मगुप्तको सुखी बनाया तथा उन्हें तार दिया ॥ १५ ॥

हे महाप्रभो! आपने माताके उपदेशसे आपकी १६ भक्ति करनेवाले शुचिव्रत नामक ब्राह्मणको कृपापूर्वक धनवान् तथा ज्ञानी बना दिया ॥१६ ॥ में ।

नृपश्रेष्ठ चित्रवर्माने आपकी भक्तिसे इस लोक १७ देवदुर्लभ सुखोंको भोगकर अन्तमें सद्गति: प्राप्त की ॥ १७ ॥ स्त्री

चन्द्रांगद नामक राजपुत्रने अपनी । १८ सीमन्तिनीसहित आपकी भक्तिसे सारे दुःखोंको । | त्यागकर सुखसम्पन्न हो महागतिको प्राप्त किया, | हे शिव! मन्दर नामवाला ब्राह्मण, जो वेश्यागामी भक्तिसे, | अधम तथा महाखल था, वह भी आपकी साथ | युक्त होकर आपका पूजनकर उस वेश्याके १ ९ सद्गतिको प्राप्त हुआ ॥ १८-१९ ॥

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अ ० २५ ] रुद्रसंहिता (

भद्रायुस्ते नृपसुतः सुखमाप गतव्यथः ।

त्वद्भक्तिकृपया मात्रा गतिं च परमां प्रभो ॥ २०

सर्वस्त्रीभोगनिरतो दुर्जनस्तव सेवया ।

विमुक्तोऽभूदपि सदाऽभक्ष्यभोजी महेश्वर ॥ २१

शंबर: शंकरो भक्तश्चिताभस्मधरः सदा ।

नियमाद्भस्मनः शंभो स्वस्त्रिया ते पुरं गतः ॥ २२

भद्रसेनस्य तनयस्तथा मंत्रिसुतः प्रभो ।

सुधर्मशुभकर्माणो सदा रुद्राक्षधारिणौ ॥ २३

त्वत्कृपातश्च तौ मुक्तावास्तां भुक्त्वेह सत्सुखम् ।

पूर्वजन्मनि यौ कीशकुक्कुटौ रुद्रभूषणौ ॥ २४

पिंगला च महानन्दा वेश्ये द्वे तव भक्तितः ।

सद्गतिं प्रापतुर्नाथ भक्तोद्धारपरायण ॥ २५

शारदा विप्रतनया बालवैधव्यमागता ।

तव भक्तेः प्रभावात्तु पुत्रसौभाग्यवत्यभूत् ॥ २६

बिन्दुगो द्विजमात्रो हि वेश्याभोगी च तत्प्रिया ।

चञ्ञ्जुला त्वद्यशः श्रुत्वा परमां गतिमाययौ ॥ २७

इत्यादि बहवः सिद्धिं गता जीवास्तव प्रभो ।

भक्तिभावान्महेशान दीनबन्धो कृपालय ॥ २८

त्वं परः प्रकृतेर्ब्रह्म पुरुषात्परमेश्वर ।

निर्गुणस्त्रिगुणाधारो ब्रह्मविष्णुहरात्मकः ॥ २ ९

नानाकर्मकरो नित्यं निर्विकारोऽखिलेश्वरः ।

वयं ब्रह्मादयः सर्वे तव दासा महेश्वर ॥ ३०

। प्रसन्नो भव देवेश रक्षास्मान्सर्वदा शिव ।

त्वत्प्रजाश्च वयं नाथ सदा त्वच्छरणं गताः ॥ ३१

युद्धखण्ड ) ९ २७ हे प्रभो! भद्रायु नामक राजपुत्रने भी आपकी भक्तिद्वारा कृपा प्राप्तकर दुःखोंसे मुक्त हो सुख प्राप्त किया और माताके साथ परम गति प्राप्त की ॥ २० ॥

हे महेश्वर! सदा अभक्ष्यभक्षण करनेवाला तथा सभी स्त्रियोंमें सम्भोगरत दुर्जन भी आपकी सेवासे मुक्त हो गया । हे शम्भो! चिताकी भस्म धारण करनेवाला शम्बर, जो शिवका महाभक्त था, वह नियमपूर्वक सदा चिताका भस्म धारण करनेसे शंकररूप होकर अपनी स्त्रीके साथ आपके लोकको गया ॥ २१-२२ ॥ हे प्रभो! [ इसी प्रकार ] भद्रसेनका पुत्र तथा उसके मन्त्रीका पुत्र, जो उत्तम धर्म तथा शुभ कर्म करते थे और सदा रुद्राक्ष धारण करते थे, वे दोनों ही आपकी कृपासे इस लोकमें उत्तम सुख भोगकर मुक्त हो गये । ये दोनों ही पूर्वजन्ममें कपि तथा कुक्कुट थे और रुद्राक्ष धारण करते थे ॥ २३-२४ ॥ भक्तोंका उद्धार करनेमें तत्पर रहनेवाले हे नाथ! पिंगला तथा महानन्दा नामक दो वेश्याएँ भी आपकी भक्तिसे सद्गतिको प्राप्त हुईं । किसी ब्राह्मणकी शारदा नामक कन्या बालविधवा हो गयी थी, वह आपकी भक्तिके प्रभावसे पुत्रवती तथा सौभाग्यवती हो गयी ॥ २५-२६ ॥ नाममात्रका ब्राह्मण, वेश्यागामी बिन्दुग एवं उसकी पत्नी चंचुला दोनों ही आपका यश श्रवणकर परम गतिको प्राप्त हुए । हे प्रभो! हे महेशान! हे दीनबन्धो! हे कृपालय! इस प्रकार आपकी भक्तिसे अनेक जीवोंको सिद्धि प्राप्त हुई है । हे परमेश्वर! आप प्रकृति तथा पुरुषसे परे ब्रह्म हैं, आप निर्गुण तथा त्रिगुणके आधार हैं और ब्रह्मा - विष्णु - हरात्मक भी

आप ही हैं । २७ - २ ९ ॥

आप निर्विकार तथा अखिलेश्वर होकर भी नाना प्रकारके कर्म करते हैं । हे महेश्वर शंकर! हम ब्रह्मा आदि सभी देवता आपके दास हैं ॥ ३० ॥

हे नाथ! हे देवेश! हे शिव! हम सभी आपकी प्रजा हैं और सदा आपके शरणागत हैं, अतः आप प्रसन्न होइये और सदा हमलोगोंकी रक्षा | कीजिये ॥३१ ॥

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९ २८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २६ सनत्कुमार उवाच

इति स्तुत्वा च ते देवा ब्रह्माद्याः समुनीश्वराः ।

तूष्णीं बभूवुर्हि तदा शिवाङ्घ्रिद्वन्द्वचेतसः ॥

अथ शंभर्महेशानः श्रुत्वा देवस्तुतिं शुभाम् ।

दत्त्वा वरान् वरान् सद्यः तत्रैवान्तर्दधे प्रभुः ॥

देवाः सर्वेऽपि मुदिता ब्रह्माद्या हतशत्रवः ।

स्वं स्वं धाम ययुः प्रीता गायन्तः शिवसद्यशः ॥

इदं परममाख्यानं जलंधरविमर्दनम् ।

महेशचरितं पुण्यं महाघौघविनाशनम् ॥

देवस्तुतिरियं पुण्या सर्वपापप्रणाशिनी ।

सर्वसौख्यप्रदा नित्यं महेशानंददायिनी ॥

यः पठेत्पाठयेद्वापि समाख्यानमिदं द्वयम् ।

स भुक्त्वेह परं सौख्यं गाणपत्यमवाप्नुयात् ॥

सनत्कुमार बोले- इस प्रकार ब्रह्मादि | देवता तथा सभी मुनीश्वर स्तुति करके शिवजीके ३२ चरणयुगलका ध्यान करते हुए मौन हो गये । इसके | बाद महेश्वर प्रभु शंकरजी देवगणोंकी शुभ | सुनकर उन्हें श्रेष्ठ वर देकर शीघ्र अन्तर्धान स्तुति हो ३३ | गये ॥ ३२-३३ ॥ शत्रुओंके मारे जानेसे ब्रह्मादि सभी देवता प्रसन्न ३४ हो गये और शिवजीके उत्तम यशका गान करते अपने - अपने धामको चले गये । जलन्धरवधसे सम्बन्धित हुए भगवान् शिवका यह श्रेष्ठ आख्यान पुण्यको देनेवाला ३५ एवं पापोंको नष्ट करनेवाला है॥३४-३५ ॥ देवताओंके द्वारा की गयी यह स्तुति पुण्य ३६ देनेवाली, समस्त पापोंको नष्ट करनेवाली, सब प्रकारके सुखोंको देनेवाली तथा सर्वदा महेशको आनन्द प्रदान करनेवाली है । जो इन दोनों आख्यानोंको पढ़ता है अथवा पढ़ाता है, वह इस लोकमें महान् सुख भोगकर [ अन्तमें ] गणपतित्वको प्राप्त करता ३७ | है ॥ ३६-३७ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे जलंधरवधोपाख्याने देवस्तुतिवर्णनं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें जलन्धरवधोपाख्यानके अन्तर्गत देवस्तुतिवर्णन नामक पच्चीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २५ ॥

अथ षड्विंशोऽध्यायः विष्णुजीके मोहभंगके लिये शंकरजीकी प्रेरणासे देवोंद्वारा मूलप्रकृतिकी स्तुति, मूलप्रकृतिद्वारा आकाशवाणीके रूपमें देवोंको आश्वासन, देवताओं द्वारा त्रिगुणात्मिका देवियोंका स्तवन, विष्णुका मोहनाश,, धात्री ( आँवला ), मालती तथा तुलसीकी उत्पत्तिका आख्यान व्यास उवाच

ब्रह्मपुत्र नमस्तेऽस्तु धन्यस्त्वं शैवसत्तम ।

यच्छ्राविता महादिव्या कथेयं शांकरी शुभा ॥

इदानीं ब्रूहि सुप्रीत्या चरितं वैष्णवं मुने ।

स वृन्दां मोहयित्वा तु किमकार्षीत्कुतो गतः ॥

सनत्कुमार उवाच

शृणु व्यास महाप्राज्ञ शैवप्रवर सत्तम ।

वैष्णवं चरितं शंभुचरिताढ्यं सुनिर्मलम् ॥

मौनीभूतेषु देवेषु ब्रह्मादिषु महेश्वरः ।

सुप्रसन्नोऽवदच्छंभुः शरणागतवत्सलः ॥

व्यासजी बोले- हे ब्रह्मपुत्र! आपको नमस्कार । है । हे श्रेष्ठ शिवभक्त! आप धन्य हैं, जो आपने शंकरजीकी १ यह महादिव्य शुभ कथा सुनायी । हे मुने! अब आप उन्होंने वृन्दाको । | प्रेमपूर्वक श्रीविष्णुजीके चरित्रको सुनाइये, २ मोहितकर क्या किया और वे कहाँ गये? ॥। १-२ मा सनत्कुमार बोले- हे महाप्राज्ञ! हे शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ व्यासजी! अब आप शिवचरित्रसे परिपूर्ण तथा देवता ३ निर्मल विष्णुचरित्रको सुनिये । जब ब्रह्मादिक शंकर [ स्तुतिकर ] मौन हो गये, तब शरणागतवत्सल ४ अति प्रसन्न होकर कहने लगे- ॥ ३-४ ॥

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अ ० २६ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड ) शंभुरुवाच

ब्रह्मन्देववराः सर्वे भवदर्थे मया हतः ।

जलंधरो मदंशोऽपि सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ ५

सुखमापुर्न वा ताताः सत्यं ब्रूतामराः खलु ।

भवत्कृते हि मे लीला निर्विकारस्य सर्वदा ॥ ६ ।

सनत्कुमार उवाच

अथ ब्रह्मादयो देवा हर्षादुत्फुल्ललोचनाः ।

प्रणम्य शिरसा रुद्रं शशंसुर्विष्णुचेष्टितम् ॥ ७

देवा ऊचुः

महादेव त्वया देव रक्षिताः शत्रुजाद् भयात् ।

किंचिदन्यत्समुद्भूतं तत्र किं करवामहै ॥ ८

वृन्दा विमोहिता नाथ विष्णुना हि प्रयत्नतः ।

भस्मीभूता द्रुतं वह्नौ परमां गतिमागता ॥ ९

वृन्दालावण्यसंभ्रान्तो विष्णुस्तिष्ठति मोहितः ।

तच्चिताभस्मसंधारी तव मायाविमोहितः ॥ १०

स सिद्धमुनिसंघैश्च बोधितोऽस्माभिरादरात् ।

न बुध्यते हरिः सोऽथ तव मायाविमोहितः ॥ ११

कृपां कुरु महेशान विष्णुं बोधय बोधय ।

त्वदधीनमिदं सर्वं प्राकृतं सचराचरम् ॥ १२

सनत्कुमार उवाच

इत्याकर्ण्य महेशो हि वचनं त्रिदिवौकसाम् ।

प्रत्युवाच महालीलः स्वच्छन्दस्तान्कृताञ्जलीन् ॥ १३

महेश उवाच

हे ब्रह्मन्हे सुराः सर्वे मद्वाक्यं शृणुतादरात् ।

मोहिनी सर्वलोकानां मम माया दुरत्यया ॥ १४

तदधीनं जगत्सर्वं यद्देवासुरमानुषम् ।

तयैव मोहितो विष्णुः कामाधीनोऽभवद्धरिः ॥ १५

उमाख्या सा महादेवी त्रिदेवजननी परा ।

मूलप्रकृतिराख्याता गिरिजात्मिका ॥ १६

सुरामा 2223 Shi Section 31 1 Front ९ २ ९ शम्भु बोले — हे ब्रह्मन्! हे सभी श्रेष्ठ देवगण! मैं यह सत्य - सत्य कह रहा हूँ कि यद्यपि जलन्धर मेरा ही अंश था, फिर भी मैंने आपलोगोंके लिये उसका वध किया । हे तात! हे देवतागण! आपलोग सच-सच बताइये कि आपलोगोंको सुख प्राप्त हुआ अथवा नहीं । सर्वदा मुझ निर्विकारकी लीला आपलोगोंके निमित्त ही हुआ करती है॥५-६ ॥ सनत्कुमार बोले — तदनन्तर देवताओंके नेत्र हर्षसे खिल उठे और वे शंकरजीको प्रणामकर विष्णुका वृत्तान्त निवेदन करने लगे ॥७ ॥

देवता बोले- हे महादेव! हे देव! आपने शत्रुओंके भयसे हमारी रक्षा की, किंतु एक बात और हुई है, उसमें हम क्या करें? ॥ ८ ॥

हे नाथ! विष्णुने बड़े प्रयत्नके साथ वृन्दाको मोहित किया और वह शीघ्र ही अग्निमें भस्म होकर परम गतिको प्राप्त हुई है, किंतु इस समय वृन्दाके लावण्यपर आसक्त हुए विष्णु मोहित होकर उसकी चिताका भस्म धारण करते हैं, वे आपकी मायासे विमोहित हो गये हैं॥९ -१० ॥ सिद्धों, मुनियों तथा हमलोगोंने उन्हें बड़े आदरके साथ समझाया, किंतु वे हरि आपकी मायासे मोहित होनेके कारण कुछ भी नहीं समझ रहे हैं ॥ ११ ॥

अतः हे महेशान! आप कृपा कीजिये और विष्णुको समझाइये; यह प्राकृत सम्पूर्ण चराचर जगत् आपके ही अधीन है ॥१२ ॥

सनत्कुमार बोले — देवगणोंके इस वचनको सुनकर महालीला करनेवाले तथा स्वतन्त्र [ भगवान् ] शंकर हाथ जोड़े हुए उन देवगणोंसे कहने लगे- ॥ १३ ॥

महेश बोले- हे ब्रह्मन्! हे देवो! आपलोग श्रद्धापूर्वक मेरे वचनको सुनें । सम्पूर्ण लोकोंको मोहित करनेवाली मेरी माया दुस्तर है । देवता, असुर । एवं मनुष्योंके सहित सारा जगत् उसीके अधीन है । उसी मायासे मोहित होनेके कारण विष्णु कामके अधीन हो गये हैं ॥ १४-१५ ॥ वह माया ही उमा नामसे विख्यात है, जो इन तीनों देवताओंकी जननी है । वही मूलप्रकृति नामसे विख्यात है । 1 | तथा परम मनोहर गिरिजाके

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९ ३० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २६ गच्छध्वं शरणं देवा विष्णुमोहापनुत्तये । । हे देवताओ! आपलोग विष्णुका मोह शरण्यां मोहिनीं मायां शिवाख्यां सर्वकामदाम् ॥ १७ लिये शीघ्र ही शरणदायिनी, मोहिनी दूर तथा करनेके स्तुतिं कुरुत तस्याश्च मच्छक्तेस्तोषकारिणीम् सुप्रसन्ना यदि च सा सर्वं कार्यं करिष्यति सनत्कुमार उवाच इत्युक्त्वा तान्सुरान् शंभुः पञ्चास्यो भगवान्हरः अंतर्दधे द्रुतं व्यास सर्वैश्च स्वगणैः सह

देवाश्च शासनाच्छंभोर्ब्रह्माद्या हि सवासवाः ।

मनसा तुष्टुवुर्मूलप्रकृतिं भक्तवत्सलाम् ॥

देवा ऊचुः यदुद्भवाः सत्त्वरजस्तमोगुणाः सर्गस्थितिध्वंसविधानकारकाः यदिच्छया विश्वमिदं भवाभवौ तनोति मूलप्रकृतिं नताः स्म ताम् ॥ पाहि त्रयोविंशगुणान् सुशब्दितान् जगत्यशेषे समधिष्ठिता परा । यद्रूपकर्माणि जगत्त्रयोऽपि ते विदुर्न मूलप्रकृतिं नताः स्म ताम् ॥ यद्भक्तियुक्ताः पुरुषास्तु नित्यं दारिद्र्यमोहात्ययसंभवादीन् न प्राप्नुवन्त्येव हि भक्तवत्सलां सदैव मूलप्रकृतिं नताः स्म ताम् ॥

कुरु कार्यं महादेवि देवानां नः परेश्वरि ।

विष्णुमोहं हर शिवे दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते ॥

जलंधरस्य शंभोश्च रणे कैलासवासिनः ।

प्रवृत्ते तद्वधार्थाय गौरीशासनतः शिवे ॥

वृन्दा विमोहिता देवि विष्णुना हि प्रयत्नतः ।

स्ववृषात्त्याजिता वह्नौ भस्मीभूता गतिं गता ॥

जलंधरो हतो युद्धे तद्भयान्मोचिता वयम् । गिरिशेन कृपां कृत्वा | कामनाएँ पूर्ण करनेवाली शिवा नामक मायाकी सभी । । जाइये और उस मेरी शक्तिको सन्तुष्ट करनेवाली शरण में ॥ १८ । कीजिये, यदि वे प्रसन्न हो जायँगी तो [ आपलोगोंका स्तुति सारा कार्य पूर्ण करेंगी ॥ १६-१८ ॥ ] सनत्कुमार बोले- हे व्यास! पंचमुख । शंकर हर उन देवताओंसे ऐसा कहकर अपने भगवान् सभी । ॥ १ ९ गणोंके साथ अन्तर्धान हो गये और शंकरकी आज्ञाके अनुसार इन्द्रसहित ब्रह्मादिक देवता मनसे भक्तवत्सला २० मूलप्रकृतिकी स्तुति करने लगे ॥ १ ९ -२० ॥ देवता बोले- जिस मूलप्रकृतिसे उत्पन्न हुए सत्त्व, रज और तम — ये गुण इस सृष्टिका सृजन, पालन तथा संहार करते हैं और जिसकी इच्छासे इस विश्वका २१ आविर्भाव तथा तिरोभाव होता है, उस मूलप्रकृतिको हम नमस्कार करते हैं । जो परा शक्ति शब्द आदि तेईस गुणोंसे समन्वित हो इस जगत्में व्याप्त है, २२ जिसके रूप और कर्मको वे तीनों लोक नहीं जानते, उस मूलप्रकृतिको हम नमस्कार करते हैं ॥ २१-२२ ॥ जिनकी भक्तिसे युक्त पुरुष दारिद्र्य, मोह, उत्पत्ति तथा विनाश आदिको नहीं प्राप्त करते हैं, उन भक्त-२३ वत्सला मूलप्रकृतिको हम नमस्कार करते हैं ॥ २३ ॥

हे महादेवि! हे परमेश्वरि! हम देवताओंका

२४ कार्य कीजिये । हे शिवे! विष्णुके मोहको दूर कीजिये ।

हे दुर्गे! आपको नमस्कार है ॥२४ ॥

हे देवि! कैलासवासी शंकर एवं जलन्धरके २५ युद्धमें उसका वध करनेके लिये शिवके प्रवृत्त होनेपर | गौरीके आदेशसे ही विष्णुने बड़े प्रयत्नके साथ | वृन्दाको मोहित किया और उसका सतीत्व नष्ट २६ किया । तब वह अग्निमें भस्म हो गयी और उत्तम । गतिको प्राप्त हुई ॥ २५-२६ ॥ तब भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले शंकरने हमलोगों पर भक्तानुग्रहकारिणा ॥ २७ कृपा करके जलन्धरका वध कर दिया और हम । सभीको उसके भयसे भी कर दिया है ॥ २७ ॥

तदाज्ञया वयं सर्वे शरणं ते समागताः हे देवि! हम सभी मुक्त उन शंकरकी आज्ञासे आपकी ही त्वं हि शंभुर्युवां देवि भक्तोद्धारपरायणौ । शरणमें आये हैं; क्योंकि आप और शंकर दोनों ॥ २८ अपने भक्तोंका करनेमें निरत रहते हैं ॥ २८ ॥

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