श्रीगणेशाय नमः।
शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 921–930
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 921–930
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अ ० २२ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड ) ९ ११
इति यावत्स देवेशो गणान्पप्रच्छ सादरम् ।
तावद्गुणवरास्ते हि समायाताः प्रभुं प्रति ॥ ५४
तान्दृष्ट्वा विकलान् रुद्रः पप्रच्छ कुशलं प्रभुः ।
यथावत्ते गणा वृत्तं समाचख्युश्च विस्तरात् ॥ ५५
तच्छ्रुत्वा भगवान् रुद्रो महालीलाकरः प्रभुः ।
अभयं दत्तवांस्तेभ्यो महोत्साहं प्रवर्द्धयन् ॥ ५६
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे वे देवेश अभी गणोंसे आदरपूर्वक पूछ ही रहे थे, तभी वे श्रेष्ठ गण प्रभु शिवके पास पहुँच गये ॥५४ ॥
उन्हें विकल देखकर प्रभु शंकरजी उनका कुशल पूछने लगे, तब उन गणोंने विस्तारपूर्वक सारा वृत्तान्त यथावत् कह दिया । तब महान् लीला करनेवाले | प्रभु भगवान् रुद्रने उसे सुनकर महान् उत्साह बढ़ाते हुए उन्हें अभय प्रदान किया ॥ ५५-५६ ॥ जलंधरवधोपाख्याने विशेषयुद्धवर्णनं नामैकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें जलन्धरवधोपाख्यानमें विशेष युद्धवर्णन नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २१ ॥
अथ द्वाविंशोऽध्यायः श्रीशिव और जलन्धरका युद्ध, जलन्धरद्वारा गान्धर्वी मायासे शिवको मोहितकर शीघ्र ही पार्वतीके पास पहुँचना, उसकी मायाको जानकर पार्वतीका अदृश्य हो जाना और भगवान् विष्णुको जलन्धरपत्नी वृन्दाके पास जानेके लिये कहना सनत्कुमार उवाच
अथ वीरगणै रुद्रो रौद्ररूपो महाप्रभुः ।
अभ्यगाद् वृषभारूढः संग्रामं प्रहसन्निव ॥ १
रुद्रमायान्तमालोक्य सिंहनादैर्गणाः पुनः ।
निवृत्ताः संगरे रौद्रा ये हि पूर्वं पराजिताः ॥ २
वीरशब्दं च कुर्वन्तस्तेऽप्यन्ये शांकरा गणाः ।
सोत्सवाः सायुधा दैत्यान्निजघ्नुः शरवृष्टिभिः ॥
दैत्या हि भीषणं रुद्रं सर्वे दृष्ट्वा विदुद्रुवुः ।
शांकरं पुरुषं दृष्ट्वा पातकानीव तद्भयात् ॥ ४
अथो जलंधरो दैत्यान्निवृत्तान्प्रेक्ष्य संगरे ।
अभ्यधावत्स चंडीशं मुञ्चन्बाणान्सहस्रशः ॥ ५
निशुंभशुंभप्रमुखा दैत्येन्द्राश्च सहस्त्रशः ।
अभिजग्मुश्शिवं वेगाद्रोषात्संदष्टदच्छदाः ॥ ६
कालनेमिस्तथा वीरः खड्गरोमा बलाहकः । सनत्कुमार बोले- इसके बाद रौद्ररूपवाले महाप्रभु शंकर बैलपर सवार हो वीरगणोंके साथ हँसते हुए संग्रामभूमिमें गये । जो रुद्रगण पहले पराजित होकर भाग गये थे, वे शिवजीको आते हुए देखकर सिंहनाद करते हुए युद्धभूमिमें पुन: लौट आये । वे और शंकरके अन्य गण भी शब्द करते हुए आयुधोंसे युक्त हो बड़े उत्साहके साथ बाणोंकी वर्षासे दैत्योंको मारने लगे ॥१-३ ॥ उस समय सभी दैत्य भयंकर रुद्रको देखकर इस प्रकार भागने लगे, जिस प्रकार शिवभक्तको देखकर उसके भयसे पाप भाग जाते हैं । तदनन्तर युद्धमें असुरोंको पराङ्मुख देखकर वह जलन्धर हजारों बाणोंको छोड़ता हुआ शंकरजीकी ओर दौड़ा । शुम्भ - निशुम्भ आदि हजारों दैत्यराज भी क्रोधसे ओठोंको चबाते हुए बड़े वेगसे शंकरजीकी ओर जाने लगे॥४–६ ॥ वीर कालनेमि, खड्गरोमा, बलाहक, घस्मर, तथा अन्य दैत्य भी शिवजीकी ओर दौड़ घस्मरश्च प्रचंडश्चापरे चापि शिवं ययुः ॥ ७ प्रचण्ड पड़े ॥ ७ ॥
हे मुने! शुम्भ आदि सभी वीरों [ दैत्यगणों ] -ने शीघ्र ही बाणोंके द्वारा रुद्रगणोंको ढँक दिया और बाणैः संछादयामासुर्द्रुतं रुद्रगणांश्च ते । अंगोको छिन्न - भिन्न कर दिया दि शुभाद्या निखिला मुने ॥ ८ उनके अंगानि चिच्छिदुवीराः
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९ १२ बाणांधकारसंछन्नं दृष्ट्वा गणबलं हरः तद्बाणजालमाच्छिद्य बाणैराववृते नभः दैत्यांश्च बाणवात्याभिः पीडितानकरोत्तदा प्रचंडबाणजालौघैरपातयत भूतले खड्गरोमशिरः कायात्तथा परशुनाच्छिनत् बलाहकस्य च शिरः खट्वांगेनाकरोद्विधा स बध्वा घस्मरं दैत्यं पाशेनाभ्यहनद्भुवि महावीरं प्रचंडं च चकर्त्त त्रिशिखेन ह
वृषभेण हताः केचित्केचिद्बाणैर्निपातिता ।
न शेकुरसुराः स्थातुं गजाः सिंहार्दिता इव ॥
ततः क्रोधपरीतात्मा दैत्यान् धिक् कृतवान् रणे ।
शुंभादिकान्महादैत्यः प्रहसन्प्राह धैर्यवान् ॥
जलंधर उवाच
किं व उच्चरितैर्मातुर्धावद्भिः पृष्ठतो हतैः ।
न हि भीतवधः श्लाघ्यः स्वर्गदः शूरमानिनाम् ॥
यदि वः प्रधने श्रद्धा सारो वा क्षुल्लका हृदि ।
अग्रे तिष्ठत मात्रं मे न चेद्ग्राम्यसुखे स्पृहा ॥
रणे मृत्युर्वरश्चास्ति सर्वकामफलप्रदः ।
यशः प्रदो विशेषेण मोक्षदोऽपि प्रकीर्त्तितः ॥
सूर्यस्य मंडलं भित्त्वा यायाद्वै परमं पदम् ।
परिव्राट् परमज्ञानी रणे यः सम्मुखे हतः ॥
मृत्योर्भयं न कर्तव्यं कदाचित्कुत्रचिद्बुधैः ।
अनिवार्यो यतो ह्येष उपायैर्निखिलैरपि ॥
मृत्युर्जन्मवतां वीरा देहेन सह जायते ।
अद्य वाब्दशतांते वा मृत्युर्वे प्राणिनां ध्रुवः ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २२ । तब शंकरने अपने गणोंको बाणोंके अन्धकार ॥ ९ आवृत देखकर शीघ्रतापूर्वक दैत्योंके बाणसमूहों | काटकर अपने बाणोंसे आकाशको भर दिया को । उन्होंने बाणोंकी आँधीसे दैत्योंको ॥ ९ ॥
॥ १० । दिया और बाणसमूहोंसे दैत्योंको पृथ्वीतलपर पीड़ित कर । दिया । उन्होंने अपने परशुसे खड्गरोमाका सिर धड़से गिरा । ॥ ११ अलग कर दिया और खट्वांगसे बलाहकके सिरके । दो टुकड़े कर दिये । घस्मर नामक दैत्यको पाशमें ॥ १२ बाँधकर उसे भूमिपर पटक दिया और अपने त्रिशूलसे महावीर प्रचण्डको काट डाला॥१०–१२ ॥ शिवजीके वृषभने कुछको मार डाला, कुछ १३ बाणोंके द्वारा मार दिये गये और कुछ दैत्य सिंहसे पीड़ित हाथियोंकी भाँति स्थित रहनेमें असमर्थ हो गये ॥ १३ ॥
तब क्रोधाविष्ट मनवाला वह महादैत्य जलन्धर १४ शुम्भादि दैत्योंको धिक्कारने लगा और धैर्ययुक्त होकर हँसता हुआ कहने लगा— ॥ १४ ॥
जलन्धर बोला— [ पहले शंकरजीसे बोला— ] भागकर पीठ दिखाते हुए माताके मलके १५ समान इन दैत्योंको मारनेसे क्या लाभ; क्योंकि भयभीत लोगोंको मारना श्लाघ्य तथा वीरोंके लिये स्वर्गप्रद नहीं होता । यदि युद्ध करनेमें तुम्हारी श्रद्धा १६ है, हृदयमें थोड़ा भी साहस है तथा यदि ग्राम्यसुखमें थोड़ी भी स्पृहा नहीं है, तो मेरे सामने खड़े रहो ॥ १५-१६ ॥ [ पुनः अपने वीरोंसे बोला— ] युद्धभूमिमें मर १७ जाना अच्छा है, यह सभी कामनाओंका फल | देनेवाला, यशकी प्राप्ति करानेवाला तथा विशेषकर । मोक्ष देनेवाला भी कहा गया है । जो रणभूमिमें युद्ध १८ | होता है और सूर्यमण्डलको भेदकर परमपदको प्राप्त । करता है । बुद्धिमानोंको कभी भी कहीं भी मृत्युसे १ ९ भयभीत नहीं होना चाहिये; क्योंकि समस्त उपायोंसे भी इसे रोका नहीं जा सकता है ॥ १७–१९ ॥ के हे वीरो! यह मृत्यु तो जन्म लेनेवालोंके शरीर वर्ष | साथ ही पैदा होती है, वह आज हो अथवा सौ २० । बाद हो, प्राणियोंकी मृत्यु तो निश्चित है ॥ २० ॥
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अ ० २२ ] रुद्रसंहिता (
तन्मृत्युभयमुत्सार्य युध्यध्वं समरे मुदा ।
सर्वथा परमानन्द इहामुत्राप्यसंशयः ॥२१
सनत्कुमार उवाच
इत्युक्त्वा बोधयामास स्ववीरान्बहुशः स हि ।
धैर्यं दधुर्न ते भीत्या पलायंतो रणाद् द्रुतम् ॥ २२
अथ दृष्ट्वा स्वसैन्यं तत्पलायनपरायणम् ।
चुक्रोधाति महावीरः सिंधुपुत्रो जलंधरः ॥ २३
ततः क्रोधपरीतात्मा क्रोधाद्रुद्रं जलंधरः ।
आह्वापयामास रणे तीव्राशनिसमस्वनः ॥ २४
जलंधर उवाच
युद्धस्वाद्य मया सार्धं किमेभिर्निहतैस्तव ।
यच्च किञ्चिद्बलं तेऽस्ति तद्दर्शय जटाधर ॥ २५
सनत्कुमार उवाच
इत्युक्त्वा बाण सप्तत्या जघान वृषभध्वजम् ।
जलंधरो महादैत्यः शंभुमक्लिष्टकारिणम् ॥ २६
तानप्राप्तान्महादेवो जलंधरशरान्द्रुतम् ।
निजैर्हि निशितैर्बाणैश्चिच्छेद प्रहसन्निव ॥ २७
ततो हयान्ध्वजं छत्रं धनुश्चिच्छेद सप्तभिः ।
जलंधरस्य दैत्यस्य न तच्चित्रं हरे मुने ॥ २८
स च्छिन्नधन्वा विरथः पाथोधितनयोऽसुरः ।
अभ्यधावच्छिवं क्रुद्धो गदामुद्यम्य वेगवान् ॥ २ ९
प्रभुर्गदां च तत्क्षिप्तां सहसैव महेश्वरः ।
पाराशर्य्य महालीलो द्रुतं बाणैर्द्विधाकरोत् ॥ ३०
तथापि मुष्टिमुद्यम्य महाक्रुद्धो महासुरः ।
अभ्युद्ययौ महावेगाद्रुद्रं तं तज्जिघांसया ॥ ३१
तावदेवेश्वरेणाश बाणौघैः स जलंधरः । युद्धखण्ड ) ९ १३ इसलिये मृत्युका भय त्यागकर संग्राममें प्रसन्नतापूर्वक युद्ध करो, ऐसा करनेसे इस लोकमें तथा परलोकमें भी निःसन्देह परम आनन्दकी प्राप्ति होती है ॥२१ ॥
सनत्कुमार बोले - [ हे व्यास! ] ऐसा कहकर उसने अपने वीरोंको अनेक प्रकारसे समझाया, किंतु वे भयके कारण धैर्य धारण न कर सके और रणसे भागने लगे ॥२२ ॥
तब अपनी सेनाको भागती हुई देखकर महाबली सिन्धुपुत्र जलन्धरको बड़ा क्रोध उत्पन्न हो गया ॥२३ ॥
इसके बाद क्रोधसे आविष्ट मनवाला वह जलन्धर क्रोधसे वज्रकी ध्वनिके समान कठोर शब्द करके युद्धभूमिमें रुद्रको ललकारने लगा ॥२४ ॥
जलन्धर बोला — हे जटाधर! तुम आज मेरे साथ युद्ध करो, इन्हें मारनेसे क्या लाभ! यदि तुम्हारे पास कुछ बल है, तो उसे दिखाओ ॥ २५ ॥
सनत्कुमार बोले- ऐसा कहकर उस महादैत्य जलन्धरने सत्तर बाणोंसे अक्लिष्टकर्मा वृषभध्वज शिवजीपर प्रहार किया । महादेवजीने अपनेतक न पहुँचे हुए जलन्धरके उन बाणोंको अपने तीक्ष्ण बाणोंसे शीघ्र ही हँसते - हँसते काट दिया और सात बाणोंसे उस जलन्धर दैत्यके घोड़े, पताका, छत्र और धनुषको काट गिराया । हे मुने! शंकरके लिये यह अद्भुत बात नहीं थी ॥ २६–२८ ॥ तब कटे हुए धनुषवाला तथा रथविहीन वह सिन्धुपुत्र दैत्य जलन्धर गदा लेकर क्रोधके साथ वेगशील होकर शिवजीकी ओर दौड़ा ॥ २ ९ ॥ हे पराशरपुत्र! तब महान् लीला करनेवाले महेश्वरने उसके द्वारा चलायी गयी गदाको प्रभु शीघ्र ही सहसा दो टुकड़ोंमें कर दिया । फिर भी वह महादैत्य क्रोधमें भरकर अपनी मुष्टिका तानकर उन मारनेकी इच्छासे बड़े वेगसे उनपर महादेवको झपटा ॥ ३०-३१ ॥ इतनेमें अक्लिष्ट कर्म करनेवाले ईश्वरने अपने शीघ्र ही उस जलन्धरको एक को अक्लिष्टकर्मकारेण क्रोशमात्रमपाकृतः ॥ ३२ बाणसमूहोंसे दिया । तत्पश्चात् दैत्य जलन्धरने रुद्रको ततो जलंधरो दैत्यो बलाधिकम् । पीछे ढकेल रुद्रं मत्वा
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९ १४ ससर्ज मायां गांधर्वीमद्भुतां रुद्रमोहिनीम् ॥ तस्य मायाप्रभावात्तु गंधर्वाप्सरसां गणाः आविर्भूता अनेके च रुद्रमोहनहेतवे
ततो जगुश्च ननृतुर्गंधर्वाप्सरसां गणाः ।
तालवेणुमृदंगांश्च वादयन्ति स्म चापरे ॥
तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं गणै रुद्रो विमोहितः ।
पतितान्यपि शस्त्राणि करेभ्यो न विवेद सः ॥
एकाग्रीभूतमालोक्य रुद्रं दैत्यो जलंधरः ।
कामतस्स जगामाशु यत्र गौरी स्थिताऽभवत् ॥
युद्धे शुंभनिशुंभाख्यौ स्थापयित्वा महाबलौ ।
दशदोर्दण्डपंचास्यस्त्रिनेत्रश्च जटाधरः ॥
महावृषभमारूढस्सर्वथा रुद्रसंनिभः ।
आसुर्य्या मायया व्यास स बभूव जलंधरः ॥
अथ रुद्रं समायान्तमालोक्य भववल्लभा ।
अभ्याययौ सखीमध्यात्तद्दर्शनपथेऽभवत् ॥
यावद्ददर्श चावगीं पार्वतीं दनुजेश्वरः ।
तावत्स वीर्यं मुमुचे जडांगश्चाभवत्तदा ॥
अथ ज्ञात्वा तदा गौरी दानवं भयविह्वला । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २२ ३३ | अपनेसे अधिक बलवान् जानकर उनको मोहित | करनेवाली अद्भुत गान्धर्वी मायाका निर्माण किया । । उस समय उसकी मायाके प्रभावसे शंकरजीको मोहित । ॥ ३४ / करनेके लिये अप्सराओं एवं गन्धर्वोंके अनेक गण प्रकट हो गये ॥ ३२–३४ ॥ उसके बाद गन्धर्व तथा अप्सराओंके वे गण ३५ नाचने - गाने लगे तथा दूसरे ताल, वेणु और मृदंग बजाने लगे ॥३५ ॥
उस महान् आश्चर्यको देखकर रुद्र अपने ३६ गणोंके साथ [ उस रणभूमिमें ] मोहित हो गये । उन्हें अपने हाथसे अस्त्रोंके गिरनेका भी ध्यान न रहा ॥ ३६ ॥
इस प्रकार रुद्रको एकाग्रचित्त देखकर कामके ३७ वशीभूत वह दैत्य जलन्धर बड़ी शीघ्रतासे वहाँ पहुँचा, जहाँ गौरी विराजमान थीं । हे व्यास! युद्धभूमिमें महाबली शुम्भ तथा निशुम्भको नियुक्तकर तथा स्वयं ३८ दस भुजा, पाँच मुख, तीन नेत्र तथा जटा धारणकर, महावृषभपर आरूढ़ हो वह जलन्धर अपनी आसुरी मायाके प्रभावसे सर्वथा शंकरके समान सुशोभित ३ ९ होने लगा॥३७–३९ ॥ शिवप्रिया पार्वती रुद्रको आते हुए देखकर ४० सखियोंके मध्यसे उसके सामने आकर उपस्थित हो गयीं ॥ ४० ॥
उस दैत्यराजने ज्यों ही पार्वतीको देखा, उसी ४१ समय संयमरहित हो गया और उसके अंग जड़ हो गये ॥ ४१ ॥
तदनन्तर वे गौरी उस दानवको पहचानकर जगामान्तर्हिता वेगात्सा तदोत्तरमानसम् ॥४२ भयसे व्याकुल हो वेगपूर्वक अन्तर्धान होकर
तामदृष्ट्वा ततो दैत्यः क्षणाद्विद्युल्लतामिव ।
जवेनागात्पुनर्योद्धुं यत्र देवो महेश्वरः ॥
पार्वत्यपि महाविष्णुं सस्मार मनसा तदा ।
तावद्ददर्श तं देवं सोपविष्टं समीपगम् ॥
तं दृष्ट्वा पार्वती विष्णुं जगन्माता शिवप्रिया ।
प्रसन्नमनसोवाच प्रणमन्तं कृतांजलिम् ॥
उत्तरमानसकी ओर चली गयीं ॥४२ ॥
तत्पश्चात् क्षणमात्रमें ही बिजलीकी लताके ४३ समान पार्वतीको न देखकर वह दैत्य पुनः युद्ध जहाँ करनेके लिये बड़े वेगसे वहाँ पहुँच गया, शिवजी थे ॥ ४३ ॥
तब पार्वतीने भी मनसे महाविष्णुका स्मरण किया ४४ और उन्होंने तत्क्षण अपने समीप उन विष्णुको बैठा । हुआ देखा । तदनन्तर जगज्जननी शिवप्रिया पार्वती हाथ | जोड़कर प्रणाम करते हुए उन विष्णुको देखकर प्रसन्नचित्त ४५ | हो उनसे कहने लगीं- ॥ ४४-४५ ॥
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अ ० २३ ] रुद्रसंहिता ( पार्वत्युवाच
विष्णो जलंधरो दैत्यः कृतवान्परमाद्भुतम् ।
तत्किं न विदितं तेऽस्ति चेष्टितं तस्य दुर्मतेः ॥ ४६
तच्छ्रुत्वा जगदम्बाया वचनं गरुडध्वजः ।
प्रत्युवाच शिवां नत्वा सांजलिर्नम्रकंधरः ॥ ४७
श्रीभगवानुवाच
भवत्याः कृपया देवि तद्वृत्तं विदितं मया ।
यदाज्ञापय मां मातस्तत्कुर्य्यं त्वदनुज्ञया ॥ ४८
सनत्कुमार उवाच
तच्छ्रुत्वा विष्णुवचनं पुनरप्याह पार्वती ।
हृषीकेशं जगन्माता धर्मनीतिं सुशिक्षयन् ॥ ४ ९
पार्वत्युवाच
तेनैव दर्शितः पन्था बुध्यस्व त्वं तथैव हि ।
तत्स्त्रीपातिव्रतं धर्मं भ्रष्टं कुरु मदाज्ञया ॥ ५०
नान्यथा स महादैत्यो भवेद्बध्यो रमेश्वर ।
पातिव्रतसमो नान्यो धर्मोऽस्ति पृथिवीतले ॥ ५१
सनत्कुमार उवाच
इत्यनुज्ञां समाकर्ण्य शिरसाधाय तां हरिः ।
छलं कर्त्तुं जगामाशु पुनर्जालंधरं पुरम् ॥ ५२
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे युद्धखण्ड ) ९ १५ पार्वतीजी बोलीं- हे विष्णो! जलन्धर दैत्यने परम आश्चर्यजनक कार्य किया है, क्या आपको उस दुर्बुद्धिकी चेष्टा विदित नहीं है?। तब [ भगवान् ] गरुड़ध्वजने जगदम्बाका वह वचन सुनकर हाथ जोड़कर सिर झुकाकर शिवाको प्रणामकर कहा – ॥ ४६-४७ ॥ श्रीभगवान् बोले — हे देवि! आपकी कृपासे मुझे वह वृत्तान्त ज्ञात है । हे माता! आप मुझे जो आज्ञा दें, उसे मैं आपके आदेशसे करनेके लिये तत्पर हूँ ॥४८ ॥
सनत्कुमार बोले- विष्णुके इस वचनको सुनकर जगन्माता पार्वती धर्मनीतिकी शिक्षा देती हुई हृषीकेशसे कहने लगीं —॥४ ९ ॥ पार्वतीजी बोलीं- उस दैत्यने ही ऐसा मार्ग प्रदर्शित किया है, अब उसीका अनुसरण आप भी कीजिये । मेरी आज्ञासे आप उसकी स्त्रीका पातिव्रत्य भंग कीजिये । हे लक्ष्मीपते! उसके बिना वह महादैत्य नहीं मारा जा सकता है; क्योंकि पातिव्रतधर्मके समान अन्य कोई भी धर्म पृथ्वीतलपर नहीं है ॥ ५०-५१ ॥ सनत्कुमार बोले — पार्वतीकी यह आज्ञा सुनकर विष्णुजी उसे शिरोधार्य करके छल करनेके लिये शीघ्र ही पुनः जलन्धरकी नगरीकी ओर चले ॥५२ ॥
जलंधरवधोपाख्याने जलंधरयुद्धवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें जलन्धरवधोपाख्यानके अन्तर्गत जलन्धरयुद्धवर्णन नामक बाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २२ ॥
अथ त्रयोविंशोऽध्यायः वृन्दाको स्वप्नके माध्यमसे मोहित करना और स्वयं विष्णुद्वारा माया उत्पन्नकर हरण करना, वृन्दाद्वारा जलन्धरका रूप धारणकर वृन्दाके पातिव्रतका होना विष्णुको शाप देना तथा व्यास उवाच
सनत्कुमार सर्वज्ञ वद त्वं वदतां वर ।
किमकार्षीद्धरिस्तत्र धर्म तत्याज सा कथम् ॥
सनत्कुमार उवाच विष्णुर्जालंधरं गत्वा दैत्यस्य पुटभेदनम् । पातिव्रत्यस्य भंगाय वृन्दायाश्चाकरोन्मतिम् वृन्दां स दर्शयामास स्वप्नं मायाविनां वरः वृन्दाके तेजका पार्वतीमें विलीन व्यासजी बोले- हे सनत्कुमार! हे सर्वज्ञ! हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ! अब आप बताइये कि विष्णुने वहाँ १ जाकर क्या किया और उस [ स्त्री ] -ने अपने धर्मको कैसे छोड़ा? ॥१ ॥
सनत्कुमार बोले- दैत्य जलन्धरके नगरमें २ जाकर विष्णु वृन्दाके पातिव्रतधर्मको नष्ट करनेका ॥ विचार करने लगे । मायावियोंमें श्रेष्ठ उन्होंने वृन्दाको ।
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९ १६ स्वयं तन्नगरोद्यानमास्थितोऽद्भुतविग्रहः अथ वृन्दा तदा देवी तत्पत्नी निशि सुव्रता हरेर्मायाप्रभावात्तु दुस्स्वप्नं सा ददर्श ह स्वप्नमध्ये हि सा विष्णुमायया प्रददर्श ह भर्त्तारं महिषारूढं तैलाभ्यक्तं दिगंबरम् ॥
कृष्णप्रसूनभूषाढ्यं क्रव्यादगणसेवितम् ।
दक्षिणाशां गतं मुंडं तमसा च वृतं तदा ॥
स्वपुरं सागरे मग्नं सहसैवात्मना सह ।
इत्यादि बहुदुःस्वप्नान्निशांते सा ददर्श ह ॥
ततः प्रबुध्य सा बाला तं स्वप्नं स्वं विचिन्वती ।
ददर्शोदितमादित्यं सच्छिद्रं निष्प्रभं मुहुः ॥
तदनिष्टमिदं ज्ञात्वा रुदंती भयविह्वला ।
कुत्रचिन्नाप सा शर्म गोपुराट्टालभूमिषु ॥
ततः सखीद्वययुता नगरोद्यानमागमत् ।
तत्रापि सा गता बाला न प्राप कुत्रचित्सुखम् ॥
ततो जलंधरस्त्री सा निर्विण्णोद्विग्नमानसा ।
वनाद्वनान्तरं याता नैव वेदात्मना तदा ॥
भ्रमती सा ततो बाला ददर्शातीव भीषणौ ।
राक्षसौ सिंहवदनौ दृष्ट्वा दशनभासुरौ ॥
तौ दृष्ट्वा विह्वलातीव पलायनपरा तदा ।
ददर्श तापसं शांतं सशिष्यं मौनमास्थितम् ॥
ततस्तत्कंठमासाद्य निजां बाहुलतां भयात् ।
मुने मां रक्ष शरणमागतास्मीत्यभाषत ॥
मुनिस्तां विह्वलां दृष्ट्वा राक्षसानुगतां तदा ।
हुंकारेणैव तौ घोरौ चकार विमुखौ द्रुतम् ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २३ ॥ ३ स्वप्न दिखाया और स्वयं अद्भुत रूप धारण करके । । उसके नगरके उद्यानमें स्थित हो गये । तब उसकी ॥ ४ पतिव्रता पत्नी देवी वृन्दाने विष्णुकी मायाके प्रभावसे रात्रिमें दुःस्वप्न देखा॥२-४ ॥ । उसने विष्णुकी मायासे स्वप्नमें देखा कि उसका | पति भैंसेपर आरूढ़ होकर शरीरमें तेल लगाये नग्न होकर काले पुष्पोंसे विभूषित हो राक्षसोंके साथ हुए दक्षिण दिशाकी ओर जा रहा है, उसका सिर मुँड़ा ६ हुआ है और वह अन्धकारसे ढका हुआ है ॥ ५-६ ॥ इसी तरह उसने अपनेको और अपने नगरको ७ समुद्रमें डूबते हुए देखा । इस प्रकार उसने रात्रिके शेष भागमें बहुत प्रकारके दुःस्वप्नोंको देखा ॥७ ॥
इसके बाद वह बाला जगकर देखे गये अपने ८ स्वप्नोंपर विचार कर ही रही थी कि उसने उदित होते हुए सूर्यको छिद्रयुक्त और निष्प्रभ देखा ॥८ ॥
इन घटनाओंको अनिष्टकारी जानकर वह भयसे ९ विह्वल हो गयी और रोने लगी, उसे द्वार, अट्टालिका आदि कहीं भी शान्ति नहीं मिली ॥ ९ ॥
तदनन्तर वह अपनी दो सखियोंके साथ नगरके १० बगीचेमें आयी, परंतु उस बालाको वहाँ भी कुछ शान्ति नहीं मिली ॥१० ॥
इसके बाद वह जलन्धरकी स्त्री दुःखित होकर ११ घबराती हुई एक वनसे दूसरे वनमें गयी, किंतु वह अपने विषयमें कुछ नहीं समझ पायी ॥११ ॥
घूमती हुई उस बालाने सिंहके समान मुखवाले, १२ चमकते हुए दाढ़ और दाँतवाले भयंकर दो राक्षसोंको देखा ॥१२ ॥
उन दोनोंको देखकर भयसे विह्वल वह ज्यों ही १३ भागने लगी, त्यों ही उसने शिष्यके साथ मौन बैठे हुए शान्त एक तपस्वीको देखा ॥ १३ ॥
तदनन्तर भयभीत उसने उन तपस्वीके गलेमें १४ भुजारूपी लताको डालकर कहा- हे मुने! मेरी रक्षा कीजिये, मैं आपकी शरणमें आयी हूँ ॥१४ ॥
दो राक्षसोंद्वारा पीछा की जाती हुई तथा भयसे | विह्वल उसको देखकर मुनिने ' हूँ ' शब्दसे ही उन १५ । दोनों राक्षसोंको शीघ्र भगा दिया ॥ १५ ॥
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अ ० २३ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड ) हुंकारभयत्रस्तौ दृष्ट्वा तौ विमुखौ गतौ । तद् विस्मितातीव दैत्येन्द्रपत्नी साभून्मुने हृदि ॥ १६ |
ततस्सा मुनिनाथं तं भयान्मुक्ता कृतांजलिः ।
प्रणम्य दंडवद्भूमौ वृन्दा वचनमब्रवीत् ॥ १७
वृन्दोवाच
मुनिनाथ दयासिन्धो परपीडानिवारक ।
रक्षिताहं त्वया घोराद्भयादस्मात्खलोद्भवात् ॥ १८
समर्थः सर्वथा त्वं हि सर्वज्ञो ऽपि कृपानिधे ।
किंचिद्विज्ञप्तुमिच्छामि कृपया तन्निशामय ॥ १ ९
जलंधरो हि मद्भर्त्ता रुद्रं योद्धुं गतः प्रभो ।
स तत्रास्ते कथं युद्धे तन्मे कथय सुव्रत ॥ २०
सनत्कुमार उवाच
मुनिस्तद्वाक्यमाकर्ण्य मौनं कपटमास्थितः ।
कर्त्तुं स्वार्थं विधानज्ञः कृपयोर्ध्वमवैक्षत ॥ २१
तावत्कपीशावायातौ तं प्रणम्याग्रतः स्थितौ ।
ततस्तद्भ्रूलतासंज्ञानियुक्तौ गगनं गतौ ॥ २२
नीत्वा क्षणार्द्धमागत्य पुनस्तस्याग्रतः स्थितौ ।
तस्यैव कं कबंधं च हस्तावास्तां मुनीश्वर ॥ २३
शिरः कबंधं हस्तौ तौ दृष्ट्वाब्धितनयस्य सा ।
पपात मूर्च्छिता भूमौ भर्तृव्यसनदुःखिता ॥ २४
वृन्दोवाच
यः पुरा सुखसंवादैर्विनोदयसि मां प्रभो ।
स कथं न वदस्यद्य वल्लभां मामनागसाम् ॥ २५
येन देवाः सगंधर्वा निर्जिता विष्णुना सह ।
कथं स तापसेनाद्य त्रैलोक्यविजयी हतः ॥ २६
नांगीकृतं हि मे वाक्यं रुद्रतत्त्वमजानता ।
परं ब्रह्म शिवश्चेति दैत्यसत्तम ॥ २७
वदन्त्या ९ १७ हे मुने! उनके हुंकारमात्रसे भयभीत होकर भागते हुए उन दोनों राक्षसोंको देखकर वह दैत्येन्द्रपत्नी वृन्दा अपने मनमें बहुत अधिक विस्मित हो गयी ॥ १६ ॥
तदनन्तर भयमुक्त वृन्दाने उन मुनिनाथको हाथ जोड़कर दण्डवत् भूमिपर प्रणामकर यह वचन कहा- ॥ १७ ॥
वृन्दा बोली- हे दयाके सागर! हे मुनिनाथ! हे दूसरोंकी पीड़ाको दूर करनेवाले! इन दुष्टोंके घोर भयसे आपने मेरी रक्षा की है ॥ १८ ॥
हे कृपाके सागर! यद्यपि आप सर्वज्ञ हैं, सर्वथा समर्थ हैं, तथापि मैं आपसे कुछ निवेदन करना चाहती हूँ, कृपया आप उसे सुनें ॥ १ ९ ॥ हे प्रभो! मेरे स्वामी जलन्धर रुद्रसे युद्ध करनेके लिये गये हैं । वे वहाँ युद्धमें कैसे हैं? हे सुव्रत! आप उसे मुझसे कहिये ॥ २० ॥
सनत्कुमार बोले- उसके वाक्यको सुनकर कपट करके मौन बैठा हुआ तथा स्वार्थको सिद्ध करनेमें कुशल वह मुनि कृपा करके ऊपरकी ओर देखने लगा ॥२१ ॥
उसी समय दो बन्दर आये और उसको प्रणामकर सामने खड़े हो गये । इसके बाद उनकी भौंहोंके इशारेसे नियुक्त होकर वे आकाशकी ओर चले गये ॥ २२ ॥
हे मुनीश्वर! आधे क्षणमें ही लौटकर जलन्धरके मस्तक, धड़ और दोनों हाथोंको लेकर वे उसके । सामने खड़े हो गये ॥ २३ ॥
वह वृन्दा सिन्धुनन्दन जलन्धरके सिर, धड़ और दोनों हाथोंको देखकर पतिके दुःखसे दुखित तथा मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ी [ और विलाप करने लगी ] ॥ २४ ॥
वृन्दा बोली- हे प्रभो! जो आप पहले सुखकी बात सुनाकर मुझे प्रसन्न किया करते थे, वही आज अपनी निरपराध पत्नीसे बोलते क्यों नहीं हैं? ॥ २५ ॥
आप अहो! जिन्होंने पहले गन्धर्वोंके साथ विष्णु और देवताओंको भी पराजित कर दिया था, वे ही त्रैलोक्यविजयी । आज एक तपस्वीसे कैसे मारे गये हैं? ॥ २६ ॥
हे दैत्यश्रेष्ठ! मैंने आपसे पूर्वमें कहा था कि शिव परब्रह्म हैं, परंतु आपने रुद्रके तत्त्वको न जानकर वाक्यको स्वीकार नहीं किया ॥ २७ ॥
मेरे उस
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९ १८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २३
ततस्त्वं हि मया ज्ञातस्तव सेवाप्रभावतः ।
गर्वितेन त्वया नैव कुसंगवशगेन हि ॥ २८
इत्थं प्रभाष्य बहुधा स्वधर्मस्था च तत्प्रिया ।
विललाप विचित्रं सा हृदयेन विदूयता ॥ २ ९
ततः सा धैर्यमालंब्य दुःखोच्छ्वासान्विमुञ्चती ।
उवाच मुनिवर्यं तं सुप्रणम्य कृताञ्जलिः ॥ ३०
कृपानिधे मुनिश्रेष्ठ परोपकरणादर ।
मयि कृत्वा कृपां साधो जीवयैनं मम प्रभुम् ॥ ३१
यत्त्वमस्य पुनः शक्तो जीवनाय मतो मम ।
अतः संजीवयैनं मे प्राणनाथं मुनीश्वर ॥ ३२
सनत्कुमार उवाच
इत्युक्त्वा दैत्यपत्नी सा पातिव्रत्यपरायणा ।
पादयोः पतिता तस्य दुःखश्वासान् विमुञ्चती ॥ ३३
मुनिरुवाच
नायं जीवयितुं शक्तो रुद्रेण निहतो युधि ।
रुद्रेण निहता युद्धे न जीवन्ति कदाचन ॥ ३४
तथापि कृपयाविष्ट एनं संजीवयाम्यहम् ।
रक्ष्याः शरणगाश्चेति जानन्धर्मं सनातनम् ॥ ३५
सनत्कुमार उवाच
इत्युक्त्वा स मुनिस्तस्या जीवयित्वा पतिं मुने ।
अंतर्दधे ततो विष्णुः सर्वमायाविनां वरः ॥ ३६
द्रुतं स जीवितस्तेनोत्थितः सागरनन्दनः ।
वृन्दामालिंग्य तद्वक्त्रं चुचुम्ब प्रीतमानसः ॥ ३७
अथ वृन्दापि भर्तारं दृष्ट्वा हर्षितमानसा ।
जहौ शोकं च निखिलं स्वप्नवद् हृद्यमन्यत ॥ ३८
अथ प्रसन्नहृदया सा हि संजातहृच्छया । | रेमे तद्वनमध्यस्था तद्युक्ता बहुवासरान् ॥ ३ ९ । आपकी सेवाके प्रभावसे मैंने जान लिया था कि आप कुसंगके वशीभूत होकर गर्वके कारण मेरी बाक नहीं मान रहे हैं ॥ २८ ॥
अपने धर्ममें परायण जलन्धरकी पत्नी इस प्रकार कह कहकर दुखित हृदयसे अनेक प्रकारसे विलाप करने लगी ॥ २ ९ ॥ तदनन्तर दुःखसे उच्छ्वास छोड़ती हुई तथा धैर्य धारणकर वह वृन्दा उन मुनिश्रेष्ठको प्रणामकर हाथ जोड़कर बोली – ॥ ३० ॥
हे कृपानिधे! हे मुनिश्रेष्ठ! दूसरेका उपकार करनेमें ही आपका आदर है । इसलिये मुझपर कृपा करके हे साधो! मेरे इस स्वामीको आप जीवित कर दें ॥ ३१ ॥
हे मुनीश्वर! मैं समझती हूँ कि आप पुनः इनको जीवित करनेमें समर्थ हैं, इसलिये मेरे प्राणनाथको आप जीवित कर दें ॥ ३२ ॥
सनत्कुमार बोले- इस प्रकार कहकर पातिव्रतधर्ममें तत्पर वह दैत्यपत्नी दुःखसे श्वास छोड़ती हुई उनके पैरोंपर गिर पड़ी ॥३३ ॥
मुनि बोले- यह युद्ध में रुद्रके द्वारा मारा गया है, इसलिये इसको जिलानेमें मैं समर्थ नहीं हूँ; क्योंकि रुद्रके द्वारा युद्धमें मारा गया व्यक्ति कभी जीवित नहीं होता ॥ ३४ ॥
तथापि शरणागतकी रक्षा करनी चाहिये, इस शाश्वत धर्मको जानता हुआ मैं कृपासे युक्त होकर इसे जीवित कर देता हूँ ॥३५ ॥
सनत्कुमार बोले- हे मुने! सभी मायावियोंमें श्रेष्ठ वे मुनिरूपी विष्णु ऐसा कहकर उसके पतिको जीवित करके वहाँसे अन्तर्धान हो गये ॥३६ ॥
उनके द्वारा जीवित समुद्रपुत्र जलन्धर भी शीघ्र उठकर प्रसन्नमनसे वृन्दाका आलिंगनकर उसके मुखका स्पर्श करने लगा ॥ ३७ ॥
पतिको देखकर वृन्दाने हर्षित मनसे सभी प्रकारके शोकका परित्याग कर दिया और इस घटनाको स्वप्नके समान समझा ॥३८ ॥
वह प्रसन्नचित्तसे कामका उदय होनेपर उस वनके मध्यमें ही उसके साथ बहुत दिनोंतक विहार करती रही ॥ ३ ९ ॥
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अ ० २३ ] रुद्रसंहिता (
कदाचित्सुरतस्यांते दृष्ट्वा विष्णुं तमेव हि ।
निर्भर्त्स्य क्रोधसंयुक्ता वृन्दा वचनमब्रवीत् ॥ ४०
वृन्दोवाच
धिक् तदेवं हरे शीलं परदाराभिगामिनः ।
ज्ञातोऽसि त्वं मया सम्यङ्मायी प्रत्यक्षतापसः ॥ ४१
सनत्कुमार उवाच
इत्युक्त्वा क्रोधमापन्ना दर्शयन्ती स्वतेजसम् ।
शशाप केशवं व्यास पातिव्रत्यरता च सा ॥ ४२
रे महाधम दैत्यारे परधर्मविदूषक ।
गृह्णीष्व शठ मद्दत्तं शापं सर्वविषोल्बणम् ॥ ४३
यौ त्वया मायया ख्यातौ स्वकीयौ दर्शितौ मम ।
तावेव राक्षसौ भूत्वा भार्यां तव हरिष्यतः ॥ ४४
त्वं चापि भार्यादुःखार्तो वने कपिसहायवान् ।
भ्रम सर्पेश्वरेणायं यस्ते शिष्यत्वमागतः ॥ ४५
इत्युक्त्वा सा तदा वृन्दा प्राविशद्धव्यवाहनम् ।
विष्णुना वार्यमाणापि तत्स्थितासक्तचेतसा ॥ ४६
तस्मिन्नवसरे देवा ब्रह्माद्या निखिला मुने ।
आगताः खे समं दारैः सद्गतिं वै दिदृक्षवः ॥ ४७
अथ दैत्येन्द्रपत्न्यास्तु तज्ज्योतिः परमं महत् ।
पश्यतां ॥ ४८
सर्वदेवानामलोकमगमद्भुतम्
शिवातनौ विलीनं तद्वृन्दातेजो बभूव ह ।
आसीज्जयजयारावः खस्थितामरपंक्तिषु ॥ ४ ९
एवं वृन्दा महाराज्ञी कालनेमिसुतोत्तमा ।
पातिव्रत्यप्रभावाच्च मुक्तिं प्राप परां मुने ॥५०
युद्धखण्ड ) ९ १ ९ एक बार सहवासके अन्तमें उसको विष्णुके रूपमें जानकर क्रोधसे युक्त होकर फटकारती हुई । वृन्दा यह वचन बोली— ॥ ४० ॥
वृन्दा बोली- अरे परस्त्रीगामी हरि! तुम्हारे इस प्रकारके चरित्रको धिक्कार है । मैंने तुमको अच्छी प्रकारसे जान लिया है । तुमने ही मायाका आश्रय लेकर तपस्वीका वेष धारण किया था ॥ ४१ ॥
सनत्कुमार बोले – हे व्यास! पातिव्रतपरायण उस वृन्दाने ऐसा कहकर क्रोधयुक्त होकर अपने तेजको दिखाते हुए विष्णुको शाप दे दिया ॥४२ ॥
रे महाधम! दैत्यशत्रु! तुम दूसरेके धर्मको दूषित करनेवाले हो, इसलिये अरे शठ! सभी प्रकारके विषोंसे तीव्र मेरे द्वारा दिये गये शापको ग्रहण करो ॥४३ ॥
तुमने अपनी मायासे जिन दो पुरुषोंको दिखाया था, वे ही दोनों राक्षस बनकर तुम्हारी पत्नीका हरण करेंगे ॥ ४४ ॥
तुम भी पत्नीके दुःखसे दुखित होकर वानरोंकी सहायता लेकर वनमें भटकते हुए घूमो और यह जो सर्पोंका स्वामी ( शेषनाग ) तुम्हारा शिष्य बना था, यह भी तुम्हारे साथ भ्रमण करे ॥ ४५ ॥
ऐसा कहकर वह वृन्दा उस समय विष्णुके द्वारा रोके जानेपर भी अपने पति जलन्धरका मनमें ध्यान करते हुए अग्निमें प्रवेश कर गयी ॥४६ ॥
हे मुने! उस समय उसकी उत्तम गतिको देखनेकी इच्छावाले ब्रह्मा आदि सभी देवता अपनी भार्याओंके साथ आकाशमण्डलमें स्थित हो गये ॥ ४७ ॥
उस समय दैत्येन्द्रपत्नीकी वह परम ज्योति देवताओंके देखते - देखते ही शीघ्र अदृष्ट हो गयी और शिवा पार्वतीके शरीरमें उस वृन्दाका तेज विलीन हो गया । उस समय आकाशमें स्थित देवताओंने जय-जयकी ध्वनि की ॥ ४८-४९ ॥ हे मुने! इस प्रकार कालनेमिकी श्रेष्ठ पुत्री महारानी वृन्दाने पातिव्रतके प्रभावसे परा मुक्तिको प्राप्त किया ॥५० ॥
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९ २० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २४ ततो हरिस्तामनुसंस्मरन्मुहु- उस समय हरिने उसका स्मरणकर उसकी वृन्दाचिताभस्मरजोऽवगुंठितः | चिताकी भस्मधूलिको धारण कर लिया देवता तत्रैव तस्थौ सुरसिद्धसंघकैः | सिद्धोंके ज्ञान देनेपर भी उनको कुछ शान्ति, नहीं और मिली
प्रबोध्यमानोऽपि ययौ न शांतिम् ॥ ५१ । और वे वहींपर स्थित हो गये ॥५१ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे जलंधरवधोपाख्याने वृन्दापातिव्रतभंगदेहत्यागवर्णनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्ड में जलन्धरवधोपाख्यानके अन्तर्गत वृन्दापातिव्रतभंग और देहत्यागवर्णन नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २३ ॥
अथ चतुर्विंशोऽध्यायः दैत्यराज जलन्धर तथा भगवान् शिवका घोर संग्राम, भगवान् शिवद्वारा चक्रसे जलन्धरका शिरश्छेदन, जलन्धरका तेज शिवमें प्रविष्ट होना, जलन्धर - वधसे जगत्में व्यास उवाच
विधेः श्रेष्ठसुत प्राज्ञ कथेयं श्राविताद्भुता ।
ततश्च किमभूदाजौ कथं दैत्यो हतो वद ॥ १
सनत्कुमार उवाच
अदृश्य गिरिजां तत्र दैत्येन्द्रे रणमागते ।
गांधर्वे च विलीने हि चैतन्योऽभूद्वृषध्वजः ॥ २
अंतर्धानगतां मायां दृष्ट्वा बुद्धो हि शंकरः ।
चुक्रोधातीव संहारी लौकिकीं गतिमाश्रितः ॥ ३
ततः शिवो विस्मितमानसः पुन-र्जगाम युद्धाय जलंधरं रुषा । स चापि दैत्यः पुनरागतं शिवं दृष्ट्वा शरोघैः समवाकिरद्रणे ॥ ४ क्षिप्तं प्रभुस्तं शरजालमुग्रं जलंधरेणातिबलीयसा हरः ।
द्रुतं प्रचिच्छेदशरैर्वरैर्निजै- ।
चित्रमत्र त्रिभवप्रहन्तुः ॥ ५ ।
ततो जलंधरो दृष्ट्वा रुद्रमद्भुतविक्रमम् । ॥
चकार मायया गौरीं त्र्यम्बकं मोहयन्निव ॥ ६ ।
सर्वत्र शान्तिका विस्तार व्यासजी बोले- ब्रह्माजीके श्रेष्ठ पुत्र परम बुद्धिमान् हे सनत्कुमारजी! आपने इस परम अद्भुत कथाका श्रवण कराया । इसके बाद क्या हुआ, उस युद्धमें वह दैत्य जलन्धर किस प्रकार मारा गया, इसे कहिये ॥ १ ॥
सनत्कुमार बोले — जब वह दैत्यपति जलन्धर पार्वतीको न देखकर युद्धभूमिमें लौट आया और गान्धर्वी माया विलीन हो गयी, तब वृषभध्वज भगवान् शंकर चैतन्य हुए । मायाके अन्तर्धान हो जानेपर भगवान् शंकरको ज्ञान हुआ, तदनन्तर संहार करनेवाले शंकर लौकिक गतिका आश्रय लेकर अत्यधिक क्रुद्ध हुए ॥ २-३ ॥ इसके बाद शिवजी विस्मितमन तथा क्रुद्ध । होकर जलन्धरसे युद्ध करनेके लिये चल दिये । उस | दैत्यने भी शिवजीको पुनः आता हुआ देखकर उनपर बाणोंकी वर्षा करना प्रारम्भ कर दिया ॥४ ॥
प्रभु शिवजीने बलशाली उस जलन्धरके द्वारा | छोड़े गये उग्र बाणोंको अपने श्रेष्ठ बाणोंसे बड़ी शीघ्रतासे काटकर गिरा दिया । त्रिभुवन -संहारकर्ता - स शिवके लिये यह कोई अद्भुत बात नहीं हुई । तदनन्तर अद्भुत पराक्रमवाले शंकरजीको देखकर जलन्धरने उन्हें मोहित करनेके लिये मायाकी पार्वती बनायी ॥५-६ ॥