श्रीगणेशाय नमः।

शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 941–950

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 941–950

पृष्ठ 941

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अ ० २६ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड ) ९ ३१

वृन्दालावण्यसंभ्रांतो विष्णुस्तिष्ठति तत्र वै ।

तच्चिताभस्मसंधारी ज्ञानभ्रष्टो विमोहितः ॥ २ ९

संसिद्धसुरसंघैश्च बोधितोऽपि महेश्वरि ।

न बुध्यते हरिः सोऽथ तव मायाविमोहितः ॥ ३०

कृपां कुरु महादेवि हरिं बोधय बोधय ।

यथा स्वलोकं पायात्स सुचित्तः सुरकार्यकृत् ॥ ३१

इति स्तुवंतस्ते देवाः तेजोमंडलमास्थितम् ।

ददृशुर्गगने तत्र ज्वालाव्याप्तदिगन्तरम् ॥ ३२

तन्मध्याद्भारतीं सर्वे ब्रह्माद्याश्च सवासवाः ।

अमराः शुश्रुवुर्व्यास कामदां व्योमचारिणीम् ॥ ३३

आकाशवाण्युवाच

अहमेव त्रिधा भिन्ना तिष्ठामि त्रिविधैर्गुणैः ।

गौरी लक्ष्मीः सुरा ज्योती रजः सत्त्वतमोगुणैः ॥ ३४

तत्र गच्छत यूयं वै तासामंतिक आदरात् ।

मदाज्ञया प्रसन्नास्ता विधास्यन्ते तदीप्सितम् ॥ ३५

सनत्कुमार उवाच

शृण्वतामिति तां वाचमन्तर्द्धानमगान्महः ।

देवानां विस्मयोत्फुल्लनेत्राणां तत्तदा मुने ॥ ३६

ततः सर्वेऽपि ते देवाः श्रुत्वा तद्वाक्यमादरात् ।

गौरीं लक्ष्मीं सुरां चैव नेमुस्तद्वाक्यचोदिताः ॥ ३७

तुष्टुवुश्च महाभक्त्या देवीस्ताः सकलाः सुराः ।

ब्रह्माद्या नतमस्तकाः ॥ ३८

नानाविधाभिर्वाग्भिस्ते

ततोऽरं व्यास देव्यस्ता आविर्भूताश्च तत्पुरः ।

महाद्भुतैः स्वतेजोभिर्भासयन्त्यो दिगंतरम् ॥ ३ ९

अथ ता अमरा दृष्ट्वा सुप्रसन्नेन चेतसा ।

स्वकार्यं च न्यवेदयन् ॥ ४०

प्रणम्य तुष्टुवुर्भक्त्या 2223 Shivmahapuranam Part I_Section_31_2_Front [ हे भगवति! ] वृन्दाके लावण्यसे भ्रमित हुए विष्णु इस समय ज्ञानसे भ्रष्ट तथा विमोहित होकर उसकी चिताका भस्म धारणकर वहीं स्थित हैं ॥ २ ९ ॥ हे महेश्वरि! आपकी मायासे मोहित होनेके कारण सिद्धों तथा देवताओंके द्वारा समझाये जानेपर भी वे विष्णु नहीं समझ रहे हैं । हे महादेवि! कृपा कीजिये और विष्णुको समझाइये, जिससे देवताओंका कार्य करनेवाले वे विष्णु स्वस्थचित्त होकर अपने लोककी रक्षा करें ॥ ३०-३१ ॥ इस प्रकारकी स्तुति करते हुए देवताओंने अपनी कान्तिसे समस्त दिशाओंको व्याप्त किये हुए एक तेजोमण्डलको आकाशमें स्थित देखा । हे व्यास! इन्द्रसहित ब्रह्मा आदि सभी देवताओंने मनोरथोंको देनेवाली आकाशवाणी उस [ तेजोमण्डल ] -के मध्यसे सुनी ॥ ३२-३३ ॥ आकाशवाणी बोली- हे देवताओ! मैं ही तीन प्रकारके गुणोंके द्वारा अलग - अलग तीन रूपोंमें स्थित हूँ; रजोगुणरूपसे गौरी, सत्त्वगुणसे लक्ष्मी तथा तमोगुणसे सुराज्योतिके रूपमें स्थित हूँ । अतः आपलोग मेरी आज्ञासे उन देवियोंके समीप आदरपूर्वक जाइये, वे प्रसन्न होकर उस मनोरथको पूर्ण करेंगी ॥ ३४-३५ ॥ सनत्कुमार बोले – हे मुने! विस्मयसे उत्फुल्ल नेत्रोंवाले देवताओंद्वारा उस वाणीको सुनते ही वह तेज अन्तर्धान हो गया । तत्पश्चात् सभी देवगण उस आकाश - वाणीको सुनकर तथा उस वाक्यसे प्रेरित होकर गौरी, लक्ष्मी तथा सुरादेवीको प्रणाम करने लगे ॥ ३६-३७ ॥ ब्रह्मादि सभी देवताओंने नतमस्तक होकर विविध स्तुतियोंसे परम भक्तिपूर्वक उन देवियोंकी | स्तुति की ॥ ३८ ॥

हे व्यासजी! तब वे देवियाँ अपने अद्भुत तेजसे सभी दिशाओंको प्रकाशित करती हुईं शीघ्र ही उनके समक्ष प्रकट हो गयीं । तब देवताओंने उन देवियोंको देखकर अत्यन्त प्रसन्नमनसे उन्हें प्रणाम करके भक्तिसे उनकी स्तुति की और अपना कार्य निवेदित किया ॥ ३ ९ -४० ॥

पृष्ठ 942

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९ ३२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २६ ततश्चैताः सुरान्दृष्ट्वा प्रणतान्भक्तवत्सलाः । इसके बाद भक्तवत्सला उन देवियोंने प्रणाम बीजानि प्रददुस्तेभ्यो वाक्यमूचुश्च सादरम् ॥ ४१ | हुए देवताओंको देखकर उन्हें अपना - अपना बीज करते और आदरपूर्वक उनसे यह वचन कहा – ॥ ४१ दिया ॥ देव्य ऊचुः देवियाँ बोलीं- [ हे देवगणो! ] जहाँ इमानि तत्र बीजानि विष्णुर्यत्रावतिष्ठति । | स्थित हैं, वहाँ इन बीजोंको बो देना, इससे आपलोगोंका विष्णु निर्वपध्वं ततः कार्यं भवतां सिद्धिमेष्यति ॥ ४२ कार्य सिद्ध हो जायगा ॥ ४२ ॥

सनत्कुमार उवाच

इत्युक्त्वा तास्ततो देव्योऽन्तर्हिता अभवन्मुने ।

रुद्रविष्णुविधीनां हि शक्तयस्त्रिगुणात्मिकाः ॥ ४३

ततस्तुष्टाः सुराः सर्वे ब्रह्माद्याश्च सवासवाः ।

तानि बीजानि संगृह्य ययुर्यत्र हरिः स्थितः ॥ ४४

वृन्दाचिताभूमितले चिक्षिपुस्तानि ते सुराः ।

स्मृत्वा ताः संस्थितास्तत्र शिवशक्त्यंशका मुने ॥ ४५

निक्षिप्तेभ्यश्च बीजेभ्यो वनस्पत्यस्त्रयोऽभवन् ।

धात्री च मालती चैव तुलसी च मुनीश्वर ॥ ४६

धात्र्युद्भवा स्मृता धात्री माभवा मालती स्मृता ।

गौरीभवा च तुलसी तमःसत्त्वरजोगुणाः ॥ ४७

विष्णुर्वनस्पतीर्दृष्ट्वा तदा स्त्रीरूपिणीर्मुने ।

उदतिष्ठत्तदा तासु रागातिशयविभ्रमः ॥ ४८

दृष्ट्वा स याचते मोहात्कामासक्तेन चेतसा ।

तं चापि तुलसी धात्री रागेणैवावलोकताम् ॥ ४ ९

यच्च बीजं पुरा लक्ष्म्या माययैव समर्पितम् ।

तस्मात्तदुद्भवा नारी तस्मिन्नीर्ष्यापराभवत् ॥ ५०

अतः सा बर्बरीत्याख्यामवापातीव गर्हिताम् । ।

धात्रीतुलस्यौ तद्रागात्तस्य प्रीतिप्रदे सदा ॥५१ ।

ततो विस्मृतदुःखोऽसौ विष्णुस्ताभ्यां सहैव तु । वैकुंठमगमत्तुष्टः सर्वदेवैर्नमस्कृतः ॥५२ | कार्तिके मासि विप्रेन्द्र धात्री च तुलसी सदा । ॥ सनत्कुमार बोले - हे मुने! इस प्रकार कहकर वे देवियाँ अन्तर्धान हो गयीं । वे ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्रकी त्रिगुणात्मक शक्तियाँ थीं । तब इन्द्रसहित ब्रह्मा आदि सभी देवता प्रसन्न हो गये और उन बीजोंको लेकर वहाँ गये, जहाँ भगवान् विष्णु स्थित | थे ॥ ४३-४४ ॥ हे मुने! उन देवताओंने वृन्दाकी चिताके नीचे भूतलपर उन बीजोंको डाल दिया और उन शिव - शक्तियोंका स्मरण करके वे वहींपर स्थित हो गये ॥ ४५ ॥

हे मुनीश्वर! उन डाले गये बीजोंसे धात्री, मालती तथा तुलसी नामक तीन वनस्पतियाँ उत्पन्न हो गयीं । धात्रीके अंशसे धात्री, महालक्ष्मीके अंशसे मालती तथा गौरीके अंशसे तुलसी हुई, जो तम, सत्त्व तथा रजोगुणसे युक्त थीं॥४६-४७ ॥ हे मुने! तब स्त्रीरूपिणी उन वनस्पतियोंको देखकर उनके प्रति विशेष रागविलासके विभ्रमसे युक्त होकर विष्णुजी उठ बैठे । उन्हें देखकर मोहके कारण कामासक्त चित्तसे वे उनके प्रेमकी याचना करने लगे । तुलसी एवं धात्रीने भी रागपूर्वक उनका अवलोकन किया ॥ ४८-४९ ॥ सर्वप्रथम लक्ष्मीने जिस बीजको मायासे देवताओंको दिया था, उससे उत्पन्न हुई स्त्री मालती उनसे ईर्ष्या करने लगी । इसलिये वह बर्बरी - इस गर्हित नामसे पृथ्वीपर विख्यात हुई और धात्री तथा तुलसी रागके कपर न विष्णुके लिये सदा प्रीतिप्रद हुई ।॥ ५०३ सभी तब विष्णुका दुःख दूर हो गया और वे सभी देवताओंसे नमस्कृत होते हुए प्रसन्न होकर उन! दोनोंके साथ वैकुण्ठ - लोकको चले गये । हे विप्रेन्द्र कार्तिकके महीने में धात्री और तुलसीको सभी देवताओं ये लिये प्रिय जानना चाहिये और विशेष करके 2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_31_2_Back

पृष्ठ 943

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अ ० २७ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड ) सर्वदेवप्रिया ज्ञेया विष्णोश्चैव विशेषतः ॥ ५३

तत्रापि तुलसी धन्यातीव श्रेष्ठा महामुने ।

त्यक्त्वा गणेशं सर्वेषां प्रीतिदा सर्वकामदा ॥ ५४ ।

वैकुण्ठस्थं हरिं दृष्ट्वा ब्रह्मेन्द्राद्याश्च तेऽमराः ।

नत्वा स्तुत्वा महाविष्णुं स्वस्वधामानि वै ययुः ॥ ५५

वैकुण्ठोऽपि स्वलोकस्थो भ्रष्टमोहः सुबोधवान् ।

सुखी चाभून्मुनिश्रेष्ठ पूर्ववत्संस्मरन् शिवम् ॥ ५६

इत्याख्यानमघौघघ्नं सर्वकामप्रदं नृणाम् ।

सर्वकामविकारघ्नं सर्वविज्ञानवर्द्धनम् ॥५७

य इदं हि पठेन्नित्यं पाठयेद्वापि भक्तिमान् ।

शृणुयाच्छ्रावयेद्वापि स याति परमां गतिम् ॥ ५८

पठित्वा य इदं धीमानाख्यानं परमोत्तमम् ।

संग्रामं प्रविशेद्वीरो विजयी स्यान्न संशयः ॥ ५ ९

विप्रानां ब्रह्मविद्यादं क्षत्रियाणां जयप्रदम् ।

वैश्यानां सर्वधनदं शूद्राणां सुखदं त्विदम् ॥ ६०

शंभुभक्तिप्रदं व्यास सर्वेषां पापनाशनम् । ९ ३३ विष्णुको अत्यन्त प्रिय हैं । हे महामुने! उन दोनोंमें भी तुलसी अत्यन्त श्रेष्ठ तथा धन्य है । यह गणेशको छोड़कर सभी देवताओंको प्रिय है तथा सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाली है॥५२–५४ ॥ इस प्रकार ब्रह्मा, इन्द्र आदि वे देवता विष्णुको वैकुण्ठमें स्थित देखकर उनको नमस्कारकर तथा उनकी स्तुतिकर अपने - अपने स्थानको चले गये ॥ ५५ ॥

हे मुनिश्रेष्ठ! मोह भंग हो जानेसे विष्णुजी ज्ञान प्राप्तकर शिवजीका स्मरण करते हुए अपने वैकुण्ठलोकमें सुखपूर्वक निवास करने लगे । यह आख्यान मनुष्योंके सभी पापोंको दूर करनेवाला, मनुष्योंकी सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला, समस्त कामविकारोंको नष्ट करनेवाला तथा सभी प्रकारके विज्ञानको बढ़ानेवाला है॥५६-५७ ॥ जो भक्तिसे युक्त होकर इस आख्यानको नित्य पढ़ता, पढ़ाता है, सुनता अथवा सुनाता है, वह परम गतिको प्राप्त करता है । जो बुद्धिमान् वीर इस अत्युत्तम आख्यानको पढ़कर संग्राममें जाता है, वह विजयी होता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५८-५९ ॥ यह [ आख्यान ] ब्राह्मणोंको ब्रह्मविद्या देनेवाला, क्षत्रियोंको जय प्रदान करनेवाला, वैश्योंको अनेक प्रकारका धन देनेवाला तथा शूद्रोंको सुख देनेवाला है ॥ ६० ॥

हे व्यासजी! यह शिवजीमें भक्ति प्रदान करनेवाला, | सभीके पापोंका नाश करनेवाला और इस लोक तथा उत्तम गति देनेवाला है ॥ ६१ ॥

इहलोके परत्रापि सदा सद्गतिदायकम् ॥ ६१ परलोकमें द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे जलंधरवधानंतर-इति श्रीशिवमहापुराणे नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥

देवीस्तुतिविष्णुमोहविध्वंसवर्णनं पंचम युद्धखण्डमें जलन्धरके वधके पश्चात् ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २६ ॥

देवीस्तुति - विष्णुमोहविध्वंसवर्णन नामक छब्बीसवाँ अथ सप्तविंशोऽध्यायः शंखचूडकी सनत्कुमार उवाच

अथान्यच्छंभुचरितं प्रेमतः शृणु वै मुने ।

यस्य श्रवणमात्रेण शिवभक्तिर्दृढा भवेत् ॥

उत्पत्तिकी कथा सनत्कुमार बोले- हे मुने! अब आप शंकरजीका एक और चरित प्रेमपूर्वक सुनिये, जिसके सुननेमात्रसे शंकरजीके प्रति दृढ़ भक्ति उत्पन्न हो १ | जाती है ॥ १ ॥

पृष्ठ 944

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९ ३४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २७ शंखचूडाभिधो वीरो दानवो देवकंटकः । एक शंखचूड नामक दानव था, जो महावीर यथा शिवेन निहतो रणमूर्ध्नि त्रिशूलतः ॥ २ और देवताओंके लिये कण्टक था । शिवजीने त्रिशूलारे तच्छंभुचरितं दिव्यं पवित्रं पापनाशनम् शृणु व्यास सुसंप्रीत्या वच्मि सुस्नेहतस्तव मरीचेस्तनयो धातुः पुत्रो यः कश्यपो मुनिः स धर्मिष्ठः सृष्टिकर्त्ता विद्याज्ञप्तः प्रजापतिः दक्षः प्रीत्या ददौ तस्मै निजकन्यास्त्रयोदश तासां प्रसूतिः प्रसभं न कथ्या बहुविस्तृताः यत्र देवादिनिखिलं चराचरमभूज्जगत् । विस्तरात्तत्प्रवक्तुं च कः क्षमोऽस्ति त्रिलोकके

प्रस्तुतं शृणु वृत्तान्तं शंभुलीलान्वितं च यत् ।

तदेव कथयाम्यद्य शृणु भक्तिप्रवर्द्धनम् ॥

तासु कश्यपपत्नीषु दनुस्त्वेका वरांगना ।

महारूपवती साध्वी पतिसौभाग्यवर्द्धिता ॥

आसंस्तस्या दनोः पुत्रा बहवो बलवत्तराः ।

तेषां नामानि नोच्यन्ते विस्तारभयतो मुने ॥

तेष्वेको विप्रचित्तिस्तु महाबलपराक्रमः ।

तत्पुत्रो धार्मिको दंभो विष्णुभक्तो जितेन्द्रियः ॥

नासीत्तत्तनयो वीरस्ततश्चिंतापरोऽभवत् ।

शुक्राचार्यं गुरुं कृत्वा कृष्णमंत्रमवाप्य च ॥

तपश्चकार परमं पुष्करे लक्षवर्षकम् ।

कृष्णमंत्रं जजापैव दृढं बद्ध्वासनं चिरम् ॥

तपः प्रकुर्वतस्तस्य मूर्ध्ना निःसृत्य प्रज्वलत् ।

विससार च सर्वत्र तत्तेजो हि सुदुःसहम् ॥

तेन तप्ताः सुराः सर्वे मुनयो मनवस्तथा ।

सुनासीर पुरस्कृत्य ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥

प्रणम्य च विधातारं दातारं सर्वसंपदाम् ।

तुष्टुवुर्विकलाः प्रोचुः स्ववृत्तान्तं विशेषतः ॥

जिस प्रकार युद्धभूमिमें उसका वध किया, हे व्यासजी! । । उस पवित्र, पापनाशक तथा दिव्य चरित्रको ॥ ३ । अत्यन्त प्रेमपूर्वक सुनिये, मैं आपके स्नेहसे उसको आप कह रहा हूँ॥२-३ ॥ । पूर्व समयमें ब्रह्माजीके मरीचि नामक पुत्र हुए । ॥ ४ उन मरीचिके पुत्र जो कश्यप मुनि हुए, वे बड़े धर्मशील, सृष्टिकर्ता, विद्यावान् तथा प्रजापति थे ॥४ ॥

। दक्षने उन्हें प्रेमपूर्वक अपनी तेरह कन्याएँ प्रदान ॥ ५ कीं, उनकी बहुत - सी सन्तानें हुईं, जिन्हें विस्तारसे यहाँ कहना सम्भव नहीं है । उनसे ही सम्पूर्ण देवता ॥ ६ तथा चराचर जगत् उत्पन्न हुआ । तीनों लोकोंमें उनको विस्तारसे कहनेमें कौन समर्थ है? अब प्रस्तुत वृत्तान्तको सुनिये, जो शिवलीलासे युक्त तथा भक्तिको ७ बढ़ानेवाला है, मैं उसको कह रहा हूँ, सुनिये । कश्यपकी उन स्त्रियोंमें एक दनु नामवाली थी, जो सुन्दरी, महारूपवती, साध्वी एवं पतिके सौभाग्यसे ८ सम्पन्न थी॥५–८ ॥ उस दनुके अनेक बलवान् पुत्र थे । हे मुने! विस्तारके ९ भयसे मैं उनके नामोंको यहाँ नहीं बता रहा हूँ ॥ ९ ॥

उनमें एक विप्रचित्ति नामवाला दानव था, जो १० महाबली और पराक्रमी था । उसका दम्भ नामक पुत्र धार्मिक, विष्णुभक्त तथा जितेन्द्रिय हुआ । उसे कोई ११ पुत्र नहीं था, इसलिये वह चिन्ताग्रस्त रहता था । उसने शुक्राचार्यको गुरु बनाकर उनसे कृष्णमन्त्र प्राप्त करके पुष्कर क्षेत्रमें एक लाख वर्षपर्यन्त घोर तपस्या १२ की । उसने दृढ़तापूर्वक आसन लगाकर दीर्घकाल कृष्णमन्त्रका जप किया ॥ १०-१२ ॥ तपस्या करते हुए उस दैत्यके सिरसे एक १३ जलता हुआ दुःसह तेज निकलकर चारों ओर फैलने लगा ॥ १३ ॥

उस तेजसे सभी देवता, मुनि एवं मनुगण सन्तप्त १४ हो उठे और इन्द्रको आगेकर वे ब्रह्माजीकी शरणमें । गये । उन लोगोंने सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता ब्रह्माजीको | प्रणाम करके उनकी स्तुति की और व्याकुल होकर १५ । अपना वृत्तान्त विशेषरूपसे निवेदन किया ॥ १४-१५ ॥

पृष्ठ 945

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अ ० २७ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड ) ९ ३५ तदाकर्ण्य विधातापि वैकुंठं तैर्ययौ सह । उसे सुनकर ब्रह्मा भी उन देवताओंको तदेव विज्ञापयितुं निखिलेन हि विष्णवे ॥ १६ साथ लेकर उसे पूर्णरूपसे विष्णुसे कहनेके लिये

तत्र गत्वा त्रिलोकेशं विष्णुं रक्षाकरं परम् ।

प्रणम्य तुष्टुवुः सर्वे करों बद्ध्वा विनम्रकाः ॥

देवा ऊचुः

देवदेव न जानीमो जातं किं कारणं त्विह ।

संतप्ताः सकला जातास्तेजसा केन तद्वद ॥

तप्तात्मनां त्वमविता दीनबंधोऽनुजीविनाम् ।

रक्ष रक्ष रमानाथ शरण्यः शरणागतान् ॥

सनत्कुमार उवाच

इति श्रुत्वा वचो विष्णुर्ब्रह्मादीनां दिवौकसाम् ।

उवाच विहसन्प्रेम्णा शरणागतवत्सलः ॥

विष्णुरुवाच

सुस्वस्था भवताव्यग्रा न भयं कुरुतामराः ।

नोपप्लवा भविष्यन्ते लयकालो न विद्यते ॥

दानवो दंभनामा हि मद्भक्तः कुरुते तपः ।

पुत्रार्थी शमयिष्यामि तमहं वरदानतः ॥

सनत्कुमार उवाच

इत्युक्तास्ते सुराः सर्वे धैर्यमालंब्य वै मुने ।

सुस्थाः स्वस्वधामानि सर्वशः ॥

ययुर्ब्रह्मादयः अच्युतोऽपि वरं दातुं पुष्करं संजगाम ह । तपश्चरति यत्रासौ दंभनामा हि दानवः तत्र गत्वा वरं ब्रूहीत्युवाच परिसान्त्वयन् । गिरा सूनृता भक्तं जपन्तं स्वमनुं हरिः तच्छ्रुत्वा वचनं विष्णोर्दृष्ट्वा तं च पुरः स्थितम् प्रणनाम महाभक्त्या तुष्टाव च पुनः पुनः दंभ उवाच देवदेव नमस्तेऽस्तु पुंडरीकविलोचन वैकुण्ठलोक गये ॥१६ ॥

वहाँ जाकर सबकी रक्षा करनेवाले त्रिलोकेश १७ विष्णुको हाथ जोड़कर प्रणाम करके विनम्र होकर वे सब उनकी स्तुति करने लगे ॥१७ ॥

देवता बोले- हे देवदेव! हम नहीं जानते कि किस तेजसे हम सभी अत्यधिक सन्तप्त हो रहे हैं, १८ इसमें कौन - सा कारण है, उसे आप बताइये? हे दीनबन्धो! आप सन्तप्तचित्त अपने सेवकोंकी रक्षा करनेवाले हैं । १ ९ हे रमानाथ! आप [ सबको ] शरण देनेवाले हैं । हम शरणागतोंकी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ॥ १८-१९ ॥ सनत्कुमार बोले- ब्रह्मादि देवताओंकी यह बात सुनकर शरणागतवत्सल भगवान् विष्णुजी हँसते २० हुए प्रेमपूर्वक कहने लगे - ॥ २० ॥

विष्णुजी बोले- हे देवताओ! आपलोग निश्चिन्त तथा शान्त रहिये और भयभीत न होइये, प्रलयकाल २१ अभी उपस्थित नहीं हुआ है और न तो कोई उपद्रव ही होनेवाला है । मेरा भक्त दम्भ नामक दानव तप कर रहा है, वह पुत्र चाहता है, इसलिये मैं उसे २२ वरदान देकर शान्त कर दूँगा॥२१-२२ ॥ सनत्कुमार बोले — हे मुने! विष्णुजीके ऐसा कहनेपर ब्रह्मा आदि वे सभी देवता धैर्य धारणकर पूर्णरूपसे स्वस्थ होकर अपने - अपने निवासस्थानको २३ चले गये ॥२३ ॥

भगवान् विष्णु भी वर देनेके लिये पुष्कर क्षेत्रमें गये, ॥ २४ जहाँ वह दम्भ नामक दानव तप कर रहा था ॥ २४ ॥

वहाँ जाकर विष्णुने अपने मन्त्रका जप करते हुए सान्त्वना देते हुए मधुर वाणीमें कहा— -वर ॥ २५ उस भक्तको यह वचन सुनकर तथा उनको माँगो । तब विष्णुका । अपने सामने खड़ा देखकर उसने महाभक्तिसे उन्हें प्रणाम ॥ २६ किया तथा बार - बार उनकी स्तुति की— ॥ २५-२६ ॥ दम्भ बोला- हे देवदेव! हे कमललोचन! रमानाथ! हे त्रिलोकेश! आपको प्रणाम है, मेरे ऊपर ॥ आप मुझे महाबली, पराक्रमी, तीनों रमानाथ त्रिलोकेश कृपां कुरु ममोपरि ॥ २७ कृपा कीजिये जीतनेवाला, वीर, देवताओंके लिये अजेय तथा लोकोंको

स्वभक्तं तनयं देहि महाबलपराक्रमम् । भक्तिसे युक्त पुत्र प्रदान कीजिये ॥ २७-२८ ॥

त्रिलोकजयिनं दिवौकसाम् ॥ २८ आपकी वीरमजेयं च

पृष्ठ 946

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९ ३६ सनत्कुमार उवाच इत्युक्तो दानवेन्द्रेण तं वरं प्रददौ हरिः निवर्त्य चोग्रतपसः ततः सोऽन्तरधान्मुने ॥ गते हरौ दानवेन्द्रः कृत्वा तस्यै दिशे नमः जगाम स्वगृहं सिद्धतपाः पूर्णमनोरथः

कालेनाल्पेन तत्पत्नी सगर्भा भाग्यवत्यभूत् ।

रराज तेजसात्यन्तं रोचयंती गृहान्तरम् ॥

सुदामा नाम गोपो यो कृष्णस्य पार्षदाग्रणीः ।

तस्या गर्भे विवेशासौ राधाशप्तश्च यन्मुने ॥

असूत समये साध्वी सुप्रभं तनयं ततः ।

जातकं सुचकारासौ पिताऽऽहूय मुनीन्बहून् ॥

उत्सवः सुमहानासीत्तस्मिञ्जाते द्विजोत्तम ।

नाम चक्रे पिता तस्य शंखचूडेति सद्दिने ॥

पितुर्गेहे स ववृधे शुक्लपक्षे यथा शशी ।

शैशवेऽभ्यस्तविद्यस्तु स बभूव सुदीप्तिमान् ॥

स बालक्रीडया नित्यं पित्रोर्हर्षं ततान ह ।

प्रियो बभूव सर्वेषां कुलजानां विशेषतः ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २८ सनत्कुमार बोले- दानवेन्द्रके इस प्रकार कहनेपर । । नारायणने उसे वैसा ही वरदान दिया और हे २ ९ तपस्यासे विरतकर वे अन्तर्धान हो गये मुने! उसे ॥ २ ९ ॥ । भगवान्‌के अन्तर्धान हो जानेपर सिद्ध ॥ ३० । तपवाला तथा पूर्ण मनोरथवाला वह दानव हुए । । दिशाको नमस्कार करके अपने घर चला गया ॥ उस इसके बाद थोड़े ही समयमें उसकी भाग्यवती ३० ॥ ३१ पत्नीने गर्भ धारण किया और अपने तेजसे घरको प्रकाशित करती हुई वह शोभा प्राप्त करने लगी ॥ ३१ ॥

हे मुने! सुदामा नामक गोप, जो कृष्णका प्रधान ३२ पार्षद था, जिसे राधाने शाप दिया था, वही उसके गर्भमें आया । समय आनेपर उस साध्वीने तेजस्वी पुत्रको जन्म दिया । इसके अनन्तर पिताने बहुत - से मुनियोंको ३३ बुलाकर उसका जातकर्म संस्कार कराया ॥ ३२-३३ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ! उसके उत्पन्न होनेपर महान् उत्सव ३४ हुआ और पिताने शुभ दिनमें उसका शंखचूड — यह नाम रखा । वह [ शंखचूड ] पिताके घरमें शुक्लपक्षके चन्द्रमाके ३५ समान बढ़ने लगा और बाल्यावस्थामें ही विद्याका अभ्यासकर अत्यन्त तेजस्वी हो गया ॥ ३४-३५ ॥ वह अपनी बालक्रीडासे माता - पिताके हर्षको नित्य बढ़ाने लगा । वह सभीको प्रिय हुआ और अपने ३६ । कुटुम्बियोंको विशेष प्रिय हुआ ॥३६ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे शंखचूडोत्पत्तिवर्णनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें शंखचूडोत्पत्तिवर्णन नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २७ ॥

अथाष्टाविंशोऽध्यायः शंखचूडकी पुष्कर - क्षेत्रमें तपस्या, ब्रह्माद्वारा उसे वरकी प्राप्ति, ब्रह्माकी प्रेरणासे शंखचूडका तुलसीसे विवाह सनत्कुमार उवाच सनत्कुमार बोले- इसके बाद उस शंखचूडने ततश्च शंखचूडोऽसौ जैगीषव्योपदेशतः । | जैगीषव्य महर्षिके उपदेशसे ब्रह्माजीके पुष्कर-तपश्चकार सुप्रीत्या ब्रह्मणः पुष्करे चिरम् ॥ १ क्षेत्रमें प्रीतिपूर्वक बहुत कालपर्यन्त तप किया । उसने गुरुदत्तां ब्रह्मविद्यां जजाप नियतेन्द्रियः | एकाग्रमन होकर इन्द्रियों तथा उनके विषयोंको स एकाग्रमना । । जीतकर गुरुके द्वारा दी गयी ब्रह्मविद्याका जप करना

भूत्वा करणानि निगृह्य च ॥ २ । प्रारम्भ किया॥१-२ ॥

पृष्ठ 947

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अ ० २८ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड )

तपन्तं पुष्करे तं वै शंखचूडं च दानवम् ।

वरं दातुं जगामाशु ब्रह्मा लोकगुरुर्विभुः ॥

वरं ब्रूहीति प्रोवाच दानवेन्द्रं विधिस्तदा ।

स दृष्ट्वा तं ननामातिनम्रस्तुष्टाव सगिरा ॥

वरं ययाचे ब्रह्माणमजेयत्वं दिवौकसाम् ।

तथेत्याह विधिस्तं वै सुप्रसन्नेन चेतसा ॥

श्रीकृष्णकवचं दिव्यं जगन्मंगलमंगलम् ।

दत्तवान् शंखचूडाय सर्वत्र विजयप्रदम् ॥

बदरीं संप्रयाहि त्वं तुलस्या सह तत्र वै ।

विवाहं कुरु तत्रैव सा तपस्यति कामतः ॥

धर्मध्वजसुता सेति संदिदेश च तं विधिः ।

अन्तर्धानं जगामाशु पश्यतस्तस्य तत्क्षणात् ॥

ततः स शंखचूडो हि तपः सिद्धो ऽतिपुष्करे ।

गले बबंध कवचं जगन्मंगलमंगलम् ॥

आज्ञया ब्रह्मणः सोऽपि तपः सिद्धमनोरथः ।

समाययौ प्रहृष्टास्यस्तूर्णं बदरिकाश्रमम् ॥

यदृच्छयाऽऽगतस्तत्र शंखचूडश्च दानवः ।

तपश्चरन्ती तुलसी यत्र धर्मध्वजात्मजा ॥

सुरूपा सुस्मिता तन्वी शुभभूषणभूषिता ।

सकटाक्षं ददर्शासौ तमेव पुरुषं परम् ॥

दृष्ट्वा तां ललितां रम्यां सुशीलां सुन्दरीं सतीम् ।

तत्समीपे तु मथुरं तामुवाच सः ॥

उवास शंखचूड उवाच का त्वं कस्य सुता त्वं हि किं करोषि स्थितात्र किम् । मौनीभूता किंकरं करं मां मां संभावितुमिहार्हसि ॥ सनत्कुमार उवाच इत्येवं वचनं सकामं तमुवाच सा ॥ श्रुत्वा ९ ३७ इस प्रकार पुष्करमें तप करते हुए उस शंखचूड ३ दानवको वर देनेके लिये लोकगुरु विभु ब्रह्मा शीघ्र वहाँ गये ॥३ ॥

ब्रह्माने जब उस दानवेन्द्रसे कहा - ' वर माँगो ' ४ तब वह उन्हें देखकर अत्यधिक विनम्र होकर श्रेष्ठ वाणीसे उनकी स्तुति करने लगा । उसके बाद उसने ब्रह्मासे वर माँगा कि देवगण मुझे जीत ५ ब्रह्माजीने प्रसन्न मनसे उससे कहा होगा ॥ ४-५ ॥ उन्होंने उस शंखचूडको जगत्के ६ मंगल बनानेवाला ( ' जगन्मंगलमंगल ' सर्वत्र विजय प्रदान करनेवाला दिव्य प्रदान किया ॥ ६ ॥

' तुम बदरिकाश्रम चले जाओ और न सकें । तब कि ऐसा ही मंगलको भी नामक ) और श्रीकृष्णकवच वहाँ तुलसीके ७ साथ विवाह करो । वह पतिकी कामनासे वहींपर तप कर रही है । वह धर्मध्वजकी कन्या है ' – इस प्रकार ब्रह्माजीने उससे कहा और उसके देखते - देखते शीघ्र ८ ही उसी क्षण अन्तर्धान हो गये॥७-८ ॥ तदनन्तर तपस्यासे सिद्धि प्राप्तकर उस शंखचूडने ९ वहीं पुष्करमें ही जगत्के परम कल्याणकारी उस कवचको गलेमें बाँध लिया । इसके बाद तपस्यासे सिद्ध मनोरथवाला प्रसन्नमुख वह शंखचूड ब्रह्माकी १० आज्ञासे शीघ्र ही बदरिकाश्रममें आया ॥ ९ -१० ॥ वह दानव शंखचूड अपनी इच्छासे घूमते हुए ११ वहाँ आ गया, जहाँ धर्मध्वजकी कन्या तुलसी तप कर रही थी । सुन्दर रूपवाली, मन्द मन्द मुसकानवाली, सूक्ष्म कटिप्रदेशवाली तथा शुभ भूषणोंसे भूषित उसने उस १२ श्रेष्ठ पुरुषको कटाक्षपूर्ण दृष्टिसे देखा ॥ ११-१२ ॥ तब शंखचूड भी उस मनोहर, रम्य, सुशील, एवं सतीको देखकर उसके समीप स्थित हो १३ सुन्दरी गया और मधुर वाणीमें उससे कहने लगा- ॥ १३ ॥

शंखचूड बोला – [ हे देवि! ] तुम कौन हो, किसकी कन्या हो, तुम यहाँ क्या कर रही हो और यहाँ क्यों बैठी हो? तुम मुझे अपना दास १४ मौन होकर करो ॥१४ ॥

समझकर सम्भाषण सनत्कुमार बोले — इस प्रकारका वचन सुनकर सकामभावसे उससे कहा- ॥ १५ ॥

१५ उस तुलसीने

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९ ३८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २८ तुलस्युवाच तुलसी बोली — मैं धर्मध्वजकी कन्या हूँ और धर्मध्वजसुताहं च तपस्यामि तपस्विनी । । इस तपोवनमें तपस्या करती हूँ । तुम कौन तपोवने च तिष्ठामि कस्त्वं गच्छ यथासुखम् ॥ १६ सुखपूर्वक यहाँसे चले जाओ ॥ १६ ॥ हो?

नारीजातिर्मोहिनी च ब्रह्मादीनां विषोपमा । नारीजाति ब्रह्मा आदिको भी मोह लेनेवाली विषके समान, निन्दनीय, दूषित करनेवाली, मायारूपिणी, निन्द्या दोषकरी माया श्रृंखला ह्यनुशायिनाम् ॥ १७ सनत्कुमार उवाच इत्युक्त्वा तुलसी तं च सरसं विरराम ह दृष्ट्वा तां सस्मितां सोऽपि प्रवक्तुमुपचक्रमे शंखचूड उवाच त्वया यत्कथितं देवि न च सर्वमलीककम् । किञ्चित्सत्यमलीकं च किंचिन्मत्तो निशामय

पतिव्रताः स्त्रियो याश्च तासां मध्ये त्वमग्रणीः ।

न चाहं पापदृक्कामी तथा त्वं नेति धीर्मम ॥

आगच्छामि त्वत्समीपमाज्ञया ब्रह्मणोऽधुना ।

गांधर्वेण विवाहेन त्वां ग्रहीष्यामि शोभने ॥

शंखचूडोऽहमेवास्मि देवविद्रावकारकः ।

मां न जानासि किं भद्रे न श्रुतोऽहं कदाचन ॥

दनुवंश्यो विशेषेण दम्भपुत्रश्च दानवः ।

सुदामा नाम गोपोऽहं पार्षदश्च हरेः पुरा ॥

अधुना दानवेन्द्रोऽहं राधिकायाश्च शापतः ।

जातिस्रोऽहं जानामि सर्वं कृष्णप्रभावतः ॥

सनत्कुमार उवाच एवमुक्त्वा शंखचूडो विरराम च तत्पुरः ।

दानवेन्द्रेण सेत्युक्ता वचनं सत्यमादरात् ।

सस्मितं तुलसी तुष्टा प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥

तुलस्युवाच

त्वयाहमधुना सत्त्वविचारेण पराजिता ।

स धन्यः पुरुषो लोके न स्त्रिया यः पराजितः ॥

तथा ज्ञानियोंके लिये श्रृंखलाके समान होती है ॥१७ ॥

सनत्कुमार बोले — इस प्रकार उससे मधुर । वचन बोलकर तुलसी चुप हो गयी । तब मन्द - मन्द ॥ १८ मुसकानवाली उस तुलसीकी ओर देखकर वह भी कहने लगा -॥१८ ॥

शंखचूड बोला - – हे देवि! तुमने जो कहा है, वह सब झूठ नहीं है, उसमें कुछ सत्य है और कुछ ॥ १ ९ झूठ भी है, अब कुछ मुझसे सुनो ॥१ ९ ॥ संसारमें जितनी भी पतिव्रता स्त्रियाँ हैं, उनमें तुम २० अग्रगण्य हो । मैं पापदृष्टिवाला और कामी नहीं हूँ, उसी प्रकार तुम भी वैसी नहीं हो, मेरी तो ऐसी ही बुद्धि है ॥२० ॥

हे शोभने! मैं इस समय ब्रह्माजीकी आज्ञासे २१ तुम्हारे पास आया हूँ और गान्धर्व विवाहके द्वारा तुम्हें ग्रहण करूँगा । हे देवि! मैं देवताओंको भगा देनेवाला शंखचूड नामक दैत्य हूँ । हे भद्रे! क्या तुम मुझे नहीं २२ जानती और क्या तुमने मेरा नाम कभी नहीं सुना है? ॥ २१-२२ ॥ मैं विशेष करके दनुके वंशमें उत्पन्न हुआ हूँ २३ और दम्भका पुत्र शंखचूड नामक दानव हूँ । मैं पूर्व समयमें श्रीकृष्णका पार्षद सुदामा नामक गोप था ॥ २३ ॥

राधिकाके शापसे मैं इस समय दैत्यराज हूँ । मुझे २४ अपने पूर्वजन्मका स्मरण है, मैं श्रीकृष्णके प्रभावसे सब कुछ जानता हूँ ॥२४ ॥

सनत्कुमार बोले- इस प्रकार कहकर शंखचूड । चुप हो गया । तब दानवेन्द्रके द्वारा आदरपूर्वक सत्य | वचन कहे जानेपर वह तुलसी सन्तुष्ट हो गयी और २५ मन्द - मन्द मुसकराती हुई कहने लगी ॥ २५ ॥

तुलसी बोली- आपने अपने सात्त्विक विचारसे । इस समय मुझे पराजित कर दिया है । संसारमें वह २६ । पुरुष धन्य है, जो स्त्रीसे पराजित नहीं होता ॥ २६ ॥

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अ ० २८ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड ) ९ ३ ९ सत्क्रियोऽप्यशुचिर्नित्यं स पुमान्यः स्त्रिया जितः । जिस पुरुषको स्त्रीने जीत लिया, वह सत्कर्ममें निन्दन्ति पितरो देवा मानवाः सकलाश्च तम् ॥ २७ निरत होनेपर भी नित्य अपवित्र है देवता पितर तथा

शुध्येद्विप्रो दशाहेन जातके मृतसूतके ।

क्षत्रियो द्वादशाहेन वैश्यः पञ्चदशाहतः ॥ २८

शूद्रो मासेन शुध्येत्तु हीति वेदानुशासनम् ।

न शुचिः स्त्रीजितः क्वापि चितादाहं विना पुमान् ॥ २ ९

न गृह्णन्तीच्छया तस्मात्पितरः पिण्डतर्पणम् ।

न गृह्णन्ति सुरास्तेन दत्तं पुष्पफलादिकम् ॥ ३०

तस्य किं ज्ञानसुतपोजपहोमप्रपूजनैः ।

विद्यया दानतः किं वा स्त्रीभिर्यस्य मनो हृतम् ॥ ३१

विद्याप्रभावज्ञानार्थं मया त्वं च परीक्षितः ।

कृत्वा कांतपरीक्षां वै वृणुयात्कामिनी वरम् ॥ ३२

सनत्कुमार उवाच

इत्येवं प्रवदन्त्यां तु तुलस्यां तत्क्षणे विधिः ।

तत्राजगाम संस्स्रष्टा प्रोवाच वचनं ततः ॥ ३३

ब्रह्मोवाच

किं करोषि शंखचूड संवादमनया सह ।

गांधर्वेण विवाहेन त्वमस्या ग्रहणं कुरु ॥ ३४

त्वं वै पुरुषरत्नं च स्त्रीरत्नं च त्वियं सती ।

विदग्धाया विदग्धेन संगमो गुणवान् भवेत् ॥ ३५

निर्विरोधं सुखं राजन् को वा त्यजति दुर्लभम् ।

स पशुर्नात्र संशयः ॥ ३६

योऽविरोधसुखत्यागी

किं त्वं परीक्षसे कांतमीदृशं गुणिनं सति ।

देवानामसुराणां च दानवानां विमर्दकम् ॥ ३७

अनेन सार्धं सुचिरं विहारं कुरु सर्वदा ।

स्थाने स्थाने यथेच्छं च सर्वलोकेषु सुन्दरि ॥ ३८

,, मनुष्य सभी लोग उसकी निन्दा करते हैं ॥ २७ ॥

जनन एवं मरणके सूतकमें ब्राह्मण दस दिनमें शुद्ध होता है, क्षत्रिय बारह दिनमें, वैश्य पन्द्रह दिनमें और शूद्र एक महीनेमें शुद्ध होता है - ऐसी वेदकी आज्ञा है, परंतु स्त्रीके द्वारा विजित पुरुष बिना चितादाह हुए कभी भी शुद्ध नहीं होता ॥ २८-२९ ॥ उसके तर्पणका जल एवं पिण्ड भी पितरलोग इच्छापूर्वक ग्रहण नहीं करते और देवता उसके द्वारा दिये गये पुष्प, फल आदिको ग्रहण नहीं करते हैं । उसके ज्ञान, श्रेष्ठ तप, जप, होम, पूजन, विद्या एवं दानसे क्या लाभ है, जिसके मनको स्त्रियोंने हर लिया हो? ॥३०-३१ ॥ मैंने आपकी विद्याका प्रभाव जाननेके लिये ही आपकी परीक्षा ली है; क्योंकि स्वामीकी परीक्षा करके ही स्त्रीको अपने पतिका वरण करना चाहिये ॥ ३२ ॥

सनत्कुमार बोले- अभी तुलसी इस प्रकार कह ही रही थी कि जगत्स्रष्टा ब्रह्माजी वहाँ आ गये और यह वचन कहने लगे - ॥ ३३ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे शंखचूड! तुम इसके साथ क्या संवाद कर रहे हो? गान्धर्वविवाहके द्वारा तुम । इसको ग्रहण करो ॥३४ ॥

तुम पुरुषोंमें रत्न हो और यह सती भी स्त्रियोंमें रत्न है । चतुरोंके साथ चतुरका संगम गुणयुक्त होता है ॥ ३५ ॥

हे राजन्! यदि विरोधके बिना ही दुर्लभ सुख प्राप्त होता हो तो ऐसा कौन है, जो उसका त्याग करेगा? जो निर्विरोध सुखका त्याग करनेवाला है, वह पशु है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३६ ॥

हे सति! तुम देवताओं, असुरों तथा दानवोंका मर्दन करनेवाले इस प्रकारके गुणवान् पतिकी परीक्षा क्यों करती हो? ॥ ३७ ॥

हे सुन्दरि! तुम इसके साथ सभी लोकोंमें स्थान - स्थानपर चिरकालतक सर्वदा अपनी इच्छाके विहार करो ॥ ३८ ॥

अनुसार

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९ ४० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २ ९ अंते प्राप्स्यति गोलोके श्रीकृष्णं पुनरेव सः । अन्तमें वह गोलोकमें श्रीकृष्णको पुनः चतुर्भुजं च वैकुण्ठे मृते तस्मिंस्त्वमाप्स्यसि ॥ ३ ९ करेगा और उसके मर जानेपर तुम भी वैकुण्ठमें प्राप्त सनत्कुमार उवाच इत्येवमाशिषं दत्त्वा स्वालयं तु ययौ विधिः गांधर्वेण विवाहेन जगृहे तां च दानवः एवं विवाह्य तुलसीं पितुः स्थानं जगाम ह स रेमे रमया सार्धं वासगेहे मनोरमे इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे चतुर्भुज श्रीकृष्णको प्राप्त करोगी ॥३ ९ ॥ सनत्कुमार बोले- इस प्रकार यह आशीर्वाद । । देकर ब्रह्मा अपने लोकको चले गये और उस दानवने गान्धर्वविवाहके द्वारा उसे ग्रहण किया ॥ ४० ॥

॥ ४० इस प्रकार तुलसीसे विवाहकर वह अपने । पिताके घर चला गया और अपने मनोहर भवनमें उस ॥ ४१ । सुन्दरीके साथ रमण करने लगा ॥४१ ॥

युद्धखण्डे शंखचूडतप: करणविवाहवर्णनं नामाष्टविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें शंखचूडकी तपस्या तथा विवाहका वर्णन नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २८ ॥

अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः शंखचूडका राज्यपदपर अभिषेक, उसके द्वारा देवोंपर विजय, दुखी देवोंका ब्रह्माजीके साथ वैकुण्ठगमन, बताना और विष्णु सनत्कुमार उवाच

स्वगेहमागते तस्मिन् शंखचूडे विवाहिते ।

तप: कृत्वा वरं प्राप्य मुमुदुर्दानवादयः ॥

स्वलोकादाशु निर्गत्य गुरुणा स्वेन संयुताः ।

सर्वेऽसुराः संमिलिताः समाजग्मुस्तदन्तिकम् ॥

प्रणम्य तं सविनयं संस्तुत्य विविधादरात् ।

स्थितास्तत्रैव सुप्रीत्या मत्वा तेजस्विनं विभुम् ॥

सोऽपि दम्भात्मजो दृष्ट्वाऽऽगतं कुलगुरुं च तम् ।

प्रणनाम महाभक्त्या साष्टांगं परमादरात् ॥

अथ शुक्रः कुलाचार्यों दृष्ट्वाशिषमनुत्तमाम् ।

वृत्तान्तं कथयामास देवदानवयोस्तदा ॥

स्वाभाविकं च तद्वैरमसुराणां पराभवम्

।

विजयं निर्जराणां च जीवसाहाय्यमेव च ॥

विष्णुद्वारा शंखचूडके पूर्वजन्मका वृत्तान्त तथा ब्रह्माका शिवलोक 1 गमन सनत्कुमार बोले - [ हे व्यास! ] तपस्या करके वर प्राप्त करनेके उपरान्त विवाह किये हुए उस १ शंखचूडके घर आनेपर दानव आदि अत्यन्त प्रसन्न हो गये ॥१ ॥

अपने लोकसे शीघ्र निकलकर सभी असुर २ एकत्रित हो अपने गुरु शुक्राचार्यको साथ लेकर उसके पास आये और विनयपूर्वक उसे प्रणाम करके ३ | आदरपूर्वक उसकी स्तुति करते हुए उसको समर्थ एवं तेजस्वी मानकर प्रसन्नतापूर्वक वहींपर स्थित हो गये । | दम्भके पुत्र शंखचूडने भी अपने घर आये हुए उन ४ कुलगुरुको देखकर बड़े आदरसे महाभक्तिपूर्वक उन्हें साष्टांग प्रणाम किया॥२-४ ॥ उसे तत्पश्चात् दैत्योंके कुलाचार्य शुक्रने ५ देखकर उत्तम आशीर्वाद प्रदान किया और देवताओं | तथा दानवोंका वृत्तान्त उससे कहा । उन्होंने देव-| दानवके स्वाभाविक वैर, देवताओंकी विजय, असुरोंकी पराजय तथा बृहस्पतिके द्वारा देवताओंकी सहायताका ६ | वर्णन किया ॥ ५-६ ॥