शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 961–970

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 961–970

पृष्ठ 961

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अ ० ३१ ] रुद्रसंहिता ( तेन निःसारिता देवाः सेन्द्रा नित्यं प्रपीडिताः । हृताधिकारा विकृताः सर्वे याता दिशो दश । ३५

ब्रह्माच्युतौ तदर्थे हीहागतौ शरणं मम ।

तेषां क्लेशविनिर्मोक्षं करिष्ये नात्र संशयः ॥ ३६

सनत्कुमार उवाच

इत्युक्त्वा शंकरः कृष्णं पुनः प्रोवाच सादरम् ।

हरिं विधिं समाभाष्य वचनं क्लेशनाशनम् ॥ ३७

शिव उवाच

हे हरे हे विधे प्रीत्या ममेदं वचनं शृणु ।

गच्छतं त्वरितं तातौ देवानंदाय निर्भयम् ॥ ३८

कैलासवासिनं रुद्रं मद्रूपं पूर्णमुत्तमम् ।

देवकार्यार्थमुद्भूतं पृथगाकृतिधारिणम् ॥ ३ ९

एतदर्थे हि मद्रूपः परिपूर्णतमः प्रभुः ।

कैलासे भक्तवशतः संतिष्ठति गिरौ हरे ॥ ४०

मत्तस्त्वत्तो न भेदोऽस्ति युवयोः सेव्य एव सः ।

चराचराणां सर्वेषां सुरादीनां च सर्वदा ॥ ४१

आवयोर्भेदकर्ता यः स नरो नरकं व्रजेत् ।

इहापि प्राप्नुयात्कष्टं पुत्रपौत्रविवर्जितः ॥ ४२

इत्युक्तवन्तं दुर्गेशं प्रणम्य च मुहुर्मुहुः ।

राधया सहितः कृष्णः स्वस्थानं सगणो ययौ ॥ ४३

। हरिर्ब्रह्मा च तौ व्यास सानन्दौ गतसाध्वसौ ।

मुहुर्मुहुः प्रणम्येशं वैकुंठं ययतुर्द्रुतम् ॥ ४४

। तन्त्रागत्याखिलं वृत्तं देवेभ्यो विनिवेद्य तौ ।

तानादाय ब्रह्मविष्णू कैलासं ययतुर्गिरिम् ॥ ४५

तत्र दृष्ट्वा महेशानं पार्वतीवल्लभं प्रभुम् ।

। दीनरक्षात्तदेहं ॥४६

च सगुणं देवनायकम् | तुष्टुवुः

। करौ पूर्ववत्सर्वे भक्त्या गद्गदया गिरा ।

। बद्ध्वा नतस्कंधा विनयेन समन्विताः ॥ ४७

युद्धखण्ड ) ९ ५१ उसने इन्द्रसहित सभी देवताओंको पीड़ा देकर निकाल दिया है, जिससे वे देवता अधिकारविहीन एवं व्याकुल होकर दसों दिशाओंमें भटक रहे हैं ॥ ३५ ॥

उसीके वधके निमित्त ये ब्रह्मा तथा विष्णु मेरी शरणमें यहाँ आये हैं, मैं इनका दुःख दूर करूँगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ३६ ॥

सनत्कुमार बोले— [ हे व्यास! ] श्रीकृष्णसे इतना कहकर भगवान् शंकर ब्रह्मा तथा विष्णुको सम्बोधित करके आदरपूर्वक क्लेशनाशक वचन पुन: कहने लगे— ॥३७ ॥

शिवजी बोले- हे विष्णो! हे ब्रह्मन्! आप दोनों मेरी बात सुनिये । देवताओंको भयरहित करनेके लिये शीघ्र ही आप दोनों कैलासपर्वतपर जायँ, जहाँ मेरे पूर्ण रूप रुद्रका निवास है । मैंने ही देवताओंका कार्य करने के लिये पृथक् रूपको धारण किया है ॥ ३८-३९ ॥ हे हरे! परिपूर्णतम एवं भक्तपराधीन मुझ प्रभुका ही वह रुद्ररूप देवताओंके कार्यके लिये कैलासपर्वतपर विराजमान है । मुझमें एवं आपमें कोई भेद नहीं है । मेरा वह रुद्ररूप आप दोनोंका, चराचर जगत्का, सभी देवताओं एवं मुनियोंका सर्वदा सेव्य है॥४०-४१ ॥ जो मनुष्य हम दोनोंमें भेद रखेगा, वह नरकगामी होगा और वह इस लोकमें पुत्र - पौत्रादिसे रहित होकर नाना प्रकारका क्लेश प्राप्त करेगा । ऐसा कहते हुए | गौरीपतिको बार - बार प्रणामकर श्रीकृष्ण राधा तथा गणोंके साथ अपने स्थानको चले गये॥४२-४३ ॥ हे व्यासजी! इसी प्रकार वे ब्रह्मा तथा विष्णु भी सन्देहरहित हो शिवजीको बारंबार प्रणामकर आनन्दके साथ शीघ्र वैकुण्ठ चले गये ॥४४ ॥

वे ब्रह्मा तथा विष्णु वहाँ आकर सारा वृत्तान्त देवताओंसे कहकर तथा उन्हें साथ लेकर कैलासपर्वतपर गये ॥ ४५ ॥

दीनोंकी रक्षा करनेके लिये सगुण रूपसे शरीर धारण किये हुए देवाधिपति पार्वतीवल्लभ महेश्वर प्रभुको वहाँ देखकर सभी देवताओंने पूर्वकी भाँति हाथ जोड़कर विनयसे युक्त होकर सिर झुकाकर गद्गद वाणीसे भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति करना प्रारम्भ किया ॥ ४६-४७ ॥

पृष्ठ 962

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९ ५२ देवा ऊचुः देवदेव महादेव गिरिजानाथ शंकर वयं त्वां शरणापन्ना रक्ष देवान्भयाकुलान् ॥ शंखचूडं दानवेन्द्रं जहि देवनिषूदनम् । तेन विक्लाविता देवाः संग्रामे च पराजिताः

हृताधिकाराः कुतले विचरंति यथा नराः ।

देवलोको हि दुर्दृश्यस्तेषामासीच्च तद्भयात् ॥

दीनोद्धार कृपासिन्धो देवानुद्धर संकटात् ।

शक्रं भयान्महेशान हत्वा तं दानवाधिपम् ॥

इति श्रुत्वा वचः शंभुर्देवानां भक्तवत्सलः ।

उवाच विहसन् वाण्या मेघनादगभीरया ॥

श्रीशंकर उवाच

हे हरे हे विधे देवा: स्वस्थानं गच्छत ध्रुवम् ।

शंखचूडं वधिष्यामि सगणं नात्र संशयः ॥

सनत्कुमार उवाच

इत्याकर्ण्य महेशस्य वचः पीयूषसंनिभम् ।

ते सर्वे प्रमुदा ह्यासन्नष्टं मत्वा च दानवम् ॥

हरिर्जगाम वैकुंठं सत्यलोके विधिस्तदा ।

प्रणिपत्य महेशं च सुराद्याः स्वपदं ययुः ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३२ देवता बोले – हे देवदेव! हे महादेव । । गिरिजानाथ! हे शंकर! हम सभी देवता आपकी! हे शरण में ४८ आये हैं, भयसे व्याकुल देवताओंकी रक्षा कीजिये । देवताओंको कष्ट देनेवाले दैत्यराज शंखचूडका ॥ ४ ९ । वध कीजिये, उसने देवताओंको व्याकुल कर दिया है और युद्धमें पराजित कर दिया है । उसने देवताओंके समस्त अधिकार छीन लिये हैं, जिससे वे लोग मनुष्योंकी भाँति पृथ्वीपर भटक रहे हैं और उसके ५० भयसे उनके लिये देवलोकका देखनातक दुर्लभ हो गया है ॥ ४ ९ -५० ॥ अतः दीनोंका उद्धार करनेवाले हे कृपासिन्धो! इस ५१ संकटसे देवताओंका उद्धार कीजिये और उस दानवेन्द्रका वधकर इन्द्रको भयसे मुक्त कीजिये । देवताओंके इस वचनको सुनकर हँसते हुए भक्तवत्सल भगवान् शंकरने ५२ मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा— ॥ ५१-५२ ॥ श्रीशंकरजी बोले- हे विष्णो! हे ब्रह्मन्! हे देवगण! आपलोग अपने स्थानको जाइये, मैं सेनासहित ५३ उस शंखचूडका वध अवश्य करूँगा, इसमें सन्देह नहीं है ॥५३ ॥

सनत्कुमार बोले – शंकरकी इस अमृततुल्य वाणीको सुनकर सभी देवता दैत्योंको मरा जानकर ५४ अत्यन्त प्रसन्न हो गये ॥५४ ॥

इसके बाद शंकरजीको प्रणामकर विष्णु वैकुण्ठलोक एवं ब्रह्मा सत्यलोक चले गये तथा ५५ देवगण अपने - अपने स्थानोंको चले गये ॥५५ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे शंखचूडवधे शिवोपदेशो नामैकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें शंखचूडवधके अन्तर्गत शिवोपदेशवर्णन नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३१ ॥

अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः भगवान् शिवके द्वारा शंखचूडको समझानेके लिये गन्धर्वराज चित्ररथ ( पुष्पदन्त ) - को दूतके रूपमें भेजना, शंखचूडद्वारा सन्देशकी अवहेलना और युद्ध करनेका अपना निश्चय बताना, पुष्पदन्तका वापस आकर सारा वृत्तान्त शिवसे निवेदित करना लिये सनत्कुमार उवाच सनत्कुमार बोले- तब दुष्टोंके अथेशानो महारुद्रो दुष्टकालः सतां गतिः । | कालस्वरूप तथा सज्जनोंके रक्षक महारुद्र ईश्वरने शंखचूडवधं चित्ते निश्चिकाय सुरेच्छया ॥ ९ देवताओंकी इच्छासे अपने मनमें शंखचूडके व वधका

पृष्ठ 963

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अ ० ३२ ] रुद्रसंहिता (

दूतं कृत्वा चित्ररथं गंधर्वेश्वरमीप्सितम् ।

शीघ्रं प्रस्थापयामास शंखचूडांतिके मुदा ॥ २

सर्वेश्वराज्ञया दूतो ययौ तन्नगरं च सः ।

महेन्द्रनगरोत्कृष्टं कुबेरभवनाधिकम् ॥ ३

गत्वा ददर्श तन्मध्ये शंखचूडालयं वरम् ।

राजितं द्वादशैर्द्वारैर्द्वारपालसमन्वितम् ॥ ४

स दृष्ट्वा पुष्पदन्तस्तु वरं द्वारं ददर्श सः ।

कथयामास वृत्तान्तं द्वारपालाय निर्भयः ॥ ५

अतिक्रम्य च तद् द्वारं जगामाभ्यन्तरे मुदा ।

अतीव सुन्दरं रम्यं विस्तीर्णं समलंकृतम् ॥ ६

स गत्वा शंखचूडं तं ददर्श दनुजाधिपम् ।

वीरमंडलमध्यस्थं रत्नसिंहासनस्थितम् ॥ ७

दानवेन्द्रैः परिवृतं सेवितं च त्रिकोटिभिः ।

शतकोटिभिरन्यैश्च भ्रमद्भिः शस्त्रपाणिभिः ॥ ८

एवंभूतं च तं दृष्ट्वा पुष्पदंतः सविस्मयः ।

उवाच रणवृत्तान्तं यदुक्तं शंकरेण च ॥ ९

पुष्पदंत उवाच

राजेन्द्र शिवदूतोऽहं पुष्पदंताभिधः प्रभो ।

यदुक्तं शंकरेणैव तच्छृणु त्वं ब्रवीमि ते ॥ १०

शिव उवाच

राज्यं देहि च देवानामधिकारं हि सांप्रतम् ।

नो चेत्कुरु रणं सार्द्धं परेण च मया सताम् ॥ ११

। देवा मां शरणापन्ना देवेशं शंकरं सताम् ।

अहं क्रुद्धो महारुद्रस्त्वां वधिष्याम्यसंशयम् ॥ १२

। हरोऽस्मि सर्वदेवेभ्यो ह्यभयं दत्तवानहम् ।

खलदंडधरोऽहं वै शरणागतवत्सलः ॥ १३

। राज्यं दास्यसि किं वा त्वं करिष्यसि रणं च किम् ।

तत्त्वं ब्रूहि द्वयोरेकं दानवेन्द्र विचार्य्य वै ॥ १४

युद्धखण्ड ) ९ ५३ निश्चय किया और गन्धर्वराज चित्ररथ ( पुष्पदन्त ) -को अपना अभीष्ट दूत बनाकर शीघ्र ही प्रसन्नतापूर्वक शंखचूडके समीप भेजा । तब सर्वेश्वरकी आज्ञासे वह दूत इन्द्रकी अमरावतीपुरीसे भी अधिक ऐश्वर्यसम्पन्न तथा कुबेरके भवनसे भी उत्कृष्ट भवनोंवाले उस दैत्येन्द्रके नगरमें गया॥१–३ ॥ उसने वहाँ जाकर बारह दरवाजोंसे युक्त शंखचूडका भवन देखा, जहाँ प्रत्येक द्वारपर द्वारपाल नियुक्त थे ॥४ ॥

उनको देखते हुए उस पुष्पदन्तने प्रधान द्वारको देखा और निर्भय हो वहाँके द्वारपालसे सारा वृत्तान्त निवेदन किया । तब अत्यन्त सुन्दर, रम्य, विस्तृत तथा भलीभाँति अलंकृत उस द्वारको पार करके वह प्रसन्नतापूर्वक भीतर गया । वहाँ जाकर उसने वीरोंके मण्डलमें विराजमान तथा रत्नसिंहासनपर बैठे हुए उस दानवाधिपति शंखचूडको देखा । उस समय वह तीन करोड़ दैत्यराजोंसे घिरा हुआ था तथा वे उसकी सेवा कर रहे थे और अन्य सौ करोड़ दानव हाथोंमें शस्त्र लेकर उसके चारों ओर पहरा दे रहे थे । इस प्रकार उसे देखकर पुष्पदन्तको बड़ा आश्चर्य हुआ और उसने शंकरके द्वारा कहे गये युद्धका सन्देश इस प्रकार कहा- ॥५ – ९ ॥ पुष्पदन्त बोला- हे राजेन्द्र! मैं शिवजीका पुष्पदन्त नामक दूत हूँ । हे प्रभो! शंकरने जो सन्देश भेजा है, उसे श्रवण कीजिये, मैं आपसे कह रहा हूँ ॥ १० ॥

शिवजी बोले- तुम सज्जन देवताओंका राज्य तथा उनका अधिकार इस समय लौटा दो, अन्यथा मुझे अपना शत्रु समझकर मेरे साथ युद्ध करो ॥ ११ ॥

मैं सज्जनोंका रक्षक हूँ और देवतालोग मेरी शरणमें आये हैं, अतः मैं महारुद्र क्रुद्ध होनेपर निःसन्देह तुम्हारा वध करूँगा ॥१२ ॥

मैं हर हूँ, मैंने सभी देवताओंको अभयदान हूँ और दुष्टोंको दण्ड दिया है । मैं शरणागतवत्सल देनेवाला हूँ ॥ १३ ॥

हे दानवेन्द्र! तुम राज्य लौटाओगे अथवा युद्ध करोगे, विचार करके इन दोनोंमें एक तात्त्विक बात बताओ ॥ १४ ॥

पृष्ठ 964

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९ ५४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३२ पुष्पदंत उवाच

इत्युक्तं यन्महेशेन तुभ्यं तन्मे निवेदितम् ।

वितथं शंभुवाक्यं न कदापि दनुजाधिप ॥

अहं स्वस्वामिनं गंतुमिच्छामि त्वरितं हरम् ।

गत्वा वक्ष्यामि किं शंभुं तथा त्वं वद मामिह ॥

सनत्कुमार उवाच

इत्थं च पुष्पदंतस्य शिवदूतस्य सत्पतेः ।

आकर्ण्य वचनं राजा हसित्वा तमुवाच सः ॥

शंखचूड उवाच

राज्यं दास्ये न देवेभ्यो वीरभोग्या वसुंधरा ।

रणं दास्यामि ते रुद्र देवानां पक्षपातिने ॥

यस्योपरि प्रयायी स्यात्स वीरो भुवनेऽधमः ।

अतः पूर्वमहं रुद्र त्वां गमिष्याम्यसंशयम् ॥

प्रभात आगमिष्यामि वीरयात्रा विचारतः ।

त्वं गच्छाचक्ष्व रुद्राय हीदृशं वचनं मम ॥

इति श्रुत्वा शंखचूडवचनं सुप्रहस्य सः ।

उवाच दानवेन्द्रं स शंभुदूतस्तु गर्वितम् ॥

पुष्पदंत उवाच

अन्येषामपि राजेन्द्र गणानां शंकरस्य च ।

न स्थातुं संमुखे योग्यः किं पुनस्तस्य संमुखम् ॥

स त्वं देहि च देवानामधिकाराणि सर्वशः ।

त्वमरं गच्छ पातालं यदि जीवितुमिच्छसि ॥

सामान्यममरं तं नो विद्धि दानवसत्तम ।

शंकरः परमात्मा हि सर्वेषामीश्वरेश्वरः ॥

इन्द्राद्याः सकला देवा यस्याज्ञावर्तिनः सदा ।

सप्रजापतयः सिद्धा मुनयश्चाष्यहीश्वराः ॥

हरेर्विधेश्च स स्वामी निर्गुणः सगुणः स हि ।

यस्य भ्रूभंगमात्रेण सर्वेषां प्रलयो भवेत् ॥

शिवस्य पूर्णरूपश्च लोकसंहारकारकः ।

सतां गतिर्दुष्टहन्ता निर्विकारः परात्परः ॥

पुष्पदन्त बोला- हे दैत्यराज! शंकरने जो कुछ कहा है, उसे मैंने तत्त्वतः आपसे निवेदन मुझसे १५ किया | शंकरजीका वचन कभी झूठा होनेवाला । है । अब मैं शीघ्र ही अपने स्वामी सदाशिवके नहीं पास जाना चाहता हूँ । मैं जाकर शम्भुसे क्या कहूँगा, इसे १६ मुझको तुम बताओ ॥ १५-१६ ॥ सनत्कुमार बोले- इस प्रकार श्रेष्ठ स्वामीवाले शिवदूत पुष्पदन्तकी बात सुनकर वह दानवेन्द्र हँसकर १७ उससे कहने लगा- ॥१७ ॥

शंखचूड बोला- मैं देवताओंको राज्य नहीं दूँगा । यह पृथ्वी वीरभोग्या है । हे रुद्र! देवताओंके १८ पक्षमें रहनेवाले तुमसे मैं युद्ध करूँगा । जिस राजाके ऊपर शत्रुकी चढ़ाई हो जाती है, वह भुवनमें अधम वीर होता है । अतः हे रुद्र! मैं निश्चित रूपसे पहले १ ९ तुम्हारे ऊपर चढ़ाई करूँगा ॥ १८-१९ ॥ [ हे दूत! ] तुम जाओ और मेरा यह वचन २० रुद्रसे कह दो कि मैं वीरयात्राके विचारसे प्रात: काल आऊँगा ॥२० ॥

शंखचूडका यह वचन सुनकर उस शिवदूतने २१ हँस करके गर्वयुक्त उस दानवेन्द्रसे कहा- ॥२१ ॥

पुष्पदन्त बोला- हे राजेन्द्र! तुम शिवजीके अन्य गणोंके सामने भी नहीं ठहर सकते, तब २२ शिवजीके सम्मुख कैसे खड़े हो सकते हो? ॥ २२ ॥

अतः तुम्हें उचित यही है कि देवताओंका समस्त अधिकार उन्हें प्रदान कर दो और यदि जीवित २३ । रहना चाहते हो तो शीघ्र ही पातालमें चले जाओ । , देवता मत | हे दानवश्रेष्ठ! तुम शंकरजीको सामान्य २४ समझो; शंकरजी सभी ईश्वरोंके ईश्वर तथा परमात्मा हैं ॥ २३-२४ ॥ [ हे दैत्येन्द्र! ] प्रजापतियोंके सहित इन्द्रादि २५ समस्त देवता, सिद्ध, मुनिगण तथा नागराज सभी । सर्वदा उनकी, आज्ञामें रहते हैं । वे विष्णु तथा हैं । । ब्रह्माके स्वामी हैं और वे सगुण होकर भी निर्गुण । प्रलय २६ जिनके भ्रुकुटीको टेढ़ा करनेमात्रसे सभीका । । हो जाता है । शिवका यह पूर्णरूप लोकसंहारकारक तथा । है । वे सज्जनोंके रक्षक, दुष्टोंके हन्ता, निर्विकार २७ परसे भी परे हैं ॥ २५-२७ ॥

पृष्ठ 965

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अ ० ३३ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड )

ब्रह्मणोऽधिपतिः सोऽपि हरेरपि महेश्वरः ।

अवमान्यं न वै तस्य शासनं दानवर्षभ ॥

किं बहूक्तेन राजेन्द्र मनसा संविचार्य च ।

रुद्रं विद्धि महेशानं परं ब्रह्म चिदात्मकम् ॥

देहि राज्यं हि देवानामधिकारांश्च सर्वशः ।

एवं ते कुशलं तात भविष्यत्यन्यथा भयम् ॥

सनत्कुमार उवाच

इति श्रुत्वा दानवेन्द्रः शंखचूडः प्रतापवान् ।

उवाच शिवदूतं तं भवितव्यविमोहितः ॥

शंखचूड उवाच

स्वतो राज्यं न दास्यामि नाधिकारान् विनिश्चयात् ।

विना युद्धं महेशेन सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम् ॥

कालाधीनं जगत्सर्वं विज्ञेयं सचराचरम् ।

कालाद्भवति सर्वं हि विनश्यति च कालतः ॥

त्वं गच्छ शंकरं रुद्रं मयोक्तं वद तत्त्वतः ।

स च युक्तं करोत्वेवं बहुवार्तां कुरुष्व नो ॥

सनत्कुमार उवाच

इत्युक्त्वा शिवदूतोऽसौ जगाम स्वामिनं निजम् ।

यथार्थं कथयामास पुष्पदंतश्च सन्मुने ॥

९ ५५ महेश्वर ब्रह्मा तथा विष्णुके भी अधिपति हैं । २८ हे दानवश्रेष्ठ! उनकी आज्ञाकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये । हे राजेन्द्र! बहुत कहनेसे क्या लाभ? तुम २ ९ मनसे विचार करके रुद्रको महेशान तथा चिदात्मक परब्रह्म जानो । अत: तुम देवताओंका राज्य तथा सम्पूर्ण अधिकार लौटा दो । हे तात! ऐसा करनेसे तुम्हारा कल्याण ३० होगा, अन्यथा भय होगा ॥ २८-३० ॥ सनत्कुमार बोले- दूतकी इस प्रकारकी बात सुनकर प्रतापी दानवेन्द्र शंखचूड भवितव्यसे मोहित ३१ होकर उस शिवदूतसे कहने लगा —॥३१ ॥

शंखचूड बोला – [ हे दूत! ] मैं यह सत्य कहता हूँ कि शिवसे बिना युद्धके स्वयं न तो देवताओंका राज्य ३२ दूँगा और न तो अधिकार ही दूँगा । इस सम्पूर्ण चराचर जगत्को कालके अधीन जानना चाहिये । कालसे ही सब कुछ उत्पन्न होता है तथा कालसे ही विनष्ट भी हो ३३ जाता है । तुम रुद्र शंकरके पास जाओ और यथार्थ रूपसे मेरे द्वारा कही गयी बात कह दो, जैसा उचित हो, ३४ वे करें, तुम बहुत बातें मत करो ॥३२-३४ ॥ सनत्कुमार बोले – हे मुने! इस प्रकार बात करके वह पुष्पदन्त नामका शिवदूत अपने स्वामीके पास चला गया और उसने सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे ३५ । निवेदित किया ॥ ३५ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे शंखचूडवधे दूतगमनं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें शंखचूडवधके अन्तर्गत दूतगमनवर्णन नामक बत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३२ ॥

अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः युद्धके लिये अपने गणोंके साथ भगवान् शिवका प्रस्थान शंखचूडसे सनत्कुमार उवाच

। तस्य दूतस्य तद्वाक्यमाकर्ण्य सुरराट् ततः ।

। सक्रोधः प्राह गिरिशो वीरभद्रादिकान्गणान् ॥

रुद्र उवाच

हे वीरभद्र हे नंदिन् क्षेत्रपालाष्टभैरवाः ।

। सर्वे गणाश्च बलशालिनः ॥

सन्नद्धाः सायुधा । कुमाराभ्यां सहैवाद्य निर्गच्छन्तु ममाज्ञया ।

। स्वसेनया भद्रकाली निर्गच्छतु रणाय च ।

निर्गच्छाम्यद्य सत्वरम् ॥

शंखचूडवधार्थाय सनत्कुमार बोले- तब उस दूतका वचन सुनकर देवाधिदेव भगवान् शंकर कुपित होकर वीरभद्रादि गणोंसे कहने लगे -॥१ ॥

१ | रुद्र बोले — हे वीरभद्र! हे नन्दिन्! हे क्षेत्रपालो! हे अष्टभैरव! समस्त बलशालीगण! तुम लोग मेरी आज्ञासे अपने - अपने शस्त्र लेकर युद्धके लिये तैयार २ हो जाओ और दोनों कुमारोंके साथ [ युद्धके लिये ] निकल पड़ो । ये भद्रकाली भी अपनी सेनाके साथ युद्धके लिये चलें । मैं शंखचूड़का वध करनेके लिये ३ अभी शीघ्र ही निकल रहा हूँ ॥ २-३ ॥

पृष्ठ 966

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९ ५६ सनत्कुमार उवाच इत्याज्ञाप्य महेशानो निर्ययौ सैन्यसंयुतः सर्वे वीरगणास्तस्यानुययुः संप्रहर्षिताः एतस्मिन्नन्तरे स्कंदगणेशौ सर्वसैन्यपौ ययतुर्मुदितौ नद्धौ सायुधौ च शिवान्तिके वीरभद्रश्च नन्दी च महाकालः सुभद्रकः विशालाक्षश्च बाणश्च पिंगलाक्षो विकंपनः विरूपो विकृतिश्चैव मणिभद्रश्च बाष्कलः कपिलाख्यो दीर्घदंष्ट्रो विकरस्ताम्रलोचनः कालंकरो बलीभद्रः कालजिह्वः कुटीचर: बलोन्मत्तो रणश्लाघ्यो दुर्जयो दुर्गमस्तथा इत्यादयो गणेशानाः सैन्यानां पतयो वराः तेषां च गणनां वच्मि सावधानतया शृणु शंखकर्णः कोटिगणैर्युतः परविमर्दकः दशभिः केकराक्षश्च विकृतोऽष्टाभिरेव च चतुःषष्ट्या विशाखश्च नवभिः पारियात्रिकः षड्भिः सर्वान्तकः श्रीमांस्तथैव विकृताननः जालको हि द्वादशभिः कोटिभिर्गणपुंगवः सप्तभिः समदः श्रीमान्दुन्दुभोऽष्टाभिरेव च पंचभिश्च करालाक्षः षड्भिः संदारको वरः श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३३ सनत्कुमार बोले- इस प्रकारकी । । देकर शिवजी अपनी सेनाके साथ निकल पड़े आज्ञा और ॥ ४ । सभी वीरगण भी अत्यन्त हर्षित होकर उनके पीछे चल पड़े ॥४ ॥

। इसी बीच सभी सेनाओंके स्वामी कुमार कार्तिकेय ॥ ५ तथा गणेशजी भी प्रसन्न होकर आयुधोंसे युक्त होकर 1 । शिवजीके समीप गये । वीरभद्र, नन्दी, महाकाल ॥ ६ सुभद्रक, विशालाक्ष, बाण, पिंगलाक्ष, विकम्पन, विरूप,, । विकृति, मणिभद्र, बाष्कल, कपिल, दीर्घदंष्ट्र, विकर, ॥ ७ ताम्रलोचन, कालंकर, बलीभद्र, कालजिह्व, कुटीचर, । बलोन्मत्त, रण -॥ ८ गणेश्वर तथा । रणभूमिमें चले ॥ ९ सावधानीपूर्वक । शत्रुओंका ॥ १० सेनाके साथ, । करोड़, विशाख श्लाघ्य, दुर्जय एवं दुर्गम इत्यादि श्रेष्ठ सेनापति भी शिवजीके साथ । अब मैं उनकी संख्या बता रहा हूँ, सुनिये ॥५ – ९ ॥ मर्दन करनेवाला शंखकर्ण एक करोड़ केकराक्ष दस करोड़, विकृत आठ चौंसठ करोड़, पारियात्रिक नौ करोड़, ॥ ११ सर्वान्तक छ: करोड़, श्रीमान् विकृतानन छ: करोड़, । गणोंमें श्रेष्ठ जालक बारह करोड़, समद सात करोड़, ॥ १२ श्रीमान् दुन्दुभ आठ करोड़, करालाक्ष पाँच करोड़, । श्रेष्ठ सन्दारक छः करोड़, कन्दुक तथा कुण्डक एक-कोटिकोटिभिरेवेह कंदुकः कुंडकस्तथा ॥ १३ एक करोड़, सभीमें श्रेष्ठ विष्टम्भ नामक गणेश्वर विष्टंभोऽष्टाभिरेवेह गणप: सर्वसत्तमः पिष्टश्च सहस्त्रेण संनादश्च तथाविधः आवेशनस्तथाष्टाभिस्त्वष्टाभिश्चन्द्रतापनः महाकेशः सहस्रेण कोटीनां गणपो वृतः कुंडी द्वादशभिर्वीरैस्तथा पर्वतकः शुभः कालश्च कालकश्चैव महाकालशतेन वै अग्निकः शतकोट्या च कोट्याग्निमुख एव च आदित्यो हार्द्धकोट्या च तथा चैव घनावहः सन्नाहश्च शतेनैव कुमुदः कोटिभिस्तथा अमोघः कोकिलश्चैव शतकोट्या सुमंत्रकः काकपादः कोटिषष्ट्या षष्ट्या संतानकस्तथा महाबलश्च नवभिः पञ्चभिर्मधुपिंगलः नीलो देवेशः पूर्णभद्रस्तथैव कीटनाशः पूर्णस्तथा कोटिकोटिसहस्राणां शतैर्विंशतिभिस्तथा तत्राजग्मुस्तथा वीरास्ते सर्वे संगरोत्सवे । आठ करोड़, पिप्पल एवं सन्नाद हजार करोड़, ॥ १४ आवेशन तथा चन्द्रतापन आठ - आठ करोड़ और गणेश्वर महाकेश सहस्र करोड़ गणोंसे घिरा हुआ ॥ १५ था॥१०–१५ ॥ । कुण्डी एवं पर्वतक बारह करोड़ वीरों, काल, ॥ १६ कालक एवं महाकाल सौ करोड़, अग्निक सौ करोड़, । अग्निमुख एक करोड़, आदित्य एवं घनावह आधा-॥ १७ आधा करोड़ सन्नाह तथा कुमुद सौ करोड, अमोघ, ।, और ॥ १८ । कोकिल एवं सुमन्त्रक सौ - सौ करोड़, काकपाद । सन्तानक साठ - साठ करोड़, महाबल नौ करोड़, नब्बे-॥ १ ९ मधुपिंगल पाँच करोड़, नील, देवेश एवं पूर्णभद्र । । नब्बे करोड़, महाबलवान् चतुर्वक्त्र सा ॥ २० वहाँ ॥ । सैकड़ों तथा बीसों करोड़ गणोंको साथ लेकर ॥ २१ युद्धोत्सवमें आये॥१६–२१ ॥

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अ ० ३३ ] रुद्रसंहिता (

भूतकोटिसहस्त्रेण प्रमथैर्कोटिभिस्त्रिभिः ।

वीरभद्रश्चतुःषष्ट्या लोमजानां त्रिकोटिभिः ॥ २२

काष्ठारूढश्चतुःषष्ट्या सुकेशी वृषभस्तथा ।

विरूपाक्षश्च भगवांश्चतुःषष्ट्या सनातनः ॥ २३

तालकेतुः षडास्यश्च पञ्चास्यश्च प्रतापवान् ।

संवर्तकस्तथा चैत्रो लंकुलीशः स्वयं प्रभुः ॥ २४

लोकांतकश्च दीप्तात्मा तथा दैत्यांतकः प्रभुः ।

देवो भृङ्गीरिटिः श्रीमान्देवदेवप्रियस्तथा ॥ २५

अशनिर्भानुकश्चैव चतुःषष्ट्या सहस्रशः ।

कंकालः कालकः कालो नन्दी सर्वान्तकस्तथा ॥ २६

एते चान्ये च गणपा असंख्याता महाबलाः ।

युद्धार्थं निर्ययुः प्रीत्या शंखचूडेन निर्भयाः ॥ २७

सर्वे सहस्त्रहस्ताश्च जटामुकुटधारिणः ।

चन्द्ररेखावतंसाश्च नीलकंठास्त्रिलोचनाः ॥ २८

रुद्राक्षाभरणाः सर्वे तथा सद्भस्मधारिणः ।

हारकुंडलकेयूरमुकुटाद्यैरलंकृताः ॥ २ ९

ब्रह्मेन्द्रविष्णुसंकाशा अणिमादिगुणैर्वृताः ।

सूर्यकोटिप्रतीकाशाः प्रवीणा युद्धकर्मणि ॥ ३०

पृथिवीचारिणः केचित्केचित्पातालचारिणः ।

केचित् व्योमचराः केचित्सप्तस्वर्गचरा मुने ॥ ३१

किं बहूक्तेन देवर्षे सर्वलोकनिवासिनः ।

ययुः शिवगणाः सर्वे युद्धार्थं दानवैः सह ॥ ३२

अष्टौ च भैरवा रौद्रा रुद्राश्चैकादशाशु वसवोऽष्टौ वासवश्चादित्या द्वादश ते द्रुतम् ॥ ३३

हुताशनश्च चन्द्रश्च विश्वकर्माश्विनौ च तौ ।

कुबेरश्च यमश्चैव निर्ऋतिर्नलकूबरः ॥ ३४

वायुश्च वरुणश्चैव बुधश्च मंगलश्च वै ।

ग्रहाश्चान्ये महेशेन कामदेवश्च वीर्यवान् ॥ ३५

उग्रदंष्ट्रश्चोग्रदण्डः कोरटः कोटभस्तथा ।

। स्वयं शतभुजा देवी भद्रकाली महेश्वरी ॥ ३६

रलेन्द्रसारनिर्माणविमानोपरि संस्थिता ।

रक्तवस्त्रपरीधाना रक्तमाल्यानुलेपना ॥ ३७

। नृत्यन्ती च हसन्ती च गायन्ती सुस्वरं मुदा । | अभयं ददती स्वेभ्यो भयं चारिभ्य एव सा ॥ ३८ युद्धखण्ड ) ९ ५७ वीरभद्र सहस्र करोड़ भूतगणों, तीन करोड़ प्रमथों, चौंसठ करोड़ गणों एवं तीन करोड़ लोमजोंके सहित आये । काष्ठारूढ, सुकेश, वृषभ, विरूपाक्ष एवं भगवान् सनातन भी चौंसठ करोड़ गणोंके साथ आये ॥ २२-२३ ॥ तालकेतु, षडास्य, पंचास्य, प्रतापी संवर्तक, चैत्र, लकुलीश, स्वयंप्रभु लोकान्तक, दीप्तात्मा, दैत्यान्तक, प्रभु, देव भृंगी, देवाधिदेव महादेवके अत्यन्त प्रिय श्रीमान् रिटि, अशनि, भानुक चौंसठ सहस्र करोड़ गणोंके साथ आये । इसी प्रकार कंकाल, कालक, काल, नन्दी, सर्वान्तक तथा अन्य असंख्य | महाबली गणेश्वर शंखचूडके साथ युद्धके लिये निर्भय होकर प्रेमपूर्वक निकल पड़े॥२४–२७ ॥ ये सभी गण हजारों हाथोंसे युक्त तथा जटा मुकुट धारण किये हुए थे । वे मस्तकपर चन्द्रकलासे युक्त, नीलकण्ठ एवं त्रिलोचन थे । सभी रुद्राक्ष एवं भस्म धारण किये हुए थे और हार, कुण्डल, केयूर एवं मुकुट आदिसे अलंकृत थे । वे ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णुके सदृश, अणिमादि सिद्धियोंसे युक्त, करोड़ों सूर्योंके समान देदीप्य-मान एवं युद्धक्रियामें अत्यन्त प्रवीण थे ॥ २८–३० ॥ हे मुने! उनमें कोई पृथ्वीमें, कोई पातालमें, कोई आकाशमें तथा कोई सातों स्वर्गों में विचरण करनेवाले थे । हे देवर्षे! बहुत कहनेसे क्या लाभ, उस समय सम्पूर्ण लोकोंमें रहनेवाले सभी शिवगण दानवोंसे युद्ध करनेके लिये आ पहुँचे ॥ ३१-३२ ॥ जो आठों भैरव, महाभयानक एकादश रुद्र, आठों वसु, इन्द्र, द्वादशादित्य थे, वे शीघ्र आ पहुँचे ॥ ३३ ॥

हुताशन, चन्द्रमा, विश्वकर्मा, दोनों अश्विनीकुमार, | कुबेर, यम, निर्ऋति, नलकूबर, वायु, वरुण, बुध एवं मंगल तथा अन्य ग्रह और वीर्यवान् कामदेव शिवजीके साथ आये ॥ ३४-३५ ॥ उग्रदंष्ट्र, उग्रदण्ड, कोरट, कोटभ आदि महागण आये । स्वयं सौ भुजा धारण की हुई भगवती भद्रकाली । महादेवी स्वयं उस युद्धमें उपस्थित हुईं । वे उत्तम रत्नोंसे निर्मित विमानपर बैठी हुई थीं, रक्त वस्त्र, रक्त अनुलेपन एवं रक्तमाल्य धारण किये हुए थीं, प्रसन्नतासे हँसती हुई, सुस्वरसे गाती हुई, नृत्य करती हुई वे अपने भक्तोंको अभय प्रदान कर रही थीं तथा भय उत्पन्न कर रही थीं ॥ ३६- ३८ ॥ शत्रुओंको

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९ ५८ बिभ्रती विकटां जिह्वां सुलीलां योजनायताम् शंखचक्रगदापद्मखड्गचर्मधनुःशरान् खर्परं वर्तुलाकारं गंभीरं योजनायतम् त्रिशूलं गगनस्पर्शि शक्तिं च योजनायताम् मुद्गरं मुसलं वज्रं खड्गं फलकमुल्बणम् वैष्णवास्त्रं वारुणास्त्रं वायव्यं नागपाशकम् नारायणास्त्रं गांधर्वं ब्रह्मास्त्रं गारुडं तथा पार्जन्यं च पाशुपतं जृंभणास्त्रं च पार्वतम् ॥ महावीरं च सौरं च कालकालं महानलम् माहेश्वरास्त्रं याम्यं च दंडं संमोहनं तथा समर्थमस्त्रकं दिव्यं दिव्यास्त्रं शतकं परम् बिभ्रती च करैः सर्वैरन्यान्यपि च सा तदा आगत्य तस्थौ सा तत्र योगिनीनां त्रिकोटिभिः । सार्धं च डाकिनीनां वै विकटानां त्रिकोटिभिः भूतप्रेतपिशाचाश्च कूष्माण्डा ब्रह्मराक्षसाः वेताला राक्षसाश्चैव यक्षाश्चैव सकिन्नराः ॥ तैश्चैवाभिवृतः स्कंदः प्रणम्य चन्द्रशेखरम् पितुः पार्श्वे सहायो यः समुवास तदाज्ञया अथ शम्भुः समानीय स्वसैन्यं सकलं तदा । युद्धार्थमगमद् रुद्रः शङ्खचूडेन निर्भयः चन्द्रभागानदीतीरे वटमूले मनोहरे तत्र तस्थौ महादेवो देवनिस्तारहेतवे श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३४ । वे एक योजनपर्यन्त लम्बी विकट जिह्वा धारण किये ॥ ३ ९ । हुए उसे लपलपा रही थीं और शंख, चक्र, गदा पद्म खड्ग, चर्म, धनुष तथा बाण धारण की हई थीं ॥, ३, । वे एक योजनका गोल तथा अत्यन्त ९ ॥ गहरा ॥ ४० खर्पर, आकाशको स्पर्श करता हुआ त्रिशूल, एक । योजन लम्बी शक्ति, मुद्गर, मुसल, वज्र, खड्ग, ॥ ४१ विशाल फलक ( ढाल ), वैष्णवास्त्र, वारुणास्त्र, । वायव्यास्त्र, नागपाश, नारायणास्त्र, गन्धर्वास्त्र, ब्रह्मास्त्र, ४२ गरुडास्त्र, पर्जन्यास्त्र, पाशुपतास्त्र, जृम्भणास्त्र, पर्वतास्त्र, । महावीरास्त्र, सौरास्त्र, कालकालास्त्र, महानलास्त्र, ॥ ४३ महेश्वरास्त्र, यमदण्ड, सम्मोहनास्त्र, दिव्य समर्थास्त्र । एवं सैकड़ों - सैकड़ों दिव्यास्त्र एवं अन्य भी अस्त्र ॥ ४४ अपने हाथोंमें धारण किये हुए तीन करोड़ योगिनियों एवं तीन करोड़ विकट डाकिनियोंके साथ वहाँ आकर ॥ ४५ स्थित हो गयीं ॥ ४०–४५ ॥ । इसी प्रकार भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ४६ ब्रह्मराक्षस, वेताल, राक्षस, यक्ष, गन्धर्व तथा किन्नरोंसे । घिरे हुए स्कन्द शिवजीको प्रणाम करके और उनकी ॥ ४७ आज्ञासे वे उनके समीप स्थित हो गये ॥ ४६-४७ ॥ इसके बाद रुद्र शिवजी अपनी सारी सेना लेकर ॥ ४८ शंखचूडके साथ युद्ध करनेके लिये निर्भय होकर चल पड़े । महादेव चन्द्रभागा नदीके तटपर एक । मनोहर वटवृक्षके नीचे देवताओंका कष्ट दूर करनेहेतु ॥ ४ ९ | स्थित हो गये ॥ ४८-४९ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे शङ्खचूडवधे महादेवयुद्धयात्रावर्णनं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें शंखचूडवधके अन्तर्गत महादेवयुद्धयात्रावर्णन नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३३ ॥

अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः तुलसीसे विदा लेकर शंखचूडका युद्धके लिये ससैन्य नदीके तटपर पहुँचना पुष्पभद्रा! व्यास उवाच व्यासजी बोले- हे महाबुद्धिमान् ब्रह्मपुत्र विधितात महाबुद्धे मुने जीव चिरं समाः । । हे मुने! आप चिरकालतक जीवित रहें, आपने कथितं सुमहच्चित्रं चरितं चन्द्रमौलिनः ॥ १ शिवजीका बड़ा विचित्र चरित्र वर्णन किया । अब शिवदूते गते तत्र शङ्खचूडश्च दानवः । । आप विस्तारपूर्वक बताइये कि शिवजीके दूतकेच किं चकार प्रतापी स तत्त्वं वद सुविस्तरम् ॥ २ जानेपर प्रतापी शंखचूडने क्या किया? ॥ १-२ ॥

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अ ० ३४ ] रुद्रसंहिता ( सनत्कुमार उवाच

अथ • दूते गते तत्र शंखचूडः प्रतापवान् ।

उवाच तुलसीं वार्तां गत्वाभ्यन्तरमेव ताम् ॥ ३

शङ्खचूड उवाच

शम्भुदूतमुखाद्देवि युद्धायाहं समुद्यतः ।

तेन गच्छाम्यहं योद्धुं शासनं कुरु मे ध्रुवम् ॥ ४

इत्येवमुक्त्वा स ज्ञानी नानाबोधनतः प्रियाम् ।

क्रीडां चकार हर्षेण तमनादृत्य शंकरम् ॥ ५

तौ दम्पती चिक्रीडाते निमग्नौ सुखसागरे ।

नानाकामकलाभिश्च निशि चाटुशतैरपि ॥ ६

ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय प्रातःकृत्यं विधाय च ।

नित्यकार्यं च कृत्वादौ ददौ दानमनंतकम् ॥ ७

पुत्रं कृत्वा च राजेन्द्रं सर्वेषु दानवेषु च ।

पुत्रे समर्प्य भार्यां च स राज्यं सर्वसंपदम् ॥ ८

प्रियामाश्वासयामास स राजा रुदतीं पुनः ।

निषेधन्तीं च गमनं नाना वार्तां प्रकथ्य च ॥ ९

निजसेनापतिं वीरं समाहूय समादृतः ।

आदिदेश स संनद्धः संग्रामं कर्तुमुद्यतः ॥ १०

शंखचूड उवाच

अद्य सेनापते वीराः सर्वे समरशालिनः ।

सन्नद्धाखिलकर्माणो निर्गच्छन्तु रणाय च ॥ ११

। दैत्याश्च दानवाः शूरा षडशीतिरुदायुधाः ।

कंकानां बलिनां शीघ्रं सेना निर्यांतु निर्भयाः ॥ १२

। पञ्चाशदसुराणां हि निर्गच्छन्तु कुलानि वै ।

। कोटिवीर्याणि युद्धार्थं देवपक्षिणा ॥ १३

शम्भुना

। सन्नद्धानि च धौम्राणां कुलानि च शतं द्रुतम् ।

। निर्गच्छन्त रणार्थं हि मम शासनात् ॥ १४

। कालकेयाश्च शम्भुना । मौर्याश्च दौर्हृदाः कालकास्तथा । सज्जा निर्यान्तु ॥ १५ युद्धाय रुद्रेण मम शासनात् युद्धखण्ड ) ९ ५ ९ सनत्कुमार बोले- शिवदूतके चले जानेपर प्रतापी शंखचूडने भीतर जाकर तुलसीसे उस बातको कहा- ॥३ ॥

शंखचूड बोला — हे देवि! शिवदूतके मुखसे युद्धका सन्देश प्राप्त होनेके कारण मैं युद्ध लिये तैयार होकर जा रहा हूँ, अब तुम मेरे शासनका कार्य सँभालना ॥४ ॥

इस प्रकार यह कहकर उस ज्ञानी शंखचूडने नाना प्रकारके वाक्योंसे अपनी प्रियतमाको समझाया और शंकरका अनादरकर हर्षपूर्वक उसके साथ क्रीड़ा की ॥५ ॥

अनेक प्रकारकी कामकलाओं तथा मधुर वचनोंसे परस्पर संलाप करते हुए वे पति - पत्नी सुखसागरमें निमग्न हो रातमें क्रीडा करते रहे ॥६ ॥

ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर प्रात: कालीन कृत्य करके नित्य - कर्म सम्पन्नकर उसने बहुत दान दिया ॥७ ॥

इसके बाद अपने पुत्रको सभी दानवोंका राजा बनाकर सारी सम्पत्ति एवं राज्य, पुत्र तथा भार्याको समर्पितकर उस राजाने बारंबार रोती हुई तथा अनेक बातें कहकर युद्धमें जानेसे मना करनेवाली अपनी भार्याको आश्वस्त किया । उसके बाद उसने अपने वीर सेनापतिको आदरपूर्वक बुलाकर उसे आज्ञा दी और स्वयं सन्नद्ध होकर संग्राम करनेके लिये उद्यत हुआ॥८–१० ॥ शंखचूड बोला — हे सेनापते! युद्ध करनेमें कुशल सभी वीर सभी प्रकारसे सुसज्जित होकर युद्धके लिये चलें ॥११ ॥

बलशाली कंकोंकी सेना, जिसमें छियासी महाबलवान् दैत्य एवं दानव हैं, आयुधोंसे युक्त हो शीघ्र निर्भय होकर निकलें ॥१२ ॥

असुरोंके पचास कुल, जिसमें करोड़ों महावीर हैं वे भी देवपक्षपाती शंकरसे युद्ध करनेके लिये , निकलें ॥ १३ ॥

धूम्रनामक दैत्योंके सौ कुल शिवसे युद्ध करनेके लिये मेरी आज्ञासे शीघ्र निकलें । इसी प्रकार कालकेय, मौर्य, दौर्हृद तथा कालक तैयार होकर मेरी आज्ञासे संग्रामके लिये निकलें ॥ १४-१५ ॥ | रुद्रके साथ

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९ ६० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३५ सनत्कुमार उवाच

इत्याज्ञाप्यासुरपतिर्दानवेन्द्रो महाबलः ।

निर्जगाम महासैन्यः सहस्त्रैर्बहुभिर्वृतः ॥

तस्य सेनापतिश्चैव युद्धशास्त्रविशारदः ।

महारथो महावीरो रथिनां प्रवरो रणे ॥

त्रिलक्षाक्षौहिणीयुक्तो मांडल्यं च चकार ह । बहिर्बभूव शिविराद्रणे शिविराद्रणे वीरभयङ्करः ॥

रत्नेन्द्रसारनिर्माणं विमानमभिरुह्य सः ।

गुरुवर्गं पुरस्कृत्य रणार्थं प्रययौ किल ॥

पुष्पभद्रानदीतीरे यत्राक्षयवटः शुभः ।

सिद्धाश्रमे च सिद्धानां सिद्धिक्षेत्रं सुसिद्धिदम् ॥

कपिलस्य तपःस्थानं पुण्यक्षेत्रे च भारते ।

पश्चिमोदधिपूर्वे च मलयस्य हि पश्चिमे ॥

श्रीशैलोत्तरभागे च गंधमादनदक्षिणे ।

पञ्चयोजनविस्तीर्णे दैर्घ्यं शतगुणस्तथा ॥

शुद्धस्फटिकसंकाशा भारते च सुपुण्यदा ।

पुष्पभद्रा नदी रम्या जलपूर्णा सरस्वती ॥

लवणोदधिप्रिया भार्या शश्वत्सौभाग्यसंयुता ।

सरस्वतीसंश्रिता च निर्गता सा हिमालयात् ॥

गोमन्तं वामतः कृत्वा प्रविष्टा पश्चिमोदधौ ।

तत्र गत्वा शंखचूडः शिवसेनां ददर्श ह ॥

सनत्कुमार बोले— [ हे व्यास! ] महाबली असुरराज दानवेन्द्र शंखचूड इस प्रकार आज्ञा देकर १६ सहस्रों सेनाओंको लेकर चल पड़ा ॥ १६ ॥

युद्धशास्त्रमें प्रवीण, महारथी, महावीर, रथियोंमें १७ श्रेष्ठ तथा वीरोंमें भयंकर उसके सेनापतिने भी तीन लाख अक्षौहिणी सेनासे युक्त होकर मण्डल बनाया और वह १८ युद्ध करनेके लिये शिविरसे बाहर निकला ॥ १७-१८ ॥ शंखचूड भी उत्तम रत्नोंसे बने हुए विमानपर १ ९ चढ़कर गुरुजनोंको आगेकर संग्रामके लिये चला । पुष्पभद्रा नदीके किनारे सिद्धक्षेत्रमें सिद्धोंका आश्रम एवं २० श्रेष्ठ अक्षयवट है । वह सिद्धिप्रद सिद्धक्षेत्र है । पुण्यक्षेत्र भारतमें कपिलकी तपोभूमि है । यह स्थान पश्चिम २१ सागरके पूर्व तथा मलय पर्वतके पश्चिममें, श्रीपर्वतके उत्तर भागमें तथा गन्धमादनके दक्षिणमें पाँच योजन २२ चौड़ा एवं पाँच सौ योजन लम्बा है ॥ १ ९ –२२ ॥ भारतमें शुद्ध स्फटिकके समान जलवाली, उत्तम २३ पुण्य प्रदान करनेवाली, जलपूर्ण तथा रम्य पुष्पभद्रा तथा सरस्वती नदी है, जो क्षारसमुद्रकी प्रिय भार्या है, वह पुष्पभद्रा निरन्तर सौभाग्ययुक्त होकर हिमालयसे निकलकर २४ सरस्वती नदीमें मिलती है और गोमन्तक पर्वतको बायेंकर पश्चिम सागरमें गिरती है । वहाँ जाकर २५ शंखचूडने शिवकी सेनाको देखा ॥ २३–२५ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे शङ्खचूडयात्रावर्णनं नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें शंखचूडयात्रावर्णन नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३४ ॥

अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः शंखचूडका अपने एक बुद्धिमान् दूतको शंकरके पास भेजना दूत तथा शिवकी वार्ता, शंकरका सन्देश लेकर दूतका वापस शंखचूडके, सनत्कुमार उवाच

तत्र स्थित्वा दानवेन्द्रो महान्तं दानवेश्वरम् ।

दूतं कृत्वा महाविज्ञं प्रेषयामास शंकरम् ॥

स तत्र गत्वा दूतश्च चन्द्रभालं ददर्श ह ।

वटमूले समासीनं सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥

कृत्वा योगासनं दृष्ट्या मुद्रायुक्तं च सस्मितम् ।

शुद्धस्फटिकसंकाशं ज्वलन्तं ब्रह्मतेजसा ॥

पास आना । सनत्कुमार बोले— [ हे व्यास! ] वहाँ स्थित होकर उस दानवेन्द्रने अत्यन्त बुद्धिमान् एक महान् भेजा ॥ १ ॥

१ दैत्येश्वरको दूत बनाकर शिवजीके समीप बैठे हुए, उस दूतने वहाँ जाकर वटवृक्षके नीचे लगाये २ करोड़ों सूर्यके समान महातेजस्वी, योगासन शुद्ध । | हुए, ध्यानमुद्रायुक्त, मन्द मन्द मुसकराते हुए,, ३ | स्फटिकके समान परमोज्ज्वल, ब्रह्मतेजसे देदीप्यमान