श्रीगणेशाय नमः।
शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 971–980
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 971–980
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अ ० ३५ ] रुद्रसंहिता (
त्रिशूलपट्टिशधरं व्याघ्रचर्माम्बरावृतम् ।
भक्तमृत्युहरं शांतं गौरीकान्तं त्रिलोचनम् ॥ ४
तपसां फलदातारं कर्त्तारं सर्वसंपदाम् ।
आशुतोषं प्रसन्नास्यं भक्तानुग्रहकारकम् ॥ ५ ।
विश्वनाथं विश्वबीजं विश्वरूपं च विश्वजम् ।
विश्वेश्वरं विश्वकरं विश्वसंहारकारणम् ॥ ६
कारणं कारणानां च नरकार्णवतारकम् ।
ज्ञानप्रदं ज्ञानबीजं ज्ञानानन्दं सनातनम् ॥ ७
अवरुह्य रथाद् दूतस्तं दृष्ट्वा दानवेश्वरः ।
शंकरं सकुमारं च शिरसा प्रणनाम सः ॥ ८
वामतो भद्रकालीं च स्कंदं तत्पुरतः स्थितम् ।
लोकाशिषं ददौ तस्मै काली स्कंदश्च शंकरः ॥ ९
अथासौ शंखचूडस्य दूतः परमशास्त्रवित् ।
उवाच शंकरं नत्वा करौ बध्वा शुभं वचः ॥ १०
दूत उवाच
शंखचूडस्य दूतोऽहं त्वत्सकाशमिहागतः ।
वर्तते ते किमिच्छाद्य तत्त्वं ब्रूहि महेश्वर ॥ ११
सनत्कुमार उवाच
इति श्रुत्वा च वचनं शंखचूडस्य शंकरः ।
प्रसन्नात्मा महादेवो भगवांस्तमुवाच ह ॥ १२
महादेव उवाच
शृणु दूत महाप्राज्ञ वचो मम सुखावहम् ।
कथनीयमिदं तस्मै निर्विवादं विचार्य च ॥ १३
विधाता जगतां ब्रह्मा पिता धर्मस्य धर्मवित् ।
मरीचिस्तस्य पुत्रश्च कश्यपस्तत्सुतः स्मृतः ॥ १४
दक्षः प्रीत्या ददौ तस्मै निजकन्यास्त्रयोदश ।
तास्वेका च दनुः साध्वी तत्सौभाग्यविवर्द्धिनी ॥ १५
चत्वारस्ते दनोः दानवास्तेजसोल्बणाः । पुत्रा तेष्वेको विप्रचित्तिस्तु महाबलपराक्रमः ॥ १६ तत्पुत्रो धार्मिको दंभो दानवेन्द्रो महामतिः । युद्धखण्ड ) ९ ६१ त्रिशूल - पट्टिश धारण किये हुए, व्याघ्रचर्म ओढ़े हुए, भक्तोंकी मृत्यु दूर करनेवाले, शान्त, तपस्याका फल देनेवाले, सम्पूर्ण सम्पत्ति प्रदान करनेवाले, शीघ्र प्रसन्न होनेवाले, प्रसन्नमुख, भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले, विश्व-बीज, विश्वरूप, विश्वको उत्पन्न करनेवाले, विश्वेश्वर, विश्वकर्ता, विश्वसंहारके कारण, कारणोंके भी कारण, नरकसमुद्रसे पार उतारनेवाले, ज्ञानदाता, ज्ञानबीज तथा ज्ञानमें ही आनन्दित रहनेवाले, तीन नेत्रवाले, सनातन उमापति विश्वनाथको देखा॥२–७ ॥ उस दानवेश्वरके दूतने रथसे उतरकर कुमारसहित शंकरजीको देखकर सिर झुकाकर प्रणाम किया । उनके बायीं ओर विराजमान भद्रकाली तथा उनके आगे स्थित स्कन्दको भी प्रणाम किया । उसके बाद काली, शंकर एवं स्कन्दने लोकरीतिसे उसे आशीर्वाद दिया ॥ ८ - ९ ॥ इसके बाद सकल शास्त्रोंका ज्ञाता शंखचूडका वह दूत हाथ जोड़कर शिवको प्रणाम करके उत्तम वचन कहने लगा -॥१० ॥
दूत बोला – - हे महेश्वर! मैं शंखचूडका दूत यहाँ आपके पास आया हूँ, आपकी क्या इच्छा है? उसे आप कहिये ॥ ११ ॥
सनत्कुमार बोले— शंखचूडके दूतकी बात सुनकर प्रसन्नचित्त भगवान् महादेवने उससे | कहा —॥१२ ॥
महादेवजी बोले- हे महाबुद्धिमान् दूत! तुम मेरे सुखदायक वचनको सुनो और विचार करके मेरे वचनको निर्विवाद रूपसे उनसे कह देना ॥१३ ॥
समस्त धर्मोंके ज्ञाता तथा जगत्के निर्माता ब्रह्मा धर्मके भी पिता हैं, उनके पुत्र मरीचि तथा उनके पुत्र कश्यप कहे गये हैं ॥ १४ ॥
दक्षने उन कश्यपको अपनी तेरह कन्याएँ प्रसन्नताके साथ प्रदान कीं । उनमें एक दनु नामवाली थी । साधु / स्वभाववाली वह उनके सौभाग्यको बढ़ानेवाली थी ॥ १५ ॥
उस दनुके परम तेजस्वी चार दानव पुत्र हुए । उनमें विप्रचित्ति था, जो महाबलवान् एवं पराक्रमी था ॥ १६ ॥
एक उस विप्रचित्तिका धार्मिक तथा महाबुद्धिमान् दम्भ नामक पुत्र हुआ । तुम उसीके श्रेष्ठ, दानवराज तथा दानवोंके राजा हो ॥ १७ ॥
तस्य त्वं दानवेश्वरः ॥ १७ धर्मात्मा पुत्र तनयः श्रेष्ठो धर्मात्मा 2223 Shivmahapuranam Part I Section_32_1_Front
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९ ६२ पुरा त्वं पार्षदो गोपो गोपेष्वेव च धार्मिकः अधुना राधिकाशापाज्जातस्त्वं दानवेश्वरः दानवीं योनिमायातस्तत्त्वतो न हि दानवः निजवृत्तं पुरा ज्ञात्वा दैववैरं त्यजाधुना द्रोहं न कुरु तैः सार्द्धं स्वपदं भुंक्ष्व सादरम् नाधिकं सविकारं च कुरु राज्यं विचार्य च देहि राज्यं च देवानां मत्प्रीतिं रक्ष दानव निजराज्ये सुखं तिष्ठ तिष्ठन्तु स्वपदे सुराः अलं भूतविरोधेन देवद्रोहेण किं पुनः कुलीनाः शुद्धकर्माणः सर्वे कश्यपवंशजाः यानि कानि च पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च ज्ञातिद्रोहजपापस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् सनत्कुमार उवाच
इत्यादिबहुवार्त्ता च श्रुतिस्मृतिपरां शुभाम् ।
प्रोवाच शंकरः तस्मै बोधयन् ज्ञानमुत्तमम् ॥
शिक्षितः शंखचूडेन स दूतस्तर्कवित्तमः ।
उवाच वचनं नम्रो भवितव्यविमोहितः ॥
दूत उवाच
त्वया यत्कथितं देव नान्यथा तत्तथा वचः ।
तथ्यं किंचिद्यथार्थं च श्रूयतां मे निवेदनम् ॥
ज्ञातिद्रोहे महत्पापं त्वयोक्तमधुना च यत् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३५ । तुम पूर्वजन्ममें श्रीकृष्णके पार्षद, परम धार्मिक ॥ १८ एवं सभी गोपोंमें मुख्य थे, किंतु इस समय । राधिकाके शापसे दानवेन्द्र हो गये हो । यद्यपि तुम । । दानवयोनिमें आ गये हो, किंतु वास्तवमें दानव तुम नहीं ॥ १ ९ हो । इस प्रकार अपने पुराने जन्मका वृत्तान्त जानकर देवताओंके साथ वैर त्याग दो॥१८-१९ ॥ । तुम अपने पदपर स्थित रहकर राज्यका ॥ २० आदरपूर्वक सुखोपभोग करो, देवगणोंसे अधिक द्वेष मत करो एवं विचारपूर्वक राज्य करो ॥ २० ॥
। हे दानव! देवगणोंका राज्य लौटा दो और मेरी ॥ २१ प्रीतिकी रक्षा करो । तुम अपने राज्यपर स्थित रहो और देवता भी अपने पदपर स्थित रहें ॥२१ ॥
। सामान्य प्राणियोंके साथ भी विद्वेष करना बुरा ॥ २२ होता है, फिर देवताओंसे विरोधका तो कहना ही क्या? वे सब कुलीन, शुद्ध कर्म करनेवाले तथा कश्यपके वंशमें उत्पन्न हुए हैं ॥ २२ ॥
। ब्रह्महत्यादि जो कोई भी पाप हैं, वे जाति-॥ २३ द्रोहजनित पापकी सोलहवीं कलाकी भी बराबरी नहीं कर सकते ॥ २३ ॥
सनत्कुमार बोले— [ हे व्यास! ] इस प्रकार शंकरने उत्तम ज्ञानका बोध कराते हुए श्रुति एवं २४ स्मृतिसे सम्बन्धित शुभ बातें उससे कहीं ॥ २४ ॥
तब शंखचूडके द्वारा शिक्षित तथा तर्कविद् वह २५ दूत होनहारसे मोहित होकर विनम्रतापूर्वक इस प्रकार यह वचन कहने लगा— ॥ २५ ॥
दूत बोला — हे देव! आपने जो वचन कहा है, | वह अन्यथा नहीं है, किंतु मेरा कुछ तथ्यपूर्ण एवं २६ यथार्थ निवेदन सुनिये ॥ २६ ॥
आपने अभी जो कहा है कि जातिद्रोह महापाप तत्किमीशासुराणां च न सुराणां वद प्रभो ॥ 11 २७ है । हे ईश! क्या यह असुरोंके लिये ही है, देवोंके
सर्वेषामिति चेत्तद्वै तदा वच्मि विचार्य च ।
निर्णयं ब्रूहि तत्राद्य कुरु संदेहभंजनम् ॥
मधुकैटभयोर्दैत्यवरयोः प्रलयार्णवे ।
शिरश्छेदं चकारासौ कस्माच्चक्री महेश्वर ॥
त्रिपुरैः सह संयुद्धं भस्मत्वकरणं कुतः ।
भवाञ्चकार गिरिश सुरपक्षीति विश्रुतम् ॥
लिये नहीं? हे प्रभो! इसे बताइये ॥ २७ ॥
यदि यह सबके लिये है, तो मैं विचारकर आपसे २८ कुछ कह रहा हूँ, आप ही उसका निर्णय कीजिये और । मेरा सन्देह दूर कीजिये । हे महेश्वर! चक्रधारी विष्णु २ | प्रलयके समय समुद्रमें दैत्यश्रेष्ठ मधु एवं कैटभका है ९ शिरश्छेद क्यों किया? हे गिरिश! यह तो प्रसिद्ध | कि देवताओंके आपने युद्धमें त्रिपुरको भ भस्म पक्षधर ॥ ३० किया, तो ऐसा आपने क्यों किया? ॥ २८-३० 2223 Shivmahapuranam Part I Section_32_1_Back
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अ ० ३५ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड )
गृहीत्वा तस्य सर्वस्वं कुतः प्रस्थापितो बलिः ।
सुतलादि समुद्धर्तुं तद्द्वारे च गदाधरः ॥
सभ्रातृको हिरण्याक्षः कथं देवैश्च हिंसितः ।
शुंभादयोऽसुराश्चैव कथं देवैर्निपातिताः ॥
पुरा समुद्रमथने पीयूषं भक्षितं सुरैः ।
क्लेशभाजो वयं तत्र ते सर्वे फलभोगिनः ॥
क्रीडाभांडमिदं विश्वं कालस्य परमात्मनः ।
स ददाति यदा यस्मै तस्यैश्वर्यं भवेत्तदा ॥
देवदानवयोर्वैरं शश्वन्नैमित्तिकं सदा ।
पराजयो जयस्तेषां कालाधीनः क्रमेण च ॥
तवानयोर्विरोधे च गमनं निष्फलं भवेत् ।
समसंबंधिनां तद्वै रोचते नेश्वरस्य ते ॥
सुरासुराणां सर्वेषामीश्वरस्य महात्मनः ।
इयं ते रहिता लज्जा स्पर्धास्माभिः सहाधुना ॥
यतोऽधिका चैव कीर्तिर्हानिश्चैव पराजये ।
तवैतद्विपरीतं च मनसा संविचार्यताम् ॥
सनत्कुमार उवाच
इत्येतद्वचनं श्रुत्वा संप्रहस्य त्रिलोचनः ।
यथोचितं च मधुरमुवाच दानवेश्वरम् ॥
महेश उवाच
वयं भक्तपराधीना न स्वतंत्राः कदापि हि ।
तदिच्छया तत्कर्माणो न कस्यापि च पक्षिणः ॥
पुरा विधिप्रार्थनया युद्धमादौ हरेरपि ।
मधुकैटभयोर्दैत्यवरयोः प्रलयार्णवे ॥
। देवप्रार्थनया तेन हिरण्यकशिपोः पुरा । प्रह्रादार्थं वधोऽकारि भक्तानां हितकारिणा ९ ६३ विष्णुने बलिका सर्वस्व लेकर उसे पाताल ३१ लोकमें क्यों भेज दिया? सुतल आदि लोकका उद्धार करनेके लिये उसके द्वारपर गदा धारणकर क्यों स्थित हैं? ॥ ३१ ॥
इन देवताओंने भाईसहित हिरण्याक्षको क्यों ३२ मारा और इन्हीं देवताओंने शुम्भादि असुरोंको क्यों मारा? ॥ ३२ ॥
पूर्वकालमें समुद्रमन्थन किये जानेपर देवगणोंने ३३ ही अमृतका पान किया । हम सभीको क्लेश प्राप्त | हुआ, किंतु इसका [ अमृतपानरूप ] फल देवताओंने भोगा ॥ ३३ ॥
यह जगत् भगवान् कालका क्रीडापात्र है, वे ३४ जिस समय जिसे ऐश्वर्य प्रदान करते हैं, उस समय वह ऐश्वर्यवान् हो जाता है । देवताओं एवं दैत्योंका
३५ वैर सदा किसी - न - किसी निमित्त होता आया है ।
क्रमशः जीत और हार कालके अधीन है ॥ ३४-३५ ॥
इन दोनोंके विरोधमें आपका आ जाना ३६ निष्फल प्रतीत हो रहा है । यह विरोध तो समान सम्बन्धियोंका ही अच्छा लगता है, आप सदृश ईश्वरका नहीं ॥३६ ॥
आप तो देवता तथा असुर सभीके स्वामी हैं, ३७ अतः इस समय आप महात्माकी केवल हमलोगोंसे यह स्पर्धा निर्लज्जताकी बात है । विजय होनेपर अधिक कीर्ति तथा पराजय होनेपर हानि - ये दोनों ही आपके लिये सर्वथा विपरीत हैं, इसे मनसे विचार ३८ कीजिये ॥ ३७-३८ ॥ सनत्कुमार बोले — यह वचन सुनकर शिवजी हँसकर दानवराजसे यथोचित मधुर वचन कहने ३ ९ लगे - ॥ ३ ९ ॥ महेश बोले- हम अपने भक्तोंके अधीन हैं, स्वतन्त्र कभी नहीं हैं, हम उनकी इच्छासे ही कर्म करते हैं और किसीके भी पक्षपाती नहीं हैं ॥ ४० ॥
४० / पूर्वकालमें ब्रह्माकी प्रार्थनासे ही प्रलयार्णवमें विष्णु तथा दैत्यश्रेष्ठ मधु - कैटभका युद्ध हुआ था ॥ ४१ ॥
४१ भक्तोंका कल्याण करनेवाले उन्हीं विष्णुने पूर्वकालमें देवताओंकी प्रार्थनासे प्रह्लादकी रक्षाके हिरण्यकशिपुका वध किया था ॥ ४२ ॥
॥ ४२ निमित्त 2223 Shivmaha Do I Section 32 2 Front
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९ ६४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३६
त्रिपुरैः सह संयुद्धं भस्मत्वकरणं ततः ।
देवप्रार्थनयाकारि मयापि च पुरा श्रुतम् ॥ ४३
सर्वैश्वर्याः सर्वमातुर्देवप्रार्थनया पुरा ।
आसीच्छंभादिभिर्युद्धं वधस्तेषां तया कृतः ॥४४
अद्यापि त्रिदशाः सर्वे ब्रह्माणं शरणं ययुः I स सदेवो हरिर्मां च देवः शरणमागतः ॥ ४५
हरिब्रह्मादिकानां च प्रार्थनावशतोऽप्यहम् ।
सुराणामीश्वरो दूत युद्धार्थमगमं खलु ॥ ४६
पार्षदप्रवरस्त्वं हि कृष्णस्य च महात्मनः ।
ये ये हताश्च दैतेया न हि केऽपि त्वया समाः ॥ ४७
का लज्जा महती राजन् मम युद्धे त्वया सह ।
देवकार्यार्थमीशोऽहं विनयेन च प्रेषितः ॥ ४८
गच्छ त्वं शंखचूडं वै कथनीयं च मे वचः ।
स च युक्तं करोत्वत्र सुरकार्यं करोम्यहम् ॥ ४ ९
इत्युक्त्वा शंकरस्तत्र विरराम महेश्वरः ।
उत्तस्थौ शंखचूडस्य दूतोऽगच्छत्तदन्तिकम् ॥ ५०
देवगणोंकी प्रार्थनासे मैंने भी त्रिपुरोंके किया तथा उन्हें भस्म किया - यह बात साथ युद्ध । जानते हैं । पूर्वकालमें देवताओंकी प्रार्थनासे सब लोग सबकी | स्वामिनी तथा सबकी माताने शुम्भादिके साथ किया और उन्होंने उनका वध भी किया ॥ ४३-४४ युद्ध आज भी सभी देवता ब्रह्माकी शरणमें गये और ॥ देवताओंसहित विष्णु - ब्रह्मा मेरी शरण में आये । हे दूत! देवताओंका स्वामी मैं भी ब्रह्मा तथा विष्णुकी प्रार्थनाके कारण युद्धके लिये आया हूँ ॥ ४५-४६ ॥ [ हे दूत! शंखचूडसे कहना कि ] तुम महात्मा श्रीकृष्णके श्रेष्ठ पार्षद हो । पहले जो - जो दैत्य मारे गये, उनमें कोई भी तुम्हारे समान नहीं था ॥४७ ॥
हे राजन्! देवताओंका कार्य करनेके लिये तुम्हारे साथ युद्ध करनेमें मुझे कौन - सी बड़ी लज्जा है । देवताओंके कार्यके लिये मैं ईश्वर विनयपूर्वक भेजा गया हूँ ॥४८ ॥
[ अत: हे दूत! ] तुम जाओ और शंखचूडसे मेरा वचन कह देना कि मैं तो देवकार्य अवश्य करूँगा, उसे जो उचित हो, वैसा करे ॥४ ९ ॥ ऐसा कहकर महेश्वर चुप हो गये और शंखचूडका दूत उठा और उसके पास चला गया ॥५० ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे शङ्खचूडवधे शिवदूतसंवादो नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें शंखचूडवधके अन्तर्गत शिवदूतसंवादवर्णन नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३५ ॥
अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः शंखचूडको उद्देश्यकर देवताओंका दानवोंके साथ महासंग्राम सनत्कुमार उवाच
स दूतस्तत्र गत्वा च शिववाक्यं जगाद ह ।
सविस्तरं यथार्थं च निश्चयं तस्य तत्त्वतः ॥
तच्छ्रुत्वा शंखचूडोऽसौ दानवेन्द्रः प्रतापवान् ।
अंगीचकार सुप्रीत्या रणमेव स दानवः ॥ २ ।
समारुरोह यानं च सहामात्यैश्च सत्वरः । ।
आदिदेश स्वसैन्यं च युद्धार्थं शंकरेण ।
च ॥ ३
सनत्कुमार बोले- उस दूतने वहाँ जाकर शिवजीकी सारी बात तथा उनका निश्चय विस्तारपूर्वक यथार्थ रूपसे कह दिया ॥१ ॥
उसे सुनकर उस प्रतापी दानवेन्द्र शंखचूडने कर बड़े प्रेमके साथ युद्ध करनेकी चुनौती स्वीकार ली ॥ २ ॥
इसके बाद वह बड़ी शीघ्रताके साथ अमात्योंके । सहित विमानपर आरूढ़ हुआ और शंकरजीके आज्ञा । साथ युद्ध करनेके लिये उसने अपनी सेनाको दे दी ॥ ३ ॥
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अ ० ३६ ] रुद्रसंहिता (
शिवः स्वसैन्यं देवांश्च प्रेरयामास सत्वरः ।
स्वयमप्यखिलेशोऽपि सन्नद्धोऽभूच्च लीलया ॥ ४
युद्धारम्भो बभूवाशु नेदुर्वाद्यानि भूरिशः ।
कोलाहलश्च संजातो वीरशब्दस्तथैव च ॥ ५
देवदानवयोर्युद्धं परस्परमभून्मुने ।
धर्मतो युयुधे तत्र देवदानवयोर्गणः ॥ ६
स्वयं महेन्द्रो युयुधे सार्धं च वृषपर्वणा ।
भास्करो युयुधे विप्रचित्तिना सह धर्मतः ॥ ७
दंभेन सह विष्णुश्च चकार परमं रणम् ।
कालासुरेण कालश्च गोकर्णेन हुताशनः ॥ ८
कुबेरः कालकेयेन विश्वकर्मा मयेन च ।
भयंकरेण मृत्युश्च संहारेण यमस्तथा ॥ ९
कालम्बिकेन वरुणश्चंचलेन समीरणः ।
बुधश्च घटपृष्ठेन रक्ताक्षेण शनैश्चरः ॥ १०
जयन्तो रत्नसारेण वसवो वर्चसां गणैः ।
अश्विनौ दीप्तिमद्भ्यां च धूम्रेण नलकूबरः ॥ ११
धुरंधरेण धर्मश्च गणका क्षेण मंगलः ।
शोभाकरेण वैश्वानः पिपिटेन च मन्मथः ॥ १२
गोकामुखेन चूर्णेन खड्गनाम्नासुरेण च ।
धूम्रेण संहलेनापि विश्वेन च प्रतापिना ॥ १३
द्वादशार्का पलाशेन युयुधुर्धर्मतः परे ।
असुरैरमराः सार्द्धं शिवसाहाय्यशालिनः ॥ १४
एकादश महारुद्राश्चैकादशभयंकरैः ।
असुरैर्युयुधुर्वीरैर्महाबलपराक्रमैः ॥ १५
महामणिश्च युयुधे चोग्रचंडादिभिः सह ।
राहुणा सह चन्द्रश्च जीवः शुक्रेण धर्मतः ॥ १६
नन्दीश्वरादयः सर्वे दानवप्रवरैः सह ।
युयुधुश्च महायुद्धे नोक्ता विस्तरतः पृथक् ॥ १७
वटमूले तदा शंभुस्तस्थौ काल्याः सुतेन च ।
सर्वे च युयुधुः सैन्यसमूहाः सतत मुने ॥ १८
रत्नसिंहासने रम्ये कोटिदानवसंयुते ।
उवास शंखचूडश्च रत्नभूषणभूषितः ॥ १ ९
महायुद्धो देवासुरविमर्दनः ।
बभूवाथ चलन्ति स्म महामृधे ॥। २०
नानायुधानि दिव्यानि युद्धखण्ड ) ९ ६५ शिवजीने भी शीघ्रतासे अपनी सेना एवं देवताओंको [ युद्धके लिये ] प्रेरित किया और वे स्वयं सर्वेश्वर होकर लीलापूर्वक युद्धके लिये तैयार हो गये ॥४ ॥
इसके बाद शीघ्र ही युद्ध प्रारम्भ हो गया । उस समय अनेक प्रकारके बाजे बजने लगे, कोलाहल और वीरोंकी गर्जनाएँ होने लगीं ॥५ ॥
हे मुने! देव और दानवोंका परस्पर युद्ध होने लगा । देवता तथा दानव धर्मपूर्वक युद्ध करने लगे ॥ ६ ॥
स्वयं महेन्द्र वृषपर्वाके साथ तथा भास्कर विप्रचित्तिके साथ धर्मपूर्वक युद्ध करने लगे ॥७ ॥
दम्भके साथ विष्णुका महान् युद्ध होने लगा । काल कालासुरके साथ, अग्नि गोकर्णके साथ, कुबेर कालकेयके साथ, विश्वकर्मा मयके साथ, मृत्यु भयंकरके साथ, यमराज संहारके साथ, वरुण कालम्बिकके साथ, समीरण चंचलके साथ, बुध घटपृष्ठके साथ, शनैश्चर रक्ताक्षके साथ, जयन्त रत्नसारके साथ, अष्ट वसु वर्चस्गणोंके साथ, अश्विनीकुमार दोनों दीप्तिमानोंके साथ, नलकूबर धूम्रके साथ, धर्म धुरन्धरके साथ, मंगल गणकाक्षके साथ, वैश्वान शोभाकरके साथ, कामदेव पिपिटके साथ, बारहों आदित्य गोकामुख, चूर्ण, खड्ग नामक असुर, धूम्र, संहल, विश्व, प्रतापी एवं पलाशके साथ धर्मपूर्वक युद्ध करने लगे । शिवकी सहायता प्राप्तकर देवगण असुरोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ ८– -१४ ॥ एकादश महारुद्र भयंकर, महाबली, महापराक्रमी तथा वीर ग्यारह असुरोंसे युद्ध करने लगे । महामणि उग्रचण्ड आदिके साथ, चन्द्रमा राहुके साथ तथा बृहस्पति शुक्राचार्यके साथ धर्मपूर्वक युद्ध करने लगे । नन्दीश्वर आदि शिवगण भी दानवोंके साथ युद्ध करने लगे, उसका पृथक् - पृथक् वर्णन विस्तारके भयसे नहीं किया गया॥१५–१७ — ॥ हे मुने! उस समय शिवजी काली एवं पुत्रके साथ वटके मूलमें स्थित रहे और समस्त सैन्यसमूह निरन्तर युद्ध कर रहे थे । रत्नजटित आभूषणोंसे भूषित शंखचूड भी करोड़ों दानवोंसे युक्त रत्नजटित मनोहर सिंहासनपर बैठा हुआ था । इसके बाद देवताओं एवं असुरोंका विनाश करनेवाला महायुद्ध छिड़ गया । उस महायुद्धमें प्रकारके दिव्य आयुध चल रहे थे ॥ १८-३० ॥ नाना
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९ ६६ गदर्ष्टिपट्टिशाश्चक्रभुशुंडिप्रासमुद्गराः निस्त्रिंशभल्लपरिघाः शक्त्युन्मुखपरश्वधाः शरतोमरखड्गाश्च शतघ्न्यश्च सहस्रशः भिंदिपालादयश्चान्ये वीरहस्तेषु शोभिताः शिरांसि चिच्छिदुश्चैभिर्वीरास्तत्र महोत्सवाः वीराणामुभयोश्चैव सैन्ययोर्गर्जतो रणे गजास्तुरंगा बहवः स्यन्दनाश्च पदातयः सारोहवाहा विविधास्तत्रासन् सुविखंडिताः निकृत्तबाहूरुकरकटिकर्णयुगाङ्घ्रयः संछिन्नध्वजबाणासितनुत्रवरभूषणाः समुद्धतकिरीटैश्च शिरोभिः सह कुंडलैः संरंभनष्टैरास्तीर्णा बभौ भूः करभोरुभिः महाभुजैः साभरणैः संछिन्नैः सायुधैस्तथा अंगैरन्यैश्च सहसा पटलैर्वा ससारघैः मृधे भटाः प्रधावंतः कबंधान् स्वशिरोक्षिभिः पश्यन्तस्तत्र चोत्पेतुरुद्यतायुधसद्भुजैः वल्गन्तोऽतितरां वीरा युयुधुश्च परस्परम् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३६ गदा, ऋष्टि, पट्टिश, चक्र, भुशुण्डी ॥ २१ मुद्गर, निस्त्रिंश, भाला, परिघ, शक्ति, प्रास, | परशु, बाण, तोमर, खड्ग, सहस्रों तोपें,, भिन्दिपाल उन्मुख, । । एवं अन्य शस्त्र वीरोंके हाथोंमें शोभित हो ॥। २२ रहे थे ॥ २१-२२ ॥ । महान् उत्साहसे युक्त वीर लोग युद्धमें ॥ २३ गरजती हुई दोनों सेनाओंके वीरोंके सिरोंको इन आयुधोंसे काटने लगे । हाथी, घोड़े, रथ, पैदल । तथा अनेक प्रकारके सवारसहित वाहन युद्धमें ॥ २४ कट रहे थे ॥ २३-२४ ॥ भुजा, जङ्घा, हाथ, कटि, दोनों कान, पैर, ध्वज, ॥ २५ बाण, तलवार, कवच एवं उत्तम आभूषण कटकर पृथ्वीपर गिरने लगे । उस समय योद्धाओंके कटे हुए । किरीट - कुण्डलयुक्त सिरोंसे तथा हाथियोंकी कटी हुई ॥ २६ सूँड़ोंसे, कटी हुई आभूषणयुक्त भुजाओं तथा कटे हुए । आयुधों एवं कटे हुए अन्य अंगोंसे समस्त पृथ्वी ॥ २७ मधुमक्खीके छत्तोंके समान पट गयी ॥ २५-२७ ॥ । युद्धमें कटे हुए सिरोंकी आँखोंसे कबन्धकी ॥ २८ ओर देखते हुए योद्धा शस्त्र धारण की हुई भुजाओंको ऊपरकी ओर उठाकर जहाँ - तहाँ दौड़ रहे थे ॥ २८ ॥
महाबलवान् एवं महापराक्रमी वीर तीव्र नाद शस्त्रास्त्रैर्विविधैस्तत्र महाबलपराक्रमाः ॥२ ९ करते हुए अनेक प्रकारके शस्त्रास्त्रोंसे परस्पर युद्ध
केचित्स्वर्णमुखैर्बाणैर्विनिहत्य भटान्मृधे ।
व्यनदन् वीरसन्नादं सतोया इव तोयदाः ॥
सर्वतः शरकूटेन वीरः सरथसारथिम् ।
वीरं संछादयामास प्रावृट्सूर्यमिवाम्बुदः ॥
अन्योऽन्यमभिसंसृत्य युयुधुर्द्वन्द्वयोधिनः ।
आह्वयंतो विशंतोऽग्रे क्षिपंतो मर्मभिर्मिथः ॥
सर्वतो वीरसंघाश्च नानाबाहुध्वजायुधाः
।
व्यदृश्यंत महासंख्ये कुर्वन्तः सिंहसंरवम् ॥
महारवान् स्वशंखांश्च विदध्मुर्वै पृथक् पृथक् ।
वल्गनं चक्रिरे तत्र महावीराः प्रहर्षिताः ॥
कर रहे थे । कुछ योद्धा युद्धमें सुवर्णमुखवाले बाणोंसे योद्धाओंको मारकर जलवृष्टि करनेवाले मेघोंके ३० । समान वीरगर्जना कर रहे थे । कोई वीर चारों ओरसे अपने बाणोंसे रथसहित सारथीको इस प्रकार ढँक ३१ दे रहा था, जिस प्रकार बादल सूर्यको ढँक लेता है ॥ २ ९ –३१ ॥ द्वन्द्वयुद्ध करनेवाले वीर एक - दूसरेसे ३२ भिड़कर ललकारते हुए तथा एक - दूसरेके आगे जाते | हुए मर्मस्थलपर प्रहार करते हुए आपसमें युद्ध कर रहे थे ॥ ३२ ॥
ओरसे अपने उस महायुद्धमें वीरसमूह चारों लेकर ३३ हाथोंमें नाना प्रकारके ध्वज तथा आयुध में । । सिंहनाद करते हुए दिखायी पड़ रहे थे । उस युद्ध | महावीर महान् शब्द करनेवाले अपने शंखोंको पृथक्- कर ३४ | पृथक् बजा रहे थे और प्रसन्न होकर घोर नाद
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अ ० ३७ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड ) ९ ६७ एवं चिरतरं कालं देवदानवयोर्महत् । रहे थे । इस प्रकार दीर्घकालतक देवताओं तथा बभूव युद्धं विकटं करालं वीरहर्षदम् ॥ ३५ दानवोंका विकट, भयंकर तथा वीरोंको हर्षित करनेवाला महाप्रभोश्च लीलेयं शंकरस्य परात्मनः । महायुद्ध हुआ । परमात्मा महाप्रभु शंकरकी यह लीला यया संमोहितं सर्वं है, जिसने देवता, मनुष्य एवं असुरोंसहित सभीको
सदेवासुरमानुषम् ॥ ३६ । मोहित कर रखा है॥३३–३६ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे शङ्खचूडवधे परस्परयुद्धवर्णनं नाम षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें शंखचूडवधके ॥ ३६ ॥
अन्तर्गत परस्परयुद्धवर्णन नामक छत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३६ ॥
अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः शंखचूडके साथ कार्तिकेय आदि महावीरोंका युद्ध सनत्कुमार उवाच
तदा देवगणाः सर्वे दानवैश्च पराजिताः ।
दुद्रुवुर्भयभीताश्च शस्त्रास्त्रक्षतविग्रहाः ॥ १
ते परावृत्य विश्वेशं शंकरं शरणं ययुः ।
त्राहि त्राहीति सर्वेशेत्यूचुर्विह्वलया गिरा ॥ २
दृष्ट्वा पराजयं तेषां देवादीनां स शंकरः ।
सभयं वचनं श्रुत्वा कोपमुच्चैश्चकार ह ॥ ३
निरीक्ष्य स कृपादृष्ट्या देवेभ्यश्चाभयं ददौ ।
बलं च स्वगणानां वै वर्द्धयामास तेजसा ॥ ४
शिवाज्ञप्तस्तदा स्कन्दो दानवानां गणैः सह ।
युयुधे निर्भयः संख्ये महावीरो हरात्मजः ॥ ५
कृत्वा क्रोधं वीरशब्दं देवो यस्तारकान्तकः ।
अक्षौहिणीनां शतकं समरे स जघान ह ॥ ६
रुधिरं पातयामास काली कमललोचना ।
तेषां शिरांसि संछिद्य बभक्ष सहसा च सा ॥ ७
पपौ रक्तानि तेषां च दानवानां समन्ततः ।
युद्ध चकार विविधं सुरदानवभीषणम् ॥ ८
शतलक्षं गजेन्द्राणां दानवानां तथा रणे ।
मुखे चिक्षेप लीलया ॥ ९
समादायैकहस्तेन सनत्कुमार बोले— [ हे व्यासजी! ] उस समय दानवोंने सभी देवताओंको पराजित कर दिया, जिससे शस्त्रास्त्रोंसे क्षत - विक्षत अंगोंवाले देवता भयभीत होकर भागने लगे ॥१ ॥
वे लौटकर शिवजीकी शरणमें गये और ' हे सर्वेश! रक्षा करो, रक्षा करो ', ऐसा विह्वल वाणीमें कहने लगे ॥ २ ॥
तब उन देवताओंकी इस प्रकारकी पराजय देखकर तथा उनका भययुक्त वचन सुनकर शिवजीने महान् क्रोध किया । कृपादृष्टिसे देखकर उन्होंने देवताओंको अभयदान दिया तथा अपने तेजसे गणोंके बलको बढ़ाया॥३-४ ॥ तब शिवपुत्र महावीर कार्तिकेय शिवजीकी आज्ञा लेकर रणक्षेत्रमें दानवोंके साथ निर्भय होकर युद्ध करने लगे । तारकासुरका वध करनेवाले कार्तिकेयने क्रोध करके वीरध्वनि करते हुए उनकी सौ अक्षौहिणी सेनाको युद्धमें मार डाला । कमलके समान नेत्रवाली काली सहसा दैत्योंका सिर काटकर रक्त बहाने लगीं और उनका भक्षण करने लगीं ॥५-७ ॥ वे दानवोंके रुधिरका चारों ओरसे पान करने और देवताओं तथा दानवोंके लिये भयंकर लगीं प्रकारके युद्ध करने लगीं । उन्होंने रणमें विविध लीलापूर्वक सौ लाख हाथी एवं सौ लाख दानवोंको उठाकर मुखमें डाल लिया ॥ ८ - ९ ॥ एक हाथसे
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९ ६८ कबंधानां सहस्रं च सन्ननर्त रणे बहु महान् कोलाहलो जातः क्लीबानां च भयंकरः पुनः स्कंदः प्रकुप्योच्चैः शरवर्षां चकार ह पातयामास क्षणतः कोटिशो ऽसुरनायकान्
दानवाः शरजालेन स्कन्दस्य क्षतविग्रहाः ।
भीताः प्रदुद्रुवुः सर्वे शेषा मरणतस्तदा ॥
वृषपर्वा विप्रचित्तिर्दंडश्चापि विकंपनः ।
स्कंदेन युयुधुः सार्द्धं तेन सर्वे क्रमेण च ॥
महामारी च युयुधे न बभूव पराङ्मुखी ।
बभूवुस्ते क्षतांगाश्च स्कंदशक्तिप्रपीडिताः ॥
महामारीस्कंदयोश्च विजयोऽभूत्तदा मुने । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३७ । हजारों कबन्ध युद्धभूमिमें नृत्य करने ॥ १० उस समय महान् कोलाहल होने लगा लगे । कायरोंके लिये भयप्रद था । इसके बाद, जो । । कुपित हो पुनः बाणोंकी वर्षा करने लगे और स्कन्द उन्होंने ॥ ११ क्षणभरमें करोड़ों असुरसेनापतियोंको मारकर गिरा दिया ॥ १०-११ ॥ जो शेष दानव मरनेसे बच गये, वे सब १२ स्कन्दके बाणोंसे क्षत - विक्षत तथा भयभीत होकर भागने लगे ॥१२ ॥
तब वृषपर्वा, विप्रचित्ति, दण्ड, विकम्पन — ये १३ सब बारी - बारीसे स्कन्दके साथ युद्ध करने लगे ॥ १३ ॥
महामारी भी युद्ध करने लगी और युद्धसे १४ नहीं हटी । उधर स्कन्दकी शक्तिसे पीड़ित हुए असुरगण क्षत - विक्षत होने लगे । हे मुने! उस समय स्कन्द एवं महामारीकी विजय हुई, स्वर्गमें नेदुर्दुदुभयः स्वर्गे पुष्पवृष्टिः पपात ह ॥। १५ दुन्दुभियाँ बजने लगीं और फूलोंकी वृष्टि होने
स्कंदस्य समरं दृष्ट्वा महारौद्रं तमद्भुतम् ।
दानवानां क्षयकरं यथा प्रकृतिकल्पकम् ॥
महामारीकृतं तच्चोपद्रवं क्षयहेतुकम् ।
चुकोपातीव सहसा संनद्धोऽभूत्स्वयं तदा ॥
वरं विमानमारुह्य नानाशस्त्रास्त्रसंयुतम् ।
अभयं सर्ववीराणां नानारत्नपरिच्छदम् ॥
महावीरैः शंखचूडो जगाम रथमध्यतः ।
धनुर्विकृष्य कर्णान्तं चकार शरवर्षणम् ॥
तस्य सा शरवृष्टिश्च दुर्निवार्या भयंकरी ।
महाघोरांधकारश्च वधस्थाने बभूव ह ॥
देवाः प्रदुद्रुवुः सर्वे येऽन्ये नन्दीश्वरादयः ।
एक एव कार्त्तिकेयस्तस्थौ समरमूर्द्धनि ॥
पर्वतानां च सर्पाणां नागानां शाखिनां तथा ।
राजा चकार वृष्टिं च दुर्निवार्यां भयंकरीम् ॥
तद्वृष्ट्या प्रहतः स्कन्दो बभूव शिवनन्दनः ।
नीहारेण च सांद्रेण संवृतो भास्करो यथा ॥
लगी ॥ १४-१५ ॥
तब कार्तिकेयके महाभयानक, अद्भुत, दानवोंका १६ क्षय करनेवाले एवं कल्पान्तसदृश और महामारीके द्वारा किये गये क्षयकारी उपद्रवको देखकर वह शंखचूड अत्यन्त कुपित हुआ और स्वयं सहसा १७ युद्धके लिये तैयार हुआ ॥ १६-१७ ॥ वह शंखचूड अनेक प्रकारके अस्त्र - शस्त्रोंसे १८ युक्त, विविध रत्नोंसे जटित तथा सभी वीरोंको अभय देनेवाले विमानपर चढ़कर महावीरोंके साथ रणभूमिमें | उपस्थित हो गया और कर्णपर्यन्त धनुषकी प्रत्यंचा १ ९ खींचकर बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ १८-१९ ॥ उसकी वह शरवृष्टि भयानक थी तथा २० प्रतीकारके योग्य नहीं थी, उससे युद्धस्थलमें घनघोर अन्धकार छा गया ॥ २० ॥ थे,
सभी देवता तथा नन्दीश्वर आदि जो अन्य २१ वे महागण भागने लगे, उस युद्धमें एकमात्र कार्तिकेय ही डटे रहे ॥ २१ ॥ एवं
उस समय दानवराजने पर्वतों, सर्पों, नागों २२ वृक्षोंकी भयंकर एवं दुर्निवार्य वर्षा की, उस, वृष्टिसे हो । शिवपुत्र स्कन्द उसी प्रकार आहत ( आच्छन्न ) ॥ २३ गये, जैसे घने कोहरेसे आच्छादित सूर्य ॥ २२-२३
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अ ० ३७ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड ) ९ ६ ९
नानाविधां स्वमायां च चकार मयदर्शिताम् ।
तां नाविदन् सुराः केऽपि गणाश्च मुनिसत्तम ॥
तदैव शङ्खचूडश्च महामायी महाबलः ।
शरेणैकेन दिव्येन धनुश्चिच्छेद तस्य वै ॥
बभञ्ज तद्रथं दिव्यं चिच्छेद रथरक्षकान् ।
मयूरं जर्जरीभूतं दिव्यास्त्रेण चकार सः ॥
शक्तिं चिक्षेप सूर्याभां तस्य वक्षसि घातिनीम् ।
मूर्च्छामवाप सहसा तत्प्रहारेण स क्षणम् ॥
पुनश्च चेतनां प्राप्य कार्तिकः परवीरहा । हे मुनिश्रेष्ठ! उसने मय दानवके द्वारा सिखायी २४ गयी अपनी अनेक प्रकारकी माया फैलायी, किंतु कोई भी देवता तथा गण उसे नहीं जान सके ॥ २४ ॥
उसी समय महामायावी एवं महाबली २५ शंखचूडने अपने एक ही दिव्य बाणसे उनके धनुषको काट दिया ॥ २५ ॥
उसने उनके दिव्य रथ एवं रथके रक्षकोंको २६ नष्ट कर दिया तथा अपने दिव्यास्त्रसे उनके मयूरको जर्जर कर दिया ॥ २६ ॥
उसने उनके वक्ष: स्थलपर सूर्यके समान देदीप्यमान २७ एवं आघात करनेवाली अपनी शक्ति चलायी, तब उसके प्रहारसे वे कार्तिकेय सहसा मूर्च्छित हो गये ॥ २७ ॥
पुनः [ क्षणमात्रमें ] चेतना प्राप्तकर शत्रुवीरोंको रत्नेन्द्रसारनिर्माणमारुरोह स्ववाहनम् ॥२८ नष्ट करनेवाले कार्तिकेय अपने महारत्नजटित
स्मृत्वा पादौ महेशस्य साम्बिकस्य च षण्मुखः ।
शस्त्रास्त्राणि गृहीत्वैव चकार रणमुल्बणम् ॥
सर्पांश्च पर्वतांश्चैव वृक्षांश्च प्रस्तरांस्तथा ।
सर्वांश्चिच्छेद कोपेन दिव्यास्त्रेण शिवात्मजः ॥
वह्निं निवारयामास पार्जन्येन शरेण ह ।
रथं धनुश्च चिच्छेद शंखचूडस्य लीलया ॥
सन्नाहं सर्ववाहांश्च किरीटं मुकुटोज्ज्वलम् ।
वीरशब्दं चकारासौ जगर्ज च पुनः पुनः ॥
चिक्षेप शक्तिं सूर्याभां दानवेन्द्रस्य वक्षसि ।
संप्राप मूर्च्छा दीर्घतमेन च ॥
तत्प्रहारेण मुहूर्तमात्रं तत्क्लेशं विनीय स महाबलः । चेतनां प्राप्य चोत्तस्थौ जगर्ज हरिवर्चसः
शक्त्या जघान तं चापि कार्तिकेयं महाबलम् ।
स पपात महीपृष्ठेऽमोघां कुर्वन् विधिप्रदाम् ॥
काली गृहीत्वा तं क्रोडे निनाय शिवसन्निधौ ज्ञानेन तं शिवश्चापि जीवयामास लीलया ददौ बलमनंतं च समुत्तस्थौ प्रतापवान् गमनाय मतिं चक्रे पुनस्तत्र शिवात्मजः वाहनपर सवार हो गये । वे कार्तिकेय पार्वतीसहित शिवके चरणोंका स्मरणकर अस्त्र - शस्त्र लेकर घनघोर २ ९ संग्राम करने लगे ॥ २८-२९ ॥ उन शिवपुत्रने क्रोधपूर्वक अपने दिव्यास्त्रसे ३० उसके समस्त सर्पों, पर्वतों, वृक्षों एवं पाषाणोंको काट दिया ॥३० ॥
उन्होंने पार्जन्य बाणके द्वारा लीलासे ही शंखचूडके ३१ आग्नेयास्त्रको शान्त कर दिया और उसका रथ तथा धनुष भी काट डाला । वे उसके कवच, समस्त वाहन, उज्ज्वल किरीट एवं मुकुटको नष्टकर वीरध्वनि करने ३२ लगे तथा बारंबार गरजने लगे॥३१-३२ ॥ उसके बाद उन्होंने दानवेन्द्रकी छातीपर सूर्यके समान देदीप्यमान शक्तिसे प्रहार किया । उस अत्यन्त ३३ तीव्र प्रहारसे वह मूर्च्छित हो गया । वह महाबली थोड़ी ही देरमें शक्तिकी पीड़ा दूरकर चेतना प्राप्त करके उठ ॥ ३४ गया तथा सिंहके समान गर्जना करने लगा ॥ ३३-३४ ॥ उस महाबलीने कार्तिकेयपर अपनी शक्तिसे प्रहार ३५ किया, तब कार्तिकेय विधाताके द्वारा दी गयी शक्तिको अमोघ सिद्ध करनेके लिये पृथ्वीतलपर गिर पड़े ॥ ३५ ॥
तब काली उन्हें अपनी गोद में उठाकर शिवजीके । ले आयीं । शिवजीने अपनी लीलासे ज्ञानके द्वारा ॥ ३६ पास उन्हें जीवित कर दिया और उन्हें अनन्त बल प्रदान किया । तब वे महाप्रतापी शिवपुत्र उठ बैठे तथा पुनः । जानेका विचार करने लगे ॥ ३६-३७ ॥ ॥ ३७ युद्धमें
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९ ७० एतस्मिन्नन्तरे वीरो वीरभद्रो महाबलः शंखचूडेन युयुधे समरे बलशालिना ववर्ष समरेऽस्त्राणि यानि यानि च दानवः चिच्छेद लीलया वीरस्तानि तानि निजैः शरैः दिव्यान्यस्त्राणि शतशो मुमुचे दानवेश्वरः तानि चिच्छेद तं बाणैर्वीरभद्रः प्रतापवान् ॥
अथातीव चुकोपोच्चैः शंखचूडः प्रतापवान् ।
शक्त्या जघानोरसि तं स चकंपे पपात कौ ॥
क्षणेन चेतनां प्राप्य समुत्तस्थौ गणेश्वरः ।
जग्राह च धनुर्भूयो वीरभद्रो गणाग्रणीः ॥
एतस्मिन्नन्तरे काली जगाम समरं पुनः ।
भक्षितुं दानवान् स्वांश्च रक्षितुं कार्तिकेच्छया ॥
वीरास्तामनुजग्मुश्च ते च नन्दीश्वरादयः ।
सर्वे देवाश्च गंधर्वा यक्षा रक्षांसि पन्नगाः ॥
मद्यभांडांश्च बहुशः शतशो वाद्यवाहकाः ।
पुनः समुद्यताश्चासन् वीरा उभयतोऽखिलाः ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३८ । इसी बीच महाबली तथा पराक्रमी वीरभद्र बलशाली ॥ ३८ शंखचूडके साथ रणक्षेत्रमें युद्ध करने लगे ॥ ३८ ॥
। उस दानवने समरमें जिन - जिन अस्त्रोंको ॥ ३ ९ । उन - उन अस्त्रोंको उन वीरभद्रने लीलापूर्वक चलाया अपने, बाणोंसे नष्ट कर दिया ॥३ ९ ॥ । तब उस दानवेश्वरने सैकड़ों दिव्य अस्त्र ४० छोड़े, किंतु प्रतापी वीरभद्रने अपने बाणोंसे उनका छेदन कर दिया ॥ ४० ॥
तब प्रतापी शंखचूड अत्यन्त कुपित हुआ । ४१ उसने अपनी शक्तिके द्वारा उनकी छातीपर प्रहार किया, जिससे वे काँप उठे और पृथ्वीपर गिर गये ॥ ४१ ॥
इसके बाद गणोंमें प्रमुख गणेश्वर वीरभद्र ४२ क्षणमात्रमें चेतना प्राप्तकर उठ बैठे और उन्होंने पुन: अपना धनुष ले लिया ॥ ४२ ॥
इसी बीच काली कार्तिकेयकी इच्छासे दानवोंका ४३ भक्षण करने तथा अपने गणोंकी रक्षा करनेहेतु युद्धभूमिमें गयीं और वे नन्दीश्वर आदि वीरगण, सभी देवता, गन्धर्व, ४४ यक्ष, राक्षस तथा नाग उनके पीछे - पीछे चलने लगे ।
बाजे बजने लगे, सैकड़ों वीर मधुभाण्ड लिये हुए थे ।
४५ । दोनों पक्षके वीर युद्धके लिये उद्यत थे॥४३–४५ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे शङ्खचूडवधे ससैन्यशंखचूडयुद्धवर्णनं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें शंखचूडवधके अन्तर्गत ससैन्यशंखचूडयुद्धवर्णन नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३७ ॥
अथाष्टत्रिंशोऽध्यायः श्रीकालीका शंखचूडके साथ महान् युद्ध, आकाशवाणी सुनकर कालीका शिवके पास आकर युद्धका वृत्तान्त बताना सनत्कुमार उवाच
सा च गत्वा हि संग्रामं सिंहनादं चकार ह ।
देव्याश्च तेन नादेन मूर्च्छामापुश्च दानवाः ॥
अट्टाट्टहासमशिवं चकार च पुनः पुनः ।
तदा पपौ च माध्वीकं ननर्त रणमूर्द्धनि ॥
उग्रदंष्ट्रा चोग्रदंडा कोटवी च पपौ मधु ।
अन्याश्च देव्यस्तत्राजौ ननृतुर्मधु संपपुः ॥
सनत्कुमार बोले - [ हे व्यास! ] महादेवीने | युद्धस्थलमें पहुँचते ही सिंहनाद किया, देवीके उस १ नादसे दानव मूच्छित हो गये ॥ १ ॥ वे
किया, भगवतीने बार - बार अशुभ अट्टहास ॥ २ ॥
२ मद्यपान करने लगीं तथा युद्धभूमिमें नृत्य करने लगीं इसी प्रकार उग्रदंष्ट्रा, उग्रदण्डा, कोटवी आदि । भी मधुपान करने लगीं । अन्य देवियाँ भी युद्धक्षेत्रमें ३ । मधुपान और नृत्य करने लगीं ॥ ३ ॥