शिव स्वरोदय - हिन्दी भाष्य सहित — पृष्ठ 11–20
शिव स्वरोदय - हिन्दी भाष्य सहित · Khemraj Shri Krishna Das · पृष्ठ 11–20
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श्रीः । शिवस्वरोदयः ।
भाषाटीकासमेतः ।
महेश्वरं नमस्कृत्यशैलजांगणनायकम् ॥
गुरुं च परमात्मानं भजे संसारतारणम् ॥ १ ॥
अर्थ-महादेव, पार्वती, गणेश, गुरु और संसार पार करनेवाले परमात्माको भजताहूं अर्थात् प्रणाम आदिसे उनका सेवन करताहूं ॥ १ ॥
देव्युवाच ॥ देवदेवमहादेवकृपांकृत्वाममोपरि ॥ सर्वसिद्धिकरंज्ञानंकथयस्वममप्रभो ॥ २ ॥
अर्थ-पार्वती कहतीहै कि हेदेवताओंके देव हेप्रभो मेरे ऊपर कृपा करके संपूर्ण सिद्धियोंके करनेवाले ज्ञानको मेरेलिये कहो ॥ २ ॥
कथं ब्रह्मांडमुत्पन्नंकथंवापरिवर्तते ॥ कथं विलीयतेदेववदब्रह्मांडनिर्णयम् ॥ ३ ॥
अर्थ -हेदेव यह ब्रह्माण्ड कैसे उत्पन्न होताहै और किसप्रकार इसकी पालना होतीहै और कैसे इसकी प्रलय होतीहै इस ब्रह्माण्डके निर्णयको मुझे कहो ॥ ३ ॥
ईश्वरउवाच ॥ तत्त्वाद्ब्रह्मांडमुत्पन्नंतत्त्वेनपरिव र्त्तते ॥ तत्त्वेविलीयतेदेवितत्त्वाद्ब्रह्मांडनिर्णयः ४ ॥
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( ) २ शिवस्वरोदय । अर्थ-महादेव बोले यह ब्रह्माण्ड तत्वोंसे उत्पन्न होताहै और तत्वोंसेही इसकी पालना होतीहै और तत्वोंमेंही लीन होजाताहै-इससे तत्वोंसेही इसका निर्णय समझो ॥ ४ ॥
देव्युवाच ॥ तत्त्वमेव परं मूलं निश्चितं तत्त्व- वादिभिः॥तत्त्वस्वरूपंकिंदेवतत्त्वमेवप्रकाशय ५ अर्थ -पार्वती बोली कि तत्ववादियोंने ब्रह्माण्डका मूल तत्वकोही निश्चित कियाहै इससे हेदेव तत्वका स्वरूप क्याहै सो मेरेप्रति आपही प्रगट करें ॥ ५ ॥
ईश्वरउवाच || निरंजनोनिराकारएकोदेवो महे श्वरः॥तस्मादाकाशमुत्पन्नमाकाशाद्वायुसंभवः ६ अर्थ- महादेव बोले कि मायारहित निराकार एक देव परमेश्वरहै उससे आकारांपैदाहुआ और आकाशसे वायु उत्पन्नहुई ॥ ६ ॥
वायोस्तेजस्ततश्चापस्ततः पृथ्वीसमुद्भवः ॥ एतानिपंचतत्वानिविस्तीर्णानिचपंचधा ॥ ७ ॥
अर्थ-वायुसे तेज और तेजसे जल और जलसे पृथ्वी उत्पन्न हुई ये पांच तत्व एक २ के प्रति पांच प्रकारसे विस्तारको प्राप्त होते हैं अर्थात पंचीकरण करनेसे पच्चीसतत्व होते हैं ।॥ ७ ॥
तेभ्योब्रह्मांडमुत्पन्नंतैरेवपरिवर्त्तते ॥ विलीयतेचतत्रैवतत्रैवरमतेपुनः ॥ ८ ॥
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( ) भाषाटीकासमेत । ३ अर्थ-इनसे ब्रह्माण्ड उत्पन्न होताहै और इन्ही ब्रह्माण्डकी पालना होतीहै और इन्हीमें लीन होकर फिर सूक्ष्म रूपसे बना रहताहै ॥ ८ ॥
पंचतत्त्वमयेदेहेपंचतत्त्वानिसुंदरी ॥ सूक्ष्मरूपेणवर्त्ततेज्ञायंतेतत्त्वयोगिभिः ॥ ९ ॥
अर्थ-हे सुंदरि पांच तत्वोंसे पैदा हुये देहमें ये पांचोंतत्व सूक्ष्म रूपसे वर्तते हैं उनको तत्वोंके ज्ञाता योगीजन जानतेहैं ॥ ९ ॥
अथस्वरंप्रवक्ष्यामिशरीरस्थस्वरोदयम् ॥ हंसचारस्वरूपेण भवेज्ज्ञानंत्रिकालजम् ॥ १० ॥
अर्थ- अब शरीरके विषे स्थित स्वरोंकी उत्पत्तिहै जिससे ऐसे जो अकार आदिस्वर उनको कहताहूं जिनके ज्ञानसे हंस चार रूपसे भूत भविष्यत् वर्तमान काला ज्ञान होताहैं ॥ १० ॥
गुह्याद्गुह्यतरंसारमुपकारप्रकाशनम् ॥ इदंस्वरोदयंज्ञानंज्ञानानांमस्तकेमणिः ॥ ११ ॥
अर्थ-यह स्वरोदयज्ञान जितनी गोप्य व छिपी वस्तुहैं उनमें गुप्त -सार -उपकारोंका प्रकाशक है और सब ज्ञानका शिरोमणी है ॥ ११ ॥
सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरंज्ञानंसुबोधंसत्यप्रत्ययम् ॥ आश्चर्यनास्तिके लोकेआधारत्वास्तिकेजने १२ ॥
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( 8 ) शिवस्वरोदय । अर्थ-और यह स्वरोदय ज्ञान और भली प्रकार जानने योग्य और प्रतीतिका करताहै जो जन नास्तिक हैं उनको आश्वर्य दीखताहै और जो आस्तिकहैं उनका आधारहैं ॥ १२ ॥
अथ शिष्यलक्षणम् ।
शांतेशुदेसदाचारेगुरुभक्त्यैकमानसे ॥
दृढचित्तेकृतज्ञेचदेयं चैवस्वरोदयम् ॥ १३ ॥
अर्थ-शांतस्वभाव-शुद्ध-उत्तम आचरणशील- गुरुकी भक्तिमें जिसका मन और दृढ चित्त किये उप- कारोंका ज्ञाता-ऐसे शिष्यकोही स्वरोदय देना ॥ १३ ॥
दुष्टेचदुर्जनेक्रुद्धेनास्तिकेगुरुतल्पगे ॥ हीनसत्वेदुराचारेस्वरज्ञानंनदीयते ॥ १४ ॥
अर्थ-जो दुष्ट -दुर्जन-कोधी -नास्तिक-गुरुस्त्रीगा- मी- अधीर -और दुराचारीहो उसको स्वरकाज्ञान न दे. शृणुत्वंकथितंदेविदेहस्थंज्ञानमुत्तमम् ॥ येनविज्ञातमात्रेणसर्वज्ञत्वंप्रणीयते ॥ १५ ॥
अर्थ-हे देवी तू मेरे कहे हुये देहमें स्थित उत्तम ज्ञान को सुन जिसके ज्ञान मात्रसेही सर्वज्ञ हो जाताहै॥ १५ ॥
स्वरेवेदाश्वशास्त्राणिस्वरेगांधर्वमुत्तमम् ॥ स्वरेचसर्वत्रैलोक्यंस्वरमात्मस्वरूपकम् ॥ १६॥
अर्थ-संपूर्ण वेद -शास्त्र और उत्तम गांधर्व ( गान-
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( ) भाषाटीकासमेत । ५ विद्या ) और संपूर्ण त्रिलोकी ये सब स्वरमेंहींहै -और स्वरही आत्मा स्वरूप है ॥ १६ ॥
स्वरहीनश्वदैवज्ञोनाथहीनंयथागृहम् ॥ शास्त्रहीनं यथावशिरोहीनंचयद्वपुः ॥ १७ ॥
अर्थ-स्वरके ज्ञानसे हीन ज्योतिषी-और स्वामीसे हीन घर -शास्त्रहीन मुख -और शिरसेहीन देह-शोभित नहीं होते ॥ १७ ॥
नाडीभेदं तथाप्राणतत्त्वभेदंतथैवच ॥ सुषुन्नामिश्रभेदंचयोजानातिसमुक्तिगः ॥ १८ ॥
अर्थ-जो मनुष्य नाडी-प्राण-तत्व और सुषुम्ना आदि मिश्रित तीन नाडियोंके भेदको जानता है वह मुक्तिको प्राप्त होताहै ॥ १८ ॥
साकारेवानिराकारेशुभंवायुबलात्कृते ॥ कथयंतिशुभंकेचित्स्वरज्ञानं वरानने ॥ १ ९ ॥ अर्थ-साकार [ व्यावहारिक ] वा निराकार [पार- मार्थिक ] में वायु [ स्वर ] केवल श्रम होताहै और हे पार्वति कोई यह कहते हैं कि स्वरके ही ज्ञानसे शुभ होताहै ॥ १ ९ ॥ ब्रह्मांडखंडपिंडाद्याःस्वरेणैवहिनिर्मिताः ॥ सृष्टिसंहारकर्त्ताचस्वरः साक्षान्महेश्वरः ॥ २० ॥
अर्थ -ब्रह्मांडके खंड और पिंड आदि स्वरकेही
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( ) ६ शिवस्वरोदय । रचेंहैं और सृष्टि और संहारका कर्त्ता साक्षात् महेश्वर [शिव ] रूप स्वरहींहै ॥ २० ॥
स्वरज्ञानात्परंगुह्यंस्वरज्ञानात्परंधनम् ॥ स्वरज्ञानात्परंज्ञानंनवादृष्टंनवाश्रुतम् ॥ २१ ॥
अर्थ -स्वरके ज्ञानसे परे गुह्य-स्वरके ज्ञानसे परे धन-स्वरके ज्ञानसे परे ज्ञान न देखाहै और न सुनाहै २१ शत्रुहन्यात्स्वरवलेतथामित्रसमागमः ॥ लक्ष्मीप्राप्तिःस्वरबलेकीर्तिःस्वरबलेसुखम्॥२२॥
अर्थ-स्वरका बल होय तौ शत्रुको हने और मित्रका समागम-और लक्ष्मी की प्राप्ति और कीर्ति और सुख स्वरके ही बलसे होतीहैं ॥ २२ ॥
कन्याप्राप्तिः स्वरवलेस्वरतोराजदर्शनम् ॥ स्वरेणदेवतासिद्धिःस्वरेणक्षितिपोवशः ॥ २३ ॥
अर्थ-और कन्याकी प्राप्ति [ विवाह ] और राजा का दर्शन -देवता की सिद्धिऔर राजा का वशमें होना स्वरसे ही होतेहैं ॥ २३ ॥
स्वरेणगम्यतेदेशो भोज्यंस्वरवलेतथा ॥ लघुदीर्घस्वरवलेमलंचैव निवारयेत् ॥ २४ ॥
अर्थ-स्वरके ही बलसे देशाटन होताहै और स्वरके ही बलसे भोजन और स्वरके ही बलसे लघुशंका और मलका त्याग होताहै ॥ २४ ॥
सर्वशास्त्रपुराणादिस्मृतिवेदांगपूर्वकम् ॥
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( ) भाषाटीका समेत । ७
स्वरज्ञानात्परंतत्त्वंनास्तिकिंचिद्वरानने ॥ २५ ॥
अर्थ-संपूर्ण शास्त्र और पुराणादि स्मृति और वेदांग आदि ये सब स्वरज्ञानसे परे तत्व नहीं हैं ॥ २५ ॥
नामरूपादिकःसर्वोमिथ्यासर्वेषुविभ्रमः ॥ अज्ञानमोहितामूढायावत्तत्त्वंनविद्यते ॥ २६ ॥
अर्थ-इतने तत्वका ज्ञान नहीं होता तबतक नाम-रूप आदि भ्रम मिथ्या हैं और मूढ जनोंको मोहभी तबतकही है ॥ २६ ॥
इदंस्वरोदयशास्त्रंसर्वशास्त्रोत्तमोत्तमम् ॥ आत्मघटप्रकाशार्थप्रदीपकलिकोपमम् ॥ २७ ॥
अर्थ-यह स्वरोदय शास्त्र संपूर्ण उत्तम २ शास्त्रोंमें उत्तमहै और आत्मारूपी घटके प्रकाशार्थ दीपककी कलिका [ कली ] के समानहै ॥ २७ ॥
यस्मैकस्मै परस्मैवानप्रोक्तंप्रश्नहेतवे ॥ तस्मा देतत्स्वयंज्ञेयमात्मानोवाऽऽत्मनाऽऽत्मनि ॥२८॥
अर्थ-यह स्वरोदय प्रश्न करनेसे जिस किसको नहीं कहना किंतु अपने लिये अपनेही देहमें अपनी बुद्धिसे स्वयं जानना ॥ २८ ॥
नतिथिर्नचनक्षत्रंनवारोग्रहदेवता ॥ नचविष्टिर्व्यतीपातोवैधृत्याद्यास्तथैवच ॥ २ ९ ॥ अर्थ -इस स्वरोदयमें तिथी-नक्षत्र -वार- ग्रह-देवता-भद्रा-व्यतीपात वैधृति आदिका दोष नहींहै २९
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( ) ८ शिवस्वरोदय ।
कुयोगोनास्तिकोदेविभवितावाकदाचन ॥
प्राप्तेस्वरवलेशुद्धेसर्वमेवशुभफलम् ॥ ३० ॥
अर्थ-हे देवि इसमें कोई कुयोग नहीं है और न कभी होगा जब स्वरका शुद्ध बल प्राप्तहो तब संपूर्ण फल शुभही होताहै ॥ ३० ॥
देहमध्येस्थितानाड्योबहुरूपाःसुविस्तरात् ॥ ज्ञातव्याश्वबुधैर्नित्यंस्वदेहज्ञानहेतवः ॥ ३१ ॥
अर्थ -देहके मध्यमें अनेक रूप और विस्तारवाली बहुतसी नाडी स्थितहैं वे सब अपने देहके ज्ञानार्थ विद्वानोंको जाननी ॥ ३१ ॥
नाभिस्थानगकंदोर्ध्वमंकुरादेव निर्गताः ॥ द्विसप्ततिसहस्राणिदेहमध्येव्ययस्थिताः ॥ ३२ ॥
अर्थ-नाभि स्थानके कंदसे ऊपर अंकुरके समान निकसीहैं और देहके मध्यमें ७२००० बहत्तर सहस्र नाडी स्थितहै || ३२ ॥ नाडीस्थाकुंडली शक्तिर्भुजंगाकारशायिनी ॥ ततोदशोध्वगानाड्यो दशैवाधःप्रतिष्ठिताः ॥ ३३॥
अर्थ-नाडीमें स्थित और सर्वके समान सोतीहुयी कुंडली शक्तिहै उससे ऊपरको गई हुयी दश नाडी हैं और दशही नीचेको गयीहैं ॥ ३३ ॥
द्वेद्वेतिर्यग्गतेनाड्यौचतुर्विंशतिसंख्यया ॥ प्रधानादशनाड्यस्तुदशवायुप्रवाहकाः ॥ ३४ ॥
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( ) भाषाटीका समेत । ९ अर्थ-दो २ नाडी तिरछी गयीहैं ये चोवीस नाडी हैं तिनमें दश नाडी प्रधानहैं और दश वायुके प्रवाहको करतीहैं ॥ ३४ ॥
तिर्यगूर्ध्वास्तथानाड्योवायुदेहसमन्विताः ॥ चक्रवत्संस्थितादेहेसर्वाः प्राणसमाश्रिताः ३५॥ अर्थ-तिरछी-ऊपर और नीचे स्थित और वाय और देहके आश्रित सब नाडी देहमें चक्रके समान स्थितहैं और सब प्राणके आधीनहैं ॥ ३५ ॥
तासांमध्येदशश्रेष्ठादशानांतिस्रउत्तमाः ॥ इडाचपिंगलाचैव सुषुम्नाचतृतीयका ॥ ३६॥
अर्थ-उन सब नाडीमें दश नाडी श्रेष्ठहैं और उन दशोंमें ये तीन उत्तमहैं कि इडा, पिंगला और तीसरी सुषुम्ना ३६ गांधारीहस्तिजिह्वाचपूषाचैवयशस्विनी ॥ अलंबुषाकुहूश्चैवशंखिनीदशमीतथा ॥ ३७ ॥
अर्थ-गांधारी-हस्ति जिह्वा -पूषा-यशस्विनी- अलंबुषा- कुहू -और दशवीं शंखिनी-जाननी ॥ ३७ ॥
इडावामेस्थिताभागेपिंगलादक्षिणेस्मृता ॥ सुषुम्नामध्यदेशेतुगांधारीवामचक्षुषि ॥ ३८ ॥
अर्थ-इडा नाडी वामभागमें- पिंगला दक्षिण भागमें और सुषुम्ना मध्य देशमें और गांधारी वामनेत्रमें जाननी ॥ ३८ ॥
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( ) | १० शिवस्वरोदय दक्षिणेहस्तिजिह्वाचपूषाकर्णेचदक्षिणे ॥ यशस्विनीवामकर्णेआननेचाप्यलंबुषा ॥ ३ ९ ॥ अर्थ-दक्षिण नेत्रमें हस्तिजिव्हा और दक्षिण कर्ण-में पूषा और वामकर्णमें यशस्विनी और मुखमें अलं-बुषा जाननी ॥ ३ ९ ॥ कुहूश्वलिंगदेशेतु मूलस्थानेतुशंखिनी ॥ एवंद्वारंसमाश्रित्यतिष्ठंतिदशनाडिकाः ॥ ४० ॥
अर्थ- लिंग देशमें कुहू और गुदास्थानमें शंखिनी जाननीइस प्रकार शरीरके द्वारोंमें दश नाडी टिकतीहैं४ • इडापिंगलासुषुम्नाचप्राणमार्गेसमाश्रिताः ॥ एताहिदशनाड्यस्तुदेहमध्येव्यवस्थिताः ॥ ४१ ॥
अर्थ-इडा पिंगला सुषुम्ना ये तीनों प्राण मार्गमें आश्रितहै ये दश नाडी देहके मध्यमें स्थितहैं ॥ ४१ ॥
नामानिनाडिकानां वातानांतुवदाम्यहम् ॥ प्राणोऽपानःसमानश्चउदानोव्यानएवच ॥ ४२ ॥
अर्थ-नाडियोंके आश्रय जो वायुहैं उनके नाम मैं कहताहूं कि प्राण अपान समान उदान और व्यान४२ नागःकूर्मोथ कृकलोदेवदत्तोधनंजयः ॥ हृदिप्राणोवसेन्नित्यमपानोगुदमंडले ॥ ४३ ॥
अर्थ-नाग कूर्म ककल देवदत्त और धनंजय और प्राणवायु हृदयमें और अपान गुदामंडलमें सदैव वसताहै. समानोनाभिदेशेतुउदानःकंठमध्यगः ॥