शिव स्वरोदय - हिन्दी भाष्य सहित — पृष्ठ 21–30
शिव स्वरोदय - हिन्दी भाष्य सहित · Khemraj Shri Krishna Das · पृष्ठ 21–30
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( ) भाषाटीकासमेत । ११
व्यानोव्यापीशरीरेषु प्रधानादशवायवः ॥ ४४ ॥
अर्थ-समान नाभिदेशमें कंठके मध्यमें उदान और सब शरीरमें व्यापी व्यान वायु होताहै ये दश वायु प्रधानहैं. प्राणाद्याःपंचविख्यातानागाद्याः पंचवायवः ॥ तेषामपिचपंचानांस्थानानिचवदाम्यहम् ॥ ४५ ॥
अर्थ-पांच प्राण आदि और पांच नाग आदिहैं उन नाग आदि पांचों के भी मैं स्थान कहताहूं॥ ४५ ॥
उद्गारेनागआख्यातः कूर्मउन्मीलनेस्मृतः ॥ कृकलःक्षुतकृज्ज्ञेयोदेवदत्तोविजृंभणे ॥ ४६ ॥
अर्थ-उद्गार ( उगलना ) में नाग वायु और नेत्रों- के उन्मीलनमें कूर्म और छींकनेमें कृकल और विजूं- क्षण ( जंभाई ) में देवदत्त वायु जानना ॥ ४६ ॥
नजहातिमृतंवापिसर्वव्यापीधनंजयः ॥ एतेनाडीषु सर्वासुभ्रमंतेजीवरूपिणः ॥ ४७ ॥
अर्थ -और सर्व शरीरमें व्यापी धनंजय वायु मृत शरीरको भी नहीं त्यागता जीवरूपी ये दश वायु सब नाडियों में भ्रमतेंहैं ॥ ४७ ॥
प्रकटंप्राणसंचारंलक्षयेद्देहमध्यतः ॥ इडापिंगलासुषुम्नाभिर्नाडीभिस्तिभिर्बुधः ४८॥ अर्थ-देहके मध्यमें जो प्रकट प्राणका संचारहै उसको इडा पिंगला सुषुम्ना इन तीन नाडियोंसे ही बद्धिमान मनुष्य जाने ॥ ४८ ॥
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( ) | १२ शिवस्वरोदय इडावामेचविज्ञेयापिंगलादक्षिणेस्मृता ॥ इडानाडीस्थितावामाततोव्यस्ताचपिंगला॥४ ९ ॥ अर्थ -वाम भागमें इडा पिंगला कहींहै इडा नाडी वामरूपसे स्थितहै और व्यस्त उलटी पिंगला स्थितहै४ ९ इडायां तुस्थितश्चंद्रः पिंगलायांचभास्करः ॥ सुषुम्नाशं भुरूपेणशंभु सस्वरूपतः ॥ ५० ॥
अर्थ -इडामें चन्द्रमा स्थितहै और पिंगलामें सूर्य और सुषुम्ना हंसरूपसे स्थितहै और हंस शंभरूपसे स्थितहै ॥ ५० ॥
हकारोनिर्गमेप्रोक्तःसकारेणप्रवेशनम् ॥ हकारः शिवरूपेणसकारःशक्तिरुच्यते ॥ ५१ ॥
अर्थ-स्वरके निकसनेमें हकार कहाहै और प्रवे शर्मे सकार, हकार शिवरूप कहाहै और सकार शक्ति-रूप कहाँहै ॥ ५१ ॥
शक्तिरूपः स्थितश्चंद्रवामनाडीप्रवाहकः ॥ दक्षनाडीप्रवाहश्वशंभुरूपोदिवाकरः ॥ ५२ ॥
अर्थ -और वाम नाडीका प्रवाहक चन्द्रमा शक्ति-रूपसे स्थितहै और दक्षिण नाडीका प्रवाहक ( जलने- वाला ) शंभु रूप सूर्य स्थितहै ॥ ५२ ॥
श्वासकारसंस्थेतु यदानंदीयते बुधैः ॥ तद्दानंजीवलोकेस्मिन् कोटिकोटिगुणं भवेत् ५३
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( ) भाषाटीकासमेत । १३ अर्थ-जब श्वास सकारमें स्थितहो उस समय जो दान बुद्धिमान् मनुष्य दें वह दान इस जीवलोकमें कोटि- गुना फल देताहै ॥ ५३ ॥
अनेनलक्षयेद्योगीचैकचित्तःसमाहितः ॥ सर्वमेषविजानीयान्मार्गेवैचंद्रसूर्ययोः ॥ ५४ ॥
अर्थ-एकाग्र चित्त और समाहित ( सावधान ) योगी इसी मार्गसे देखे और चंद्रमा और सूर्यके मार्गमें ही सबको जानलें ॥ ५४ ॥
ध्यायेत्तत्त्वंस्थिरेजीवेअस्थिरेनकदाचन ॥ इष्टसिद्धिर्भवेत्तस्यमहालाभोजयस्तथा ॥ ५५ ॥
अर्थ-जो मनुष्य जिस समय जीव स्थिरहो उसी समय तत्त्वका ध्यान करै अस्थिर ( चंचल ) में कदा-चित न करे उसके इष्टकी सिद्धि होतीहै और महान् लाभ और जय होताहै ॥ ५५ ॥
चंद्रसूर्यसमभ्यासंये कुवैतिसदानराः ॥ अतीतानागतज्ञानंतेपांहस्तगतंभवेत् ॥ ५६ ॥
अर्थ-जो मनुष्य सदैव चंद्र सूर्य स्वरोंका भली प्रकार अभ्यास करतेहैं उनको भूत और भविष्यत्का ज्ञान हस्तगत ( प्रत्यक्ष ) होताहै ॥ ५६ ॥
वामेचामृतरूपास्याज्जगदाप्यायनंपरम् ॥ दक्षिणेचरभागेनजगदुत्पादयेत्सदा ॥ ५७ ॥
अर्थ-वाम भागकी नाडी ( इडा ) अमृतरूप और
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( ) १४ शिवस्वरोदय । सब जगतकी पोषक होती है और दक्षिणके चर भागकी पिंगला नाडी सदैव जगतको पैदा करतीहै ॥ ५७ ॥
मध्यमाभवतिक्रूरादुष्टासर्वत्रकर्मसु ॥ सर्वत्रशुभकार्येषुवामाभवतिसिद्धिदा ॥ ५८ ॥
अर्थ -और मध्यमा ( सुषुम्ना ) नाडी क्रूरा और संपूर्ण कर्मों में दुष्ट होतीहै और वामा नाडी संपूर्ण शुभ कार्योंमें सिद्धिकी दाता होतीहै ॥ ५८ ॥
निर्गमेतुशुभावामाप्रवेशेदक्षिणाशुभा ॥ चंद्रःसमस्तुविज्ञेयोरविस्तुविषमःसदा ॥ ५ ९ ॥ अर्थ -और गमनके समयमें वामा नाडी और प्रवे- शके समयमें दक्षिण शुभ होतीहै और चंद्रमाको सम और सूर्यको विषम सदैव जानना ॥ ५९ ॥
चंद्रःस्त्रीपुरुषःसूर्यचंद्रोगौरोसितोरविः ॥ चंद्रनाडीप्रवाहेणसौम्यकार्याणिकारयेत् ॥६० ॥
अर्थ-चन्द्रमा स्त्री और सूर्य पुरुष और चंद्रमा गौर- वर्ण और सूर्य कृष्ण वर्ण जानना और जब चंद्रमाकी नाडीका प्रवाह हो उससमय सौम्य कार्योंको करे ६० सूर्यनाडी प्रवाहेणरौद्रकर्माणिकारयेत् ॥ सुषुम्नायाःप्रवाहेणभुक्तिमुक्तिफलानिच ॥ ६१ ॥
अर्थ-और सूर्य नाडीके प्रवाहमें रौद्र ( क्रूर ) कर्मों करावें और सुषुम्नाके प्रवाहमें भोग और मुक्ती फलके देनेवाले कार्योंको करे ॥ ६१ ॥
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( ) भाषाटीकासमेत । १५
आदौचंद्रः सिते पक्षेभास्करोहिसितेतरे ॥
प्रतिपत्तोदिनान्याहुस्त्रीणित्रीणिकृतोदयौ ॥६२॥
अर्थ-शुक्ल पक्षमें प्रथम चन्द्रमाका स्वर और कृष्ण पक्षमें प्रथम सूर्यका चलताहै और प्रतिपदासे लेकर तीन २ दिन चन्द्रमा और सूर्यका स्वर बलवान् होताहै ॥ ६२ ॥
3 सार्धद्विघटिकेज्ञेयःशुक्केकृष्णेशशीरविः ॥ वहत्येकदिनेनैवयथाषष्टिघटीःक्रमात् ॥ ६३ ॥
अर्थ -और ढाई ढाई २ ॥ घटी शुक्ल पक्षमें चन्द्रमा ढाई ढाई २ ॥ घटी कृष्ण पक्षमें सूर्य एक दिनमें साठ घटी पर्यंत बहतेहैं अर्थात् दोनों स्वरोंकी क्रमसे २४ चौबीस २ आवृत्ति होतीहैं ॥ ६३ ॥
वहेयुस्तद्वटीमध्येपंचतत्त्वानिनिर्दिशेत् ॥ प्रतिपत्तोदिनान्याहुर्विपरीतेविवर्जयेत् ॥ ६४ ॥
अर्थ-और उन प्रत्येक ढाई २ ॥ घटियोंमें पांचों तत्व वहतेहैं और प्रतिपदासे लेकर जो चन्द्रमा और सूर्यके दिन कहेंहैं उनसे विपरीत होय अर्थात् चन्द्रमाके स्वरमें सूर्यका और सूर्यके समयमें चन्द्रमाका स्वर चले तो उसको वर्ज दे क्योंकि वह अशुभहै ॥ ६४ ॥
शुक्लपक्षेभवेद्वामाकृष्णपक्षेचदक्षिणा ॥ जानीयात्प्रतिपत्पूर्वयोगितद्यतमानसः ॥ ६५ ॥
अर्थ- शुक्ल पक्षमें प्रतिपदासे लेकर प्रथम वामा और
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( ) | १६ शिवस्वरोदय कृष्ण पक्षमें प्रथम दक्षिणा नाडीको योगी एकाग्र अन्तः-करणसे जाने ॥ ६५ ॥
शशांकंवारयेद्रात्रौदिवावारयभास्करम् ॥ इत्यभ्यासरतोनित्यं सयोगीनात्रसंशयः ॥ ६६ ॥
अर्थ- रात्रीके समय चंद्र स्वरको और दिनके समय सूर्य स्वरको निवारण करै इस प्रकार अभ्यासमें जो तत्परहै वही योगीहै इसमें संशय नहीं ॥ ६६ ॥
सूर्येणबध्यते सूर्यश्चंद्रश्चंद्रेणबध्यते ॥ योजानातिक्रियामेतांत्रैलोक्यं वशगंक्षणात्॥६७॥
अर्थ- सूर्यके स्वरसे सूर्य और चंद्रमाके स्वरसे चंद्रमा बंद होताहै और जो मनुष्य इस क्रियाको जान-ताहै उसके वशमें त्रिलोक क्षण मात्रमें होतेहैं ॥ ६७ ॥
उदयं चंद्रमार्गेण सूर्येणास्तमनंयदि ॥ तदातेगुणसंघाताविपरीतंविवर्जतेत् ॥ ६८ ॥
अर्थ-यदि चंद्रमाके स्वरमें सूर्यका उदय हो और सूर्यके स्वरमें अस्त होय तो उस समय अनेक गुणोंके समूह पैदा होतेहैं और इससे विपरीत ( उलटा ) होय तो उसको वर्जदे ॥ ६८ ॥
गुरुशुक्रबुधेदूनां वासरेवामनाडिका ॥ सिद्धिदासर्वकार्येषुशुक्लपक्षेविशेषतः ॥ ६ ९ ॥ अर्थ- बृहस्पति शुक्र बुध और सोम इन चारोंमें वाम नाडी सब कार्योंमें सिद्धि की दाता होती है और शुक्ल
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( ) भाषाटीकासमेत । १७
पक्षमें यह होय तो औरभी विशेष फल होताहै ॥ ६ ९ ॥
अर्कागारकसौरीणांवासरेदक्षनाडिका ॥
स्मर्त्तव्याचरकार्येषुकृष्णपक्षेविशेषतः ॥ ७० ॥
अर्थ-आदित्य मंगल शनैश्वर इन वारोंमें दक्षिण नाडीका स्मरण चर कार्योंमें करना और इसका फल कृष्ण पक्षमें विशेष कर होताहै ॥ ७० ॥
प्रथमंवहतेवायुर्द्वितीयंचतथानलः ॥ तृतीयंवहते भूमिश्चतुर्थंवारुणीवहेत् ॥ ७१ ॥
अर्थ-प्रथम वायु तत्व वहताहै द्वितीयबार अग्नितत्त्व, तृतीय बार भूमि तत्व और चतुर्थ वार वरुण तत्त्व वह- ताहै और पांचवी आकाशतत्व ॥ ७१ ॥
सार्द्धद्विघटिके पंचक्रमेणैवोदयंतिच ॥ क्रमादेकैकनाड्यांचतत्त्वानां पृथगुद्भवः ॥७२ ॥
अर्थ -ढाई घटीके मध्ये ये पूर्वोक्त पांचों तत्व क्रमसे उदय होतेहैं और एक २ नाडीमें भी क्रमसे पृथक् पांचों तत्व उदय होतेहैं ॥ ७२ ॥
अहोरात्रस्यमध्ये तुज्ञेयाद्वादशसंक्रमाः ॥ वृषकर्कटकन्यालिमृगमीनानिशाकरे ॥ ७३ ॥
अर्थ -और रात्रि और दिनके मध्यमें चंद्र और सूर्य-की बारह संक्राति जाननी तिनमें वृष कर्क कन्या वृश्विक मकर मीन संक्राति चंद्रमाकी होतीहैं ॥ ७३ ॥
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( ) १८ शिवस्वरोदय ।
मेषसिंहौचकुंभश्चतुलाचमिथुनंधनम् ॥
उदयेदक्षिणेज्ञेयःशुभाशुभविनिर्णयः ॥ ७४ ॥
अर्थ-मेष सिंह कुंभ तुला मिथुन धन ये संक्रांति सूर्यकी जाननी इस प्रकार उदय और दक्षिणके शुभ अशुभका निर्णय जानना ॥ ७४ ॥
तिष्ठेत्पूवोत्तरेचन्द्रोभानुःपश्चिमदक्षिणे ॥ दक्षनाड्याःप्रसारेतुनगच्छेद्याम्यपश्चिमे ॥ ७५ ॥
अर्थ-पूर्व और उत्तरमें चंद्रमा टिकताहै और पश्चिम और दक्षिणमें सूर्य, दक्षिण नाडीके प्रवाह(स्वर) में दक्षिण और पश्चिममें नजाय ॥ ७५ ॥
वामाचारप्रवाहेतुनगच्छेत्पूर्वउत्तरे ॥ परिपंथिभयंतस्यगतोऽसौननिवर्त्तते ॥ ७६ ॥
अर्थ -और वाम नाडीके प्रचारमें पूर्व और उत्तरमें न जाय जायतौ उसको शत्रुका भय होताहै और गया वह फिर नहीं लौटता ॥ ७६ ॥
तत्रतस्मान्नगंतव्यंबुधैः सर्वहितैषिभिः ॥ तदातत्रतुसंयाते मृत्युरेवनसंशयः ॥ ७७ ॥
अर्थ- तिससे सबके हितैषी उस समय नजाय यदि उससमयमें जायतो मृत्यु होनेमें संदेह नहीं होता ७७ ॥ शुक्लपक्षेद्वितीयायामकेवहतिचंद्रमाः ॥ दृश्यतेलाभदःपुंसांसौम्येसौख्यंप्रजायते ॥ ७८ ॥
अर्थ -यदि शुक्ल पक्षको द्वितीयाके दिन सूर्यके प्रवा-
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( ) भाषाटीकासमेत । १ ९ हमें चंद्रमा वहे तो पुरुषोंको लाभदायक होताहै और उस समय सौम्य कार्य किया जाय तो सुख होताहै ७८ ॥ सूर्योदयेयदासूर्यचंद्रश्चंद्रोदये भवेत् ॥ सिध्यंतिसर्वकार्याणिदिवारात्रिगतान्यपि ॥ ७९ ॥
अर्थ - जिस समय सूर्यके उदयमें सूर्य और चंद्रमाके उदयमें चंद्रमाकाही स्वरहो उस समय दिन वा रात्रिमें किये हुये सब काम सिद्ध होतेहैं ॥ ७ ९ ॥ चंद्रकालेयदासूर्यः सूर्यश्चंद्रोदयेभवेत् ॥ उद्वेगःकलहोहानिःशुभंसवैनिवारयेत् ॥ ८० ॥
अर्थ-जिस समय चंद्रमाके समय में सूर्य और सूर्यके समयमें चंद्रमा होय तब उद्वेग कलह हानि होतेहैं और संपूर्ण शुभकी निवृत्ति होतीहै ॥ ८० ॥
सूर्यस्यवाहेप्रवदंतिविज्ञाज्ञानंह्यगम्यस्यतुनिश्च येन ॥ इवासेनयुक्तस्यतुशीतरश्मेःप्रवाहकाले फलमन्यथास्यात् ॥ ८१ ॥
अर्थ-बुद्धिमान् मनुष्य सूर्यके प्रवाहमें अगम्य (जो न देखी न सुनी ) वस्तुको ज्ञान निश्चयसे कहतेहैं और चंद्रमा श्वासका प्रवाह होय तो अन्यथा फल होताहै अर्थात् अगम्य वस्तुका ज्ञान नहीं होता ॥ ८१ ॥
अथ विपरीतलक्षणम् ।
यदाप्रत्यूषकालेनविपरीतोदयोभवेत् ॥
चंद्रस्थानेवहत्यकरविस्थानेचचंद्रमाः ॥ ८२ ॥
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( ) २० शिवस्वरोदय । अर्थ-जिस दिन प्रातःकालसे लेकर विपरीत स्वरोंका उदयहो अर्थात् चंद्रमा स्थानमें सूर्य और सूर्यके स्थानमें चंद्रमा वहै उस समय यह फल जानना कि८२ प्रथमेमनउद्वेगं धनहानिर्द्वितीयके ॥ तृतीयेगमनंप्रोक्तमिष्टनाश्चतुर्थके ॥ ८३ ॥
अर्थ-प्रथममें मनका उद्वेग दूसरेमें धनकी हानि और तीसरेमें गमन और चौथेमें इष्टका नाश होताहै ॥ ८३ ॥
पंचमेराजविध्वंसं षष्ठेसर्वार्थनाशनम् ॥ सप्तमेव्याधिदुःखानिअष्टमे मृत्युमादिशेत् ॥ ८४ ॥
अर्थ-पांचवेमें राज्यका विध्वंस और छठेमें संपूर्ण अर्थोंका नाश और सातवेमें व्याधि और दुःख और आठवेमें मृत्युका होना कहाहै ॥ ८४ ॥
कालत्रयेदिनान्यष्टौविपरीतंयदावहेत् ॥ तदादुष्टफलंप्रोक्तंकिंचिन्यूनंतुशोभनम् ॥ ८५ ॥
अर्थ-प्रातः काल और मध्याह्न और सायंकाल इन तीनों कालोंमें यदि पूर्वोक्त विपरीत स्वरोंका उदय यदि आठ दिनतक बराबर चले तो उस समय दुष्ट फल कहा है यदि कुछ कम विपरीत चलै तो शुभ फलजानना ॥ प्रातर्मध्याह्नयोश्चंद्रःसायंकालेदिवाकरः ॥ तदानित्यंजयोलाभोविपरीतंविवर्जयेत् ॥ ८६ ॥
अर्थ-जिस दिन प्रातःकाल और मध्याह्नको चंद्रमाका