शिव स्वरोदय - हिन्दी भाष्य सहित — पृष्ठ 91–100
शिव स्वरोदय - हिन्दी भाष्य सहित · Khemraj Shri Krishna Das · पृष्ठ 91–100
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( ) भाषाटीकासमेत । ८१
पिंगलायांस्थितोजीवावामेदूतस्तुपृच्छति ॥
तदाऽपिम्रियतेरोगीयदित्रातामहेश्वरः ॥ ३२४ ॥
अर्थ-यदि जीव पिंगलामें स्थितहो और दूत वाम भागमें स्थित होकर पूछे तो उस समय भी रोगी मर जायगा चाहे महादेव भी रक्षा क्यों न करे ॥ ३२४ ॥
एकस्यभूतस्यविपर्ययेणरोगाभिभूतिर्भवतीह- पुंसाम् ॥ तयोर्द्वयवैिधुसुहृद्विपत्तिःपक्षद्वयेव्य- त्ययतोमृतिःस्यात् ॥ ३२५ ॥
अर्थ-एक भूत ( तत्व)के विपरीत होने सेभी पुरुषोंको रोग तिरस्कारका देते हैं और दो तत्वोंके विपरीत हो- नेसे बंधु और मित्रोंसे विपत्ति होतीहै यदि दो पक्ष( १ मा-स ) तक व्यत्यय चला जाय तो मृत्यु होताहै॥ ३२५ ॥
इति रोगप्रकरणम् ।
अथ कालप्रकरणम् ।
मासादौचैवपक्षादौवत्सरादौयथाक्रमम् ॥
क्षयकालंपरीक्षेतवायुचारवशात्सुधीः ॥ ३२६ ॥
अर्थ -मास-पक्ष-और वर्ष इन तीनोंकी क्रमसे आदिमें विद्वान् मनुष्य वायुके प्रचार वशसे क्षय (मरण) केसमयकी परीक्षा करै ॥ ३२६ ॥
पंचभूतात्मकंदी पंशिवस्नेहेनसिंचितम् ॥ रक्षयेत्सूर्यवातेनप्राणीजीवः स्थिरोभवेत्॥ ३२७॥
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( ) ८२ शिवस्वरोदय । अर्थ - यह पंच भूतात्मक दीप ( देह ) को शिवरूप स्नेह (तेल) से सींच कर सूर्यरूप पवनसे जो प्राणी रक्षा करता है उसका जीव स्थिर होताहै ॥ ३२७ ॥
मारुतंबंधयित्वातुसूयैबंधयतेयदि ॥ अभ्यासाज्जीवतेजीवःसूर्यकालेऽपिवंचिते ॥३२८॥
अर्थ-जो मनुष्य प्राणवायुको बांधकर दिनभर सूर्य स्वरका बंधन करताहै इस प्रकार अभ्यासके बलसे सूर्य कालका वंचन करके वह जीव जीसकता है ॥ ३२८ ॥
गगनात्स्रवतेचंद्रःकायपद्मानिसिंचयेत् ॥ कर्मयोगसदाभ्यासैरमरःशशिसंश्रयात् ॥ ३२ ९॥ अर्थ -आकाशमें गमन करनेसे चंद्रमाकी किरण नीचे गिरकर देहरूपी कमलोंको सींचतीहैं इस प्रकार कर्मके योगसे योगी चंद्रमाका आश्रय लेनेसे अभ्यासके द्वारा अमरहोजाताहै ॥ ३२९ ॥
शशांकंवारयेद्रात्रौदिवावायदिवाकरः ॥ इत्यभ्यासरतोनित्यं सयोगीनात्रसंशयः ॥ ३३० ॥
अर्थ-जो रात्रिमें चंद्रस्वरका और दिनमें सूर्य-स्वरका निवारण करताहै इस प्रकार अभ्यासमें तत्पर वह योगी ही योगीहै इसमें संदेह नहीं है ३३० ॥ अहोरात्रेयदेकत्रवहतेयस्यमारुतः ॥ तदातस्यभवेन्मृत्युःसंपूर्णे वत्सरत्रये ॥ ३३१ ॥
अर्थ-जिस मनुष्यका प्राणवायु ( श्वास ) अहोरात्र
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( ) भाषाटीकासमेत । ८३ भर एक स्थानमें ही वहतारहै तब उस मनुष्यकी मृत्यु तीन वर्षमें हो जायगी ॥ ३३१ ॥
अहोरात्रद्वयंयस्यपिंगलायांसदागतिः ॥ तस्यवर्षद्वयंप्रोक्तं जीवितंतत्त्ववेदिभिः ॥ ३३२ ॥
अर्थ-जिस मनुष्यके श्वासकी दो गति अहोरात्र पिंगलामें रहे तत्वके ज्ञाताओंने उस मनुष्य का जीवन दो वर्षका कहाहै ॥ ३३२ ॥
त्रिरात्रेवहतेयस्यवायुरेकपुटेस्थितः ॥ तदासंवत्सरायुस्तंप्रवदंतिमनीषिणः ॥ ३३३ ॥
अर्थ-जिस मनुष्यकी प्राणवायु तीनरात्र तक एकही नासिकाके पुटमें स्थित होकर चले तो विद्वान् मनुष्य उसकी अवस्था एक वर्षकी कहतेहैं ॥ ३३३ ॥
रात्रौचंद्रादिवासूर्योवहेद्यस्यनिरंतरम् ॥ जानीयात्तस्यवैमृत्युः षण्मासाभ्यंतरेभवेत् ३३४ अर्थ-जिस मनुष्यका रात्रिमें चंद्रस्वर और दिनमें सूर्यस्वर निरंतर वहै उस मनुष्यकी छः महीनेके भीतर मृत्यु होतीहै ॥ ३३४ ॥
लक्ष्यंलक्षितलक्षणेनसलिलेभानुर्यदादृश्य- तेक्षीणोदक्षिणपश्चिमोत्तरपुरः षट्त्रिद्विमासै कतः ॥ मध्यंछिद्रमिदं भवेद्दश दिनं धूमाकु-॥मलंतद्दिनेसर्वज्ञैरपिभाषितंमुनिवरैरायुःप्रमा- स्फुटम् ॥ ३३५ ॥
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( ) ८४ शिवस्वरोदय । अर्थ-जिस मनुष्यको जलके विषे सूर्यका प्रतिबिंग क्षीण ( कटाहुआ ) क्रमसे दक्षिण पश्चिम उत्तर और पूर्वमें दीखे वह छः ६ तीन ३ दो २ एक १ मास जीवेगा अर्थात् दक्षिणमें जिसको कटा दीखे उसकी छः ६ और पश्चिममें तीन ३ उत्तरमें २ पूर्वमें एक मासकी अवस्था समझनी-यदि प्रतिबिंबके मध्यमें छिद्र दीखे तो दश दिनकी अवस्था जाननी यदि संपूर्ण प्रतिबिंबमें धूमसा प्रतीत होय तो उसी दिन मृत्यु जाननी यह सर्वज्ञ मुनिवरोंने अवस्थाका प्रकट प्रमाण कहाहै ३३५ दूतःकृष्णकषायकृष्णवसनोदंतक्षतोमुंडि- तस्तैलाभ्यक्तशरीररज्जुककरोदीनश्चपूर्णो त्तरः ॥ भस्मांगारकपालपाशमुशलीसूर्या स्तमायातियःकालीशून्यपदस्थितोगदयु- तःकालानलस्यादृतः ॥ ३३६ ॥
अर्थ -यदि प्रश्न करनेवाला दूत काले भगवें वस्त्र धारकर अथवा दूतके दांतोंमें घाव होय मुंडित होय तैलाभ्यंग किये होय हाथमें रस्सी लिये होय दीन होय पूर्वोत्तर अर्थात् उत्तर देनेमें समर्थ और भस्म, अंगार, कपाल, मुसल, ये जिसके हाथमें होयँ जो सूर्यास्तके समय आवे -और जिसके पैर शून्य होयँ इतने प्रका- का दूत पूछनेको आवे तो रोगी कालको प्राप्त होगा ऐसा जाने ॥ ३३६ ॥
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( ) भाषाटीकासमेत । ८५
अकस्माच्चित्तविकृतिरकस्मात्पुरुषोत्तमः ॥
अकस्मादिद्रियोत्पातःसन्निपाताग्रलक्षणम्३३७ अर्थ-जिस रोगीके चित्तमें अकस्मात् विकार हो जाय और अकस्मात् उत्तम हो जाय और अकस्मात् इंद्रियोंमें उत्पात होजाय ये संनिपातके लक्षण जानने ॥ शरीरं शीतलंयस्यप्रकृतिर्विकृता भवेत् ॥ तदरिष्टसमासेनव्यासतस्तुनिबोधमे ॥ ३३८ ॥
अर्थ-जिसका शरीर शीतलहो प्रकृतिमें विकार हो वह संक्षेपसे अरिष्ट जानना और मेरे सकाशसे विस्तारसे श्रवण कर ॥ ३३८ ॥
दुष्टशब्देषुरमतेशुद्धशब्देषुचाप्यति ॥ पश्चात्तापोभवेद्यस्यतस्यमृत्युर्नसंशयः ॥ ३३ ९ ॥ अर्थ-जो मनुष्य बुरे २ शब्दोंको कहै और जो शुद्ध शब्दोंको कहै और पीछेसे पश्वात्ताप करै उसकी मृत्यु होगी इसमें संशय नहीं ॥ ३३ ९ ॥ हुंकारःशीतलोयस्यफूत्कारोवह्निसन्निभः ॥ महावैद्योभवेत्तस्यतस्यमृत्युभवेद्ध्रुवम् ३४० ॥ अर्थ-जिसका हुंकार शीतल होय और फूत्कार अनिके समान होय उसकी चाहे महान वैद्य रक्षा करे तोभी निश्वयसे मृत्यु होगी ॥ ३४० ॥
जिह्वांविष्णुपदंधुवंसुरपदंसन्मातृकामण्ड- लमेतान्येवमरुंधतीममृतगुंशुकंधुवंवाक्षण-
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( ) ८६ शिवस्वरोदय । म् ॥ एतेष्वेकमपिस्फुटंन पुरुषः पश्येत्पुरः- प्रेषितःसोवश्यंविशतीहकालवदनंसंवत्सरा- दूर्ध्वतः ॥ ३४१ ॥
अर्थ-जो मनुष्य जीभ ( जिह्वा ) आकाश ध्रुव-दे वमार्गमातकाओंका मंडल-अरुंधती-चंद्रमा -शुक्र-अगस्ति–इनमेंसे एककोभी कहनेसे न देखे वह रोगी अवश्य वर्ष दिनके अनंतर कालके मुखमें जायगा ३४१ ॥ अरश्मिबिंबंसूर्यस्यवन्हेःशीतांशुमालिनः ॥ द्वैकादशमासायुर्नरश्वोर्ध्वनजीवति ॥ ३४२ ॥
अर्थ -जिस मनुष्यको सूर्य चंद्रमा प्रतिबिंब और अनि इनकी किरण प्रतीत न होय उस मनुष्यकी अवस्था ग्यारह मासकी जाननी ॥ ३४२ ॥
वाप्यांपुरीषमूत्राणिसुवर्णरजतंतथा ॥ प्रत्यक्षमथवास्वप्रेदशमासान्नजीवति ॥ ३४३ ॥
अर्थ-जिस मनुष्यको सुपनेमें अथवा जागृत अव- स्थामें बावड़ीमें मल मूत्र सुवर्ण चांदी दीखे वह दश माससे परे नहीं जीवेगा ॥ ३४३ ॥
क्वचित्पश्यतियोदीपंसुवर्णचकषान्वितम् ॥ विरूपाणिचभूतानिनवमासान्नजीवति ॥ ३४४ ॥
अर्थ-जो मनुष्य कभी २ दीपक को अथवा कसोटी लगाया हुआ सुवर्ण और संपूर्ण भूतोंको विपरीत देखे वह नौ महीनेसे परे नहीं जीवेगा ॥ ३४४ ॥
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( ) भाषाटीकासमेत । ८७ स्थूलांगोऽपिकृशः कृशोऽपिसहसास्थूल- त्वमालभ्यतेप्राप्तोवाकनकप्रभांयदिभवेत्क्रू रोsपिकृष्णच्छविः ॥ शूरो भीरुसुधीरधर्म- निपुणःशांतोविकारीपुमानित्येवंप्रकृतिः प्रयातिचलनंमासाष्टकंजीवति ॥ ३४५ ॥
अर्थ-जिस मनुष्यकी प्रकृति ( स्वभाव )इस प्रकार चलायमान हो जाय कि स्थूल होय तो एकदम कृश हो जाय और कृश होय तो एकदम स्थूल हो जाय और क्रूर वा कृष्ण वर्ण होकर सुवर्ण समान कांतिवाला हो जाय शूर वीर होकर भीरु होजाय-धार्मिक होकर अधर्मी हो जाय और शांत होकर चंचल हो जाय-तो वह मनुष्य आठ महीने जीवेगा ॥ ३४५ ॥
पीडाभवेत्पाणितलेचजिह्वामूलेतथास्यागु धिरंचकृष्णम् ॥ विद्धंनचग्लायतियत्रदृष्ट्या जीवेन्मनुष्यः सहिसप्तमासम् ॥ ३४६ ॥
अर्थ-जिस मनुष्यके हाथके तलवे पर जिह्वाके मूल-में रुधिर काला हो जाय और जिसके गातमें नोचनेसे दुःख न होय वह मनुष्य सात मास जीवेगा ॥ ३४६ ॥
मध्यांगुलीनांत्रितयंनवकं रोगंविनाशुष्यति यस्यकंठः ॥ मुहुर्मुहुःप्रश्नवशेनजाड्यात्प- ड्रभिःसमासैः प्रलयंप्रयाति ॥ ३४७ ॥
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( ) ८८ शिवस्वरोदय । अर्थ-जिस मनुष्यकी बीचकी तीन अंगुली नमुड़े और रोगके विनाही कंठ सूख जाय और जिसको बार-वार पूछनेसे जडता होजाय अर्थात् पूर्वापरका अनुसं- धान न रहै वह मनुष्य छः महीनेमें मरणको प्राप्त होजायगा ॥ ३४७ ॥
नयस्यस्मरणंकिंचिद्विद्यतेस्तनचर्मणि ॥ सोवश्यं पंचमेमासिस्कंधारूढोभविष्यति ३४८॥ अर्थ-जिस मनुष्यके स्तनोंका चाम बधिर हो जाय वह मनुष्य पांचवें महीनेमें चार मनुष्योंके कांधेपर अवश्य चढेगा ( मरैगा ) ॥ ३४८ ॥
यस्यनस्फुरतिज्योतिः पीड्यतेनयनद्वयम् ॥ मरणतस्यनिर्दिष्टचतुर्थेमासिनिश्चितम् ॥ ३४ ९ ॥ अर्थ-जिस मनुष्यके नेत्रोंकी ज्योति प्रकाश न हो और दोनों नेत्रोंमें पीडा होय, उस मनुष्यका मरण चौथे मासमें अवश्य कहाहै ॥ ३४ ९ ॥ दंताश्ववृषणौयस्यनकिंचिदपिपीड्यते ॥ तृतीयंमासमावश्यंकालाज्ञायाभवेन्नरः ॥ ३५० ॥
अर्थ - जिस मनुष्यके दांत और अंडकोशोंमें दबा- नेसे पीडा कुछभी न होय वह तीसरे महीनेमें कालकी आज्ञामें पहुंचेगा ॥ ३५० ॥
कालोदूरस्थितोवापियेनोपायेनलक्ष्यते ॥ तंवदामिसमासेनयथादिष्टंशिवागमे ॥ ३५१ ॥
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( ) भाषाटीकासमेत । ८९ अर्थ-दूर पर स्थितभी काल जिस उपायसे दीख जाय उस उपायको शिवशास्त्रके अनुसार संक्षेपसे कह-ताहूं ॥ ३५१ ॥
एकांन्तंविजनंगत्वाकृत्वाऽऽदित्यंचपृष्ठतः ॥ निरीक्षयेन्निजच्छायांकंठदेशेसमाहितः ॥ ३५२॥
अर्थ-कि एकांत विजन वनमें जा कर और सूर्यको पीठपर करके अपनी छाया को सावधानीसे कंठ देशमें देखे ॥ ३५२ ॥
ततश्चाकाशमीक्षेतह्रींपरब्रह्मणेनमः ॥ अष्टोत्तरशतंजम्वाततः पश्यतिशंकरम् ॥ ३५३॥
अर्थ-फिर आकाश देखे और 'ह्रींपरब्रह्मणेनमः' इस मंत्रका १०८ बार जप करे तो वह मनुष्य शिव-जीकोदेखेगा ॥ ३५३ ॥
शुद्धस्फटिकसंकाशंनानारूपधरंहरम् ॥ षण्मासाभ्यासयोगेन भूचराणांपतिर्भवेत् ॥ वर्षद्वयेनतेनाथकर्त्ताहर्त्तास्वयंप्रभुः ॥ ३५४ ॥
अर्थ-जिन शिवजीका रूप शुद्धस्फटिकके तुल्यहै और जो नानारूपको धारतेहैं इस प्रकार छः महीने अभ्यास करनेसे भूचरों ( प्राणी ) का राजा होताहै और दो वर्ष अभ्यास करनेसे कर्त्ता हर्त्ता, स्वयंप्रभु होजाताहै ॥ ३५४ ॥
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( ) ९० शिवस्वरोदय ।
त्रिकालज्ञत्वमाप्नोतिपरमानंदमेवच ॥
सतताभ्यासयोगेननास्तिकिंचित्सुदुर्लभम्३५५ अर्थ -और निरंतर अभ्यास करनेसे भूत भविष्यत् वर्तमान तीनों कालोंका ज्ञान और परम आनंदको प्राप्त होताहै और उसको कोई वस्तु दुर्लभ नहीं होती ३५५ तद्रूपंकृष्णवर्णयः पश्यतिव्योम्निनिर्मले ॥ षण्मासान्मृत्युमाप्नोतिसयोगीनात्रसंशयः॥ ३५६ अर्थ-जिस योगीको निर्मल आकाशमें वह शिव- जीका रूप कृष्णवर्ण दीखे वह योगी छः महीनेसे मृत्युको प्राप्तहोगा इसमें संशय नहीं ॥ ३५६ ॥
पीतेव्याधिर्भयंरक्तेनीलेहानिंविनिर्दिशेत् ॥ नानावर्णेथचेत्तस्मिनसिद्धश्वगीयतेमहान् ३५७ अर्थ-पीला दीखे तो व्याधि लाल दीखै तो भय नीला दीखे तो हानि होतीहै यदि उसमें नाना वर्ण दीखें तो योगी सिद्धियोंको प्राप्त होताहै ॥ ३५७ ॥
पदेगुल्फेचजठरेविनाशःक्रमशोभवेत् ॥ विनश्यतोयदाबा हूस्वयंतुम्रियतेध्रुवम् ॥ ३५८॥
अर्थ -यदि छायामें पैर गुल्फ ( टकने ) पेट-ये न दीखें अथवा भुजा नदीखें तो निश्वयसे योगी मृत्युको प्राप्त होगा ॥ ३५८ ॥
वामबाहुस्तथाभार्यानश्येतेतिनसंशयः ॥ दक्षिणेबंधुनाशोहिमृत्युमाप्तंविनिर्दिशेत् ३५ ९॥