शिव स्वरोदय - हिन्दी भाष्य सहित — पृष्ठ 81–90
शिव स्वरोदय - हिन्दी भाष्य सहित · Khemraj Shri Krishna Das · पृष्ठ 81–90
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( ) भाषाटीकासमेत । ७१ अर्थ-इस विधिसे कामी पुरुष सब कामिनीयोंको नशमें करताहै परंतु मेरी यह सच्ची आज्ञाहै कि यह वशी करण किसी अन्य पुरुषको अर्थात् लंपटकोनकहै २८५ इति वशीकरणम् ।
अथगर्भप्रकरणम् ।
ऋतुकालभवानारीपंचमेऽह्नियदाभवेत् ॥
सूर्याचंद्रमसोयगिसेवनात्पुत्रसंभवः ॥ २८६ ॥
अर्थ-ऋतुस्नानके अनंतर जब स्त्रीको पांचवां दिन होय उस समय पुरुषका सूर्य स्वर स्त्रीका चंद्र स्वर चलता होय तो उस समय स्त्रीके संग करनेसे पुत्रका जन्म होताहै || २८६ ॥ शंखवल्लीगवांदुग्धेपृथ्व्यापोवहतेयदा ॥ भर्त्तुरेववदेद्वाक्ये दर्पदेहित्रिभिर्वचः ॥ २८७ ॥
अर्थ-जिस समय पृथ्वी और जल तत्त्व वहते होय उस समय स्त्रीको गौके दूधमें शंखवल्लीको खिलावे
फिर स्त्री अपने भर्तासे तीन वार भोगकी प्रार्थना करे ।
ऋतुस्नातापिवेन्नारीऋतुदानंतुयोजयेत् ॥
रूपलावण्यसंपन्नोनरसिंहःप्रसूयते ॥ २८८॥
अर्थ--जब स्त्रीऋतुस्नानके अनंतर उक्त औषधको पीले तब पुरुष ऋतुदानदे अर्थात् भोग करे तो रूप-और पराक्रमी -सुंदर नरोंमें सिंह पैदा होताहै॥ २८८ ॥
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( ) ७२ शिवस्वरोदय ।
सुषुम्नासूर्यवाहेनऋतुदानंतुयोजयेत् ॥
अंगहीनः पुमान्यस्तुजायतेत्रासविग्रहः ॥ २८९ ॥
अर्थ-जो मनुष्य सूर्य स्वरके प्रवाहके संग सुषुम्ना स्वरके बहनेके समय ऋतु दान देताहै उसके अंगहीन और कुरूप पुत्र पैदा होताहै ॥ २८९ ॥
विषमांके दिवारात्रौविषमांकेदिनाधिपः ॥ चंद्रनेत्राग्नितत्त्वेषुवंध्यापुत्रमवाप्नुयात् ॥ २ ९ ० ॥ अर्थ-ऋतुके अनंतर विषम दिनोंमें पुरुषका सूर्यस्वर दिन वा रातिमें चले अर्थात स्त्रीका चंद्र स्वर चले और पृथ्वी -जल -अभी-इन तत्वोंमें गर्भाधान होय तो यामी पुत्रको प्राप्त होतीहै ॥ २ ९ ० ॥ ऋत्वारंभेरविःपुंसांस्त्रीणांचैवसुधाकरः ॥ उभयोःसंगमे प्राप्तेवंध्यापुत्रमवाप्नुयात् ॥ २ ९ १ ॥ अर्थ -यदि ऋतुके आरंभमें पुरुषोंका सूर्य स्वर और स्त्रीका चंद्रस्वर चले और दोनोंका संगम होजाय तो वंध्यागी पत्रको प्राप्त होजाय ॥ २ ९ १ ॥ ऋत्वारंमेरविःपुंसांशुक्रांत चसुधाकरः ॥ अनेनक्रम योगेननादत्तेदैवदारुकम् ॥ २ ९ २॥ अर्थ-यदि भोगके आरंभ पुरुषका सूर्यस्वर चले और वीर्यपातके अनंतर चंद्रस्वर वहने लगे तो इसक्रम-योगसे स्त्री गर्भ धारण नहीं करती ॥ २९ २ ॥ चंद्रनाडीयदाप्रवेगकन्यातदाभवेत् ॥
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( ) भाषाटीकासमेत । ७३
सूर्यो भवेत्तदापुत्रोद्वयोर्गर्भोविहन्यते ॥ २ ९ ३ ॥
अर्थ-यदि गर्भवतीके प्रश्नके समयमें चंद्रमाकी नाडी चले तौ गर्भमें कन्या होतीहै और सूर्यस्वर चले तो पुत्र और दोनों स्वर चलें तो गर्भ नष्ट होजाताहै ॥ २ ९ ३ ॥ पृथ्वीपुत्रीजलेपुत्रःकन्यकाप्रभंजने ॥ तेजसिगर्भपातःस्यान्नभस्यपिनपुंसकः ॥ २ ९ ४॥ अर्थ -प्रश्नके समयमें पृथ्वी तत्व होय तो कन्या जल तत्व होय तो पुत्र वायुतत्व होय तो कन्या तेजतत्व होय तो गर्भका पात आकाश तत्व होय तो नपुंसक होताहै ॥ २९ ४ ॥ चंद्रेस्त्रीपुरुषः सूर्यो मध्यमार्गेनपुंसकः ॥ गर्भप्रयदादूतः पूर्णेपुत्रःप्रजायते ॥ २९५ ॥
अर्थ-गर्भके प्रश्न समय चंद्र स्वर होय तो कन्या सूर्यस्वर होय तो पुत्र सुषुम्नाका स्वर होय तो नपुंसक होताहै यदि पूछनेवाले दूतके पूर्ण अंग होय तो पुत्र पैदा होताहै ॥ २९ ५ ॥ शून्ये शून्यंयुगे युग्मंगर्भपातश्चक्रमे ॥ तत्त्ववित्साविजानीयात्कथितंतत्तुसुंदरि ॥ २९ ६॥ अर्थ-हे सुंदरी पूछने वालेके अंग शून्य होय तो शून्य दो २ स्वर चले होय तो युग्म ( दो ) यदि स्वरोंका संक्रम या सुषुम्ना होय तो गर्भका पात तत्वोंके वेत्ता जाने ॥ २ ९ ६ ॥ ४
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( ) ७४ शिवस्वरोदय । गर्भाधानंमारुतेस्याच्चदुःखीदिक्षुख्यातवारुणे सौख्ययुक्तः ॥ गर्भस्रावःस्वल्पजीव श्ववह्नौभो गीभव्यःपार्थिवेनार्थयुक्तः ॥ २९७ ॥
अर्थ-वायु तत्वमें गर्भाधान होय तो दुःखवाला और जलतत्वमें गर्भाधान होय तो दिशाओंमें विख्यात और सुखी, अग्नितत्वमें होय तो गर्भका पात अथवा अल्पजीवी पृथ्वी तत्वम होय तो भोगी-सुंदर- धनवान- पुत्र पैदा होताहै ॥ २ ९ ७ ॥ धनवान्सौख्ययुक्तश्वभोगवानर्थसंस्थितिः ॥ स्यान्नित्यंवारुणेतत्त्वेव्योम्निगर्भोविनश्यति२ ९ ८ अर्थ-जल तत्वमें गर्भाधान होय तो धनवान् सुखी भोगवान् जिसके पास नित्यधन रहै ऐसा पुत्र पैदा होताहै आकाश तत्वमें गर्भाधान होय तो गर्भ नष्ट होजाताहै ॥ २ ९ ८ ॥ माहेंद्रेसुसुतोत्पत्तिर्वारुणेदुहिताभवेत् ॥ शेषेषुगर्भहानिःस्याज्जातमात्रस्यवामृतिः २९९ ॥ अर्थ-पृथ्वी तत्वमें गर्भाधान होय तो पुत्रकी और जल तत्वमें रहै तो कन्याकी उत्पत्ति होतीहै और शेष तत्वमें रहै तो गमकी हानि वा पैदा होतेहीका मरण होताहै ॥ २९९ ॥
रविमध्यगतश्चंद्रश्चद्रमध्यगतोरविः ॥
ज्ञातव्यंगुरुतःशोघंनवेदेश। स्त्र कोटिभिः ॥ ३०० ॥
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( ) भाषाटीकासमेत । ७५ अर्थ-सूर्य स्वरके मध्यमें चंद्रस्वरकी और चंद्र स्वरके मध्यमें सूर्य स्वरकी गति गुरुसे शीघ्र जाने यह बात वेद और कोटि शास्त्रोंसे नहीं आती ॥ ३०० ॥
इति गर्भप्रकरणम् । अथसंवत्सरफलम् | चैत्रशुक्लप्रतिपदिप्रातस्तत्त्वविभेदतः ॥ पश्येद्विचक्षणोयोगीदक्षिणेचोत्तरायणे ॥३०१ ॥
अर्थ-चैत्रके शुक्लपक्षकी प्रतिपदाको प्रातःकालके समय तत्वोंके विभेदसे विचक्षण ( पंडित ) योगी दक्षि-णायन और उत्तरायण देखे -अर्थात् उस दिनके तत्वोंके बहनेसे वर्षभरके फलको देखे ॥ ३०१ ॥
चंद्रोदयस्यवेलायांवहमानोऽथतत्त्वतः ॥ पृथिव्यापस्तथावायुः सुभिक्षंसर्वसस्यजम् ३०२ अर्थ - चंद्रस्वरके उदयके समय यदि पृथ्वी जल वा वायुतत्व] चलै तो सब खेतियोंका सुभिक्ष होताहै ३०२ तेजोव्योम्रोर्भयंघोरंदुर्भिक्षंकालतत्त्वतः ॥ एवंतत्त्वफलंज्ञेयं वर्षेमासेदिनेष्वपि ॥ ३०३ ॥
अर्थ -यदि चंद्रस्वरमें तेज और आकाशतत्व चलते हों तो घोरभय और दुर्भिक्ष होताहै इसी प्रकार सम- यके तत्वानुसार वर्ष मास और दिनोंमेंभी संपूर्णतत्वोंका फल जानना ॥ ३०३ ॥
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( ) ७६ शिवस्वरोदय ।
मध्यमाभवतिक्रूरादुष्टासर्वेषुकर्मसु ॥
देशभंगमहारोगक्लेशकष्टादिदुःखदा ॥ ३०४ ॥
अर्थ- मध्यमा ( सुषुम्ना ) नाडी क्रूर और सब-कममें दुष्ट ( बुरी ) देशका भंग-महारोग-क्लेश-कष्ट आदि अत्यंतदुःखोंको देतीहै ॥ ३०४ ॥
मेषसंक्रांतिवेलायांस्वरभेदंविचारयेत् ॥ संवत्सरफ लंबूयालोकानांतत्त्वचितकः ॥ ३०५॥
अर्थ -यदि मेषकी संक्रांतिके समय स्वरके भेदको विचारै तो तत्वका चिंतक मनुष्य लोकोंको संवत्सरका फल कहसकताहै ॥ ३०५ ॥
पृथिव्यादिकतत्त्वेनदिनमासाब्दजं फलम् ॥ शोभनंचयथादुष्टंव्योममारुतवह्निभिः ॥ ३०६॥
अर्थ-मेषसंक्रांतिके समय पृथ्वी आदितत्वोंसे दिन मास और वर्षका फल शोभन जाने -और आकाश पवन और अश्तित्वसे दुष्टफल जाने ॥ ३०६ ॥
सुभिक्षंराष्ट्रवृद्धिःस्याद्वदु सस्यावसुंधरा ॥ बहुवृष्टिस्तथासौख्यं पृथ्वीतत्त्वं वहेद्यदि॥ ३०७॥
अर्थ- यदि मेषसंक्रांतिके दिन पृथ्वी तत्व चले तो सुभिक्ष देशकी वृद्धि पृथ्वीमें बहुत अन्न बहुत वृष्टि और बहुत सुख होताहै ॥ ३०७ ॥
अतिवृष्टिः सुभिक्षं स्यादारोग्यंसौख्यमेवच ॥ बहुसस्यातथापृथ्वीअप्तत्त्ववैवहेद्यदि ॥ ३०८ ॥
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( ) भाषाटीकासमेत । ७७ अर्थ-यदि जलतत्व उस दिन बहता होय तो अति वृष्टि सुभिक्ष-आरोग्य और सुख और पृथिवीमें बहुत खेती होतीहै ॥ ३०८ ॥
दुर्भिक्षराष्ट्रभंगः स्यादुत्पत्तिश्वविनश्यति ॥ अल्पादल्पतरावृष्टिरग्नितत्त्वंवहेद्यदि ॥ ३० ९ ॥ अर्थ -यदि अग्नितत्व चलताहोय तो दुर्भिक्ष - देशका भंग -और उत्पत्तिका नाश और बहुत स्वल्प वृष्टि होती है ॥ ३० ९ ॥ उत्पातोपद्रवाभीतिरल्पावृद्धिःस्युरीतयः ॥ मेषसंक्रांतिवेलायांव्योमतत्त्ववहेद्यदि ॥ ३१० ॥
अर्थ -यदि मेषसंक्रांतिके समय वायुतत्व चलता होयतो उत्पात-उपद्रव - नीति- अल्पवृष्टि-ईति' ( मूसे लगना आदिछः ) होतीहैं ॥ ३१० ॥
मेषसंक्रांतिवेलायांव्योमतत्त्वंवहेद्यदि ॥ तत्रापिशुन्यताज्ञेयासस्यादीनांसुखस्यच ३११ अर्थ -यदि मेषसंक्रांतिके समय आकाश तत्व बहता होय तो सस्य आदि और सुखकी शून्यता जाननी ३११ पूर्णप्रवेशनेश्वासेसस्यंतत्त्वेनसिध्यति ॥ सूर्यचंद्रेऽन्यथाभूतेसंग्रहःसर्वसिद्धिदः ॥ ३१२ ॥
अर्थ -यदि श्वासका पूर्ण प्रवेश होजाय तो तत्वसे १. अतिवृष्टिरनावृष्टिर्मूषिकाश्शलभाः शुकाः । अत्यासन्नाश्च राजानः षडेता ईतयः स्मृताः ।
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( ) ७८ शिवस्वरोदय । धान्यकी सिद्धि होतीहै और यदि तत्वोंके उदयके समय सूर्य व चंद्रस्वर विपरीत होजाय तो और चंद्रके योगमें सूर्य और सूर्यके योगमें चंद्रहो-तो अन्तका संग्रह सिद्धि ( लाभ ) को देताहै ॥ ३१२ ॥
विषमेवह्नितत्त्वस्याज्ज्ञायते केवलंनभः ॥ तत्कुर्याद्वस्तुसंग्राहोद्विमासेचमहर्घता ॥३१३ ॥
अर्थ-यदि विषम ( दक्षिण ) स्वरमें अभितत्वो अथवा केवल आकाशतत्व होय तो उससमय वस्तुओंका संग्रह करै तो दोमासमें महर्धता ( महंगा पना ) होगी ३ १ ३ खौसंक्रमतेनाडीचंद्रमंतेप्रसर्पिता ॥ खानिलेवह्नियोगेन रौरवंजगतीतले ॥ ३१४ ॥
अर्थ-यदि रात्रिके समय सूर्यकी नाडी वहतीहो और प्रातःकालके समय चंद्रमाकी बहने लगे और उस समय आकाश पवन अग्नितत्व इनका योग होय तो पृथ्वीके तलपर रौरव ( बडे २ अनर्थ ) होतेहैं ३ १४ ॥ इति संवत्सरप्रकरणम् ।
अथरोगप्रकरणम् ।
महीतत्त्वेस्वरोगश्वजलेचजलमातृतः ॥
तेजसिखेटवाटीस्थशाकिनीपितृदोषतः ॥३१५ ॥
अर्थ-यदि प्रश्नके समय पृथ्वीतत्व वहताहोय तो स्व (प्रारब्ध ) का रोग-जलतत्व चलताहोय तो जलोंकी
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, ( ) भाषाटीकासमेत ७९ मातृकाओंका-तेजतत्व वहताहोय तो खेटवाटीमें रहने वाली शाकिनी वा पितृदोष ( पीडा ) से रोगका होना समझना ॥ ३१५ ॥
आदौशून्यगतोदूतःपश्चात्पूर्णेविशेद्यदि ॥ मूर्च्छितोऽपिध्रुवं जीवेद्यदथैप्रतिपृच्छति ॥३१६॥
अर्थ - यदि पूछने वाला दूत पहिले शून्य अंगकी तरफ आयाहो और पश्चात् (पीछे) पूर्ण अंगकी तरफ बैठ जाय तो मूर्छितभी वह रोगी निश्वयसेजीजायगा-जिसके लिये वह पूछताहै ॥ ३१६ ॥
यस्मिन्नंगेस्थितोजीवस्तत्रस्थः परिपृच्छति ॥ तदाजीवतिजीवोस यदिरोगैरुपद्रुतः ॥ ३१७ ॥
अर्थ-यदि जिस अंगमें जीव स्थितहो उसी अंगकी तरफ बैठाहुआ प्रश्नकरे तो रागोंसे पीडितभी वह जीव अवश्य जीवेगा ॥ ३१७ ॥
दक्षिणेनयदावायुर्दूतोरौद्राक्षरोवदेत् ॥ तदाजीवतिजीवोसौ चंद्रेसम फलंभवेत् ॥ ३१८ ॥
अर्थ -यदि वायु दक्षिणनाडीकी बहतीहो औरदूतके मुखसे भयानक वचन निकलें तो वह जीव जीवेगा और चंद्रश्वर होयतो समान फल होताहै ॥ ३१८ ॥
जीवाकारंचवा धृत्वाजीवाकारंविलोक्यच ॥ जीवस्थोजीवितप्रश्नेतस्यस्याज्जोवितंफलम् ३१ ९ अर्थ-जीवाकारको धारकर और देखकर जीवमें
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( ) ८० शिवस्वरोदय । स्थित हुआ दूत जीनेका प्रश्न करे तो उसको जीवनका फल होताहै ॥ ३१ ९ ॥ वामचारेतथादक्षप्रवेशेयत्रवाहने ॥ तत्रस्थःपृच्छतेदूतस्तस्यसिद्धिर्नसंशयः ३२० ॥ अर्थ -वामनाडी (इडा) अथवा दक्षिणनाडी( पिंगला) इन दोनोंके चलने वा प्रवेश करनेके समय जो दूत प्रश्न करै तो उसकी सिद्धि होतीहै इसमें संशय नहीं ३२० ॥ प्रश्नेचाधःस्थितोजीवोनूनंजीवोहिजीवति ॥ ऊर्ध्वचारस्थितोजीवोजीवोयातियमालयम्३२१ अर्थ -यदि प्रश्नके समय दूत अधाभागमें स्थित होय तो वह रोगी जीव निश्वयसे जीवै यदि जीव ऊर्ध्व भागमें स्थित होय तो जीव यमालय में जायगा ॥ ३२१ विपरीताक्षरप्रश्नेरिक्तायांपृच्छकोयदि ॥ विपर्ययंचविज्ञेयंविषमस्योदयेसति ॥ ३२२ ॥
अर्थ -यदि विषमनाडी (सुषुम्ना) का उदय हो और प्रश्नका कर्ता रिक्त नाडीमें ऐसा प्रश्न करें जिसके अक्षर विषम ( १-३-५ आदि ) हों तो विपरीत फल जानना ॥ चंद्रस्थानेस्थितोजीवः सूर्यस्थानेतुपृच्छकः ॥ तदाप्राणवियुक्तोसौयदिवैद्यशतैर्वृतः ॥ ३२३ ॥
अर्थ -यदि अपनी जीव( श्वासवायु ) चंद्रमा चारमें स्थितहो और प्रश्नकर्ता सूर्यके चारमें स्थित होयतो यह रोगी चाहे सौ वैद्योंसे युक्तहो तो भी मर जायगा ॥