शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 171–180
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 171–180
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द्वितीयोऽध्यायः I I I धर्मनिष्ठ, दृढ अङ्गवाले, बाल्य अवस्था को पार किये हुये, तरुण, सदा सेवा करने में कुशल, जो कुछ कार्य स्वामी का उत्तम या चाहे मल - मूत्रादि उठाना होराशास्त्र ॥ आदि नीच भी कार्य हो उन सर्वो को करने के लिये उद्यत रहनेवाले एवं आज्ञानुसार कार्य करनेवाले हों ऐसे लोगों को राजा ' परिचारक ' बनावे । है एवं ोतिर्विद् ' गुण तथा देवता की । वध - ज्ञान जानकर शत्रुप्रजाभृत्यवृत्तं विज्ञातुं कुशलाश्च ये ते गूढचाराः कर्त्तव्या यथार्थश्रुतबोधकाः जासूस ' के लक्षण - जो शत्रु तथा प्रजागण के व्यवहार कुशल एवं यथार्थ बार्तो को सुनकर उन्हें ठीक २ बताने गूढचार ( जासूस ) पद पर नियुक्त करना चाहिये । राज्ञः समीपप्राप्तानां नतिस्थानविबोधकाः दण्डधरा वेत्रधराः कर्तव्यास्ते सुशिक्षकाः दण्डधारी - आसा- वल्लमधारी के लक्षण - जो राजा के लोगों को प्रणाम करने की रीति एवं बैठने के लिये स्थान वतानेवाले, विनय तथा शिक्षा जाननेवाले हों ऐसे लोगों धारण करके राजा के समीप में रहने वाला बनाना चाहिये
।
॥ १८६ ॥
को जानने के लिये वाले हों ऐसे लोगों | ॥ १६० || समीप उपस्थित हुये को अच्छी तरह से को दण्ड तथा बेंत ।
तन्त्रीकण्ठोत्थितान् सप्तस्वरान् स्थानविभागतः ।
उत्पादयति संवेत्ति ससंयोगविभागिनः ॥ १६१ ॥
अनुरागं सुस्वरं च सतालं च प्रगायति ।
कहे हुए सनृत्यं वा गायकानामधिपः स च कीर्तितः ॥ १६२ ॥
दुति से गायकाधिप के लक्षण – जो वीणा या कण्ठ से निकले हुये स. रि. ग. म, प. ध. नि. इन ७ स्वरों को स्थान - विभाग के अनुसार यथार्थ रूप से पैदा करते हैं एवं संयोग तथा विभाग को साथ अर्थात् मिले हुये या अलग २ उन सर्वो को भलीभांति समझते हैं और जो राग, स्वर - ताल के साथ गाते या नाचते हैं बोलने ऐसे लोगों को गायकों ( गानेवालों ) का अधिपति बनाना चाहिये । तथाविधा च पण्यस्त्री निर्लज्जा भावसंयुता । न तथा न्दर में शृङ्गाररसतन्त्रज्ञा सुन्दराङ्गी मनोरमा ॥ ११३ । i नवीनोत्तुङ्गकठिनकुचा सुस्मितदर्शिनी । वेश्या के लक्षण और पूर्वोक्त रीति से गाने तथा नाचनेवाली, लज्जा न करनेवाली, भाव ( अनुराग ) से युक्त, शृङ्गार रस के तत्व को जाननेवाली, सुन्दर अङ्गों वाली, मनको आनन्दित करनेताली, नवीन अवस्थावाली, ऊँचे, कठिन कुचोंवाली, सुन्दर स्मित ( सुसुकान ) के साथ देखने वाली ( कटाक्ष. , करनेवाली ) ऐसी जो वेश्या हो उसे राजा अपने यहां रखें । नेवाले ये चान्ये साधकास्ते च तथा चित्तविरञ्जकाः ॥ १६४ ॥
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८६ शुक्रनीति:: सुभृत्यास्तेपि सन्धार्या नृपेणात्महिताय च । वेश्या - भृत्य के लक्षण — और इसके अतिरिक्त अन्य वेश्याओं के मृत्य जो मनोऽभिलषित कार्य के करने में चतुर, चित्त को विशेष रूप से प्रसन्न करने
चाले ऐसे अच्छे भृत्य हों उन्हें अपने हित के लिये राजा को रखना चाहिये ।
वैतालिकाः सुकवयो वेत्रदण्डधराश्च ये ॥ १६५ ॥
शिल्पज्ञाश्च कलावन्तो ये सदाप्युपकारकाः ।: दुर्गुणासूचका भाणा नर्तका बहुरूपिणः ॥ १६६ ॥
आरामकृत्रिमवनकारिणो दुर्गेकारिणः ।
महानालिकयन्त्रस्थगोलैर्लक्ष्यविभेदिनः ॥
लघुयन्त्राग्नेय चूणेबाणगोला सिकारिणः अनेकयन्त्रशस्त्रास्त्रधनुस्तूणादिकारकाः ॥
स्वर्णरत्नाद्यलङ्कार घटका रथकारिणः ।
पाषाणघटका लोहकारा धातुविलेपकाः ॥
कुम्भकाराः शौल्विकाश्च तक्षाणो मार्गकारकाः ।
नापिता रजकाश्चैव वासिका मलहारकाः ॥
वार्ताहराः सौचिकाश्च राजचिह्नाप्रधारिणः ।
भेरीपटहगोपुच्छ - शंखवेण्वादिनिःस्वनैः ॥
ये व्यूहरचका यानव्यपयानादिबोधकाः ।
१ ९ ७ ॥
१ ९ ८ ॥
१ ९९ ॥
२०० || २०५ ॥ • नाविकाः खनका व्याधाः किराता भारिका अपि ॥ २०२ ॥
शस्त्रसंमार्जन करा जलधान्य प्रवाहकाः ।
आपणिकाश्च गणिका वाद्यजायाप्रजीविनः ॥
तन्तुवायाः शाकुनिकाश्चित्रकाराश्च चर्मकाः ।
गृहसंमार्जकाः पात्रधान्यवस्त्रप्रमार्जकाः ॥
शय्यावितानास्तरण कारकाः शासका अपि ।
आमोदास्वेदसद्धूपकारास्ताम्बूलिकास्तथा ॥
हीनाल्पकमिणश्चैते योज्याः कार्यानुरूपतः ।
२०३ ॥
२०४ ॥
२०५ ॥
वैतालिक तथा शिल्पज्ञों को पास में रखने का निर्देश - और जो वैतालिक ( राजा की स्तुति करके जगानेवाले ), सुकवि, वेत या दण्ड धारण करनेवाले ( रक्षक विशेष ), शिल्प कला के पण्डित, कलाओं ( ६४ प्रकार की कामविद्या ) में कुशल, सदा हित करनेवाले, दूसरों के दोषों की सूचना देनेवाले, भाण ( परिहास के पण्डित ), बहुरूपिया, बगीचा तथा बनावटी जंगल बनाने में कुशल, दुर्गं ( किला ) बनानेवाले, महानालिक यन्त्रों ( बड़ी तोपों ) के अन्दर रखे हुये गोलों से शत्रुओं पर लचय - भेद ( निशाना ) करनेवाले ( गोलन्दाज ), लघु CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri यन्त्र ( बन्दूक आदि के एवं ( तर्कश ) आ बनानेवाले, गेरू आदि धा ( ताम्बे के वासिक ( लक चामर - निश एवं भेरी ( न आदि को बजा ( शत्रुओं से प सूचना देनेवाल खेलनेवाले या को साफ करन ढोनेवाले, आप के काम - शास्य चलानेवाले, ( मोची ), झ वितान ( चंदो करनेवाले, चि वाले अच्छे तथा अन्यान्य अनुरूप यथ नो अ सत्य तथ निर्देश - सत्य युक्त आज्ञानुस यहां सदा रखे ग संपूर्ण पा
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द्वितीयोऽध्यायः ८७: यन्त्र ( बन्दूक आदि ), आग्नेय चूर्ण ( बारूद ), बाण, गोला " और तलवार ' नृत्य जो आदि के एवं अनेक प्रकार के युद्धोपयोगी यन्त्र, शस्त्र, अन, धनुष, तूणीर न्न करने ( तर्कश ) आदि के बनानेवाले कारीगर, सोना, रत्न आदि के अलङ्कारों को हिये । बनानेवाले, रथ बनानेवाले पत्थरों को गढ़ने वाले ( सङ्गतराश ), लुहार, गेरू आदि धातुओं से गृहादि को रंगनेवाले ( रंगसाज ), कुम्हार, शौल्विक ( ताम्बे के वर्त्तन बनानेवाले ), बढ़ई, सड़क बनानेवाले, नाई, घोबी, वासिक ( लकड़हारा ), मेहतर, संवाद पहुँचानेवाले, दर्जी, राज - चिह्न ( छन्न-चामर - निशान ) लेकर राजा के आगे रहनेवाले, व्यूह - रचना करनेवाले ' एवं भेरी ( नगारा ), पटह ( ढोल ), गोपुच्छ ( रणसिंघा ), शङ्ख, वंशी आदि को बजाकर यान ( शत्रुओं के ऊपर चढ़ाई करना ) और व्यपयान ( शत्रुओं से पीछे हटता ) आदि ( आक्रमण करना ) समयों में सैनिकों को सूचना देनेवाले, नाविक ( मल्लाह ), खनक ( खननेवाले ), व्याघ ( शिकार खेलनेवाले या बहेलिया ), किरात ( कोल - भिलादि ), बोझा ढोनेवाले, शस्त्रों को साफ करनेवाले ( ज्ञान चढ़ाकर तीक्षण करनेवाले ), जल तथा धान्य को ढोनेवाले, आपणिक ( व्यापार करनेवाले ), परदेशी स्त्री - विहीन कर्मचारियों के काम - शान्त्यर्थं वेश्यायें, बाजा बजाते हुये स्त्रियों के साथ नाच कर जीविका चलानेवाले, जुलाहे, पक्षी बनाकर जीविका रखनेवाले, चित्रकार, चर्मकार ( मोची ), झाडू देनेवाले, वर्त्तन, धान्य, वस्त्र इनको सफा करनेवाले, शय्या, -२ ॥ विज्ञान ( चंदोवा ), बिछौना आदि के बनाने और उसको लगाने की कला को करनेवाले, चित्त को प्रसन्न करनेवाले ( सुगन्धित ) एवं पसीना न ला चाले अच्छे धूप को बनानेवाले, ताम्बूल ( पान का बीड़ा ) लगानेवाले, तथा अन्यान्य हीन तथा क्षुद्र राजसंबन्धी कार्य करने वाले इन सर्वो को कार्य
के अनुरूप यथायोग्य राजा अपने यहां रखे ।
प्रोक्तं पुण्यतमं सत्यं परोपकरणं तथा ॥ २०६ ॥
आज्ञायुक्तांश्च भृतकान्सततं धारयेन्नृपः । चैतालिक सत्य तथा परोपकार की श्रेष्ठता तथा इनसे युक्त राजकर्मचारी रखने का निर्देश- - सत्य तथा परोपकार को सब पुण्यों में श्रेष्ठ बताया है अतः इनसे करने वाले युक्त आज्ञानुसार सचाई के साथ राज- कार्य करनेवाले भृत्यों को राजा अपने मविद्या )
यहां सदा रखे ।
, भा हिंसा गरीयसी सर्वपापेभ्योऽनृतभाषणम् ॥ २०७ ॥
कुशल, गरीयस्तरमेताभ्यां युक्तान्भृत्यान्न धारयेत् । रखे हुये संपूर्ण पापों से हिंसा तथा असस्य की प्रबलता तथा इनसे युक्त मृत्यों को ), लघु CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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GG शुक्रनीति: न रखने का निर्देश — और सब पापों से बढ़कर हिंसा ( हस्या या कष्ट पहुंचाना )
और झूठ बोलना है अतः इन दोनों से युक्त भृत्यों को न रखे ।
यदा यदुचितं कर्तुं वक्तुं वा तत्प्रबोधयन् ॥ २०८ ॥
तद्वति कुरुते द्राक्तु स सभृत्यः सुपूज्यते । सद्भृत्य के लक्षण जिस समय जो कार्य करने के लिये एवं जो बात बोलने के लिये उचित प्रतीत हो उसी को राजा से समझाता हुआ और स्वयं भी शीघ्रता से उसी बात को कहता एवं उसी कार्य को करता भी है वही
भृत्य अच्छा कहलाता है और भली भांति पूजित भी होता है ।
उत्थाय पश्चिमे यामे.गृहकृत्यं विचिन्त्य च ॥ २० ९ ॥
कृत्वोत्सर्ग तु विष्णुं हि स्मृत्वा स्नायादनन्तरम् ।
प्रातः कृत्यं तु निर्वर्त्य यावत्सार्धमुहूर्तकम् ॥ २१० ॥
गत्वा स्वकार्यशालां वा कार्याकार्यं विचिन्त्य च । अच्छे भृत्यों का यह कृत्य है कि वह रात्रि को पिछले प्रहर में उठकर गृह के ( उस दिन करने लायक ) कृत्यों का विचार करने के बाद मल - मूत्रादि का परित्याग कर विष्णु ( परमात्मा ) का स्मरण करते हुये स्नान करे । अथवा ॥ मुहूर्त्त ( करीब 11 घण्टे ) के अन्दर प्रातःकालीन नित्य के संम्पूर्ण कार्यों को समाप्त कर अपने कार्यालय में जाकर वहां के कर्तव्य या अकर्त्तव्य
कार्यों का निश्चय कर तदुपरान्त स्नान करे ।
विनाज्ञया विशन्तं तु द्वास्थः सम्यङ् निरोधयेत् ॥ २११ ॥
निदेशकार्य विज्ञाप्य तेनाज्ञप्तः प्रमोचयेत् । • द्वारपाल के कर्त्तव्यों का निर्देश - और द्वारपाल का यह कर्त्तव्य है कि वह द्वार पर रहकर बिना राजाज्ञा के अन्दर प्रवेश करनेवाले को अच्छी तरह से रोके | और उसके बताये हुये कार्य की सूचना राजा को देकर यदि राजा की
आज्ञा अन्दर आने देने के लिये हो तो उसे अन्दर जाने के लिये छोड़ दे ।
दृष्ट्वा गतान्सभामध्ये राज्ञे दण्डधरः क्रमात् ॥ २१२ ॥
निवेद्य तन्नतीः पश्चात्तेषां स्थानानि सूचयेत् । राजपार्श्वचर्त्ती दण्डधारियों का कर्त्तव्य - और राजा के पास दण्ड धारण करनेवाले मृत्यों का यह कर्त्तव्य है कि वह राजसभा में आये हुये लोगों को देखकर क्रम से राजा से उसके प्रणाम करने की सूचना देकर पश्चात् उससे
बैठने के लिये स्थान का निर्देश करे ।
ततो राजगृहं गत्वाऽऽज्ञप्तो गच्छेच्च सन्निधिम् ॥ २१३ ॥
मत्वा नृपं यथान्यायं विष्णुरूपमिवापरम् ।
प्रविश्य सानुरागस्य चित्तज्ञस्य समन्ततः ॥ २१४ ॥
CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri भ भृत्य का के ) बाद पुन उसके समीप राजा को निय अनुराग रखने ओर स्थिर ह अ अ जलती ह धन लेने में स जावे । त राजा के की सेवा करे एवं राजा के प राजा की आज्ञ वि राजाज्ञा दार्थ प्रस्तुत सिद्धान्त वात काटकर कोई स राजा से राजा के बुला
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द्वितीयोऽध्यायः हुंचाना ) भर्तुरर्घासने दृष्टिं कृत्वा नान्यत्र निक्षिपेत् । भृत्य का राजसमीपावस्थान करने पर कर्त्तव्य — उसके ( स्थान बताने के ) बाद पुनः राजगृह ( राजसमी ) में जाकर राजा की आज्ञा पाने पर उसके समीप जावे । और जगत् के रक्षार्थ दूसरे विष्णु भगवान के समान स्थित बात राजा को नियमानुकूल प्रणाम करे और राजसभा में पहुँचकर मृत्यों के स्वयं अनुराग रखनेवाले एवं उनके हृदय को पहचाननेवाले राजा के अर्द्धासन की वही ओर ॥ ॥ जावे उठकर मूत्रादि करे । संम्पूर्ण स्थिर - दृष्टि होकर देखता रहे और किसी अन्य तरफ दृष्टि न दौड़ावे । अग्नि दीप्तमिवासीदेद्राजानमुपशिक्षितः आशीविषमिव क्रुद्धं प्रभुं प्राणघनेश्वरम् जलती हुई अग्नि के समान एवं क्रुद्ध विषधर सर्प की लेने में समर्थ राजा को समझ कर अत्यन्त विनय के । यत्नेनोपचरेन्नित्यं नाहमस्मीति चिन्तयेत् समर्थयँश्च तत्पक्षं साधु भाषेत भाषितम् तन्नियोगेन वा ब्रूयादर्थं सुपरिनिश्चितम् राजा के पक्ष की पुष्टि करने का निर्देश — और नित्य ॥ २१५ ॥
। भांति प्राण तथा साथ उसके समीप ॥ २१६ ॥
।
॥ २१७ ॥
यत्न के साथ राजा कर्त्तव्य की सेवा करे और ' राजा के आगे मेरी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है ' ऐसा सोचे एवं राजा के पक्ष का ही समर्थन करता हुआ सन्तोषजनक बात कहे । अथवा राजा की आज्ञा पाने पर लोक - शास्त्र से सुनिश्चित बात कहे ।
सुखप्रबन्धगोष्ठीषु विवादे वादिनां मतम् ।
कि वह विजानन्नपि नो ब्रूयाद्भर्तुः क्षिप्त्वोत्तरं वचः ॥ २ ९ ८ ॥
रह से राजाज्ञा से विवादियों के मत को युक्ति से बोलने का निर्देश – मनोविनो-जा की दार्थ प्रस्तुत राजगोष्ठी में परस्पर तर्क करनेवालों के विवाद उपस्थित होने पर सिद्धान्त वात को जानते हुये भी वादी रूप में बोलनेवाले राजा के उत्तर को काटकर कोई बचन न बोले । धारण I लोगों उससे I सदाऽनुद्धतवेषः स्यान्नृपाहूतस्तु प्राञ्जलिः तद्रां कृतनतिः श्रुत्वा वस्त्रान्तरितसम्मुखः तदाज्ञां धारयित्वादौ स्वकर्माणि निवेदयेत् नवा ss सीतासने प्रो न तत्पार्श्वे न संमुखे उच्चैः प्रहसनं कासं ष्ठीवनं कुत्सनं तथा जुम्भणं गात्रभङ्गं च पर्वास्फोटं च वर्जयेत् राजा से स्वकार्य निवेदन प्रकार तथा जोर से हँसने ॥। २१ ९ ॥ | ॥ २२० ॥
।
॥ २२१ ॥
आदि का निषेध -राजा के बुलाने पर सदा विनीत के समान वेष बनाये हुये हाथ जोड़े और CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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९ ०.: शुक्रनीति: नमस्कार करने के बाद शरीर के अगले हिस्से को वस्त्र से ढके हुये स्थित हो और राजा की बात सुनकर तथा सर्वप्रथम उनकी आज्ञा पाकर पश्चात् अपने कार्य का निवेदन करे | और नमस्कार करने के बाद नम्रता के साथ अपने आसन पर बैठे, और राजा के बगल में या सामने जोर से हँसना, खांसना, थूकना, कुत्सित कार्य या किसी की निन्दा करना, जभाई लेना, शरीर तोड़ना, अंगुलियों के पोरों को चटकाना इन सब कार्यों को न करे ।
राज्ञादिष्टन्तु यत्स्थानं तत्र तिष्ठेन्मुदान्वितः ।
प्रवीणोचितमेधावी वर्जयेदभिमानिताम् ॥ २२२ ॥
राजा के बताये हुये स्थान पर प्रसन्न चित्त से बैठे, प्रत्रीणों की भांति योग्य बुद्धिचाला होकर अभिमान करना छोड़ दे ।
आपद्युन्मागंगमने कार्यकालात्ययेषु च ।
अपृष्टोऽपि हितान्वेषी ब्रूयात्कल्याणभाषितम् ॥ २६३ ॥
राजा के ऊपर जब कोई आपत्ति आ पड़े अथवा वह कुपथ पर चले, या कार्य करने का समय व्यतीत हो रहा तो विना पूछने पर भी हित चाहने वाला होकर राजा से कल्याणकारक वचन कहे ।
प्रियं तथ्यं च पथ्यं च वदेद्धर्मार्थकं वचः ।
समानवर्तया चापि तद्धितं बोधयेत्सदा ॥। २२४ ॥
हितकारी सेवक का कृत्य — और सुनने में प्रिय, सत्य तथा हितकारक, धर्म तथा भर्थ से युक्त वचन सदा राजा से कहे, और संमानयुक्त बात - चीत से या समान बातों ( उदाहरणों ) के द्वारा सदा राजा को हित की बात समझावे |
कीर्तिमन्यनृपाणां वा वदेन्नीतिफलं तथा ।
दाता त्वं धार्मिकः शूरो नीतिमानसि भूपते ॥ २२५ ॥
अनीतिस्ते तु मनसि वर्तते न कदाचन ।
ये ये भ्रष्टा अनीत्या तांस्तदग्रे कीर्तयेत्सदा ॥ २२६ ॥
नृपेभ्यो ह्यधिकोऽसीति सर्वेभ्यो न विशेषयेत् । और समझाने के लिये अन्य राजाओं की कीर्त्ति और नीति का फल राजा से कहे । और यह सदा उसके आगे कहे कि - ' हे महाराज! आप दाता, धार्मिक, शूर तथा नीति के जानने वाले या तदनुसार चलनेवाले हैं । और कभी आपके मन में अनीति नहीं रहती है । एवं जो जो अनीति पर ' चलने से राज्य से भ्रष्ट हो गये हैं उन सर्वो का वर्णन सदा राजा के आगे करे ।
और ' आप सब राजाओं से श्रेष्ठ है ' ऐसा विशेष रूप से न कहे ।
परार्थ देशकालज्ञो देशे काले च साधयेत् ॥ २२७ ॥।
CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri और देव पर दूसरे का जिससे दूसरे F राजा क समझदार रा चाहे भूख स जाय फिर भी समझद पर नियुक्त दूसरे के अ ( मारस ) किसी पूर्ण करे क्य पैदा करनेवा किसी विलम्ब न व काल तक स्वामी या या उसके न
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द्वितीयोऽध्यायः स्थित हो परार्थनाशनं न स्यात्तथा ब्रूयात्सदैव हि । अपने और देश तथा काल का जाननेवाला होकर उचित देश तथा काल होने अपने खांसना पर दूसरे का कार्य राजा से सिद्ध करावे 1 । और राजा से सदा ऐसा बचन कहे
, जिससे दूसरे का कार्य न नष्ट हो ।
तोड़ना, न कर्षयेत्प्रजां कार्यमिषतश्च नृपः सदा ॥ २२८ ॥
अपि स्थाणुवदासीत शुध्यन्परिगतः क्षुधा ।
न त्वेवानर्थसम्पन्नां वृत्तिमीहेत पण्डितः ॥ २२६ ॥
राजा को किसी भी मिष से प्रजा को पीड़ित न करने का निर्देश-- भांति समझदार राजा किसी निजी कार्य के व्याज से सदा प्रजा को दुःखित न करे | चाहे भूख से पीड़ित होने से सूखकर स्थाणु ( खुत्थे ) की भांति निश्चल हो जाय फिर भी अनर्थ से भरी हुई ( वुरी ) जीविका को न चाहे ।
यत्कार्ये यो नियुक्तः स भूयात्तत्कार्यतत्परः ।
ले, या नान्याधिकारमन्विच्छेन्नाभ्यसूयेच्च केनचित् ॥ २३० ॥
चाहने समझदारों को अपने २ कार्यों में नियुक्त रहने का निर्देश - जो जिस कार्य पर नियुक्त किया गया हो वह उस कार्य के करने में तथ्पर रहे । और किसी दूसरे के अधिकार छीनने की इच्छा न करे और किसी के साथ असूया ( मात्सर्य ) न करे ।
तकारक, न न्यूनं लक्षयेत्कस्य पुरयेत स्वशक्तितः ।
चीत से परोपकरणादन्यन्न स्यान्मिन्त्रकरं सदा ॥ २३१ ॥
ही बात • किसी की त्रुटि पर ध्यान न दे बल्कि अपनी शक्ति से उसकी त्रुटि को पूर्ण करे क्योंकि दूसरे के साथ उपकार करने से बढ़कर दूसरा कोई मित्रता पैदा करनेवाला कार्य नहीं है ।
करिष्यामीति ते कार्यं न कुर्यात्कार्यलम्बनम् ।
द्राक्कुर्यात्त समर्थश्चेत्साशं दीर्घं न रक्षयेत् ॥ २३२ ॥
किसी से ' मैं तुम्हारा कार्य करूंगा ' ऐसा कहकर उसके कार्य करने में चिलश्व न करे । यदि स्वयं समर्थ हो तो शीघ्र कार्य को पूरा कर दे । दीर्घ राजा काल तक उसे आशा में लटका कर न रखे ।
दाता, गुह्यं कर्म च मन्त्रं च न भर्तुः सम्प्रकाशयेत् ।
टाले हैं । विद्वेषं च विनाशं च मनसापि न चिन्तयेत् ॥ २३३ ॥
ति पर स्वामी के गुल कार्य के प्रकाश करने का निषेध - स्वामी ( राजा ) के गुप्त करे । कार्य या विचार को किसी के समक्ष प्रकाशित न करे । और उसके साथ विद्वेष या उसके नाश की कल्पना मन से भी न करे । राजा परममित्रोऽस्ति न कामं विचरेदिति । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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६२ शुक्रनीति: स्त्रीभिस्तदर्थिभिः पापैर्वैरिभूतैर्निराकृतैः ॥ २३४ ॥
एकार्थचर्या साहित्यं संसर्ग च विवर्जयेत् । राजा को मित्र मानने का एवं उनकी स्त्री आदि के साथ सहवास का निषेध - ' राजा मेरा परम मित्र है ' - ऐसा समझ कर मनमाना व्यवहार न करे । और स्वामी को चाहनेवाली स्त्रियों एवं स्वामी के साथ पाप ( बुरा ) व्यवहार या वैरभाव रखनेवाले किंवा स्वामी से तिरस्कृत लोगों के साथ मिलकर किसी कार्य को करना या उनके साथ रहना या किसी प्रकार का संबन्ध रखना
याग दे ।
वेषभाषानुकरणं न कुर्यात्पृथिवीपतेः २३५ ॥
सम्पन्नोपि च मेधाबी न स्पर्धेत च तद्गुणैः । राजवेशभूषा धारण की नकल करने का निषेध - राजा के वेष तथा भूषा का नकल न करे । गुणों से संपन्न तथा प्रतिभाशाली होने पर भी राजा के गुणों
के साथ स्पर्द्धा न करे अर्थात् ' मैं राजा से अधिक गुणवान् हूँ ' यह न दिखावे ।
रागापरागौ जानीयाद्भुतुः कुशल कर्मवित् ॥ २३६ ॥
इङ्गिताकारचेष्टाभ्यस्तदभिप्रायतां तथा ।
त्यजेद्विरतं नृपतिं रक्ते वृत्तिन्तु कारयेत् ॥ २३७ ॥
राजा की विरक्ति तथा अनुरक्ति का ज्ञान रखने एवं तदनुसार त्याग तथा ग्रहण का निर्देश - और निपुण लोगों के कर्म को अथवा राजा के या अपने शुभ कर्म को जाननेवला होकर स्वामी के अनुराग अथवा विरक्ति को अर्थात् किस कार्य से स्वामी प्रसन्न या अप्रसन्न होते हैं - इस बात को एवं स्वामी के इशारा, आकार ( मुखमुद्रा ), और चेष्टा से उनके अभिप्राय को जाने । और यदि राजा को विरक्त जाने तो उसे छोड़ दे एवं अनुराग युक्त जाने तो उसके पास रहे ।
विरक्तः कारयेन्नाशं विपक्षाभ्युदयं तथा ।
आशावर्धनकं कृत्वा फलनाशं करोति च ॥२३८ ॥
अकोपोऽपि सकोपाभः प्रसन्नोऽपि च निष्फलः ।
वाक्यश्च समदं वक्ति वृत्तिच्छेदं करोति च ॥ २३ ९ ॥
लक्ष्यते विमुखश्चैव गुणसङ्कीर्त्तने कृते ।
दृष्टि क्षिपत्यथान्यत्र क्रियमाणे च कर्मणि ॥ २४० ॥
विरक्तलक्षणं ह्येतद्रक्तस्य लक्षणं ब्रुवे । विरक्त राजा के लक्षण - राजा जिसके ऊपर विरक होता है उसका नाश करता है एवं उसके शत्रुओं का अभ्युदय ( तरक्की ) करता है । यदि स्वामी प्रथम आशा बढाकर अन्त में कार्यफल को नष्ट कर देता है । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri और बिना क कार्य को सफ जीविका का पड़ता है और गुण - कीर्त्तन समझने चाहि I घ अनुरक्त वचनों को प्र आसन दिलात भेट होने पर प्रसन्न वदन को उससे अन स्वीकार करत बातों का प्रस अनुराग रखने सेवा करनी च त त राजा से वस्त्र- भूषण आ कार्यों में जो निवेदन करना को सुने और
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द्वितीयोऽध्यायः ६३ और बिना कोप के भी कोपयुक्त सा दिखाई पड़ता है । प्रसन्न होते हुये भी कार्य को सफल नहीं करनेवाला होता है । और अहङ्कारयुक्त बात बोलता है, बस का जीविका का नाश करता है । गुणों की प्रशंसा करने पर भी विमुख दिखाई करे । पड़ता है और अन्यत्र किये जा रहे कार्य की ओर दृष्टि लगाता है किन्तु व्यवहार गुण - कीर्तन करनेवाले की ओर नहीं लगाता है तो ये सब लक्षण विरक्त के किसी रखना भूषा गुणों बावे । समझने चाहिये । और आगे अनुरक्त स्वामी के लक्षण कहते दृष्ट्वा प्रसन्नो भवति वाच्यं गृह्णाति'चादरात् कुशलादिपरिप्रश्नी प्रदापयति चासनम् । विविक्तदर्शनं चास्य रहस्येनं न शङ्कते ज्ञायेत हृष्टवदनः श्रुत्वा तस्य च तत्कथाम् अप्रियाण्यपि चान्यानि तद्युक्तान्यभिमन्यते उपायनव गृह्णाति स्तोकं सम्पादनैस्तथा । कथान्तरेषु स्मरति प्रहृष्टवदनस्तथा
हैं ।
॥ २४१ ॥
॥ २४२ ॥
| ॥ २४३ ॥
॥ २४४ ॥
अनुरक्त राजा के लक्षण - जो देखकर प्रसन्न होता है और आदर के साथ वचनों को ग्रहण करता है अर्थात् सुनता है । कुशलादि पूछता है, बैठने को आसन दिलाता है । और सेवक के लिये एकान्त में दर्शन देता है एवं एकान्त में तथा भेट होने पर उससे शङ्का नहीं रखता है । और उसकी जो बातें हैं उसे सुनकर शुभ प्रसन्न वदन दिखाई पड़ता है और सेवक से संबद्ध अप्रिय बातों एवं कार्यों को उससे अन्य मानता है अर्थात् अभिनन्दन करता है । दिये हुये उपहार को मी के स्वीकार करता है एवं सेवक के थोड़े से कार्यों को कर देने से भी उन्हें दूसरी III बातों का प्रसङ्ग होंवे पर भी प्रहृष्ट - वदन होकर स्मरण करता है । ये सब उसके अनुराग रखनेवाले स्वामी के लक्षण हैं । यदि ऐसा हो तो उस स्वामी का सेवा करनी चाहिये । तद्दत्तवस्त्रभूषादिचिह्नं सन्धारयेत्सदा न्यूनाधिक्यं स्वाधिकारकार्ये नित्यं निवेदयेत् ॥ २४५ ॥
तदर्थां तत्कृतां वार्तां शृणुयाद्वापि कीर्तयेत् । राजा से प्रदत्त भूषणादि धारण का निर्देश - अनुरक्त स्वामी के दिये हुये वस्त्र - भूषण आदि चिह्न को सदा धारण करना चाहिये । अपने अधिकार के कार्यों में जो न्यूनाधिषय ( कमी - चेपा ) हो गया हो उसे निस्य स्वामी से निवेदन करना चाहिये | और स्वामी से संबद्ध तथा स्वामी की कही हुई बातों
को सुने और उसका कीर्तन करे ।
उसका । चारसूचकदोषेण त्वन्यथा यद्वदेन्नृपः ॥ २४६ ॥
हैहै । शृणुयान्मौनमाश्रित्य तथ्यमन्नानुमोदयेत् । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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६४ शुक्रनीतिः स्वामी के प्रति नृत्य के कर्त्तव्य - यदि जासूस अथवा चुगुलखोरों के दोष ( कहने ) से राजा विरुद्ध वचन कहें तो उसे चुपचाप नृत्य को सुन लेना
चाहिये किन्तु सत्य की भांति उसे स्वीकार नहीं करना चाहिये ।
आपद्गतं सुभर्तारं कदापि न परित्यजेत् ॥ २४७ ॥
और विपत्ति में पड़े हुये अच्छे स्वामी का कभी परित्याग न करना चाहिये ।
एकवारमध्यशितं यस्यान्नं ह्यादरेण च ।
तदिष्टं चिन्तयेन्नित्यं पालकस्याञ्जसा न किम् ॥ २४८ ॥
चाहे जिस किसी का अन्न यदि आदर के साथ एक बार भी खा लिया जाय तो उसका हित नित्य चिन्तन करना उचित होता है फिर पालन करने वाले का वस्तुतः क्या हितचिन्तन नहीं करना चाहिये अर्थात् अवश्य करना चाहिये ।
अप्रधानः प्रधानः स्यात्काले चात्यन्तसेवनात् ।
प्रधानोऽप्यप्रधानः स्यात्सेवालस्यादिना यतः ॥ २४६ ॥
स्वामी की समय पर अत्यन्त सेवा करने से अप्रधान ( गौण ) सेवक प्रधान ( मुख्य ) हो जाता है किन्तु सेवा में आलस्यादि करने से प्रधान भी अप्रधान सेवक हो जाता है ।
नित्यं संसेवनरतो भृत्यो राज्ञः प्रियो भवेत् ।
स्वस्वाधिकारकार्यं यद्द्राक्क्कुर्यात्सुमना यतः ॥ २५० ॥
निष्य भली - भांति सेवा में तत्पर रहनेवाला भृत्य राजा का प्रिय होता है । क्योंकि भृत्य अपने २ अधिकार ( जिम्मेदारी ) का कार्य शीघ्र करता है अतः स्वामी उससे प्रसन्न रहता है ।
न कुर्यात्सहसा कार्यं नीचं राजापि नो दिशेत् ।
तत्कार्यकारकाभावे राज्ञा कार्य सदैव हि ॥ २५१ ॥
मृत्य स्वामी का कार्य अविवेक पूर्वक न करे अर्थात् सावधानी से करे । और राजा भी मृत्य से नीच कार्य करने के लिये न कहे किन्तु यदि उस नीच ( मल - मूत्रादि उठाना रूप ) कार्य का करने वाला उस समय कोई राजा पास न हो तो उस कार्य को सदा स्वयं राजा को कर देना उचित ही है । काले यदुचितं कर्तुं नीचमप्युत्तमोऽर्हति यस्मिन्प्रीतो भवेद्राजा तदनिष्टं न चिन्तयेत् ॥ २५२ ॥
समय पढ़ने पर यदि आवश्यकता हो तो मल - मूत्रादि उठाना निष्ट भी उसके अयोग्य उच्च कोटि के भृत्य के लिये करना उचित ही है क्योंकि जिसके ऊपर | चाहिये | न और राज -करना चाहिये प र आपस म किये गये उत्त रक्षा के लिये भेद रखे । B उ राजा रा पर राजा तथ रखते हैं वहां अ र दूसरे भ कहे । और न सुने । न न नौकर के रूप हि स डाकू के हित या अहि समान केवल fa प्रच्छन्न. CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri