शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 161–170
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 161–170
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७५ प्रधान तान् सर्वान् पोषयेद् भृत्या दानैर्मानैः सुपूजितान् ॥ १२५ ॥
हीयते चान्यथा राजा हाकीतिं चापि विन्दति । राजा को तपस्वी आदियों की रक्षा करने का निर्देश — जो राज्य में तपस्या करने वाले, दानशील, वेद तथा स्मृतियों के ज्ञाता ( वैदिक और स्मार्त्त ), अनुरूपः पुराण के जानने वाले, शास्त्रज्ञ, ज्योतिषी, मन्त्र - तन्त्रवेत्ता, वैद्य, कर्मकाण्ड भी के ज्ञाता, शैवादि धर्म शास्त्र - ज्ञाता, तथा इन से अन्य विषयों के ज्ञाता, श्रेष्ठ गुणी, बुद्धिमान या जितेन्द्रिय हो, उन सर्वो का मासिक या वार्षिक, वृत्ति, ११८ ॥ " समय २ पर दान तथा सम्मान द्वारा पूजित करते हुये भरण - पोषण करे । यदि . राजा- ऐसा न करे तो राज्य से च्युत हो जाता है तथा उसकी अपकीर्त्ति भी
होती है ।
बहुसाध्यानि कार्याणि तेषामप्यधिपांस्तथा ॥ १२६ ॥
तत्तत्कार्येषु कुशलाब्ज्ञात्वा तांस्तु नियोजयेत् । बहुत व्यक्तियों द्वारा संपन्न होने वाले कार्यों को जानकर था उन कार्यों दश प्रकृ- के करने में कुशल जो हो उन्हीं व्यक्तियों को समझ कर यथायोग्य उक्त कार्यों
योग्यता: का अधिकारी बनावे ।
न, चांदी, ' अमन्त्रमक्षरं नास्ति नास्ति मूलमनौषधम् ॥ १२७ ॥
- पाठान्तर अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः । -शाला का योजनाकर्त्ता की दुर्लभता - कोई भी अक्षर ऐसा नहीं है जो मन्त्र से अध्यक्ष, शून्य हो, तरु - गुल्म आदि का कोई भी मूळ ( जड़ी - बूटी ) ऐसा नहीं है जो 1 औषध न हो एवं कोई भी ऐसा पुरुष नहीं है जो किसी कार्य के योग्य न हो किन्तु इन सर्वो को यथोचित रीति से कार्यों में लगाने वाला पुरुष ही.
दुर्लभ है ।
प्रभद्रादिजातिभेदं गजानां च चिकित्सितम् ॥ १२८ ॥
शिक्षां व्याधिं पोषणं च तालुजिह्वानखैर्गुणान् ।
( संग्राम आरोहणं गतिं वेत्ति सं योग्यो गजरक्षणे ॥ १२६ ॥
से कर तथाविधाधोरणस्तु हस्तिहृदयहारिकः । को वसूल गजाधिपति के एवं महावत के लक्षण - जो पुरुष हाथियों के प्रभद्र आदि ग्राम मैं जाति - भेद को तथा उनकी चिकित्सा - विधि शिक्षा, व्याधि, पोषण करना : तथा उनके तालु, जिह्वा ' और नख के द्वारा गुणों को एवं उन पर चढ़ने की ॥ ' तथा उनके चलाने की कला को जानने वाला हो उसे हाथियों की रक्षा करने मैं ( गजाध्यक्ष ) नियुक्त करे । क्योंकि उक्त गुणों से ही युक्त महाबत हाथियों
। ' को वश में करने वाली होता है ।
अश्वानां हृदयं वेत्ति जातिवर्णभ्रमैर्गुणान् ॥ १३० ॥
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०७६ शुक्रनीति:
गतिं शिक्षां चिकित्सां च सत्त्वं सारं रुजं तथा ।
हिताहितं पोषणं च मानं यानं दतो वयः ॥ १३१ ॥
शूरश्च व्यूहवित्प्राज्ञः कार्योऽश्वाधिपतिश्च सः । अश्वाधिपति के लक्षण - जो पुरुष घोड़ों के हृद्गत भावों को एवं जाति, रंग, रोमों की भौंरी के द्वारा उनके गुणों को तथा उनकी चाल, शिक्षा, चिकित्सा, सच्व ( बल ), सार ( क्षमता ), रोग, हिताहित ( शुभ या अशुभ ) फल, पालन, मान ( ऊंचाई आदि ), उन पर गमन करना, दाँतों से अबस्था को जानने वाला, शूर, ब्यूह - रचना का जानने वाला, अध्यन्त बुद्धिमान हो
उसे घोड़ों का अध्यक्ष बनाना चाहिये ।
एभिर्गुणैश्च संयुक्तो धुर्यान्युग्यांश्च वेत्ति यः ॥ १३२ ॥
रथस्य सारं गमनं भ्रमणं परिवर्तनम् ।
-समापतत्सु शस्त्रास्त्रलक्ष्यसंधाननाशकः ॥ १३३ ॥
रथगत्या स रथपो हयसंयोगगुप्तिवित् । सारथि के लक्षण – जो पुरुष उक्त गुणों से युक्त होते हुये भी भार वहन करने में समर्थ रथ में जोते जाने वाले घोड़ों को एवं रथकी दृढता आदि, चलाना, घुमाना, बदलना जानता है, और रथ की विशेष गति से शत्रुओं द्वारा चलाये हुये शस्त्रास्त्रों के लचय को विफल बनाने वाला, तथा शत्रुओं के घोड़ों के साथ मुठभेड़ होने पर अपने घोड़ों को बचाने की कला जानने वाला
* हो उसे रथाध्यक्ष या सारथि बनाना चाहिये ।
सादिनश्च तथा कार्याः शूरा व्यूह विशारदाः ॥ १३४ ॥
वाजिगतिविदः प्राज्ञाः शस्त्रास्त्रैर्युद्धको विदाः । घुड़सवार के लक्षण - और जो शूर व्यूह - रचना में पण्डित, घोड़ों -की चालों को जानने वाले, बुद्धिमान तथा शस्त्र तथा अस्त्र द्वारा युद्ध करने
में कुशल हों उन्हें घुड़सवार बनाना चाहिये ।
चक्रितं रेचितं वल्गितकं धौरितमाप्लुतम् ॥ १३५ ॥
तुरं मंदं च कुटिलं सर्पणं परिवर्तनम् ।
एकादशास्कन्दितं च गतीरश्वस्य वेत्ति यः ॥ १३६ ॥
यथाबलं यथार्थ च शिक्षयेत्स च शिक्षकः । अश्वशिक्षक के लक्षण — जो चक्रित ( चक्राकार में घुमाना ), रेचित ( त विशेष ), वल्गितक ( बहुत ऊँच्ची वस्तु को लाँघना ), धौरित ( गतिभेद ), आप्लुत ( मेढक की भांति कूदना ), तुर ( तेज दौड़ना ), मन्द ( धीरे? चलना ), कुठिल ( वक्रगति ), सर्पण ( सर्प की भांति टेढ़े - मेढ़े दौड़ना ), परि -वर्त्तन ( पलटना ), आस्कन्दित ( शत्रुओं पर आक्रमण करना ), इन ११ प्रकार CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri की घोड़ों की शिक्षा देना नियुक्त करने व ह अश्वसेव ( घोड़े की जं शूर होता है सेनापति जानने का ) को नीचा दि शूर, सैनिक-में भक्ति रख म्लेच्छ या स सेनाध्यक्ष य पत्ति ( हिंयों का जो ' गौल्मिक ' अनुशतिक, लिये अध्यक्ष एवं १०००
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द्वितीयोऽध्यायः GO १ ॥ की घोड़ों की चालों को तथा घोड़े के सामर्थ्य के अनुसार उन्हें यथार्थ रूप से शिक्षा देना जानता है वह अश्वशिक्षक ( घोड़ों को सिखानेवाला ) के पद पर वं नियुक्त करने योग्य होता है । जाति वाजिसेवासु कुशलः पल्याणादिनियोगवित् ॥ १३७ ॥
, शिक्षा, ढांगश्च तथा शूरः स कार्यो वाजिसेवकः । अशुभ ) अश्वसेवक ( साईस ) के लक्षण - जो घोड़ों की सेवा करने में कुशल, पल्याण ' अवस्था ( घोड़े की जीन ) आदि लगाने की कला का जानने वाला, दृढ़ अर्को वाला तथा मान हो शूर भार वहन
होता है वह साईस बनाने योग्य है ।
नीतिशस्त्रास्त्रव्यूहादिनतिविद्याविशारदाः ॥। १३८ ॥
अबाला मध्यवयसः शूरा दान्ता ढांगकाः । स्वर्धमनिरता नित्यं स्वामिभक्ता रिपुद्विषः ॥ १३६ ॥.
शूद्रा वा क्षत्रिया वैश्या म्लेच्छाः संकरसम्भवाः ।
सेनाधिपाः सैनिकाश्च कार्या राज्ञा जयार्थिना ॥ १४० ॥
सेनापति तथा सैनिकों के लक्षण - जो नीति ( कर्त्तव्य तथा अकर्त्तव्य आदि जानने का ) शास्त्र, शस्त्र तथा अस्त्र चलाना, व्यूह - रचना, नतिविद्या ( शत्रुओं शत्रुओं के को नीचा दिखाना ) इन सब विषयों में पण्डित, लड़कपन से रहित, तरुण, शत्रुओं के शूर, सैनिक - शिक्षा प्राप्त, दृढ़ अङ्गों वाले, अपने धर्म में निरत, निष्य स्वामी जने वाला मैं भक्ति रखने वाले, एवं उनके शत्रुओं से द्वेष रखने वाले, शूद्र, क्षत्रिय, वैश्य, -म्लेच्छ या सङ्कीर्ण जाति वाले हों उन्हें विजय चाहनेवाला राजा अपना: ॥ सेनाध्यक्ष या सैनिक बनावे ।
पंचानामथवा षण्णामधिपः पदगामिनाम् ।
, घोड़ों योग्यः स पत्तिपालः स्यास्त्रिंशतां गौल्मिकः स्मृतः ॥ १४१ ॥
बुद्ध करने. शतानां तु शतानीकस्तथाऽनुशतिको वरः ।
सेनानीलेखकश्चैते शतं प्रत्यधिपा इमे ॥। १४२ ॥
साहस्रिकस्तु संयोन्यस्तथा चायुतिको महान् । पत्ति ( पैदल सेना ) पाल आदिकों के अधिकार -५ या ६ पैदल लिपा--I हियों का जो स्वामी होता है वह ' पत्तिपाल ' ३० सिपाहियों का स्वामी ' गौल्मिक ' १०० सिपाहियों का स्वामी ' शतानीक ' कहलाता है, और श्रेष्ठ. ( गति अनुशतिक, सेनानी तथा लेखक ये सब सौ - सौ के ऊपर विशेष २ कार्यों के... तिभेद, लिये अध्यक्ष बनाने चाहिए । और १००० सिपाहियों का स्वामी ' साहस्रिक ' ' '
( धीरे २ एवं १०००० सिपाहियों का स्वामी महान ' आयुतिक ' बनाना चाहिये ।
ब ), परि न्यूहाभ्यासं शिक्षयेद्यः सायंप्रातस्तु सैनिकान् ॥ १४३ ॥
१ प्रकार जानाति स शतानीकः सुयोद्धुं युद्धभूमिकाम् । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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शुक्रनीति: शतानीकादिकों के लक्षण - सायं प्रातः सैनिकों को व्यूह - रचना का आयास ( कवायत या परेड़ ) कराना और भली भांति युद्ध करने के लिये रणसज्जा ( युद्ध योग्य सामग्री - वेषभूषा से सुसज्जित करना ) का ज्ञान रखना,
यह शतानीक का कर्त्तव्य है ।
तथाविधोऽनुशतिकः शतानीकस्य साधकः ॥ १४४ ॥
जानाति युद्धसम्भारं कार्ययोग्यं च सैनिकम् । और जो इन्हीं गुणों से युक्त, शतानीक की सहायता करने वाला युद्धो-· पयोगी सामग्रियों का तथा कार्य योग्य सैनिकों का जानने वाला होता है वह ' अनुशतिक ' कहलाता है । अर्थात् उक्त कार्यों का भार उसके ऊपर रहता है ।. निदेशयति कार्याणि सेनानीर्यामि कांश्च सः ॥ १४५ ॥
परिवृत्ति यामिकानां करोति स च पत्तिपः । जो प्रहरी ( पहरा देने वाले ) लोगों के लिये कार्य बताता है अर्थात् जिसके निदेशानुसार सिपाही कार्य करते हैं वह ( सेनानी ) कहलाता है । और प्रहरी गणों का. जो ह रा- बदलता है ' वह ' पत्तिप ' या ' पत्तिपाल '
कहलाता है ।
स्वावधानं यामिकानां विजानीयाच्च गुल्मपः ॥ १४६ ॥
जो प्रहरियों को अपने २ कामों में सतर्कता का निरीक्षण करता है वह ' गुल्मप ' या ' गौल्मिक ' कहलाता है ।
सैनिकाः कति सन्त्येतैः कति प्राप्तं तु वेतनम् ।
प्राचीनाः के कुत्र गताश्चैतान्वेत्ति स लेखकः ॥ १४७ ॥
गजाश्वानां विंशतेश्चाधिपो नायकसंज्ञकः । जो सेना में कितने सैनिक हैं! और उन्होंने कितना वेतन पाया है? - पुराने असमर्थ सैनिक कितने हैं? और कौन कहां २ गये हैं, इन लबों को जान कर लिखता है, वह ' लेखक ' कहलाता है 1 । और २० हाथियों एवं २० ' घोडों का अध्यक्ष ' नायक ' कहलाता है 1 उक्तसंज्ञान्स्वस्वचिह्नेर्लांछितांश्च नियोजयेत् ॥ १४८ ॥
उपर्युक्त अधिकारियों को अपने २ चिह्नों से युक्त रहने का निर्देश – ऊपर जिनके नामों का निर्देश किया गया है उन पत्तिपाल आदियों को उनके जो १ चिह्न हों उन से युक्त करके कार्य करने का आदेश देना चाहिये ।
अजा विगोमहिष्येणमृगाणामधिपाश्च ये ।
तद्वृद्धिपुष्टिकुशलास्तद्वात्सल्य निपीडिताः ॥ १४६ ॥
तथाविधा गजोष्ट्रादेर्योन्यास्तत्सेवका अपि । बकरा, मेवा, गौ, भैंस, पूण ( मृग विशेष ) मृग, इनके जो अध्यक्ष हों CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri उन्हें उन आदि के भी होना चाहिय य तित्तिरा प्रवृत्ति रखन पक्षियों के भ कला जानने लोगों को स E रत्नाद्य अध्यक्ष बना जाति और कोषाध्य व्यवहार में हों उन्हें ' को एवं मोटा, मूल्य का बनाना चा विता
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चना का उन्हें के लिये उनके रखना, आदि होना युद्धो वह द्वितीयोऽध्यायः ७ ९ उन ( बकरा आदि ) सब पशुओं की वृद्धि तथा पोषण करने में कुशल एवं दुख से दुखी होने वाले होना चाहिये । इसी प्रकार से हाथी तथा ऊंट के भी जो अध्यक्ष हों उन्हें भी हाथी, ऊँट आदि की सेवा करने वाला
चाहिये । और ऐसे ही लोगों की नियुक्ति भी करनी चाहिये ।
युद्धप्रवृत्तिकुशला स्तित्तिरादेश्च पोषकाः ॥ १५० ॥
शुकादेः पाठकाः सम्यक्छयेनादेः पातबोधकाः ।
तत्तदुद्धृदयविज्ञानकुशलाश्च सदा हि ते ॥ १५१ ॥
तित्तिरादिपोषकों की योजना का निर्देश — और इसी भांति युद्ध करने की ना - है १ । प्रवृत्ति रखने वाले तीतर आदि पक्षियों का पालन करने वाले और सुग्गे आदि ] पक्षियों के भली भांति पढ़ाने वाले तथा बाज आदि पक्षियों के झपट्टा मारने की कला जानने वाले एवं उपर्युक्त पक्षियों के हृद्गत भावों के पहचानने में निपुण है अर्थात् लोगों को सदा उन सर्वो का अध्यक्ष बनाना चाहिये ।
छाता है । मानाकृतिप्रभावर्णजातिसाम्याच्च मौल्यवित् ।
रत्नानां स्वर्णरजत मुद्राणामधिपश्च सः ॥ १५२ ॥
पत्तिपाल ' रत्नाद्यध्यक्ष के लक्षण -- और रस्न, स्वर्ण, चाँदी, मुद्रा ( सिक्का ). के जो अध्यक्ष बनाये जांय, उन्हें रस्नादिकों के मान ( तौल ), आकार, चमक, रंग है वह जाति और समानता को देखकर उनके मूल्य का जानकार होना चाहिये ।
दान्तस्तु सधनो यस्तु व्यवहारविशारदः ।
धनप्राणोऽतिकृपणः कोशाध्यक्षः स एव हि ॥ १५३ ' ॥
कोषाध्यक्ष के लक्षण - और जो विनम्र स्वभाव वाले, धनी तथा व्यवहार में चतुर, धन की प्राण के समान रक्षा करने वाले तथा अत्यन्त कृपण हो उन्हें ' कोषाध्यक्ष ' पद पर नियुक्त करना चाहिये । या है?
सर्वो को देशभेदैर्जातिभेदैः स्थूलसूक्ष्मबलाबलः ।
एवं २० कौशेयादेर्मान मूल्यवेत्ता वस्त्रस्य वस्त्रपः ॥ १५४ ॥
वस्त्राधिपति के लक्षण — -8 और जो देश तथा जाति - संबन्धी विभिन्नता एवं मोटा, महोन, मजबूत, कमजोर जानकर परिमाण ( तैल ) और उचित मूल्य का निश्चय करनेवाला हो उसी को रेशमी आदि वस्त्रों का ' अध्यक्ष ' ऊपर जो २ बनाना चाहिये ।
कुटीकञ्चुकनेपथ्यमण्डपादेः परिक्रियाम् ।
' प्रमाणतः सौचिकेन रञ्जनानि च वेत्ति यः ॥ १५५ ॥
तथा शय्यादिसन्धानं वितानादेनिंयोजनम् ।
वस्त्रादीनां च स प्रोतो वितानाद्यधिपः खलुः ॥ १५६ ॥
वितानाद्यधिपके लक्षण — जो वस्त्रों की कुटी ( तम्बू. ), कल्चुक ( कवच CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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५० शुक्रनीति: या कुर्ता- कोट आदि ), नेपथ्य ( पर्दा आदि या वेष ), मण्डप ( वस्त्र निर्मित: गृह आदि ) को नाप के अनुसार सीने तथा शय्या ( विस्तार ) आदि बिछाना या सजाना, शामियाना आदि का ठीक से खड़ा करना और वस्त्रादियों को पहनाना भली भांति जानता हो उसे वितानादि का अध्यक्ष बनाना चाहिये ।
जातिं तुलां च मौल्यं च सारं भोगं परिग्रहम् ।
संमार्जनं च धान्यानां विजानति स धान्यपः ॥ १५७ ॥
धान्यपति के लक्षण -- जो धान्यों की जाति, वजन, मूल्य, श्रेष्ठता, खाने. का तरीका, पाने का उपाय, साफ करना इन सब विषयों को अच्छी तरह से जानता है, उसे ' धान्यप ' धान्यों का अध्यक्ष बनाना चाहिये ।
घौताधौतविपाकज्ञो रससंयोगभेदवित् ।
क्रियासु कुशलो द्रव्यगुणवित्पाकनायकः ॥ १५८ ॥
पाकाध्यक्ष के लक्षण – जो पकाने का अन्न - धुला हुआ है या नहीं घुला हुआ है एवं परिपक्क हुआ है या नहीं इसका जानने वाला, तथा रसों ( कड़वा, कसैला, तीता, खट्टा, नमकीन, मीठा ) के संयोग से होने वाले भेदों का जान-कार है एवं पाकक्रिया ( रसोई बनाने ) में निपुण तथा द्रव्यों एवं उनके गुण को जानने वाला हो उसे ' पाकनायक ' ( रसोई बनाने वालों का अध्यक्ष ) बनाना चाहिये ।
फलपुष्पवृद्धिहेतुं रोपणं शोधनं तथा ।
पादपानां यथाकालं कर्तुं भूमिजलादिना ॥ १५ ९ ॥
तद्वेषजं च संवेत्ति ह्यारामाधिपतिश्च सः । आरामाधिपति के लक्षण - जो वृक्षों को समयानुसार मिट्टी ( खाद ) तथा जल देने आदि से उनके पुष्प तथा फल के बढ़ाने के साधन ( उपाय ), लगाना, संस्कार करना, और रोग लग जाने पर औषध ( दूर करने का उपाय ) करना भली भांति जानता हो उसे ' आरामाधिपति ' ( बगीचों का अध्यक्ष ) बनाना
चाहिये ।
प्रासादं परिखां दुर्ग प्राकारं प्रतिमां तथा ॥ १६० ॥।
यन्त्राणि सेतुबन्धञ्च वाप कूपतडागकम् ।
तथा पुष्करिणीं कुण्डं जलाद्यूर्ध्वगतिक्रियाम् ॥ १६१ ॥
सुशिल्पशास्त्रतः सम्यक्सुरम्यं तु यथा भवेत् ।
कर्तुं जानाति यः सैव गृहाद्यधिपतिः स्मृतः ॥ १६२ ॥
गृहाद्यधिपति के लक्षण - जो सुन्दर शिल्प शास्त्र का ज्ञाता होने तद्-नुसार अत्यन्त सुन्दर जिस प्रकार से बन सके उस प्रकार से राजभवन, खाई, किला, परकोटा, मूर्ति, यन्त्र, पुल, बावड़ी, कूप, तालाब, पोखरी, कुण्ड, जल CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri को यन्त्रादि है उसी को ६ स जो यथा और उनका स योग्य होता ह f देवाध्य की आराधन ' देवपूजा का दानाध्य संग्रह भी नह जानने वाला को पहचानन रहनेवाला हो सभास तथा सौजन्य में समभाव लोभ को ज सभ्य ( सेम ६ शु ०
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द्वितीयोऽध्यायः ८१ निर्मितः को यन्त्रादि से ऊपर चढ़ाना, इन सब को सुन्दर बनाने की क्रिया को जानता बिछाना है उसी को गृहादियों का अध्यक्ष बनाना चाहिये ।:
दियों को राजकार्योपयोग्यान् हि पदार्थान्वेत्ति तत्त्वतः ।
हिये । सचिनोति यथाकाले सम्भाराधिप उच्यते ॥ १६३ ॥
जो यथार्थ रूप से राजा के कार्य में आने योग्य वस्तुओं को जानता है ॥ और उनका समयानुसार संग्रह करके रखता है वह ' सम्भाराधिप ' पद के , खाने योग्य होता है ।
रह से स्वधर्माचरणे दक्षो देवताराधने रतः ।
निःस्पृहः स च कर्तव्यो देवतुष्टिपतिः सदा ॥ १६४ ॥
देवाध्यक्ष के लक्षण --जो अपने धर्म के आचरण करने में चतुर, देवता की आराधना में निरत, स्वयं किसी वस्तु की इच्छा न रखनेवाला हो उसे हीं घुला ' देवपूजा का अध्यक्ष ' अर्थात् पुजारियों के विभाग का स्वामी बनाना चाहिये । कड़वा याचकं विमुखं नैव करोति नं च संग्रहम् । , जान- दानशीलश्च निर्लोभो गुणज्ञश्च निरालसः ॥ १६५ ॥
के गुण दयालुर्मृदुवाग्दान पात्र विन्नति तत्परः 1 नित्यमेभिर्गुणैर्युक्तो दानाध्यक्षः प्रकीर्तितः ॥ १६६ ॥
अध्यक्ष ) दानाध्यक्ष के लक्षण – जो याचकों को विमुख नहीं करता है और स्वयं संग्रह भी नहीं करता है एवं दानशील, लोभरहित, गुणज्ञ ( दूसरे के गुण: जानने वाला ), आलस्यरहित, दयालु, मधुरभाषी, दान देने योग्य व्यक्तियों को पहचानने वाला और विनम्र होता है वही व्यक्ति इन गुणों से सदा युक्त रहनेवाला होने से ' दानाध्यक्ष ' पद के योग्य होता है । ) तथा
व्यवहारविदः प्राज्ञा वृत्तशीलगुणान्विताः ।
लगाना, रिपौ मित्रे समा ये च धर्मज्ञाः सत्यवादिनः ॥ १६७ ॥
G करना निरालसा जितक्रोधकामलोभाः प्रियंवदाः ।
बनाना सभ्याः सभासदः कार्या वृद्धाः सर्वासु जातिषु ॥ १६८ ॥
सभासद् के लक्षण - जो लोक व्यवहार को जाननेवाले, विद्वान, सदाचार तथा सौजन्यादि एवं दया- उदारता आदि सद्गुणों से युक्त, शत्रु तथा मित्र में समभाव रखनेवाले, धर्मज्ञ, सत्यवादी, आलस्यरहित, क्रोध, काम तथा लोभ को जीतनेवाले ऐसे सभी जातियों के जो वृद्ध लोग हैं, उन्हें सभा का सभ्य ( सेम्बर ) बनाना चाहिये ।
तद सर्वभूतात्मतुल्यो यो निःस्पृहोऽतिथिपूजकः ।
, खाई दानशीलम्ध यो नित्यं स वै सत्राधिपः स्मृतः ॥ १६६ ॥
ड, जल सनाधिप के लक्षण - जो सम्पूर्ण प्राणियों के साथ अपने समान व्यवहार ६ शु ० CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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८२ शुक्रनीतिः करनेवाला, निस्पृह, अतिथियों का संमान करनेवाला, नित्य दानशील हो, उसे ' सनाधिप ' ( यज्ञ - विभाग का अध्यक्ष ) बनाना चाहिये । परोपकारनिरतः परममप्रकाशकः . निर्मत्सरो गुणग्राही सद्विद्यः स्यात् परीक्षकः ॥ १७० ॥
परीक्षक के लक्षण -- जो परोपकार में निरत रहनेवाला, दूसरे के मर्म अर्थात् मर्म को विदीर्ण करनेवाले दोष को नहीं प्रकाशित करनेवाला, महसरता से शून्य ( दूसरे के शुभ में द्वेष न रखनेवाला ), गुणग्राही और जिस विषय की परीक्षा लेता हो उसको जाननेवाला हो उसे ' परीक्षक ' ( परीक्षा लेनेवालो ) बनाना चाहिये ।
प्रजा नष्टा हि भवेत्तथा दण्डविधायकः ।
नातिक्रूरो नातिमृदुः साहसाधिपतिश्च सः ॥ १७१ ॥
साहसाधिप के लक्षण - प्रजा जिससे नष्ट न हो जाय ऐसे दण्ड का विधान करनेवाला, अत्यन्त क्रूरता तथा मृदुता को नहीं करनेवाला जो होता है वही ' साहसाधिपति ' ( चोर आदि का शासन करने के लिये अध्यक्ष फौजदारी ) पद के योग्य होता है ।
आघर्षकेभ्यश्चोरेभ्यो ह्यधिकारिगणात्तथा ।
प्रजासंरक्षणे दक्षो ग्रामपो मातृपितृवत् ॥ १७२ ॥
ग्रामाधिप के लक्षण —डाकू, चोर तथा राज्य के उच्छृङ्खल अधिकारी पुरुषों से माता - पिता की भांति जो अपनी प्रजा की रक्षा करने में निपुण होता . है । वही ' ग्रामप ' ( ग्रामपति ) पद के योग्य होता है ।
वृक्षान् संपुष्य यत्नेन फलं पुष्पं विचिन्वति ।
मालाकार इवात्यन्तं भागहारस्तथाविधः ॥ १७३ ॥
कर वसूल करनेवाले के लक्षण - जिस प्रकार से माली अत्यन्त यस्न से वृक्षों को बढ़ाकर उससे फल तथा पुष्प का संग्रह करता है उसी प्रकार प्रजाओं से जो राजा का भाग ( कर = मालगुजारी ) ग्रहण करनेवाला हो वैसा ' भागहार ' बनाना चाहिये ।
गणनाकुशलो यस्तु देशभाषाप्रभेदवित् ।
• असन्दिग्धमगूढार्थ विलिखेत्स च लेखकः ॥ १७४ ॥
लेखक के लक्षण - जो गणना ( गिनती ) करने में कुशल, देश की भाषाओं के भेदों को जाननेवाला, एवं सन्देहरहित तथा अर्थ समझने लायक स्पष्ट लिखनेवाला होता है, उसे ' लेखक ' पद पर नियुक्त करना चाहिये ।
शस्त्रास्त्रकुशलो यस्तु दृढाङ्गश्च निरालसः ।
3 समाहूयात् प्रनम्रः प्रतिहारकः ॥ १७५ ॥
द्वारपाल आलस्यरहित, के पास ले ज करना चाहिय य ता चुट्टी लेन न आये ऐसे ' शौल्किक ' प ज द तपोनिष्ठ शास्त्रोक कर्म क्षमाशील, नि य न दानशील पुत्रादि को भी लेता है, वह प श्र श्रुतज्ञ क ( पढ़ना ) तथ अभ्यास करन स स पौराणिक सुन्दर स्वरवा विषयों का ज स उ शास्त्रविद ( व्याकरणाद CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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द्वितीयोऽध्यायः ६३ ल हो, द्वारपाल के लक्षण -- जो शस्त्र तथा अन चलाने में निपुण, दृढ़ अड्डों वाला, आलस्यरहित, एवं नम्रता के साथ योग्यतानुसार लोगों को पुकार कर राजा के पास ले जानावाला हो उसे ' प्रतिहारक ' ( द्वारपाल ) पद पर नियुक्त करना चाहिये ।
के म था विक्रयिणां मूलधननाशो भवेन्नहि ।
मरसरता तथा शुल्कं तु हरति शौल्किकः स उदाहृतः ॥ १७६ ॥
विपय चुङ्गी लेनेचा के के लक्षण – बेचनेवालों का मूल धन में जिससे कमी वाला न आये ऐसे शुल्क ( चुङ्गी ) को जो व्यापारियों से वसूल करनेवाला हो उसे ) ' शौल्किक ' पद पर नियुक्त करे । जपोपवास- नियम - कर्मध्यानरतः सदा 1 दान्तः क्षमी निःस्पृहश्च तपोनिष्ठः स उच्यते ॥ १७७ ॥
तपोनिष्ठ के लक्षण - – जो सदा जप, उपवास, नियम ( व्रतपालन ), का शास्त्रोत कर्म तथा ध्यान में रत रहनेवाला, इन्द्रियों का दमन करने वाला, होता क्षमाशील, निस्पृह रहनेवाला हो उसे ' तपोनिष्ठ ' कहते हैं ।
जदारी ) याच केभ्यो ददात्यर्थं भार्यापुत्रादिकं त्वपि ।
संगृह्णाति यत्किंचिद् दानशीलः स उच्यते ॥ १७८ ॥
दानशील के लक्षण - जो याचकों को मांगने पर अपना धन, स्त्री तथा पुत्रादि को भी दे डालता है और उस समय अपने पास कुछ नहीं बचाकर रख धिकारी ' लेता है, वह ' दानशील ' कहलाता है । होता
पठन पाठनं तुक क्षमास्त्वभ्यासशालिनः ।
.. श्रुतिस्मृतिपुराणानां श्रुतज्ञास्ते प्रकीर्तिताः ॥ १७६ ॥
श्रुतज्ञ के लक्षण - जो श्रुति ( वेद ), स्मृति तथा पुराणों का अध्ययन ( पढ़ना ) तथा अध्यापन ( पढ़ाना ) करने में समर्थ तथा उन सर्वो का निश्य वृक्षों I अभ्यास करनेवाले हैं उन्हें ( श्रुत ) कहते हैं ।
जाओं I साहित्यशास्त्रनिपुणः संगीतज्ञश्च सुस्वरः ।
I सर्गादिपञ्चकज्ञाता स वै पौराणिकः स्मृतः ॥ १८० ॥
पौराणिक के लक्षण - जो साहित्य शास्त्र में निपुण, सङ्गीत का जाननेवाला, सुन्दर स्वरवाला एवं सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर, वंशानुचरित इन पांच विषयों का जाननेवाला हो वह ' पौराणिक ' कहलाता है । की मीमांसातर्कवेदान्तशब्द शासनतत्परः लायक ऊहह्वान्बोधितुं शक्तस्तन्वतः शास्त्रविच्च सः ॥ १८१ ॥
शास्त्रविद् के लक्षण - जो मीमांसा, तर्क ( न्याय ), वेदान्त, शब्दशासन ( व्याकरणादि शब्द शास्त्र ) का जाननेवाला, उक्त विषयों में तर्क करने तथा CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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८४ शुक्रनीति: यथार्थ रूप से उन्हें समझाने में समर्थ हो उसे ' शास्त्रविद् ' कहते हैं ।
संहितां च तथा होरां गणितं वेत्ति तत्त्वतः ।
ज्योतिर्विच्च स विज्ञेयोत्रिकालज्ञश्च यो भवेत् ॥ १८२ ॥
ज्योतिर्विद् के लक्षण - जो संहिता ( वाराही संहिता आदि ), होराशास ( पाराशर ), गणित ( ग्रहलाघवादि ) को यथार्थ रूप से जानता है एवं त्रिकालज्ञ ( भूत, भविष्य, वर्तमान का जानने वाला ) है वह ' ज्योतिबिंदु ' कहलाता है ।
बीजानुपूर्व्या मन्त्राणां गुणान्दोषांश्च वेत्ति यः ।
मन्त्रानुष्ठानसम्पन्नो मान्त्रिकः सिद्धदैवतः ॥ १८३ ॥
मान्त्रिक के लक्षण - जो बीजों की आनुपूर्वी के साथ मन्त्रों के गुण तथा दोष को जानता है एवं मन्त्र का नित्य अनुष्ठान करने में लगा हुआ, देवता की सिद्धि प्राप्त करनेवाला होता है उसे ' मान्त्रिक ' कहते हैं ।
हेतुलिङ्गौषधीभिर्यो व्याधीनां तत्त्वनिश्चयम् ।
साध्यासाध्यं विदित्वोपक्रमते स भिषक्स्मृतः ॥ १८४ ॥
वैथ के लक्षण - जो हेतु ( कारण ), लिङ्ग ( लक्षण ) तथा औषध- ज्ञान द्वारा व्याधियों का यथार्थ निश्चय एवं साध्यता तथा असाध्यता जानकर चिकित्सा करता है उसे ' भिषक ' ( वैद्य ) कहते हैं । श्रुतिस्मृतीवरैर्मन्त्रानुष्ठानैर्देषता नम् कर्तु हिततमं मत्वा यतते स च तान्त्रिकः ॥ १८५ ॥
• तान्त्रिक के लक्षण – जो श्रुति तथा स्मृति से भिन्न पुराणादि में कहे हुए मन्त्रानुष्ठान द्वारा देवता का पूजन अत्यन्त हितकर समझकर उस पद्धति से यत्न करता है वह ' तान्त्रिक ' कहलाता है ।
नपुंसकाः सत्यवाचो सुभूषाश्च प्रियंवदाः ।
सुकुलाश्च सुरूपाश्च योज्यास्त्वन्तःपुरे सदा ॥ १८६ ॥
अन्तःपुर के योग्य पुरुष के लक्षण - जो नपुंसक ( हिजड़े ), सत्य बोलने ' वाले, सुन्दर भूषण धारण करनेवाले, प्रियभाषी, अच्छे कुल में उत्पन्न तथा सुन्दर स्वरूपवाले हों, उन्हें सदा अन्तःपुर ( रनिवास ) के अन्दर में नियुक्त करे ।
अनन्याः स्वामिभक्ताश्च धर्मनिष्ठा दृढाङ्गकाः ।
अबाला मध्यवयसः सेवासु कुशलाः सदा ॥ १८७ ॥
सर्वं यद्यत्कार्यंजातं नीचं वा कर्तुमुद्यताः ।
निदेशकारिणो राज्ञा कर्तव्याः परिचारकाः ॥ १८८ ॥
परिचारक के लक्षण —जो अनन्य भाव से स्वामी की भक्ति करनेवाले, धर्मनिष्ठ, अ करने में कुशल आदि नीच भी आज्ञानुसार का शः जासूस कुशल एवं यथ को गूढचार ( राह द दण्डधारी-लोगों को प्रणाम वतानेवाले, वि धारण करके रा तन उत अ सन गायकाध प. ध. नि. इन हैं एवं संयोग भलीभांति समझ ऐसे लोगों को तथ नवी वेश्या के ल न करनेवाली, सुन्दर भङ्गों वाल कठिनकुचौचाल करनेवाली ) ऐस ये CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri