शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 191–200

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 191–200

पृष्ठ 191

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द्वितीयोऽध्यायः १०५ नौर परि किया है वे यदि वादी को मान्य हों तो उसके विषय में लिखे हुये पत्र को से ' क्रय-। स्थावर लिखता कहते हैं । 1

का अवि-' संमतिसंज्ञक पत्र ' कहते हैं ।

स्वकीयवृत्त ज्ञानार्थं लिख्यते यत्परस्परम् ॥

श्रीमंगलपदाढभ्यं वा सपूर्वोत्तरपक्षकम् ।

असंदिग्धमगूढार्थं स्पष्टाक्षरपदं सदा ॥

अन्यव्यावर्त कस्वात्म - परपित्रादिनामयुक् ।

एक - द्वि - बहुवचनैर्यथार्ह स्तुतिसंयुतम् ॥

समामा सतदर्घा हर्नामजात्यादिचिह्नितम् कार्यबोधि सुसम्बन्धं नत्याशीर्वादपूर्वकम् स्वाम्यसेवक सेव्यार्थं क्षेमपत्रं तु तत्स्मृतम् । क्षेमपत्र के लक्षण - अपने समाचारों को सूचित करने के ३१५ || ३१६ ॥ ३१७ ॥ ॥ ३१८ ॥

लिये सदा श्री तथा कहते हैं । मङ्गलसूचकशब्दों से प्रारम्भ करके प्रश्न तथा उत्तरों युक्त, सन्देहरहित, - स्पष्ट अर्थ तथा वांचने योग्य अक्षरों से युक्त शब्दों से भरा हुआ, दूसरे का ग्रहण न हो इसलिये अपने तथा दूसरे के पिता आदि के नामों से युक्त, एक, न्य भली. लेख्य ' दूर होने साक्षरयुक्त ' शुद्धि-दो या बहुवचनों से यथायोग्य प्रशंसा से भरे हुये, वर्ष, दिन नाम तथा जातिबोधक शब्दों से युक्त, कार्य को सुसंगत, नमस्कार ( बढ़ों के लिये ) एवं आशीर्वाद ( छोटों स्वामी तथा सेवक का परस्पर सेवा संबन्ध को लेकर जो ' उसे ' तेमपत्र ' कहते हैं । एभिरेव गुणैर्युक्तं स्त्राधर्ष कवि बोधकम् भाषापत्रं तु तज्ज्ञेयमथवा वेदनार्थकम् वेदनार्थक पत्र के लक्षण - उपर्युक्त इन्हीं सभी गुणों मास, पक्ष तथा सूचित करनेवाला, के लिये ) पूर्वक, पत्र लिखा जाता है ॥ ३१ ९ ॥ | से युक्त, अपनी ' पीड़ाओं को व्यक्त करनेवाला जो पत्र होता है उसे ' भाषापत्र ' अथवा ' वेद-व्यवसाय को उस लेख पत्र नार्थक पत्र ' कहते हैं । प्रदर्शितं वृत्तलेख्यं - समासाल्लक्षणान्वितम् समासात्कथ्यते चान्यच्छेषायव्ययबोधकम् आय - व्यय लेख्य के लक्षण - इस तरह से संक्षेप में से ' युक्त प्रथम ' वृत्त लेख्य ' के भेदों को प्रदर्शित किया अब लेख्य ' का संक्षेप से वर्णन कर रहे हैं । ॥ ३२० || । अपने - अपने लक्षणों द्वितीय ' आय - व्यय-व्याप्यव्यापकभेदैश्च मूल्यमानादिभिः पृथक् ॥ ३२१ ॥

विशिष्टसंज्ञितैस्तद्धि यथार्थैर्बहुभेदयुक् । राजाओं के आय - व्ययादिक के लक्षण - आय - व्यय - लेख्य या पत्र व्याप्य प्रधान · ( अल्पविषयक ) और व्यापक ( बहुविषयक ) भेदों से, बहुत या थोड़ा होने से, प्रदर्शित CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 192

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१०६ शुक्रनीति: पृथक् - पृथक् यथार्थ मूल्य और मान ( तौल ) आदि से अनेक

अनेक प्रकार का ) होता है ।

वत्सरे वत्सरे वापि मासि मासि दिने दिने ॥

हिरण्यपशुधान्यादि स्वाधीनं त्वायसंज्ञकम् ।

पराधीनं कृतं यत्तु व्ययसंज्ञं धनं च तत् ॥

प्रतिवर्ष, प्रतिमास और प्रतिदिन जो सोना, पशु तथा अपने अधीन हो जाता है अर्थात् अपने पास आता है । वह भेदों से युक्त ३२२ ॥ ३२३ ॥ धान्य आदि जो ' आय ' कहलाता. है । और जो सोना आदि धन दूसरे के आधीन कर दिया ( दे दिया ) जाता है. वह ' व्यय ' कहलाता है ।

साकचैव प्राचीन आयः सचितसंज्ञकः ।

व्ययो द्विधा चोपभुक्तस्तथा विनिमयात्मकः ॥ ३२४ ॥

आय के भेद — और आय दो प्रकार का होता है, एक तात्कालिक दूसरा प्राचीन, जिसे ' संचित ' भी कहते हैं । वं व्यय भी दो प्रकार का होता है,. एक उपभुक्त ( उपभोग किया हुआ ), दूसरा विनिमयात्मक ( किसी वस्तु के बदले रूप में दिया हुआ ) ।

निश्चितान्यस्वामिकञ्चानिश्चितस्वामिकन्तथा ।

स्वस्वत्व निश्चितं चेति त्रिविधं सञ्चितं मतम् ॥ ३२५ ॥

संचित आय के भेद - सञ्चित आय तीन प्रकार का होता है । एक निश्चि-तान्यस्वामिक ( जिसका दूसरा कोई स्वामी निश्चित है ), दूसरा अनिश्चित--स्वामिक ( जिसके स्वामी का निश्चय नहीं है ), तीसरा स्व - स्वस्वनिश्चित ( अपना स्वस्व जिस पर निश्चित है अर्थात् निजी ) संज्ञक सञ्चित आय है ।

निश्चितान्यस्वामिकं यद्धनं तु त्रिविधं हि तत् ।

औपनिध्यं याचितकमौत्तमणिकमेव च ॥ ३२६ ॥

निश्चितान्यस्वामिक संचित धन के भेद - इसमें प्रथम जो निश्चितान्य-स्वामिक संचित धन है, वह तीन प्रकार का है उसमें पहला औपनिध्य, दूसरां याचितक तीसरा औत्तमर्णिक है ।

विस्रम्भान्निहितं सद्भिर्यदौपनिधिकं हि तत् ।

अवृद्धिकं गृहीतान्यालङ्कारादि च याचितम् ॥ ३२७ ॥

सवृद्धिकं गृहीतं यदृण तचौत्तमणिकम् । औपनिध्य - याचित - औत्तमर्णिक के लक्षण - जो धन किसी सज्जन द्वारा विश्वास मानकर किसी के पास रखा जाता है वह ' औपनिधिक ' ( ( औपनिध्य ) कहलाता है । जो बिना खुद का दूसरे से अलङ्कार आदि ( रूपया आदि ) लिया जाता है वह ' याचित ' कहलाता है । और जो सूद पर ऋण लिया जाता ' है वह ' औत्तमर्णिक ' कहलाता है । नि अज्ञातस्व छूट गया, गिर वह अज्ञातस्व ' स किंवा निश्चित अधिक कहला उ अ साहजिक अपने हिस्से ) मास अथवा व द और दा है वह म प स अधिक किंवा यज्ञ अ किंवा युद्ध अ अधिक होने प्राप्त होता है संचित प्रथम - पूर्व संचित के जो आय CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 193

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द्वितीयोऽध्यायः १०७ युक्त निध्यादिकं च मार्गादौ प्राप्तमज्ञातस्वामिकम् ॥ ३२८ ॥

अज्ञातस्वामिक के लक्षण – और जो मार्ग आदि में किसी का भूल से गया, गिरा हुआ किंवा कहीं पर गड़ा हुआ निध्यादि धन मिल जाता है छूट वह ' अज्ञातस्वामिक ' अर्थात् ' अनिश्चितस्वामिक ' कहलाता है । साहजिक चाधिकं च द्विधा स्वत्वविनिश्चितम् । दो sarafa निश्चित के भेद और स्वस्वचिनिश्चित अर्थात् स्वस्वस्वनिश्चित कहलाता. किंवा निश्चितत्वस्वस्व धन दो प्रकार का होता है प्रथम साहजिक, द्वितीय जाता है.

rfan कहलाता है ।

उत्पद्यते यो नियतो दिने मासि च वत्सरे ॥ ३२६ ॥

आयः साहजिकः सैव दायाद्यश्च स्ववृत्तितः । दूसरा साहजिक के लक्षण - इनमें जो धन का आय दाय ( पैत्रिक संपत्ति में से होता है,. अपने हिस्से ) या वृत्ति ( व्यवसाय आदि ) के द्वारा निश्चित रूप से दिन,

के बदले मास अथवा वर्ष भर में होता है वह ' साहजिक ' कहलाता है ।

दायः परिग्रहो यतु प्रकृष्टं तत्स्वभावजम् ॥ ३३० ॥

और दाय ( पैत्रिक धन ) एवं परिग्रह ( दान लेने ) से जो आय होता ॥ है वह बिना क्लेश के मिलने से उत्तम स्वभावज ( साहजिक ) कहलाता है ।

निश्चि मौल्याधिक्यं कुसीदं च गृहीतं याजनादिभिः ।

निश्चित-- पारितोष्यं भृतिप्राप्तं विजिताद्यं धनं च यत् ॥ ३३१ ॥

( अपना स्वस्वत्वेऽधिकसंज्ञं तदन्यत्साहजिकं स्मृतम् । अधिक के लक्षण - जो उचित मूल्य से अधिक रूप में या सुद रूप में किंवा यज्ञ आदि कराने से प्राप्त हुआ एवं पारितोषिक ( इनाम ) या वेतन किंवा युद्ध आदि के द्वारा जीत रूप में प्राप्त हुआ धन है वह अपने स्वत्व से श्वितान्य-- अधिक होने से ' अधिक ' संज्ञक कहलाता है । इससे अन्य रीति से जो धन

- दूसरा प्राप्त होता है वह ' साहजिक ' कहलाता है ।

पूर्ववत्सरशेषं: च वर्तमानाव्दसम्भवम् ॥ ३३२ ॥

नद्वारा निध्य ) आदि ) स्वाधीनं सचितं द्वेधा घनं सर्व प्रकीर्तितम् । संचित धन के लक्षण - स्वाधीन संचित सम्पूर्ण धन दो

प्रथम- पूर्व वर्ष का शेष, और वर्त्तमान वर्ष का संचित धन है ।

द्वेधाधिकं साहजिकं पार्थिवेतरभेदतः ॥

भूमिभागसमुद्भूत आयः पार्थिव उच्यते । संचित धन के भेद - अधिक और साहजिक भेद से

प्रकार का होता है ।

३३३ ॥

· पूर्वोक्त दो प्रकार जाता के जो आय हैं चे प्रत्येक पार्थिब ( स्थावर ) तथा इतर ( जङ्गम = चल ) भेद CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 194

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१०८ शुक्रनीतिः से दो प्रकार के हैं । इनमें से पार्थिव आय वह कहलाता है जो भूमि के

भागों से उत्पन्न हो ।

स देवकृत्रिम जलैर्देशग्रामपुरैः पृथक् ॥ ३३४ ॥

बहुमध्याल्पफलतो भिद्यते भूविभागतः । पार्थिव संज्ञक आय के भेद - उस पार्थिवसंज्ञक • आय के देवालयों, कृत्रिम ( कल्पित ) वस्तुओं, जल, देश, ग्राम तथा पुरों से पृथक् - पृथक् विभिन्न हुये भूमि - संबन्धी विभागों से एवं बहुत ( अधिक ), मध्यम तथा अल्प फलों से

अनेक भेद होते हैं ।

शुल्कदण्डाकर कर भाटकोपायनादिभिः ॥ ३३५ ॥

इतरः कीर्तितस्तज्ज्ञैरायो लेखविशारदैः । चल संज्ञक आथ के लक्षण — और व्यवसायी आदि लोगों से प्राप्त होने चाले शुल्क ( चुगी - टैक्स ), दण्ड ( जुर्माना ), खान, कर ( मालगुजारी ), भाटक ( भाड़ा ), उपायन ( नजर - भेट ), इत्यादि से होनेवाले आय को आय का ज्ञान रखनेवाले एवं लिखने में ( हिसाब लिखने में ) चतुर लोगों ने

इतर अर्थात् चल - संज्ञक कहा है ।

यन्निमित्तो भवेदाय व्ययस्तन्नामपूर्वकः ॥ ३३६ ॥

व्ययश्चैव समुद्दिष्टो व्याप्यव्यापकसंयुतः । विभागानुसार आय - व्यय के व्याध्य - व्यापक का निर्देश— जिस निमित्त ( विभाग ) से जो आय होता है व्यय भी उसी निमित्त ( विभाग ) के नाम में होता है । अर्थात् जिस विभाग में आय होता है उस विभाग में व्यय भी होता है । और आय की भांति व्यय भी व्याप्य व्यापक से युक्त है अर्थात्

स्वल्प तथा बहुविषयक कहा हुआ है ।

पुनरावर्तकः स्वत्वनिवर्तक इति द्विधा ॥ ३३७ ॥

व्ययो यन्निध्युपनिधीकृतो विनिमयीकृतः ।

सकुसीदाकुसीदाधमर्णिकश्चावृत्तः स्मृतः ॥ २३८ ॥

व्यय के भेदों एवं पुनरावर्त्तक के लक्षण - वह व्यय दो प्रकार का होता है, एक - पुनरावर्त्तक ( फिर लौटकर आनेवाला ), दूसरा स्वत्वनिवर्त्तक ( देने चाले के स्वस्व को निवृत्त करनेवाला ) कहलाता है । जो व्यय निधि, उपनिधि या विनिमय रूप में हुआ है एवं सूद - सहित या विना सूद का इस भांति से दो प्रकार का आधमर्णिक ये सब आवृत्त ( पुनरावर्त्तक ) संज्ञक कहलाते हैं ।

निधिर्भूमौ विनिहितोऽन्यस्मिन्नुपनिधिः स्थितः ।

दत्तमूल्यादिसंप्राप्तः स वै विनिमयीकृतः ॥ ३३६ ॥

वृद्धयाऽवृद्धया च यो दत्तः स वै स्यादाधमर्णिकः । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri स ( निधि, उप कहते हैं जो पृ ग्रहण नहीं कि निधि ( उपनि मयीकृत व्यय है । सूद पर य हैं । इसमें सूद जाता है उसे स्व Farata प्रथम-- - ऐहिक प्रा च श ऐहिकत और भोग्य र होते हैं! जो व्यय कहलाता म स भ प्रतिदान, जाता है उसे दिया जाता है जो भृत्यों को ध उपभोग्य के लिये एवं प्राप्ति के लिय ' उपभोग्य ' क

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द्वितीयोऽध्यायः १०४ भूमि के सवृद्धिकमृणं दत्तमकुसीदं तु याचितम् ॥ ३४० ॥

1 निधि, उपनिधि आदि व्यय के लक्षण - निधि ( निधीकृत ) व्यय. उसे कहते हैं जो पृथ्वी में गाड़ दिया जाता है, इसको अत्यन्त कष्ट पड़ने पर भी - कृत्रिम ग्रहण नहीं किया जाता है — अतः यह भी एक प्रकार का व्यय ही है । उप-हुये निधि ( उपनिधीकृत ) व्यय वह है जो दूसरे के पास रखा हुआ है । विनि-कलों से मयीकृत व्यय उसे कहते हैं जो दिये हुये मूल्यादि से बदले में मिला हुआ है । सूद पर या बिना सूद के जो दिया गया है उसे आधमर्णिक व्यय कहते हैं । इसमें सूद पर जो दिया जाता है उसे ऋण और बिना सूद के जो दिया जाता है उसे याचित ( हथ - उधार ) कहते हैं । त होने स्वत्वनिवर्तको द्वेधा त्वैहिकः पारलौकिकः । स्वत्वनिवर्त्तक के भेद - स्वस्वनिवर्त्तक व्यय दो प्रकार का होता हैं हजारी ), प्रथम-- - ऐहिक, द्वितीय- पारलौकिक । नाथ को लोगों ने प्रतिदानं पारितोष्यं वेतनं भोग्यमैहिकः ॥ ३४१ ॥

चतुर्विधस्तथा पारलौकिकोऽनन्त भेदभाक् ।

शेषं संयोजयेन्नित्यं पुनरावर्तको व्ययः ॥ ३४२ ॥

ऐहिक तथा पारलौकिक व्यय के भेद - उसमें प्रतिदान, पारितोष्य वेतन और भोग्य रूप से ऐहिक के ४ भेद होते हैं । और पारलौकिक के अनन्त भेद निमित्त होते हैं! जो नित्य शेष को रोकड़ में मिलाया जाता है वह भी पुनरावर्त्तक के नाम व्यय कहलाता है ।

व्यय भी मूल्यत्वेन च यद्दत्तं प्रतिदानं स्मृतं हि तत् ।

= अर्थात् सेवाशौर्यादि संतुष्टैर्दत्तं तत्पारितोषिकम् ॥ ३४३ ॥

भृतिरूपेण संदत्तं वेतनं तत् प्रकीर्तितम । प्रतिदान, पारितोषिक और वेतन व्यय के लक्षण - मूल्य रूप में जो दिया जाता है उसे ' प्रतिदान ' कहते हैं । सेवा तथा शूरता आदि से प्रसन्न होकर जो दिया जाता है, उसे ' पारितोषिक ' ( पारितोष्य ) कहते हैं । भरण - पोषणार्थं

होता है, जो भृत्यों को दिया जाता है उसे ' वेतन ' कहते हैं ।

( देने धान्यवस्त्रगृहाराम गोगजादिरथार्थकम् ॥ ३४४ ॥

उपनिधि विद्याराज्याधर्जनार्थ घनाप्त्यर्थ तथैव च ।

भांति से व्ययीकृतं रक्षणार्थमुपभोग्यं तदुच्यते ॥ ३४५ ॥।

ते हैं । उपभोग्य के लक्षण - धान्य, वस्त्र, गृह, बगीचा, गो, गज आदि तथा स्थ के लिये एवं विद्या तथा राज्य आदि के उपार्जन के लिये और भ्रम आदि की प्राप्ति के लिये एवं इन सबों की रक्षा के लिये बो व्यय किया जाता है उसे ' उपभोग्य ' कहते हैं । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 196

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११० शुक्रनीति:

सुवर्णरत्नरजतनिष्कशालास्तथैव च ।

रथाश्व गोगजोष्ट्राजावीनशालाः पृथक् पृथक्! ॥ ३४६ ॥

बाद्यशस्त्रास्त्रत्रस्त्राणां धान्यसम्भारयोस्तथा ।

मन्त्रिशिल्पनाट्य वैद्यमृगाणां पाकपक्षिणाम् ॥ ३४७ ॥

शाला भोग्ये निविष्टास्तु तद्वचयो भोग्य उच्यते । भोग्य – सोना, रत्न, चांदी, निष्क ( मोहर - स्वर्ण मुद्रा ) रखने के जो स्थान हैं एवं रथ, घोड़े, गौ, गज, ऊंट, बकरे, भेडे आदि के तया इनके अध्यक्षों के लिये पृथक् - पृथक् बने हुये जो स्थान ( गृह ) हैं । और बाद्य ( बाजे ). शस्त्र, अस्त्र, धान्य, संभार ( नाना प्रकार की सामग्री ) रखने के लिये जो स्थान हैं तथा मन्त्री, शिल्प, नाटथ ( नाटक - संबन्धी ), वैद्य, युग, पाक, पक्षी इनके लिये जो स्थान हैं, उन सर्वो की गणना भोग्य के अन्दर

है अतः इन सबों के संबन्ध में होनेवाले व्यय को भी ' भोग्य ' कहते हैं ।

जपहोमार्चनैर्दानैश्चतुर्धा पारलौकिकः ॥ ३४८ ॥

पुनर्यातो निवृत्तश्च विशेषायव्ययौ च तौ ।

आवर्तको निवर्ती च व्ययायौ तु पृथग्विधा ॥ ३४ ९ ॥

पारलौकिक व्यय के चार भेद और उनके लक्षण – जप, होम, पूजन तथा दान भेद से पारलौकिक व्यय के मुख्य चार भेद होते हैं । और जो आग भाकर पुनः जानेवाला हो उसे विशेष आय एवं जो व्यय जाकर पुनः आनेवाला हो उसे विशेष व्यय कहते हैं । अतः व्यय तथा आय ये दोनों पृथक् २ आवर्त्तक ( वापस आनेवाले ) निवर्त्ती ( नहीं वापस आनेवाले ) भेदों से दो १ प्रकार के होते हैं ॥ आवर्तकविहीनौ तु व्ययायौ लेखको लिखेत् । आय - व्यय - लेखक के कर्त्तव्य - लेखक वापस आनेवाले और वापस न

आनेवाले व्यय तथा आयको लिखे ।

क्रयाधमर्णघटनान्यस्थलाप्तो विवर्तकः ॥ ३५० ॥

द्रव्यं लिखित्वा दद्यात्तु गृहीत्वा विलिखेत्स्वयम् । क्रय ( खरीदना ), अधमर्ण की घटनाओं ( ऋणादि व्यवहारों ) एवं अन्य विषयों में विश्वासपात्र लेखक स्वयं द्रव्य लिखकर तब देवे या लेवे 1 1 हीयते नैवमायव्ययविलेखकः ॥। ३५१ ॥ इस प्रकार से आय - व्यय के लिखनेवाले का लिखा आय तथा व्ययन कम होता है और न बढ़ता है ।

हेतुप्रमाणसम्बन्धकार्याङ्गव्याध्यव्यापकैः · ।

आयाश्च बहुधा भिन्ना व्ययाः शेषं पृथक् पृथक् ॥ ३५२ ॥

CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri 1 अवशिष्ट -प्रमाण, संबन्ध ( थोड़े विषय -इन सर्वो के घ स किसी प्र - संख्या, कहीं समाहार ( स ३ प मान उन् नापा जाता है उसे ' परिम र जहां प कराना चाहि श ६ स लोकव्य ये चांदी, स कौड़ी से लेक तृणपर्यन्त व्यवहा मूल्य समझी मूल्य क जितने व्यय

पृष्ठ 197

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द्वितीयोऽध्यायः १११ मानेन संख्या चैवोन्मानेन परिमाणकैः । ॥ अवशिष्ट आय के विविध भेद - अवशिष्ट आय और पृथक् २ कारण, -प्रमाण, संबन्ध ( संयोग ), कार्याङ्ग ( कार्यों के अवान्तर व्यापार ), व्याप्य . ( थोड़े विषय ), व्यापक ( बहुत विषय ), मान, संख्या, उन्मान और परिमाण

- इन सबों के द्वारा बहुत प्रकार से भिन्न २ होते हैं ।

मुद्रा ) क्वचित्संख्या क्वचिन्मानमुन्मानं परिमाणकम् ॥ ३५३ ॥

के तथा समाहारः कचिच्चेष्टो व्यवहाराय तद्विदाम् । हैं । और किसी प्रदेश में मानादि का ज्ञान रखनेवाले लोगों को! व्यवहार के लिये 7 ) रखने -संख्या, कहीं पर मान, कहीं पर उन्मान, कहीं पर परिमाण और कहीं पर

= ), वैद्य, -समाहार ( संख्यादियों का समुदाय ) अभीष्ट होता है ।

के अन्दर अङ्गुलाद्यं स्मृतं मानमुन्मानं तु तुला स्मृता ॥ ३५४ ॥

परिमाणं पात्रमानं संख्यैकद्वयादिसंज्ञिका । मान- उन्मान - परिमाण संख्या के लक्षण - अंगुलि या हाथ आदि से जो नापा जाता है उसे ' उन्मान ' और काठ आदि के बने पात्रों से जो नापा जाता

है उसे ' परिमाण ' एवं एक, दो, तीन आदि गिनती को ' संख्या ' कहते हैं ।

॥पूजन तथा यत्र यादृग् व्यवहारस्तत्र ताक्प्रकल्पयेत् ॥ ३५५ ॥

जो आय जहां पर जैसा व्यवहार हो वहां पर वैसा व्यवहार राजा को आनेवाला कराना चाहिये ।

1. पृथक् २ रजतस्वर्णताम्रादि व्यवहारार्थमुद्रितम् ।

से दो २ व्यवहार्य वराटाद्यं रत्नान्तं द्रव्यमीरितम् ॥ ३५६ ॥

सपशुधान्यवस्त्रादि - तृणान्तं धनसंज्ञकम् । लोकव्यवहारार्थं द्रव्य तथा धन के लक्षण - लोकव्यवहार के लिये ढाले वापस न ये चांदी, सोना एवं तांबे के सिक्कों का व्यवहार प्रजाओं को करना चाहिये । कौड़ी से लेकर रत्न- पर्यन्त की संज्ञा ' द्रव्य ' है । पशु, धान्य, वस्त्र से लेकर

= तृण पर्यन्त की संज्ञा ' धन ' है ।

व्यवहारे चाधिकृतं स्वर्णाद्यं मूल्यतामियात् ॥ ३५७ ॥

एवं अन्य व्यवहार के लिये राजा द्वारा निश्चित स्वर्णादि मुद्रायें प्रत्येक वस्तु की

मूल्य समझी जाती हैं ॥। कारणादिसमायोगात्पदार्थस्तु भवेद् भुवि ।

व्यय व येन व्ययेन संसिद्धस्तद्वययस्तस्य मूल्यकम् ॥ ३५८ ॥

मूल्य की परिभाषा - संसार में कारण आदि के संयोग होने से जो पदार्थ ' जितने व्यय में सिद्ध होता है उतना व्यय उसका मूल्य होता है । २ ॥ i सुलभासुलभत्वाश्चागुणत्वगुणसंश्रयैः । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 198

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११२ शुक्रनीतिः यथाकामात्पदार्थानामर्घं हीनाधिकं भवेत् ॥ ३५६ ॥

मूल्य के म्यूनाधिक्य का कारण - निर्देश - पदार्थों की सुलभता पा दुर्लभता से किंवा अच्छा या बुरा होने से ( तारतम्यानुसार ) उनका मूल्य विक्रेता के इच्छानुसार अधिक या कम होता है ।

न हीनं मणिधातूनां कश्चिन्मूल्यं प्रकल्पयेत् ।

मूल्यहा निस्तु · चैतेषां राजदौष्टयेन जायते ॥ ३६० ॥

किसी प्रदेश में भी राजा मणियों तथा सोना, चांदी आदि धातुओं का मूल्य थोड़ा न रखे । इन सबों के मूल्य में कमी जब होती है तब राजा की दुष्टता से न कि प्रजा की ।

दीर्घे चतुर्भागभूतपत्रे तिर्यग्गतावलिः ।

त्र्यंशगाभ्यन्तरगता चाघगा पादगापि वा ॥

कार्या व्यापकव्याप्यानां लेखने पदसंज्ञिका । पत्रलेखन प्रकार — थोड़ा या ज्यादा विषयों के अनुसार लिये प्रशस्त पत्र ( कागज ) के ऊपर चार भाग करने पर के अन्दर या आधे भाग किंवा चौथाई भाग के अन्दर आड़ी

बनाकर पर्दो ( अक्षरों ) को लिखना चाहिये ।

श्रेष्ठाभ्यन्तरगा तासु वामतस्त्र्यंशगाऽप्यनु ॥

दक्षत्र्यंशगता चानु ह्यर्धगा पादगा ततः । उक्त ३ प्रकार की पदावलियों में जो पत्र के अन्दर ३६१ ॥ लेख लिखने के उसमें से ३ भाग लकीरों की पंकि ३६२ ॥ वामभाग से शुरू होकर तीन भाग में लिखी होती है वह श्रेष्ठ है । और दक्षिण से वामभाग की ओर तीन भाग तक लिखी होती है वह उसकी अपेक्षा हीन है । अर्द्धांश में लिखी हुई उससे भी हीन, इसके बाद चतुर्थांश में लिखी हुई सबसे

ही है ।

स्वभ्यन्तरे स्वभेदाः स्युः सदृशाः सदृशे पदे ॥ ३६३ ॥

स्वारम्भपूर्तिसदृशे पदगे स्तः सदैव हि । लाइनों की दूरी परस्पर समान भाव से होने से सब एक सी हों और उनमें अक्षर भी समान हों । अर्थात् जो समान पद हों उनमें सर्वत्र अक्षर समान लिखे जांय । और आरम्भ किये गये विषयों की पूर्ति के अनुरूप पत्र

हों एवं उनमें अक्षर और लाइनें उसी के अनुसार अंकित हों ।

राजा स्वलेख्यचिह्नं तु यथाभिलषितं तथा ॥ ३६४ ॥

लेखानुपूर्व कुर्याद्धि दृष्ट्वा लेख्यं विचार्य च । राजा लेख को देखकर उसके बाद विचार कर लेखानुसार जो उचित प्रतीत हो उसे इच्छानुकूल अपने लेख से अङ्कित कर देवे अर्थात् लिख देवे । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri स मन्त्री, वि दिखाने के लि अ स इनमें से उसके बाद सु स अ और ' प्रध ' यह अङ्गीकार अ ल उसके बा ' पुरोहित ' ' यह स्व अ सब लेखो लेख के अन्त " यह अङ्गीकृत का युव युवराज अ अच्छी तरह से दिखाया उस प लिखना चाहिय स राज सभी मन्त्र हस्ताक्षर करना उन सब लेखों • लेखों पर पूर्ण पशु ०

पृष्ठ 199

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द्वितीयोऽध्यायः ११३ ता मंत्री च प्राड्विवाकश्च पण्डितो दूतसंज्ञकः ॥ ३६५ ॥

या स्वाविरुद्धं लेख्यमिदं लिखेयुः प्रथमं त्विमे । का मूल्य मन्त्री, विचारपति, पण्डित और दूत आदि ये सब प्रथम राजा को

दिखाने के लिये ' यह लेख मुझे अभिमत है ' ऐसा लिखें ।

अमात्यः साधु लिखनमस्त्येतत्प्राग् लिखेदयम् ॥ ३६६ ॥

सम्यग्विचारितमिति सुमन्त्रो विलिखेत्ततः । का मूल्य इनमें से जो अमारय है वह ' यह लेख अच्छा है ' ऐसा पत्र में प्रथम लिखे । दुष्टता उसके बाद सुमन्त्र ' मैंने इस पर भली - भांति विचार किया है ' ऐसा लिखे । ' यह लिखने के ३ भाग की पंकि सत्यं यथार्थमिति च प्रधानश्च लिखेत्स्वयम् ॥ ३६७ ॥

अङ्गीकर्तुं योग्यमिति ततः प्रतिनिधिर्लिखेत् । और ' प्रधान ' ' यह वस्तुतः यथार्थ है ' यह स्वयं लिखे उसके बाद प्रतिनिधि

अङ्गीकार करने योग्य है ' ऐसा लिखे ।

अङ्गीकर्तव्यमिति च युवराजो लिखेत्स्वयम् ॥ ३६८ ॥

लेख्यं स्वाभिमतं चैतद्विलिखेच्च पुरोहितः । उसके बाद युवराज ' इसे अङ्गीकार करना चाहिये ' ऐसा स्वयं लिखे । और ' पुरोहित ' ' यह लेख मुझे अभिमत है ' ऐसा लिखे । शुरू वामभाग लेख अश ' यह सबसे ॥ स्वस्वमुद्राचिह्नितं च लेख्यान्ते कुर्युरेव हि ॥ ३६ ९ ॥ अङ्गीकृतमिति लिखेन्मुद्रयेश्च ततो नृपः । सब लेखों पर स्व - स्वमुद्राङ्कित करने का निर्देश - और मन्त्री आदियों को के अन्त में अपनी २ मुहर लगा देनी चाहिये । और अन्त में राजा भी

अङ्गीकृत है ' ऐसा लिखे और उस पर अपनी मुहर कर दे ।

कार्यान्तरस्याकुलत्वात्सम्यग्द्रष्टुं न शक्यते ॥ ३७० ॥

युवराजादिभिर्लेख्यं तदनेन च दर्शितम् । युवराज आदि को कार्यान्तर में ( दूसरे २ कार्यों में ) व्यस्तचित्त होने से अच्छी तरह से लेख के संपूर्ण विषयों को न देख सकने से ' इस आदमी ने जो दिखाया उस पर मैंने अच्छी तरह से विचार किया ' यह भी मन्त्री आदि को

क्षेत्र अक्षर लिखना चाहिये ।

पत्र समुद्रं विलिखेयुर्वै सर्वे मन्त्रिगणास्ततः ॥ ३७१ ॥

नुरूप राजा दृष्टमिति लिखेद् द्राक् सम्यग्दर्शनाक्षमः । सभी मन्त्री लोगों को सभी लेखों पर मुहर से अङ्कित करके अपना २ हस्ताक्षर करना चाहिये और भली - भांति से देखने में असमर्थ राजा शीघ्र उचित उन सब लेखों पर ‘ मैंने देखा ' यह लिख दे क्योंकि उसका मन्त्री आदि के देवे । - लेखों पर पूर्ण विश्वास रहता है । पशु ० CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 200 का मूल पृष्ठ
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.११४ शुक्रनीतिः आयमादौ लिखेत्सम्यग् व्ययं पश्चात्तथागतम् ॥ ३७२ ॥

वामे चायं व्ययं दत्ते पत्रभागे च लेखयेत् । पत्र में आय - व्यय लेखन का स्थान- विचार - बही खाते पर पहले सम्पूर्ण आग्र ( आमदनी ) लिखे पीछे जो व्यय हुआ हो उसे लिखे । और वही के बाई

ही ओर आय और दाहिनी ओर व्यय लिखे ।

यत्रोभौ व्यापकव्याप्यो वामोर्श्वभागगौ क्रमात् ॥ ३७३ ॥

आधाराघेयरूपौ वा कालार्थं गणितं हि तत् । जहां पर आय तथा व्यय ये दोनों अधिक या अल्प अथवा आश्रय तथा आश्रयी रूप से हों वहां पर उन दोनों को बही के वाम भाग में यथाक्रम ऊपर

की ओर रखना चाहिये । ऐसी व्यवस्था नियम के लिये है ।

अघोधश्च क्रमात्तत्र व्यापकं वामतो लिखेत् ॥ ३७४ ॥

व्याप्यानां मूल्यमानादि तत्पंक्तयां विनिवेशयेत् । उसमें व्यापक को वामभाग में क्रम से नीचे - नीचे लिखे । और व्याप्यों का ।

मूल्य और मानादि उन्हीं की पंक्ति में लिखे ।

ऊर्ध्वगानां तु गणितमधः पंक्त्यां प्रजायते ॥ ३७५ ॥

यत्रोभौ व्यापकव्याप्यौ व्यापकत्वेन संस्थितौ । जहां पर वे दोनों व्यापक और व्याप्य बहुसंख्यक हों वहाँ पर ऊपरवालों

की गणना नीचे की पंक्ति में होती है ।

व्यापकं बहुवृत्तित्वं व्याप्यं स्यान्न्यूनवृत्तिकम् ॥ ३७६ ॥

व्याप्याश्वावयवाः प्रोक्ता व्यापकोऽवयवी स्मृतः । व्यापक - व्याप्य के लक्षण - बहुत स्थलों पर रहनेवालों को ' व्यापक ' कम स्थलों पर रहनेवालों को ' व्याप्य ' कहते हैं । और व्याप्य अवयव ( अङ्ग ) एवं

व्यापक ( अवयवी ) कहलाते हैं ।

सजातीनां च लिखनं कुर्याच्च समुदायतः ॥ ३७७ ॥

यथाप्राप्तं तु लिखनमाद्यन्तसमुदायतः । समान जातिवाले विषयों का समुदाय रूप से एक स्थान पर ही लिखना उचित होता है ॥ और नाना प्रकार के विषयों का जहां जैसा मौका हो वहाँ

उसके अनुसार आदि, अन्त और सर्वत्र लिखना उचित है ।

व्यापकाश्च पदार्था वा यत्र संति स्थलानि हि ॥ ३७८ ॥

व्याप्यमायव्ययं तत्र कुर्यात्कालेन सर्वदा । जहां पर पदार्थ व्यापक ( बहुत ) हो एवं स्थल भी बहुत हों वहां सर्वदा

आय - व्यय को काल से व्याप्य कर लेना चाहिये ।

स्थानटिप्पनिका चैषा ततोऽन्यत् संघटिप्पनम् ॥ ३७ ९ ॥

स्थान - वि समूह संबन्धी विशिष्ट है । उ f आयवि इन सर्वो का होता है । पहले ज संख्या लिखन अधिक संज्ञक शेषाय बहियों से हो ज्ञान से ही तिथ्याद होते हैं । म पूर्वोक्त इतर ( पार्थि जो पुनरावर्त्त अन्तिम व्या पहले प CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri