शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 201–210
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 201–210
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द्वितीयोऽध्यायः ११५ ॥ विशिष्टसंज्ञितं तत्र व्यापकं लेख्यभाषितम् । स्थान- टिप्पणादि के भेद - यह स्थान - संबन्धी विवरण अन्य है और वस्तु--ले सम्पूर्ण समूहसंबन्धी विवरण इससे अम्य है, उसमें लेखोक व्यापक की संज्ञा
ही के बा विशिष्ट है ।
आयाः कति व्ययाः कस्य शेषं द्रव्यस्य चास्ति वै ॥ ३८० ॥
३ ॥ विशिष्टसंज्ञकै रेषां संविज्ञानं प्रजायते । are कितने हैं और व्यय कितने हैं और किस द्रव्य का कितना शेष है? श्रय तथा इन सर्वो का भली - भांति ज्ञान विशिष्टसंज्ञक पूर्वोक्त व्यापक लेख विशेष से
क्रम ऊपर होता है ।
आदौ लेख्यं यथा प्राप्तं पश्चात्तद्गणितं लिखेत् ॥ ३८१ ॥
यथा द्रव्यं च स्थानं चाधिकसज्ञं च टिप्पनैः । पहले जो वस्तु जिस तरह से प्राप्त हो उसे लिखे उसके पश्चात् उसकी व्याप्यों का संख्या लिखनी चाहिये । उसके बाद विवरण के साथ जैसा द्रव्य, स्थान तथा
अधिकसंज्ञक हो उसे लिखे ।
॥ - शेषायव्ययविज्ञानं क्रमाल्लेख्यैः प्रजायते ॥ ३८२ ॥
स्थलायव्यय विज्ञानं व्यापकं स्थलतो भवेत् । ऊपरवालों शेषायव्यय - स्थलायव्ययज्ञान — अवशिष्ट भाय तथा व्यय का पूर्ण ज्ञान चहियों से होता है । और बहुत स्थानों के आय - व्यय का पूर्ण ज्ञान स्थानों के ६ ॥ ज्ञान व्यापक ' कम - अङ्ग ) एवं होते ७७ ॥ ही लिखना का हो वहाँ इतर
से ही हो जाता है ।
पदार्थस्य स्थलानि स्युः पदार्थाश्च स्थलस्य तु ॥ ३८३ ॥
व्याप्यास्तिध्यादयश्चापि यथेष्टा लेखने नृणाम् । तिथ्यादि लिखने का निर्देश - स्थल पदार्थके एवं पदार्थ स्थल के व्याप्य
हैं । मनुष्यों को अपनी इच्छानुसार लिखने में तिथ्यादि रखनी चाहिये ।
निश्चितान्यस्वामिकाद्या आया ये इतरान्तगाः ॥ ३८४ ॥
विशिष्टसंज्ञका ये च पुनरावर्तकादयः ।
व्ययाश्च परलेखान्ता अन्तिमव्यापकाश्च ते ॥ ३८५ ॥
पूर्वोक्त निश्चितान्यस्वामिक ( निश्चित है अन्य स्वामी जिसका ) से लेकर ( पार्थिव से भिन्न- जङ्गम - शुल्कादि ) तक जितने आय हैं और विशिष्टसंज्ञक ७८ ॥ जो पुनरावर्त्तकादि व्यय हैं वे सब दूसरों के लेख हैं अन्त में जिसके ऐसे एवं अन्तिम व्यापकचाले ( बहुत शेषवाले ) हैं ।
वहीं सर्व इच्छया ताडितं कृत्वादौ प्रमाणफलं ततः ।
प्रमाणभक्तं तल्लब्धं भवेदिच्छाफलं नृणाम् ॥ ३८६ ॥
९ ॥ पहले प्रमाण फल ( सिद्धवस्तु ) को इच्छा ( साध्यवस्तु ) से गुणित ३७ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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' ११६ शुक्रनीति: करके प्रमाण से भाग करने पर जो लब्धि हो उसे मनुष्यों का इच्छा - फल कहते हैं । समासतो लेख्यमुक्तं सर्वेषां स्मृतिसाधनम् । इस प्रकार से संक्षेप से सभी विषयों की स्मृति का साधन ( कारण )
लेख्य ( बही या पत्र ) का वर्णन किया गया ।
गुञ्जा माषस्तथा कर्षः पदार्थः प्रस्थ एव हि ॥
यथोत्तरा दशगुणाः पञ्च प्रस्थस्य चाढकाः! ततश्चाष्ट्राढकः प्रोक्तो धर्मणस्ते तु विंशतिः ॥ खारिका स्याद्भिद्यते तद् देशे देशे प्रमाणकम् गुञ्जादिकों का लक्षण – गुञ्ज ( रत्ती ), माष ( माशा रुपया भर ), पदार्द्ध, प्रस्थ ये सब उत्तरोत्तर क्रम से दशगुने ३८७ ॥ ३८८ ॥ । ), कपं ( एक होते हैं अर्थात् १० गुआओं का १ माप, १० मापों का १ कर्ष, १० कर्षों का १ पदार्द, १० पदार्थों का १ प्रस्थ होता है । ५ प्रस्थों का १ आढक, १० आढकों का १ अर्मण, २० अर्मणों का १ खारिका ( खारी ) होती है । देश - भेद से ये
परिमाणों में भिन्नतायें होती हैं ।
पञ्चाङ्गुलावट पात्रं चतुरंगुल विस्तृतम् ॥ ३८६ ॥
प्रस्थपादं तु तब्ज्ञेयं परिमाणे सदा बुधैः । प्रस्थपाद का लक्षण —५ अङ्गुल गहरा, ४ अङ्गुल चौड़ा जो पात्र होता है, उसे पण्डित लोग सदा नापने में ' प्रस्थपाद ' कहते हैं । इसी को लोक में
' माना ' भी कहते हैं ।
ऊर्ध्वाकश्च यथासंज्ञस्तदधस्थाश्च वामगाः ॥ ३६० ॥
क्रमात्स्वदशगुणिताः परार्घान्ताः प्रकीर्तिताः । संख्या का प्रमाण - -- संज्ञानुसार ऊपर लिखे हुये अङ्क के नीचे बाई ओर एक २ इकाई क्रम से बढ़ाने पर अपने से दशगुनी अधिक परार्द्ध पर्यन्त भट्ट
की गिनती होती है ।
न कर्तुं शक्यते संख्यासंज्ञा कालस्य दुर्गमात्त् ॥ ३ ९ १ ॥
ब्रह्मणो द्विपराधं तु आयुरुक्तं मनीषिभिः । संख्या की अनन्तता — काल की समाप्ति होना असंभव है अतः संख्या की संज्ञा परार्द्ध से अधिक नहीं हो सकती है 1 । और विद्वानों ने ब्रह्मा की आयु का प्रमाण दो परार्द्ध तक कहा है क्योंकि परार्द्ध से अतिरिक्त संख्या की संज्ञा
नहीं है ।
एको दश शतं चैव सहस्रं चायुतं क्रमात् ॥ ३ ९ २ ॥
नियुतं प्रयुतं कोटिरबुदं चाब्जखर्वको । f एकादि. नियुक्त, प्रयुक्त परार्द्ध ब व कालमान वृद्धि - क्रम स ( एक संक्रान कार्य आरम्भ दिन की संख्य होता है ) इ सौर मान क मजदूरी देने सावन मान ६ भृति के दी जानेवाली कार्यकालमिि भृति ( है वैसी हिसा कार्यमा तुम्हें इतनी E ' प्रतिवर्ष ( कालमाना प CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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द्वितीयोऽध्यायः ११७ इच्छा - फल निखर्वपद्मशङ्खाब्धि- मध्यमान्त परार्धकाः ॥ ३६३ ॥
एकादि - परार्ध तक संख्याओं के नाम - एक, दश, शत, सहस्र, अयुत, नियुत, प्रयुत, कोटि, अर्बुद, अब्ज, खर्च, निखर्व, पद्म, शङ्ख, अब्धि, मध्य, अन्त, - कारण ) परार्द्ध ये सब संख्याओं की संज्ञायें हैं ।
कालमानं त्रिधा ज्ञेयं चान्द्रं सौरं च सावनम् ।
भृतिदाने सदा सौरं चान्द्रं कौसीदवृद्धिषु ॥ ३६४ ॥
कल्पयेत्सावनं नित्यं दिनभृत्येऽवधौ सदा । कालमान का चैविध्य एवं चान्द्रादिकों की व्यवस्था — चान्द्र ( चन्द्र की ( एक वृद्धि - क्रम से शुक्ल १ प्रतिपदा से अमावस्या ३० पर्यन्त ) मास, सौर अर्थात् ( एक संक्रान्ति से दूसरी संक्रान्ति पर्यन्त ), सावन ( जिस दिन से कोई कार्य आरम्भ किया जाता है और जिस दिन समाप्त होता है वहाँ तक पदाका दिन की संख्या के अनुसार गणना करना- इसमें पूरे ३० दिन का १ मास भेद से ये होता है ) इन भेदों से काल मान ३ प्रकार का होता है । वेतन देने में सदा सौर मान का, ऋण - व्यवहार में नित्य चान्द्रमान का एवं दैनिक मजदूरों को मजदूरी देने और अवधि ( इतने दिन तक कार्य करो ऐसी अवधि ) में सदा सावन मान का व्यवहार करना चाहिये । होता है, लोक में दी
।
कार्यमाना कालमाना कार्यकालमितिनिधा ॥ ३ ९ ५ ॥
भृतिरुक्ता तु तद्विज्ञैः सा देया भाषिता यथा । भृति के ३ प्रकारों का निर्देश - कार्यमाना ( कार्य के परिमाण के अनुसार जाने वाली ), कालमाना ( काल के परिमाण के अनुसार दी जानेवाली ), कार्यकालमिति ( कार्यं तथा काल के प्रमाणानुसार दी जानेवाली ) इन भेदों सेभृति ( मजदूरी या वेतन ) ३ प्रकार की पण्डितों ने कही है । जैसी कही बाई ओर है वैसी हिसाब करके भृति देनी चाहिये । यंन्त भ अयं भारस्त्वया तत्र स्थाप्यस्त्वेतावतीं भृतिम् ॥ ३६६ ॥
दास्यामि कार्यमाना सा कीर्तिता तद्विदेशकैः । १ ॥ कार्यमानादिकों के लक्षण –'यह भार यहां से उठाकर वहां पर रख दो, तुम्हें इतनी मजदूरी दी जायगी ' यह ' कार्यमाना ' भृति पण्डितों ने कही है । संख्या की की आयु की संज्ञा ( 11. वत्सरे वत्सरे वापि मासि मासि दिने दिने ॥ ३६७ ॥
एतवर्ती भृतिं तेऽहं दास्यामीति च कालिका । ' प्रतिवर्ष ' प्रतिमास एवं प्रतिदिन इतनी भृति तुम्हे मैं दूंगा ' इसे ' कालिका
कालमाना ) मृति कहते हैं ।
एतावता कार्यमिदं कालेनापि त्वया कृतम् ॥ ३६८ ॥
भृतिमेतावतीं दास्ये कार्यकालमिता च सा ।. CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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११८ शुक्रनीति: ' इसने काल के अन्दर इस कार्य के करने पर मैं तुम्हें इतनी मृति दूंगा '
इसे ' कार्यकालमिता ' ( कार्यकालमिति ) मृति कहते हैं ।
न कुर्याद् भृतिलोपं तु तथा भृतिविलम्बनम् ॥ ३ ९९ ॥
अवश्यपोष्यभरणा भृतिर्मध्या प्रकीर्तिता ।
परिपोष्या भृतिः श्रेष्ठा समान्नाच्छादनार्थिका ॥ ४८० ॥
भवेदेकस्य भरणं यया सा हीनसंज्ञिका । मध्यमादि स्मृति लक्षण - मध्य में भृतिका लोप तथा भृति देने में विलम्ब नहीं करना चाहिये । अवश्यपोष्य ( पोषण करने योग्य ) माता - पिता आदि का भरण - पोषण जितने से हो जाय उतनी भृति को ' मध्या ' और अवश्य पोष्य लोगों के अतिरिक्त अन्य लोगों का भी पोषण जिससे हो उस भृति को ' श्रेष्ठा ' अन्न - वस्त्र मान्न के लिये केवल पर्याप्त होनेवाली भृति को ' समा ' एवं
जिससे केवल अपना ही भरण - पोषण हो सके उसे ' होना ' भृति कहते हैं ।
यथा यथा तु गुणवान्भृतस्तद्भृतिस्तथा ॥ ४०१ ॥
संयोज्या तु प्रयत्नेन नृपेणात्महिताय वै । पोषण योग्य भृतिनियत करने का निर्देश – भृतक ( भृत्य ) जैसे २ गुणवान ( योग्य ) होता जाय वैसे २ उसकी भूति ( वेतन ) अपने हित के लिये राजा को यत्नपूर्वक बढ़ा देनी चाहिये अथवा योग्यतानुसार वेतन देना
चाहिये ।
अवश्य पोष्यवर्गस्य भरणं भृतकाद्भवेत् ॥ ४८२ ॥
तथा भृतिस्तु संयोज्या यद्योग्या भृतकाय वै 1 वेतनभोगी के माता - पिता आदि अवश्य - पोषण करने योग्य लोगों का उसके द्वारा जितने वेतन से पालन - पोषण हो सके उतना वेतन योग्यतानुसार
भृत्य के लिये नियुक्त करना चाहिये ।
ये भृत्या हीनभृतिकाः शत्रवस्ते स्वयंकृताः ॥ ४८३ ॥
परस्य साधकान्ते तु छिद्रकोशप्रजाहराः । हीन मृति देने से अनर्थ का निर्देश -जो अत्यल्प वेतन पानेवाले भृत्य हैं उन्हें राजा अत्यल्प वेतन देकर अपना शत्रु स्वयं बना लेता है क्योंकि दे पेट न भर सकने के कारण राजा का कार्य छोड़कर दूसरे का भी कार्य करके पेट भरते हैं और सदा राजा के छिद्र खोजते - फिरते हैं एवं उसके धन हरते हैं
तथा प्रजा को लूटते हैं ।
अनाच्छादनमात्रा हि भृतिः शूद्रादिषु स्मृता ॥ ४०४ ॥
तत्पापभागन्यथा स्यात्पोषको मांसभोजिषु । शूद्रादिकों को आच्छादन मात्र देने का निर्देश- केवल शूद्रादि लोगों के CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri लिये अन्न ख नहीं । अन्यथ वेतन देने से पाप कर्मों का घ और है उस पुरुष धन दिया जा भृत्य धीरे और न इन भेदों से मध्या तथा करने के लि छुट्टी देनी च को दिन में राजा करावे और कार्यों को त रोग क को पीड़ित वर्ष तक पी आदि की करनी चाहि
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द्वितीयोऽध्यायः ११६ ति दूंगा लिये अन्न - वस्त्र मान्न के लिये पर्याप्त वेतन देना उचित कहा है अन्य के लिये नहीं । अन्यथा अर्थात् अन्न - वस्त्र से अतिरिक्त भी कार्यों का निर्वाह करनेवाला ॥ वेतन देने से मांसभोजी उन शूद्रादि लोगों का पोषण करनेवाला राजा उसके पाप कर्मों का स्वयं भी भागी ( भोग करनेवाला ) होता है । ॥ यद्ब्राह्मणेनापहृतं धनं तत्पर लोकदम् ॥ ४०५ ॥.
शूद्राय दत्तमपि यन्नरकायैव केवलम् । देने में और ब्राह्मण यदि धन चुरा भी ले तो उससे जिसका धन चुराता ता - पिता है उस पुरुष को परलोक में शुभ फल मिलता है किन्तु यदि शूद्र को स्वयं
र अवश्य धन दिया जाय तो उससे केवल दाता को नरक ही मिलता है ।
भृति को मन्दो मध्यस्तथा शीघ्र त्रिविधं भृत्य उच्यते ॥ ४०६ ॥
समा ' एवं समा मध्या च श्रेष्ठा च भृतिस्तेषां क्रमात्स्मृता । मृत्य के तीन भेद - मन्द ( धीरे २ कार्य करनेवाला सुस्त ), मध्य ( न धीरे और न जल्दी कार्य करनेवाला ) और शीघ्र ( शीघ्र कार्य पूर्ण करनेवाला ) I इन भेदों से भृश्य ३ प्रकार का होता है । अतः इन सब की क्रम से समा,
मध्या तथा श्रेष्ठा नामक ३ प्रकार की भृतियों का देना उचित कहा है ।
जैसे २ भृत्यानां गृहकृत्यार्थं दिवा यामं समुत्सृजेत् ॥ ४०७ ॥
हित के निशि यामन्त्रयं नित्यं दिनभृत्येऽर्धयामकम् । तन देना यों को छुट्टी देने का नियम — भृत्यों को प्रतिदिन अपना गृहकृत्य करने के लिये दिन में १ प्रहर ( ३ घण्टे ) की और रात्रि में तीन प्रहर की छुट्टी देनी चाहिये | और दिन - भृत्यों ( रोजाना मजदूरी पर कार्य करनेवालों )
को दिन में आधा प्रहर ( डेढ़ घण्टे ) की छुटी देना चाहिये ।
लोगों का तेभ्यः कार्यं कारयोत ह्युत्सवायैविना नृपः ॥ ४०८ ॥
तानुसार अत्यावश्यं तूत्सवेऽपि हित्वा श्राद्धदिनं सदा । राजा उत्सवादि - दिनों को छोड़कर अन्य दिनों में उन भृत्यों से कार्य करावे और श्राद्धवाले दिन को छोड़कर अन्य उत्सवदिनों में भी अत्यावश्यक.
कार्यों को तो सदा करावे ।
ले भृत्य पादहीनां भृतिं त्वा दद्यात्यैमासिकीं ततः ॥ ४० ९ ॥
= योंकि वे पञ्चवत्सरभृत्ये तु न्यूनाधिक्यं यथा तथा । यं करके रोग के समय भृति देने का प्रकार – ५ वर्ष तक कार्य करनेवाले भृत्य हरते हैं को पीड़ित अवस्था ( बीमारी आदि ) में चतुर्थांश कम वेतन दे और यदि १ वर्ष तक पीड़ित हों तो उन्हें ३- मास का वेतन ( चतुर्थांश ) दे । और पीड़ा 7 आदि की जैसी न्यूनाधिकता हो उसके अनुसार वेतन देने में भी न्यूनाधिकता करनी चाहिये । लोगों के CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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१२०: शुक्रनीति: षाण्मासिकीं तु दीर्घार्त्ते तदूर्ध्वं न च कल्पयेत् ॥ ४१० ॥
नैव पक्षार्धमार्तस्य हातव्याऽल्पापि वै भृतिः । और दीर्घ काल तक ( १ वर्ष के ऊपर ) यदि पीड़ित हो तो उसे ६ मास का वेतन दे । इसके ऊपर न दे । और १ सप्ताह तक पीड़ित भृत्यों का वेतन
भी कुछ नहीं काटना चाहिये ।
संवत्सरोषितस्यापि ग्राह्यः प्रतिनिधिस्ततः ॥ ४११ ॥
सुमहद्गुणिनं त्वा भृत्यर्थं कल्पयेत्सदा । बारबार रोगग्रस्त के स्थान पर प्रतिनिधि रखने का निर्देश – १ वर्ष तक छुटी लिये हुये भृत्य का प्रतिनिधि उसी के द्वारा निर्णीत रखना चाहिये । और अत्यन्त योग्य भृत्यों को बीमार पड़ने पर सदा उसको आधा
वेतन देना चाहिये ।
सेवां विना नृपः पक्षं दद्याद् भृत्याय वत्सरे ॥ ४१२ ॥
सेवा के बिना ही मृति देने का निर्देश - राजा विना सेवा कराये ही प्रतिवर्ष १ पक्ष का वेतन मृत्यों को देवे ।
चत्वारिंशत्समा नीताः सेवया येन वै नृपः ।
ततः सेवां विना तस्मै भृत्यर्ध कल्पयेत्सदा ॥। ४१३ ॥
यावज्जीवं तु तत्पुत्रेऽक्षमे बाले तदधकम् ।
भार्यायां वा सुशीलायां कन्यायां वा स्वश्रेयसे ॥ ४१४ ॥
. जिस भृस्य ने सेवा करते हुये ४० वर्ष चितादिये राजा उसे बिना सेवा लिये ( घर पर ) आजीवन पेंशन के रूप में आधा वेतन सदा देता रहे और उसके बच्चे जब तक कार्य करने योग्य न हो जाय तब तक उन्हें अपने कल्याणार्थं भृत्य के आधे वेतन से आधा वेतन दे इसी भांति उस की सुशीला स्त्री तथा अविवाहिता कन्या को भी पेंशन का आधा वेतन देवे ।
.: अष्टमांशं पारितोष्यं दद्याद् भृत्याय वत्सरे ।
कार्याष्टमांशं वा दद्यात् कार्य द्रागधिकं कृतम् ॥। ४१५ ॥
और ' के लिये प्रतिवर्ष वेतन का अष्टमांश पारितोषिक रूप में देवे । अथवा यदिः शीघ्रता के साथ अधिक कार्य किया हो तो कार्य के अष्टमांश को पारितोषिक रूप में देवे अर्थात् उस कार्य के करने में जो वेतन हो उसका अष्टमांश देवे ।
! स्वामिकार्ये विनष्टो यस्तत्पुत्रे तद् भृतिं वहेत् ।
याबद्वालोऽन्यथा पुत्रगुणान्दृष्ट्वा भृतिं बद्देत् ॥ ४१६ ॥
स्वामी के कार्य करने में यदि भृत्य मरजाय तो उसका पुत्र उसके वेतन को प्राप्त करे, जब तक कि वह बड़ा कार्य करने योग्य न हो जाय, अन्यथा अर्थात जब बड़ा हो ष द य करता रहे औ दे देवे । व कभाषी कठोर बातें क अपमान करत सिखाता है । स और सम पहुँचाये हुये, नहीं छोड़ते ह २ उ जो केव ' चे ' मध्यम ' प बड़े लोगों क II CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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द्वितीयोऽध्यायः १२१ ॥ अब बड़ा हो जाय तो उसके गुणों को देखकर तदनुसार वेतन प्राप्त करे ।
षष्ठांशं वा चतुर्थांशं भृतेर्भृत्यस्य पालयेत् ।
६ मास दद्यात्तदर्थं भृत्याय द्वित्रिवर्षेऽखिलं तु वा ॥ ४१७ ॥
का वेतन के वेतन का षष्ठांश या चतुर्थांश काटकर राजा अपने यहां जमा करता रहे और जब दो - तीन वर्ष हो जाय तब आधी या पूरी रकम उसे देवे ।
वाक्यपारुष्यान्न्यूनभृत्या स्वामी प्रबलदण्डतः ।
- १ वर्ष भृत्यं प्रशिक्षयेन्नित्यं शत्रुत्वं त्वपमानतः ॥ ४१८ ॥
रखना कटुभाषी भृत्य का भृति - दान- प्रकार - यदि स्वामी या राजा भृत्यों से आघा कठोर बातें करता है या वेतन पूरा नहीं देता है या प्रबल दण्ड देता है किंवा अपमान करता है तो इन सब व्यवहारों से वह अपने भृत्यों को शत्रुता करना सिखाता है ।
भृतिदानेन संतुष्टा मानेन परिवर्धिताः ।
सविता मृदुवाचा ये न त्यजन्त्यधिपं हि ते ॥। ४१६ ॥
और समय पर वेतन देने से संतुष्ट किये हुये, संमान से गौरव पद पर पहुँचाये हुये, मृदु वचनों से समझाये हुये जो भृत्य हैं वे अपने स्वामी को नहीं छोड़ते हैं ।
३ ॥ ' अधमा धनमिच्छन्ति धनमानौ तु मध्यमाः ।
ना सेवा उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम् ॥ ४२० ॥
रहे और जो केवल धन चाहते हैं वे ' अधम ' जो धन तथा मान दोनों चाहते हैं । हैं. अपने चे ' मध्यम ' एवं जो केवल मान चाहते हैं वे ' उत्तम ' जन कहलाते हैं । क्योंकि सुशीला बड़े लोगों का धन मान ( आदर ) ही है । 11 में देवे । मांश को - उसका वेतन को अर्थात्
यथागुणान्स्वभृत्यांश्च प्रजाः संरञ्जयेन्नृपः ।
शाखाप्रदानतः कांश्चिदपरान् फलदानतः ॥ ४२१ ॥
अन्यान् सुचक्षुषा हास्यैस्तथा कोमलया गिरा ।
सुभोजनैः सुवसनैस्ताम्बूलैश्च धनैरपि ॥ ४२२ ॥
कांश्चित् सुकुशलप्रश्नैरधिकार प्रदानतः ।
वाहनानां प्रदानेन योग्याभरणदानतः ॥। ४२३ ॥
छत्रातपत्रचमरदीपिकानां प्रदानतः ।
क्षमया प्रणिपातेन मानेनाभिगमेन च ॥ ४२४ ॥
सत्कारेण च ज्ञानेन ह्यादरेण शमेन च ।
प्रेम्णा समीपवासेन स्वार्घासनप्रदानतः ॥ ४२५ ॥
सम्पूर्णा सनदानेन स्तुत्योपकार कीर्तनात् । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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१२२ शुक्रनीति: राजा का भृत्य के संग वर्त्तन का वर्णन- न— राजा योग्यतानुसार भृयों एवं प्रजाजनों का मनोरञ्जन निम्नरीति से करे जैसे—- किसी को शाखा प्रदान ( यत्किचित् देने ) से, किसी को फलदान ( यत्किचित् से कुछ अधिक देने ) से, किसी को अच्छी दृष्टि से देखने से, किसी को हँसकर बात - चीत करने से, किसी को कोमल चचनों से, किसी को सुन्दर भोजन, सुन्दर चख, ताम्बूल ( पान का बीड़ा ) या धन देने से, किसी को अच्छी तरह कुशल- प्रश्न करने से, किसी को किसी विभाग का अधिकार प्रदान करने से, किसी को वाहन ( सवारी ) या योग्य आभूषण - प्रदान करने से, किसी को छात्र ( पतों का बना छाता ), आतपत्र ( वस्त्र का बना छाता ), चामर या दीपक - प्रदान करने से, किसी को क्षमा - प्रदान करने से, किसी को प्रणाम करने से, किसी को संमान के साथ उसके साथ गमन करने से, किसी को सत्कार करने से, किसी को शास्त्रीय प्रसङ्ग चलाने से, किसी को आदर, शान्ति या प्रेम - प्रदर्शन करने से, किसी को समीप में रहने से, किसी को अपने अर्द्धासन पर बैठाने से, किसी को संपूर्ण आसन प्रदान करने से और किसी को स्तुति या उपकार का
वर्णन करने से प्रसन्न करे ।
यत्कार्ये विनियुक्ता ये कार्यारङ्कयेश्च तान् ॥
लोहजैस्ताम्रजै रीतिभवै रजतसंभवैः ।
सौषर्णे रत्नजैर्वापि यथायोग्यैः स्वलान्छनैः ॥
प्रविज्ञानाय दूरात्तु वस्त्रेश्व मुकुटैरपि । er को कार्य - मुद्रा से अंकित करने का निर्देश – राजा कार्य में नियुक्त किये गये हों, उन्हें दूर से यह अमुक कार्य ४२६ ॥ ४२७ ॥ जो जिस में नियुक्त है, इसको फौरन जानने के लिये लोहा, तामा, पीतल, चांदी, सोना या रस्म के बने हुये, योग्यतानुसार अपने - अपने चिह्नों, वस्त्रों और मुकुटों द्वारा कार्यों
( विभागों ) के चिह्नों से युक करे ।
वाद्य वाहनभेदैश्च भृत्यान्कुर्यात् पृथक्पृथक् ॥ ४२८ ॥
स्वविशिष्टं च यश्चि न दद्यात् कस्यचिन्नृपः । भृत्यों को विशिष्ट राजचिह्न न देने का निषेध – और राजा विशिष्ट अधिकारियों को बाजे और सवारियों की भिन्नता से अर्थात् इस अधिकारी के यातायात के समय ऐसे बाजे होने चाहिये । और इस अधिकारी के यातायात में ऐसी सवारी होना चाहिये - इस भांति की विशेषताओं से पृथक् - पृथक् करे और राजा अपने विशिष्ट राजचिह्न छत्र - मुकुटादि किसी
के लिये न देवे ।
दश प्रोक्ताः पुरोधाद्या ब्राह्मणाः सर्व एव ते ॥ ४२६ ॥
CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri अ नैव १० प्रकृि १० प्रकृतियां करने चाहिये नियुक्ति करनी उक्त पदों पर न भ भागग्राहं निर्देश - और वाले लोगों क चाहिये | और लिये वैश्य, छ में ब्राह्मण नि सेनापति या कायर पु होता है वही संकीर्ण का यह धर्म गणों की नि राजा है उस मृस्य
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भृत्यों एवं खा - प्रदान धिक देने ) त करने , ताम्बूल १० कुशल प्रश्न करने द्वितीयोऽध्यायः १२३
अभावे क्षत्रिया योज्यास्तदभावे तथोरुजाः ।
नैव शूद्रास्तु संयोज्या गुणवन्तोपि पार्थिवैः ॥ ४३० ॥
१० प्रकृति पुरोहितादियों का जाति - नियम — पुरोहित आदि जो पूर्वोक प्रकृतियां ( प्रधान ) हैं उनके पद पर रहनेवाले सभी ब्राह्मण ही नियुक्त चाहिये । ब्राह्मण के अभाव में क्षत्रिय, क्षत्रिय के अभाव में वैश्यों की किसी नियुक्ति करनी चाहिये । और राजा को गुणवान ( योग्य ) शूद्रों को नियुक्ति को उक्तपदों पर नहीं ही करनी चाहिये । ( सो पक - प्रदान से, किसी से प्रेम - प्रदर्शन बैठाने से,
भागग्राही क्षत्रियस्तु साहसाधिपतिश्च सः ।
ग्रामपो ब्राह्मणो योष्यः कायस्थो लेखकस्तथा ॥ ४३१ ॥
शुल्कमाही तु वैश्यो हि प्रतिहारश्च पादजः ।
सेनाधिपः क्षत्रियस्तु ब्राह्मणस्तदभावतः ॥ ४३२ ॥
भागग्राही और साहसाधिपति आदि पद के लिये चत्रियादि रखने का उपकार का निर्देश - और कर ( मालगुजारी ) वसूल करनेवाले तथा शासन कार्य करने-वाले लोगों के पद पर क्षत्रिय, ग्रामाध्यक्ष पद पर ब्राह्मण नियुक्त करना ॥ चाहिये । और लेखक पद पर कायस्थ, शुल्क ( चुंगी आदि ) वसूल करने के लिये वैश्य, द्वारपाल पद पर शूद्र और सेनापति पद पर क्षत्रिय उसके अभाव ॥ में ब्राह्मण नियुक्त करना चाहिये ।
न वैश्यो न च वै शूद्रः कातरश्च कदाचन ।
नृत्य जिस सेनापतिः शूर एव योज्यः सर्वासु जातिषु ॥ ४३३ ॥
नियुक्त है, सेनापति पद पर शूरमान को रखने का निर्देश - और कभी वैश्य, शूद्र रन के या कायर पुरुष सेनापति नहीं बनाना चाहिये क्योंकि सभी जातियों में जो शूर कार्यों होता है वही सेनापति पद पर नियुक्त होता है ।
ससङ्करचतुर्वर्णधर्मोऽयं पावनः ।
॥ यस्य वर्णस्य यो राजा स वर्णः सुखमेधते ॥ ४३४ ॥
संकीर्ण जातियों के सहित चारो ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ) वर्णों विशिष्ट का यह धर्म है । किन्तु यवनों का नहीं है । अर्थात् उक्तरीति से अधिकारी इस गणों की नियुक्ति में जाति का विचार यवनों में नहीं है और जिस जाति का अधिकारी राजा है उस जाति के लोग उसके राज्य में सुखी होते हैं ।
बताओं से नोपकृतं मन्यते स्म न तुष्यति सुसेवनैः ।
को किसी कथान्तरे न स्मरति शङ्कते प्रलपत्यपि ॥ ३३५ ॥
क्षुब्धस्तनोति मर्माणि तं नृपं भृतकस्त्यजेत् । नृत्य के लिये त्यागने योग्य राजा के लक्षण - जो किसी के उपकार को CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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१२४ शुक्रनीति: नहीं मानता है और जो अच्छी से अच्छी सेवा करने पर भी नहीं संतुष्ट होता एवं बात चीत के प्रसङ्ग में भृत्य का कभी स्मरण नहीं करता है प्रत्युत है । उस पर शङ्का करता है एवं वृथा बात - चीत करता है और चुभित होकर मर्मवेधी:वाक्य
बोलता है, ऐसे राजा को भृत्य छोड़ दे ( उसकी नोकरी न करे ) ।
लक्षणं युवराजादेः कृत्यमुक्तं समासतः ॥ ४३६ ॥
इति शुक्रनोतौ युवराजादिलक्षणं नाम द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः । इस प्रकार से युवराजादि का लक्षण तथा कृत्य संक्षेप से कहा गया । इति शुक्रनीति- भाषानुवाद में युवराजादि - लक्षण नामक द्वितीय अध्याय समाप्त । अ सबके का निरूपण वर्णन करते हैं हैं वे सभी आ i धर्म के अतः धर्म में कहते हैं । इ बचाते हुये म करे अर्थात् त्रि 111 सर्व - साध तथा नखों को आंख, मुख लगाये हुये, एवं महौषधि स छाता त के समय उन मार्ग चलना तो हाथ में सहायक का CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri