शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 231–240
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 231–240
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शूर पुरुषों सर्वो के. ! तृतीयोऽध्यायः १४५
नाकार्ये तु मतिं कुर्याद् द्राक्स्वकार्य प्रसाधयेत् ।
उद्योगेन बलेनैव बुद्धया धैर्येण साहसात् ॥ ११६ ॥
पराक्रमेणार्जवेन मानमुत्सृज्य साधकः । कार्य - साधक के कृत्यों का वर्णन करने के लिये अयोग्य कार्य के विषय १ ॥ मैं बुद्धि नहीं करनी चाहिये I । और अपने कार्य को सिद्ध करनेवाले के लिये को सदा उचित है कि वह मान ( गौरव ) छोड़कर उद्योग, बल, बुद्धि, धैर्य, साहस,
वादि को पराक्रम और सरलता के द्वारा यथासंभव शीघ्र अपने कार्य को सिद्ध करे ।
ना तथा यदि सिद्धयति येनार्थः कलहेन वरस्तु सः ॥ ११७ ॥
ये । अन्यथाऽऽयुर्धनसुहृद्यशःसुखहरः स्मृतः । यदि कलह करने से अपना कार्य सिद्ध हो तो वह कलह अच्छा कहलाता २ ॥ है अभ्यथा ( यदि कार्यं सिद्ध न हो तो ) वह कलह केवल आयु, धन, मित्र,
- संभोग, यश तथा सुख को हरण करनेवाला कहा है ।
उद्योग नानिष्टं प्रवदेत् कस्मिन्न च्छिद्रं कस्य लक्षयेत् ॥ ११८ ॥
" आज्ञाभङ्गस्तु महतां राज्ञः कार्यो न वै क्वचित् । दुर्वचन का एवं गुरुजनादि की आज्ञा उल्लङ्घन का निषेध - किसी के लिये दुर्वचन न कहे और न किसी के छिद्र ( दोष ) को देखे । बड़े लोगों एवं
निन्दा राजा की आज्ञा का कभी उल्लङ्घन न करे ।
भोज में असत्कार्यनियोक्तारं गुरुं वापि प्रबोधयेत् ॥ ११ ९ ॥
कषाय नातिक्रामेदपि लघुं कचित् सत्कार्यबोधकम् । मिठाई ) असत् कार्य करानेवाले गुरु को भी बोध कराने का एवं छोटे के भी समु-चित बात मानने का निर्देश-- बुरे कार्य में नियुक्त करनेवाले गुरु को भी समझावे कि आपने यह अनुचित आज्ञा दी है अतः मैं नहीं करूँगा । और सरकार्य का उपदेश करनेवाले छोटे लोगों के भी वचनों का कभी उल्लंघन नहीं
साथ करना चाहिये । अर्थात् उसे अवश्य करना चाहिये ।
निपुण कृत्वा स्वतन्त्रां तरुणीं स्त्रियं गच्छेन्न वै क्वचित् ॥ १२० ॥
उत्तम, स्त्रियो मूलमनर्थस्य तरुण्यः किं परैः सह । तरुणी स्त्री को स्वतन्त्र छोड़ कर जाने का निषेध — और अपनी तरुणी स्त्री को स्वतन्त्र करके ( इच्छानुसार रहने की आज्ञा देकर ) अन्यत्र कहीं नहीं जाना चाहिये 1 । क्योंकि पर पुरुषों के साथ रहने से साधारण भी स्त्रियां देश- अमर्थं का कारण होती हैं फिर तरुणी स्त्रियों के विषय में क्या कहना है
वे सबसे अधिक अनर्थ का कारण हैं ।
प्रहकभी न प्रमाद्येन्मद्रव्यैर्न विमुह्येत् कुसन्ततौ ॥ १२१ ॥
मद पैदा करनेवाले द्रव्यों से ( भांग आदि अथवा ऐश्वर्य से ) अधिक-१० शु ० CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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शुक्रनीति: १४६ नहीं होना चाहिये 1 । और नालायक सन्तान पर ' यह मेरा पुत्र है ' मतवाला ऐसी ममता नहीं करनी चाहिये ।
साध्वी भार्या पितृपत्नी माता बालः पिता स्नुषा ।
अभर्तृकाऽनपत्या या साध्वी कन्या स्वसापि च ॥ १२२ ॥
मातुलानी भातृभार्या पितृमातृस्वसा तथा ।
मातामहोऽनपत्यश्च गुरुश्वशुर मातुलाः ॥
बालो s पिता च दौहित्रो भ्राता च भगिनीसुतः एतेऽवश्यं पालनीयाः प्रयत्नेन स्वशक्तितः
अविभवेऽपि विभवे पितृमातृकुलं सुहृत् ।
पत्न्याः कुलं दासदासीभृत्यवर्गाश्च पोषयेत् ॥
विकलाङ्गान् प्रब्रजितान् दीनानाथांश्च पालयेत् १२३ ॥ ॥। १२४ ॥ १२५ ॥ । साध्वी भार्यादिका यत्नपूर्वक पालने का निर्देश - सुशीला स्त्री, विमाता, माता, अविवाहिता कन्या, पिता, पुत्रवधू, बिना पति और पुत्र की कम्पा या बहन, मामी, भाई की वधू, पिता की वहन ( हुआ ), मां की बहन ( मौसी ), निःसन्तान नाना, गुरु, श्वशुर या मामा, बिना पिता का पुत्र, लड़की का लड़का ( नाती ), भाई या भानजा इन सबों का धन न रहने पर भी यथाशक्ति यत्नपूर्वक अवश्य पालन करना चाहिये 1 । और यदि धन हो तो पिता तथा माता के कुलवाले एवं मित्र, पत्नी के कुल ( ससुराल ) वाले, दास, दासी और भृत्य वर्गों का पालन - पोषण करना चाहिये और विकलाङ्ग ( काने, लंगड़े आदि ), संन्यासी, दीन और अनाथ लोगों का पालन
करना चाहिये ।
कुटुम्बभरणार्थेषु यत्नवान्न भवेच्च यः ॥ १२६ ॥
तस्य सर्वगुणैः किन्तु जीवन्नेव मृतश्च सः । जीवन्मृत पुरुषों का निर्देश - जो कुटुम्ब - पालन के विषय में प्रयत्नशील -नहीं होता है वह सर्वगुण संपन्न होते हुये भी जीवित रहकर मरे हुये के
-समान है अर्थात् उसका जीवन व्यर्थ है ।
न कुटुम्बं भृतं येन नाशिताः शत्रवोपि न ॥ १२७ ॥
प्राप्तं सरक्षितं नैव तस्य किं जीवितेन वै I जिसने कुटुम्ब का भरण - पोषण नहीं किया और शत्रुओं को नष्ट नहीं " किया एवं प्राप्त वस्तु की भलीभांति रक्षा नहीं की, उसके जीने से क्या अर्थात उसका जीवन वृथा है 1
।
स्त्रीभिर्जितो ऋणी नित्यं सुदरिद्रश्च याचकः ॥ १२८ ॥
गुणहीनोऽर्थहीनः सन् मृता एते सजीवकाः जोखि मांगनेवाला, मरे हुये के गुप्त र मैथुन, औष चाहिये ( देशाटन प्रवेश, शास्त्र करनी चाहि देशाटन के धर्म, पद सभा राजपुरुष वि - और सच्चा अनुसार ऋ विषयों का बहुत करने से अ शाखा क CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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तृतीयोऽध्यायः १४७ मेरा पुत्र है जो स्त्रियों के वशीभूत रहनेवाला, नित्य ऋण लेनेवाला, अत्यन्त दरिद्र, गुग से होन और धन से रहित है, ऐसे लोग जीवित रहकर मांगनेवाला, हैं । मरे हुये के तुल्य १२२ ॥ आयुर्विन्तं गृहच्छिद्रं मन्त्रमैथुन भेषजम् ॥ १२ ९ ॥ दानमानापमानं च नवैतानि सुगोपयेत् । 11 रखने योग्य बातों का निर्देश आयु, धन, गृह के दोष, मन्त्र, गुप्त मैथुन, औषध, दान, मान, अपमान हून ९ विषयों को अत्यन्त गुप्त रखना
8 11 चाहिये ( किसी से नहीं कहना चाहिये ) ।
देशाटनं राजसभावेशनं शास्त्रचिन्तनम् ॥ १३० ॥
वेश्यादिदर्शनं विद्वन्मैत्रीं कुर्यादतन्द्रितः । देशाटनादि की कर्त्तव्यता - आलस्यरहित होकर देशभ्रमण, राजसभा में , विमाता, प्रवेश, शास्त्रों का चिन्तन, वेश्या आदि का दर्शन, विद्वानों के साथ मैत्री की कन्या करनी चाहिये । की बहन नाका पुत्र, नन रहने दिधन हो ल ) वाले, विकलाङ्ग का पालन ६ ॥ I प्रयत्नशील मरे हुये के ॥ -नष्ट नहीं या अर्थात् अनेकाश्च तथा धर्माः पदार्थाः पशवो नराः ॥ १३१ ॥
देशाटनात् स्वानुभूताः प्रभवन्ति च पर्वताः । देशाटन के लाभ- इनमें से देशाटन करने से मनुष्यों को अनेक प्रकार
के धर्म, पदार्थ, पशु, मनुष्य और पर्वतों का अनुभव साक्षात् प्राप्त होता है ।
कीदृशा राजपुरुषा न्यायान्यायं च कीदृशम् ॥ १३२ ॥
मिथ्याविवादिनः के च के वै सत्यविवादिनः ।
कीदृशी व्यवहारस्य प्रवृत्तिः शास्त्रलोकतः ॥ १३३ ॥
सभागमनशीलस्य तद्विज्ञानं प्रजायते । सभा में बैठने से लाभ का वर्णन- - सभा में प्रवेश करने से मनुष्यों को राजपुरुष किस प्रकार के होते हैं? न्याय - अन्याय कैसा होता है? झूठा विवाद -और सच्चा विवाद उपस्थित करनेवाले कैसे होते हैं? शास्त्र और लोक के अनुसार ऋण देने आदि रूप विवाद- विषय का कैसा निर्णय होता है? इत्यादि
विषयों का विशिष्ट ज्ञान होता है ।
नाहङ्कारो च धर्मान्धः शास्त्राणां तत्त्वचिन्तनैः ॥ १३४ ॥
एकं शास्त्रमधीयानो न विन्द्यात् कार्यनिर्णयम् ।
स्याद्वह्वागमसंदर्शी व्यवहारो महानतः ॥ १३५ ॥
बुद्धिमानभ्यसेन्नित्यं बहुशास्त्राण्यतन्द्रितः । से शास्त्रों के अध्ययन के फल - बहुत से शास्त्रों के तत्वों का चिन्तन करने बहुत से से नहीं होना चाहिये । और एक अहङ्कार तथा धर्मान्धता युक्त निर्णय नहीं करना शास्त्र का केवल अध्ययन करके किसी कार्य ( तत्व ) का CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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१४५ शुक्रनीतिः चाहिये । क्योंकि बहुत शास्त्रों को जिसने अच्छी तरह से देखा है वही महान लोकिक व्यवहार का ज्ञाता हो सकता है अतः बुद्धिमान मनुष्य आलस्य-रहित होकर बहुत से शास्त्रों का नित्य अभ्यास करे ।:. तदर्थं तु गृहीत्वापि तदधीना न जायते ॥ १३६ ॥
वेश्या तथाविधावापि वशीकर्तुं नरं क्षमा ।
नेयात् कस्य वशं तद्वत् स्वाधीनं कारये जगत् ॥ १३७ ॥
बेश्यादर्शन के फल — जैसे बेश्या किसी मनुष्य के धन को ग्रहण करके भी उसके अधीन नहीं हो जाती है और स्वयं अधीन न होते हुये भी उ मनुष्य को अपने वश में करने के लिये समर्थ होती है किन्तु स्वयं किसी के वश में नहीं होती है, वैसे ही जगत् के लोगों को अपने अधीन बनाये किन्तु स्वयं किसी के अधीन न हो । इसे बेश्या - दर्शन का फल समझना
चाहिये ।श्रुतिस्मृतिपुराणानामर्थविज्ञानमेव च ।
सहवासात्पण्डितानां बुद्धिः पण्डा प्रजायते ॥ १३८ ॥
पण्डितों के साथ मैन्त्री के फल - पण्डितों के साथ संगति करने से श्रुति, स्मृति तथा पुराणों के अर्थों का विशेष ज्ञान तथा सत् - असत् का विचार करनेवाली पण्डा बुद्धि होती है । यह विद्वन्मैत्री का फल है ।
देवपित्र तिथिभ्योऽन्नमदत्त्वा नाश्नीयात् क्वचित् ।
आत्मार्थ यः पचेन्मोहान्नरकार्थं स जीवति ॥ १३ ९ ॥
अपने लिये केवल भोजन बनाकर खाने का निषेध — देवता, पितृगण तथा अतिथियों को बिना दिये कभी भोजन नहीं करना चाहिये, क्योंकि जो मोहवश केवल अपने लिये भोजन बनाता है और देवादि को बिना दिये भोजन करता है उसका जीवन नरक के लिये होता है ।
मार्ग गुरुभ्यो बलिने व्याधिताय शवाय च ।
राज्ञे श्रेष्ठाय प्रतिने यानगाय समुत्सृजेत् ॥ १४० ॥
गुरुजनादि के लिये मार्ग देने का निर्देश—— गुरुजन, बलवान, रोगी, शव ( मुर्दा ले जाने के लिये ), राजा, माननीय व्यक्ति, व्रतधारी, वाहने ( सवारी ) पर चढ़े हुए, ऐसे लोगों को जाने के लिये स्वयं हटकर मार्ग दे देना चाहिये ।
शकटात्पञ्चहस्तं तु दशहस्तं तु वाजिनः ।
दूरतः शतहस्तं च तिष्ठेनागाद् वृषाद्दश ॥ १४१ ॥
शकटादिकों से दूर रहकर चलने का निर्देश - बैलगाड़ी आदि से ५ हाथ, घोड़े से १० हाथ, हाथी से १०० हाथ, बैल से १० हाथ की दूरी पर रहना चाहिये । शृङ्गीभ से प्रहार कर समीप में रह गमनादि बात विषय में शो इन सबों को : अपने की सेवा त्या सुननी चाहि बड़ों क लोगों की अ की करने की पान करने स निन्दित के लिये प्रस जैसे विषपान मृत्यु का का सब कुछ भो बिना CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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तृतीयोऽध्यायः १४६
है वही शृङ्गिणां नखिनां चैव दंष्ट्रिणां दुर्जनस्य च ।
य आलस्य- नदीनां वसतौ स्त्रीणां विश्वासं नैव कारयेत ॥ १४२ ॥
शृङ्गी आदि का विश्वास करने का निषेध - सींगबाले पशु - बैल आदि, लख से प्रहार करनेवाले भालू, आदि, दाढ़ीवाले व्याघ्रादि, दुर्जन, नदी और स्त्री इनके
समीप में रहने पर विश्वास नहीं करना चाहिये ।
७ ॥
करके. ये भी उक्त वयं किसी तीन बनाये समझना श्रुति, का विचार ॥ नृगण तथा क्योंकि जो बिना दिये
खादन्न गच्छेदध्वानं न च हास्येन भाषणम् ।
शोकं न कुर्यान्नष्टस्य स्वकृतेरपि जल्पनम् ॥ १४३ ॥
गमनादि के निषेध के विषय - भोजन करते हुये रास्ता चलना, हंसते हुये बात करना, नष्ट हुई वस्तु या बीती हुई बात या मरे हुये व्यक्ति के विषय में शोक करना, अपने किये हुये कार्य की.. स्वयं प्रशंसा रूप में वर्णन इन सब को नहीं करना चाहिये ।
स्वशङ्कितानां सामीप्यं त्यजेद्वै नीचसेवनम् ।
संलापं नैव शृणुयाद् गुप्तः कस्यापि सर्वदा ॥ १४४ ॥
अपने ऊपर शंका रखनेवालों तथा दुर्जनों के समीप में रहना एवं नीचों की सेवा त्याग देनी चाहिये । और सर्वदा छिपकर किसी की बातें नहीं सुननी चाहिये ।
उत्तमैरननुज्ञातं कार्यं नेच्छेच्च तैः सह ।
देवैः साकं सुधापानाद्राहोश्विन्नं शिरो यतः ॥ १४५ ॥
बदों की आज्ञा के बिना उनके साथ कार्य करने का निषेध - यदि श्रेष्ठ लोगों की अपने साथ कार्य करने की अनुमति न हो तो उनके साथ उस कार्य की करने की इच्छा न करे, क्योंकि देवताओं के साथ बिना अनुमति के अमृत • पान करने से राहु का शिर काटा गया ।
महतोऽसत्कृतमपि भवेत्तद् भूषणाय वै ।
11 विषपानं शिवस्यैव त्वन्येषां मृत्युकारकम् ॥ १४६ ॥
न, रोगी, तेजस्वी क्षमते सर्वं भोक्तुं वह्निरिवानघः । वाहनं निन्दित भी कार्यों का बड़ों के लिये भूषण होने का निर्देश - सर्व साधारण मार्ग दे के लिये प्रसिद्ध नहीं करने योग्य कार्य भी बड़े लोगों के लिये भूषण होता है । जैसे विषपान शिवजी के लिये ही भूषण हुआ किन्तु अम्बों के लिये बद्दी ॥ मृत्यु का कारण होता है, क्योंकि निष्पाप तेजस्वी व्यक्ति अग्नि के समान
५ हाथ, सब कुछ भोजन करने के लिये समर्थ होता है ।
दूरी पर न सांमुख्ये गुरोः स्थेयं राज्ञः श्रेष्ठस्य कस्यचित् ॥ १४७ ॥
राजा मित्रमिति ज्ञात्वा न कार्य मानसेप्सितम् । • बिना अनुमति के श्रेष्ठ के संमुख बैठने का निषेध - गुरुजन, राजा या किसी CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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शुक्रनीति: १५० व्यक्ति के संमुख विना अनुमति के नहीं बैठना चाहिये । और ' राजा हमारा मित्र
श्रेष्ठ है ' यह समझ कर मनमाना कार्य नहीं करना चाहिये ।
नेच्छेन्मूर्खस्य स्वामित्वं दास्यमिच्छेन्महात्मनाम् ॥ १४८ ॥
विरोधं न ज्ञानलवदुर्विदग्धस्य रञ्जनम् । मूर्ख का स्वामी बनने की इच्छा का निषेध - मूर्ख जनका स्वामी बनने की इच्छा न करे किन्तु महान आत्मा • ( उच्च विचार ) वालों का दास भी बनने की इच्छा करे अथवा मूर्खो का स्वामी या दास कुछ भी बनने की इच्छा-न करे और महात्माओं के साथ विरोध करने की इच्छा न करे । एवं थोड़े ज्ञान से ही अपने को बहुत बड़ा चतुर माननेवाले व्यक्ति को खुश करने की.
इच्छा न करे अथवा उन्हें विरुद्ध या खुश करने की इच्छा न करे ।
अत्यावश्यमनावश्यं क्रमात् कार्यं समाचरेत् ॥ १४ ९ ॥
प्राक्पश्चाद्द्द्राग्विलम्बेन प्राप्तं कार्यं तु बुद्धिमान् । आवश्यक कार्य को सर्वप्रथम करने का निर्देश - बुद्धिमान मनुष्यों को बहुत से कार्य हाथ में आ जाने पर उनमें से अत्यावश्यक और अनावश्यक कार्यों को छाटकर क्रम से अत्यावश्यक कार्य को प्रथम एवं शीघ्रता से करना
चाहिये और अनावश्यक को पीछे तथा बिलम्ब से करना चाहिये ।
पित्राज्ञप्तेनापि मातृवधरूपे सुपूजिता ॥ १५० ॥
धृता गोतमपुत्रेण ह्यकार्ये चिरकारिता । बुरे कार्य में देरी करने का निर्देश — और न करने योग्य बुरे कार्य के करने में देरी करना अत्यन्त उचित होता है जैसे इन्द्र के साथ व्यभिचार कराने के. दोष से कुपित हुये गोतम के द्वारा अपनी स्त्री अहल्या का वध करने की आज्ञा पाने पर भी उनके पुत्र शतानन्द का मातृवध में देरी करना उचित
हुआ ।
प्रेम्णा समीपवासेन स्तुत्या नत्या च सेवया ॥ १५१ ॥
कौशल्येन कलाभिश्व कथाभिर्ज्ञानतोऽपि च । आदरेणार्जवेनैव शौर्याद्दानेन विद्यया
प्रत्युत्थानाभिगमनैरानन्दस्मितभाषणैः ।
उपकारैः स्वाशयेन वशीकुर्याज्जगत् सदा ॥
जगत् को वश में करने के उपाय- सदा प्रेम, समीप नमस्कार, सेवा, चतुरता, कलार्थी ( गाना - बजाना आदि ६४ कहना, ज्ञानोपदेश, आदर, सरलता, शूरता, दान, विद्या, अपने आसन से उठना या आगे जाकर लिवालाना ॥ १५२ ॥
१५३ ॥ में रहना, स्तुति, प्रकार की ), कथा सामने आने पर , आनन्द तथा सुस्कुराहट CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri के साथ वा जगत् को वश उपर्युक् निष्फल सि छोड़ देनी उक्त प्रेमाव वेदाद शिक्षा, व्या यजुः, साम तथा १८ मनुष ( जूभा ) व्यसन क पर कर ल कूट विका की नहीं सोच विहि पर लोक पर स्थिर
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जा हमारा १४८ ॥ दमी बनने भी बनने की इच्छा थोड़े करने की नुष्यों को अनावश्यक से करना = यं के करने कराने के करने की ना उचित २ ॥ स्तुति, 7 ), कथा आने पर मुस्कुराहट तृतीयोऽध्यायः १५१ & साथ वार्तालाप, उपकार, सुन्दर आशय - प्रदर्शन, इन सबों के करने से के को अपने वशीभूत करना चाहिये ।
जगत् एते वश्यक रोपाया दुर्जने निष्फलाः स्मृताः ।
तत्सन्निधिं त्यजेत्प्राज्ञः शक्तस्तं दण्डतो जयेत् ॥ १५४ ॥
छलभूतैस्तु तद्रूपैरुपायैरेभिरेव वा । बश करने के उपायों की दुर्जनों के विषय में विफलता का निर्देश - किन्तु उपर्युक्त ये सभी वश करने के उपाय दुर्जनों के विषय में प्रयोग करने पर निष्फल सिद्ध होते हैं, अतः बुद्धिमानों को उनकी ( दुर्जनों की ) संगतिः छोड़ देनी चाहिये बल्कि यदि सामर्थ्य हो तो उन्हें दण्ड देकर अथवा बनावटी
उक्त प्रेमादि रूप इन्हीं उपायों से वशीभूत करना चाहिये ।
श्रुतिस्मृतिपुराणानामभ्यासः सर्वदा हितः ॥ १५५ ॥
साङ्गानां सोपवेदानां सकलानां नरस्य हि । वेदादि के अभ्यास की हितकारिता का निर्देश - मनुष्यों के लिये संपूर्ण शिक्षा, व्याकरण, कल्प, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष इन ६ अङ्गों के सहित, ऋक्, यज्ञः, साम, अथर्व इन ४ वेदों एवं धनुर्वेदादि ४ उपवेदों, १८ मन्वादि स्मृतियों
तथा १८ पुराणों का सर्वदा अभ्यास करना हितकर है ।
मृगयाक्षाः स्त्रियः पानं व्यसनानि नृणां सदा ॥ १५६ ॥
चत्वार्येतानि सन्त्यज्य युक्त्या संयोजयेत् क्वचित् । मनुष्यों के ४ व्यसनों का निर्देश - सदा मृगया ( शिकार ) और अक्ष ( जुआ ) खेलना, स्त्री - संभोग करना, मद्यादि पीना, ये ४ मनुष्यों के लिये व्यसन कहे हुये हैं, इन्हें सदा करना स्याग कर कभी थोड़ा सा समय आने.
पर कर लेना उचित होता है अन्यथा नहीं ।
कूटेन - व्यवहारं तु वृत्तिलोपं न कस्य चित् ॥ १५७ ॥
न कुर्याच्चिन्तयेत्कस्य मनसाप्यहितं क्वचित् । कूट व्यवहार का निषेध - किसी के साथ कपटपूर्ण व्यवहार या आजी-विका की हानि नहीं करनी चाहिये, एवं कभी किसी का अहित भी मन से
नहीं सोचना चाहिये ( करना तो दूर रहा ) ।
तत्कार्यं तु सुखं यस्माद्भवेत्त्रैकालिकं दृढम् ॥ १५८ ॥
मृते स्वर्गं जीवति च विन्द्यात्कीर्ति दृढां शुभाम् । विहित कार्य करने का निर्देश - जिस कार्य के करने से इह लोक और . पर लोक दोनों में स्थिर सुख मिले अर्थात् मरने पर स्वर्ग और जीवित रहने
पर स्थिर तथा सुन्दर कीर्त्ति का लाभ हो उसी ( कार्य ) को करना चाहिये ।
जागर्ति च सचिन्तो य आधिव्याधिनिपीडितः ॥ १५ ९ ॥
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१५२ शुक्रनीति:
जारचोरो बलिद्विष्टो विषयी धनलोलुपः ।
कुसहायी कुनृपतिर्भिन्नामात्य - सुहृत्प्रजः ॥ १६० ॥
कुर्याद्यथा समीक्ष्यैतत् सुखं स्वप्याच्चिरं नरः । रात्रि में सुखपूर्वक न सो सकनेवालों का निर्देश – जो चिन्ता से परेशान, आधि ( मानसिक पीड़ा ) तथा व्याधि से पीड़ित, जार ( व्यभिचारी ), चोर, बलवान शत्रुवाला, विषयलोलुप, धन - लोलुप होता है और जो बुरे साथियों ' बाला, विरक्त मन्त्री, मिन्न तथा प्रजा गणों से युक्त कुत्सित विचार का राजा है । ये सब रान्नि में भी सदा जागते रहते हैं । अतः मनुष्यों को उचित है ' कि विचार कर ऐसा कार्य करे जिससे बहुत दिनों तक सुखपूर्वक रात्रि में
सो सके ।
राज्ञो नानुकृतिं कुर्यान्न च श्रेष्ठस्य कस्यचित् ॥ १६१ ॥
नैको गच्छेद् व्यालव्याघ्र चोरेषु च प्रबाधितुम् । योग्यता न रहने पर बड़ों के अनुकरण करने एवं सर्पादि पकड़ने के लिये ' एकाकी गमन का निषेध - राजा या किसी श्रेष्ठ पुरुष के व्यवहार की योग्यता न रहने पर अनुकरण नहीं करना चाहिये । और व्याल ( सर्पादि ),
व्याघ्र तथा चौर को मारने या पकड़ने के लिये अकेले नहीं जाना चाहिये ।
जिघांसन्तं जिघांसीयाद् गुरुमप्याततायिनम् ॥ १६२ ॥
कलहे न सहायः स्यात् संरक्षेद् बहुनायकम् । मारनेवाले गुरु को भी मारने का एवं कलह में सहायता न करने का -निर्देश - अपने को मारने की इच्छा रखनेवाले एवं आततायी गुरुजन को भी मारने की इच्छा रखनी चाहिये । झगड़ा होने पर किसी पक्ष का साथी नहीं बनना चाहिये । और जो बहुत लोगों का स्वामी हो उसकी रक्षा करनी
चाहिये ।
गुरूणां पुरतो राज्ञो न चासीत महासने ॥ १६३ ॥
प्रौढपादो न तद्वाक्यं हेतुभिर्विकृतिं नयेत् । गुरुजनों के आगे प्रौढपाद बैठने का निषेध – गुरुजनों के तथा राजा आगे उनसे ऊँचे आसन पर या पैर के ऊपर पैर रखकर नहीं बैठना चाहिये और उनके वाक्यों का तर्क द्वारा खण्डन नहीं करना
चाहिये ।
यत्कर्तव्यं न जानाति कृतं जानाति चेतरः ॥
नैव वक्ति च कर्तव्यं कृतं यश्चोत्तमो उत्तम पुरुष के लक्षण - जो नीचं मनुष्य होता है नरः वह जो । योग्य है ) उसको नहीं जानता है किन्तु केवलकृत ( किये
।
१६४ ॥
कर्तव्य करने हुये ) को ही CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri जानता है । नहीं कहता अपनी प्रिय के अपराध स्त्रियो ( सहसा अत्यन्त गुण स्त्रिय १६ च वर्ष की अ मारना चा चाहिये । चढ़कर दौ भाई की स्वाम रक्षा के लि के समान करते हैं । एक
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11 से परेशान, - ), चोर, साथियों-का राजा उचित है रात्रि में 11 ने के लिये चहार की सर्पादि ), ये । करने का नको भी थी नहीं करनी राजा के चाहिये । ( करने ही तृतीयोऽध्यायः १५३ है । और जो उत्तम मनुष्य होता है वह कर्त्तव्य और कृत दोनों को जानता कहता है 1 नहीं न प्रियाकथितं सम्यङ्मन्येतानुभवं विना ॥ १६५ ॥
अपराधं L मातृस्नुषा भ्रातृपत्नीसपत्निजम् । स्त्री के कथनमात्र से बिना स्वयं अनुभव किये समझने का निषेध-अपनी प्रिया स्त्री के कहने मात्र से ही माता, पुत्रवधू, भाई की पत्नी या सौत के अपराध को बिना स्वयं अनुभव किये सत्य नहीं समझना चाहिये । अनृतं । साहसं माया मूर्खत्वमतिलोभता ॥ १६६: अशौचं निर्दया दर्पः स्त्रीणामष्टौ स्वदुर्गुणाः । स्त्रियों के ८ दुर्गुणों का निर्देश –— क्योंकि १ झूठ बोलना, २ साहस, ( सहसा कोई कार्य कर बैठना ), ३ माया ( ढोंग रचना ) अत्यन्त लोभ, ६ अपवित्रता, ७ निर्दयता, ८ दर्प ( अहङ्कार )
दुर्गुण स्त्रियों के होते हैं ।
षोडशाब्दात्परं पुत्रं द्वादशाब्दात्परं खियम् ॥।
न ताडयेद् दुष्टवाक्यैः पीडयेन्न स्नुषादिकम् । १६ वर्ष से ऊपर की अवस्था वाले पुत्रादि के ताड़नादि वर्ष की अवस्था के बाद पुत्र और १२ वर्ष की अवस्था बाद , ४ मूर्खता , ५ ये ८ स्वाभाविक १६७ ॥ का निषेध - १६ कन्या को नहीं मारना चाहिये । और पुत्रवधू आदि को कटु वचनों से क्लेश नहीं पहुँचाना
चाहिये ।
पुत्राधिकाश्च दौहित्रां भागिनेयाश्च भ्रातरः ॥ १६८ ॥
कन्याधिका पालनीया भ्रातृभार्या स्नुषा स्वसा । दौहित्र आदि का पुत्रादिकों से बढ़कर पालन करने का निर्देश - पुत्र से चढ़कर दौहित्र ( नाती ), भानजा, भाई इन सब का एवं कन्या से बढ़कर
भाई की स्त्री, पुत्रवधू और बहिन इनका पालन करना चाहिये ।
आगमार्थं हि यतते रक्षणार्थ हि सर्वदा ॥ १६६ ॥
कटुम्ब पोषणे स्वामी तदन्ये तस्करा इव । स्वामी के लक्षण — जो कुटुम्ब - पालन के निमित्त धन की प्राप्ति और उसकी रक्षा के लिये सदा प्रयत्न करता है वही स्वामी है इससे अन्य स्वामी चोर समान है क्योंकि वे कुटुम्ब पालन - न कर स्वयं उस धन का उपभोग
करते हैं । 1
अनृतं साहसं मौख्यं कामाधिक्यं स्त्रियां यतः ॥ १७० ॥
कामाद्विनैकशयने नैव सुप्यात्त्रिया सह । एक शय्या पर सदा स्त्री के साथ सोने का निषेध – क्योंकि स्त्रियों में CC - 0. Mamukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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१५४ शुक्रनीतिः झूठ, साहस ( विना विचारे कार्य करना ), मूर्खता और काम की अधिकता होती है अतः विना काम की अधिकता के स्त्री के साथ एक शय्या पर नहीं शयन करना चाहिये ॥ दृष्ट्वा धनं कुलं शीलं रूपं विद्यां बलं वयः ॥ १७१ ॥
कन्यां दद्यादुत्तमं चेन्मैत्रीं कुर्यादथात्मनः । वर और मित्र की परीक्षा करने का निर्देश - धन, कुल, शील, रूप विद्या, वल और अवस्था ( उम्र ) इन सब को देखकर जिस वर में ये सब, उत्तम रीति से हों उसी को कन्या देनी चाहिये, क्योंकि यदि ये सब उत्तम होते हैं तो कम्बा भी उस वर से अपनी मैत्री जोड़ती है अथवा उत्तम हो तभी उससे अपनी मैत्री या संबन्ध करना उचित होता है भार्यार्थिनं वयोविद्यारूपिणं निर्धनं त्वपि ॥ १७२ ॥
न केवलेन रूपेण वयसा न धनेन च । वर के लक्षण - भार्यार्थी ( विवाह करने के लिये इच्छुक ) यदि अवस्था ( विवाह योग्य उम्र ), विद्या तथा रूप से युक्त हो किन्तु धन उत्तमः न हो तो भी उसे बुलाकर कन्या दे देनी चाहिये किन्तु केवल रूप, अवस्था
या धन देखकर कन्या नहीं देनी चाहिये ।
आदौ कुलं परीक्षेत ततो विद्यां ततो वयः ॥ १७३ ॥
शीलं धनं ततो रूपं देशं पश्वाद्विवाहयेत् । सर्वप्रथम वर के कुल, उसके बाद विद्या, उसके बाद अवस्था, उसके बाद शील, धन, रूप तथा देश की क्रमशः परीक्षा करने पश्चात् उसके साथ-कन्या का विवाह करना चाहिये । कन्या वरयते रूपं माता वित्तं पिता श्रुतम् ॥ १७४ ॥।
बान्धवाः कुलमिच्छन्ति मिष्टान्नमितरे जनाः । विवाहार्थं कन्या वर के रूप को सुन्दरता, माता उत्तम धन, पित्ता उत्तम. विद्या, बान्धव गण उत्तम कुल पसन्द करते हैं किन्तु इनसे अन्य बराती लोग केवल मिष्ट ( मधुर ) अन्न खाने की इच्छा रखते हैं क्योंकि उन्हें वरादि के कुलादि से कोई प्रयोजन नहीं है । भार्यार्थं वरयेत्कन्यामसमानर्षिगोत्रजाम् ॥ १७५ ॥
भ्रातृमत सुकुलांच योनिदोषविवर्जिताम् । कन्या के लक्षण -- भार्या बनाने के लिये अपने से भिन्न ऋषि और गोत्र वाली, भाई से संयुक्त, अच्छे कुल में उत्पन्न हुई, योनि रोग से रहित अथवा निर्दोष मांसे पैदा हुई कन्या का वरण करना वर के लिये
क्षणशः उचित है ।
कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् ॥ १७६ ॥
CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri विद्या को निष्य इस बुद्धि करके विद्य धना एवं दान भार्यादियों व्यर्थ है । भवि चाहिये । इस बुद्धि १२॥ वर्ष धन श्रेष्ठ है, का उपार्ज धन घटत है । एव ले जा स अव तब तक