शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 221–230
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 221–230
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तृतीयोऽध्यायः १३५ - अहंकार- अधिक सोना ), २. तन्द्रा ( अर्द्धनिद्रित अवस्था ), ३. भय, ४. क्रोध, पाता है ५. आलस्य, ६. दीर्घं सूत्रता ( थोड़े समय में पूर्ण होने योग्य कार्य को देरी हगाकर करना ) इन ६ दोषों को ऐश्वर्य चाहनेवाले व्यक्ति त्याग कर दें । क्योंकि ये सब दोष कार्य नष्ट करने के लिये समर्थ होते हैं, इसमें कोई सन्देह
नहीं है ।
त होकर उपायज्ञश्च योगज्ञस्तत्त्वज्ञः प्रतिभानवान् ॥ ५७ ॥
लोगों को स्वधर्मनिरतो नित्यं परस्त्रीषु पराङ्मुखः ।
वक्तोहवश्चित्रकथः स्यादकुण्ठितवाक् सदा ॥ ५८ ॥
मनुष्य को कौन सा कार्य करना और कौन सा छोड़ना चाहिये इसका निर्देश - प्रत्येक कार्य करने का उपाय और कौशल का जाननेवाला, तरच विषयः पिता, गुरु का ज्ञाता, प्रतिभाशाली, नित्य अपने धर्म में रत एवं परस्त्री से दूर रहने वाला,. भी कभी चक्का ( बोलने में चतुर ), तर्क करनेवाला, नाना प्रकार की मधुर बातें करने-वाला एवं बोलने में कुण्ठित नहीं होनेवाला सदा होना चाहिये ।
चिरं संशृणुयान्नित्यं जानीयात्क्षिप्रमेव च ।
विज्ञाय प्रभजेदर्थान्न कामं प्रभजेत् कचित् ॥ ५६ ॥
स्वजनों के नित्य देर तक बातें सुननी चाहिये अर्थात् पूरी बातें सुननी चाहिये एवं , बालक, शीघ्र कहने वालों की बातें समझनी चाहिये । समझकर किसी कार्य को करना चाहिये और कभी मनमानी नहीं करनी चाहिये ।
क्रयविक्रयातिलिप्सां स्वदैन्यं दर्शयेन्नहि ।
॥ कार्य विनाऽन्यगेहे न नाज्ञातः प्रविशेदपि ॥ ६० ॥
नहीं करना किसी वस्तु के खरीदने या बेचने में अत्यन्त आग्रह एवं हर किसी के अकेले सामने अपनी दीनता नहीं प्रकट करनी चाहिये क्योंकि इनसे क्रम से लाभ ह्रीं जागना में हानि तथा लघुता होती है । विना प्रयोजन एवं विना जान पहचान के स्वयं किसी दूसरे के गृह के अन्दर नहीं घुसना चाहिये ।
अपृष्टो नैव कथयेद् गृहकृत्यं तुं कं प्रति ।
बह्वर्थाल्पाक्षरं कुर्यात् सँल्लापं कार्यसाधकम् ॥ ६१ ॥
॥ स्वीकार विना पूछे किसी से कुछ कहने का निषेध - विना पूछे किसी से अपने वाले घर के कार्य या बातों को नहीं बताना चाहिये । बहुत अर्थों से भरा हुआ एवं गुण थोड़े अक्षरों ( शब्दों ) से युक्त, कार्य को सिद्ध करनेवाला ( मतलब की ) सुन्दर वार्त्तालाप करना चाहिये ।
न दर्शयेत् स्वाभिमतमनुभूताद्विना सदा ।
11. परमतं सम्यक् तेनाज्ञातोत्तरं वदेत् ॥ ६२ ॥
विना अनुभव ज्ञात्वा के स्वाभिप्राय प्रकट करने का निषेध - बिना अनुभव किये दन में बा CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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१३६ शुक्रनीति:. हुये किसी विषय में अपना विचार सदा प्रकट नहीं करना चाहिये । और के अभिप्राय को भलीभांति समझकर उससे अज्ञात उत्तर देना चाहिये । दूसो
दम्पत्योः कलहे साक्ष्यं न कुर्यात् पितृपुत्रयोः ।
: सुगुप्तः कृत्यमन्त्रः स्यान्न त्यजेच्छरणागतम् ॥ ६३ ॥
दम्पती आदि के बीच में किसी की साक्षी न देने का निर्देश - स्त्री - पुरुष क पिता - पुत्र की आपसी झगड़े में किसी के तरफ से साक्षी ( गवाही ) नहीं देनी चाहिये 1 । अपने कार्य तथा विचार को गुप्त रखना चाहिये अर्थात् विस कार्य पूर्ण हुये प्रकाशित नहीं करना चाहिये । शरण में आये हुये विपसि प्रस्त का त्याग नहीं करना चाहिये ।
यथाशक्ति चिकीर्षेत्तु कुर्यान्मुच्च नापदि ।
कस्यचिन्न स्पृशेन्मर्म मिथ्यावादं न कस्यचित् ॥ ६४ ॥
आपत्ति में विचलित होने एवं मर्मवेधी वातें करने का निषेध - यथा शक्ति प्रत्येक कार्य करने की इच्छा करनी चाहिये । और कार्य करते हुये आपत्ति पड़ने पर विचलित नहीं होना चाहिये । किसी से मर्मवेधी ( हृदय में चुभने वाली ) बातें नहीं करनी चाहिये एवं किसी के संबन्ध में या किसी ऐ झूठी बातें नहीं करनी चाहिये । नाश्लीलं कीर्तयेत् कश्चित् प्रलापं न च कारयेत् । अश्लील बातें आदि करने का निषेध - अश्लील ( घृणा लज्जादिबोधक )
बातें नहीं करनी चाहिये एवं कोई अनर्थक वचन नहीं बोलना चाहिये ।
अस्वर्ग्य स्याद्धर्म्यमपि लोकविद्वेषितं तु यत् ॥ ६५ ॥
स्वहेतुभिर्न हन्येत कस्य वाक्यं कदाचन ।
प्रविचार्योत्तरं देयं सहसा न वदेत् क्वचित् ॥ ६६ ॥
: लोकनिन्दित आदि कार्य करने का निषेध - जो कार्य लोक में निन्दित होता है वह यदि धर्मयुक्त भी हो तो नरक में ले जानेवाला होता है अतः उसे नहीं करना चाहिये । अपने कारण से किसी की बात को न काटे । खूब बिचार करके उत्तर देना चाहिये और सहसा कभी नहीं बोलना चाहिये । शत्रोरपि गुणा ब्राह्मा गुरोस्त्याव्यास्तु दुर्गुणाः । शत्रु के भी गुणों को ग्रहण करने का निर्देश - शत्रुओं के भी गुणों को ग्रहण करना चाहिये या उनका अभिनन्दन करना चाहिये । और गुरुजनों
के भी दुर्गुणों को छोड़ देना चाहिये ।
उत्कर्षो नैव नित्यः स्यान्नापकर्षस्तथैव च ॥ ६७ ॥
प्राक्कर्मवशतो नित्यं सधनो निर्धनो भवेत् ।
1 तस्मात् सर्वेषु भूतेषु मैत्रीं नैव च हापयेत् ॥ ६८ ॥
प्रारब्ध या अपकर्ष सभी - प्राणिय छोड़े ऐसा दीर्घदः -तरकाल क आलसी तथ 1 जो ' व्य तदनुसार ही दूर तक -तक सुख भ 1 1 प्रस्युर व्यक्ति तत्क बाजी तथा चहकार्य ह आलस - होने पर भ कार्य की नष्ट हो जा साहस विचार कि क्रिया या CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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तृतीयोऽध्यायः १३७ और दूसरो ये । प्रारब्धवश धनी - निर्धन होने का निर्देश - उत्कर्ष ( सुख की अवस्था ) -या अपकर्ष ( दुःखावस्था ) नित्य नहीं बना रहता है । प्राकन कर्मवश मनुष्य ३ ॥ धनवान या निर्धन सदा होता है । अतः एक सी अवस्था सदा न रहने से - स्त्री - पुरुष या सभी ही नहीं छोड़े नर्थात् विना विपत्ति प्रस्त प्राणियों में मैत्रीभाव ( सुख - से सुखी - दुःख से दुःखी होना ) रखना न ऐसा करने से सभी लोग सन्तुष्ट रहकर दुःख नहीं पहुँचायेंगे ।
दीर्घदर्शी सदा च स्यात् प्रत्युत्पन्नमतिः कचित् ।
साहसी सालसी चैव चिरकारी भवेन्न हि ॥ ६ ९ ॥
दीर्घदर्शी के लक्षण - सदा दूर तक सोचनेवाला तथा क्वचित् समयानुसार तरका कर्त्तव्य स्थिर करनेवाला होना चाहिये, और सहसा कार्य करनेवाला,
आलसी तथा देरी से धीरे - धीरे कार्य समाप्त करनेवाला नहीं होना चाहिये ।
६४ ॥
षेध - यथा यः सुदुर्निष्फलं कर्म ज्ञात्वा कर्तुं व्यवस्यति ।
करते द्रागादौ दीर्घदर्शी स्यात् स चिरं सुखमश्नुते ॥ ७० ॥
हुये 1. जो व्यक्ति किसी कार्य के अच्छे - बुरे फल या निष्फलता को विचार कर ( हृदय में तदनुसार कार्य करने की चेष्टा करता है और जो कार्य करने के प्रथम शीघ्र किसी से -ही दूर तक उसके परिणाम ( फल ) को जाननेवाला होता है वह चिरकाल तक सुख भोगता है । अतः दीर्घदर्शी होना उचित है ।
प्रत्युत्पन्नमतिः प्राप्तां क्रियां कर्तुं व्यवस्यति ।
दिबोधक ) सिद्धि: सांशयिकी तत्र चापल्यात् कार्यगौरवात् ॥ ७१ ॥
ये । प्रत्युत्पन्नमति के लक्षण - जो प्रत्युत्पन्नमति ( समयानुसार सूझवाला ) ६५ ॥ व्यक्ति तत्काल में उपस्थित कार्य करने की चेष्टा करता है उसके कार्य में जल्द-बाजी तथा कार्य की गुरुता से सिद्धि के विषय में सम्बेह बना रहता है अर्थात् ॥ -चह कार्य हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है ।
न्दित होता यतते नैव कालेऽपि क्रियां कर्तुं च सालसः ।
उसे नहीं न सिद्धिस्तस्य कुत्रापि स नश्यति च सान्वयः ॥ ७२ ॥
विचार करके आलसी मनुष्य के लक्षण - जो आलसी होता है वह समय उपस्थित - होने पर भी करने योग्य कार्य के करने में प्रयत्नशील नहीं होता है, उसके कार्य की सिद्धि कभी भी नहीं होती है और वह वंश सहित या साथी सहित भी गुणों गुरुज क्रियाफलमविज्ञाय यतते साहसी च सः दुःखभागी भवत्येव क्रियया तत्फलेन वा ॥ ७३ ॥
साहसी के लक्षण व दोष- जो साहसी व्यक्ति क्रिया के फल का बिना || विचार किये हुये सहसा ( एकाएक ) कार्य करने का प्रयत्न करता है वह
क्रिया या उसके फल के कारण से केवल दुःखभागी ही होता है ।
॥
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१३८ शुक्रनीति: महत्कालेनाल्पकर्म चिरकारी करोति च स शोचत्यल्पफलतो दीर्घदर्शी भवेदतः ॥ चिरकारी मनुष्य के लक्षण – जो चिरकारी ( देरी तक होता है वह थोड़े से कार्य को बहुत देर में धीरे २ करता है वह थोड़ा फल होने से अनुताप करता है अतः दीर्घदर्शी पर करनेवाली ) होना चाहिये ॥ ७४ ॥ कार्य करने वाला ) > हुआ समाप्त करता ( दूर तक परिणाम
सुफलं तु भवेत्कर्म कदाचित् सहसाकृतम् ।
निष्फलं वापि प्रभवेत् कदाचित् सुविचारितम् ॥ ७५ ॥
तथापि नैव कुर्वीत सहसानर्थकारि तत् ।
कदाचिदपि सब्जातम कार्यादिष्टसाधनम् ॥ ७६ ॥
यदनिष्टं तु सत्कार्यान्नाकार्यप्रेरकं हि तत् । सहसा कार्य करने का निषेध - सहसा किया हुआ भी कर्म कभी २-सुन्दर फल देनेवाला हो जाता है कभी २ भलीभांति विचार कर भी किया हुआ कर्म निष्फल हो जाता है । तथापि ( कदाचित् कार्य सफलता होने पर भी ) सहसा ( बिना बिचारे एकाएक ) कार्य नहीं करना चाहिये, क्योंकिः वह अनर्थ पैदा करनेवाला होता है 1 । और कदाचित् अकार्य ( नहीं करने योग्य कार्य ) से भी जो इष्टसिद्धि होती है और सत् ( अच्छे ) कार्य से जो अनिष्ट फल होता है, इससे वह अकार्य को करने के लिये प्रेरणा करने वाला
नहीं हो सकता है ।
भृत्यो भ्राताऽपि वा पुत्रः पत्नी कुर्यान्न चैव यत् ॥ ७७ ॥
विधास्यन्ति च मित्राणि तत्कार्यमविशङ्कितम् । मित्र की विशेषता - भृत्य, भाई, पुत्र और पत्नी भी जिस कार्य को
पूर्ण नहीं कर सकते, उसीको उसके मित्र - गण निःसन्देह पूर्ण कर देते हैं ।
यो हि मित्रमविज्ञाय याथातथ्येन मन्दधीः ॥ ७८ ॥
मित्रार्थे योजयत्येनं तस्य सोऽर्थोऽवसीदति बिना समझे किसी को मित्र बनाने का निषेध - जो मन्दबुद्धि । से मित्र के भीतरी ( अच्छे - बुरे ) भाव को बिना समझे यथार्थ रूपः नियुक्त करता है उसका वह मैत्रीरूप मित्रता के लिये उसे मर्थं नष्ट हो जाता है । न हि मानसिको धर्मः कस्यचिज्ज्ञायतेऽञ्जसा अतो यतेत तत्प्राप्त्यै ॥ ७६ ॥
मित्र की प्राप्ति के लिये यरन करने मित्रलब्धिर्वरा का निर्देश नृणाम् । को वस्तुतः नहीं जाना जा सकता - किसी के मानसिक भाव है । इससे उसकी ( अच्छे मित्र की ) प्राप्ति के लिये प्रय उत्तम बात विश्वस किसी भी का भी अत्य की तथा रा प्रामाण णिक, सुपरि परीक्षा भी छिपकर के बाद होने से सर्वतोभावेन और ( यस्किञ्चित करे ) और मैत्री रखे । दान, म उम्र दण कटु - भाषण भाषण करने CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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तृतीयोऽध्यायः १३६ के लिये प्रयत्न करना चाहिये । क्योकि मनुष्यों के लिये मित्र का पाना उत्तम बात है । बाला ) करता-रिणाम कभी २-- किया होने करने नात्यन्तं विश्वसेत् कश्चिदू विश्वस्तमपि सर्वदा ॥ ८० ॥
पुत्रं वा भ्रातरं भार्याममात्यमधिकारिणम् ।
धनस्त्रीराग्यलोभो हि सर्वेषामधिको यतः ॥ ८१ ॥
विश्वस्त का भी अत्यन्त विश्वास करने का निषेध - सर्वदा विश्वासपात्र किसी भी व्यक्ति का यहां तक पुत्र, भाई, स्त्री, अमास्य या अधिकारी पुरुष का भी अत्यन्त विश्वास नहीं करना चाहिये । क्योंकि सभी लोगों को धन, श्री तथा राज्य का लोभ अधिक रूप से होता है । प्रामाणिकं चानुभूतमाप्तं सर्वत्र विश्वसेत् । प्रामाणिकादि का विश्वास करने का निर्देश- - अतः विश्वस्त रूप से प्रामा-णिक, सुपरिचित एवं हित्तैषी लोगों का सर्वत्र विश्वास करना चाहिये । विश्वसित्वात्मवद् गूढस्तत्कार्य विसृशेत् स्वयम् ॥ ८२ ॥
तद्वाक्यं तर्कतोऽनर्थ विपरीतं न चिन्तयेत् । परीक्षा करके विश्वस्त मानने का निर्देश - अपने समान विश्वास करके भी छिपकर उसे ( विश्वासपात्र ) के कार्यों की परीक्षा करे । और परीक्षा करने से जो के बाद वस्तुतः विश्वासपात्र निकलने पर उसके वाक्यों में तर्क से अनर्थ नेवाला होने से विरुद्ध जैसा विचार न करे अर्थात् उसके वचनों को निःसन्देह
सर्वतोभावेन मान ले ।
चतुःषष्टितमांशं तन्नाशितं क्षमयेदथ ॥ ६३ ॥
स्वधर्मनीतिबलवांस्तेन मैत्रीं प्रधारयेत् । और यदि उक्त विश्वासपात्र व्यक्ति के द्वारा कार्य का ६४ वां भाग ( यस्किञ्चित् भाग ) नष्ट हो जाय तो भी उसे क्षमा कर दे ( उसका विचार न करे ) और वह अपने धर्मं तथा नीति में बलवान है अतः उसके साथ
मैन्त्री रखे ।
दानैर्मानैश्च सत्कारैः सुपुभ्यान् पूजयेत् सदा ॥ ६४ ॥
रूप दान, मान और सेवा से अत्यन्त पूज्यों की सदा पूजा करे ।
उसे कदापि नोग्रदण्डः स्यात् कटुभाषणतत्परः ।
भार्या पुत्रोऽयुद्विजते कटुवाक्यादुप्रदण्डतः ॥ ८५ ॥
उम्र दण्ड और कटु वचन का निषेध – कभी भी उम्र दण्ड देनेवाला एवं कटु - भाषण करने में तत्पर नहीं होना चाहिये, क्योंकि स्त्री तथा पुत्र भी कटु-भाव भाषण करने एवं उग्र दण्ड करने से उद्विग्न हो उठते हैं । आप्तिः पशवोऽपि वशं यान्ति दानैश्च मृदुभाषणैः । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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१४० शुक्रनीति: और पशु भी चारा देने एवं पुचकार कर बुलाने से वश फिर मनुष्यों के विषय में क्या कहना है? । न विद्यया न शौर्येण धनेनाभिजनेन च न बलेन प्रमत्तः स्याच्चातिमानी कदाचन विद्यादिकों से प्रमत्त होने का निषेध - विद्या, शूरता, धन, -के मद से मतवाला एवं अत्यन्त मानी कभी नहीं होना चाहिये नाप्तोपदेशं संवेत्ति विद्यामत्तः स्वहेतुभिः अनर्थमप्यभिप्रेतं मन्यते परमार्थवत् महाजनैर्वृतः पन्था येन संत्यज्यते बलात् ॥ विद्यामत्तता के अनर्थकारी फल -1 - विद्या के मद से उन्मत्त
में हो जाते हैं ।
॥ ८६ ॥
। कुल और वह
।
॥ ८७ ॥
I ८८ ॥ पुरुष अपने तर्कों -से आप्त ( परमहितैषी ) जनों के उपदेश - वचनों को कुछ भी नहीं समझता है और अनर्थकारी भी अपने अमीष्ट विचार को परमार्थ - युक्त ( उचित - कर्तव्य ) समझता है । और जिससे वह अच्छे पुरुषों से स्वीकृत मार्ग का भी हठात् परित्याग कर देता है ।
शौर्यमत्तस्तु सहसा युद्धं कृत्वा जहात्यसून् ।
व्यूहादियुद्धकौशल्यं तिरस्कृत्य च शात्रवान् ॥ ८६ ॥।
शौर्यमतता के अनर्थकारी फल - और जो व्यक्ति शूरता से मत्त होता है, वह सहसा ( बिना विचारे ) शस्त्रों को धारण किये हुये व्यूह - रचना आदि युद्धसंबन्धी कौशल का भी तिरस्कार करके युद्ध करता हुआ अपने प्राणों -का परिस्याग कर देता है ।
श्रीमन्तः पुरुषो वेत्ति न दुष्कीर्तिमजो यथा ।
स्वमूत्रगन्धं मूत्रेण मुखमासिञ्चते स्वकम् ॥ ९ ० ॥
धनमत्त पुरुष की स्थिति का वर्णन - जैसे बकरा अपने मूत्र के गन्ध को नहीं जानता है बल्कि उसी मूत्र से अपने सुख को सीचता रहता है उसी भांति धन के मद से मत्त पुरुष अपने मुख को दुष्कीर्त्ति से नीचे करवाता है तो भी - दुष्कीति का नहीं ख्याल करता है । तथाभिजनमत्तस्तु सर्वानेव वमन्यते श्रेष्ठानपीतरान्सम्यगकार्ये कुरुते मतिम् कुलीनता के मद से मत्त की स्थिति का वर्णन - तथा • से मत पुरुष श्रेष्ठ तथा नीच सभी लोगों का तिरस्कार करता नहीं करने योग्य बुरे कार्यों में अपनी बुद्धि अच्छी तरह से -चुरे कार्य करने का विचार रखता है और सदा करता भी है ।
बलमत्तस्तु सहसा युद्धे विदधते मनः ।
॥ ६१ ॥
कुलीनता के मद रहता है । और करता है अर्थात् बलम • समझे - बूझे बल से स मानम जगत् के ल भी सबस विद्या लिये ही प किन्तु सज्ज विद्या ( धन ) करना कह शूरत तथा उनक फल यह रखना । योग्य सम सुन्द सिद्ध करन विद्या, मन कुळवाले क CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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तृतीयोऽध्यायः १४१ जाते हैं । बलेन बाघते सर्वानश्वादीनपि ह्यन्यथा ॥ ६२ ॥
बलमत्त की स्थिति का वर्णन - बल के मद से मत्त पुरुष एकाएक बिना ] " समझे - बूझे युद्ध करने में मन लगाता है, और मनके बिरुद्ध चलने पर अपने और बल 11 -पने तर्कों समझता ( उचित मार्ग का होता है, ना आदि ने प्राणों 1 को नहीं सी भांति है तो भी के मद है । और अर्थात् वह से सबों को कष्ट पहुँचाता है यहां तक अवादियों को भी पीड़ित करता है ।
मानमत्तो मन्यतेस्म तृणवश्चाखिलं जगत् ।
अपि च सर्वेभ्यस्त्वत्यर्घासनमिच्छति ॥ ६३ ॥
मानमत्त की स्थिति का वर्णन - अभिमान से मतवाला पुरुष सम्पूर्णं जगत् के लोगों को तृण के समान तुच्छ समझता है और स्वयं अयोग्य होकर मी सब से अधिक श्रेष्ठ आसन पाने की इच्छा करता है । मदा एतेऽवलिप्तानां सतामेते दमाः स्मृताः । विद्यादि से सज्जनों को विनयी बनने का निर्देश - गर्वयुक्त लोगों के लिये ही पूर्वोक्त विद्या, शौर्य आदि ये सब मद ( उम्मत्त बनानेवाले ) होते हैं
किन्तु सज्जनों के लिये ये ही दम ( विनय लानेवाले ) होते हैं ।
विद्यायाश्च फलं ज्ञानं विनयश्च फलं श्रियः ॥ ९ ४ ॥
बलफलं • सद्रक्षणमुदाहृतम् । विद्यादिकों के फल - -जैसे विद्या का फल ज्ञान और विनय है । लक्ष्मी-( धन ) का फल यज्ञ तथा दान करना है । बल का फल सज्जनों की रक्षा
करना कहा है ।
नामिताः शत्रवः शौर्यफलं च करदीकृताः ॥ ९ ५ ॥
शमो दमञ्चार्जवं चाभिजनस्य फलं त्विदम् ।
मानस्य तु फलं चैतत्सर्वे स्वसदृशा इति ॥ ६६ ॥
शूरतादि के फलों का निर्देश - शूरता का फल शत्रुओं को सिर झुकवानाः तथा उनको कर देनेवाली प्रजा बनाना है । और अभिजन ( कुलीनता ) का फल यह है कि मनको शान्त रखना, इन्द्रियों का दमन करना एवं सरलता रखना । मान का फल तो यह है कि- सब को अपने सदृश संमान--योग्य समझना ।
सुविद्या मन्त्र भैषण्यस्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि ।
गृह्णीयात् सुप्रयत्नेन मानमुत्सृज्य साधकः ॥ ९ ७ ॥।
सुन्दर विद्यादि को नीच से भी ग्रहण करने का निर्देश - अपने कार्य को सिद्ध करनेवाला पुरुष अपने गौरव को त्यागकर अत्यन्त प्रयत्न के साथ सुन्दर विद्या, मन्त्र, औषध तथा स्त्रीरश्न ( उत्तम गुणयुक्त सुम्दर स्त्री ) यदि नीच--कुलवाले के पास हो तो भी उसे ग्रहण करे । उपेक्षेत प्रनष्टं यत्प्राप्तं यत्तदुपाहरेत् । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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-१४२ शुक्रनीतिः न बालं न स्त्रियं चातिलालयेत्ताडयेन्न च ॥ ६८ ॥
विद्याभ्यासे गृह्यकृत्ये तावुभौ योजयेत्क्रमात् । की उपेक्षा करने का निर्देश - जो वस्तु नष्ट हो गई हो उसकी नष्टवस्तु ' उपेक्षा कर दे और जो उपस्थित हुई हो उसे ग्रहण करे । -स्त्री का अत्यन्त लाड - प्यार करना या अधिक ताडन करना उचित नहीं हैं । बल्कि उन ( बालक तथा स्त्री ) को क्रम से विद्याभ्यास तथा गृह - संवन्धी
- कार्यों में नियुक्त करना उचित है ।
परद्रव्यं क्षुद्रमपि नादत्तं स हरेदणु ॥ ६६ ॥
नोच्चारयेदधं कस्य स्त्रियं नैव च दूषयेत् । परद्रव्यहरणादि का निषेध - बिना दिये तुच्छ भी दूसरे के द्रव्य ( वस्तु ) - को न ग्रहण करे और दूसरे के छोटे भी पाप को किसी से या पापकर्त्ता
- से न कहे । और किसी स्त्री को दूषित न करे या दोष न लगावे ।
न ब्रूयादनृतं साक्ष्यं कृतं साक्ष्यं न लोपयेत् ॥ १०० ॥
प्राणात्ययेऽनृतं ब्रूयात् सुमहत्कार्य साधने । 1 प्राणनाशादि की संभावना में झूठ बोलने का निर्देश - झूठी गवाही न दे और दी हुई गवाही से पलट न जावे । और जब बहुत बड़ा कार्य सिद्ध
- करना हो या प्राण - सङ्कट उपस्थित हो तभी झूठ बोले अन्यथा झूठ न बोले ।
कन्यादात्रे तु ह्यधनं दस्यवे सघनं नरम् ॥ १०१ ॥
गुप्तं जिघांसवे नैव विज्ञातमपि दर्शयेत् । जानकर भी कभी कन्या देनेवाले को ' तुम्हारा यह जामाता ( दामाद ) -दरिद्र है ' तथा डाकू को ' यह धनी है ' एवं मारनेवाले को ' यह यहां मारने के
-भय से छिपा हुआ है ' ऐसा किसी भी व्यक्ति के बारे में न कहे ।
जायापत्योश्च पित्रोश्च! भ्रात्रोश्च स्वामिभृत्ययोः ॥। १०२ ॥
भगिन्योर्मित्रयोर्भेदं न कुर्याद् गुरुशिष्ययोः । स्त्री - पुरुषादि में भेद डालने का निषेध - स्त्री - पुरुष, माता - पिता, भाई - भाई, स्वामी- भृत्य, वहिन - बहिन, मित्र - मित्र, ' गुरु - शिष्य इन सबों के बीच परस्पर
-भेद न डलावे ।
न मध्याद् गमनं भाषाशालिनोः स्थितयोरपि ॥ १०३ ॥
सुहृदं भ्रातरं बन्धुमुपचर्यात् सदात्मवत् । वार्ता करते हुये पुरुषों के बीच जाने का निषेध — और परस्पर बात - चीत - करते हुये दो व्यक्तियों के बीच में से न निकले । और मित्र, भाई, बन्धु ( स्वजन ), इन सब के साथ सदा अपने समान व्यवहार करना चाहिये
।
गृहागतं क्षुद्रमपि यथार्हं पूजयेत् सदा ॥ १०४ ॥
अपन करना चा सपुत्र जिसके पुत्र लाकर स है और उनका प सपो राजा, जा हीन हैं • सप ' करने का दुष्ट स्वभ पहुँच से, बढ़ चाहिये शेष नही या जाने ( तो स्वयं CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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हो उसकी चालक या नहीं हैं । -संवन्धी 1 ( वस्तु ) पापकर्त्ता वाही न सिद्ध ले । दामाद ) मारने के २ ॥ ई - भाई, परस्पर 1 त - चीत ई, बन्धु हिये । तृतीयोऽध्यायः १४३ तदीयकुशलप्रश्नैः शक्त्या दानैर्जलादिभिः । अपने गृह में आये हुये किसी भी तुच्छ व्यक्ति का उसके साथ कुशल-पूछने से तथा यथाशक्ति उसे जलादि देने से यथायोग्य आदर - संमान प्रश्न । करना चाहिये सपुत्रस्तु गृहे कन्यां सपुत्रां वासयेन्नहि ॥ १०५ ॥
सभर्तृकां च भगिनीमनाथे ते तु पालयेत् । सपुत्र के लिये सपुन्न कन्या आदि को लाकर गृह में बसाने का निषेध-जिसके पुत्र हो वह अपने गृह में पुत्रयुक्ता कन्या एवं पतियुक्ता बहन को सदा के लिये न रखे क्योंकि इससे कलह होने की संभावना रहती है और यदि कन्या तथा बहन अनाथ अवस्था में हों तो अवश्य लाकर
उनका पालन करना चाहिये ।
' सर्पोऽग्निर्दुर्जनो राजा जामाता भगिनीसुतः । १०६ ॥
रोगः शत्रुर्ना मान्योऽप्यल्प इत्युपचारितः । सर्पादि को तुच्छ समझकर अपमान करने का निषेध - सर्प, अग्नि, दुर्जन, राजा, जामाता ( दामाद ), भानजा, रोग, शत्रु वे सब छोटे अर्थात् बालक या
हीन हैं इस ख्याल से कभी उनका तिरस्कार या उपेक्षा नहीं करनी चाहिये ।
क्रौर्यात्तदण्याद् दुःस्वभावात् स्वामित्वात् पुत्रिकाभयात् ॥ १०७ ॥
स्वपूर्वज पिण्डदत्वाद् वृद्धिभीत्या उपाचरेत् ।
ऋणशेषं रोगशेषं शत्रुशेषं न रक्षयेत् ॥ १०८ ॥
सर्पादि से संभल कर व्यवहार करने का तथा ऋणादिका समूल नाश करने का निर्देश - किन्तु क्रूर होने से सर्प से, तीक्ष्ण होने से अग्नि से, दुष्ट स्वभाव होने से दुर्जन से, स्वामी होने से राजा से, कन्या को क्लेश पहुँचाने के भय से जामाता से, अपने पूर्वजों को पिण्ड देनेवाला होने से भानजा से, बढ़ जाने से रोग से, भय होने से शत्रु से संभल कर ऐसा व्यवहार करना चाहिये जिससे वे हानि न पहुँचा सकें । और ऋण, रोग तथा शत्रु इनका शेष नहीं रखना चाहिये अर्थात् इन्हें समूल नष्ट कर देना चाहिये । याचकाद्यैः प्रार्थितः सन्न तीक्ष्णं चोत्तरं वदेत् तरकार्यं तु समर्थश्चेत् कुर्याद्वा कारयीत च याचकादि के साथ व्यवहार का प्रकार - याचक आदि जाने ( मांगने ) पर तीक्षण उत्तर नहीं देना चाहिये । और तो स्वयं उसके कार्य को कर दे या दूसरे से करा दे! दातॄणां धार्मिकाणां च शूराणां कीर्तनं सदा शृणुयात्तु प्रयत्नेन तच्छिद्रं नैव लक्षयेत्
।
॥ १० ९ ॥
से प्रार्थना किये यदि सामर्थ्यं हो
।
॥ ११० ॥
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शुक्रनीति: १४४ की कीर्त्ति सुनने का निर्देश - दाता, धार्मिक और शूर पुरुषों दाता आदि सुनना चाहिये, और इन सर्वो के का गुण - कीर्त्तन ( प्रशंसा ) सदा प्रयत्नपूर्वक । दोष की तरफ ध्यान नहीं देना चाहिये । A काले हित मिताहारविहारी विघसाशनः; अदीनात्मा च सुस्वप्नः शुचिः स्यात्सर्वेदा नरः ॥ १११ ॥
समय आदि पर परिमित भोजन आदि करने का निर्देश - मनुष्यों को सदा समय पर हितकर तथा उचित मात्रा के साथ आहार तथा विहार, देवादि को.. भोग लगाकर प्रसाद - भोजन, अकातर - स्वभाव, अच्छी तरह से सोना तथा. शरीर एवं मन से पवित्र रहना । इन सब विषयों को सदा करना चाहिये ।;
कुर्याद्विहारमाहारं निर्धारं विजने सदा ।
व्यवसायी सदा च स्यात् सुखं व्यायाममभ्यसेत् ॥ ११२ ॥
स्त्री - संभोगादि का एकान्त में करने का निर्देश - और सदा स्त्री - संभोग,. भोजन तथा मल - मूत्रादि का त्याग एकान्त में करना चाहिये । एवं सदा उद्योग करने में निरत रहना और सुखपूर्वक व्यायाम ( कसरत ) करना चाहिये ।
अन्नं न निन्द्यात् सुस्वस्थः स्वीकुर्यात् प्रीतिभोजनम् ।
आहारं प्रवरं विद्यात् षड्सं मधुरोत्तरम् ॥ ११३ ॥।
मधुरादि षड्रस अन्न को प्रीतिपूर्वक भोजन का निर्देश -- अन्न की निन्दा. नहीं करनी चाहिये एवं स्वस्थ रहने पर किसी के द्वारा आमन्त्रित प्रीतिभोज में भोजन करना स्वीकार करना चाहिये । तित, कटु, अम्ल, लवण, कषाय ( कसैला ), मधुर इन ६ रसों से युक्त एवं प्रधान रूप से मधुरान्न ( मिठाई ) युक्त जो भोजन होता है उसे सर्वोत्तम समझना चाहिये ।
विहारं चैव स्वस्त्रीभिर्वेश्याभिर्न कदाचन ।
नियुद्धं कुशलैः सार्धं व्यायामं नतिभिर्वरम् ॥ ११४ ॥
स्व - स्त्री के साथ विहार करने का निर्देश - और अपनी स्त्री के साथ विहार करना उचित है वेश्याओं के साथ कदापि नहीं उचित है । और निपुण ( मझ - विद्या में निपुण ) लोगों के साथ प्रणत होकर कुश्ती लड़ना उत्तम. न्यायाम है अतः इसे करना चाहिये ।
हित्वा प्राक्पश्चिमौ यामौ निशि स्वापो वरो मतः ।
दीनान्धपबधिरा नोपहास्याः कदाचन ॥ ११५ ॥
रात्रि में सोने के समय का एवं दीनादिक उपहास के निषेध का निर्देश-रान्नि में प्रथम तथा चतुर्थं प्रहरों को छोड़कर मध्य के द्वितीय तथा तृतीय प्रह में सोना उत्तम होता है । दीन, अन्धा, पड्डु तथा बहरा ऐसे लोगों का कभी उपहास ( हंसी ) नहीं करना चाहिये । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri कार्य में बुद्धि नही उचित है पराक्रम और यदि क है अन्यथा ( यश तथा स दुर्वचन लिये दुर्वचन राजा की अ असत् चित बात समझावे कि कार्यका करना चाहि तरुणी को स्वतन्त्र जाना चाहि अनर्थ का क वे सबसे अ मद १० श