शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 251–260

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 251–260

पृष्ठ 251

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सवचन से चित्त हो हा भी नहीं ० ॥ का निर्देश-या निरर्थक करे क्योंकि. ॥ निर्देश - जो ति समझा करते हैं उन्हें = में फर्क आ मनमुटाव मानते हैं ३४ ॥ जन्म से ही सा मित्र भी चित्त में चुभे नहीं होता ५ ॥ तक शत्रु तृतीयोऽध्यायः १६५ अपने से बल में अधिक रहे तब तक उसे कन्धे पर रखे अर्थात् उसका आदर औरे और जब समझ ले कि वह हीनबल हो गया तब उसे घड़े के समान पत्थर पर पटक कर नष्ट कर दे ।

न भूषयत्यलंकारो न राज्यं न च पौरुषम् ।

न विद्या न धनं तादृग् यादृक्सौजन्यभूषणम् ॥ २३६ ॥

' मनुष्य का भूषण सुजनता है ' इसका निर्देश — जैसा सुजनतारूपी भूषण मनुष्य को भूषित करता है वैसा अलङ्कार, राज्य, पौरुष ( पराक्रम ), बिद्या या धन नहीं भूषित करता है । अश्वे जवो वृपे धैर्य मणौ कान्तिः क्षमा नृपे । हावभावौ च वेश्यायां गायके मधुरस्वरः दातृत्वं धनिके शौर्य सैनिके बहुदुग्धता गोषु दमस्तपस्विषु विद्वत्सु वावदूकता सभ्येध्व पक्षपातस्तु तथा साक्षिषु सत्यवाकू अनन्य भक्तिभृत्येषु सुहितोक्तिश्च मन्त्रिषु मौनं मूर्खेषु च स्त्रीषु पातिव्रत्यं सुभूषणम् महादुभूषणं चैतद्विपरीतममीषु च || २३७ ॥ | ॥ २३८ ॥

| ॥ २३६ ॥

॥ २४० ॥

अश्वादिकों में वेगादिक गुणों की भूषणता तथा अन्यथा ( विपरीत ) होने पर दुर्भूषणता का निर्देश - घोड़े में अधिक वेग, बैल में अधिक भारवहन की सामर्थ्य, मणि में चमक, राजा में क्षमा, वेश्या में हाव - भाव, गानेवाले में मधुर स्वर, धनी में दान देने की शक्ति, सैनिक में शूरता, गायों में बहुत दुग्ध देना, तपस्वियों में इन्द्रियों का दमन करना, विद्वानों में बोलने की अच्छी शक्ति, सभासदों में किसी का पक्षपात न करना, साक्षियों ( गवाहों ) मैं सत्य चोलना ( सच्ची गवाही देना ), मृत्यों में स्वामी की अनन्य भक्ति, मन्त्रियों में राजा के लिये सुन्दर हितकर वचन बोलना, मूर्खों में मौन रहना, स्त्रियों में पतिव्रताधर्मं का पालन करना ही सुन्दर भूषण कहलाता है अर्थात् अन्यभूषण इन लोगों के लिये भूषण नहीं है । यदि इन सब घोड़े आदियों में वेगादि गुणों का अभाव हो तो उनकी सुन्दरता को अत्यन्त नष्ट करनेवाले होते हैं ।

गृहं बहुकुटुम्बेन दीपैर्गोभिः सुबालकैः ।

भात्येकनायकं नित्यं नैव निर्बहुनायकम् ॥ २४२ ॥

एक ही नायक आदि से ही परिवार आदि की शोभा का निर्देश - गृह में अब अधिक परिवार, बहुत से दीपकों का प्रकाश, बहुतसी गायें और बहुत से चालक सुन्दर हो तब उसकी नित्य शोभा होती है और जब तक गृह का CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 252

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शुक्रनीति: १६६ स्वामी एक व्यक्ति रहता है तभी तक उसकी शोभा बनी रहती है अनेक स्वामी होने पर शोभा नष्ट हो जाती है । न च हिंस्रमुपेक्षेत शक्तो हन्याच्च तत्क्षणे । हिंस्र पुरुषादि की उपेक्षा करने का निषेध - हिंसक पुरुषों या पशुओं की उपेक्षा नहीं करनी चाहिये किन्तु सामर्थ्य हो तो तत्काल उनको नष्ट कर

देना चाहिये क्योंकि देर करना अनिष्टकर होता है ।

पैशुन्यं चण्डता चौर्य मात्सर्यमतिलोमता ॥ २४२ ॥

असत्यं कार्यघातित्वं तथाऽलसकताऽप्यलम् ।

गुणिनामपि दोषाय गुणानाच्छाद्य जायते ॥ २४३ ॥

चुगुलखोरी आदि दोषों से गुणियों के गुणों के ढंक जाने का निर्देश— चुगुलखोरी, तीक्ष्णता ( अत्यन्त क्रोध ), चोरी, मत्सरता, अतिलोभ, असत्य भाषण, कार्यं नष्ट करना, अत्यन्त आलस्य ये सब दोप हैं अतः यदि ये गुणवानों को भी हों तो उनके सम्पूर्ण गुणों को ढंक देने वाले होते हैं । अर्थात् इन दोषों से वे निन्दा के पात्र बन जाते हैं ।

मातुः प्रियायाः पुत्रस्य धनस्य च विनाशनम् ।

बाल्ये मध्ये च वार्धक्ये महापापफलं क्रमात् ॥ ४४ ॥

बाल्यावस्था आदि में मां आदि के मरने में महापातक के फल का निर्देश -बाल्यावस्था में मां का, युवावस्था में प्रिया स्त्री का, वृद्धावस्था में पुत्र एवं धन का नष्ट हो जाना क्रमले ये सब प्राक्तन महापाप के फल हैं

श्रीमतामनपत्यत्वमघनानां च मूर्खता ।

स्त्रीणां षण्ढपतित्वं च न सौख्यायेष्टनिर्गमः ॥

दुःखप्रद विषयों का निर्देश - धनवानों को पुत्र न होना, स्त्रियों को नपुंसक पति मिलना, प्रिय वस्तुओं का अलग हो बातें सुख के लिये नहीं होती हैं अर्थात् दुःखप्रद होती हैं । मूर्खः पुत्रोऽथवा कन्या चण्डी भार्या दरिद्रता । 1 २४५ ॥ दरिद्रों को भूख, जाना, ये सब नीचसेवा ऋणं नित्यं नैतत्वट्कं सुखाय च ॥ २४६ ॥

सुखकारक न होनेवाली ६ वातों का निर्देश - १. २. कम्या, ३. अत्यन्त क्रोध करनेवाली स्त्री, ४. दरिद्रता, ५. अथवा नीच पुरुषों की सेवा तथा ६. नित्य ऋण लेना ये ६ नहीं होती हैं अर्थात् इनसे नित्य मनुष्य दुःखी रहता है ।

नाध्यापने नाध्ययने न देवे न गुरौ द्विजे ।

न कलासु न सङ्गीते सेवायां नार्जवे स्त्रियाम् ॥

न शौर्ये न च तपसि साहित्ये रमते मनः । मूर्ख पुत्र अथवा नीच जातिवाल बातें सुखकारक २४७ ॥ जीवन और देव सरलता, रमता ( ल पशु है । खल सकनेवाला वाला, ऊपर आशा होने का नि आशा बढ़ी पर्याप्त नही नहीं हो भाशा भी वैस धूर्त प अत्यन्त सा कार्य सिद्ध प्रीतिक पालन करत की भाँति CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 253

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- है अनेक पशुओं की ष्ट ही कर ॥ ॥ निर्देश-भ, असत्य गुणवान इन दोषों ४ ॥ 7 निर्देश-- पुत्र एवं 11 को भूख, T, ये सब ६ ॥ पुत्र अथवा जातिवालों सुखकारक ॥ तृतीयोऽध्यायः १६७ यस्य मुक्तः खलः किं वा नररूपपशुश्च सः ॥ २४८ ॥

जीवन्मुक्त, खल या पशु के तुल्य के लक्षण -- जिसका मन पढ़ाने या पढ़ने में और देवता, गुरु, ब्राह्मण, चित्रकला आदि कला, सङ्गीत, सेवा ( नौकरी ), सरलता, स्त्री, शूरता, तपस्या या साहित्य इनमें से किसी एक में भी नहीं रमता ( लगता ) है वह या तो जीवन्मुक्त या खल अथवा मनुष्य रूप में पशु है । अन्योदयासहिष्णुश्च छिद्रदर्शी विनिन्दकः । द्रोहशीलः स्वान्तमलः प्रसन्नास्यः खलः स्मृतः ॥ २४६ ॥:

खल पुरुष के लक्षण — जो दूसरे के अभ्युदय ( तरक्की ) को नहीं सह सकनेवाला, दोष देखनेवाला, निन्दा करनेवाला, द्रोह रखनेवाला, मलिन हृदय-बाला, ऊपर प्रसन्नता दिखाने वाला होता है वह ' खल ' कहलाता है ।

एकस्यैव न पर्याप्तमस्ति यद् ब्रह्मकोशजम् ।

आशया वर्द्धितस्यास्ति तस्याल्पमपि पूर्तिकृत् ॥ २५० ॥

आशाबद्ध लोगों के लिये जगत् की सम्पूर्ण वस्तु की प्राप्ति से भी कमी बोध होने का निर्देश - ब्रह्माण्ड के अन्दर विद्यमान जितनी वस्तुयें हैं वे सभी जिसकी आशा बढ़ी हुई है ऐसे अकेले एक पुरुष की थोड़ी भी इच्छापूर्ति के लिये पर्याप्त नहीं हैं अर्थात् उनकी इच्छा की पूर्ति ब्रह्माण्ड की सारी वस्तुओं से भी नहीं हो सकती है । करोत्यकार्य साशोऽन्यं बोधयत्यनुमोदते । आशा से युक्त पुरुष न करने योग्य कार्य को भी स्वयं करता है और अन्य

को भी वैसे कार्य करने के लिये समझाता है तथा अनुमोदन करता है ।

भवन्त्यन्योपदेशार्थं धूर्ताः साधुसमाः सदा ॥ २५१ ॥

स्वकार्याथ प्रकुर्वैन्ति ह्यकार्याणां शतं तु ते । धूर्त पुरुष के कर्मों का निर्देश— धूर्त लोग दूसरे को उपदेश देने के लिये अत्यन्त साधुपुरुषों के समान आचरण करते हैं किन्तु वे ही धूर्त स्वयं अपना

कार्य सिद्ध करने के लिये सैकड़ों कुकृत्यों को कर डालते हैं ।

पित्रोराज्ञां पालयति सेवने च निरालसः ॥ २५२ ॥

छायेव वर्तते नित्यं यतते चागमाय वै ।

कुशलः सर्वविद्यासु स पुत्रः प्रीतिकारकः ॥ २५३ ॥

दुःखदो विपरीतो यो दुर्गुणो धननाशकः । प्रीतिकारक व दुःखदायी पुत्र के लक्षण - जो पुत्र माता - पिता की आज्ञा का पालन करता है और उनकी सेवा करने में आलस्य नहीं करता है बल्कि छाया की भाँति सदा उनका अनुगमन करता है, धन या विद्या का अर्जन करने के CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 254

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शुक्रनीति: १६८ लिये नित्य प्रयत्नशील रहता है तथा सभी विद्याओं में निपुण होता है, वही ( पुत्र ) माता - पिता का आनन्द बढ़ानेवाला होता है । और जो माता - पिता की के विपरीत व्यवहार करनेवाला, दुर्गुणों से युक्त तथा धन नष्ट करनेवाला आज्ञा

होता है वह दुःखदायी होता है ।

पत्यौ नित्यं चानुरक्ता कुशला गृहकर्मणि ॥ २५४ ॥

पुत्रप्रसूः सुशीला या प्रिया पत्युः सुयौवना । प्रीति देनेवाली स्त्री के लक्षण - जो स्त्री अपने पति में नित्य अनुराग रखनेवाली, गृहकार्य में चतुर, पुत्र पैदा करनेवाली, सुशीला और सुन्दर

यौवनवाली होती है, वह पति की प्यारी होती है ।

पुत्रापराधान् क्षमते या पुत्रपरिपोषिणी ॥ २५५ ॥

सा माता प्रीतिदा नित्यं कुलटाऽन्याऽतिदुःखदा । आनन्ददायिनी तथा दुःखदायिनी माता के लक्षण - जो माता पुत्रों के अपराधों को क्षमा करनेवाली एवं उनका परिपोषण करनेवाली है वह नित्य आनन्द देनेवाली होती है, इससे अन्य जो माता कुलटा ( व्यभिचारिणी ) है

यह अत्यन्त दुःख देनेवाली होती है ।

विद्यागमार्थं पुत्रस्य वृत्त्यर्थ यतते च यः ॥ २५६ ॥

पुत्रं सदा साधु शास्ति प्रीतिकृत्स पिताऽनृणी । आनन्ददायक पिता के लक्षण - जो पिता पुत्र को विद्वान बनाने के लिये एवं उसकी स्थायी जीविका रखने के लिये प्रयत्न करता है और पुत्र को दा अच्छी शिक्षा देता रहता है एवं अपने ऊपर किसी का ऋण नहीं रखता है वह आनन्ददायक होता है अथवा वह आनन्ददायक तथा पुत्र ऋण से उऋण

होता है ।

यः साहाय्यं सदा कुर्यात् प्रतीपन्न वदेत् क्वचित् ॥ २५७ ॥

सत्यं हितं वक्ति याति दत्ते गृह्णाति मित्रताम् । मित्र के लक्षण - जो व्यक्ति सदा सहायता करे और कभी प्रतिकूल बात न कहे तथा सस्य एवं हितकर वचनों का उपदेश करे और धनादि दे तथा स्वयं प्रेमवश ले भी वही मित्र बन जाता है, अर्थात् जो मित्र होते हैं उनके ये

लक्षण हैं । 2

नीचस्यातिपरिचय ह्यन्यगेहे सदा गतिः ॥ २५८ ॥

जातौ संघे प्रातिकूल्यं मानहान्यै दरिद्रता । मानहानिकारक कार्यों का निर्देश -नीच पुरुषों के साथ अस्यन्त घनिष्ठता, दूसरे के घर बराबर जाना, जिस जाति में स्वयं हो उस ( ब्राह्मणादि ) जाति के लोगों के दरिद्रता ये होती है । मैंने स निषेध - ' इ सर्प तथा हि क्योंकि ये स मित्र नहीं ह दुःखक फेर लेना, मैं बहुत स सदा निवास किसी से म स्त्रियों ही सुन्दर यदि वह य है अर्थात् स्त्री च प्यार करने यथेष्ट प्यार व्यवस CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 255

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है, ता - पिता की करनेवाला ॥ न्य अनुराग सुन्दर 11 तापुत्रों के वह नित्य रणी ) है 11 ने के लिये ता है वह से उऋण २७ ॥ तिकूल बात उनके ये ॥ द ) जाति तृतीयोऽध्यायः १६६ के लोगों के अथवा जिस समूह में हो उसके साथ प्रतिकूल आचरण करना एवं ये सब मानहानि करनेवाले हैं अर्थात् इन सबों के होने से मानहानि दरिद्रता

होती है ।

व्याघ्रामिसर्प हिंस्राणां नहि सङ्घर्षणं हितम् ॥ २५३ ॥

सेवितत्वात्तु राज्ञो नैते मित्राः कस्य सन्ति किम् । मैंने सेवा की है यह समझकर राजादि के साथ अधिक संघर्षं रखने का विषेध — ' इन सर्वो की मैंने सेवा की है ' इस साहस से सजा, व्याघ्र, अग्नि, सर्प तथा हिंसक पुरुष इनके साथ अधिक संघर्ष रखना हितकर नहीं होता है । क्योंकि ये सब राजा व्याघ्रादि क्या किसी के मित्र होते हैं? अर्थात् किसी के

मित्र नहीं होते हैं, इनको रुष्ट होते देर नहीं लगता है ।

दौर्मनस्यं च सुहृदां सुप्राबल्यं रिपोः सदा ॥ २६० ॥

विद्वत्स्वपि च दारिद्रयं दारिद्रये बह्नपत्यता ।

धनिगुणिवैद्यनृपजलहीने सदा स्थितिः ॥ २६१ ॥

दुःखाय कन्यका s ध्येका पित्रोरपि च याचनम् । दुःखकारक कार्यों का निर्देश - मित्रों या बन्धुओं का दुःखी होकर दिल फेर लेना, शत्रुओं की सदा प्रवलता, विद्वानों की दरिद्रता, दरिद्रता की अवस्था में बहुत सन्तान होना, धनिक, गुणी, वैद्य, राजा तथा जल से रहित देश में सदा निवास करना, माता - पिता के लिये एक भी कन्या का उत्पन्न होना और

किसी से मांगना ये सब दुःखकारक होते हैं ।

सुरूपः सधनः स्वामी विद्वानपि बलाधिकः ॥ २६२ ॥

न कामयेद्यथेष्टं यत् स्त्रीणां नैव सुसौख्यकृत् ।

यो यथेष्टं कामयते स्त्री तस्य वशगा भवेत् ॥ २६३ ॥

स्त्रियों को पति के प्रेम से ही अधिक सुख मानने का निर्देश - पति भले ही सुन्दर स्वरूप, घन तथा विद्या से युक्त एवं अधिक बलशाली हो किन्तु यदि वह यथेष्ट प्रेम न करे तो स्त्रियों के लिये सुन्दर सुखकारक नहीं होता है ' है अर्थात् स्त्रियां स्वामी के प्रेम से ही अधिक सुख मानती हैं । सन्धारणाल्लाल नाच्च यथा याति वशं शिशुः । स्त्री वशवर्तिनी बने इसके उपाय- -जैसे गोदी में उठाकर लेने और लाड़-प्यार करने से बच्चे वश में हो जाते हैं उसी भांति जो पति जिस स्त्री का

यथेष्ट प्यार करता है वह स्त्री उसके वशीभूत हो जाती है ।

कार्यम् तत्साधकादींश्च तद्व्ययं सुविनिर्गमम् ॥ २६४ ॥

विचिन्त्य कुरुते ज्ञानी नान्यथा लध्वपि क्वचित् । व्यवसाय में साधन, व्यय, लाभ आदि का विचारकर प्रवृत्त होने का CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 256

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१७० शुक्रनीतिः निर्देश - जानकार व्यवसायी किसी कार्य ( व्यवसाय ) को आरम्भ कर यह कार्य कैसा है? इससे साधन ( उपाय ) हैं? इसमें कितना योग्य व्यय? इसकी निकास ( खपत ) कैसी है अथवा जो व्यय होगा उससे लाभ, रोगी क कैसा है? इन सबों को भलीभांति विचार करके पश्चात् कार्य करता है अन्यथा को रक्षा बिना विचार किये कोई छोटा भी कार्य कभी नहीं करता है । को पुरुष सदा हूँ न च व्ययाधिकं कार्य कर्तुमीहेत पण्डितः ॥ २६५ लाभाधिक्यं यत्क्रियते स सेवेद् व्यवसायिभिः । मूल्यं मानं च पण्यानां याथात्म्यान्मृग्यते सदा ॥ २६६ ॥ मूर्ख

अधिक व्ययवाले कार्यों को न करने तथा लाभवाले कार्यों को करने का करता है, क निर्देश - विज्ञजन को अधिक व्यय और स्वल्प लाभवाले कार्य करने की इच्छा शराव आदि नहीं रखनी चाहिये 1 । और जिसमें अधिक लाभ हो ऐसे कार्य व्यवसायियों को इष्टकार्य करना चाहिये अर्थात् इससे अन्य कम लामाले कार्य छोड़ देने चाहिये और सदा बेचने योग्य द्रव्यों के मूल्य तथा तौल या संख्या का यथार्थ रूप से ख्याल रखना चाहिये । सवगु तपः स्त्रीकृषिसेवा सूपभोग्ये नापि भक्षणे । तमोगुणी, छ हितः प्रतिनिधिनित्यं कार्येऽन्ये तं नियोजयेत् ॥ २६७ ॥ रजोगुणी हो

तपस्यादि में प्रतिनिधि बनाने में हितकारिता के अभाव का निर्देश-तपस्या करना, स्त्री ( पत्नी ), कृषि ( खेती ), सेवा, किसी वस्तु का उपभोग करना, भोजन करना । इन सबों के लिए अपना प्रतिनिधि किसी को हितकर नहीं है अर्थात् हानि की सम्भावना है । इससे अन्य कार्यों में निधि की नियुक्ति ठीक होती है ।

निर्जनत्वं मधुरभुग् जारचोरः सदेच्छति ।

साहाय्यं तु बलिद्विष्टं वेश्या घनिकमित्रताम् ॥ २६८ ॥

कुनृपश्च छलं नित्यं स्वामिद्रव्यं कुसेवकः ।

तत्त्वं तु ज्ञानवान् दम्भं तपोऽग्नि देवजीवकः ॥। २६ ९

मधुरभोजी आदिको निर्जनता आदि की इच्छा रखने का निर्देश -बनाना स्वकम प्रति- ब्राह्मण ही होता है । ( न्यून ) ह ॥ स्वधम मिठाई. धर्म में स्थि खानेवाला, स्त्री - लम्पट ( ब्यभिचारी ), चोर ये सब सदा निर्जनता ( एकान्त ( अपने घर - जहां पर कोई दूसरा न रहे ) चाहते हैं । वली शत्रु से आक्रान्त हुआ पुरुष आचरण क . सहायता की, वेश्या - घनियों के साथ मित्रता की, दुष्ट राजा - छल की, दुष्ट नौकर स्वामी के धन की, ज्ञानी पुरुष तस्व जानने की, पुजारी ( वेतन लेकर देवपूजा करनेवाला ), दम्भ (. पाखण्ड ), तप और अग्नि की नित्य इच्छा करते हैं । धर्म क · योग्या कान्तं च कुलटा जारं वैद्यं च व्याधितः । अपने धर्म धृतपण्यो महार्घत्वं दानशीलं तु याचकः ॥ २७०, ॥ ३ कुटुम्ब का CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 257

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करने के प्रथम इसमें कितना उससे छाम अन्यथा ॥ २६५ २६६ ॥ को करने का रने की इच्छा नवसायियों को चाहिये और रूप से ख्याल ६७ ॥ निर्देश-काउपभोग को बनाना यों में प्रति ६ ॥ २६ ९ ॥ ईश - मिठाई. ( एकान्त हुआ पुरुष दुष्ट नौकर कर देवपूजा रते हैं । तृतीयोऽध्यायः १७१ रक्षितारं मृगयते भीतश्छिद्रं तु दुर्जनः । योग्य कुलवधू स्त्री पति को, कुलटा स्त्री- जार ( परस्त्रीगामी उपपति ) रोगी वैद्य को, दूकानदार महंगाई को, याचक- दानशील को, भयभीत , रक्षा करनेवाले को भौर दुर्जन छिद्र ( दोष या बुराई करने के अवसर ) पुरुष सदा हूँढ़ता रहता है । को चण्डायते विवदते स्वपित्यश्नाति मादकम् ॥ २७१ ॥

करोति निष्फलं कर्म मूर्खो वा स्वेष्टनाशनम् । मूर्ख जनों के कृत्य - — मूर्खजन कमी अत्यन्त क्रोधी के समान आचरण करता है, कभी झगड़ा करता है, कभी अधिक सोता है, कभी मादक ( भाग-शराव आदि ) द्रव्य भक्षण करता है, कभी कार्य को निष्फल और कभी अपना

इष्ट कार्य या वस्तु को नष्ट कर देता है ।

तमोगुणाधिकं क्षात्रं ब्राह्मं सत्त्वगुणाधिकम् ॥ २७२ ॥

अन्यद्रजोधिकं तेजस्तेषु ' सत्त्वाधिकं वरम् । गुणी तेज की सर्वाधिक श्रेष्ठता का निर्देश- चत्रियों का तेज अधिक तमोगुणी, ब्राह्मणों का तेज अधिक सत्वगुणी, इससे अन्य वैश्यों का तेज अधिक

रजोगुणी होता है । इन सबों में अधिक सत्वगुणी तेज ही श्रेष्ठ होता है ।

सर्वाधिको ब्राह्मणस्तु जायते हि स्वकर्मणा ॥ २७३ ॥

तत्तेजसोऽनुतेजांसि सन्ति च क्षत्रियादिषु । स्वकर्म से ब्राह्मण की सर्वाधिक महत्ता का निर्देश — और इन सबों में ब्राह्मण ही अपने अध्ययन - अध्यापनादि ६ कर्मों के द्वारा सवये अधिक श्रेष्ठ होता है । चत्रियादि अन्य वर्णों में जो तेज हैं वे ब्राह्मण

( न्यून ) हैं ।

स्वधर्मस्थं ब्राह्मणं हि दृष्ट्वा बिभ्यति चेतरे ॥

क्षत्रियादिर्नान्यथा स्वधर्मं चातः समाचरेत् । स्वधर्मस्थ ब्राह्मण से क्षत्रियादि के डरने का निर्देश -धर्म में स्थित देखकर अन्य क्षत्रियादि जाति के लोग उससे ( अपने धर्म से च्युत रहने पर ) नहीं डरते हैं । अतः ब्राह्मण आचरण करना चाहिये । के तेज से हीन २७४ ॥ ब्राह्मण को अपने डरते हैं अन्यथा को अपने धर्म का न स्यात् स्वधर्महानिस्तु यया वृत्त्या च सा वरा ॥ २७५ ॥

स देशः प्रवरो यत्र कुटुम्ब परिपोषणम् । धमं हानि न पहुँचानेवाली वृत्ति की श्रेष्ठता - जिस आजीविका से अपने धर्म की हानि न हो वही आजीविका श्रेष्ठ है 1 । जिस देश में अपने कुटुम्ब का भलीभांति पोषण हो वहीं देश सबसे उत्तम है ।. CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 258

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१७२ शुक्रनीति: कृषिस्तु चोत्तमा वृत्तिर्या सरिन्मातृका मता ॥ २७६ ॥

मध्यमा वैश्यवृत्तिश्च शूद्रवृत्तिस्तु चाधमा । कृषिवृत्ति की सर्वाधिक उत्तमता - नदी से सीची जानेवाली कृषि आजीविका है । वैश्यवृत्ति ( व्यवसाय - गोरक्षा आदि ) ( खेती ) उत्तम मध्यम आजीविका है । शूद्रवृत्ति ( सेवा ) अधम आजीविका है । दूर रह याच्याऽघमतरा वृत्तिर्ह्यत्तमा सा तपस्विषु ॥ २७७ ॥ बुद्धिमान व्य

क्वचित्सेवोत्तमा वृत्तिर्धर्मशीलनृपस्य च । स्थापित है । मिक्षा की अधमता तथा क्वचित् मिक्षा व सेवा की भी उत्तमवृत्तिता— समान हैं । भिक्षावृत्ति अत्यन्त अभ्रम आजीविका है किन्तु वही तपस्वियों लिये उत्तम तरह से उ है । कहीं पर धर्मशील राजा की सेवा भी उत्तम आजीविका मानी जाती है । साथियों के आध्वर्यवादिकं कर्म कृत्वा या गृह्यते भृतिः ॥ २७८ ॥

सा कि महाधनायैष वाणिज्यमलमेव किम् । आध्वर्यवादि कर्मों से महाधनी न बन सकने का निर्देश - यजुर्वेदोक वेदादि . अध्वर्यु सम्बन्धी कर्म करके जो दक्षिणास्वरूप में वेतन लिया जाता है क्या वह अनुवाक ( महाधन की प्राप्ति के लिये पर्याप्त होता है? अर्थात् कभी नहीं क्योंकि वह थोड़ा होता है | और वाणिज्य ( ( व्यवसाय ) भी क्या महाधन के लिये पर्याप्त सेमारी हुई

होता है? अर्थात् नहीं ।

राजसेवां विना द्रव्यं विपुलं नैव जायते ॥ २७६ ॥

8 राजसेवाऽतिगहना बुद्धिमद्भिर्विना न सा ।

कर्तुं शक्या चेतरेण ह्यसिधारेव सा सदा ॥ २८० ॥

विना राजसेवा के विपुल धन प्राप्ति न होने एवं राजसेवा की अतिशय कठिनता का निर्देश – वस्तुतः बिना राजसेवा के विपुल धन की प्राप्ति नहीं होती है किन्तु राजसेवा अत्यन्त गहन ( कठिन ) है और बुद्धिमान को छोड़कर अन्य मूर्खजनों के द्वारा वह नहीं की जा सकती है क्योंकि वह तलवार की धार के समान तीच्ण है उसपर मूर्ख लोग सदा नहीं चल सकते हैं । व्यालाही यथा व्यालं मन्त्री मन्त्रबलान्नृपम्

करोत्यधीनं तु नृपे भयं बुद्धिमतां महत् ।

राजाओं के साथ सर्प की भांति सतर्कता से व्यवहार करने ॥ २६१ ॥

सर्प पकड़नेवाला जैसे मन्त्र के बल से सांप को अपने अधीन का निर्देश -अन्त्री को भी अपने मन्त्र अर्थात् करता है वैसे ही को अधीन मन्त्रणा ( उचित सलाह ) के बल से राजा करना चाहिये इसीसे राजा बुद्धिमानों से अधिक भय रखना चाहिये अर्थात् सतर्कता से व्यवहार करना चाहिये! बिना नीति प्रथम पहले दरिद्र चढ़ना अच्छ हो तो दुःख मृताप होकर मर ज पैदल चलन होता है । चलने-CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 259

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 259 का मूल पृष्ठ
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२७६ ॥ कृषि ( खेती ) दि ) मध्यम ७७ ॥ तमवृत्तिता-- लिये उत्तम

जाती है ।

२८ ॥

- यजुर्वेदोक क्या वह क्योंकि वह लिये पर्याप्त 11 G ॥ की अतिशय प्राप्ति नहीं को छोड़कर तलवार की 1 २५१ ॥ निर्देश-वैसे ही बल से राजा भय रखना तृतीयोऽध्यायः १७३

ब्राह्मं तेजो बुद्धिमत्सु क्षात्त्रं राज्ञि प्रतिष्ठितम् ।

आरादेव सदा चास्ति तिष्ठन् दूरेऽपि बुद्धिमान् ॥ २८२ ॥

बुद्धिपाशैर्बन्घयित्वा सन्ता समीपस्थोऽपि दूरेऽस्ति ह्यप्रत्यक्षसहायवान् ॥ २८३ ॥

दूर रहते हुई भी समीपस्थ की भांति कार्य करनेवालों का निर्देश -बुद्धिमान व्यक्तियों में ब्राह्मण सम्बन्धी तेज तथा राजा में क्षत्रिय सम्बन्धी तेज स्थापित है । अतः बुद्धिमान लोग दूर रहते हुये भी सदा समीप में ही रहने के समान हैं । और वह बुद्धिरूपी रस्सी से राजा या शत्रु को बांधकर तरह से उसको पीटता है और अपने पास खींच लेता है । एवं छिपकर अपने साथियों के साथ समीप में रहता हुआ दूर रहने के समान है ।

नानुवाकहता । बुद्धिर्व्यवहारक्षमा भवेत् ।

अनुवाकहता या तु न सा सर्वत्र गामिनी ॥ २८४ ॥

वेदादि के पण्डितों का विना नीतिशास्त्र के चतुर न बनने का निर्देश-अनुवाक ( वेद का एक विभाग विशेष ) की आलोचना करने से मारी गई. बुद्धि लौकिक व्यवहार समझने में समर्थ नहीं होती है क्योंकि वह अनुवाक सेमारी हुई होने से सर्वत्र घुसने वाली नहीं होती । अर्थात् वेदादि के पण्डित बिना नीतिशास्त्र के लोकव्यवहार में चतुर नहीं हो सकते हैं ।

आदौ वरं निर्धनत्वं धनिकत्वमनन्तरम् ।

तथादौ पादगमनं यानगत्वमनन्तरम् ॥ २८५ ॥

सुखाय कल्पते नित्यं दुःखाय विपरीतकम् । प्रथम निर्धनतादि के बाद घनी आदि होने में सुख - प्राप्ति का निर्देश -पहले दरिद्र होना पीछे धनी होना एवं पहले पैदल चलना बाद में सवारी पर चढ़ना अच्छा होता है क्योंकि इससे सुख मिलता है और यदि इससे विपरीत हो तो दुःख होता है ॥ वरं हि त्वनपत्यत्वं मृतापत्यवतः सदा ॥ २८६ ॥

दुष्टयानात्पादगमो ह्यौदासीन्यं विरोधतः । मृतापत्यता आदि से अनपत्यता आदि की श्रेष्ठता का निर्देश - सन्तान होकर मर जाने की अपेक्षा निःसन्तान रहना, दुष्ट घोड़े आदि की सवारी से पैदल चलना और झगड़ा करने से तटस्थ ( उदासीन ) बना रहना अच्छा

होता है ।

वरं देशाच्छादनतश्चर्मणा पादगूहनम् ॥ २८७ ॥

ज्ञानलव दौविंदग्ध्यादज्ञता प्रवरा मता । चलने - फिरने के प्रदेश को चमड़े से ढंक देने की अपेक्षा चमड़े का जूता CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 260

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 260 का मूल पृष्ठ
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१७४ शुक्रनीति: पावों में पहन लेना और थोड़े से ज्ञान से ही चतुर बनने से मूर्ख बनना गृहस्थि अच्छा होता है । स परगृहनिवासाद्धचरण्ये निवसनं वरम् ॥ २८८ ॥ गुणवान नौकर

प्रदुष्टभार्यागार्हस्थ्याद्भक्ष्यं वा मरणं वरम् । अच्छी पुरुषो और दूसरे के गृह में निवास करने से जंगल में रहना और अत्यन्त गृहस्थ के स्त्री से गृहस्थी चलाने की अपेक्षा भीख मांगना यां मर जाना अच्छा. पर सुख

दुष्टा है ।

मैथुनमृणं गर्भाधानं स्वामित्वमेव च ॥ २८६ ॥

खल सख्यमपथ्यं तु प्राक्सुखं दुःखनिर्गमम् | अन्तःप प्रथम सुखकर पश्चात् दुःखकर विषयों का निर्देश - कुत्तों का मैथुन करना, नपुंसक देख ऋण लेना, गर्भाधान होना, स्वामी बनना, दुष्टों के साथ मित्रता करना और अन्तःपुर ( कुपथ्य सेवन करना, ये सभी पहले सुखकर प्रतीत होते हैं पश्चात् दुःखदायी यदि युवा प

होते हैं ।

कुमन्त्रिभिर्नृपो रोगी कुवैद्यैः कुनृपैः प्रजा ॥ २६० ॥

कुसन्तत्या कुलं चात्मा कुबुद्धचा हीयतेऽनिशम् । कुमन्त्री आदिकों से राजादिकों के नाश का निर्देश - दुष्ट मन्त्रियों से समय राजा, अनाड़ी वैद्यों से रोगी, दुष्ट राजाओं से प्रजा, दुष्ट सन्तान से कुछ, कुबुद्धि से आत्मा इन सर्वो की दिन पर दिन उत्तरोत्तर अवस्था बिगड़ती

जाती है ।

हस्त्यश्ववृषबाली शुकानां शिक्षको यथा ॥ २ ९ १ ॥

तथा भवन्ति ते नित्यं संसर्गगुणधारकाः । शिक्षकानुसार हस्त्यादि का सद्गुणादि के धारण करने का निर्देश - हाथी, घोड़ा, बैल, बालक, स्त्री तथा सुग्गा इन सबों के जैसे शिक्षक होते हैं उसके

अनुसार ही वे संसर्गवश अच्छा या बुरा गुण धारण करनेवाले हो जाते हैं ।

स्याज्जयोऽवसरोक्त्या सद्वसनैः सुप्रसिद्धता ॥ २६२ ॥

सभायां विद्यया मानस्त्रितयं त्वधिकारतः । अधिकार प्राप्त होने पर स्वयं प्राप्त होनेवाली ३ बातें - उचित अवसर आने पर ही कहने या करने से किसी कार्य की सिद्धि होती है और अच्छे वर्षों के पहनने से लोगों के बीच में सुप्रसिद्धि एवं सभा में विद्या से मान ( प्रतिष्ठा ) प्राप्त होता है । किन्तु अधिकार प्राप्त होने पर ( स्वामी बनने पर )

उक्त ३ तीनों यातें स्वयं प्राप्त हो जाती हैं ।

सुभार्या सुष्ठु चापत्यं सुविधा सुधनं सुहृत् ॥ २ ९ ३ ॥

सुदासदास्यौ सद्देहः सद्वेश्म सुनृपः सदा ।

गृहिणां हि सुखायालं दशैतानि न चान्यथा ॥ २६४ ॥

नियुक्ति कर समय बांधे सदृश व्यवह में अपने को देने के लिये मनुष्य चाहिये ( प प्रवास समय मनुष ढोनेवाला विद्या, आ होते हैं । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri