शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 261–270
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 261–270
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मूर्ख बना और अत्यन्त & 11 मैथुन करना, करना और दुःखदायी G ॥ मन्त्रियों से न से कुछ, या बिगड़ती ३ ॥ देश- हाथी, होते हैं उसके
जाते हैं ।
२ ॥
चित अवसर और अच्छे या से मान बनने पर ) ॥ ॥ तृतीयोऽध्यायः १७५. के सुखदायक विषयों का निर्देश -- गुणवती सुशीला स्त्री गृहस्थियों, सुन्दर सन्तान, उत्तम विद्या, उत्तम घन, अच्छा मित्र, अच्छे नौकर गुणवान अच्छी नौकरानी, सुन्दर रोगरहित शरीर, सुन्दर गृह, अच्छा राजा ये १० बातें, पुरुषों के लिये सदा अत्यन्त सुखदायक होती हैं । इनसे विपरीत होने गृहस्थ के स्थान पर दुःख देनेवाली होती हैं ।
• पर सुख वृद्धाः सुशीला विश्वस्ताः सदाचाराः स्त्रियो नराः ।
क्लीबा वाऽन्तःपुरे योग्या न युवा मित्रमप्युत ॥ २६५ ॥।
अन्तःपुर में नियुक्त करने योग्य पुरुषों के लक्षण – जो स्त्री पुरुष या नपुंसक देखने में वृद्ध, सुशील, विश्वासी और सदाचारी हो उन्हीं को अन्तःपुर ( रानिवास ) में नियुक्त करना उचित होता है । किन्तु मित्र भी यदि युवा पुरुष हो तो उसकी नियुक्ति अन्तःपुर के लिये अनुचित होती है ।
कालं नियम्य कार्याणि ह्याचरेन्नान्यथा क्वचित् ।
गवादिष्वात्मवज्ज्ञानमात्मानं चार्थधर्मयोः ॥ २६६ ॥
नियुञ्जीतान्नसंसिद्धयै मातरं शिक्षणे गुरुम् । समय बांधकर कार्य करने आदि का एवं अर्थ और धर्म में आत्मादि की नियुक्ति करने का निर्देश- - समय बांध कर कार्य करना चाहिये, अन्यथा बिना समय बांधे कभी कार्य नहीं करना चाहिये । और आदि पशुओं में भी अपने सदृश व्यवहार ( पालन आदि ) करना चाहिये, अर्थ और धर्म के उपार्जन मैं अपने को लगाना चाहिये एवं भोजन बनाने के लिये माता की तथा शिक्षा
देने के लिये गुरु की नियुक्ति करनी चाहिये ।
गच्छेदनियमेनैव सदैवान्तःपुरं नरः ॥ २ ९ ७ ॥
मनुष्य को सदैव अन्तःपुर में बिना समय बांधे ( एकाएक ) पहुँच जाना चाहिये ( ऐसा करने से दुराचार होने का भय नहीं रहता है ) ।
भार्याऽनपत्या सद्यानं भारवाही सुरक्षकः ।
परदुःखहरा विद्या सेवकश्च निरालसः ॥ २ ९ ८ ॥
षडेतानि सुखायालं प्रवासे तु नृणां सदा । प्रवास के समय में सुखदायी अनपस्य भार्यादि ६ का निर्देश – प्रवास के समय मनुष्यों को अपने साथ में बिना सन्तान की स्त्री, अच्छी सवारी, ढोनेवाला कुळी, रक्षा करनेवाला सिपाही, दूसरों के दुःख को दूर करनेवाली विश्वा, आलस्थरहित ( फुर्तीला ) नौकर ये ६ सदा अत्यन्त सुखदायक
होते हैं ।
मार्ग निरुध्य न स्थेयं समर्थेनापि कर्हिचित् ॥ ६ ९९ ॥
सद्यानेनापि गच्छेन्न हट्टमार्गे नृपोऽपि च । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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· शुक्रनीति: १७६ राजा को भी शान्त घोड़े आदि से भी बाजार के अन्दर न जाने वस्तुतः निर्देश - सामर्थ्यशाली होकर भी कभी मार्ग रोक कर नहीं खड़ा का भी वश चाहिये । राजा को भी शान्त घोड़े आदि की सवारी से भी बाजार के अन्दर रहना को अवश्य नहीं क
भीड़ में नहीं जाना चाहिये ।
ससहायः सदा च स्यादध्वगो नान्यथा क्वचित् ॥ ३०० ॥
समीपसन्मार्गजलाभयग्रामेऽध्वगो वसेत्त् ।
तथाविधे वा विरमेन्न मार्गे विपिनेऽपि न ॥ ३० ९ ॥
पथिकों को यात्रा के समय कर्तव्या कर्त्तव्य विपयों का निर्देश – पथिक को साथी से युक्त सदा यात्रा करनी चाहिये, इससे अन्यथा अर्थात् सा के कभी नहीं यात्रा में रहना चाहिये । और उसे मार्ग के समीप " सुविधा से युक्त तथा किसी प्रकार के भय से रहित ग्राम जायगा ) । स्वदुर को लोकत दुर्गुण हैं । ठहरना चाहिये । भयरहित, जलयुक्त जो मार्ग न हों वहां पर एवं जंगल में विश्राम नहीं करना चाहिये ।
अत्यनं चानशनमतिमैथुन मेव च ।
अत्यायासश्च सर्वेषां द्राग्जराकरणं महत् ॥ ३०२ ॥
अत्ययासोहि विद्यासु जराकारी कलासु च । शीघ्र वृद्धता लाने वाले विषयों का निर्देश – अत्यन्त भ्रमण, उपवास, अत्यन्त मैथुन, अत्यन्त परिश्रम इन सबों के करने से सभी को शीघ्र अत्यन्त वृद्धता आ जाती है । और विद्याध्ययन तथा कलाओं के सीखने में अत्यन्त
परिश्रम करना भी वृद्धावस्था ला देता है ।
दुर्गुणं तु गुणीकृत्य कीर्तयेत् स प्रियो भवेत् ॥ ३०३ ॥
गुणाधिक्यं कीर्तयति यः किं स्यान्न पुनः सखा । प्रिय होने के उपाय - जो दुर्गुण को गुण बतलाकर उसका बखान करता है वह संसार का प्रिय होता है । और जो गुण को चढ़ा - बढ़ा कर प्रशंसा
करता है वह क्यों न मित्र हो जाय, अर्थात् वह अवश्य मित्र हो जाता है ।
दुर्गुणं वक्ति सत्येन प्रियोऽपि सोऽप्रियो भवेत् ॥ ३०४ ॥
गुणं हि दुर्गुणीकृत्य वक्ति यः स्यात्कथं प्रियः । अप्रिय होने के कारणों का निर्देश — जो सचमुच विद्यमान दुर्गुण को कहता है वह प्रिय होकर भी सुननेवाले का अप्रिय हो जाता है । और जो
गुण को दुर्गुण बताकर कहता है वह भला कैसे प्रिय हो सकता है ।
स्तुत्या वशं यान्ति देवा ह्यब्जसा किं पुनर्नराः ॥ ३०५ ॥
प्रत्यक्षं दुर्गुणान्नैव वक्तुं शक्नोति कोऽप्यतः । स्तुति से देवता के वशवर्त्ती होने का निर्देश — जब स्तुति करने से देवता CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri महान होता है औ से जानने और अपने स्कूति नही का खान ही है । ऐ और वह स को भी प्र साधु उपकार को सरसो से साधु अर्थात् दुर्ब धुर्जन का १२
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न जाने का खड़ा रहना अन्दर ३०० ॥ १ ॥ - पथिक को विना साथी प जल की चा के समय एवं जंगल में. १ ॥ T, उपवास, ीघ्र अत्यन्त में अस्यन्त ३ ॥ खान करता कर प्रशंसा
ता है ।
०४ ॥
दुर्गुणको 1 और जो ०५ ॥ से देवता तृतीयोऽध्यायः १७७ वश में हो जाते हैं तब मनुष्यों की क्या बात है? अर्थात् भी वस्तुतः में हो जाते हैं । इसीसे कोई भी किसी के सामने उसके मनुष्य दुर्गुणों अवश्य नहीं वश कह सकता है ( क्योंकि वह जानता है कि सुननेवाला को क्रुद्ध । जायगा ) स्वदुर्गुणान स्वयं चातो विमृशेल्लोकशास्त्रतः ॥ ३०६ ॥
स्वदुर्गुणों का स्वयं विचार करने का निर्देश- - अतः स्वयं अपने दुर्गुणों. को लोक तथा शास्त्र से विचार करना चाहिये अर्थात् मुझमें कौन - कौन दुर्गुण हैं ।
स्वदुर्गुणश्रवणतो यस्तुष्यति न क्रुध्यति ।
स्वोपहासप्रविज्ञाने यतते त्यजति श्रुते ॥ ३०७ ॥
स्वगुणश्रवणान्नित्यं समस्तिष्ठति नाधिकः ।
दुर्गुणानां खनिरहं गुणाधानं कथं मयि ॥ ३०८ ॥
मय्येव चाज्ञताऽप्यस्ति मन्यते सोऽधिकोऽखिलात् ।
स साधुस्तस्य देवा हि कलालेशं लभन्ति न ॥ ३०६ ॥
महान् पुरुष के लक्षण – जो व्यक्ति अपने दुर्गुणों के सुनने से संतोष को प्राप्त होता है और क्रुद्ध नहीं होता है बल्कि अपने उपहासकर दोषों को विशेष रूप से जानने के लिये प्रयत्न करता है । और दोषों को सुनने पर छोड़ देता है । और अपने गुणों को सुनकर नित्य समभाव में रहता है । किसी प्रकार की, स्फूर्ति नहीं रखता है अर्थात् खुशी से उछलता नहीं है एवं मैं तो दुर्गुणों. का खान हूं अतः मेरे में गुण कैसे आगया, क्योंकि मूर्खता तो केवल मुझमें ही है । ऐसा जो समझता है वह संपूर्ण जगत् के लोगों की अपेक्षा महान् है और वह साधु पुरुष कहलाता है एवं देवता लोग उसकी कला के एक अंश को भी प्राप्त नहीं कर सकते हैं ( फिर मनुष्यों की बात क्या है ) ॥
सदाऽल्पमप्युपकृतं महत् साधुषु जायते ।
मन्यते सर्षपादल्पं महच्चोपकृतं खलः ॥ ३१० ॥
साधु पुरुष तथा खळ पुरुष के लक्षण - सज्जन पुरुष लोग सदा थोड़े भी उपकार को बड़ा समझते हैं और खल लोग बहुत बड़े भारी उपकार को भी सरसो से भी छोटा ( अतितुच्छ ) समझते हैं ।
क्षमिणं बलिनं साधुर्मन्यते दुर्जनोऽन्यथा ।
दुरुक्तमप्यतः साघोः क्षमयेद् दुर्जनस्य न ॥ ३११ ॥
साधु पुरुष क्षमाशील व्यक्ति को बलवान और दुर्जन पुरुष इससे विपरीत अर्थात् दुर्बल समझते हैं. अतः साधु पुरुष का दुर्वचन: सहना उचित है किन्तु. दुर्जन का सहना उचित नहीं है । १२ शु ० CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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शुक्रनीति: १७८
तथा न क्रीडयेत् कैश्चित् कलहाय भवेद्यथा ।
विनोदेऽपि शपेन्नैवं ते भार्या कुलटाऽस्ति किम् ॥ ३१२ ॥
का निषेध -- ऐसी क्रीडा अर्थात् मनो. विनोद की बात नहीं करनी चाहिये जिससे झगड़ा खड़ा हो जाय । जैसे वृद्ध विनोद में भी ऐसा नहीं कहना चाहिये कि – क्या तुम्हारी स्त्र ( व्यभिचारिणी ) है १ ॥ अपशब्दाश्च नो वाच्या मित्रभावाच्च केष्वपि गोप्यं न गोपयेन्मित्रे तद्गोध्यं न प्रकाशयेत् ॥ ३१३ ॥
मित्र के प्रति कर्त्तव्या कर्तव्य विषयों का निर्देश - किसी व्यक्ि मित्रभाव से भी अपशब्दों ( कटुवचनों ) का प्रयोग करना उचित नहीं है । देखने का की - सी क स्त्री की लेना चा अन्य मित्र से गोप्य विषय को न छिपावे और उसके गोप्य विषय को कहीं प्रकाशित अधीन व न करे । अपने बच बैरीभूतोऽपि पश्चात् प्राक्कथितं वापि सर्वदा | दण्ड न विज्ञातमपि यद्दष्टथं दर्शयेत्तन्न कर्हिचित् ॥ ३१४ ॥
प्रतिकर्तुं यतेतैव गुप्तः कुर्यात् प्रतिक्रियाम् । कारणवश मित्र के वैरी बन जाने पर भी मित्रतावस्था में पहले कही ग्राम हुई गुप्त बातों को एवं जाने हुये उसके दोषों को भी कहीं पर सदा ग्राम का प्रकाशित न करे कौर गुप्त होकर उसकी दुर्भावना को ' दूर करने का यन करे चित्तवाल और दूर भी करे । तो उस यथार्थमपि न ब्रूयाद् बलवद्विपरीतकम् ॥ ३१५ ॥
दृष्टं त्वदृष्टवत् कुर्याच्छतमप्यश्रुतं क्वचित् । बलवान के प्रति विपरोत वातें न करने का निर्देश - बलवान् पुरुषों की विन विपरीत अर्थात् ग्लानिजनक कोई बातें यदि यथार्थं भी हों तो भी उन्हें कहने का ' उसके सामने न कहे, एवं जो देखी भी हों उन्हें अनदेख कर दे और जो ज्ञान कर
-कहीं सुनी भी हों उन्हें अनसुनी कर दे ।
मूकोऽन्धो बधिरः खञ्जः स्वापत्काले भवेन्नरः ॥ ३१६ ॥
अन्यथा दुःखमाप्नोति हीयते व्यवहारतः । मनुष्य को आपत्ति पड़ने पर कर्तव्य कर्मों का निर्देश – मनुष्य को अपने ऊपर आपत्ति आ जाने पर किसी प्रबल पुरुष की बुरी सत्य बात कहने के लिये मूक ( गूंगा ) बन जावे, बुराई देखने के लिये अन्धा, बुराई सुनने के लिये बहरा एवं बुराई करने के लिये दौड़ - धूप करने में लंगड़ा बन जाये अर्थात् किसी भांति से बुरा लगनेवाला व्यवहार न करे, यदि ऐसा नहीं करेगा तो दुःख पायेगा और व्यवहार से गिर जायेगा । बिना राव हारेगाव नहीं हो अन्य दूसरे के! मिलकर करना च CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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३१२ ॥ अर्थात् मनो. जाय । जैसे स्त्री कुलटा ३१३ ॥ व्यक्ति के लिये त नहीं है 1 । कहीं प्रकाशित १४ ॥ - पहले कही पर सदा कायरन करे ५ ॥ नू पुरुषों की तो भी उन्हें दे और जो ३१६ ॥ य को अपने त कहने के बाई सुनने के हा बन जावे नहीं करेगा तृतीयोऽध्यायः १७६ वदेद् वृद्धानुकूलं यन्न बालसदृशं कचित् ॥ ३१७ ॥
परवेश्मगतस्तत्स्त्रीवीक्षणं न च कारयेत् । वृद्धजनों के अनुकूल बचन - बोलने का एवं किसी की स्त्री को देखने का निर्देश– वृद्धजनों के अनुकूल वचन बोलना घूर कर न चाहिये, कहीं पर बच्चों की - सी बातें नहीं करनी चाहिये । और किसी के घर में स्त्री की तरफ घूर कर नहीं देखना चाहिये ( बल्कि देखकर लेना चाहिये ) । अधनादननुज्ञातान्न गृह्णीयात्तु स्वामिताम् शिशुं शिक्षयेदन्यशिशुं नाप्यपराधिनम् अन्य के अपराधी चालक को दण्ड न देने का निषेध अधीन किसी अधिकार को बिना उसकी अनुमति प्रभुश्व पहुँचने पर उसकी नीची निगाह कर ॥ ३१८ ॥.
। - किसी गरीब के न स्वीकार करे । अपने बच्चों का शासन करे किन्तु दूसरे के वच्चों को अपराध करने पर भी
चुण्ड न दे ।
अधर्मनिरतो यस्तु नीतिहीनश्चलान्तरः ॥ ३१३ ॥
संकर्षकोऽतिदण्डी तद्ग्रामं त्यक्त्वाऽन्यतो वसेत् । ग्राम को छोड़कर अन्यत्र वास करने की अवस्थाओं का निर्देश - यदि ग्राम का स्वामी अधर्म में निरत, नीति पर नहीं चलनेवाला, अव्यवस्थित चित्तवाला, धन का शोषण करनेवाला और अधिक तीक्ष्ण दण्ड देनेवाला हो
तो उस ( ग्राम ) को छोड़कर अन्यत्र निवास करना चाहिये ।
यथार्थ विज्ञातमुभयोर्वादिनोर्मतम् ॥ ३२० ॥
अनियुक्तो न वै ब्रूयाद्धीनशत्रुर्भवेदतः । विना जज की आज्ञा के वादी - प्रतिवादी के विषय में सत्यासत्यादि बातें न कहने का निर्देश - वादी और प्रतिवादी उन दोनों के मत को यथार्थ रूप से जान कर भी अर्थात् ' किसका सत्य है और किसका झूठ है ' यह जानकर भी बिना राजा या जज के द्वारा नियुक्त किये स्वयं चलकर न कहे क्योंकि जो हारेगा वह शत्रु हो जायगा अतः न कहे । और इससे मनुष्य किसी का शत्रु नहीं हो सकता है 1 गृहीत्वाऽन्यविवादं तु विवदेन्नैव केनचित् ॥ ३२१ ॥
मिलित्वा सङ्घशो राजमन्त्रं नैव तु तर्कयेत् । अन्य के विवाद को ग्रहण कर किसी के संग विवाद न करने का निर्देश— दूसरे के झगड़े में पड़कर किसी के साथ झगड़ा न करे । और किसी के दल में मिलकर राजा के द्वारा की हुई किसी मन्त्रणा के विषय में तर्क - वितर्क नहीं करना चाहिये । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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शुक्रनीति: १८० अज्ञातशास्त्रो न ब्रूयाज्ज्योतिषं धर्मनिर्णयम् ॥ ३२२ ॥
नीतिदण्डं चिकित्सां च प्रायश्चित्तं क्रियाफलम् । बिना शास्त्रज्ञान के न करने योग्य विषयों का निर्देश - बिना शास्त्र का ज्ञान प्राप्त किये हुये ( मूर्ख ) पुरुष को ज्योतिष, धर्म का निर्णय, दण्डनीति या नीति एवं दण्डविषयक विवरण, चिकित्सा, प्रायश्चित्त और
परिणाम ( नतीजा ) के विषय में कुछ न करे या न कहे ।
पारतन्त्र्यात्परन्दुःखं न स्वातन्त्र्यात्परं सुखम् ॥ ३२३ ॥
अप्रवासी गृही नित्यं स्वतन्त्रः सुखमेधते । अब पारतय्य से बढ़कर दुःख और स्वतन्त्रता से बढ़कर सुख न होने का प्रथम सुह निर्देश — परतन्त्रता ( पराधीनता ) से बढ़कर दूसरा कोई दुःख और स्वाधी-नता से बढ़कर दूसरा कोई सुख नहीं है । एवं प्रवास नहीं करनेवाला
स्वाधीन होकर अपने ही घर में रहनेवाला पुरुष सुख प्राप्त करता है । 1
नूतनप्राक्तनानां च व्यवहारविदां धिया ॥ ३२४ ॥
प्रतिक्षणं चाभिनवो व्यवहारो भवेदतः ।
वक्तुं न शक्यते प्रायः प्रत्यक्षादनुमानतः ॥ ३२५ ॥
उपमानेन तब्ज्ञानं भवेदाप्तोपदेशतः । प्रत्यक्षादि ४ प्रमाणों से व्यवहार ज्ञान होने का निर्देश -नवीन प्राचीन व्यवहार में चतुर लोगों की बुद्धि से प्रतिक्षण नये - नये व्यवहार तथा • मित्र अपकार वाला, अ होता है तथा होते रहते हैं अतः प्रायः करके उन सर्वो का कहना कठिन है इसीसे प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान तथा आप्त पुरुषों के उपदेश ( शब्द प्रमाण ) से उन सर्वो का
• प्राप्त करना चाहिये ।
कथितं तु समासेन सामान्यं नृपराष्ट्रयोः ॥ ३२६ ॥
नीतिशास्त्रं हितायालं यद्विशिष्टं नृपे स्मृतम् । इति शुक्रनीतौ नृपराष्ट्रसामान्यलक्षणं नाम तृतीयोऽध्यायः समाप्तः इस प्रकार से संक्षेपरूप में सामान्यतः ( साधारणतया ) राजा तथा ( प्रजाजन ) दोनों के सम्बन्ध में और विशेषतः केवल राजा के लिये नीतिशास्त्र पर्याप्त हितकारक है उसे कहा गया । इति शुक्रनीति में नृप - राष्ट्र - सामान्य लक्षणनामक तृतीय अध्याय समाप्त हुआ । 8 ज्ञान दुःख से की सिद्ध मित्र का विषयों । युक्त वह पादवाल राष्ट्रजो भाव यह मित्र की " करता ह है और केवल 1 कहलात CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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२२ ॥ बिना शास्त्र का यि दण्डनीति किसी कार्य का ३२३ ॥ न होने का
और स्वाधी-है ।
४ ॥
५ ॥
- नवीन तथा व्यवहार होते च, अनुमान, बों का ज्ञान ६ ॥ समाप्तः । तथा राष्ट्र के लिये जो चतुर्थोऽध्यायः चतुर्थाध्याये प्रथमं प्रकरणम् ।
अथ मिश्रप्रकरणं प्रवक्ष्यामि समासतः ।
लक्षणं सुहृदादीनां समासाच्छृणुताधुना ॥ १ ॥
अब मिश्रप्रकरण ( विविध विषयों का प्रकरण ) संक्षेप से कहता हूँ, उसमें प्रथम सुहृदादियों के लक्षण संक्षेप से इस समय तुम लोग सुनो ।
मित्रं शत्रुश्चतुर्धा स्यादुपकारापकारयोः ।
कर्ता कारयिता चानुमन्ता यश्च सहायकः ॥ २ ॥
मित्र और शत्रु के प्रकारों का निर्देश - मनुष्य किसी का उपकार या अपकार करने से क्रम से मित्र या शत्रु होता है जो प्रत्येक करनेवाला, कराने-वाला, अनुमति देनेवाला और सहायता करनेवाला इन भेदों से ४ प्रकार का होता है ।
यस्य सुद्रवते चित्तं परदुःखेन सर्वदा ।
इष्टार्थे यततेऽन्यस्य प्रेरितः सत्करोति यः ॥ ३ ॥
आत्मस्त्रीधनगुह्यानां शरणं समये सुहृत् ।
प्रोक्तोत्तमोऽयमन्यश्च द्वियेकपदमित्रकः ॥ ४ ॥
४ पादों से युक्त उत्तम मित्र के लक्षण - १. जिसका चित्त दूसरे ( मित्र ) के दुःख से सदा द्रवीभूत हो जाता है । २. और जो दूसरे ( मित्र ) के अभीष्ट कार्य की सिद्धि के लिये सदा यत्न करता है । ३. तथा बिना प्रेरणा किये ही स्वयं मित्र का सरकार करता है । ४. एवं अपने ( मित्र की ) स्त्री, धन और गुप्त विषयों की समय पड़ने पर रक्षा करनेवाला होता है, इस प्रकार: पादों से युक्त वह मित्र ' उत्तम ' कहलाता है । इससे अन्य अर्थात् योग्यतानुसार न्यून • ' पादवाला होने से तीन, दो तथा एक पादवाला मित्र कहलाता है । इसका भाव यह है कि — जिसका चित्त मित्र के दुःख से द्रवीभूत होता है, और जो मित्र की अभीष्ट - सिद्धि के लिये यरन करता है एवं बिना प्रेरणा किये सरकार करता है पह ' त्रिपदमित्रक ' और जिसका चित्त मित्र के दुःख से द्रवीभूत होता है और जो अभीष्ट सिद्धि के लिये यत्न करता है वह ' द्विपदमित्रक ' एवं जो केवल मित्र के से द्रवित चित्तवाला होता है वह ' एकपदमित्रक ' दुःख कहलाता है ।
अनन्यस्वत्वकांमत्वमेकस्मिन् विषये द्वयोः ।
वैरिलक्षणमेतद्वाऽन्येष्टनाशन कारिता ॥५ ॥
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१८२ शुक्रनीति: बैरभाव रखनेवालों के दो छक्षणों का निर्देश - एक वस्तु के विषय में दो सहज व्यक्तियों का ' अपना २ स्वत्व जमाने की इच्छा रखना ' अथवा ' एक दूसरे के नाना आदि अभीष्ट कार्य को नष्ट करना ' ये दोनों लक्षण बैरभाव रखनेवाल के हैं । खड़की, पर भ्रात्रभावेऽपि तु द्रव्यमखिलं मम वै भवेत् । माता की न स्यादेतस्य वश्योऽयं ममैव स्वात् परस्परम् ॥ ६ ॥ और मौसी
भोक्ष्येऽखिलमहं चैतद्विनाऽन्यं स्तः सुवैरिणौ । होते हैं! द्वेष्टि द्विष्ट उभौ शत्रू स्तश्चैकतरसंज्ञकौ ॥ ७ ॥
परम शत्रु और एकतरफा शत्रु भाइयों के लक्षण -2 - भाई के रहने पर भी ' पिता का सम्पूर्ण द्रव्य मेरा ही हो, इस दूसरे भाई का न हो, यह भाई मेरे ही विद्या अधीन रहे मैं इसके अधीन न रहूँ, और मैं इसको अलग रखकर अकेले समग्र वस्तु का उपभोग ‘ करूँगा ' ऐसा जो परस्पर भाई लोग एक दूसरे के प्रति विचार रखते हैं, बे दोनों ‘ परमशत्रु ' कहलाते हैं । जो केवल द्वेष करता है और जो किसी का द्वेपपात्र होता है वे दोनों ' एकतरफा शत्रु ' कहलाते हैं ।
शूरस्योत्थानशीलस्य बलनीतिमतः सदा ।
सर्वे मित्रा गूढवैरा नृपाः कालप्रतीक्षकाः ॥ ८ ॥
भवन्तीति किमाश्वर्यं राज्यलुब्धा न ते हि किम् ।
न राज्ञो विद्यते मित्रं राजा मित्रं न कस्य वै ॥ ९ ॥
प्रायः कृत्रिममित्रे ते भवतश्च परस्परम् ।
केचित् स्वभावतो मित्राः शत्रवः सन्ति सर्वदा ॥ १० ॥
राजाओं की परस्पर कृत्रिम मित्रता का निर्देश - ' जो राजा शूर, सदा उन्नति के लिये उद्योगशील एवं बल तथा नीति से युक्त होता है उसके सभी राजा लोग समय की प्रतीक्षा करनेवाले ( मौका का इन्तजार करनेवाले ) होकर गुप्त रूप से वैरभाव और ऊपर से मित्रभाव रखनेवाले आश्चर्य करना क्या उचित है? अर्थात् कभी नहीं । क्योंकि लोग ) राज्य के लोभी नहीं हैं अर्थात् अवश्य हैं । इससे यह राजा का कोई मित्र नहीं होता है और राजा भी किसी के हैं किन्तु प्रायः वे ( दोनों राजा ) मतलब के लिये परस्पर रहते हैं । और कोई स्वभावतः सदा मित्र या शत्रु ही होते हैं ।
माता मातृकुलं चैव पिता तत्पितरौ तथा ।
पितृपितृव्यात्मकन्या पत्नी तत्कुलमेव च ॥
पितृमात्रात्मभगिनी कन्यकासन्ततिश्च या ।
प्रजापालो गुरुश्चैव मित्राणि सहजानि हि ॥
होते हैं ' इस पर क्या वे ( राजा सिद्ध हुआ कि मित्र नहीं होते कृत्रिम मित्र बने ११ ॥ १२ ॥ तथा धीरत से अपनी सार्थक वही यथाथ श्रेष्ठ होता कोई प्रयो स्वाभ जैसे, हिंस माता तथा चचा के परस्प ननद - भौज वैद्य ) अत्यन्त क्र होता है CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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विषय में दो क दूसरे के. ॥ ने पर भी भाई मेरे ही अकेले समग्र प्रति ता है और ९ ॥ - 11 शूर, सदा सके सभी करनेवाले ) ' इस पर ( राज हुआ नहीं होते मित्र बने चतुर्थाध्याये मिश्रप्रकरणम् १८२ सहज मित्र कहलानेवालों का निर्देश - जैसे - माता, माता के कुल के लोग आदि, पिता, पिता के माता - पिता ( दादा - दादी ), पिता के चचा अपनी नाना पत्नी, पत्नी के कुल के लोग ( ससुरालवाले ), पिता की बहिन (, फुआ ) लड़की की , वहिन ( मौसी, अपनी बहिन, कन्या की सन्तान अथवा फूल, माता और मौसी की लड़की - लड़के, राजा, गुरु ये सब सहज ( स्वाभाविक ) मित्र होते हैं ।
विद्या शौर्य च दाक्ष्यं च बलं धैर्य च पञ्चमम् ।
मित्राणि सहजान्याहुवर्तयन्ति हि तैर्बुधाः ॥ १३ ॥
विद्यादि ५ की सहज मित्रता का निर्देश -विद्या, शूरता, चतुरता, बल तथा धीरता ये पांचों भी सहज मित्र कहलाते हैं क्योंकि पण्डित लोग इन्हीं से अपनी जीविका चलाते हैं ।
पुत्रो निर्देशवर्त्ती यः स पुत्रोऽन्वर्थनामवान् ।
श्रेष्ठ एकस्तु गुणवान् किं शतैरपि निर्गुणैः ॥ ६४ ॥
सार्थक पुन के लक्षण - माता - पिता के आज्ञावशवर्त्ती जो पुत्र होता है । वही यथार्थ नामवाला ( सार्थक ) पुत्र कहलाता है । और एक गुणवान् पुत्र श्रेष्ठ होता है, सैकड़ों निर्गुण ( मूर्ख ) पुत्रों से क्या? अर्थात् पिता का इनसे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है ।
स्वभावतो भवन्त्येते हिंस्रो दुर्वृत्त एव च ।
ऋणकारी पिता शत्रुर्माता स्त्री व्यभिचारिणी ॥ १५ ॥
आत्मपितृभ्रातरश्च तत्स्त्रीपुत्राश्च शत्रवः स्वाभाविक शत्रु के लक्षण -- स्वभावतः निम्नलिखित ये सब शत्रु होते हैं, जैसे, हिंसाशील, दुराचारी ( दुष्ट ), ऋण करनेवाला पिता, व्यभिचारिणी माता तथा स्त्री, अपने तथा पिता के भाई लोग ( भाई- चचा ) और भाई तथा
चचा के स्त्री और पुत्र, ।
स्नुषा श्वश्रूः सपत्नी च ननान्दा यातरस्तथा ॥ १६ ॥
परस्पर शत्रु कहलानेवालों का निर्देश – पतोहू और सास, सौत - सौत, मनद - भौजाई, देवरानी - जेठानी ये सब प्रायः परस्पर शत्रु होती हैं ।
मूर्खः पुत्रः कुवैद्यश्चा रक्षकस्तु पतिः प्रभुः ।
चण्डश्चण्डा प्रजा शत्रुरदाता धनिकच येः ॥ १७ ॥
मूर्ख पुत्रादिकों की शत्रु संज्ञा का निर्देश – मूर्ख पुत्र, दुष्ट चिकित्सक ( त्र ' अर्ध वैद्य ), नहीं रक्षा करनेवाला पति ( स्वामी ), अत्यन्त क्रोधी प्रभु ( राजा ), अत्यन्त क्रोध करनेवाली प्रजा या सन्तान, नहीं देनेवाला ( कंजूस ) घनी जो होता है वह शत्रु है । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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१८४ शुक्रनीति: दुष्टानां नृपतिः शत्रुः कुलटानां पतिव्रता । साधुः खलानां शत्रुः स्यान्मूर्खाणां बोधको रिपुः ॥ १८ ॥.. जिस
दुष्टों के लिये राजा, कुलटाओं के लिये पतिव्रता स्त्री, दुर्जनों के लिये सज्जन जाता है उ और मूर्खों के लिये उपदेश देनेवाला शत्रु होता है ।
उपदेशो हि मूर्खाणां क्रोधायैव शमाय न ।
पयः पानं भुजङ्गानां विषायैवामृताय न ॥ १ ९ ॥
मूर्खों के लिए उपदेश देने का निषेध – क्योंकि — मूर्खो के लिये उपदेश देना केवल क्रोधजनक होता है उससे उसे शान्ति नहीं मिलती है । और सप के लिये दूध पिलाना केवल विषवर्द्धक होता है उससे अमृत नहीं होता है अर्थात् विष के बदले अमृत नहीं निकलता ।
आसमन्ताच्चतुर्दिक्षु सन्निकृष्टाश्च ये नृपाः ।
तत्परास्तत्परा - येऽन्ये क्रमाद्धीनबलारयः ॥
शत्रूदासीनमित्राणि क्रमात्ते स्युस्तु प्राकृताः ।
अरिमित्रमुदासीनोऽनन्तरस्तत्परः परः ॥
क्रमशो वा नृपा ज्ञेयाश्चतुर्दिक्षु तथाऽरयः स्वसमीपतरा भृत्या मात्याद्याश्च कीर्तिताः राजाओं के स्वाभाविक शत्रु - उदासीन मित्र राजाओं के राज्य के सब तरफ चारों दिशाओं में समीपवर्ती एवं उनके बाद के जो अन्य राजा लोग हैं वे क्रम से स्वाभाविक पास के के उदासीन और पुनः उसके बाद के मित्र होते हैं 1 । और हीन पास के, उसके बाद के पुनः उसके बाद के इस क्रम से शत्रु, मित्र होते हैं । और अरि, मित्र और उदासीन राजाओं के भी पास के, उसके बाद के पुनः उसके बाद के इस क्रम उनके २० ॥ २१ ॥ ॥। २२ ॥ लक्षण - राजा के बाद पुनः उनके शत्रु, उसके बाद बलवाले शत्रु भी उदासीन तथा चारों दिशाओं में भी शत्रु, मित्र और उदासीन होते हैं । और अपने अत्यन्त समीपवर्त्ती भृत्य तथा अमास्य ( मन्त्री ) आदि भी राजा के द्वारा कष्ट दिये जाने पर शत्रु हो जाते हैं ।
बृंहयेत् कर्षयेन्मित्रं हीनाधिकबलं क्रमात् ।
भेदनीयाः कर्षणीयाः पीडनीयाश्च शत्रवः ॥ २३ ॥
विनाशनीयास्ते सर्वे सामादिभिरुपक्रमैः । मित्र और शत्रु राजाओं के प्रति राजाओं के आचरण का निर्देश – हीनबल और अधिक चलवाले मित्र राजाओं की भी क्रम से वृद्धि तथा क्षीणता करे । और जो शत्रु राजा लोग हैं उनमें सामादि उपायों से भेद डालना तथा उन्हें
चीण, पीडित एवं नष्ट करना चाहिये ।
मित्रं शत्रुं यथायोग्यैः कुर्यात् स्ववशवर्तिनम् ॥ २४ ॥
उपायेन यथा व्यालो गजः सिंहोऽपि साध्यते । बनाना चा क्यो को भी वि मित्रा मित्र, संब तथा दण्ड मित्र विद्या ( 5 यदि नि जाते हैं । मित्र दूसरा को है । और लिये कह भेद - गुणों की हो तो म -वाक्य ' क उदा CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri