शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 311–320

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 311–320

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चतुर्थाध्याये विद्याकलानिरूपण प्रकरणम् २२५.. जिस द्विज ने संपूर्ण विद्याओं तथा कलाओं का अध्ययन-१७ ॥ गुरु का लक्षण सर्वो का गुरु ( श्रेष्ठ या उपदेष्टा ) होने योग्य होता है, बिना करना, किया है वही से वह गुरु नहीं हो सकता है । नर्मपत्रियों दुष्टर्श का पढ़े केवल जातिमात्र कलाः संख्यातुं नैव शक्यते । के विद्या ह्यनन्ताश्च उय करना ये विद्यामुख्याश्च द्वात्रिंशच्चतुःषष्टिकलाः स्मृताः ॥ २३ ॥

३ विद्या ३२ और कला ६४ होने का निर्देश - यद्यपि विद्यायें तथा कायें मुख्य अनन्त हैं अतः उनकी गणना नहीं की जा सकती है, तथापि उनमें से २८.॥ मुख्य रूप से ३२ विद्यायें तथा ६४ कलायें मानी गई हैं ।

नौकरी करना यद्यत्स्याद्वाचिकं सम्यक्कर्मविद्याभिसंज्ञकम् ।

मं हैं । क्रियाओं शक्तो मूकोऽपि यत्कर्तुं कलासंज्ञं तु तत्स्मृतम् ॥ २४ ॥

गई है । विद्या और कला के लक्षण जो २ कर्म वाणी द्वारा भलीभांति संपन्न किया जा सकता है वह ' विद्या ' नाम से प्रसिद्ध है और जिसे गंगा भी हाथ २६ ॥ से कर सकता है उसे ' कला ' कहते हैं ।

उक्त संक्षेपतो लक्ष्म विशिष्टं पृथगुच्यते ।

स्मृतिकारों ने विद्यानां च कलानां च नामानि तु पृथक् पृथक् ॥ २५ ॥

विधान बताया इस प्रकार से संक्षेप में लक्षण कहा गया, अब विशेष रूप से पृथक् २ तवाना चाहिये, लक्षण कहते हैं । उनमें विद्याओं तथा कलाओं के नाम पृथक् २ ये सब हैं ।

बैल, वैश्यों को ऋग्यजुः साम चाथर्व वेदा आयुर्धनुः क्रमात् ।

चाना चाहिये । गान्धर्वचैव तन्त्राणि उपवेदाः प्रकीर्तिताः ॥ २६ ॥

खना चाहिये । विद्याओं में वेद तथा उपवद के नामों का निर्देश - जैसे विद्यायें १. ऋग्वेद,. दि कठिन भूमि २. यजुर्वेद, ३. सामवेद, ४. अथर्ववेद ये ४ वेद हैं और क्रम से ५. आयुर्वेद, निर्देश ० ॥ - ब्राह्मणों नाना विशेष रूप. २१ ॥ - विहित नाना सम्पूर्ण वेदों का ६. धनुर्वेद, ७. गान्धर्ववेद, ८. तन्त्र ४ उपवेद हैं ।

शिक्षा व्याकरणं कल्पो निरुक्तं ज्यौतिषं तथा ।

छन्दः षडङ्गानीमानि वेदानां कीर्तितानि हि ॥ २७ ॥

वेदों के ६ अंगों का निर्देश - ९. शिक्षा, १०. व्याकरण, ११. कल्प..: १२. निरुक्त, १३. ज्यौतिष, १४. छन्द ये वेदों के ६ अङ्ग माने गये हैं ।

मीमांसातर्क सांख्यान वेदान्तो योग एव च ।

इतिहासाः पुराणानि स्मृतयो नास्तिकं मतम् ॥ २८ ॥

अर्थशास्त्रं कामशास्त्रं तथा शिल्पमलङ्कृतिः ।

काव्यानि देशभाषाऽव - सरोक्तिर्यावनं मतम् ॥ २ ९ ॥

देशादिधर्मा द्वात्रिंशदेता विद्याभिसंज्ञिताः । मीमांसादि विद्याओं के नामों का निर्देश - १५. मीमांसा, १६. तर्क २॥ · ( न्याय वैशेषिक ), १७. सांख्य, १८. वेदान्त, १ ९. योग, २०. इतिहास, १५ शु ० CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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२२६ शुक्रनीति: २१. पुराण, २२. स्मृति, २३. नास्तिकमत, २४. अर्थशास्त्र, २५. कामशास्त्र -२६. शिल्पशास्त्र, २७. अलङ्कारशास्त्र, २८. काव्य, २ ९. देशभाषा ३०., उनकी उपास रोचित उक्ति, ३१. यवनों का मत, ३२. देशादि के प्रचलित धर्म, ये अवस- प्रकार चार ,

नाम से प्रसिद्ध हैं ।

मन्त्रब्राह्मणयोर्वेद - नाम प्रोक्तमृगादिषु ॥ ३० ॥

वेद के मन्त्र और ब्राह्मण दो भागों का निर्देश - ऋग्वेदादि मन्त्र और ब्राह्मण भागों की वेद संज्ञा कही हुई है 1 । अर्थात् वेदों में ब्राह्मण ये दो भाग होते हैं ।

जपहोमाचनं यस्य देवताप्रीतिदं भवेत् ।

उच्चारान्मन्त्रसंज्ञं तद्विनियोगि च ब्राह्मणम् ॥ ३१

मन्त्र और ब्राह्मण के लक्षण – जिस वेद के भाग का उच्चारण -होम और देवपूजन करना देवता की प्रीति के लिये होता है, कहते हैं । और उन मन्त्रों के विनियोग ( प्रयोगविधि ) जिसमें हो भाग को ' ब्राह्मण ' कहते हैं

ऋग्रूपा यत्र ये मन्त्राः पादशोऽर्धर्चशोऽपि वा ।

येषां होत्रं स ऋग्भागः समाख्यानं च यत्र वा ॥। ३२

ऋग्वेद के लक्षण - जिसमें ऋग्रूप स्तुतिपरक मन्त्र हों जो अथवा ऋचाओं का आधा २ अंश करके पढ़े जाते हों तथा जिन ३२ विद्या fa य आयुर्वेद ४ वेदों में दीर्घमायु मन्त्र और निदान का ज्ञ श्रग्वेद का उप ॥ करके जप, धनुर्वेद उसे ' मन्त्र ' में निपुणता प्र उस वेद के ॥ वीणा और क कि पाद २ स्वरों में ताल मन्त्रों के ' गान्धर्ववेद ' द्वारा होम किया जाता हो, जिसमें अच्छी तरह से आख्यान हो, उसे ' ऋग्वेद ' कहते हैं । प्रश्लिष्टपठिता मन्त्रा वृत्तगीतिविवर्जिताः । आध्वर्यवं यत्र कर्म त्रिगुणं यत्र पाठनम् ॥ ३३ ॥ तन्त्र या

मन्त्रब्राह्मणयोरेव यजुर्वेदः स उच्यते । के प्रयोग एवं यजुर्वेद के लक्षण - जिसमें अलग २ करके मन्त्र पढ़े जाते हों, जो कि का भेद, प्रयो अथर्ववेद का छन्द तथा गान से रहित हों, तथा जिसमें अध्वर्युसंबन्धी कर्म कहे गये हो, एवं जिसमें मन्त्र तथा ब्राह्मण भाग का तीन बार आवृत्ति करके पाठ होता हो -उसे ' यजुर्वेद ' कहते हैं । शिक्षा क उद्गीथं यस्य शस्त्रादेर्यज्ञे तत्सामसंज्ञकम् ॥ ३४ ॥ से, ताल्वादि

सामवेद के लक्षण — जिसमें यज्ञ के समय शस्त्रादि की स्तुति उच्चस्थर से की शिक्षा हो गाकर मन्त्रों द्वारा की जाती हो उसे ' सामवेद ' कहते हैं ।

अथर्वाङ्गिरसो नाम छुपास्योपासनात्मकः ।

इति वेदचतुष्कं तु ह्यद्दिष्टं च समासतः ॥ ३५ ॥ ६

अथर्ववेद के लक्षण — जिसमें उपास्य ( आराध्य ) देवताओं का तथा कल्प क CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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चतुर्थाध्याये विद्याकलानिरूपण प्रकरणम् २२७ 24. कामशास वर्णन हो उसे ' अथर्वाङ्गिरस ( अथर्ववेद ) कहते हैं । इस T, ३०. उनकी उपासना वेदों का का संक्षेप में वर्णन किया गया है । ये ३२ अवस- प्रकार से चारो विन्दत्यायुर्वेत्ति सम्य - गाकृत्योषधिहेतुतः । विद्या यस्मिन्ॠग्वेदोपवेदः स चायुर्वेदसंज्ञकः ॥ ३६ ॥

॥ के लक्षण जिसमें कही हुई विधि का पालन करने से मनुष्य आयुर्वेद दि ४ वेदों में दीर्घ बायु लाभ करता है । और जिसके द्वारा रोगों का लक्षण, औषधि तथा में मन्त्र और निदान का ज्ञान प्राप्त कर रोगियों की आयु का ज्ञान प्राप्त करता है । उसे वेद का उपवेद ' आयुर्वेद ' कहते हैं 1

युद्धशस्त्रास्त्रकुशलो रचनाकुशलो भवेत् ।

१ ॥ यजुर्वेदोपवेदोऽयं धनुर्वेदस्तु सः ॥। ३७ ॥

करके अप धनुर्वेद के लक्षण - जिसके ज्ञान से मनुष्य युद्ध, शस्त्र, ब्यूहरचना आदि , उसे ' मन्त्र ' में निपुणता प्राप्त करता है उसे यजुर्वेद का उपवेद ' धनुर्वेद ' कहते हैं 1

उस बेद के स्वरैरुदात्तादिधर्मैस्तन्त्रीकण्ठोत्थितैः सदा ।

सतालैर्गानविज्ञानं गान्धर्वो वेद एव सः ॥ ३८ ॥

गान्धर्ववेद के लक्षण - जिसके द्वारा उदात्त, अनुदात्त, स्वरित स्वर तथा ३२ ॥ दीणा और कण्ठ से निकले हुये निषादादि स. रि. ग. म, प, ध, नि इन ७ कि पाद २ स्वरों में ताल के साथ गाने का ज्ञान होता है, उसे सामवेद का उपवेद जन मन्त्रों के ' गान्धर्ववेद ' कहते हैं ।

उसे ' ऋग्वेद ' विविधोपास्यमन्त्राणां प्रयोगाः सुविभेदतः ।

कथिताः सोपसंहारास्तद्धर्मनियमैश्च षट् ॥ ३६ ॥

अथर्वणां चोपवेदस्तन्त्ररूपः स एव हि । ॥ तन्त्र या आगम के लक्षण - जिसमें नाना प्रकार के उपास्य देवों के मन्त्रों के प्रयोग एवं मारण, मोहन, उच्चाटन, विद्वेषण, आकर्षण, स्तम्भन इन ६ प्रयोगों हों, जो कि का भेद, प्रयोग तथा उपसंहार, धर्म तथा नियम के साख वर्णन हो, उसे

कहे गये ह अथर्ववेद का उपवेद ' तन्त्र ' या ' आगम ' कहते हैं ।

पाठ होता हो स्वरतः कालतः स्थानात्प्रयत्नानुप्रदानतः ॥ ४० ॥

सवनाद्यैश्च सा शिक्षा वर्णानां पाठशिक्षणात् । शिक्षा के लक्षण - जिसमें उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित स्वर से, कालक्रम ति ॥ उच्चस्वर से से, ताल्वादि स्थान से, प्रयत्न के साथ से, उच्चारण आदि से वर्णों के पढ़ने

की शिक्षा हो उसे ' शिक्षा ' कहते हैं ।

प्रयोगो यन्त्र यज्ञानामुक्तो ब्राह्मणशेषतः ॥ ४१ ॥

॥ श्रौतकल्पः स विज्ञेयः स्मार्तकल्पस्तथेतरः । का तथा कल्प के लक्षण व भेद जिसमें ब्राह्मण भाग के शेष अंश से यज्ञों का CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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२२८ शुक्रनीति: प्रयोग कहा है उसे ' श्रौतकल्प ' कहते हैं । इससे भिन्न को ' स्मात्संकल्प

कहते हैं ।

व्याकृताः प्रत्ययाद्यैश्च धातुसन्धिसमासतः ॥ ४२ ॥

शब्दा यत्र व्याकरणमेतद्धि बहुलिङ्गतः । व्याकरण के लक्षण -- - जिसमें प्रत्यय आदि के द्वारा तथा समास और पुंल्लिङ्ग, खीलिङ्ग, नपुंसकलिङ्ग इनके द्वारा शब्द सिद्ध धातु किये,

उसे ' व्याकरण ' कहते हैं ।

शब्दनिर्वचनं यत्र वाक्यार्थैकार्थसंग्रहः ॥ ४३ ॥

निरुक्तं तत्समाख्यानाद्वेदाङ्गं श्रोत्रसंज्ञकम् । विचारपूर्णत ' तर्क ' या ' म्या सन्धि,: सांख्य गये हैं । कूटस्थ पुरुष, रूप, रस, ग ५ पृथ्वी ये निरुक्त के लक्षण- जिसमें शब्दों का निष्कर्ष के साथ कथन तथा वाक्यार्थी कर्मेन्द्रियां, १ उभयेन्द्रिय का एक अर्थ में संग्रह किया गया हो उसे ' निरुक्त ' कहते हैं । वह शब्दों का ) अर्थ भलीभांति कहने से वेद का श्रोत्र ( कान ) अङ्ग माना जाता है । ( गणना i नक्षत्रग्रहगमनैः कालो येन विधीयते ॥ ४४ ॥

संहिताभिश्व होराभिर्गणितं ज्योतिषं हि तत् । वेदान्त ज्यौतिष लक्षण - जिससे नक्षत्रों तथा ग्रहों की गति द्वारा काल का नाना प्रकार पृथक् २ निर्देश किया जाता है । और जिसके संहिता, होरा तथा गणित ये से उत्पन्न हु

तीन स्कन्ध हैं उसे ' ज्योतिष ' कहते हैं ।

म्यरस्तजभ्नगैर्लान्तैः पद्यं यत्र प्रमाणतः ॥ ४५ ॥

कल्प्यते छन्दःशास्त्रं तद्वेदानां पादरूपधृक् । छन्द लक्षण - जिसमें भगण ( त्रिगुरु sss ), यगण ( आदिलघु रगण ( लघु मध्य sis ) सगण ( अन्तगुरु IIS ), तगण ( अन्तलघु जगण ( गुरुमध्य ISI ), भगण ( आदिगुरु ॥ ), नगण ( त्रिलघु ॥ ( 5 ), तथा लघु ( 1 ) इनके प्रमाण से पद्यों ( छन्दों ) की कल्पना

हो उसे वेदों के चरण की व्यवस्था करनेवाला ' छन्द ' शास्त्र कहते हैं ।

यत्र व्यवस्थिता चार्थकल्पना विधिभेदतः ॥। ४६ ॥

मीमांसा वेदवाक्यानां सैव न्यायश्च कीर्तितः । मीमांसा लक्षण --- जिसमें वेद के वाक्यों की अनुष्ठान - भेद से अर्थ योग ल ISS ), द्वारा चित्त S31 ) कहते हैं । ), गुरु की गई इतिहास के द्वारा प्राच कहते हैं । कल्पना व्यवस्थित की गई है अर्थात् वाक्यार्थ- विचार किया गया है उसे ' मीमांसा ' कहते हैं और ' न्याय ' भी कहा जाता है । पुराण भावाभावपदार्थानां प्रत्यक्षादिप्रमाणतः ॥ ४७ ॥ तथा वंशों क

सविवेको यत्र तर्कः कणादादि मतं च यत् । तर्क लक्षण - जिसमें भाव ( द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय ) तथा अभाव पदार्थों का प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान तथा शब्द प्रमाणों के द्वारा स्मृति CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 315

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चतुर्थाध्याये विद्याकलानिरूपणप्रकरणम् २२ ९: होता है तथा जो काणादादि वैशेषिक दार्शनिकों का मत है उसे ' माक पूर्ण तर्क । विचार ' तर्क ' या ' न्याय ' कहते हैं विकाराः षोडशेति ३२ पुरुषोऽष्टौ प्रकृतयो च ॥ ४८ ॥

॥ - यात्सांख्यमित्यभिधीयते । तन्त्वादिसंख्यावैशिष्ट या लक्षण - जिसमें एक पुरुष, आठ प्रकृति, सोलह विकार अर्थात् १ धातु, सन्धि, सांख्य १ प्रकृति, २ महत्तत्व, ३ अहङ्कार, ५ तन्मात्राएँ - शब्द, स्पर्श, किये गये । है कूटस्थ पुरुष, ये आठ प्रकृतियों, तथा १ आकाश. २ वायु, ३ अग्नि, ४ जल ४३ रूप, रस ये, गन्ध ५ महाभूत ,, १ हस्त, २ पाद, ३ जिह्वा, ४ लिङ्ग, ५ गुदा ये ५, ॥ ५ कर्मेन्द्रियां पृथ्वी, १ श्रवण, २ स्वकू ३ चक्षु, ४ रसना, ५ घ्राण ये ५ ज्ञानेन्द्रियाँ और - तथा वाक्यार्थी १ उभयेन्द्रिय मन ये १६ चिकार । इस प्रकार से २५ तत्वादि की संख्या

वह शब्दों का ( गणना ) की विशेषता हैं अतः उसे ' सांख्य ' शास्त्र कहते हैं ।

है । ब्रह्मैकमद्वितीयं स्यान्नाना नेहास्ति किञ्चन ॥ ४ ९ ॥

४ ॥ मायिकं सर्वमज्ञानाद्भाति वेदान्तिनां मतम् । वेदाम्त लक्षण – एक, अद्वितीय, अनिर्वचनीय ब्रह्म ही इस संसार में हैं, द्वारा काल का माना प्रकार की जो वस्तुयें दिखाई पड़ रही हैं वे सत्य नहीं हैं. वस्तुतः माया तथा गणित ये से उत्पन्न हुई अज्ञान से सत्यवत् प्रतीत होती हैं । यह वेदान्तियों का मत है । ५ ॥ = दिलघु ISS ), लघु SSI ) लघु ॥। ), गुरु कल्पना की गई चित्तवृत्तिनिरोधस्तु प्राणसंयमनादिभिः ॥ ५० ॥।

तद्योगशास्त्रं विज्ञेयं यस्मिन्ध्यानसमाधितः ।. योग लक्षण - जिसमें एकाग्रता के साथ ध्यान एवं कुम्भकादि प्राणायाम द्वारा चित्त की वृत्तियों का निरोध करना बताया गया हो उसे ' योग ' शास्त्र

कहते हैं ।

प्राग्वृत्तकथनं चैक - राजकृत्यमिषादितः ॥ ५१ ॥

यस्मिन्स इतिहासः स्यात्पुरावृत्तः स एव हि । हैं । 1 इतिहास लक्षण - जिसमें किसी मुख्य राजा के चरित्र - वर्णन के छल आदि ६ ॥ अर्थ कल्पना उसे ' मीमांसा ' = शेष, समवाय ) प्रमाणों के द्वारा के द्वारा प्राचीन व्यवहारों का वर्णन हो उसे ' इतिहास ' और ' पुरावृत्त ' भी

कहते हैं ।

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च ॥ ५२ ॥

वंशानुचरितं यस्मिन् पुराणं तद्धि कीर्तितम् । पुराण लक्षण - जिसमें सगं ( सृष्टि ), प्रतिसर्ग, प्रलय, वंश, मम्बन्तर

तथा वंशों का चरित ये सब वर्णित हो उसे ' पुराण ' कहते हैं ।

वर्णादिधर्मस्मरणं यत्र वेदाविरोधकम् ॥ ५३ ॥

कीर्तनं चार्थशास्त्राणां स्मृतिः सा च प्रकीर्तिता । स्मृति लक्षण - जिसमें वेद से अविरुद्ध ( वेदसंमित ) चारो वर्णों एवं CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 316

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२३० शुक्रनीति: आश्रमों के धर्मों का स्मरण ( वर्णन ) तथा अर्थशास्त्र का भलीभांति किया गया हो, उसे ' स्मृति ' कहते हैं । प्रतिपादन काव्य युक्तिर्बलीयसी यत्र सर्व स्वाभाविकं मतम् ॥ ५४ ॥ युक्त कवि

कस्यापि नेश्वरः कर्त्ता न वेदो नास्तिकं हि तत् । होकर ि नास्तिक मत लक्षण — जिसमें युक्ति ( तर्क ) को सर्वश्रेष्ठ प्रमाण गया हो एवं प्रत्येक वस्तु की सृष्टि स्वभावतः उत्पन्न हुई मानी माना देशमा ईश्वर को जगत् का कर्त्ता तथा वेद दोनों को भी न माना जाय 1 । जाय उसे ' । श्रीर वाणी को नास्ति-कमत ' कहते हैं । श्रुतिस्मृत्यविरोधेन राजवृत्तादि - शासनम् ॥ ५५ ॥ अवस

सुयुक्त्याऽर्थार्जनं यत्र ह्यर्थशास्त्रं तदुच्यते । बोध क अर्थशास्त्र लक्षण - जिसमें श्रुति तथा स्मृत्ति के अविरुद्ध ( संभव ) राजाओं कहते हैं । के लिये आचरण के विषय में उपदेश किया गया हो तथा अच्छे कौशल से

धन अर्जन करने की विधि कही गई हो, उसे ' अर्थशास्त्र ' कहते हैं ।

शशादिभेदतः पुंसामनुकूला दिभेदतः ॥ ५६ ॥

पद्मिन्यादिप्रभेदेन स्त्रीणां स्त्रीयादिभेदतः ।

तत्कामशास्त्रं सत्त्वादेर्लज्म यत्रास्ति चोभयोः ॥ ५७ ॥

कामशास्त्र लक्षण - जिसमें पुरुषों के शश, मृग, अश्व, हस्ती जातिभेद तथा अनुकूल, धृष्ट, शठ आदि नायक - भेद एवं स्त्रियों के चित्रिणी, शङ्खिनी तथा हस्तिनी रूप से जातिभेद तथा स्वीया, यावन का कारण रूप से की गई है, पश्चिनी, धर्म का प्र परकीया, वेश्या आदि - नायिकाभेद एवं दोनों ( स्त्री तथा पुरुष ) के अनुरागादि के लक्षण विशेष रूप से वर्णित हों उसे ' कामशास्त्र ' कहते हैं । देशा प्रासादप्रतिमाराम - गृहवाप्यादिसंस्कृतिः वेदमूलक कथिता यत्र तच्छिल्पशास्त्रमुक्तं महर्षिभिः ॥ ५८ ॥ है उस

शिल्पशास्त्र लक्षण — जिसमें प्रासाद ( राजभवन देवमन्दिर ), प्रतिमा ( मूर्ति ), उद्यान गृह, बावड़ी आदि का सुन्दर रीति से निर्माण तथा संस्कार करने की विधि वर्णित हो उसे महर्षियों ने ' शिल्पशास्त्र ' कहा है । इस समन्यूनाधिकत्वेन सारूप्यादिप्रभेदतः । गया, किन्त कहा जा स अन्योन्यगुणभूषा तु वर्ण्यतेऽलङ्कृतिश्च सा ॥ ५६ ॥

अलङ्कार शास्त्र लक्षण — जिसमें समता, न्यूनता तथा अधिकता और सादृश्य आदि भेद से परस्पर शब्द तथा अर्थ के गुण वैचित्र्य रूप ' regi क्यों? ( अलङ्कार ) का वर्णन हो उसे ' भलङ्कारशास्त्र ' कहते हैं । कलाका सरसालङ्कृतादुष्ट- शब्दार्थ काव्यमेव तत् । बातियां क विलक्षण चमत्कारबीजं पद्यादिभेदतः ॥ ६० ॥

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पृष्ठ 317

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जांति प्रतिपादन ४ ॥ प्रमाण माना जाय । और 1 उसे ' नारित-11 संभव ) राजाओ छे कौशल से ३ ॥ २७ ॥ हस्ती रूप से 1 के पद्मिनी, या, परकीया, अनुरागादि के ५ ॥ न ), प्रतिमा तथा संस्कार 1 & 11 नचिकता और रूप ' अति ' ॥ चतुर्थाध्याये विद्याकला निरूपणप्रकरणम् २३१ - रस तथा अलङ्कार से युक्त, दोषरहित शब्द और अर्थ काव्य लक्षण को ' काव्य ' कहते हैं । और वह पथ - गद्यादि भेद से युक्त युक्त कवि की रचना होता है । होकर विलक्षण चमत्कारजनक ' सुग्रहा वाक् तु दैशिकी । लोकसंकेततोऽर्थान लक्षण - लोगों के संकेत से अर्थों को जल्दी से बोध करानेवाली वाणी देशभाषा

को ' देशभाषा ' कहते हैं ।

बिना कौशिक शास्त्रीय संकेतैः कार्यसाधिका ॥ ६१ ॥

यथा कालोचिता वाग्वाऽवसरोक्तिस्तु सा स्मृता । अवसरोक्ति लक्षण -- कोश तथा शास्त्र - संबन्धी संकेत के बिना ही अर्थ का बोध करानेवाली समयानुसार उचित कही हुई वाणी को ' अवसरोकि *

कहते हैं ।

ईश्वरः कारणं यत्रादृश्योऽस्ति जगतः सदा ॥ ६२ ॥

श्रुतिस्मती विना धर्माधर्मोस्तस्तच्च यावनम् ।

श्रुत्यादिभिन्नधर्मोऽस्ति यत्र तद्यावनं मतम् ॥ ६३ ॥

यावन प्रन्थ तथा मत लक्षण - जिसमें सदा अदृश्य रहनेवाला ईश्वर जगत् का कारण माना गया है और श्रुति स्मृति के विना धर्मं तथा अधर्म की व्यवस्थाः की गई है, उसे ' यावन. ( यवनों का ) ग्रन्थ ' कहते हैं । जिसमें श्रुति आदि से भिन्नः धर्म का प्रतिपादन किया गया है उसे ' यावन ( यवनों का ) मत ' कहते हैं ।

कल्पित श्रुतिमूलो वाऽमूलो लोकैर्धृतः सदा ।

देशादिधर्मः स ज्ञेयो देशे देशे कुले कुले ॥। ६४ ॥

देशादि धर्म लक्षण - हर एक देश तथा कुल में जो लोगों के द्वारा कल्पित वेदमूलक या वेदमूलक से भिन्न ( मूलरहित ) आचार सदा धारण किया: गया है उसे ' देशादिधर्म ' कहते हैं । पृथक्पृथक्तु विद्यानां लक्षणं संप्रकाशितम् । कलानां न पृथङ्नाम लक्ष्म चास्तीह केवलम् इस प्रकार से पृथक् २ विद्याओं के लक्षणों का तो वर्णन गया, किन्तु केवल कलाओं का नाम तथा लक्षण पृथक् रूप कहा जा सका । पृथक्पृथक् क्रियाभिर्हि कलाभेदस्तु जायते । यांयां कलां समाश्रित्य तन्नाम्ना जातिरुच्यते ॥ ६५ ॥

भलीभांति किया से नहीं यहां ॥ ६६ ॥२

क्योंकि कलाओं का क्रिया द्वारा ही पृथक २ मेद होता है । और जिस ३ कला का आश्रय लेकर लोग जीविका चलाते हैं उन कलाओं के नाम से उनकी जातियां कही जाती हैं । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 318

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-२३२ शुक्रनीति: हावभावादिसंयुक्तं नर्तनं तु कला स्मृता । अनेकवाद्यविकृतौ ज्ञानं तद्वादनं कला ॥ ६७ ॥ अस्म करना

गान्धवं वेदोक्त ७ कलाओं के लक्षण - १ - हाव - भाव के साथ नाचने विधि जानना ' नृत्यकला ' कहते हैं । २ -- अनेक प्रकार वाद्य यन्त्रों ( बाज को F ) के बनाने ६ तथा बजाने के ज्ञान को ' वाद्य ' तथा ' वादन ' कला कहते हैं । वस्त्रालङ्कारसंधानं स्त्रीपुंसोश्च कला स्मृता । १४. स्व अनेकरूपाविर्भावकृतिज्ञानं कला स्मृता ॥ ६८ ॥ ज्ञान को भी

३. स्त्री तथा पुरुष को वस्त्र तथा आभूषण को सुन्दर रीति से पहनाने को बाद पुनः पृथ : ' वस्त्रालङ्कार संधान ' कला कहते हैं । ४. अनेक प्रकार के रूप - प्रगट करने की स * विधि का जानना ' रूप प्रकाशन कला ' कहते हैं । & शय्यास्तरणसंयोग- पुष्पादिग्रथनं कला । व द्यूताद्यनेक कीडाभी रञ्जनं तु कला स्मृता ॥ ६६ ॥ १६. धा

५. शय्या तथा विछोने को भलीभांति लगाकर उस पर पुरुष आदि को कहते हैं । १७ सुन्दर गूंथ या सजा कर रखने को भी कला कहते हैं । ६. द्यूत ( जूभा ) i शास्त्र के अन्थ आदि अनेक क्रीडाओं ( खेलों ) द्वारा मनोरञ्जन करने को भी कहा कहते हैं । श अनेक सनसन्धानै रतेर्ज्ञानं कला स्मृता । स धनुर्वेदो कला सप्तकमेतद्धि गान्धर्वे समुदाहृतम् ॥ ७० ॥। हुये निशाना ।

७. अनेक प्रकार का आसन करके रति ( मैथुन ) करने के ज्ञान को भी कला कहते हैं । इन ७ कलाओं का वर्णन ' गान्धर्ववेद ' में किया गया है । स्थानों पर मकरन्दासवादीनां मद्यादीनां कृतिः कला | ( कुश्ती लड़न शल्यगूढाहृतौ ज्ञानं शिराव्रणव्यधे कला ॥ ७१ ॥ ब

आयुर्वेदोक १० कलाओं के लक्षण - ८. मकरन्द ( पुष्परस ) से बिना शम आसवादि मादक द्रव्य तथा मद्यादि बनाने को भी कला कहते हैं । ९. छिपे युद्ध होता है । हुये शल्य ( विधे हुये कांटा आदि ) को सुखपूर्वक निकालने तथा सिराओं पर और न इस ल उत्पन्न हुये व्रण को शस्त्र से चीरने के ज्ञान को भी कला हीना दिरससंयोगान्नादिसंपाचनं कला - वृक्षादिप्रस्त्रारोपपालनादिकृतिः कला.. १०. हींग आदि द्रव्यों तथा लवणादि रसों के संयोग को भी कला कहते हैं ११. वृक्षादि के फलने, लगाने तथा की क्रिया को जानना भी कला कहते हैं । पाषाणात्वादिद्रुतिस्तदस्मकरणं कला कहते हैं । | ॥ ७२ ॥

से भज्ञादि के पकाने रक्षा करके बड़ा करने

यावदिक्षुविकाराणां कृतिज्ञानं कला स्मृता ॥ ७३ ॥

१२. पत्थरों का तोड़ना तथा स्वर्णादि धातुओं को गलाना और उनको व न शत्रु के नहीं होता है । जाय तब तक क स क बाहु का CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 319

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चतुर्थाध्याये विद्याकलानिरूपणप्रकरणम् २३३ भी कला कही जाती है । १३. जितने गुडादि हैं उनके बनाने की ७ ॥ अस्म करना कला है । थनाचने विधि जानना संयोग - क्रियाज्ञानं कला स्मृता । को धात्वोषधीनां 1 ) के बनाने धातुसांकर्य पार्थक्य - करणं तु कला स्मृता ॥ ७४ ॥

स्वर्णादि धातुओं तथा औषधियों के मिलाने तथा प्रयोग करने के १४. भी कला कहते हैं । १५. स्वर्णादि धातुओं को एकत्र मिल जाने के ५ ॥ ज्ञान को करने को भी कला कहते हैं । से पहनाने बाद पुनः पृथक संयोगापूर्वविज्ञानं धात्वादीनां कला स्मृता । को गट करने की क्षारनिष्कासनज्ञानं कलासंज्ञं तु तत्स्मृतम् ॥ ७५ ॥

कलादशकमेतद्धि ह्यायुर्वेदागमेषु च । १६. धारवादिकों के अपूर्वं रीति से संयोग करने के ज्ञान को भी कला ३ ॥ कहते हैं । १७. चार निकालने को भी कला कहते हैं । ये १० कलायें आयुर्वेद-पुरुष आदि को शान के प्रन्थों में वर्णित हैं । चूत ( जूला ) i शस्त्रसन्धानविक्षेपः पदादिन्यासतः कला ॥ ७६ ॥

ला कहते हैं । संध्या घाताकृष्टिभेदैर्मल्लयुद्धं कला स्मृता । धनुर्वेदोक्त ५ कलाओं के लक्षण --- १८. पैर आदि को पैतरे के साथ रखते = हुवे निशाना साध कर शस्त्रों के चलाने को भी कला कहते हैं । १ ९. सन्धि ज्ञान को भी स्थानों पर प्रहार करना तथा पकड़ कर खीचना आदि भेदों के साथ मल्लयुद्ध है ।

( कुश्ती लड़ना ) करने को भी कला कहते हैं ।

बाहुयुद्धन्तु मल्लाना - मशस्त्रं मुष्टिभिः स्मृतम् ॥ ७७ ॥

॥ मृतस्य तस्य न स्वर्गो यशो नेहापि विद्यते । पुष्परस ) से बिना शस्त्र के केवल मुष्टियों ( मुक्कों ) द्वारा प्रहार करते हुये मल्लों का हैं । ९. छिपे युद्ध होता है उसे ' बाहुयुद्ध ' कहते हैं । इसमें जो जो मरता है. उसको न तो स्वर्ग

सिराओं पर और न इस लोक में यश ही प्राप्त होता है ।

बलदर्पविनाशान्तं नियुद्धं यशसे रिपोः ॥ ७८ ॥

नकस्यासीत कुर्याद्वा प्राणान्तं बाहुयुद्धकम् । 11 शत्रु के बल के दर्पका नाश होने तक होनेवाला युद्ध किसके यश के लिये दि के पकाने नहीं होता है? अर्थात् सबके लिये होता है । अतः जब तक प्राण न निकल

बड़ा करने तब तक बाहुयुद्ध करना ही चाहिये ।

• कृत प्रतिकृतैश्चित्रैर्वाहुभिन सुसङ्कटैः ॥७६ ॥

सन्निपातावघातैश्च प्रमादोन्मथनैस्तथा ।

कृतं निपीडनं ज्ञेयं तन्मुक्तिस्तु प्रतिक्रिया ॥ ८० ॥

और उनको बाहु का प्रहार करना, बाहुप्रहार को रोकना, नाना प्रकार से बाहुप्रहार CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 320

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 320 का मूल पृष्ठ
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२३४ शुक्रनीति: करना, अत्यन्त भीषण बाहु प्रहार करना, शत्रु के ऊपर लगातार करना, और बाहुप्रहार से चोट पहुँचाना तथा असावधान होने बाहुमहार ३४. ही बाहुओं से मसल डारना इत्यादि रीतियों से किये हुये पर शत्रु को बखादि रंगन बाहुयुद्ध को ' निपीवन कहते हैं । इससे अपने को बच्चा लेने को ' प्रतिक्रिया ' कहते हैं । ' के द्वारा बा की कला के अन्दर ही माने जाते हैं । ये सब महयुद्ध न कलाऽभिलक्षिते देशे यन्त्राद्यस्त्रनिपातनम् | स वाद्यसङ्केततो व्यूहरचनादि कला स्मृता ॥ ६१ ३६. नो २०. लक्ष्य के स्थान पर युद्ध यन्त्रादि तथा अस्त्रों को फेंकना ॥ कहते हैं । ३ ( निशाना ३ लगाकर अब चलाना भी कला है । २१. युद्ध के बाजों के संकेत से रचना आदि करना भी कला है । व्यूह. " गजाश्वरथगत्या. तु युद्धसंयोजनं कला | ३८. अ कलापञ्चकमेतद्धि धनुर्वेदागमे स्थितम् ॥। ८२ ॥ छिद्र करनार २२. हाथियों, घोड़ तथा रथों को विशेष रूप से चलाने के द्वारा युद्ध का आयोजन करना भी कला है । ये पांच कलायें धनुर्वेद शास्त्र में कही ४०. स्व हुई हैं । सोना तथा र विविधासन मुद्राभिर्देवता तोषणं कला | र सारथ्यं च गजाश्वादेतिशिक्षा कला • स्मृता ॥ ८३ ॥

पृथक् ४ कलाओं के लक्षण -- २३. अनेक प्रकार के पद्मासनादि आसनों ४२. स्व तथा मत्स्य - कूर्मादि मुद्राओं द्वारा देवता को संतुष्ट करना भी कला है । २४. रघ कला है । ४६ हांकने को एवं २५. हाथी तथा घोड़े को चाल सिखाने को भी कला कहते हैं । प मृत्तिकाकाष्ठपाषाणधातुभाण्डादिसत्क्रिया । पृथक्कलाचतुष्कन्तु चित्राद्यालेखनं कला ॥ ८४ ॥ ४४. प

२६-२९. मिट्टी, काष्ठ, पत्थर तथा धातु के वर्त्तन आदि को सुन्दर रीति भी कला है से बनाना ये भी पृथक् २ चार कलायें हैं । ३०. चित्र आदि का सुन्दर लिखना का जानना भी कला है । तडागवापीप्रासादसमभूमिक्रिया कला घटयाद्यनेकयन्त्राणां वाद्यानां तु कृतिः कला ॥ ८५ ॥ ४६. क

तडागकूपादि कलाओं के लक्षण – ३१. तालाब, बावड़ी, राजभवन तथा मी कला है । भूमि को समतल बनाने की क्रिया भी कला है । ३२. घड़ी आदि अनेक पन् को बनाना भी कला है । ३३. और अनेक प्रकार के बाजों को बनाना मी कला है । ४८. ग भलीभांति हीनमध्यादिसंयोग- वर्णाद्यै रञ्जनं कला | स जलवाय्वग्निसंयोगनिरोधैश्च क्रिया कला ॥ ८६ ॥

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