शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 301–310

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 301–310

पृष्ठ 301

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४ है तो ४. १२ हुआ पुनः लब्धि ८ हुई, होता है, कम होता ८ ॥ ८२ ॥

८३ ॥ झनी चाहिये । ब्धि हो उसे मोतीका निश्चित करना ३ ॥ गोल मोती - वह अधम ८५ ॥ धातुओं में की भलीभांति 71 ६ ॥ बंग, सीसा, के मेल से ॥ तम लौह से चतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् की धातुयें श्रेष्ठ होती हैं । अतः सोना सर्वश्रेष्ठ धातु पूर्व - पूर्व के मेल से ' कांसा ' बनता है, तामा तथा वन तथा तामा ' पीतल ' बनता है । मानसममपि स्वर्णं तनु स्यात पृथुलाः परे २१५ माना जाता है । रांगा के मेल से । स्वर्णादि धातुओं के गुण- तौल में बराबर सोना पतला बनाया जाता है । किन्तु अन्य धातुयें स्वर्ण के बराबर तौल में होती हुई भी मोटी ही बनती हैं ।

सोने के समान पतली नहीं ।

एकच्छिद्रसमाकृष्टे समखण्डे द्वयोर्यदा ॥ ८८ ॥

घातोः सूत्रं मानसमं निर्दुष्टस्य भवेत्तदा । जब दो धातुओं के समान दो टुकड़ों को एक छिद्र में डालकर सूत्राकार खींचकर तार बनाया जाय तो यदि धातु शुद्ध होगी तब उसका सूत्र मान में

बराबर ही होगा ।

यन्त्र - शस्त्रास्त्ररूपं यन्महामूल्यं भवेदयः ॥ ८६ ॥

रजतं षोडशगुणं भवेत् स्वर्णस्य मूल्यकम् । धातुओं के मूल्य का प्रमाण - यन्त्र तथा शस्त्र रूप होने पर, लोहे का मूल्य अत्यधिक बढ़ जाता है । चांदी से सोलह गुना अधिक मूल्य सोने का

होता है ।

ताम्रं रजतमूल्यं स्यात् प्रायोऽशीतिगुणं तथां ॥ ६० ॥।

ताम्राधिकं साधेगुणं वज्रं वङ्गात्तथा परे ।

रङ्गसीसे द्वित्रिगुणे ताम्राल्लोहं तु षड्गुणम् ॥ ९ १ ॥।

मूल्यमेतद्विशिष्टं तु ह्युक्तं प्राङ्मूल्यकल्पनम्! प्रायः तामे से अस्सी गुना अधिक मूल्य चांदी का होता है । वंग से डेढ़ गुना अधिक तामे का मूल्य होता है । और वङ्ग से अन्य रोगा तथा सीसा क्रम से ताम्र से द्विगुण तथा त्रिगुण मिलते हैं ॥ और लोह छ गुने मिलते हैं । यह विशिष्ट रूप से मूल्य कहा गया है, क्योंकि पूर्व से ही मूल्य का वर्णन किया

गया है ।

सुशृङ्गवर्णा सुदुघा बहुदुग्धा सुबत्सका ॥ ९ २ ॥

तरुण्यल्पा वा महती मूल्याधिक्याय गौर्भवेत् ।

पीतवत्सा प्रस्थदुग्धा तन्मूल्यं राजतं पलम् ॥ ९ ३ ॥

अधिक मूल्य गौ के लक्षण -- सुन्दर सींग तथा वर्णवाली, दुहने में क्लेश नहीं पहुँचानेवाली अधिक देनेवाली सुन्दर बछदेवाली, जवान ऐसी गौ चाहे वह छोटी, दूध, अधिक होता है । पीले वर्ण हो या बड़ी हो तो उसका मूल्य CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 302

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शुक्रनीति: २१६ की बछड़े वाली गौ यदि अच्छा दूध देनेवाली हो तो उसका मूल्य १ पक तीस ( ४ तोला ) चांदी है । 1 अजायाश्च गबार्द्ध स्थान्मेष्या मूल्यमजार्धकम् । बकरी आदि के मूल्य का प्रमाण – और बकरी का मूल्य गौ

आघा होता है तथा भेड़ी का मूल्य बकरी से आधा होता है ।

दृढस्य । युद्धशीलस्य पलं मेषस्य राजतम् ॥ ६४ ॥

ढ़ शरीरवाला एवं लड़ने में निपुड़ भेड़े का मूल्य एक पल चांदी

दश वाऽष्टौ पलं मूल्यं राजतं तूत्तमं गवाम् ।

पलं मेष्या अवेश्चापि राजतं मूल्यमुत्तमम् ॥ ९ ५ ॥

गवां समं सार्धगुणं महिष्या मूल्यमुत्तमम् । चांदी है । मूल्य से ४ मा ५ रती का है । देश - क संसार में गौ आदि के उत्तम मूल्यों का निर्देश — और गौ का उत्तम मूल्य १० या स एवं उन -८ पल चांदी है । भेड़ी या भेड़ का उत्तम मूल्य १ पल चांदी है । भैंस का

उत्तम मूल्य गौ के बराबर या डेहगुना अधिक होता है ।

सुशृङ्गवर्णबलिनो वोढुः शीघ्रगमस्य च ॥ ६६ ॥

अष्टतालवृषस्यैव मूल्यं षष्टिपलं स्मृतम् | जो व सुन्दर सींग तथा वर्णं एवं बल से युक्त, बोझा ढोनेवाला तथा जल्दी २ उसका मल चलनेवाला तथा भाठ ताल ( अंगूठा तथा मध्यमा अंगुली फैलाकर नापने से द्वारा सर्व जितनी लम्बाई होती है, उसे ' ताल ' कहते हैं ) के बराबर ऊँचे

६० पल चांदी मुल्य होता है ।

महिषस्योत्तमं मूल्यं सप्त चाष्टौ पलानि च ॥ ६७ ॥

भैंस का उत्तम मूल्य १० या ८ पल चांदी होता है ।

द्वित्रिचतुःसहस्रं वा मूल्यं श्रेष्ठं गजाश्वयोः ।

उष्ट्रस्य माहिषसमं मूल्यमुत्तममीरितम् ॥ ९ ८ ॥।

हाथी आदि के उत्तम मूल्यों का निर्देश - हाथी और घोड़े का गुणानुसार २, ३ या ४ हजार मुद्रा या पल चांदी होता है । ऊंट मूल्य महिष के समान ही होता है ।

योजनानां शतं गन्ता चैकेनाह्वाऽश्व उत्तमः ।

मूल्यं तस्य सुवर्णानां श्रेष्ठं पञ्चशतानि हि ॥ ६६ ॥

उत्तम अश्व आदि के लक्षण और मूल्य का निर्देश- एक दिन योजन ( ४०० कोश ) जानेवाले घोड़े उत्तम कहलाते हैं । उनका ५०० सुवर्ण ( स्वर्णमुद्रां ) होता है ।

त्रिंशद्योजनगन्ता वै उष्ट्रः श्रेष्ठस्तु तस्य वे ।

पलानां तु शतं मूल्यं राजतं परिकीर्तितम् ॥ १०० ॥

बैल का भेदों को स शुल्क है उसे ' श श्रेष्ठ मूल्य वस्त का उत्तम ( चुंगी ) तथा करस पर व्यापा प्रयत्नपूर्वक में १०० श्रेष्ठ मूल्य CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 303

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मूल्य १ पछ के मूल्य से ॥ दी है । 11 मूल्य १० या । 11 तथा जल्दी २ र नापने से ॥ ॥ का श्रेष्ठ मूल्य ऊंट का उत्तम li दिन में १०० का श्रेष्ठ मूल्य G ॥ चतुर्थाध्याये कोशनिरूपण प्रकरणम् योजन जानेवाला ऊट श्रेष्ठ कहलाता है उसका तीस चांदी है ।

चतुर्माषमितं स्वर्ण निष्क इत्यभिधीयते ।

• पञ्चरक्तिमितो माषो गजमौल्ये प्रकीर्तितः ॥

माशे सोने का १ निष्क होता है । हाथी का मुल्य ४ रती का १ माशा माना जाता है ।

५ रत्नभूतं तु तत्तत्स्याद्यद्यदप्रतिमं भुवि ।

यथादेशं यथाकालं मूल्यं सर्वस्य कल्पयेत् ॥

२१७ मूल्य १०० पल १०१ ॥ निश्चय करने में १०२ ॥ देश - कालानुसार सर्वो की मूल्य- कल्पना करने का निर्देश - जो - जो वस्तुयें -संसार में अनुपम ( बेजोड़ ) होती हैं वे सभी रत्नस्वरूप मानी जाती हैं । अत ध्रुव उन सबों का मूल्य देश तथा काल के अनुसार निश्चित

न मूल्यं गुणहीनस्य व्यवहाराक्षमस्य च ।

नीच मध्योत्तमत्वं च सर्वस्मिन्मूल्यकल्पने. ॥

चिन्तनीयं बुधैर्लोकाद्वस्तुजातस्य सर्वदा । जो वस्तु गुणों से हीन तथा व्यवहार करने के लिये उसका मूल्य कुछ भी नहीं होता है । और बुद्धिमान व्यक्ति - द्वारा सर्वत्र मूल्य निश्चय करने में समस्त वस्तुओं के नीच,

भेदों को सदा समझकर तदनुसार विचार करना चाहिये ।

विक्रेतृक्रेतृतो राजभागः शुल्कमुदाहृतम् ॥

करना चाहिये ।

१०३ ॥

अयोग्य होती है, को लोक - परम्परा मध्यम तथा उत्तम १०४ ॥ शुल्क के लक्षण - बेंचने तथा खरीदनेवाले से राजा जो अपना अंश लेता है उसे ' शुल्क ' कहते हैं ।

शुल्कदेशा हट्टमार्गाः करसीमाः प्रकीर्तिताः ।

वस्तुजातस्यैकवारं शुल्कं ग्राह्यं प्रयत्नतः ॥ १०५ ॥

वस्तुओं के शुल्क को एक बार ही ग्रहण करने का निर्देश - शुल्क · ( चुंगी ) लेनेवाला स्थान बाजार के मार्ग ( खरीदनेवालों से लेने के लिये ) तथा करसीमा ( चुंगी लगने के स्थान की सीमा पर बना चुंगी घर ) जहाँ “ पर व्यापारियों ( बेचनेवालों ) से चुंगी ली जाती है । समस्त वस्तुओं का ' प्रयत्नपूर्वक एक बार ही चुंगी लेनी चाहिये ।

कचिन्नैवासकृच्छुल्कं राष्ट्रे प्राह्यं नृपैश्छलात् ।

द्वात्रिंशांशं हरेद्राजा विक्रेतुः क्रेतुरेव वा ॥ १०६ ॥

विंशांशं वा षोडशांशं शुल्कं मूल्याविरोधकम् ।

शुल्कं विक्रेतृतो हरेत् ॥ १०७ ॥

न हीनसममूल्याद्धि लाभं दृष्ट्वा हरेच्छुल्कं क्रेतृतश्च सदा नृपः । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 304

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गी २१८ शुक्रनीति: अपने राज्य में राजा कभी भी छल से बारंबार किसी लेवे । और राजा बेचने या खरीदनेवालों से वस्तु के वस्तु की चुंगी न र चुंगी के रूप में ग्रहण करे अथवा मूल धन को छोड़कर मूल्य का ३२ व अंश व या सोलहवां अंश चुंगी लेवे । जिस विक्रेता ( बेचनेवाले लाभ में से बीसवां जिस कृ कम या बराबर मूल्य वस्तु का मिले, उससे चुंगी न लेवे ) को मूल धन से रूप में मिलत मूल्य से अधिक द्रव्य का लाभ देखकर तदनुसार हो खरीदने । और राजा यो भाग ( ५ रुप सदा लेवे । वाले से चुंगी बहुमध्यापफलितां भुवं मानमितां सदा ॥ १०८ ॥

ज्ञात्वा पूर्व भागमिच्छुः पश्चाद्भागं विकल्पयेत् । श हरेच्च कर्षकाद्भागं यथा नष्टो भवेन्न सः ॥। १०६ ॥ किसान से भाग ( मालगुजारी ) लेने का प्रमाण – सदा करग्रहण का अभिलाषी राजा प्रथम भूमि को नाप कर और उसके बहुत, मध्यम पैदावार को समझ कर पश्चात् तदनुसार कर का निश्चय करे । और से उतना ही कर लेवे जितने से वह नष्ट ( क्षतिग्रस्त ) न होवे ।

मालाकार इव ग्राह्यो भागो नाङ्गारकारवत ।

बहुमध्याल्पफलतस्तारतम्यं विमृश्य च ॥ ११० ॥

या कम रजताद कृषक उत्पन्न होनेव लोहा, वंग आधा अंश प पञ्चमांश, सह माली जैसे लता आदि से थोड़ा २ फूल चुनता है उसी भांति राजा भी थोड़ा कर लेवे किन्तु जैसे कोयला बनानेवाला संपूर्ण वृक्षों के जड़ को जलाकर तृणका कोयला बनाता है वैसा संपूर्ण कर रूप में न ले लेवे । और ' बहुत, मध्यम आदि तथा कम पैदावार के तारतम्य को समझ कर तदनुसार ही कर लेवे । राजभागादि व्ययतो द्विगुणं लभ्यते यतः । ऋषिकृत्यं तु तच्छ्रेष्ठं तन्न्यूनं दुःखदं नृणाम् ॥ १११ ॥ बकरी

उत्तम कृषिकृत्य के लक्षण - राजा का कर ( मालगुजारी ) आदि संपूर्ण भैंस और घ व्यय को काट कर जिस खेती से दुगुना लाभ हो, वह उत्तम खेती कहलाती तथा है इससे कम लाभ होने पर कृषकों को दुःख देनेवाली खेती हो जाती है । तडागवापिकाकूपमातृकाद्देवमातृकात् 1 देशान्नदीमातृकात्तु राजाऽनुक्रमतः सदा ॥ ११२ ॥

तृतीयांश चतुर्थाशमर्घाशं तु हरेत्फलम् । षष्ठांश मूषरात्तद्वत्पाषाणादिसमाकुलात् ॥ ११३ ॥ कारु

तडागादिकों से संपन्न भूमि से ग्राह्य राजभाग का तारतम्य - निर्देश - राम्रा शिल्पी ( चि क्रमानुसार सदा तडाग ( तालाब ), बावड़ी या कूप के जल से सींचे जाने वाले दिन कर र खेतों से तृतीयांश, वर्षा के द्वारा सिचाई होनेवाले खेतों से चतुर्थांश तथा के लिये ता नदी से सिंचाई होनेवाले खेतों से उपज का आधा अंश एवं बंजर तथा किसी दूसर पथरीली जमीन से होनेवाले आय का छठा अंश कर रूप में ग्रहण करे । जोत कर ख CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 305

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चतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २१६ रजतशत कर्षमितो यतः 1 की चुंगी न राजभागस्तु तस्मै विंशांशमुत्सृजेन्नृपः ॥११४ ॥

३२ वां avar लभ्यते में से से राजा को १०० रूपये भर चांदी चांदी का रुपया कर बीसवां जिस कृपक तो उस ( कृषक ) के लिये राजा अपने कर में से बीसवां नौर मूल घन से रूप में मिलता हो ओर से दे देवे । राजा थोड़े भाग ( ५ रुपये ) अपनी

नेिवाले से चुंगी स्वर्णादर्घ च रजतान्तृतीयांशं च ताम्रतः ।

चतुर्थांशं तु षष्ठांशं लोहाद्वङ्गाच्च सीसकात् ॥ ११५ ॥

5 II रत्ना चैव क्षारा खनिजाद्वययशेषतः ।

लाभाधिक्यं कर्षकादेर्यथा दृष्ट्वा हरेत्फलम् ॥ ११६ ॥

करग्रहण त्रिधा वा पचधा कृत्वा सप्तधा दशघाडाप वा । का रजतादियुक्त भूमि के लिये. राजभाग- नियम — व्यय को काटकर खान से मध्यम । और या कम उत्पन्न होनेवाले सोना से आधा अंश, चांदी से तृतीयांश, तामा से चतुर्थांश, कृपक छोद्दा, वंग तथा सीसा से षष्ठांश, रत्नों से तथा चार पदार्थं नमक आदि से माघा अंश एवं कृषक आदि के लाभ की अधिकता देखकर तदनुसार तृतीयांश, २० ॥ पञ्चमांश, सप्तमांश या दशमांश कर ग्रहण राजा को करना चाहिये । ति राजा भी द को जलाकर " बहुत, मध्यसं

वे ।

८१ ॥

आदि संपूर्ण ती कहलाती

आती है ।

-२ ॥

३ ॥

निर्देश- राजा सींचे जानेवाले चतुर्थांश तथा चं बंजर तथा

करे ।

तृणकाष्ठादिहरकाद्विंशत्यंशं हरेत्फलम् ॥। ११७ ॥

तृणकाष्ठादिविक्रेता आदि से २० वाँ भाग कर लेने का निर्देश — और तृण-काष्ठ आदि लाकर बेचनेवालों से २० वाँ अंश कर लेना चाहिये । अजाविगोमहिष्यश्ववृद्धितोऽष्टांशमाहरेत् महिष्यजाविगोदुग्धात्षोडशांशं हरेन्नृपः ॥ ११८ ॥॥

बकरी आदि की वृद्धि से ८ वां भाग लेने का निर्देश - बकरी, भेड़, गौ, भैंस और घोड़ों की वृद्धि में से अष्टमांश कर राजा ग्रहण करे । भैंस, बकरी, मेंद, तथा गाय के दूध में से १६ वां भाग कर ग्रहण करे ।

कारुशिल्पिगणात्पक्षे दैनिकं कर्मकारयेत् ।

तस्य वृद्धचै तडागं वा वापिकां कृत्रिमां नदीम् ॥ ११६ ॥

कुर्वन्त्यन्यत् तद्विधं वा कर्षन्त्यभिनवां भुवम् ।

यद्वययद्विगुणं यावन्न तेभ्यो भागमाहरेत् ॥ १२० ॥

कारु आदि से कर लेने के प्रकार का निर्देश — कारु ( बढ़ई आदि ) तथा शिल्पी ( चित्रकार आदि ) आदि के वर्गों से हर एक पक्ष ( १५ दिन ) एक दिन कर रूप में उनसे मुफ्त में काम करा लेवे । और जो राज्य की उन्नति के लिये तालाब, बावड़ी, या कृत्रिम नदी ( नहर ) या इसी के समान और किसी दूसरे कार्य का निर्माण करते हैं उन लोगों से तथा जो नवीन भूमि को जोत कर खेती के योग्य बनाते हैं उन लोगों से जब तक व्यय काटकर दूना , CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 306

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२२० शुक्रनीति: लाभ न होने लगे तब तक कर नहीं लेना चाहिये उसके होने पर लेना चाहिये । बाद अधिक लाम त भूविभागं भृतिं शुल्कं वृद्धिमुत्कोचकं करम् । मा सद्य एव हरेत्सर्वं न तु कालविलम्बनैः ॥ १२१ ॥ दूकानदार

भूमिभागादि को तत्काल लेने का निर्देश - अपनी जमीन की स अलग कराना, वेतन, चुंगी, ब्याज, घूस या दलाली, कर ( मालगुजारी का हिस्सा, रचा दूकान के लिये सबों को तत्काल ले लेना चाहिये, इनमें विलम्ब करना अनुचित है । ), दद्यात्प्रतिकर्षकाय भागपत्रं सचिह्नितम् । नियम्य ग्रामभूभागमेकस्माद्धनिकाद्धरेत् १२२ ॥

गृहीत्वा तत्प्रतिभुवं धनं प्राक् तत्समं तु वा ।

विभागशो गृहीत्वाऽपि मासि मासि ऋतावृतौ ॥ १२३ ॥

षोडशद्वादशदशाष्टांशतो वाऽधिकारिणः ।

स्वांशात् षष्ठांशभागेन ग्रामपान् सन्नियोजयेत् ॥ १२४ ॥

इन स इ राजा सब प्रकार से संक्षेप इस प्र • किसान को भागपत्र लिख देने का एवं ग्राम के किसी धनी को प्रतिसू चनाकर उसी से कर लेने का निर्देश -- राजा हर एक किसान को मालगुजारी की रसीद लिखकर उसपर अपनी मुहर भी लगाकर दे देवे । अथवा ग्राम की - सभी भूमि का कर नियत कर किसी एक धनिक से सभी कर ले लेवे । और उस धनिक को किसानों का जामिनदार मान ले । जो कि राजकर को प्रति अ मास या प्रति ऋतु सबसे अलग - अलग २ लेकर राजा को दिया करे । और योग्यतानुसार सोलहवां, बारहवां, दशवां या आठवां अंश जो राजा को राष्ट्र के . मिलनेवाला कर हो उसका छठां भाग वेतन रूप में देकर राजा ग्रामपाल प्रकरण का सं ( मुखिया ) या अधिकारी की नियुक्ति करे । पर्वतादि ) तथ वादिदु कुटुम्बार्थाद्धरेन्नृपः! य उपभोगे धान्यवस्त्रं क्रेतृतो नाहरेत् फलम् ॥ १२५ ॥

क्वचित् कर लेने के निषेध का निर्देश – राजा कुटुम्बपालनार्थं रखी हुई गो आदि के दुग्ध के ऊपर कर न लेवे, और अपने उपभोग के लिये धान्य तथा वस्त्र खरीदने वाले से भी कर न ग्रहण करे । राज्य तथ के अधीन जिल वार्धुषिकाच्च कौसीदाद द्वात्रिंशांशं हरेन्नृपः । गुण सम्पन्न गृहाद्याधारभूशुल्कं कृष्टभूमिरिवाहरेत् ॥ १२६ ॥ बाद राजा ह

व्यापारी आदि से लाभ का ३२ वां भाग लेने का निर्देश- व्यापार हो नहीं है, क्योंक करनेवालों और । व्याज पर रुपया देनेवालों से लाभांश का ३२ अतिरिक्त अंश ( रुपये में दो पैसा ) कर राजा ग्रहण करे । और गृह बनाने के लिये दी अन्य हुई भूमि का कर बोने के लिये दी हुई भूमि के समान ही लेवे । य CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 307

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चतुर्थाध्याये राष्ट्रप्रकरणम् २२१

अधिक लाम तथा चापणिकेभ्यस्तु पण्यभूशुल्कमाहरेत् ।

मार्गसंस्काररक्षार्थं मार्गगेभ्यो हरेत् फलम् ॥ १२७ ॥

आदि से भूमि का कर लेने का निर्देश - राजा दूकानदारों से २१ ॥ दूकानदार भूमि का कर ग्रहण करे । और यात्रियों से मार्ग की सफाई तथा - का हिस्सा, दूकान की ग्रहण करे । गुजारी रक्षा के लिये भी कर

), इन सर्वतः फलभुग् भूत्वा दासवत् स्यात्तु रक्षणे ।

1 इति कोशप्रकरणं समासात् कथितं किल ॥ १२८ ॥

२२ ॥ इति शुक्रनीतौ चतुर्थाध्यायस्य कोशनिरूपणं नाम द्वितीयं प्रकरणम् ॥ २ ॥

१२३ ॥ राजा सर्वो से कर ग्रहण कर नौकर की भांति उनकी रक्षा करे । इस.

प्रकार से संक्षेप में कोश- प्रकरण का वर्णन किया गया ।

२४ ॥

- को प्रतिभू मालगुजारी वा ग्राम की 1 और र को प्रति करे । और राजा को इस प्रकार शुक्रनीति भाषा टीका में चतुर्थाध्याय का कोशनिरूपण नाम का द्वितीय प्रकरण समाप्त ॥ श्रथ चतुर्थाध्यायस्य तृतीयं राष्ट्रप्रकरणम् ।

अथ मिश्रे तृतीयं तु राष्ट्रं वक्ष्ये समासतः ।

स्थावरं जङ्गमं वापि राष्ट्रशब्देन गीयते ॥ १ ॥

राष्ट्र के दो प्रकारों का निर्देश - अब इस मिश्र अध्याय में तीसरा राष्ट्र प्रकरण का संक्षेप में वर्णन करूंगा । यहां पर ' राष्ट्र ' शब्द से स्थावर ( वृक्ष-जा ग्रामपाल पर्वतादि ) तथा जङ्गम ( गो - मनुष्यादि ) का बोध करना चाहिये ।

यस्याधीनं भवेद्यावत्तद्राष्ट्रं तस्य वै भवेत् ।

कुबेरता शतगुणाधिका सर्वगुणात्ततः ॥ २ ॥

२ ॥ रखी हुई ईशता चाधिकतरा सा नाल्पतपसः फलम् ।

धान्य तथा स दीव्यति पृथिव्यां तु नान्यो देवो यतः स्मृतः ॥ ३ ॥

राज्य तथा राजा की सर्वश्रेष्ठता एवं देवतुल्यता का निर्देश - जिस राजा के अधीन जितना राष्ट्र होता है उतना उसका वह ' राज्य ' कहलाता है । सर्व-॥ गुण - सम्पन्न होने की अपेक्षा सौ गुना अधिक श्रेष्ठ धन - कुबेर होना है, उसके रा - व्यापार बाद राजा होना सबसे अधिक श्रेष्ठ है जो कि साधारण तपस्या का फल का ३२ नहीं अतिरिक्त है, क्योंकि वह संसार में देवता के समान विहार करता है अतः उसके के लिये दी अन्य कोई देवता के समान नहीं माना जाता है । 1 यस्याश्रितो भवेल्लोकस्तद्वदाचरति प्रजा । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 308

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२२२ शुक्रनीति: भुङ्क्ते राष्ट्रफलं सम्यगतो राष्ट्रकृतं त्वषम् ॥ ४ ॥

राजा को देश के पुण्य और पाप का भोक्ता होने का निर्देश - जैसे त राजा के ज आश्रय मैं छोग रहते हैं और वह जैसा आचरण करता है उसकी प्रजायें भी बैंडा ह्री आचरण करती हैं । इसी से वह राजा भी राष्ट्र ( राज्य वर्त्ती प्रजा ) के मुख्य जा किये हुये पाप - पुण्य का फल दुःख - सुख का भली भांति भोग करता है । निर्देश - पूर्वक

स्वस्वधर्मपरो लोको यस्य राष्ट्र प्रवर्तते ।

धर्मनीतिपरो राजा चिरं कीर्ति स चाश्नुते ॥ ५ ॥

भूमौ यावद्यस्य कीर्तिस्तावत्स्वर्गे स तिष्ठति । जिस राजा के राज्य में प्रजाजन अपने २ धर्म में तत्पर रहते हैं, नीति में तत्पर रहनेवाला वह राजा चिरस्थायी कीर्त्ति प्राप्त पृथ्वी पर जिसकी कीर्त्ति जब तक विद्यमान रहती है, तब तक

में रहता है ।

अकीर्तिरेव नरको नान्योऽस्ति नरको दिवि ॥ ६ ॥

नरदेहाद्विना त्वन्यो देहो नरक एव सः ।

महत्पापफलं विद्यादाधिव्याधिस्त्र रूपकम् ॥ ७ ॥

नरक के लक्षण का निर्देश — अपकीर्ति ही नरक है, परलोक में प्रत्येक जातियों का भी प्रतिलोम ( पि धर्म हो गई जिनक तथा म करता है । त वह स्वयं जो लोग जाति मानने ह लोग नहीं मा ज अम्य कोई जरायुजा नरक नहीं है । मनुष्य देह को छोड़कर अन्य देह नरक ही हैं । और आघि अण्डज ( पक्षी व्याधि का होना बड़े पाप का फल ही समझना चाहिये । की प्राणियों क स्वयं धर्मपरो भूत्वा धर्मे संस्थापयेत् प्रजाः । उ I प्रमाणभूतं धर्मिष्ठमुपसर्पन्त्यतः प्रजाः 115 11 से राजा के धर्मिष्ठ बनने का निर्देश - राजा स्वयं धर्म में तत्पर होकर प्रजाजौ से नीच जन्म वर्णव को धर्म में स्थापित रक्खे । इससे प्रजायें भी प्रामाणिक तथा धर्मिष्ठ राजा की क अनुगामिनी बनी रहती हैं । वि देशधर्मा जातिधर्माः कुलधर्माः सनातनाः । कर्म के मुनिप्रोक्ताश्च ये धर्माः प्राचीना नूतनाश्च ये ॥ ६ ॥ गुणों के द्वारा

ते राष्ट्रगुप्त्यै सन्धार्या ज्ञात्वा यत्नेन सन्नृपैः । तथा कला के धर्मसंस्थापनाद्राजा श्रियं कीर्ति प्रविन्दति ॥ १० ॥ की गई है ।

सर्वधर्म - रक्षण से देश - रक्षा होने का निर्देश- बहुत दिनों से प्रचलित देश इ धर्म, जाति - धर्म, तथा कुल - धर्मं एवं सुनियों द्वारा कहे हुये धर्मं, तथा प्राचीन प्र और नवीन धर्म, इन सब का ज्ञान प्राप्त कर राष्ट्र की रक्षा के लिये यत्नपूर्वक द्विजोत अच्छे राजाओं को इनकी रक्षा करनी चाहिये । क्योंकि धर्म की संस्थापना देना ये ३ कम करने से राजा लक्ष्मी तथा कीर्ति को प्राप्त करता है । के लिये यज्ञ चतुर्धा भेदिता जातिर्ब्रह्मणा कर्मभिः पुरा । अधिक हैं । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 309

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चतुर्थाध्याये राष्ट्रप्रकरणम् २२३ 2 । तत्तत्सांकर्यासांकर्यात्त् प्रतिलोमानुलोमतः ॥ ११ ॥

-जैसे राजा जात्यानन्त्यं तु सम्प्राप्तं तद्वक्तुं नैव शक्यते । के प्रजायें भी वैसा जाति के ४ प्रकारों का तथा संकरता से जाति की अनन्तता का वर्ती मजा ) के मुख्य पूर्वकाल में ब्रह्मा जी ने कर्म के अनुसार मानव की ४ जातियां बनाई । है । निर्देश - जातियों का सांकर्य ( मिलावट ) होने पर उन संकीर्ण ( मिश्रित ] उनमें प्रत्येक भी सांकर्य अनुलोम ( पिता उच्च वर्ण - माता नीच वर्ण ) और जातियों का 1 प्रतिलोम ( पिता नीच वर्ण - माता उच्च वर्ण ) रूप से होने से असंख्य जातियां

हो गई जिनका वर्णन करना अशक्य है ।

हैं, धर्म तथा मन्यन्ते जातिभेदं ये मनुष्याणां तु जन्मना १२ ॥

करता है । तएव हि विजानति पार्थक्यं नामकर्मभिः । तक वह स्वर्ग जो लोग पूर्व कर्मानुसार जिस जाति में मनुष्य जन्म ले उसकी वही ज्ञाति मानने हैं, वे ही लोग नाम तथा कर्म से जाति - भेद मानते हैं,. अन्य

॥ = खोग नहीं मानते हैं ।

जरायुजाण्डजाः स्वेदोद्भिज्जा जातिः सुसंग्रहात् ॥ १३ ॥

11 अन्य जरायुजादि चार प्राणियों की जाति का निर्देश - जरायुज ( मनुष्यादि ), कोई । और आ अण्डज ( पक्षी आदि ), स्वेदज ( जूंआ आदि ), उद्भिज्ज ( वृचादि ) ये ४ प्रकार की प्राणियों की जातियां हैं ।

उत्तमो नीचसंसर्गाद्भवेन्नीचस्तु जन्मना ।

= नीचो भवेोत्तमस्तु संसर्गाद्वाऽपि जन्मना ॥ १४ ॥

प्रजा जन्म से उत्तम वर्ण का मनुष्य संसर्गवश नीच हो जाता है किन्तु जन्म होकर से नीच वर्णं का मनुष्य संसर्गवश उत्तम नहीं हो सकता है । र्मिष्ठ राजा की

कर्मणोत्तमनीचत्वं कालतस्तु भवेद् गुणैः ।

विद्याकलाश्रयेणैव तन्नाम्ना जातिरुच्यते ॥ १५ ॥

कर्म के द्वारा मनुष्य तत्काल उत्तम तथा नीच कहलाने लग गुणों के द्वारा कुछ काल के बाद उत्तम या नीच माना जाता है और विद्या तथा कला के आश्रय से भी उसके नामानुसार अनेक जातियों की कल्पना ० प्रचलित ॥ देश-तथा प्राचीन लिये यत्नपूर्वक की संस्थापना की गई है ।

इम्याध्ययनदानानि कर्माणि तु द्विजन्मनाम् ।

प्रतिग्रहोऽध्यापनं च याजनं ब्राह्मणेऽधिकम् ॥

fat तथा ब्राह्मणों के कर्मों का निर्देश - यज्ञ करना, देशाचे ३ कर्म द्विजाति ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ) मान्न के के लिये अधिक यज्ञ कराना, वेद पढ़ाना, दान लेना ये ३ कर्म

हैं ।

१६ ॥

वेद पढ़ना, दान हैं किन्तु ब्राह्मणों जीविका के लिये CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 310 का मूल पृष्ठ
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२२४ शुक्रनीति: सद्रक्षणं दुष्टनाशः स्वांशादानं तु क्षत्रिये । कृषिगोगुप्तिवाणिज्यमधिकं तु विशां स्मृतम् ॥ १७ ॥: गुरु का

क्षत्रिय और वैश्य के कर्मों का निर्देश - सज्जनों की रक्षा करना किया है वही नाश करना, अपने अंश ( कर ) को ग्रहण करना ये ३ कर्म, दुर्श का पड़े केवल जा जीविका के लिये अधिक हैं । खेती करना, गोपालन तथा वाणिज्य क्षत्रियों के f करना ये रे कर्म जीविका वैश्यों के लिये अधिक हैं । दानं सेवैव शूद्रादेनचकर्म कीर्तितम् । मुख्य वि क्रियाभेदैस्तु सर्वेषां भृतिवृत्तिरनिन्दिता ॥ १८ ॥ कलायें अनन्त

शूद्रादि के कर्मों का निर्देश - दान देना, जीविकार्थं नौकरी करना मुख्य रूप सेर तथा नीच कर्म ( चौका - वर्त्तन आदि ) करना शूद्रादि के ये कर्म हैं । क्रियाओं श में भेद द्वारा सभी वर्णों की भरण - पोषणार्थ वृत्ति अनिन्दित मानी गई है ।. सीरभेदैः कृषिः प्रोक्ता मन्त्राद्यैर्ब्राह्मणादिषु ब्राह्मणैः षोडशगवं चतुरूनं यथा परैः द्विगवं वाऽन्त्यजैः सीरं दृष्ट्वा भूमार्दवं तथा ब्राह्मणादि के लिये कृषि - भेद का निर्देश - जैसे मनु हलसंबन्धी भेदों के द्वारा ब्राह्मणादि के लिये भी कृषि करने विद्याओ । किया जा सक ॥ १६ ॥ से कर सकत

। उ आदि स्मृतिकारों ने f का विधान बताया इस प्रक है । उसमें ब्राह्मणों को १६ बैल १ हल पर रख कर खेत जुतवाना चाहिये,. लक्षण कहते और उत्तरोत्तर ४-४ कम बैलों से अर्थात् चत्रियों को १२ बैल, वैश्यों को ८ बैल तथा शूर्दो को ४ बैल १ हल पर रखते हुये खेत जुतवाना चाहिये । ग और अन्यों ( अस्पृश्य जातियों ) को २ बैल १ हल पर रखना चाहिये । विद्याओं यह नियम भूमि की मृदुता को देखकर किया गया है अतः यदि कठिन भूमि २. यजुर्वेद, हो तो बैलों की संख्या २ से ४ भी हो सकती है । ६. धनुर्वेद, ब्राह्मणेन विनाऽन्येषां भिक्षावृत्तिर्विगर्हिता ॥ २० ॥ f

ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य को भिक्षा निन्दित होने का निर्देश - ब्राह्मणों को छोड़ कर अन्य वर्णों के लिये भिक्षा मांग कर जीविका चलाना विशेष रूप. द से निन्दित है । १२. निरुक,

तपोविशेषेर्विविधैव्रतैश्व विधिचोदितैः ।

वेदः कृत्स्नोऽधिगन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना ॥ २१ ॥

द्विजातिको साङ्गवेद पढ़ने का निर्देश – द्विजों को वेद - विहित नाबा प्रकार की तपस्यायें तथा व्रत करते हुये उपनिषदों के सहित सम्पूर्ण बेदों का अध्ययन करना चाहिये । मीमांसा योऽधीतविद्यः सकलः स सर्वेषां गुरुर्भवेत् । ( न्याय वैशेष न च जात्याऽनधीती यो गुरुर्भवितुमर्हति ॥ २२ ॥ १५०

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