शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 331–340

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 331–340

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के किसी कार्यों मे रहते हैं हैं अतः उनकी मदिरा चिकने का

खना चाहिये ।

४५ ॥

किसी को दिन में

४६ ॥

४७ ॥

त्रों को ग्राम में - उनमें परस्पर को १० हाथ, - । और बकरी, द देकर उनका RII ४ ९ ॥ ५० ॥ चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २४५ सहजन ) वैर, नीम, जम्बीर, खिरनी, खजूर, देवकरक्ष, फल्गु ( अञ्जीर ), तापिच्छ (, ( तमाल ), सिम्भल, कुद्दाल, लवली ( हरफारेवड़ी ), आंवला बिजौरा नीबू, बढ़हर, नारियल, केला आदि तथा अन्य भी अच्छे,

सुपारी, जो वृक्ष हों उन्हें ग्राम के समीप में लगाना चाहिये ।

फलवाले वामभागेऽथवोद्यानं कुर्य्याद् वासगृहे शुभम् ॥ ५२ ॥

बागीचा लगाने के स्थान का निर्देश - निवासगृह के वामभाग में अथवा निवासगृह के हाते के अन्दर ही सुन्दर बगीचा लगाना चाहिये ।

सायं प्रातस्तु धर्मान्ते शीतकाले दिनान्तरे ।

वसन्ते पञ्चमेऽह्रस्तु सेव्या वर्षासु न क्वचित् ॥ ५३ ॥

वृक्षों को ऋतुभेद से सींचने के समय का निर्देश - और ग्रीष्म ऋतु में प्रातः तथा सायंकाल में, शीत काल में एक दिन का अन्तर देकर अर्थात् सीसरे दिन, वसन्त ऋतु में दिन के पश्चम मुहूर्त्त में अथवा पांचवे दिन परं वृक्षों को सीचना चाहिये किन्तु वर्षा में कभी भी नहीं सींचना चाहिये ।

फलनाशे कुलत्थैश्च माषैर्मुद्गैर्यवैस्तिलैः ।

शृतशीत पयःसेकः फलपुष्पाय सर्वदा ॥ ५४ ॥

वृक्ष के नष्ट न होने का उपाय - यदि वृक्ष के फल नष्ट हो जाते हों तो उसके लिये कुलथी, उरद, मूंग, जौ, तिल इनमें से किसी एक को डालकर मौटाकर शीतल किये हुये जल - से सीचना चाहिये । इससे वृक्ष सदा फल - फूल देने लगते हैं ।

मत्स्याम्भसा तु सेकेन वृद्धिर्भवति शाखिनाम् ।

आषिकाजशकृच्चूर्ण यवचूर्णं तिलानि च ॥ ५५ ॥

गोमांसमुदकचेति सप्तरात्रं निधापयेत् ।

उत्सेकः सर्ववृक्षाणां फलपुष्पादिवृद्धिदः ॥ ५६ ॥।

बुखों के फल - पुष्प - वृद्धि का उपाय - मछली के धोने के बाद उसी जल सींचने से वृक्षों की वृद्धि होती है । और भेड़ तथा बकरी की विष्ठा का चूर्ण, तिल तथा गोमांस और जल इन सब को सात रात्रि तक वृक्ष के मूल के भीतर देना चाहिये । वृक्षों में इन सब के प्रयोग से फल और पुष्प की ] ५१ ॥ वृद्धि अत्यन्त होती है ।

इमली, चन्दन, ये च कण्टकिनो वृक्षाः खदिराद्यास्तथापरे ।

न्हा, कथ, राजा- आरण्यकास्ते विज्ञेयास्तेषां तत्र नियोजनम् ॥ ५७ ॥।

छ, चम्पा, सीप कोटदार आरण्य वृक्षों के रोपण के स्थान और नामों का निर्देश — और जो वृक्ष ट, शीशम, शिशु मैं करना तथा अन्य खैर आदि के हैं, वे जंगली कहाते हैं । इनका रोपण जंगलों चाहिये । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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२४६ शुक्रनीति:

खदिराश्मन्तशाकाग्निमन्थस्योनाकबब्बुलाः ।

तमाल - शाल- कुटज -घवार्जुनपलाशकाः ॥ ५८ ॥

सप्तपर्ण - शमीतुन देवदारु विकङ्कताः 1 करमर्देङ्गुदी भूर्ज - विषमुष्टि- करीरकाः ५ ९ ॥

शलकी काश्मरी पाठा तिन्दुको बीजसारकः ।

हरीतकी च भल्लातः शम्पाकोऽर्कश्च पुष्करः ॥ ६० ॥

अरिमेदश्च पीतद्रुः शाल्मलिश्च बिभीतकः ।

नरवेलो महावृक्षोऽपरे ये मधुकादयः ॥ ६१ ॥

प्रतानवत्यः स्तम्बिन्यो गुल्मिन्यश्च तथैव च ।

ग्राम्या प्रामे वने वन्या नियोज्यास्ते प्रयत्नतः ॥ ६२ ॥

ह जारयतु जाति के जो गृह उस जा M ग्राम के चौराहे या ग के मन्दिर जैसे - खैर, अश्मन्तक, सागौन, भरणी, सोनापाठा, बबूर, तमाल, शाल, कुटज ( खोरया ), अर्जुन, पलाश, धव, सतवन, शमी, तून, देवदास, विकत, करौंदा, इङ्गुदी, भोजपत्र, कुचिला, करीर, सलई, खम्भार, पादर, तेंदू सार, हरड, मिलावा, शम्याक, आक, पोहकर, दुर्गन्ध खैर, पीतब्रु, बहेड़ा, नरबेल, महावृक्ष और अन्य जो महुआ आदि एवं प्रतान ( पतली शाखाओं ) वाली, गुच्छोंवाली, गुल्म ( मूल ) वाली छतायें से जो ग्राम में होनेवाले हैं उन्हें ग्राम में ओर जो बन में होनेवाले वन में यत्नपूर्वक लगाना चाहिये । कूपवा पोपुष्करिण्यस्तडागाः सुगमास्तथा । , विजय-सेमर, मेरु आ लाबी २ आदि १६ प्र हैं इनमें यन्त्राकार से हैं उन्हें युक, परिचा और जिनके एवं जिनके कार्याः खाता द्वित्रिगुण - विस्तारपदधानिकाः ॥ ६३ ॥ चित्र बने हों

कूपादि में उतरने योग्य सीढ़ियों के बनाने का निर्देश- कूआ, घावनी, छोटा तालाब, बढ़ा तालाब आदि जलाशय ऐसे बनवाने चाहिये जिसमें छोग सुगमता से उतर सकें । और जलाशय की गहराई से दुगुनी या विस्तार में उसके चारों ओर सीढ़ियां बनवानी चाहिये ।

यथा तथा छानेकाश्च राष्ट्रे स्याद्विपुलं जलम् ।

नदीनां सेतवः कार्या विबन्धाः सुमनोहराः ॥ ६४ ॥

नौकादिजलयानानि पारगानि नदीषु च । तिगुनी जिसम जिसका १ ह त + देश में विपुल जल होने एवं पुल आदि बनवाने का प्रबन्ध करने का निर्देश- - इस तरह के बहुत से जलाशय राज्य में बनवाना चाहिये, जिससे प बहुत जल उनमें भरा रहे । अनेक प्रकार के अत्यन्त मनोहर नदियों में पुरु भी बनवाना चाहिये । और नदियों को पार करने के लिये उनमें नौका आदि जिनके इससे नाम जलयान बनवाकर रखना चाहिये । ६. माल्यवान यग्जातिपूज्यो यो देवस्तद्विद्यायाश्च यो गुरुः ॥ ६५ ॥

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५८ ॥ २ ९ ॥ ६० ॥ ३१ ॥ चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् तदालयानि तज्जातिगृहपङ्क्तिमुखे न्यसेत् । पूज्य देव तथा गुरु के गृह बनाने के स्थान जात्यनुकूल के जो पूज्य देवता हों और उनको विद्या पढ़ानेवाले आति के लोगों के मकानों की पंक्ति के संमुख बनाने गृह उस जाति शृङ्गाटके ग्राममध्ये विष्णोर्वा शंकरस्य च ॥ २४७ का निर्देश - जिस जो गुरु हों उनके

चाहिये ।

६६ ॥

गणेशस्य रवेर्देव्याः प्रासादान् क्रमतो न्यसेत् । ग्राम के चौराहे पर विष्णु आदि के मन्दिर बनाने का निर्देश - गांव के चौराहे या गाँव के मध्य में विष्णु, शंकर, गणेश, सूर्य तथा देवी इन पञ्चदेवों

के मन्दिर क्रमशः बनाने चाहिये ।

॥ ६२ ॥

तमाल, शाल, चदारु, विकत तेंदू, विजय-पीतमु, सेमर, ज्ञान ( लम्बी २ कतायें हैं इनमें नेवाले हैं उन्हें मेर्वादिषोडशविधलक्षणान् सुमनोहरान् ॥ ६७ ॥

वर्तुलांश्चतुरस्रान् वा यन्त्राकारान् समण्डपान् ।

प्राकारगोपुरगणयुतान् द्वित्रिगुणोच्छ्रितान् ॥ ६८ ॥

यथोक्तान्तः सुप्रतिमाञ्जलमूलान् विचित्रितान् । मेरु आदि मन्दिर के १६ प्रकारों का सलक्षण निर्देश - जो मन्दिर मेरु बादि १६ प्रकार के लक्षणों से युक्त, अत्यन्त मनोहर, गोलाकार, चौकोर या यन्त्राकार से युक्त, मण्डप, प्राकार ( परकोटा ) तथा प्रधान विशाल द्वारों से युक्त, परिचारक वर्गों से युक्त, लम्बाई - चौड़ाई से दुगुना या तिगुने ऊंचे हों और जिनके मध्य ' शास्त्रोक्त रीति से बनी हुई सुन्दर देवमूर्त्तियां रखी हों । एवं जिनके चारों ओर खाइयों में जल भरा हो तथा जिनमें नाना प्रकार के । ६३ ॥ चित्र बने हों । - कुआ, बावड़ी, जिसमें लोग रम्यः सहस्रशिखरः सपादशतभूमिकः ॥ ६६ ॥

मी या तिगुनी सहस्रहस्तविस्तारोच्छ्रायः स्यान्मेरुसंज्ञकः । जिस मन्दिर में १ हजार कंगूरे बने हों और १२५ पगभूमि हो, तथा जिसका १ हजार हाथ का विस्तार तथा ऊंचाई हो, वह मेह संज्ञक होता है ।: ६४ ॥ ततस्ततोऽष्टांशहीना अपरे मन्दरादयः ॥ ७० ॥

मन्दरो ऋक्षमालीच घुमणिश्चन्द्रशेखरः ।

बन्ध करने का माल्यवान् पारियात्रश्च रत्नशीर्षश्च धातुमान् ॥ ७१ ॥

चाहिये, जिससे पद्मकोशः पुष्पहासः श्रीकरः स्वस्तिकाभिधः ।

नदियों में पुल महापद्मः पद्मकूटः षोडशो विजयाभिधः ॥ ७२ ॥

उनमें नौका आदि इससे उत्तरोत्तर अष्टांश हीन अन्य मन्दर आदि नामवाले मन्दिर होते हैं । विपके नाम क्रम से २. मन्दर, ३. श्वश्वमाली, ४. धुमणि, ५. चन्द्रशेखर, ६. • माझ्यवान् ६५ ॥, ७. पारियात्र, ८. रत्नशीर्ष, ९. धातुमान्, १०. पद्मकोश, CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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२४८ शुक्रनीति: ११. पुष्पहास, १२. श्रीकर, १३. स्वस्तिक, १४. महापद्म १६. विजय ये सब हैं ।, १५.

तन्मण्डपश्च तत्तुल्यः पादम्यूनोच्छ्रितः पुरः ।

स्वाराध्यदेवताध्यानैः प्रतिमास्तेषु योजयेत् ॥ ७३ ॥

मेर्वादिकों के अनुसार उनके मण्डपों प्रमाणों का निर्देश -- उन के मण्डप ( देवताभवन ) उन्हीं के अनुरूप उनकी ऊँचाई से पद्मपूट देवता ही रम्य और मन्दिरों ऊँचे आगे भाग में बनाने चाहिये | उनमें अपने आराध्य देवताओं के ध्यान और के अनुसार देवता की मूर्तियां स्थापित करनी चाहिये । के लिये क ध्यानयोगस्य संसिद्धचै प्रतिमालक्षणं स्मृतम् । भी हो तो प्रतिमाकारको मर्त्यो यथा ध्यानरतो भवेत् ॥ ७४ ॥

तथा नान्येन मार्गेण प्रत्यक्षेणापि वा खलु । सावि ध्यान योग में प्रतिमा की साधनमुख्यता का निर्देश – ध्यान योग की १. साविक भलीभांति सिद्धि के लिये प्रतिमारूपी साधन मुख्य कहा है, क्योंकि प्रतिमा और जहां बनानेवाला मनुष्य जै ध्यान में लीन हो जाता है वैसा निश्चय अन्य मार्ग से या प्रत्यक्ष देवता के देखने से भी ध्यान में लीन नहीं हो सकता है । प्रतिमा सैकती पैष्टी लेख्या लेप्या च मृम्मयी ॥ ७५ ॥ सावि

पाषाणात् स्थिरा ज्ञेया यथोत्तरा । अवस्था में । बालू से लेकर धातु पर्यन्त की बनी प्रतिमाओं की उत्तरोत्तर स्थिरता की है, एवं इ अधिकता का निर्देश - प्रतिमायें बालू की, चावल आदि को पीस कर उसके कहलाती ह पिण्ड की, चित्र की, लेप की, मिट्टी की, काष्ठ की, पाषाण की, धातु की बनती हैं । ये उत्तरोत्तर एक से दूसरी अधिक स्थिर होती हैं । यथोक्तावयवैः पूर्णा पुण्यदा सुमनोहरा ॥ ७६ ॥। राजस

अन्यथाऽऽयुर्धनहरा नित्यं दुःखविवर्द्धिनी । नाना आम शास्त्रोक तथा अन्यथा रीति से बनी प्रतिमा के फल - यदि प्रतिमा और अभया शास्त्रोक्त नियमानुसार अङ्गों से परिपूर्ण बनी हो तो वह पुण्य देनेवाली समा अत्यन्त मनोहर होती है । यदि अन्यथा रीति से बनी हो तो आयु तथा धन को हरण करनेवाली और निस्य दुःख को बढ़ानेवाली होती है । तामस देवानां प्रतिबिम्बानि कुर्याच्छ्रेयस्कराणि च ॥ ७७ ॥ मारनेवाली

होती है च स्वर्ग्याणि मानवादीनामस्वर्ग्यान्यशुभानि च । देव - प्रतिमा की शुभकारिता मानव - प्रतिमा की अशुभकारिता का निर्देश-देवताओं की प्रतिमायें बनवानी चाहिये क्योंकि वे शुभकारक तथा स्वर्गदायक होती हैं 1 । और मनुष्यों की प्रतिमायें तो अशुभकारक तथा स्वर्ग देनेवाली नहीं प्रतिमाओं संक्षेप होती हैं । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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, १५. पशकू ३ । श - उन मन्दिरों चतुर्थांश कम तार्थी के ध्यान 98 11 - ध्यान योग की क्योंकि प्रतिमा निश्चय अन्य मार्ग

ता है ।

७५ ॥

तर स्थिरता की पीस कर उसके धातु की बनती ७६ ॥ यदि प्रतिमा - देनेवाली तथा आयु तथा घन ७७ ॥ का निर्देश-तथा स्वर्गदायक देनेवाली नहीं चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २४ ९ मानतो नाधिकं हीनं तद्विम्बं रम्यमुच्यते ॥ ७८ ॥

प्रतिमा शास्त्रोक्त मान से न अधिक और न हीन होने पर देवताओं की होती हैं । ही रम्य और कल्याणकारक

अपि श्रेयस्करं नृणां देवबिम्बमलक्षणम् ।

सलक्षणं मत्र्यबिम्बं न हि श्रेयस्करं सदा ॥ ७६ ॥

और देवता की प्रतिभा यदि शास्त्रोक्त लक्षणों से रहित भी हो तो मनुष्यों के लिये कल्याणकारक होती है और यदि मनुष्य की प्रतिमा लक्षणों से युक्त भी हो तो सदा ही कल्याणकारक नहीं होती है ।

सात्त्विकी राजसी देवप्रतिमा तामसी त्रिधा ।

विष्ण्वादीनां च या यत्र योग्या पूज्या तु तादृशी ॥ ८० ॥

साविकी आदि तीन प्रकार की प्रतिमाओं का निर्देश - विष्णु आदि देवता १. सात्विकी, २. राजसी, ३. तामसी इन भेदों से ३ प्रकार की होती है । और जहां पर जैसी योग्य हो वहां पर वैसी प्रतिमा की पूजा

योगमुद्रान्विता स्वस्था वराभयकरान्विता ।

देवेन्द्रादिस्तुतनुता सात्त्विकी सा प्रकीर्तिता ॥

साविकी प्रतिमा के लक्षण – जो प्रतिमा योगमुद्रा से अवस्था में स्थित, वरदान तथा अभय दान देनेवाली मुद्रा है, एवं इन्द्रादि देवता जिसकी स्तुति तथा नमन कर रहे कहलाती है । तिष्ठन्ती वाहनस्था वा नानाभरणभूषिता ।

करनी चाहिये ।

८१ ॥

युक्त, स्वाभाविक से युक्त हाथवाली हैं, वह ' सात्विकी ' या शस्त्रास्त्रा भयवर- करा सा राजसी स्मृता ॥ ८२ ॥

राजसी प्रतिमा के लक्षण - जो प्रतिमा किसी वाहन पर बैठी हुई तथा नाना आभूषणों से युक्त होती है एवं जिसके हाथों में शस्त्र, अस्त्र तथा वर और अभय दान की मुद्रा बनी हुई है वह ' राजसी ' कहलाती है ।

शखा दैत्यहन्त्री या ह्युग्ररूपधरा सदा ।

युद्धाभिनन्दिनी सा तु तामसी प्रतिमोच्यते ॥ ८३ ॥

तामसी प्रतिमा के लक्षण - जो प्रतिमा शव तथा अस्त्रों से दस्यों को मारनेवाली, उग्ररूप को धारण किये हुई, सदा युद्ध के लिये उत्सुक रूप में होती है वह ' तामसी ' कहलाती है ।

संक्षेपतस्तु ध्यानादि विष्ण्वादीनां तथोच्यते ।

प्रमाणं प्रतिमानां च तदङ्गानां सुविस्तरम् ॥। ८४ ॥

संक्षेप से विष्णु आदि देवताओं का जैसा ध्यान है तथा विस्तारपूर्वक प्रतिमाओं का पुर्व उनके भङ्गों का प्रमाण है, वैसा कहते हैं । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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२५० शुक्रनीतिः स्वस्वमुष्ठेश्चतुर्थोऽशो ह्यङ्गुलं परिकीर्तितम् । तदङ्गुलैर्द्वादशभिर्भवेत् तालस्य दीर्घता अंगुलादिकों के प्रमाणों का निर्देश - अपनी २ मुष्टि के ॥ चतुर्थाश ६५ ॥ बाल १ अंगुल का प्रमाण कहा हुआ है । और १२ अंगुल के बराबर मूर्ति ५ ता मानी गई है । की लम्बाई १ लाख हो वामनी सप्तताला स्यादष्टताला तु मानुषी । नवताला स्मृता देवी राक्षसी दशतालिका ॥ ८६ ॥ सत्ययु

वामनी, मानुषी, देवी, राक्षसी प्रतिमाओं के लक्षण - जो प्रतिमा • ताल की प्रमाण ऊँची है वह ' वामनी ' ८ ताल की ' मानुषी ' ९ ताल की ७ ताल प्रमाण ऊंची १० ताल प्रमाण की ऊँची ' राक्षसी ' कहलाती है । ' देवी ' और

सप्ततालाद्युच्चता वा मूर्तीनां देशभेदतः ।

सदैव स्त्री सप्तताला सप्ततालश्च वामनः ॥ ८७ ॥

स्त्री देवता तथा वामन भगवान की प्रतिया की ऊँचाई का प्रमाण- ९ अथवा देशभेद से उपर्युक्त ७ ताल आदि प्रमाण की ऊंचाई प्रतिमाओं की मानी ९ ताल गई है ॥ और सदा स्त्री देवता की प्रतिमा ७ ताल की ऊँची और वामन भगवान चाहिये, जि की ७ ताल की ऊँची बनानी चाहिये । भाग २ अ न नारायणो राम्रो नृसिंहो दशतालकः । प्रमाण का दशतालः स्मृतो बाणो बलीऽम्द्रो भार्गवोऽर्जुनः ॥ ८८ ॥

नर - नारायणादि की प्रतिमाओं की ऊँचाई का प्रमाण - नर, नारायण, राम और नृसिंह की प्रतिमा १० ताल की ऊंची, एवं बाणासुर, बलि, इन्द्र, परशुराम तथा अर्जुन की भी प्रतिमा १० ताल ऊंची कही हुई है । ४ अ चण्डी. भैरववेतालनरसिंहवराहकाः । नीचे १ ता क्रूरा द्वादशठालाः स्युर्हयशीर्षादयस्तथा ॥ ८६ ॥ से नीचे लि

ज्ञेया पोडशताला तु पैशाची वाऽऽसुरी सदा । चण्डी आदि की प्रतिमाओं की ऊंचाई के प्रमाण - चण्डी, भैरव, बेताल, नरसिंह, वराह तथा हयग्रीव आदि क्रूर देवताओं की प्रतिमा १२ ताल ऊंची २ ता एवं पैशाची या आसुरी प्रतिमा १६ ताल ऊंची सदा बनाने को कही गई है । २ ताल प्र हिरण्यकशिपुर्वृत्रो हिरणाक्षश्च रावणः ॥ ९ ० ॥ प्रमाण बन कुम्भकर्णोऽथ नमुचिर्निशुम्भः शुम्भ एव हि । एते षोडशतालाः स्युर्माहिषो रक्तबीजकः ॥ ९ १ ॥ पण्डि असुरों की प्रतिमा की ऊंचाई का प्रमाण - - 1 हिरण्यकशिपु, वृत्रासुर, विभागपूर्व हिरण्याच, रावण, कुम्भकर्ण, नमुचि, निशुम्भ, शुम्भ, महिषासुर तथा रकबीज इन सब असुरों की प्रतिमायें १६ ताल की ऊंची होती हैं । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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२५ ॥ तुर्थांश के बराबर बाई १ ताल की ६ ॥ प्रतिमा ७ ताक की ' देवी ' और ७ ॥ का प्रमाण-माओ की मानी वामन भगवान ६५ ॥ नारायण, राम बलि, इम ॥ भैरव, वेताल, २ ताल ऊंची

ही गई है ।

३ ॥

बु, वृत्रासुर, तथा रकबीज चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २५१ पचतालाः स्मृता बालाः षट्तालाश्च कुमारकाः । कुमार भाव की प्रतिमा की ऊंचाई का प्रमाण -बालभाव की

बाल तथा तथा कुमार भाव की ६ ताल की ऊची बनानी चाहिये ।

मूर्ति ५ ताल की कृतयुगे त्रेतायां नवतालिका ॥ ९ २ ॥

दशताला अष्टताला द्वापरे तु सप्तताला कलौ स्मृता । - भेद से प्रतिमा की ऊँचाई के प्रमाण में भेद - सत्ययुग में • ताल सत्ययुगादि ऊंची, त्रेता में ९ ताल, द्वापर में ८ ताल और कलियुग में ७ ताल

प्रमाण ऊंची प्रतिमा बनाने के लिये सामान्य रूप से कहा है ।

नवताल प्रमाणे तु मुखं तालमितं स्मृतम् ॥ ९ ३ ॥

चतुरङ्गुलं ललाटं स्यादधो नासा तथैव च ।

नासिकाऽधश्च हन्वन्तं चतुरङ्गुलमीरितम् ॥ ९ ४ ॥

९ ताल प्रमाण ऊंची प्रतिमा के अवयवों के प्रमाणों का निर्देश - यदि ९ ताल प्रमाण की प्रतिमा हो तो उसमें मुख १ ताल प्रमाण का बनाना चाहिये, जिसमें ४ अंगुल प्रमाण का ललाट और उसके नीचे भाग २ अंगुल का एवं नासिका के नीचे हनु ( ठुड्डी ) तक प्रमाण का बनाना चाहिये । चतुरङ्गुला भवेद् ग्रीवा तालेन हृदयं पुनः । नाभिस्तस्मादधः कार्या तालेनैकेन शोभिता नाभ्यधश्च भवेन्मेढ्र ं भागेनैकेन वा पुनः । ४ अंगुल प्रमाण ग्रीवा, १ ताल प्रमाण हृदय अर्थात् नीचे १ ताल प्रमाण सुन्दर नाभि बनानी चाहिये । और १

से नीचे लिङ्ग तक का भाग बनाना चाहिये ।

द्विताला ह्यायतावूरू जानुनी चतुरङ्गुले ॥

जङ्घे ऊरुसमे कार्ये गुल्फाघश्चतुरङ्गुलम् २ ताल प्रमाण लंबे दोनों ऊरु, ४ अंगुल प्रमाण दोनों २ ताल प्रमाण दोनों जंघायें और दोनों गुल्फों के नीचे

प्रमाण बनाना चाहिये ।

नवतालात्मकमिदमूर्ध्वमानं बुधैः स्मृतम् ॥

नासिका तक का का भाग ४ अंगुल || ६५ || वचःस्थल, उसके ताल प्रमाण नाभि ६६ ॥ । जानु, ऊरु के समान का भाग ४ अंगुल ६७ || पण्डितों ने इस प्रकार से प्रतिमा की ९ ताल प्रमाण की ऊंचाई का विभागपूर्वक वर्णन किया है ।

शिखावधि तु केशान्तं त्र्यकुलं सर्व मानतः ।

दिशाऽनया च विभजेत् सप्ताष्टदशतालकम् ॥ ६८ ॥

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२५२ शुक्रनीति: चाहे जिस मान की प्रतिमा बनावे, सभी मानों में शिखा मान ३ ही अङ्गुल मानना चाहिये । इस रोति से ७ पर्यन्त केशों हाथ की प्रतिमाओं के अङ्ग - निर्माण में त्रैराशिक नियमानुसार , ८ तथा १० ताल चाहिये । मान कल्पना चतुस्तालात्मकौ बाहू ह्यङ्गुल्यन्तावुदाहृतौ । स्कन्धादिकूर्परान्तं च विंशत्यङ्गुलमुत्तमम् त्रयोदशाङ्गुलं ॥ ६६ ॥

चाधः कक्षायाः कूर्परान्तकम् ।

अङ्गुलि अष्टाविंशत्यङ्गुलस्तु मध्यमान्तः करः स्मृतः ॥ १०० ॥

पर्यन्त का दिखाई पड़े प्रमाण करनी रम्य प्र के जो - जो अ तभी अत्यन्त स्कन्ध से लेकर कूर्पर दोनों बाहुओं की लम्बाई ४ ताल प्रमाण कही हुई है । कृश बने हों ( केहुनी ) पर्यन्त २० अङ्गुल की लम्बाई है । कच्चा ( कांख ) के नीचे से कूर्पर पर्यन्त की उत्तम कही होनी चाहिये । कूर्पर से मध्यमा अङ्गुलि लम्बाई १३ अगुरु की प्रमाण कहा हुआ है । पर्यन्त हाथ की लम्बाई २८

सप्ताङ्गुलं करतलं मध्या पश्चाङ्गुला मता ।

सार्घत्रयाङ्गुलोऽङ्गुष्ठस्तर्जनीमूल पर्वभाक् ॥ १०१ ॥

पर्षद्वयात्मकोऽन्यासां पर्वाणि त्रीणि त्रीणि तु ।

अर्धाङ्गुलेनाङ्गुलेन हीनानामा च तर्जनी ॥ १०२ ॥

कनिष्ठिकानामिकातोऽङ्गुलोना च प्रकीर्तिता । उसमें ७ अङ्गुल का करतल, ५ भङ्गुल लम्बी मध्यमा है । अंगूठे की लम्बाई ३॥ अङ्गुल प्रमाण होनी अङ्गुलि मानी रम्य त के लिये सव हो वही रम्य मतान्त जिसमें जिस को तो जो गई होती है । मूल भाग तक पहुँचनेवाली चाहिये और वह तर्जनी के अन्य एवं दो पर्व ( पोर ) वाला होना चाहिये । और सभी अङ्गुलियों में तीन २ पोर होने चाहिये । तथा मध्यमा अवयव से आधा अङ्गुल छोटी अर्थात् ४॥ अङ्गुल लम्बी अनामिका अङ्गुलि भौहें मिलाक की ) अङ्गुलि और १ अंगुल छोटी ( कनिष्ठिका के बगल बगल ( ४ अंगुल लम्बी ) तर्जनी ( अंगूठा के की ) अंगुलि होनी चाहिये । दोनों चतुर्दशाङ्गुलौ पादौ अङ्गुष्ठोद्वचङ्गुलो मतः ॥ १०३ ॥ समान कुछ

सार्द्धद्वयालोऽस्तन्मिता वा प्रदेशिनी । तथा चौड़ाई • प्रदेशिनी द्वचङ्गुला तु सार्घाङ्गुलमथेतराः ॥ १०४ ॥

१४ अंगुल लम्बे दोनों पैर होने चाहिये । उसमें अंगूठा दो अंगुल प्रमाण का और प्रदेशिनी ( अंगूठे के बगल की ) अंगुली भी २ अंगुल प्रमाण की दोनों अथवा अंगूठा और प्रदेशिनी ढाई २ अंगुल प्रमाण की तथा अन्य अंगुलियाँ ( १ अंगुल डेढ़ २ अंगुल प्रमाण की बनानी चाहिये । का मूल भा शिरोमितौ पाणिपादौ गूढगुल्फौ प्रकीर्तितौ ।.. CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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पर्यन्त केशों का १० ताल प्रमाण - कल्पना करनी २०० ॥ कही हुई है । ई उत्तम कही १३ अशुरू की चाई २८ ०१ ॥ ०२ ॥ लिमानी गई वह तर्जनी के चाहिये । और ध्यमा अङ्गुलि ठिका के बगल ( अंगूठा के ३ ॥ ॥ अंगुल प्रमाण 5 प्रमाण न्य अंगुलियां चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपण प्रकरणम् २५३ और पैर ऐसे बनाने चाहिये जिसमें सिरायें ( नसें ) तथा गुल्फ न हाथ दिखाई पड़े । तद्विज्ञैः प्रस्तुता ये ये मूर्तेरवयवाः सदा ॥ १०५ ॥

न हीना नाधिका मानान्ते ते ज्ञेयाः सुशोभनाः ।

स्थूला न कशा वापि सर्वे सर्वमनोरमाः ॥ १०६ ॥

रम्य प्रतिमा के लक्षण- - मूर्ति के बनानेवाले कारीगरों द्वारा निर्मित मूर्त्ति के जो - जो अवयव हों वे सब यदि शास्त्रोक्त मान से न अधिक और न कम हो तभी अत्यन्त सुन्दर मानना चाहिये । और यदि सभी अङ्ग न स्थूल तथा न ह्रया बने हों तो सभी भांति से उन्हें सुन्दर मानना चाहिये ।

सर्वाङ्गः सर्वरम्यो हि कश्चिलक्षे प्रजायते ।

शास्त्रमानेन यो रम्यः स रम्यो नान्य एव हि ॥ १०७ ॥

रम्य तथा अरम्य प्रतिमा का अन्तर --- लाखों में कोई एक प्रतिमा सर्वो के लिये सर्वाङ्ग सुन्दर बनती है किन्तु शास्त्र प्रमाणानुसार जो रम्य ( सुन्दर ) हो वही रम्य कहलाता है अन्य नहीं ।

शास्त्रमानविहीनं यदरम्यं तद्विपश्चिताम् ।

एकेषामेव तद् रम्यं लग्नं यत्र च यस्य हृत् ॥ १०८ ॥

मतान्तर से रम्य और अरभ्य के अन्तर - किसी एक का मत है कि-जिसमें जिसका मन लग जाता है उसके लिये वही रम्य होता है किन्तु विद्वानों को तो जो शास्त्र के प्रमाण से विरुद्ध बनी प्रतिमा है वही होती है । अष्टाङ्गुलं ललाटं स्यात्तावन्मात्रे भ्रुवौ मते अवयवों की आकृति का वर्णन - ललाट ८ अंगुल भौहें मिलाकर उतनी ही ( ८ अंगुल चौड़ी ) होनी चाहिये अर्धाङ्गुला भ्रुवोर्लेखा मध्ये धनुरिवायता नेत्रे च त्र्यलायामे ले विस्तृते शुभे दोनों भौहों की चौड़ाई आधा अंगुल और मध्य में अरम्य ( असुन्दर ) । चौड़ा, और दोनों

॥ १०६ ॥

। धनुष के आकार के समान कुछ उठी हुई होनी चाहिये । और नेन्नों की लम्बाई तीन अंगुल की

तथा चौड़ाई दो अंगुल की एवं देखने में सुन्दर बनानी चाहिये ।

तारका तत्तृतीयांशा नेत्रयोः कृष्णरूपिणौ ॥ ११० ॥

तु भ्रुवोर्मध्यं नासामूलमथाङ्गुलम् । दोनों नेत्रों की कृष्ण वर्ण की पुतलियाँ नेत्र के तृतीयांश के बराबर ( १ अंगुल ) की, दोनों भौहों के मध्य का भाग दो अंगुल चौड़ा एवं नाता का मूल भाग एक अंगुल चौड़ा बनाना चाहिये । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 340

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 340 का मूल पृष्ठ
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२५४ शुक्रनीति: नासाप्रविस्तरं तद्वद् द्व्यङ्गुलं तद्विलद्वयम् ॥ १११ ॥

शुकनासाकृतिर्नासा सरलं वा द्विधा शुभा । नासा के अग्रभाग का विस्तार दो अंगुल का एवं उसके दो छिद्र ही अंगुल के होने चाहिये । सुग्गे की नासा के आकार जैसी भी दो अययव दोनों प्रकार की अर्थात् दोनों प्रकारों में से किसी एक प्रकार को अथवा सीधी अकुल का जानी चाहिये । नाला बनाई और लम्बाई निष्पावसदृशं नासापुटयुग्मं सुशोभनम् ॥ ११२ ॥

दोनों नासापुट निष्पाव ( मोठ ) के समान अस्यन्त सुन्दर चाहिये । बनाना ग्रीवा कर्णौ च भ्रूसमौ ज्ञेयौ दीर्घौ च चतुरङ्गुलौ! भाग ( वच कर्णपाली त्र्यङ्गुला स्यात् स्थूला चाघोङ्गुला मता ॥ ११३ ॥। होनी चाहिय

दोनों कान भी भौहों के समान चार २ अंगुल लम्बे होने चाहिये । कर्ण पाली तीन अंगुल लम्बी और आधी अंगुल मोटी होनी चाहिये । E नासावंशोऽर्द्धाङ्गुलस्तु श्लक्ष्णः सार्द्धाङ्गुलोन्नतः । हृदय क नासिका का दण्ड तीन अंगुल लम्बा, डेढ़ अंगुल उन्नत, और चिकना तथा से लेकर पृष्ठ

ऊंचा होना चाहिये ।

प्रीबामूलाच्च स्कन्धान्तमष्ट्रा ङ्गुलमुदाहृतम् ॥ ११४ ॥

बाह्वन्तरं द्वितालं स्थात्तालमात्रं स्तनान्तरम् | कमर क अवयवों के अन्तर का प्रमाण- प्रीवा के मूल भाग से लेकर स्कन्ध पर्यन्त चाहिये । और आठ अंगुल का विस्तार होना चाहिये । दोनों बाहुओं का अन्तर अर्थात् वर्ष होना चाहिये -स्थल दो ताल प्रमाण चौड़ा होना चाहिये । और दोनों स्तनों का अन्तर ( मध्यभाग ) एक ताल प्रमाण चौड़ा होना चाहिये । षोडशाङ्गुलमात्रं तु कर्णयोरन्तरं स्मृतम् ॥ ११५ ॥ स्त्रियों क

कर्णहन्वप्रान्तरं तु सदैवाष्टाङ्गुलं मतम्! अंगुल अधि एक कान से लेकर दूसरे कान तक का अन्तर १६ अंगुल प्रमाण होना परिधि सोलह चाहिये । और कान तथा हनु का अग्रभाग ( ठुड्डी ) का अन्तर सदा आठ होनी चाहिय

अंगुल का होना चाहिये ।

नासाकर्णान्तरं तद्वत्तदर्धं कर्णनेत्रयोः ॥ ११६ ॥

मुखं तालतृतीयांशमोष्ठावर्धाङ्गुलौ मतौ । हाथ के नाक और कान का अन्तर भी उसी तरह से ( आठ अंगुल का ) होना अंगुल को हो चाहिये 1 । और कान तथा नेत्र का अन्तर उससे आधा ( चार अंगुल का ) का होना च रखना चाहिये । सुख की चौड़ाई एक ताल का तृतीयांश प्रमाण होना चाहिये । दोनों ओठ आध अंगुल प्रमाण का होना चाहिये । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri