शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 341–350
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 341–350
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२११ ॥ छिद्र भी दो अथवा सांधी नासा बनाई २२ ॥ सुन्दर बनाना चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् द्वात्रिंशदंगुलः प्रोक्तः परिधिर्मस्तकस्य च ॥ विस्तृतिस्तद् द्वादशाङ्गुलदीर्घता । दश की परिधि का प्रमाण - मस्तक की परिधि अवयवों चाहिये । मस्तक का विस्तार ( चौड़ाई अकुल का होना अंगुल का होना चाहिये । और लम्बाई बारह ग्रीवामूलस्य परिधिर्द्वाविंशत्यङ्गुलात्मकः ॥ हृन्मध्य- परिधिर्ज्ञेयश्चतुःपञ्चाशदङ्गुलः २५५ ११७ ॥ ( घेरा ) बत्तिस ) दश अङ्गुल का ११८ ॥ ग्रीवा मूल की परिधि बाइस अंगुल की होनी चाहिये । हृदय के मध्य भाग ( वच के मध्य भाग ) की परिधि चउअन ( ५४ ) अंगुल की
होनी चाहिये ।
ना ॥ ११३ ॥
चाहिये । कर्ण-चिकना तथा २१४ ॥ स्कन्ध पर्यन्त अर्थात् व नों का अन्तर १५ ॥ - प्रमाण होता तर सदाभाऊ ६ ॥ का ) होना र अंगुल का )
होना चाहिये ।
होनाङ्गुलचतुस्तालपरिधिर्द्वदयस्य च ॥ ११६ ॥
आ स्तनात् पृष्ठदेशान्ता पृथुता द्वादशाङ्गुला । हृदय की परिधि एक अंगुल कम चार ताल प्रमाण होनी चाहिये । स्तन
से लेकर पृष्ठ पर्यन्त की मुटाई बारह अंगुल की होनी चाहिये ।
सार्वत्रितालपरिधिः कट्याश्च द्वयङ्गुलाधिकः ॥ १२० ॥
चतुरङ्गुल उत्सेधो विस्तारः स्यात्षडङ्गुलः । कमर की परिधि दो अंगुल अधिक साढ़े तीन ताल प्रमाण की होनी चाहिये । और उसकी ऊंचाई चार अंगुल की तथा विस्तार ६ अंगुल का
होना चाहिये ।
पश्चाद्भागे नितम्बस्य स्त्रीणामङ्गुलतोऽधिकः ॥ १२१ ॥।
बाह्रममूलपरिधिः षोडशाष्टादशाङ्गुलः । त्रियों की मूर्ति के नितम्ब के पीछे भाग में पुरुष की अपेक्षा परिधि एक गुल अधिक साढ़े तीन ताल प्रमाण होना चाहिये । बाहु के अग्रभाग की परिधि सोलह अंगुल की एवं बाहु के मूल भाग की परिधि अट्ठारह अंगुल की
होनी चाहिये ।
हस्तमूलाम - परिषिञ्चतुर्दश दशाङ्गुलः ॥ १२२ ॥
पचाङ्गुला पादकरतलयोर्विस्तृतिः स्मृता । हाथ के मूलभाग की परिधि चौदह अंगुल की एवं अग्रभाग की परिधि दश अंगुल को होनी चाहिये 1 । पैर तथा हाथ के तलभाग का विस्तार पांच अंगुल
का होना चाहिये ।
अरुमूलस्य परिधि द्वात्रिंशदङ्गुलात्मकः ॥ १२३ ॥
ऊनविंशत्यङ्गुलः स्यादूर्वप्रपरिधिः स्मृतः । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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२५६ शुक्रनीति: ऊरु के मूलभाग की परिधि बत्तीस अंगुल की ओर और ऊद
की परिधि उन्नीस अंगुल की होनी चाहिये ।
जङ्घामूलाग्र परिधिः षोडशद्वादशाङ्गुलः ॥ १२४
मध्यमामूलपरिधिर्विज्ञेयश्चतुरङ्गुलः जंघा के मूल भाग की परिधि सोलह अंगुल की एवं जंघा के परिधि बारह अगुल की होनी चाहिये । मध्यमा अंगुली के के अग्रभाग ॥ प्रतिम देखने में स अग्रभाग का होना च की परिधि चार अंगुल की होनी चाहिये । मूल भाग की तर्जन्यनामिकामूलपरिधिः सार्धभ्यङ्गुलः ॥ १२५ ॥ योग्यत
कनिष्ठिकायाः परिधिर्मूले त्र्यङ्गुल एव हि । द्विगुण, त्रिरं तर्जनी और अनामिका अंगुली के मूल भाग की परिधि साढ़े तीन कापीठ ( की होनी चाहिये | किन्तु कनिष्ठिका अंगुली के मूलभाग की परिधि तीन अंगुल ही
अंगुल की होनी चाहिये ।
स्वमूलपरिघेः पादहीनो परिधिः स्मृतः ॥ १२६ ॥
देवमनि हस्तपादाङ्गुष्ठयोश्च चतुःपञ्चाङ्गुलं क्रमात् । और प्रत्येक अंगुलियों के अपने २ मूल भाग की परिधियों की अपेक्षा म पीठ से दस भाग की परिधियां प्रमाण में चतुर्थांश हीन होती हैं । जैसे मध्यमा के मूल भूमि द्वार स भाग की परिधि चार अंगुल की है तो उसके अग्र भाग की परिधि चतुर्याचा अनुरूप हिर हीन होने से तीन अंगुल की होती है । इसी भांति से अन्य अंगुलियों के लिये भी समझना चाहिये । हाथ तथा पैर के अंगूठे की परिधि क्रम से
पांच अंगुल की होनी चाहिये ।
पादाङ्गुलीनां परिधिस्त्र्यङ्गुलः समुदाहृतः ॥ १२७ ॥
मण्डलं स्तनयोर्नाभेः सार्धाङ्गुलमथाङ्गुलम् । पैर की अंगुलियों की परिधि तीन अंगुल की होनी चाहिये । मंडल ( परिधि ) डेढ़ अंगुल का एवं नाभि का मण्डल एक
होना चाहिये ।
सर्वाङ्गानां यथाशोभि पाटवं परिकल्पयेत् ॥ १२८
चार तथा मञ्जिल सवा सौ महि बने हुये म स्तनों का शक्ति के अन अंगुल का प्रासाद ॥ प्रासाद ' उत्तम मूर्ति के संपूर्ण अङ्ग ऐसे बनाने चाहिये जिससे उनकी सुन्दरता की शोमा ' अघम ' प्रास विशेष रूप से प्रतीत होती हो । प्र नो दृष्टिम घोष्टिं मीलिताक्षी प्रकल्पयेत् । स नोदृष्टिं तु प्रतिमां प्रसन्नाक्षीं विचितयेत् ॥ १२६ ॥ मन्दिर
प्रतिमा की दृष्टि का प्रमाण- — और ऊपर अथवा नीचे की ओर दृष्टिवाकी अथवा मण्डप किंवा सुंदी आंखोंवाली वा उप्र दृष्टिवाली मूर्ति नहीं बनानी चाहिये 1 । अपि बनाना चाहि तु प्रसन्नता से भरी दृष्टिवाली मूर्ति बनानी चाहिये । स्तम्भ की क १७ शु ० CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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करु के अग्रभाग १२४ ॥ के अग्रभागकी मूल भाग की १२५ ॥ बाढ़े तीन अंगुल परिधि तीन ही २२६ ॥ 1 की अपेक्षा म मध्यमा के मूल परिधि चतुर्या अंगुलियों के लिये म से चार तथा २७ ॥ हिये । स्तनों का एक अंगुल का १२८ ॥ न्दरता की शोमा २२६ ॥ चतुर्थाध्याये लोकधर्मांनरूपण प्रकरणम् २५७ प्रतिमायास्तृतीयांशमर्धाशं तत् सुपीठकम् । के आसन का प्रमाण- प्रतिमा ( मूर्ति ) का जो आसन हो वह प्रतिमा एवं प्रतिमा के मान के अनुसार तृतीयांश या अर्द्धांश प्रमाण. देखने में सुन्दर । का होना चाहिये द्विगुणं त्रिगुणं द्वारं प्रतिमायाश्चतुर्गुणम् ॥ १३० ॥
एकद्वित्रिचर्तुहस्तं पीठं देवालयस्य च । योग्यतानुसार द्वारादि का प्रमाण - देवमन्दिर का द्वार प्रतिमा के मान से द्विगुण, त्रिगुण या चतुर्गुण बड़ा बनाना चाहिये । और योग्यतानुसार प्रतिमा
का 1 पीठ ( आसन ) एक, दो, तीन या चार हाथ प्रमाण बनाना चाहिये ।
पीठतस्तु समुच्छ्रायो भित्तेर्दशकराधिकः ॥ १३१
द्वारातु द्विगुणोच्छ्रायः प्रासादस्योर्ध्व भूमिभाक् ।
शिखरं चोच्छ्रायसमं द्विगुणं त्रिगुणं तु वा ॥ १३२ ॥
देवमन्दिर की ऊंचाई का प्रमाण - देवगृह की भित्ति ( भीत ) की ऊंचाई. पीठ से दस हाथ अधिक करनी चाहिये । प्रासाद ( देवमन्दिर ) के ऊपर की भूमि द्वार से दुगुनी ऊंची होनी चाहिये । और प्रासाद का शिखर ऊंचाई के. अनुरूप द्विगुण या त्रिगुण बनाना चाहिये ।
एकभूमिं समारभ्य सपादशत भूमिकम् ।
प्रासादं कारयेच्छक्त्या ह्यष्टास्त्रं पद्मसन्निभम् ॥ १३३ ॥
चतुर्दिमण्डपं वापि चतुःशालं समन्ततः । मञ्जिल तथा प्रासाद की आकृति आदि का निर्देश - एक मञ्जिल से लेकर सवा सौ मञ्जिल तक का अठपहला कमल के आकार का, चारो दिशाओं में बने हुये मण्डपों से अथवा चारो तरफ कमरों से युक्त प्रासाद ( मन्दिर )
शक्ति के अनुसार बनाना चाहिये ।
सहस्रस्तम्भसंयुक्तश्चोत्तमोऽन्यः समोऽधमः ॥ १३४ ॥
प्रासाद के उत्तमादि ३ भेदों का निर्देश - एक हजार स्तम्भों से युक्त प्रासाद ' उत्तम ' उससे न्यून स्तम्भों का ' मध्यम ' उससे भी न्यून स्तम्भों का ' अक्षम ' प्रासाद कहलाता है ।
प्रासादे मण्डपे वापि शिखरं यदि कल्प्यते ।
स्तम्भास्तत्र न कर्तव्या भित्तिस्तत्र सुखप्रदा ॥ १३५ ॥
मन्दिर के स्तम्भों का प्रमाण तथा निषेध का निर्देश – जिस प्रासाद ओरष्टव अषि अथवा मण्डप के ऊपर यदि शिखर बनाना हो तो वहां पर स्तम्भ नहीं चाहिये । बनाना चाहिये क्योंकि स्तम्भ वहां पर केवल भित्ति ( भीत ) ही सुखप्रद होती है..... की कोई आवश्यकता नहीं है । १७ शु ० CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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२५८ शुक्रनीति:
प्रासादमध्यविस्तारः प्रतिमायाः समन्ततः ।
षड्गुणोऽष्टगुणो वापि पुरतो वा सुविस्तरः ॥ १३६ ॥
प्रासाद के भीतरी विस्तार का विचार — प्रासाद के भीतरी ब्रह्मा विस्तार चारो तरफ प्रतिमा से लगुना या अठगुना होना चाहिये और भाग का मुख बनान के आगे की तरफ सब से अधिक विस्तार होना चाहिये ।
वाहनं मूर्तिसदृशं सार्धं वा द्विगुणं स्मृतम् ।
यत्र नोक्तं देवताया रूपं तत्र चतुर्भुजम् ॥ १३७ ॥
अभयं च वरं दद्याद्यत्र नोक्तं यदायुधम् ।
अधः करे तूर्ध्वकरे शङ्खं चक्रं तथाऽङ्कुशम् ॥ १३८ ॥
पाशं वा डमरु शूलं कमलं कलशं सुवम् ।
लड्डुकं मातुलुङ्गं वा वीणां मालां च पुस्तकम् ॥ १३६
प्रतिमा इयग्री गणेश्वर ( अङ्ग मनुष्य भांति, वरा || मुख हाथो प्रतिमा के वाहन, रूप तथा आयुध के स्थान का विचार – देवता का भांति ही ह चाहन देवमूर्ति के अनुरूप डेढ़गुना या दुगुना बड़ा होना चाहिये । जहां पर देवता का रूप ( बाहु का उल्लेख ) नहीं कहा हो वहां पर च बनाना चाहिये । जहां पर देवता के आयुध ( अस्त्र - शस्त्र ) का उल्लेख न हो वहां पर नीचे के हाथों में क्रम से अभय तथा वर मुद्रा का अंकन करना चाहिये । और ऊपर हाथों में शङ्ख, चक्र, अंकुश, प्राश, डमरू, शूल, कमल, कलश, खुवा, लड्डू, मातुलुङ्ग, वीणा, माला वा पुस्तक का अंकन करवा अपने चाहिये । स्थित, दादी मुखानां यत्र बा हैं. यं तत्र पक्त्या निवेशनम् | बाली, दिव्य तन् पृथग् - प्रीत्र मुकुटं सुमुखं स्वक्षिकर्णयुक् ॥ १४० ॥ पैर तक क
प्रतिमा के अनेक सुख होने पर व्यवस्था का निर्देश - जहां पर प्रतिमा इष्टदेव की में बहुत सा सुख बनाना हो वहां पर उन्हें एक पंक्ति में बनाना चाहिये । और उनकी ग्रीवा, मुकुट तथा मुख, आंख और कान को पृथक् २ २! सुन्दर ' रीति से बनाना चाहिये । भुजानां यत्र बाहुल्यं न तत्र स्कन्धभेदनम् | अनिष्ट अनेक भुजाओं की व्यवस्था — जिस मूर्ति में बहुत भुजायें बनानी हो प्रतिमा कभ वहां स्कन्धों में भेद नहीं किया जाता है अर्थात् स्कन्ध दो ही बनाये जाते है बनवाने वाल किन्तु भुजायें दो से अधिक भी बनाई जाती है । नष्ट कर कूर्परोर्ध्वं तु सूक्ष्माणि चिपिटानि दृढानि च ॥ १४१ ॥ स्थूल अव
भुजमूलानि कार्याणि पक्षमूलानि वै यथा । समान कहनी के ऊपर भुजाओं के मूल भाग, दोनों पावों के मूल भाग के सूचम, चिपटे तथा दृढ़ बनाने चाहिये । नहीं दिखाई CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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१३६ ॥ भीतरी भाग हिये और प्रतिमा १३७ ॥ १३८ ॥ ॥ १३६ ॥
चार देवता का ना चाहिये । वहाँ हां पर चतुर्भुज का उल्लेख न हो का अंकन करना मरू, शूल, कमल, का अंकन करना
।
१४० ॥
-जहां पर प्रतिमा बनाना चाहिये । पृथक् २ ही बनाये जाते हैं १४१ ॥ क भाग के समान चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २५६ ब्रह्मणस्तु चतुर्दिक्षु मुखानां विनियोजनम् ॥ १४ ९ ॥ ब्रह्मा के मुखों की व्यवस्था - ब्रह्मा की मूर्ति में चारों दिशाओं में एक २ सुख बनाना चाहिये ।
हयग्रीवो वराइश्च नृसिंहश्च गणेश्वरः ।
सुखैर्विना नराकारो नृसिंहश्च नखैर्विना ॥ १४३ ॥
हयग्रीवादिकों की आकृतिविषयक विचार - हयग्रीव, वराह, नृसिंह, गणेश्वर ( गणेश ), इन ४ देवताओं की मूर्तियों में मुख को छोड़ कर शेष अङ्ग मनुष्य के आकार का बनाना चाहिये अतः हयग्रीव का सुख घोड़े की भांति, वराह का सूअर की भांति, नृसिंह का सिंह की भांति और गणेश का मुख हाथी की भांति बनाना चाहिये । और नृसिंह का नख भी सिंह की भांति ही होना चाहिये ।
तिष्ठन्तीं सूपविष्टां वा स्वासने वाहनस्थिताम् ।
प्रतिमामिष्टदेवस्य कारयेदुक्तलक्षणाम् ॥
हीनश्मश्रुनिमेषां च सदा षोडशवार्षिकीम् ।
दिव्याभरणावखाढयां दिव्यवर्णक्रियां सदा ॥।
वस्त्रैरापादगूढां च दिव्यालङ्कारभूषिताम् । अपने आसन पर खड़ी अथवा सुखपूर्वक बैठी हुई स्थित, दादी तथा मूंछ से एवं निमेष से रहित, सदा १६ १४४ ॥ १४५ ॥ अथवा वाहन पर वर्ष की अवस्था वाली, दिव्य आभरण तथा वस्त्र से युक्त, दिव्य वर्णं तथा क्रियावाली, वस्त्रों से पैर तक ढकी हुई, दिव्य अलङ्कारों से भूषित ऐसी पूर्वोक्त लक्षणों से युक्त अपने
इष्टदेव की प्रतिमा बनवानी चाहिये ।
हीनाङ्गो नाधिकाङ्गयश्च कर्त्तव्या देवताः कचित् ॥ १४६ ॥
हीनाङ्गी स्वामिनं हन्ति अधिकाङ्गी च शिल्पिनम् ।
कृशा दुर्भिक्षदा नित्यं स्थूला रोगप्रदा सदा ॥ १४७ ॥।
अनिष्टकारक प्रतिमा के लक्षण - हीन तथा अधिक भङ्गोंवाली देवता की प्रतिमा कभी नहीं बनवानी चाहिये । क्योंकि हीन अङ्गवाली प्रतिमा मूर्ति बनवानेवाले स्वामी को एवं प्रमाण से अधिक अङ्गवाली शिल्पी ( मूर्त्तिकार ) को नष्ट कर देती है । कृश अङ्गवाकी निस्य दुर्भिक्षु ( अभाव ) देनेवाली और स्थूळ अङ्गवाली प्रतिमा सदा रोग देनेवाली होती है । गूढ सन्ध्यस्थिधमनी सर्वदा सौख्यवर्धिनी । दायक प्रतिमा के लक्षण - जिसकी सन्धि, अस्थि तथा धमनियां नहीं दिखाई पड़ती हैं ऐसी प्रतिमा सर्वदा सुख बढ़ानेवाली होती है । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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२६० शुक्रनीति: वराभयाब्जशङ्खाढ यस्ता विष्णोश्च सात्विकी ॥ १४८ मृगवाद्याभयवर हस्ता सोमस्य सान्त्विकी । ॥ साविक प्रतिमाओं का वर्णन विष्णु की जिस मूर्ति में प्रमाण तथा अभयदान की मुद्रा एवं कमल तथा शङ्ख से युक्त चारो क्रम से वर मणि से उ ' सात्त्विक ' कहलाती है । मृग, वाद्य, अभय तथा वरदान की हाथ मुद्रा होते क्रम हैं वह से बाणलिङ्ग विचार स चारो हाथों में जिसके रहती है वह चन्द्रमा की ' साविक मूर्त्ति ' कहलाती है । में मान विप वराभयाब्जलड्डूक · हस्तेभास्यस्य सात्विकी ॥ १४६ ॥
पद्ममालाऽभयवर - करा सत्त्वाधिका रवेः । गणेश को जो सात्विक मूर्त्ति होती है उसके चारो हाथों में क्रम से बर युगम तथा अभय दान की मुद्रा एवं कमल तथा लड्डू होते हैं । सूर्य की जो किंचित्र साविक मूर्त्ति होती है उसके चारो हाथों में क्रम से कमल, माला,
तथा वरदान की मुद्रा होती है ।
वीणालुङ्गाभयवर- करा सत्त्वगुणा श्रियः ॥ १५० ॥
लक्ष्मी की साविक मूर्ति में चारो हाथों में क्रम से वीणा, लुक, तथा वरदान मुद्रा होती है ।
शङ्खचक्रगदापद्मैरायुधैरादितः पृथक् ।
षट्षड्भेदाश्च मूर्तीनां विष्ण्वादीनां भवन्ति हि ॥ १५१ ॥
अभय अन्य काष्ठ अभय वर्णभे युक्त सूर्ति ' राजसी ' विष्णु आदि देवताओं की मूर्तियों के प्रथम से लेकर चतुर्थ पर्यन्त चारो युगभ हाथों में शंख, चक्र, गदा, पद्म और आयुधों धारण करने में भिन्नता होने ( त्रेता, द्व से ६-६ भेद होते हैं । मूर्तियां ब
यथोपाधिप्रभेदेन संयोग विभागतः ।
समस्तव्यस्तवर्णादिभेदज्ञानं प्रजायते ॥ १५२ ॥
मूर्तियों की जैसी उपाधि ( नाम ) है उसके अनुसार भेद होने से और वाहन तथा अस्त्रादियों के संयोग तथा पृथक्ता होने से, समस्त तथा पृथक् पृथक् शंकर रूप से वर्णादियों का भेद ज्ञात होता है । तथा गणेश लेख्या लेप्या सैकती च मृन्मया पैष्टिकी तथा । बनाने के एतासां लक्षणाभावे न कश्विद्दोष ईरितः ॥ १५३ ॥
लक्षणों के अभाव में भी दोषरहित प्रतिमा का निर्देश - चित्र, लेप, बालू, मिट्टी, तथा चूर्णं - चावल आदि के चूर्ण की पिष्टि ( पीठी ) के द्वारा बनी हुई अनुस इन मूर्तियों में शास्त्रानुसार सिद्ध किसी लक्षण की न्यूनता होने पर भी कोई दिन के ल प्रतिमा क इसमें दोष नहीं मानते हैं अर्थात् यथारुचि बनाई जा सकती हैं । नहीं करनी
बाणलिङ्गे स्वयंभूते चन्द्रकान्तसमुद्भवे ।
रत्नजे गण्डकीभूते मानदोषो न सर्वथा ॥ १५४ ॥
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॥ १४८ ॥
मैं क्रम से हाथ होते हैं वह बर की मुद्रा क्रम से
कहलाती है ।
१४६ ॥
में क्रम से वर । सूर्य की जो - माला, अमय २५० ॥ णा, लुङ्ग, अभय । १५१ ॥ तुर्थ पर्यन्त चारो में भिन्नता होने १५२ ॥ होने से और तथा पृथक् पृथक २५३ ॥ चित्र, लेप, बालू, द्वारा बनी हुई पर भी कोई ॥ २५४ चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६१ पाषाणघातुजायां तु मानदोषान् विचिन्तयेत् । तथा दोपरहित प्रतिमा का निर्देश - स्वयं प्रगट, चन्द्रकान्त प्रमाण रत्न से उत्पन्न, गण्डक नदी से उत्पन्न शालिग्राम, ये सब मणि बाणलिङ्ग से उत्पन्न कहे, जाते हैं इन सब मूर्त्तियों में पूर्वोक्त मानसंबन्धी दोषों का विचार सर्वथा नहीं करना चाहिये । किन्तु पाषाण तथा धातु - निर्मित मूर्त्तियों
में मानविषयक दोषों का विचार करना ही चाहिये ।
श्वेतपीतारक्तकृष्णपाषाणैर्युगभेदतः ॥ १५५ ॥
प्रतिमां कल्पयेच्छिल्पी यथारुच्यपरैः स्मृता । युगभेद से वर्ण भेद का कथन – मूर्तिकार युगभेदानुसार श्वेस, पीत, किंचित् रक्त तथा कृष्ण वर्ण के पत्थरों से मूर्त्ति का निर्माण करे । और इनसे
अन्य काष्ठ आदि से अपनी रुचि के अनुसार मूर्त्ति का वर्तन बनावे ।
श्वेता स्मृता साविकी तु पीता रक्ता तु राजसी ॥ १५६ ॥
तामसी कृष्णवर्णा तु ह्युक्तलक्ष्मयुता यदि । वर्णभेद से सास्त्रिकी आदि प्रतिमाओं का निर्देश - पूर्वोक लक्षणों से युक्त मूर्त्ति यदि श्वेत वर्ण की हो तो ' सास्विकी ' पीत या रक्त वर्ण की हो तो
' राजसी ' और कृष्ण वर्ण की हो तो ' तामसी ' कहलाती है ।
सौवर्णी राजती ताम्री रैतिकी वा कृतादिषु ॥ १५७ ॥
युगभेद से सौवर्णादि का प्रतिमा - विभाग - निर्देश—- और सत्ययुग आदि ( त्रेता, द्वापर, कलि ) युगों में क्रम से सुवर्ण, चांदी, तामा तथा पीतल की मूर्तियां बनानी चाहिये ।
शांकरी श्वेतवर्णा वा कृष्णवर्णा तु वैष्णवी ।
सूर्यशक्तिगणेशानां ताम्रवर्णा स्मृताऽपि च ॥
लौही सीसमयी वापि यथोद्दिष्टा स्मृता बुधैः । शंकर की मूर्त्ति श्वेत वर्ण की, विष्णु की मूर्त्ति कृष्ण वर्ण तथा गणेश की मूर्ति ताम्र वर्ण की अथवा लोहा तथा सीसा बनाने के लिये कही हुई है । चलार्चायां स्थिरार्चायां प्रासादाद्युक्तलक्षणाम् प्रतिमां स्थापयेनान्यां सर्वसौख्यविनाशिनीम् १५८ ॥ की, सूर्य, शक्ति की शास्त्रानुसार ॥ १५६ ॥
। अनुक्त प्रतिमा के स्थापन का निषेध - थोड़े दिन के लिये अथवा चिर दिन के लिये पूजनार्थ प्रासाद ( मन्दिर ) आदि में पूर्वोक लक्षणों युक्त प्रतिमा का स्थापन करना चाहिये । इससे अन्य प्रकार की मूर्ति की स्थापना
नहीं करनी चाहिये, क्योंकि वह सब सुखों को नष्ट करनेवाली होती है ।
सेव्य सेवक भावेषु प्रतिमालक्षणं स्मृतम् ॥ १६० ॥
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२६२ शुक्रनीति: जहां सेव्य सेवक भाव है अर्थात् प्रतिमा पूजा करने के लिये है वहां के लिये ही प्रतिमा के उक्त लक्षण बताये गये हैं बनाई जाती जो क आमोद - प्रमोद के लिये बनाई गई हैं वहां के लिये उक्त नियम नहीं है अर्थात् । जहाँ बृहत् शरीर प्रतिमायाश्च ये दोषा ह्यर्चकस्य तपोबलात् । कहते हैं सर्वत्रेश्वरचित्तस्य नाशं यान्ति क्षणात् किल ॥। १६१ ॥ गण्डस्थल भक्त - पूजक के तपोबल से प्रतिमा- दोषों के नष्ट होने का सुन्दर तथा प्रतिमा के जो उक्त दोष हैं वे हर प्रकार से ईश्वर में अनुरक्त चित्तवाले निर्देश - और रहित बड़ा पूजनकर्त्ता के तपोबल से _क्षणमान्न में नष्ट हो जाते हैं अर्थात् उनके भक्क दोष नहीं घटित होते हैं । व्याघ्र देवतायाश्च पुरतो मण्डपे वाहनं न्यसेत् । काले लान्छ द्विबाहुर्गरुडः प्रोक्तः सुचचुः स्वक्षिपक्षयुक् ॥ १६२ ॥
नराकृतिश्चक्षुमुखो मुकु बद्धाञ्जलिर्नम्रशीर्षः सेव्यपादाब्जलोचनः ॥ १६३ ॥
वाहन - स्थापन तथा वाहनों के लक्षणविषयक निर्देश -- देवता की मूर्ति के भागे मण्डप में उनके वाहन की मूर्ति रखनी चाहिये । और विष्णु के वाहन गणेश गरुड की मूर्ति में दो बाहु, चोंच, दो आँख, दो पङ्ख सुन्दर रीति से बनामी में सुख हाथ चाहिये । एवं मुख के स्थान पर चोंच बनाकर शेष अङ्ग मनुष्य की भांति कान - हाथ बताना चाहिये | और मुकुट, कवच तथा अङ्गद ( बाजू बन्द ) आभूषण से स्थूल स्कन युक्त, अलि बांधे हुये, सिर झुकाये तथा अपने सेव्य देवता के चरण की तरफ दृष्टि किये हुये बनाना चाहिये ।
वाहनत्वं गता ये ये देवतानां च पक्षिणः ।
कामरूपधरास्ते ते यथा सिंहवृषादयः ॥ १६४ ॥
देवताओं के बाहन - भाव को प्राप्त हुये जो पक्षी या सिंह तथा वृष ( आदि हैं वे सब इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले हैं ।
स्वनामाकृतयश्चैते कार्या दिव्या बुधैः सदा ।
सुभूषिता देवताप्रमण्डपे ध्यानतत्पराः ॥ १६५ ॥
विद्वानों को देवता के मण्डप में उनके आगे ध्यान लगाये हुये, सुन्दर रीति से अलङ्कृत किये हुये, अपने नामानुरूप आकृतिचाले उक्त सदा बनाने चाहिये ।
मार्जाराकृतिकः पीतः कृष्णचिह्नो बृहद्वपुः ।
असटो व्याघ्र इत्युक्तः सिंहः सूक्ष्मकटिर्महान् ॥ १६६ ॥
बृहद्भ्रूगण्डनेत्रस्तु भालरेखो मनोहरः ।
सटावान् धूसरोऽकृष्णलान्छनञ्च महाबलः ॥ १६७ ॥
कमलों दांत टूटा ह अग्रभाग में चाहिये । अ भांति शास्त्रो बैल ) सम्पूर्ण अलि पर्यन दिव्य तथा गण्डस वाहन नासिक और शूंड क ( शुण्ड का लम्बाई दश CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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बनाई जाती अर्थात् जहाँ
ही है ।
६१ ॥
निर्देश - और चित्तवाले मक न्तु उनके लिये ६२ ॥ ६३ ॥ ता की मूर्ति के ष्णु के वाहन त से बनानी य की भांति • आभूषण से चरण कमलों ६४ ॥ T वृष ( बैल ) ६५ ॥ हुये, दिव्य उक्त वाहन २६६ ॥ चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६३ के समान आकृतिवाला पीत वर्ण का, काले चिह्नों से युक्त, जो बिल्ली कन्धे के बाली ( जटा ) से रहित पशु होता है उसे ' व्याघ्र ' बृहत् शरीर वाला, की कमर पतली तथा शरीर भारी होता कहते हैं और सिंह बड़े होते हैं । भाल पर रेखायें होती हैं । तथा नेत्र गण्डस्थल कन्धे पर बड़े २ बालों से युक्त, धूसर वर्ण का सुन्दर तथा पशु होता है । रहित बड़ा बलवान् भेदः सटालञ्छनतो नाकृत्या व्याघ्रसिंहयोः है । एवं भौंह, यह देखने में काले चिह्नों से व्याघ्र तथा सिंह में केवल कन्धे पर जटा ( बड़े - बड़े बाल ) का तथा
काले लान्छन का भेद होता है । आकार दोनों के समान ही होते हैं ।
गजाननं नराकारं ध्वस्त कर्ण पृथूदरम् ॥ १६८ ॥
बृहत्संक्षिप्तगहन- पीनस्कन्धाङ्घ्रिपाणिनम् ।
भग्नवामरदमीप्सितवाहनम् ॥ १६ ९ ॥
ईषत्कुटिलदण्डाप्रवामशुण्डमदक्षिणम् ।
सन्ध्यस्थिधमनीगढं कुर्यान्मानमितं सदा ॥ १७० ॥
गणेश की मूर्त्ति के लक्षण तथा अवयवों का प्रमाण - गणेश जी की मूर्ति में सुख हाथी के समान तथा अन्य अङ्ग मनुष्य के समान बनाना चाहिये । कान - हाथी के समान लम्बा - चौड़ा, उदर - स्थूल, बृहत् संक्षिप्त, घन और स्थूल स्कन्ध, चरण तथा हाथ बनाने चाहिये । एवम् शूंड - लम्बी, बायां दांत टूटा हुआ और इच्छानुसार वाहन बनाना चाहिये । शुण्ड का दण्ड अग्रभाग में बाईं ओर कुछ मुद्दा हुआ होना चाहिये, दक्षिण ओर नहीं होना चाहिये । और सन्धि, अस्थि तथा धमनी नहीं दिखाई पड़नी चाहिये । इस मांति शास्त्रोक्त प्रमाणानुसार सदा मूर्ति बनाना चाहिये ।
सार्धं चतुस्तालमितः शुण्डादण्डः समस्ततः ।
दशाङ्गुलं मस्तकं च भ्रूगण्डश्चतुरङ्गुलः ॥ १७१ ॥
सम्पूर्ण सूंड की लम्बाई साढ़े चार साल ( विस्तृत अंगूठा से मध्यमा अङ्गुलि पर्यन्त एक ताल होता है ) प्रमाण, मस्तक - दश अंगुल प्रमाण, भौंह तथा गण्ड स्थल चार अंगुल प्रमाण बनाना चाहिये ।
नासोत्तरोष्ठरूपा च शेषा शुण्डा सपुष्करा ।
दशाङ्गुलं कर्णदैर्घ्यं तदष्टाङ्गुलविस्तृतम् ॥ १७२ ॥
नासिका तथा ऊपर का भष्ठ इन दोनों के स्थान पर शुंड ही होती है । और शूंड का मूल भाग उत्तरोष्ठ रूप समझना चाहिये तथा अवशिष्ट पुष्कर ( शुण्ड का अग्रभाग सहित शुंड का भाग समझना चाहिये । कान की • लम्बाई ६७ ॥ दश अंगुल की और चौड़ाई आठ अंगुल की होनी चाहिये । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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२६४ शुक्रनीति:
कर्णयोरन्तरे व्यासो द्वयङ्गुलस्तालसम्मितः ।
मस्तकेऽस्यैव परिधिर्ज्ञेयः षट्त्रिंशदङ्गुलः ॥ १७३ ॥
दोनों कानों के अन्तर का व्यास १ ताल २ अगुल प्रमाण कर्ण भी चाहिये । मस्तक में इस ( कान ) की परिधि छत्तीस अंगुल की होनी का होना नेत्रों के मूल नेत्रोपान्ते च परिधिः शीर्षतुल्यः सदा मतः । चाहिये । अकुल प्रमाण सद्व्यङ्गुलद्वितालः स्यान्नेनाधः परिधिः करे ॥ १७४
करा परिधिर्ज्ञेयः पुष्करे च दशाङ्गुलः ।
प्रयङ्गुलं कण्ठदैर्घ्यं तत्परिधिस्त्रिंशदङ्गुलः ॥ १७५ ॥
दोनों नेन्नों के उपान्त भाग की परिधि सदा मस्तक के मुख्य होती स्त्रियों चाहिये । नेन्नों के नीचे भाग की परिधि दो ताल तथा दो अंगुल प्रमाण की टाईपांच होनी चाहिये । शूंड में शूंड का अग्रभाग तथा पुष्कर में दश अंगुल प्रमाण को अङ्गुल अधिक परिधि होनी चाहिये । कण्ठ की लम्बाई तीन अंगुल की एवं उसकी तीस अंगुल की होनी चाहिये ।
परिणाहस्तूदरे च चतुस्तालात्मकः सदा ।
षडङ्गुलो नियोक्तव्यो s टालो वापि शिल्पिभिः ॥ १७६
उदर की लम्बाई सदा छः अथवा आठ अंगुल अधिक चार ताल की शिल्पी ( मूर्तिकार ) को बनानी चाहिये ।
दन्तः षडङ्गुलो दीर्घस्तन्मूलपरिधिस्तथा ।
षडङ्गुलम्वाधरोष्ठः पुष्करं कमलान्वितम् ॥ १७७ ॥
परिधि अका ॥ सर्वो क प्रमाण सुख का प्रम भेदों की लम दांत की लम्बाई छः अंगुल प्रमाण तथा उसके मूल भाग की परिधि भी बालक उसी भांति ( छः अंगुल प्रमाण ) की बनानी चाहिये । अधरोष्ठ छः अंगुल का सिर बड़ा ब तथा पुष्कर कमल से युक्त बनाना चाहिये ।
ऊरुमूलस्य परिधि: षट्त्रिंशदङ्गुलो मतः ।
त्रयोविंशत्यङ्गुलः स्यादूर्वग्रपरिधिस्तथा ॥ १७८ ॥
ऊरुमूल की परिधि छत्तीस अंगुल की और ऊरुवों के अग्रभाग की तेइस अंगुल की बनानी चाहिये ।
जङ्घामूले तु परिधिविंशत्यङ्गुलसंमितः ।
परिधिर्बाहुमूलादेरधिको द्वचङ्गुलोऽङ्गुलः ॥ १०६ ॥
जंघा मूल की परिधि बीस अंगुल की और बाहु के मूलभाग की उससे दो अंगुल अधिक ( १२ अंगुल ) तथा अप्रभाग की अकुल भर ( २१ अङ्गुल ) प्रमाण की होनी चाहिये ।
कर्णनेत्रान्तरं नित्यं विज्ञेयं चतुरङ्गुलम् ।
मूल मध्याप्रान्तरं तु दशसप्तषडङ्गुलम् ॥ १८० ॥
वैसा सिर परिधि बाल - स बड़ा होता परिधि है । और श अधिक है । और स किन्तु सुटा वैसा बनान CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri