शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 361–370

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 361–370

पृष्ठ 361

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 361 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

- कृतः ॥ ३१ ॥

निर्णय माननीय ननीय होता है । राजा की मान्यता ३२ ॥ सभी विवाशे की बुद्धि साधारण

३३ ॥

शास्त्र का जानने-, अतः बहुत से युक्त करे । व्यक्ति होता है, तू उसका निर्णय ३४ ॥ ( जूरिओ ) के उसके अनुसार ३५ ॥ यों ( जूरियों ), सम्पों में चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २७५ ) ३. स्मृति ( धर्मशास्त्र ), ४. गणक ( गणना करनेवाला ), किये हुये जूरी, के लेखक ( लिखने वाला ), ६. सुत्रर्ण, ७. अग्नि, ८. जल, ९. धन, १०. ५ कर्मचारी ), ये १० व्यवहार ( मुकदमा ) निर्णय करने में साधन के पुरुष (

हैं ।

एतद्दशाङ्गकरणं यस्यामध्यास्य पार्थिवः ॥ ३७ ॥

न्यायान् पश्येत् कृतमतिः सा सभाऽध्वरसन्निभा । सभा के द्वितीय लक्षण ' का निर्देश — इस प्रकार से परिमार्जित यज्ञतुल्य बुद्धिवाला राजा जिस सभा में उपर्युक्त १० साधनों का आश्रय लेकर न्याय ( मुकदमों ) को देखता है ( निर्णय करता है ) उसे यज्ञ - सभा के समान

समझना चाहिये ।

दशानामपि चैतेषां कर्म प्रोक्तं पृथक् पृथक् ॥ ३८ ॥

वक्ताऽध्यक्षो नृपः शास्ता सभ्याः कार्य परीक्षकाः ।

स्मृतिर्विनिर्णयं ब्रूते जयं दानं दमं तथा ॥ ३ ९ ॥

दशाङ्गों के कर्मों का पृथकू २ निर्देश - पूर्वोक्त इन १० साधनों के कर्म भी पृथक् २ कहे हुये हैं । जैसे- १. अध्यक्ष ( अधिकारी पुरुष ) विवाद- निर्णय प्रकाशक होता है एवं २. राजा - शासन करनेवाला, ३. सभ्यगण ( जूरीगण ) -निर्णय के औचित्य की परीक्षा करनेवाले होते हैं और ४. स्मृति ( मन्वादिस्मृति ) -इसके द्वारा विवाद का निर्णय, मन्त्र जप, दान तथा इन्द्रियादि - निग्रह का ज्ञान होता है ।

शपथार्थे हिरण्याग्नी अम्बु तृषितक्षुब्धयोः ।

गणको गणयेदर्थं लिखेन्न्याय्यं च लेखकः ॥ ४० ॥

५०६. शपथ ग्रहण करने के लिये सोना तथा अग्नि, ७. जल— इसका प्रयोग प्यासे तथा क्रोधी के लिये होता है ८. गणक - यह विवाद की शुभा शुभ की गणना करनेवाला होता है । ९. लेखक - न्याय संगत निषयों का लिखनेवाला होता है ।

शब्दाभिधानत्त्वज्ञौ गणनाकुशलौ शुची ।

नानालिपिज्ञौ कर्तव्यौ राज्ञा गणकलेखकौ ॥। ४१ ॥

गणक तथा लेखक के लक्षण - शब्द तथा अर्थ के तत्वज्ञ, गणना करने है, वह मैं कुशल, निर्दोष, नाना प्रकार की लिपिओं के ज्ञाता ऐसे लक्षणों से युक्त गणक तथा लेखक की नियुक्ति राजा करे ।

३६ ॥ धर्मशास्त्रानुसारेण ह्यर्थशास्त्रविवेचनम् ।

( नियुक यत्राधिक्रियते स्थाने धर्माधिकरणं हि तत् ॥ ४२ ॥

सभ्य • धर्माधिकरण के लक्षण का निर्देश जिस स्थान पर धर्मशास्त्र के अनुसार CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 362

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 362 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२७६ शुक्रनीति: अर्थशास्त्र की विवेचना अधिक रूप से की जाय उसे ( न्यायालय - कचहरी ) कहते हैं । धर्माधिकरण व्यभिचार क व्यवहारान् दिदृक्षुस्तु ब्राह्मणैः सह पार्थिवः । खियों का भी मन्त्रज्ञैर्मन्त्रिभिश्चैष विनीतः प्रविशेत् सभाम् ॥ ४३ ॥

राजासभा में प्रवेश करने का प्रकार -- व्यवहारों ( मुकदमों की इच्छा रखने वाला राजा विनीत भाव से मन्त्रणा करने में कुवाल ) को माझा देखने और ख तथा मन्त्रियों के साथ न्यायसभा में प्रवेश करे । इन सब पूर्व धर्मासनमधिष्ठाय कार्यदर्शनमारभेत् । तथा दण्ड के३ पूर्वोत्तरसमो भूत्वा राजा पृच्छेद्विवादिनौ ॥ ४४ ॥

सभा में राजा के कृत्यों का निर्देश - इस प्रकार से राजा धर्मासन जिन ज ( म्यायासन ) पर बैठकर मुकदमा देखना शुरू करे । वादी - प्रतिवादी दोनों पूर्वजों के द्वा में समभाव रखकर राजा उन दोनों से प्रश्न करे । चाहिय करना प्रत्यहं देशदृष्टैश्व शाखदृष्टश्च हेतुभिः । न करने देवें, जातिजानपदान् धर्माच्छेणिधर्मास्तथैव च ॥ ४५ ॥।

समीक्ष्य कुलधर्मांश्च स्वधर्मं प्रतिपालयेत् । f राजा को पूर्ण विचारपूर्वक सब धर्मों की रक्षा करने का निर्देश - प्रतिदिन त लोक तथा शास्त्रों में देखे गये कारणों के द्वारा जाति, देश, श्रेणि एवं कुल के धर्मों को भलीभांति देख कर राजा अपना ( विचारपूर्वक मुकदमों का कलियुग

निर्णय करना रूप ) धर्म का पालन करे ।

देशजातिकुलानां च ये धर्माः प्राक् प्रवर्तिताः ॥ ४६

तथैव ते पालनीयाः प्रजा प्रक्षुभ्यतेऽन्यथा । देश- जाति -कुलधर्मों का पालन करने का निर्देश - देश, जाति के जो धर्मं जिस भांति से पहले से चले आये हों उनका उसी पालन करना चाहिये । अन्यथा अपने मनले यदि राजा कुछ उनमें

करे तो उससे प्रजा में क्षोभ उत्पन्न हो जाता है ।

उदुह्यते दाक्षिणात्यैर्मातुलस्य सुता द्विजैः ॥ ४७ ॥

मध्यदेशे कर्मकराः शिल्पिनश्च गवाशिनः । हैं वे प्रायः ॥ नासक्त, थोड़े कर्म करने में एवं कुछ से भलीभांति भांति से ६ परिवर्तन न्यायाद को देखे । पूर्व देश - जाति · कुलधर्मों के उदाहरणों का निर्देश- जैसे दक्षिण देश के ब्राह्मण के मारने मनुष्य म • लोग मामा की कन्या ( ममेरी बहिन ) के साथ विवाह करते हैं । मध्य देश मैं समय पर का में कर्मकर तथा शिल्पी गोमांसभक्षी होते हैं । उचित होता मत्स्यादाश्च नराः सर्वे व्यभिचाररताः स्त्रियः ॥ ४८ ॥

उत्तरे मद्यपा नार्यः स्पृश्या नृणां रजस्वलाः । निय और उत्तर देश में सभी लोग मछली खानेवाले होते हैं तथा CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 363

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 363 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

से धर्माधिकरण ४३ ॥ दम ) को देखने में कुशल ब्राह्मणों 1४४ ॥ राजा धर्मासन प्रतिवादी दोनों । ४५ ॥ निर्देश - प्रतिदिन श्रेणि एवं कुछ के क मुकदमों का चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २७७ वाली एवं मद्य पीनेवाली होती हैं एवं वहां के लोग रजस्वला व्यभिचार कराने

स्पर्श करते हैं, जो कि निषिद्ध है ।

नियों का भी " जाताः प्रगृह्णन्ति भ्रातृभार्यामभर्तृकाम् ॥

अनेन कर्मणा नैते प्रायश्चित्तदमार्हकाः । और खस जाति के लोग विश्ववा भाई की स्त्री के साथ निषिद्ध कर्मों के करने से भी थे सब राजा इन सब पूर्वोक

के अधिकारी नहीं होते हैं ।

तथा दण्ड येषां परम्पराप्राप्ताः पूर्वजैरप्यनुष्ठिताः ॥

त एव तैर्न दुष्येयुराचारान्नेतरस्य तु ।

४ ९ ॥

विवाह करते हैं । के द्वारा प्रायश्चित्त ५० ॥ जिन जाति, देश तथा कुछ के जो प्राचीनकाल से प्रचलित एवं उनके पूर्वजों के द्वारा सक्ष पालन किये जाते हुये जैसे धर्म हो उनका वैसे ही पालन करमा चाहिये । अतः राजा एक दूसरे के धर्मविषयक आचारों को दूषित

म करने देवें, अर्थात् जिसका जैसा आचार हो उसको वैसा करने देवें ।

परस्त्रीधनसंलुब्धा मद्यासक्तरताः कलौ ॥ ५१ ॥

विज्ञानलवदुर्दग्धाः प्रायः श्रीसंयुताश्च ये ।

तन्त्रकर्मरता वेदविमुखाः स्युः सदैव हि ॥ ५२ ।

महादण्डेन चैतेषां कुर्यात् संशोधनं नृपः । कलियुग में महादण्ड के योग्यों का निर्देश – कलियुग में जो धनवान् है वे प्रायः करके दूसरे की स्त्री तथा धन के अधिक लोभी, मद्यपान करने में ॥ ४६ ॥

जाति एवं कुछ उसी भांति से - उनमें परिवर्तन ४७ ॥ देश के ब्राह्मण मासक्त, थोड़े ज्ञान से भी अपने को सबसे अधिक पण्डित कर्म करने में रत एवं वेदविमुख सदा होते हैं, राजा इन से भलीभांति दण्डित करे । न्यायान्पश्येत्तु मध्याह्ने पूर्वाह्णे स्मृतिदर्शनम् न्यायादिकों के समय का निर्देश- - राजा मध्याह्नकाल को देखे । पूर्वाह्न ( दोपहर के पूर्व ) में स्मृतियों को देखे । मनुष्यमारणे स्तेये साहसेऽत्ययिके सदा न कालनियमस्तत्र सद्य एव विवेचनम् माननेवाले, तन्त्र सर्वो को महादण्ड ॥ ५३ ॥

में न्याय ( सुकदमों ) ॥। ५४ ॥ मनुष्यमारणादिकों में समय के नियम में अभाव का निर्देश - किन्तु मनुष्य ते हैं । मध्यदेश के मारने पर एवं चोरी, डांका किंवा अन्य नाशजनक मुकदमों के देखने मैं समय का नियम नहीं है for उन सब में तरकाल ही विचार करना 11 उचित होता है । 85 धर्मासनगतं दृष्ट्वा राजानं मन्त्रिभिः सह । ते हैं तथा ि गच्छे निवेद्यमानं • यत् प्रतिरुद्धमधर्मतः ॥ ५५ ॥ -CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 364

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 364 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२७८ शुक्रनीति: यथासत्यं चिन्तयित्वा लिखित्वा वा समाहितः । त्वा वा प्राञ्जलिः प्रह्नो ह्यर्थी कार्य निवेदयेत् ॥ ५६ बयान ) राजा के समक्ष कार्य निवेदन करने के प्रकार का निर्देश- ॥ केबल ( से मन्त्रियों के साथ बैठे हुये राजा को देखकर प्रार्थी उनके पास न्यायासन पर भांति दण्ड जाकर अधर्म से रहित जो निवेदन करना हो उसे यथार्थ रूप से जावे । बोर विचार और सावधान - चित्त से उसे लिखकर नमस्कार करते हुये हाथ कर राजा नम्रता के साथ कार्य का निवेदन करे ( दावा दाखिल करे ) ।

यथार्हमेनमभ्यर्च्य ब्राह्मणैः सह पार्थिवः ।

सान्त्वेन प्रशमय्यादौ स्वधर्म प्रतिपादयेत् ॥ ५७ ॥

अर्थी के लिये राजा के कार्यों का निर्देश - ब्राह्मणों के साथ प्रार्थी का यथायोग्य संमान कर और सर्वप्रथम साम्स्वनासूचक साम्यवना देकर स्वधर्म- पालन ( मुकदमा देखना ) प्रारम्भ करे ।

काले कार्यार्थिनं पृच्छेत् प्रणतं पुरतः स्थितम् ।

किं कार्यं क च ते पीडा मा भैषीब्रूहि मानव ॥ ५८

केन कस्मिन् कदा कस्मात् पीडितोऽसि दुरात्मना ।

एवं पृष्ट्वा स्वभावोक्तं तस्य संशृणुयाद्वचः ॥ ५ ९ ॥

समयानुसार राजा विनम्रभाव से संमुख में स्थित उस ( मुकदमा दायर करनेवाले ) से " हे भला आदमी! तुम्हारा क्या क्या कष्ट है? मत डरो? मुझसे कहो! तुम्हें किस दुरात्मा ने जोड़कर उपस्थित न पूर्वोक राजा उस प्रावि शब्दों से वाक ' इसक कहलाता है मिलकर ' प्र ॥ मिलकर धर्म कहता है । कार्यार्थी राजस कार्य है! एवं सज्जन कहाँ पर, किस समय, क्यों पीड़ा पहुँचाई है? " इस प्रकार से पूंछ कर उसके स्वाभाविक रीति से कहे हुये वचन को सुने । व्यवह प्रसिद्धलिपिभाषाभिस्तदुक्तं लेखको लिखेत् । माय लेक लेखक के कृत्यों का वर्णन - और लेखक उसके कहे हुये वाक्यों को उस पास न्याया समय की लिपि और भाषा में लिखे । करना ) का अन्यदुक्तं लिखेदन्यद्योऽर्थिप्रत्यर्थिनां वचः ॥ ६० ॥

चौरवत् त्रासयेद् राजा लेखकं द्रागतन्द्रितः । राजा को अन्यथा लेख लिखनेवाले को दण्ड देने का निर्देश और परि कोई लेखक वादी - प्रतिवादी के कहे हुये वचन को जैसा वह कहता है वैशा राजा नहीं लिखे ' अर्थात् भिन्न रीति से लिखे ' तो राजा उसे अविलम्ब चोर की या उसके अ भांति दण्ड देने में तत्परता रक्खे | न उपस्थित किसी को प लिखितं तादृशं सभ्या न विब्रूयुः कदाचन ॥ ६१ ॥ अपनी

बलादू गृह्णन्ति लिखितं दण्डयेत्तस्तु चौरवत् | बुद्धि और सभ्य ( जूरी ) लोग भी उक्त रीति से लिखे हुये ( अन्यथा ) हे CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 365

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 365 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

: ॥। ५६ ॥

न्यायासन पर पास जावे | और से विचार कर हाथ जोड़ कर के ५७ साथ ॥ राजा उस सूचक शब्दों से ॥ ५८ ॥

मना ।

५ ९ ॥

उस कार्यार्थी 7 क्या कार्य है? माने कहां पर उसके स्वाभाविक वाक्यों को उस ६० ॥ निर्देश और यदि कहता है वैसा चिलम्व चोर की ६१ ॥ ये ( अन्यथा ) से चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपण प्रकरणम् २७ ९ कभी भी अनुमोदन न करें । यदि वे लोग अपने अधिकार ( बयान ) का लेख का अनुमोदन करें तो राजा उन लोगों को चोर की के बल से उक्त भांति दण्ड दे प्राषिवाको । नृपाभावे पृच्छेदेवं सभागतम् ॥ ६२ ॥

के अभाव में प्राड्विवाक को पूछने का निर्देश — और राजा के उपस्थित राजा न रहने पर प्राविचाक ( जज ) न्यायालय में उपस्थित बादी से पूर्वोक रीति से पूछे ॥ वादिनौ पृच्छति प्राड् वा विवाको विविनक्तयतः विचारयति सभ्यैर्वा धर्माऽधर्मान् विवक्ति वा ॥ ६३ ॥

प्राविवाक शब्द के अर्थका निर्देश - विश्वारपति ( जज ) को ' प्राङ्क्षि-बाक ' इसलिये कहते हैं कि वह वादी प्रतिवादी से पूछता है अतः प्राड् ' ' कहलाता है और विचार करता है अतः ' विवाक ' कहलाता है अतः दोनों मिलकर ' प्राड्विवाक ' सिद्ध होता है और वही विचारपति सम्यों के साथ मिलकर धर्माधर्मं का विचार करता है अथवा विशेष रूप से अपना निर्णय कहता है । सभायां ये हिता योग्याः सभ्यास्ते चापि साधवः । राजसभा ( न्यायालय ) में जो हित चाहनेवाले, कार्य करने में चतुर

एवं सज्जन हों, उन्हीं को सभ्य ( जूरी ) बनाना चाहिये ।

स्मृत्याचारव्यपेतेन मार्गेणाघर्षितः परैः ॥ ६४ ॥

आवेदयति चेद्राज्ञे व्यवहारपदं हि तत् । व्यवहार पद का कथन - धर्मशास्त्र एवं सदाचार से विरुद्ध मार्ग का आश्रय लेकर दूसरों के द्वारा पीड़ित किये जाने पर यदि कोई राजा के पास न्यायालय में आवेदन पत्र देता है उसे ' व्यवहार पद ' ( मुकदमा दायर

करना ) का स्थान कहते हैं ।

• नोत्पादयेत् स्वयं कार्यं राजा नाप्यस्य पूरुषः ॥ ६५ ॥

न रागेण न लोभेन न क्रोधेन प्रसेन्नृपः ।

परैरप्रापितानर्थान्न चापि स्वमनीषया ॥ ६६ ॥

राजा या राजपुरुष को स्वयं व्यवहार को पैदा करने का निषेध - राजा या उसके अधिकारी पुरुष स्वयं किसी विवाद ( मुकदमा ) को न्यायालय में व उपस्थित करें । और राजा अनुराग, लोभ या क्रोध के वशीभूत होकर किसी को पीडित न करे । और बादी - प्रतिवादी के बिना उपस्थित किये राजा अपनी बुद्धि से किसी मुकदमा को न्यायालय में न उपस्थित करे । छलानि चापराधांच पदानि नृपतेस्तथा । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 366

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 366 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२८० शुक्रनीति: · स्वयमेतानि गृह्णीयान्नृपस्त्वावेद कैर्विना ॥ ६७ ॥

सूचकस्तोभकाभ्यां वा श्रुत्वा चैतानि तत्त्वतः । राजा को छलादि का बिना निवेदन किये भी ग्रहण करने किन्तु बिना किसी के द्वारा मुकदमा दायर किये ही राजा का स्वयं जानेवाले छछ, अपराध तथा राजा के पद ( विवाद - स्थान ) इन सूचक ( जासूस अथवा स्तोभक ( सुखविर ) के द्वारा सुनने के निर्देश-आगे कहे सर्वो को जानकर मुकदमा कायम करे । बाद ठीक र पञ्चाशत शास्त्रेणानिन्दितस्त्वर्थी नापि राज्ञा प्रचोदितः ॥ ६८ ॥ का अपमान

आवेदर्यात यत्पूर्व स्तोभकः स उदाहृतः । ४. पीने के स्तोभक के लक्षण – जो शास्त्र से अनिन्दित हो एवं राजा के द्वारा लिये बने हु आवेदनार्थ प्रेरित न किया गया हो किन्तु यदि वह पहले ही आकर राजा पाटनेवाला, से निवेदन करता है, उस आवेदन कर्त्ता को स्तोभक कहते हैं । अन्तःपुर ( नृपेण विनियुक्तो यः परदोषानुवीक्षणे ॥। ६६ ॥ का स्थान ) नृपं संसूचयेऽज्ञात्वा सूचकः स उदाहृतः । मैं घुसने वाल सूचक के लक्षण - राजा द्वारा जो दूसरे के दोषों को निरीक्षण करने १३. जानबू के लिये नियुक्त किये जाने पर उसे जान कर राजा को सूचित करता है, वह बाला के बैठने, १७ के.

' सूचक ' कहलाता है ।

पाथिभङ्गी पराक्षेपी प्राकारोपरिलङ्घकः ॥ ७० ॥

निपानस्य विनाशी च तथा चायतनस्य च ।

परिखापूरकचैष राजच्छिद्रप्रकाशकः ॥ ७१ ॥

अन्तःपुरं वासगृहं भाण्डागारं महानसम् ।

: प्रविशत्य नियुक्तो यो भोजनं च निरीक्षते ॥ ७२ ॥

विण्मूत्रश्लेष्मवातानां क्षेप्ता कामान् नृपायतः ।

पर्यङ्कासनबन्धी चाप्यग्रस्थान विरोधकः ॥ ७३ ॥

नृपातिरिक्तवेषश्च विधृतः प्रविशेत्तु यः ।

यश्चापद्वारेण विशेदवेलायां तथैव च ॥ ७४ ॥

शय्यासने पादुके च शयनासनंरोहणे ।

i राजन्यासन्नशयने यस्तिष्ठति समीपतः ॥ ७५ ॥

राज्ञो विद्विष्टसेवी चाप्यदत्त विहितासनः ।

अन्य वस्त्राभरणयोः स्वर्णस्य परिधायकः ॥ ७६ ॥

स्वयंप्राहेण ताम्बूलं गृहीत्वा भक्षयेत्तु यः ।

अनियुक्तप्रभाषी च नृपाक्रोशक एव च ॥ ७७ ॥

एकवासास्तथाऽभ्यक्तो मुक्तकेशोऽवगुण्ठितः ।. धारण किये प्रधान द्वार किसी के घ शयन करने पहननेवाला उनके समीप २८. विना के किसी के ३२. नवरत नियुक्त न वाला, ३५. लगाकर नानेवाला, पहनकर ज ढंकनेवाला, करनेवाला, कान, ४८. CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 367

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 367 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६७ ॥ बनेका निर्देश-स्वयं आगे कहे ) इन सब को के बाद ठीक २ ॥ ६५ ॥

राजा के द्वारा ही आकर राजा 1 ६६ ॥ निरीक्षण करते करता है, वह ७० ॥ ७१ ॥ ७२ ॥ ७३ ॥ ७४ ॥ ७५ ॥ ७६ ॥ चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपण प्रकरणम् २८१ ' विचित्रिताङ्गः स्रग्वी च ' परिधान विधूनकः ॥ ७८ ॥

शिरः प्रच्छादकञ्चैव च्छिद्रान्वेषणतत्परः ।

आसङ्गी मुक्तकेशश्च घ्राणकर्णाक्षिदर्शकः ॥ ७६ ॥

कर्णनासाविशोधकः । दन्तलेखनचैव समीपे पश्चाशच्छलान्येतानि सन्ति हि ॥ ८० ॥

राज्ञः ( ५० ) छलों का वर्णन -- १. मार्ग को नष्ट करनेवाला, २. दूसरे पञ्चाशत् करनेवाला, ३. प्राकार ( चहार दीवारी ) का लांघनेवाला का 2. अपमान पीने के लिये बने हुये जलाशय को नष्ट या दूषित करनेवाला, ५. रहने के बने हुये स्थान को नष्ट या दूषित करनेवाला, ६. परिखा ( खांई ) को लिये पाटनेवाला, ७. राजा के दोषों को प्रकाशित करनेवाला, ८. विना आज्ञा लिये अन्तःपुर ( जनानखाने ) में घुस जानेवाला, ९. बिना आज्ञा के वासगृह ( रहने का स्थान ), १०. भाण्डगृह ( खजाना ), ११. या महानस ( रसोई गृह ) मैं घुसनेवाला, १२. भोजन करते समय खानेवाले को एकटक देखनेवाला, १३. जानबूझ कर मल, १४. मूत्र, १५. कफ १६. अधोवायु का त्याग करने-बाला, १७. राजा के आगे वीरासन वांधकर घमण्ड से बैठनेवाला, १८. राजा के बैठने के आगे के स्थान को छेकनेवाला, १ ९. राजा से अधिक वेष - भूषा धारण किये हुये राजा के सामने उपस्थित होनेवाला, २१. किसी के गृह में प्रधान द्वार को छोड़कर अन्य मार्ग से प्रवेश करनेवाला, २२. असमय में किसी के घर में जानेवाला, २३. बिना अनुमति के किसी की शय्या पर शयन करनेवाला २४. आसन पर बैठनेवाला, २५. या खड़ाऊं अथवा जूता पहननेवाला, २६. राजा के सोने के समय शय्या पर पहुँच जाने पर भी उनके समीप ठहरनेवाला, २७. राजा के शत्रु की भी सेवा करनेवाला, १८. बिना अनुमति के किसी के गृह में ठहर जानेवाला, २ ९, बिना अनुमति के किसी के वस्त्र, ३०. आभूषण, ३१. या स्वर्ण का धारण करनेवाला, १२. जबरदस्ती दूसरे के पान को लेकर खानेवाला, ३३. भाषण के लिये नियुक्त न किये जाने पर भी भाषण करनेवाला, ३४. राजा की निन्दा करने वाला, ३५. राजा के समीप में केवल एक वस्त्र पहननेवाला, ३६. तेल लगाकर जानेवाला, ३७. केश खोल कर जानेवाला, ३८. सुख ढँक कर जानेवाला, ३ ९. विचित्र ढङ्ग से अह्नों को बनाकर जानेवाला, ४०. माला पहनकर जानेवाला, ४१. पहिने हुये वस्त्र को हिलानेवाला, ४२. सिर को • ढकने वाला, ४३. दूसरे के छिद्रों को ढूंढनेवाला, ४४. मद्यपानादि व्यसन ७७ ॥ करनेवाला, ४५. वेश - भूषादि का त्याग करनेवाला, ४६. अपनी नाक, ४७. कान, ४८. या आंख को विशेष रूप से दिखानेवाला, ४ ९. दांत को कुरेदने चाका, CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 368

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 368 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२८२ शुक्रनीतिः १०. कान या नाक से मल निकालनेवाला, राजा के समीप ( दोष ) माने जाते हैं । में ये आज्ञोल्लङ्घनकारित्वं स्त्रीधो वर्णसङ्करः परस्त्रीगमनं चौर्यं गर्भश्चैष पतिं विना ॥ । ८१ ॥ वाक्पारुष्यमवाच्याद्यं दण्डपारुष्यमेव च । गर्भस्य पातनं चैवेत्यपराधा दश अपराधों दशैव तु ॥ ६२ ॥

का वर्णन - १. भाज्ञा का उल्लङ्घन करना, २. हत्या करना, रे. विवाह द्वारा वर्णसङ्करता करना, ४. पर - त्री गमन ५. चोरी करना, ६. पति के अलावा अन्य पुरुष से गर्भ होना ७. ५० ह क्रोधी, विच मानी हो तो श्री को करना आवेदन , बोलना, ८. नहीं कहने योग्य बातें कहना ९. कठोर दण्ड, कठोर बचन बादी द्वारा गिराना इस प्रकार से ये १० अपराध होते हैं । देना, १०. गर्भ का ( अर्जी ) 1

उत्कृती सस्यघाती चाप्यग्निदश्च तथैव च ।

राज्ञो द्रोहप्रकर्ता च तन्मुद्राभेदकस्तथा ॥ ८३

' तन्मन्त्रस्य प्रभेत्ता च बद्धस्य च विमोचकः ।

अस्वामिविक्रयं दानं भागं दण्डं विचिन्वति ॥ ८४ ॥

पटहाघोषणाच्छादी द्रव्यमस्वामिकं च यत् ।

राजावलीढद्रव्यं च यच्चैवाङ्गविनाशनम् ॥ ८५ ॥।

द्वाविंशतिपदान्याहुर्नृपज्ञेयानि पण्डिताः 1 राजा द्वारा ज्ञेय २२ पर्दों का वर्णन - १. उद्वेग करनेवाला. २. ( खेती ) नष्ट करनेवाला, ३. गृहादि में अग्नि लगानेवाला, ४. राजद्रोह जाता है उस होती है । पर प्रार्थना पूछकर उसके बयान अन्त में राज प्रकार का स धान्य करने-पूर्वप वाला, ५. राजचिह्न को नष्ट करनेवाला, ६. राजा की गुप्त मन्त्रणा को प्रकाशित करनेवाला, ७. कैदियों को जेल से भगानेवाला, ८. बिना स्वामी के वस्तु को स्त करने प्रकार से बेंच देना, ९. किसी के दान, हिस्सा, और दण्ड को लुप्त करनेवाला, ९. राजा दिलाते हैं के द्वारा जिस विषय की डुग्गी पिटा दी गई हो, उसको छिपानेवाला, १०, मैं ऐसापुन बिना स्वामी के ( लावारिस ) द्रव्य को ले लेनेवाला, ११. राजा से से किये करे एवं अ ब्रव्य पर अधिकार जमानेवाला, १२. किसी अङ्गों को काट देना, ये पूर्वोक १० अपराधों के सहित २२ पद अर्थात् विवाद के स्थान कहे हुये हैं जिसे

पण्डितों को जानना चाहिये ।

उद्धतः क्रूरवाग्वेषो गर्वितश्चण्ड एव हि ॥ ८६ ॥

सहासनश्चातिमानी वादी दण्डमवाप्नुयात् । पूर्वप दण्ड योग्य वादी के लक्षणों का निर्देश — जो वादी उद्धत स्वभाववाला, ( सुकदमा निष्ठुर बच्चन बोलनेवाला एवं निष्ठुर कार्य करने योग्य वेषवाला, गर्वी, अस्पत ' योग्य हो CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 369

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 369 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प में ये ५० पुरु ८१ ॥ ८२ ॥ जा, २. स्त्री को श्री गमन करना, ७. कठोर वचन १०. गर्म का ८३ ८४ ॥ ८५ ॥ चाला २. धान्य राजद्रोह करने णा को प्रकाशित मी के वस्तु को वाला, ९. राजा पानेवाला, १०. जा से के लिये देना, ये पूर्वोक कहे हुये हैं जिसे ३६ ॥ स्वभाववाला , गर्दी, अत्यन्त चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २८३ क्रोधी, विचारपति ( जज ) के साथ २ आसन पर बैठनेवाला और अत्यन्त

तो उसे दण्ड देना चाहिये ।

मानी हो " अर्थिन कथितं राज्ञे तदावेदनसंज्ञकम् ॥ ८७ ॥

कथितं प्रावाकादौ सा भाषाऽखिल बोधिनी ।

स पूर्वपक्षः सभ्यादिस्तं विमृश्य यथार्थतः ॥ ८८ ॥

अर्थितः पूरयेद्धीनं तत्साक्ष्यमधिकं त्यजेत् ।

वादिनश्चिह्नितं साक्ष्यं कृत्वा राजा विमुद्रयेत् ॥ ८६ ॥

आवेदन पत्र के लक्षण तथा सबके बोध योग्य भाषा ( बयान ) का निर्देश—-बादी द्वारा जो राजा के पास आवेदन पत्र दिया जाता है, उसे ' आवेदन ' ( अर्जी ) कहते हैं । और जो प्राड्विवाक ( जज ) आदि के समक्ष कहा है उसे ' भाषा ' ( वयान ) कहते हैं । जो कि सारी बातों को समझानेवाली होती ज्ञाता है । और वही ' पूर्वपक्ष ' कहा जाता है । सभ्य ( जूरी ) आदि उसी पर प्रार्थना किये जाने पर यथार्थं रीति से विचार कर जो कमी हो उसे वादी से पूछकर पूरा कर ले एवं जो अधिक हो उसे निकाल दे । इस भांति से उसके बयान को पूर्ण करके उस पर उसके अंगूठे का निशान लगवाले और अम्स में राजा उस पर अपनी मुहर लगा दे । वादी का यह बयान भी एक प्रकार का साचय ( गवाही ) होता है ।

अशोधयित्वा पक्षं ये ह्युत्तरं दापयन्ति तान् ।

रागालोमाद्भयाद्वापि स्मृत्यर्थे वाधिकारिणः ॥ ६० ॥

सभ्यादीन् दण्डयित्वा तु ह्यधिकारान्निवर्तयेत् । पूर्वपच को बिना शुद्ध किये उत्तर दिलानेवाले अधिकारी को अधिकार-च्युत करने का निर्देश – जो अधिकारी पुरुष राग, लोभ या भय इस प्रकार से बिना वादी के पक्ष का जांच - परताल किये ही प्रतिवादी से उत्तर दिलाते हैं ऐसा करनेवाले उन अधिकारी सभ्य ( जूरी ) आदि को भविष्य मैं ऐसा पुनः निन्दित कार्य न करने का स्मरण रखने के लिये राजा दण्डित

करे एवं अधिकार- च्युत कर दे ।

माह्माग्राह्यं विवादं तु सुविमृश्य समाश्रयेत् ॥ ९ १ ॥

सञ्जातपूर्वपक्षं तु वादिनं सन्निरोधयेत् ।

राजाज्ञया सत्पुरुषैः सत्यवाग्भिर्मनोहरैः ॥ ६२ ॥

निरालसेङ्गितज्ञैश्च दृढशस्त्रास्त्रधारिभिः । पूर्वपच पूर्ण होने पर बादी को रोक देने का निर्देश- राजा विवाद ( सुकदमा ) लेने योग्य है या नहीं इसका भलीभांति विचार कर यदि योग्य हो तो ले ले । और जब बादी का पूर्वपच ( बयान ) पूरा हो जाय CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 370

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 370 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२८४ शुक्रनीति:... तो आगे कहने के लिये उसे अपनी आज्ञा से सत्य बोलनेवाले आलस्यशून्य, इङ्गित ( इसारे ) को समझनेवाले, दृढ़ शस्त्राओं, मनोहर, करनेवाले ऐसे सत्पुरुषों के द्वारा रोकवा दे | के धारण वक्तव्येऽर्थे ह्यतिष्ठन्तमुत्क्रामन्तं दुष्टों क च तद्वचः ॥ ६३ ॥

आसेधयेद्विवादार्थी यावदाह्वानदर्शनम् | का अनुमान प्रत्यर्थिनं तु शपथैराज्ञया वा नृपस्य च खोये या ल ॥ ६४ ॥ अर्थात् यथा

जब तक राजाज्ञा न हो तब तक प्रत्यर्थी को रोक देने का निर्देश-विवादार्थी ( वादी ) व्यक्ति वक्तव्य अर्थ में स्थित न होते हुये अथवा उसके वचन का अतिक्रमण करते हुये प्रतिवादी व्यक्ति को बुलाने पर आने के साथ ही सौगन्ध देकर अथवा राजाज्ञा से रोक देवे । अपरा स्थानासेधः कालकृतः प्रवासात् कर्मणस्तथा । राजा रोगी, चतुर्विधः स्यादासेघो नासिद्धस्तं विलङ्घयेत् ॥ ९ ५ ॥ व्यस्त, अभि ४ प्रकार के आधों का वर्णन - आसेध ४ प्रकार का होता है । १. स्थान उत्सव के क कृत, २. कालकृत, ३. प्रवासकृत तथा ४. कर्मकृत आसेध । आसिद्ध ( रोका तथा दुःखी हुआ ) आसेध ( रोक ) का उल्लंघन न करे । लिये न बुल

यस्त्विन्द्रियनिरोधेन व्याहारोच्छासनादिभिः ।

आसेघयेदनासेधैः स दण्डयो न त्वतिक्रमी ॥ ९ ६ ॥

यदि कोई मल - मूत्रादियों के द्वारों के निरोध से, कटु वाक्यों से अथवा हीनप कठिन शासन आदि जैसे अयोग्य आसेध के प्रकारों से किसी को अर्थात् वादी ( अनाथा की कन्या या प्रतिवादी को रोके तो वह दण्डनीय होता है । किन्तु आसेध का अतिक्रमण करनेवाला नहीं दण्डनीय होता है । नबुलवावे प्रश्न करे ।

आसेधकाल आसिद्ध आसेधं योऽतिवर्तते ।

सविनेयोऽन्यथा कुर्वन्नासेद्धा दण्डभाग् भवेत् ॥ ६७ ॥

जो भासेध ( अवरोध ) के समय में अवरुद्ध होकर आसेध का उल्लंघन करता है वह दण्डनीय होता है और यदि आसेघ करनेवाला अन्यथा रीति से आसेध करे तो वह दण्डनीय होता है । यस्याभियोगं कुरुते तत्वेनाशङ्कयाऽथवा । तमेवाह्वानयेद्राजा मुद्रया पुरुषेण वा ॥ ६८ ॥ निर्वेण्ड

जिस पर अपराध की शंका या जो अपराधी हो उसी को बुलाने के लिये विवाह के राजा का निर्देश — वस्तुतः या सन्देहवश जिसके ऊपर अभियोग ( सुकंदमा ) हुआ, अन्य चलाया जाता है, उसी को राजा अपनी मुहर लगे हुये पत्र या राजपुरुष गायों के च ( कारीगर ( सिपाही ) द्वारा न्यायालय में बुलावे । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri