शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 351–360
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 351–360
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२७३ ॥ माण का होना होनी चाहिये । १७४ १७५ ॥ के तुल्य होनी गुल प्रमाण की अंगुल प्रमाण को उसकी परिधि ॥ १७६ ॥
ताल प्रमाण १७७ ॥ की परिधि भी छः अंगुल का १७८ ॥ भाग की परिधि १७६ ॥ आग की परिधि कुल भर अधिक चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपण प्रकरणम् नेत्रयोः कथितं तज्ज्ञैर्गणपस्य विशेषतः । कर्ण और नेत्र का अन्तर सदा चार अकुल का समझना मध्य तथा अग्रभाग का अन्तर क्रम से दश, नेत्रों के मूल, विद्वानों ने गणेश की मूर्ति के संबन्ध में कहा अल प्रमाण का उत्सेधः पृथुता स्त्रीणां स्तने पखाला मता ॥ स्त्रीकटयां परिधिः प्रोक्तस्त्रितालो द्वयङ्गुलाधिकः स्त्रीणः मवयवान सर्वान् सप्ततालैर्विभावयेत् ॥ २६५ चाहिये । दोनों सात तथा छः
है ।
१८१ ॥
।
१८२ ॥
क्षियों के अवयवों का प्रमाण - स्त्री- मूर्तियों में स्तन की ऊंचाई तथा सुटाई पांच अशुल प्रमाण की होनी चाहिये । स्त्री - मूर्ति में कमर की परिधि दो अधिक तीन ताल प्रमाण की कही हुई है । और स्त्री - मूर्तियों में सम्पूर्ण अों का प्रमाण मिलाकर योग सात ताल प्रमाण होना चाहिये ।
सप्ततालादिमानेऽपि मुखं स्याद् द्वादशाङ्गुलम् ।
बालादीनामपि सदा दीर्घता तु पृथक् पृथक् ॥ १८३ ॥
सर्वो के मुख का प्रमाण - इनका सात ताल आदि प्रमाण होने पर भी सुख का प्रमाण बारह ही अङ्गुल का होता है । और बाला आदि मूर्तियों के भेदों की लम्बाई सदा पृथक् - पृथक् समझनी चाहिये ।
शिशोस्तु कन्धरा ह्रस्वा पृथु शीर्ष प्रकीर्तितम् ।
कण्ठाधो वर्धते यादृक् तादृक्छीर्ष न वर्धते ॥
बालक- प्रतिमा के अवयवों का प्रमाण - शिशु · मूर्ति की सिर बड़ा बनाना चाहिये, क्योंकि जैसा कण्ठ के नीचे का वैसा सिर नहीं बढ़ता है ।
कण्ठाधोमुखमानेन बालः सार्धचतुर्गुणः ।
द्विगुणः शिश्नपर्यन्तो धः शेषं तु सक्थितः ॥
• सपादद्विगुणौ हस्तौ द्विगुणौ वा मुखेन हि ।
१८४ ॥
ग्रीवा छोटी और भाग बढ़ता है १८५ ॥ स्थौल्ये तु नियमो नास्ति यथाशोभि प्रकल्पयेत् ॥ १८६ ॥
बाल - मूर्ति में मुख के प्रमाण की अपेक्षा कण्ठ के नीचे का भाग ४ | गुना बड़ा होता है । उसमें शिश्न पर्यन्त भाग लंबाई में मुख से दुगुना बढ़ा होता है । और शेष जंघा से लेकर नीचे का सारा भाग । गुमा अधिक बड़ा होता है । और सुख की अपेक्षा दोनों हाथ २। गुने अथवा दुगुने लम्बे होते हैं । G किन्तु सुटाई में कोई नियम नहीं है उसे जिस प्रकार से देखने में सुन्दर लगे वैसा बनाना चाहिये । १८० ॥ नित्यं प्रवर्धते बालः पञ्चाब्दात् परतो भृशम् । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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२६६ शुक्रनीति: स्यात् षोडशेऽब्दे सर्वाङ्ग - पूर्णा स्त्री विंशती पुमान् शरीर की पूर्णता होने का वर्ष प्रमाण – बालक पांच ॥ १८७ ॥
धीरे - धीरे बढ़ता है किन्तु पांच वर्ष के बाद अत्यन्त तेजी से वर्ष तक निस्व वर्ष की अवस्था में सर्वाङ्गों से परिपूर्ण होती है किन्तु पुरुष २० बढ़ता वर्ष है की । स्त्री अवस्था और गुल में परिपूर्ण अङ्गवाला होता है । तथा ऊरु और ततोऽर्हति प्रमाणं तु सप्ततालादिकं सदा । C बाल्ये s पि शोभाढयस्तारुण्ये वार्धके क्वचिद् प इससे सदा युवावस्था होने पर ही सात ताल आदि प्रमाण ॥ १८६ ॥ और दस
होती है । और कोई बाल्यावस्था में भी शोभायुक्त होता है, और कोई युवा- तथा दोनों य वस्था में एवं कच्चित् कोई वृद्धावस्था में शोभायुक्त होता है ।
मुखाधस्त्रयङ्गुला ग्रीवा हृदयं तु नवाङ्गुलम् ।
तथोदरं च बस्तिञ्च सक्थि त्वष्टादशाङ्गुलम् ॥ १८६ ॥
त्र्यङ्गुलं तु भवेज्जानु जङ्घा त्वष्टादशाङ्गुला ।
गुल्फाधस्त्रयङ्गुलं ज्ञेयं सप्ततालस्य सर्वदा ॥ १ ९ ० ॥
सप्त ताल प्रमाण की मूर्त्ति के अवयवों का प्रमाण - मुख के नीचे प इससे ( दो - दो अल सजावट शोभ न भाग में और न ग्रीवा तीन अङ्गुल प्रमाण की । हृदय ( वचः स्थल ) नथ अंगुल प्रमाण का करनी चाहिय तथा उदर और वस्ति ( नाभि के नीचे का भाग ) भी नव अंगुल प्रमाण द का, ऊरु अट्ठारह अङ्गुल प्रमाण का, जानु तीन अंगुल प्रमाण का, जा ए अट्ठारह अंगुल प्रमाण की, गुल्फ के नीचे का भाग तीन अंगुल प्रमाण का, सात ताल प्रमाणवाली मूर्त्ति में सदा होता है ।
वेदाङ्गुलं भवेद् ग्रीवा हृदयं तु दशाङ्गुलम् ।
दशाङ्गुलं चोदरं स्याद् • बस्तिश्चैव दशाङ्गुलः ॥ १६१ ॥
एकविशाङ्गुलं सक्थि जानु स्याच्चतुरङ्गुलम् ।
एकविंशाङ्गुला जङ्घा गुल्फाघश्चतुरङ्गुलम् ॥ १६१ ॥
अष्टतालप्रमाणस्य मानमुक्तमिदं सदा । दस ताल के बनाने चा कम प्रमाण क ६ दश ताल अधिक प्रमाण चार अंगुल की ग्रीवा, दस अंगुल का हृदय, दस अंगुल का उदर तथा से आरम्भ क दस अंगुल की वस्ति, इक्कीस अंगुल की ऊरु, बारह अंगुल का जालु, इस चाहिये । अंगुल की जंघा, चार अंगुल का गुल्फ के नीचे का भाग इस भांति से बाठ ताल प्रमाणवाली मूर्त्ति के अह्नों के प्रमाण होते हैं । त्रयोदशाङ्गुलं ज्ञेयं मुखं च हृदयं तथा ॥ १६३ ॥ आसुरी
उदरं च तथा बस्तिर्दशतालेषु सर्वदा । ( लम्बी ), ह तथा atta तो उसे ' आ दस ताल प्रमाणवाली मूर्तियों में सदा मुख, हृदय, उदर हो प्रत्येक तेरह अंगुल प्रमाण का होना चाहिये । उसे ' पैशा CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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न् ॥ १८७ ॥
वर्ष तक निस्प ढ़ता है । स्त्री ११ वर्ष की अवस्था कचिद् || १८८६ || ण की योग्यता और कोई युवा • १८६ ॥ १ ९ ० ॥ के नीचे भाग में नंगुल प्रमाण का अंगुल प्रमाण भाण का, जहा प्रमाण का, सात १६१ ॥ १६२ ॥ चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६७ तथा ग्रीवा जानु पचाङ्गुलं स्मृतम् ॥ १ ९ ४ ॥ गुल्फाघश्च षडविशत्यङ्गुलं सक्थि तथा जङ्घा प्रकीर्तिता । के नीचे का भाग, ग्रीवा, जानु प्रत्येक पांच अंगुल प्रमाण का और गुल्फ जंघा प्रत्येक छब्बीस अंगुल प्रमाण का होना चाहिये । तथा ऊरु और एकाङ्गुलो मूर्ध्नि मणिर्दशता_ल्पेत् ॥ १ ९ ५ ॥ पञ्चाशदङ्गुलौ बाहू दशताले स्मृतौ सदा । और इस ताल प्रमाण की मूर्ति में सिर की मणि एक अंगुल प्रमाण की,
तथा दोनों बाहु पृथक् - पृथक् पन्द्रह अजुल प्रमाण के सदा होने चाहिये ।
द्वौ द्वयङ्गुली चोनों ततो हीनप्रमाणके ॥ १ ९ ६ ॥
पाटवं तु यथाशोभि सर्वमानेषु कल्पयेत् । इससे ( दश ताल से ) हीन प्रमाणवाली मूर्ति में प्रत्येक बाहु का प्रमाण दोदो अकुछ कम होना चाहिये । और सभी प्रकार के प्रमाणों में अङ्गों की
सजावट शोभानुसार करनी चाहिये ।
नवतालप्रमाणे न ह्यूनाधिक्यं प्रकल्पयेत् ॥ १६७ ॥।
और नव ताल प्रमाण की मूर्ति में अङ्गों के प्रमाण में कमी - बेशी नहीं करनी चाहिये ।
दशताले तु विज्ञेयौ पादौ पञ्चदशाङ्गुलौ ।
एकैकाङ्गुलहीनौ: स्तस्ततो न्यूनप्रमाणके ॥ ११८ ॥
दस ताल प्रमाण की मूर्त्ति में दोनों पैर पृथक् - पृथक् पन्द्रह अंगुल प्रमाण के बनाने चाहिये । इससे हीन प्रमाण की मूर्ति में दोनों पैर एक - एक अल कम प्रमाण के होने चाहिये ।
दशता लोमानं तु ताले तालेऽधिकाङ्गुलम् ।
कल्पयेन्मुखतो धीमान् शिल्पवित्सु यथा तथा ॥ ११३ ॥
दश ताल से अधिक प्रमाण की मूर्ति में प्रत्येक ताल पर एक २ अंगुल अधिक प्रमाण अंगों का करना चाहिये । और बुद्धिमान मूर्त्तिकार को मुख का उदर तथा से आरम्भ कर पैर पर्यन्त अङ्ग जिस भांति से सुन्दर हो सके बैसा बनाना का जानु, इक्कीस भांति से आठ २६३ ॥ दर तथा बस्ति चाहिये ।
दीर्घोरजङ्घा विकटा क्रूरा स्याद् भीषणाऽऽसुरी ।
प्रतिमा ज्ञेयासी सुकृशाऽपि वा ॥ २०० ॥
बासुरी आदि मूर्तियों के लक्षण -1 - जिस मूर्ति की ऊरु तथा जंघा दीर्घ ( लम्बी ), हो एवं वह देखने में विकट, क्रूर तथा भीषण आकार वाली हो तो उसे ' आसुरी ' और उक्त लक्षणों से युक्त होती हुई जो मूर्ति अत्यन्त कृश हो उसे ' पैशाची ' अथवा ' राक्षसी ' समझनी चाहिये । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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२६८ शुक्रनीति: न चालतो हीना न षडङ्गुलतोऽधिकाः । करस्य मध्यमा प्रोक्ता सर्वमानेषु तद्विदैः ॥ २०१ ॥ चत
सभी प्रमाण की मत्ति में हाथ की मध्यमा अगुलि पांच तथा छः अंगुल से अधिक प्रमाण की नहीं बनानी चाहिये ऐसा अंगुल से कम स विद्वान लोग कहते हैं । मूति कला के को कचित्तु बालसदृशं सदैव तरुणं वयः | राजा वि मूर्तीनां कल्पयेछिल्पी न वृद्धसदृशं क्वचित् ॥ २०२ ॥ विवाद के नि
शिल्पी को कभी मूर्त्तियों की वृद्धसदृश कल्पना न करने का निर्देश- हो उनका है और मूर्त्तिकार कहीं पर बालक के समान और कहीं युवा के समान मूर्त्ति बनाये रहती प्रजा किन्तु कहीं पर भी वृद्ध के समान मूर्त्ति न बनावे | अर्थात् एवंविधान् नृपो राष्ट्रे देवान् संस्थापयेत् सदा । स प्रतिसंवत्सरे तेषामुत्सवान् सम्यगाचरेत् ॥ २०३ ॥ इ
राजा को उक्त देवताओं का स्थापन करके प्रतिवर्ष उनका उत्सव करने शत्रु, दुध का निर्देश- -राजा अपने राज्य के अन्दर इसी भांति से बनी देव - मूर्तियों की ' शत्रु ' और अ -सदा स्थापना करे । और प्रतिवर्ष उनके उत्सव भलीभांति करे ।
देवालये मानहीनां मूर्ति भग्नां न धारयेत् ।
प्रासादांश्च तथा देवाजीर्णानुद्धृत्य यत्नतः ॥ २०४ ॥
देवतां तु पुरस्कृत्य नृत्यादीन् वीदय सर्वदा ।
न मनः स्त्रोपभोगार्थ विद्ध्याद् यत्नतो नृपः ॥ २०५ ॥
न्यायपूर्वक श प शत्रुनाश कर देना ही कहलाता है । मानहीन और भग्न प्रतिमा को रखने का निषेध - और देवमन्दिर में उक्त प्रकार के प्रमाणों से हीन प्रमाण की अथवा खण्डित मूर्ति को न रहने स दे । तथा देवता और उनके मन्दिरों के जोर्ण हो जाने पर उनका यत्नपूर्वक ज पुनः संस्कार करते हुये और सदा देवताओं के आगे नृत्यादि देखते राजा यत्नपूर्वक अपने राजोचित भोग भोगने में मनको न प्रवृत्त करे ।
प्रजाभिर्विधृता ये ये ह्युत्सषास्तांश्च पालयेत् ।
प्रजानन्देन संतुष्येत् तद्दुःखैर्दुःखितो भवेत् ॥ २०६ ॥
इति शुक्रनीतौ राष्ट्रेमध्यं चतुर्थाध्यायस्य लोकधर्मनिरूपणं नाम चतुर्थ प्रकरणं समाप्तम् ॥ ४ ॥
प्रजाकृत उत्सवों का सदैव पालने करने का निर्देश — और प्रजाओं व्यवहार हुये, से विचार क सिद्धि होती ह ६ स स राजा का द्वारा क्रोध और लो जो २ उत्सव किये जाते हों उनकी रक्षा करे एवं प्रजाओं के भानन्य से करनेवाला ), आनन्दित तथा दुःख से स्वयं दुःखित हो । उपस्थित व्यव इस प्रकार शुक्रनीति - भाषाटीका में राष्ट्र का मध्य चतुर्थाध्याय का लोकधर्मनिरूपण नामक चतुर्थ प्रकरण समाप्त हुआ । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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। २०१ ॥ च अंगुल से कम सामूर्ति - कला के चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६ ९ पश्चमं प्रकरणं राजधर्मनिरूपणम्
चतुर्थाध्यायस्यकुर्याद् व्यवहारानुदर्शनैः ।
दुष्टनिग्रहणं' वर्तितुं शक्त्या स्वाधीना च सदा प्रजा ॥ १ ॥
स्वाज्ञया से सुखी और प्रजा दुःख से दुखी होने का निर्देश-राजा को प्रजा सुख होने पर उसका भलीभांति विचार कर जो दुष्ट उपस्थित विवाद के विषय चाहिये । ऐसा करने से प्रजा सदा राजा के अधीन २०२ ॥ हो उनका निग्रह उसकी करना के अनुसार कार्य करने में समर्थ होती है । रने का निर्देश- रहती है और आज्ञा व्यवहार न करे, वैसा करना चाहिये । नान मूर्ति अर्थात् प्रजा जिस प्रकार से स्वेच्छापूर्वक बनाये स्वेष्टहानिकरः शत्रुर्दुष्टः पापप्रचारवान् । . । इष्टसंपादनं न्याय्यं प्रजानां पालनं हि तत् ॥ २ ॥
। २०३ ॥ शत्रु, दुष्ट तथा प्रजापालन के लक्षण - अपने अभीष्ट की हानि करने वाला उनका उत्सव काने ' शत्रु ' और आचरण द्वारा पाप का प्रचार करनेवाला ' दुष्ट ' कहलाता है । और नीदेव मूर्तियों की न्यायपूर्वक प्रजा का अभीष्ट सिद्ध करना ही प्रजा का ' पालन ' कहलाता है ।
1 शत्रोरनिष्टकरणान्निवृत्तिः शत्रुनाशनम् ।
पापाचारनिवृत्तिर्ये दुर्धनग्रहणं हि तत् ॥ ३ ॥
॥ २०४ ॥ शत्रुनाश और दुनिग्रह का लक्षण - शत्रु को अनिष्ट करने से निवृत्त
कर देना ही ' शत्रु का नाश ' और पापाचरण से निवृत्त करना ' दुष्ट का निग्रह ' ॥ २०५ ॥ कहलाता है ।
और देवमन्दिर में स्वप्रजाधर्मसंस्थानं सदसत्प्रविचारतः । मूर्ति को न रहने जायते चार्थसंसिद्धिर्व्यवहारस्तु येन सः ॥ ४ ॥
उनका यस्नपूर्वक व्यवहार- लक्षण - जिसके द्वारा सत् और असत् विषय का अच्छी तरह यदि देखते हुये, से विचार करने से अपनी प्रजा की धर्म में स्थिति तथा कार्यों की भलीभांति करे । सिद्धि होती है, उसे ' व्यवहार- मुकदमा ' कहते हैं ॥ । २०६ ॥ निरूपणं - और प्रजाओं द्वारा ओं के आनन्द ध्याय का आ ।
धर्मशास्त्रानुसारेण क्रोध लोभविवर्जितः ।
सप्राड्विवाकः सामात्यः सब्राह्मणपुरोहितः ॥ ५ ॥
समाहितमतिः पश्येद् व्यवहाराननुक्रमात् । राजा को प्राड्विवाकादि के साथ व्यवहारों को देखने का क्रोध और लोभ से रहित एवं प्राबिबेक ( पूछनेवाला और करनेवाला ), अमात्य, ब्राह्मण और पुरोहित के साथ सावधान
उपस्थित व्यवहारों कोकमानुसार देखे ।
नैकः पश्येच्च कार्याणि वादिनोः शृणुयाद्वचः ॥
रहसि च नृपः प्राज्ञः सभ्याश्चैव कदाचन । निर्देश - राजा उस पर विचार होकर न्यायार्थ.. ६ ॥ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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२७० शुक्रनीति: बुद्धिमान राजा अथवा न्याय सभा के सदस्यगण अकेले वादी प्रतिवादी के कार्यों ( सुकदमों ) को कभी न देखे और एकान्त मे उसके लिये को सुने । न उनकी बातों न पक्षपात पक्षपाताधिरोपस्य कारणानि च पञ्च वै ॥ ७ ॥ डरनेवाला,
रागलोभभयद्वेषा वादिनोश्व रहः श्रुतिः । पक्षपात के ५ कारणों का निर्देश - पक्षपात रूप दोष के निश्चित ये ५ कारण हैं —१. राग, २. लोभ, ३. भय, ४. द्वेष, ५. वादी - प्रतिवादी रूप क से ब्राह्मण एकान्त में बातें सुनना । करने का पौर कार्याणि यो राजा न करोति सुखे स्थितः ॥ ८ ॥ के लिये ) ।
व्यक्तं स नरके घोरे पच्यते नात्र संशयः । वैश्य को द राजा के अनिष्टकारक हेतुओं का निर्देश – जो राजा सुखभोग अर्थात् उस रहकर पुरवासी प्रजाजनों का हित कार्य मुकदमा आदि देखना, नहीं में भासक करता है । वह भविष्य में निश्चित घोर नरक का दुःख भोगेगा । इसमें सम्देह जिस नहीं है । उसी जाति यस्त्वधर्मेण कार्याणि मोहात् कुर्यान्नराधिपः ॥ ६ ॥ ही गुणवान
अचिरात्तं दुरात्मानं वशे कुर्वन्ति शत्रवः । जो राजा मूढतावश अधर्मं कार्यों को करता है उस दुरारमा को शत्रु लोग
शीघ्र अपने वश ( अधीन ) कर लेते हैं ।
अस्वर्ग्या लोकनाशाय परानीकभयावहा ॥ १० ॥
आयुर्बीजहरी राज्ञामस्ति वाक्ये स्वयंकृतिः । सभास वादी प्रतिवादी जनों की बातों को सुनकर राजा यदि सभासदों की राय बुद्धिमान, लिये बिना स्वयं कोई निर्णय करता है तो उससे उसे मरक की प्राप्ति, प्रजाओं व्यवहार का नाश, शत्रुसेनाओं से भय ( शत्रुओं की वृद्धि ) आयु का क्षय इत्यादि आलस्य से होते हैं । ऐसे सभी तस्माच्छाखानुसारेण राजा कार्याणि साधयेत् ॥ ११ ॥ नियुक्त कर
इससे राजा को शास्त्रानुसार कार्यों ( मुक्तदमों ) देखना चाहिये ।
यदा न कुर्यान्नृपतिः स्वयं कार्यविनिर्णयम् ।
तदा तत्र नियुञ्जीत ब्राह्मणं वेदपारगम् ॥।
दान्तं कुलीनं मध्यस्थ मनुद्वेगकरं स्थिरम् ।
परत्र भीरुं धर्मिष्ठमुयुक्तं क्रोधवर्जितम् ॥
स्वयं कार्य निर्णय न कर सकने पर योग्य ब्राह्मण को को भलीभांति १२ ॥ राजा ( बढ़ई ), १३ ॥ संघ ), ना नियुक करने का ये सब लो राजा को निर्देश- -जब राजा स्वयं कार्यों ( मुकद्दमों ) का निर्णय न करे तब स्वयं पंचा CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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अकेले और न एकान्त में उनकी बातो ॥७ ॥
के निश्चित रूप से वादी - प्रतिवादीको ॥ ८ ॥
खभोग में आस चना, नहीं करता 7। इसमें सन्देह 7 & 11 माको शत्रु लोग 1१० ॥ सभासदों की राय की प्राप्ति, प्रजाओ का क्षय इत्यादि - ॥। को ११ भलीभांति ॥ १२ ॥ १३ ॥ करने का नियुक निर्णय न करे तब चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २७१ लिये वेद का अच्छा ज्ञाता, इन्द्रियों का दमन करनेवाला, कुलीन, उसके न करनेवाला, शान्त प्रकृतिवाला, चञ्चलता से रहित, परलोक से पक्षपात धार्मिक, उद्योगी और क्रोध से रहित ऐसे ब्राह्मण को नियुक्त करे ।
नेवाला, यदा विप्रो न विद्वान् स्यात् क्षत्रियं तत्र योजयेत् ।
वैश्यं वा धर्मशाखज्ञं शूद्रं यत्नेन वर्जयेत् ॥ १४ ॥
ब्राह्मण न मिलने पर क्षत्रियादि नियुक्त करने का एवं शूद्र को न नियुक्त करने का निर्देश – जब वैसा बिद्वान ब्राह्मण न मिले तब उसके लिये ( निर्णय के लिये ) पूर्वोक्त गुणों से युक्त धर्मशास्त्र का जानने वाला क्षत्रिय अथवा वैश्य को नियुक्त करे किन्तु शूद्र को यत्नपूर्वक निर्णय के लिये त्याग कर दे अर्थात् उसको नियुक्त न करे ।
यद्वर्णजो भवेद्राजा योन्यस्तद्वर्णजः सदा ।
तद्वर्ण एव गुणिनः प्रायशः सम्भवन्ति हि ॥ १५ ॥
जिस जाति का राजा स्वयं हो निर्णय करने के लिये अपना प्रतिनिधि उसी जाति के व्यक्ति को सदा चुने । क्योंकि प्रायः करके राजा की जाति में ही गुणवान् लोग उत्पन्न होते हैं ।
व्यवहारविदः प्राज्ञा वृत्तशीलगुणान्विताः ।
रिपौ मित्रे समा ये च धर्मज्ञाः सत्यवादिनः ॥।
निरालसा जितक्रोध - कामलोभाः प्रियंवदाः । राज्ञा नियोजितव्यास्ते सभ्याः सर्वासु जातिषु सभासद के लक्षण – व्यवहार ( मुकदमा देखने की रीति बुद्धिमान, चरित्र, शील तथा गुण से युक्त, शत्रु तथा मित्र १६ ॥ ॥ १७ ॥
) के जाननेवाले, के साथ समान व्यवहार करनेवाले ( राग - द्वेष से रहित ), धर्म के जाननेवाले, सत्यवादी, आलस्य से रहित, क्रोध, काम तथा लोभ को जीतनेवाले, प्रिय वचन बोलनेवाले ऐसे सभी जातियों के व्यक्तियों को राजा द्वारा विचार - सभा का सदस्य ( जूरी ) नियुक्त करना चाहिये ।
कीनाशाः कारुकाः शिल्पिकुसीदिश्रेणि नर्तकाः ।
लिङ्गिनस्तस्कराः कुर्युः स्वेन धर्मेण निर्णयम् ॥ १८ ॥
अशक्यो निर्णय ह्यन्यैस्तज्जैरेव तु कारयेत् । राजा के द्वारा निर्णयायोग्य पुरुषों के लक्षण - कीनाश ( कृषक ), कारु ( बढ़ई ), शिल्पी ( कारीगर ), सूद खानेवाले, श्रेणि ( निकृष्ट जातियों के संघ ), नाचनेचाले, लिङ्गी ( भाण - योगी आदि ) तथा तस्कर ( जाति विशेष ) ये सब लोग अपने २ धर्म के अनुसार अपनी २ जातियों के विवाद का निर्णय स्वयं पंचायत द्वारा करें, क्योंकि उनकी जाति के धर्म को न जाननेवाले CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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२७२ शुक्रनीति: अन्य लोगों से निर्णय होना असंभव है, अतः जिस जाति के लोगों हो, उसका निर्णय उसी जाति के लोगों से कराना चाहिये । का विवाद आश्रमेषु द्विजातीनां कार्ये विवदतां मिथः ॥ • न विब्रूयान्नृपो धर्मे चिकीर्षुर्हितमात्मनः । ९९ ॥ यज्ञ - स राजा को द्विजाति आदिकों का स्वयं निर्णय न करने का ३ भी लौकि हित चाहनेवाला राजा ब्रह्मचर्यादि आश्रमों में स्थित होकर निर्देश - अपना यज्ञ के समा कार्य को लेकर विवाद करनेवाले द्विजातियों के धर्म के विरुद्ध कुछ परस्पर न कहे किसी । " तपस्विनां तु कार्याणि त्रैविद्यैरेव कारयेत् ॥ २० ॥ सभा म
मायायोगविदां चैव न स्वयं कोपकारणात् । श्रोता के रूप तपस्वियों एवं माया तथा योग विद्या के जाननेवाले लोगों के विवाद निर्णय देद के जाननेवाले ब्राह्मणों द्वारा ही कराना चाहिये, अन्य के द्वारा का जो घम नहीं, क्योंकि विरुद्ध निर्णय होने पर उन लोगों को कोप होगा अतः उससे फिर बचने के लिये स्वयं निर्णय न करे । किन्तु सम्यग्विज्ञानसम्पन्नो नोपदेशं प्रकल्पयेत् ॥ २१ ॥ नुसार है आच ।
जाती उत्कृष्टजातिशीलानां गुर्वाचार्यतपस्विनाम् । स्वयं विशिष्ट ज्ञान से युक्त होने पर भी राजा उत्कृष्ट जाति एवं शील से युक्त, गुरु, आचार्य, एवं तपस्वी लोगों को उपदेश न दे । सभा म आरण्यास्तु स्वकैः कुर्युः सार्थिकाः साथिकैः सह ॥ २२ ॥ चाहिये, और
सैनिकाः सैनिकैरेव ग्रामेऽप्युभयवासिभिः । क्योंकि सभ जंगली लोग जंगलियों के द्वारा, संघ बनाकर रहनेवाले अपने संघ के वाला, दोनो लोगों के द्वारा एवं सैनिक लोग सैनिकों के द्वारा और ग्राम में भी रहने वाले लोग ग्राम तथा जंगल दोनों में निवास करनेवालों के द्वारा अपने
का निर्णय करावें ।
अभियुक्ताश्च ये यत्र यन्निबन्धनियोजनाः ॥ २३ ॥
तत्रत्यगुणदोषाणां त एव हि विचारकाः । राजा ने जहां पर जिन्हें नियुक्त कर दिया है, तथा जिस कार्य जो नियुक्त हुये हैं वेही वहां के गुण तथा दोषों के विचार करनेवाले
होते हैं ।
राजा तु धार्मिकान् सभ्यान् नियुञ्ज्यात् सुपरीक्षितान् ॥
व्यवहारधुरं बोढुं ये शक्ताः पुङ्गषा इव । विवाद सभा म न्याय परायण के लोगों को के लिये लोगों के मुक वस्तुतः २४ ॥ निर्णाय न हो सका के द्वारा उच जो अच्छे बैलों के समान विवाद - निर्णय के भार को धारण करने में भलीभांति समर्थ हों तथा पूर्ण रूप से परीक्षित एवं धार्मिक हो उन्हीं लोगों को निर्णय न ह चाहिये । राजा निर्णायक सभ्य ( जूरी ) बनावे | १८श CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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लोगों का विवाद १ ९ ॥ 1 निर्देश- अपना कर परस्पर किसी
कुछ न कहे ।
G ॥
1 विवाद का - अन्य के द्वारा होगा अतः उससे २१ ॥ ति एवं शोल से ह ॥ २२ ॥
- अपने संघ के भी रहनेवाले • अपने विवाद २३ ॥ - कार्य के लिये रनेवाले वस्तुतः तान् ॥ २४ ॥
रण करने में उन्हीं लोगों को चतुर्थाध्याये राजघर्मनिरूपणप्रकरणम् २७३ लोकवेदज्ञधर्मज्ञाः सप्त पञ्च त्रयोऽपि वा ॥ २५ ॥
यत्रोपविष्टा विप्राः स्युः सा यज्ञसदृशी सभा । सभा के लक्षण -- जिस सभा में संख्या यज्ञ - सदृश वैदिक कृत्यों के जाननेवाले धर्मज्ञ! ब्राह्मण ६ भी लौकिक तथा जाती है । के समान समझी यज्ञ श्रोतारो वणिजस्तत्र कर्तव्याः सुविचक्षणाः ॥ सभा में सुनने वालों में वैश्यों के रहने का निर्देश— में ७, ५ अथवा बैठे हुये हों, वह २६ ॥ और उस सभा में श्रोता के रूप में अत्यन्त विचक्षण ( पण्डित ) वैश्यों को भी रखना चाहिये ।
अनियुक्तो नियुक्तो वा धर्मज्ञो वक्तुमर्हति ।
• देवीं वाचं स वदति यः शास्त्रमुपजीवति ॥ २७ ॥
जो धर्मशास्त्र का जाननेवाला हो उसकी चाहे नियुक्ति हो या न हो, किन्तु फिर भी उसे सभा में बोलना उचित ही होता है, क्योंकि जो शास्त्रा-नुसार आचरण करनेवाला होता है उसकी वाणी देवता के समान मानी जाती है ।
सभा वा न प्रवेष्टव्या वक्तव्यं वा समञ्जसम् ।
अब्रुवन् विब्रुवंश्चापि नरो भवति किल्बिषी ॥ २८ ॥
सभा में जाने का नियम - पहले तो विचार - सभा में जाना हो नहीं चाहिये, और यदि जाय तो जो सभ्य बात हो उसे अवश्य ही कहना चाहिये । क्योंकि सभा में जाकर भी उचित बात न कहनेवाला अथवा अनुचित कहने-वाला, दोनों ही व्यक्ति पापभागी होते हैं ।
राज्ञा ये विदिताः सम्यक् कुलश्रेणिगणादयः ।
साहसस्तेयवर्व्यानि कुर्युः कार्याणि ते नृणाम् ॥ २६ ॥
सभा में निर्णय करनेवालों का क्रम - निर्देश - राजा जिन्हें भलीभांति से न्यायपरायण समझता हो ऐसे कुल, श्रेणि ( पञ्चायत ) और गण ( बोर्ड ) के लोगों को साहस ( डांका ) और स्तेय ( चोरी ) को छोड़ कर अन्य लोगों के मुकदमों का निर्णय करने का कार्यभार देवे ।
विश्चार्य श्रेणिभिः कार्यं कुलैर्यन विचारितम् ।
गणैश्च श्रेण्यविज्ञातं गणाज्ञातं नियुक्तकैः ॥ ३० ॥
निर्णायकों का तारतम्य - उपयुक्त कुल के द्वारा जिनका उचित निर्णय न हो सका है, उनका निर्णय श्रेणियों के द्वारा करना चाहिये । और श्रेणियों के द्वारा उचित निर्णय न होने पर गणों के द्वारा, एवं गणों के द्वारा उचित निर्णय न होने पर राजा से नियुक्त किये हये जजों के द्वारा निर्णय कराना चाहिये । १८ शु ० CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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२७४ शुक्रनीति: कुलादिभ्योऽधिकाः सभ्यास्तेभ्योऽध्यक्षो ऽधिकः कृतः । सर्वेषामधिको राजा धर्माधर्मनियोजकः ॥ ३१ ॥। किये हुये ज
पूर्वोक्त कुलादिकों से अधिक सभ्यों ( जूरियों ) का निर्णय ५. लेखक ( होता है, ( जज ) का निर्णय माननीय होता माननीय है । पुरुष ( फर्म और इन सर्वो से अधिक धर्मा - धर्म का निर्णय करने में राजा होती है । की मान्यता
उत्तमाऽधममध्यानां विवादानां विचारणात् ।
उपर्युपरिबुद्धीनां चरन्तीश्वरबुद्धयः ॥। ३२ ॥
क्योंकि राजा उत्तम, मध्यम तथा अधम श्रेणी के सभी ( मुकदमों ) का निर्णायक प्रधान रूप से होता है । और उसकी बुद्धि निर्णायकों की बुद्धि से अधिक ऊँची होती है ।
एकं शास्त्रमधीयानो न विन्द्यात् कार्यनिर्णयम् ।
तस्माद् बह्वागमः कार्यो विवादेषूत्तमो नृपैः ॥ ३३ ॥
यज्ञतुल विवार्थी दुवाला साधारण ( सुकदमों ) समझना चा निर्णय करने में समर्थ पुरुष के लक्षण - केवल एक ही शास्त्र का जानने-चाला व्यक्ति विवाद का निर्णय करना नहीं जान सकता है, अतः बहुत से दशाङ्ग शास्त्रों के ज्ञाता किसी उत्तम व्यक्ति को ही राजा निर्णायक नियुक्त करे । पृथक २ क प्रकाशक होत स ब्रूते यं स धर्मः स्यादेको वाऽध्यात्मचिन्तकः । निर्णय के अ धर्म का लक्षण- - और जो आत्म - तत्व का जाननेवाला व्यक्ति होता है, इसके वह अकेला ही जो कहता है वह धर्म माना जाता है अर्थात् उसका निर्णय द्वारा सर्वमान्य होता है । शान होता एकद्वित्रिचतुर्वारं व्यवहारानुचिन्तनम् ॥ ३४ ॥
कार्यं पृथक पृथक सभ्यै राज्ञा श्रेष्ठोत्तरैः सह । ५-६.६ अनुचिन्तन प्रकार का निर्देश - राजा सबसे श्रेष्ठ सभ्यों ( जूरियों ) के प्रयोग प्यास साथ मिल कर पृथक् २ मुकदमे की गुरुता लघुता जैसी हो उसके अनुसार शुभ की गण एक बार अथवा २, ३, या ४ बार विचार कर निर्णय करे । लिखनेवाला अर्थिप्रत्यर्थिनौ सभ्यांल्लेखक प्रेक्षकांश्च यः ॥। ३५ ॥ धर्मवाक्यै रञ्जयति स सभास्तारतामियात् । जो विचारपति या सभ्य ( जूरी ) वादी - प्रतिवादी, सभ्य ( जूरियों ) गणक लेखकों या दर्शकों को धर्मयुक्त वचनों से प्रसन्न करता है, वह सम्पों में मैं कुशल, श्रेष्ठता को प्राप्त करता है । अर्थात् सर्वोत्तम समझा जाता है । गणक तथा नृपोऽधिकृतसभ्याश्च स्मृतिर्गणकलेखकौ ॥ ३६ ॥
हेमाग्न्यम्बुस्वपुरुषाः साघनाङ्गानि वै दश । दश साधनों का निर्देश – १. राजा, २. अधिकारी सम्प ( निवुत • धर्माधि CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri