शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 381–390
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 381–390
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क्रम को स्थाय
न् ।
१५६ ॥
रकर ब्राह्मणादि र्णय करे । से उत्तर लेकर । १५७ ॥ लिये जिस वादो समस्त प्रतिज्ञात ॥ १५८ ॥
देश- एक ही करना उचित
हये ।
म् ॥ १५६ ॥
के लिये पूर्ववादी का प्रमाण झठा हिये | और यदि इसमें मेरी जीव
हैं ।
१६० ॥
दवादी सरका ह प्रमाण मानुष ॥ १६१ ॥
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २ ९ ५ दॆषं घटादि तद्भव्यं भूतालाभान्नियोजयेत् । लिखित, भोगयुक्त ( कब्जे में रहना ), और साक्षी, ये तीन प्रकार उसमें होते हैं । तुलादण्डादिरूप प्रमाण को ' दैव ' कहते हैं । इसी के मानुष ' प्रमाण भी कहते हैं । इसका प्रयोग यथार्थ का निश्चय न होने पर किया को ' भव्य जाता है ।तच्छलानुसारित्वाद् भूतं भव्यं द्विधा स्मृतम् ॥ १६२ ॥
तत्त्वं सत्यार्थाभिधायि कूटाद्यभिहितं छलम् । तश्व तथा छलानुसार से भूत तथा भव्य दो प्रकार एवम् तत्व और छल के लक्षण - तत्व तथा छल के अनुसार से साधन - क्रम से भूत तथा भव्य रूप से २ प्रकार का कहा गया है । उसमें सत्य अर्थ का प्रतिपादक साधन ' तश्व '
कपट आदि से युक्त साधन ' छल ' कहा जाता है ।
छलं निरस्यं भूतेन व्यवहारान् नियेन्नृपः ॥
युक्तचाऽनुमानतो नित्यं सामादिभिरुपक्रमैः । राजा युक्ति, अनुमान तथा सामादि उपायों से छल को
साधनों से व्यवहारों ( मुकदमों ) को सदा देखे ।
न कालहरणं कार्यं राज्ञा साधनदर्शने ॥
महान् दोषो भवेत् कालाद्धर्मव्यापत्तिलक्षणः ।
१६३ ॥
दूर कर यथार्थ १६४ ॥ राजा वादी प्रतिवादियों के साधनों ( प्रमाणों ) को देखने में समय न बितावे बल्कि तत्काल ही देखे । अन्यथा विलम्ब करने से धर्मनाश रूपी महान
दोष उपस्थित हो जाता है ।
अर्थिप्रत्यर्थिप्रत्यक्षं साधनानि प्रदर्शयेत् ॥ १६५ ॥
अप्रत्यक्षं तयोर्नैव गृह्णीयात साधनं नृपः । विवादी को अपने २ साधन प्रत्यक्ष दिखाने का निर्देश - राजा अर्थी प्रत्यर्थी ( वादी - प्रतिवादी ) दोनों के सामने साधनों को दिखावे और दोनों के परोक्ष में
साधन न देखे ।
साधनानां च ये दोषा वक्तव्यास्ते विवादिना ॥ १६६ ॥
गूढास्तु प्रकटाः सभ्यैः काले शास्त्रप्रदर्शनात । जो दोष गुप्त हो उनको सभासद प्रगट करें, इसका निर्देश –विवाद करने वाला ( वादी या प्रतिवादी ) एक दूसरे के साधनों के दोषों को कहे और छिपे हुये साधन के दोषों को विचार के लिये नियुक्त पुरुषों के द्वारा
विचार करने के समय शास्त्रों के आधार पर प्रकट रूप से कहना चाहिये ।
अन्यथा दूषयन् दण्ड्यः साध्यार्थादेव हीयते ॥। १६७ ॥
विमृश्य साधनं सम्यक कुर्यात् कायविनिर्णयम् । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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२ ९ ६ शुक्रनीति: यदि वादी अन्यथा अर्थात् शास्त्र ( कानून ) के विरुद्ध किसी व्यर्थ दोष दिखाता है तो वह दण्डनीय होता है और वह जिसे साधन में जिसमें प्रथ चाहता है उससे च्युत हो जाता है ( उसका मुकदमा खारिज सिद्ध करना लिये है । है ) । अतः राजा साधन ( प्रमाणों ) पर पूर्ण विचार कर कर विवाद दिया जाता का निर्णय करे ।कूटसाधनकारी तु दण्डः कार्यानुरूपतः ॥ १६८ ॥ * जो भ
द्विगुणं कूटसाक्षी तु साक्ष्यलोपी तथैव च । दाबाद ( कूटसाक्षी और साक्ष्यलोपी को दूना दण्ड देने का निर्देश -झूठा ' किया हुआ उपस्थितं करने वाला ( वादी या प्रतिवादी ) कार्य ( मुकदमा:) के प्रमाण भागपत्र अ अनुसार ' थोड़ा या अधिक दण्ड ( जुर्माना ) का अधिकारी होता है । झूठी गवाही देने बाला या गवाह की सही बात को न मानने वाला पुरुष द्विगुण दण्ड का भागी होता है । और अधुना लिखितं वच्मि यथावदनुपूर्वशः ॥ १६ ९ ॥ स्थावर सं साक्षी से अनुभूतस्मारकं तु लिखितं ब्रह्मणा कृतम् । इस समय मैं आनुपूर्वी क्रम से यथावत् लिखित साधन के विषय में कहता हूँ । ब्रह्मा ने अनुभूत विषय को स्मरण कराने के लिये ' लिखित ' का निर्माण किया है । साध राजकीयं लौकिकं च द्विविधं लिखितं स्मृतम् ॥ १७० ॥ या अपनी
स्वहस्तलिखितं वाऽन्यहस्तेनापि विलेखितम् । को राजक असाक्षिमत् साक्षिमश्च सिद्धिर्देशस्थितेस्तयोः ॥ १७१ ॥
लिखित के दो प्रकारों के निर्देश - राजकीय और लौकिक भेड़ से लिखित दो प्रकार का होता है । और इनमें से प्रत्येक लिखित पुनः अपने हाथ से और दूसरे के हाथ से लिखा होने से दो प्रकार का होता है । और सभी प्रकार के लेख, साक्षी से युक्त या बिना साक्षी के भी होते हैं । उनकी सिद्धि स्थिति के अनुसार होती है । भाग - दान - क्रयाऽऽधान संविद् - दास - ऋणादिभिः 1 सप्तधा लौकिकं चैतत्-लौकिक लिखित के ७ प्रकारों का निर्देश - १. भाग ( बटवारा ), ३. क्रय, ४. आधान ( धरोहर ), ५. संचित् ( इकरार ), ६. बास,
आदि भेद से लौकिक लिखित ७ प्रकार का होता है ।
- त्रिविधं राजशासनम् ॥ १७२ ॥
शासनार्थ ज्ञापनार्थ निर्णयार्थ.. तृतीयकम् । देश की पक्ष ( जिला २, दान, संख्या अ ७. आण साध्य का और दोन २. भी जो अ का है राजशासन के ३ प्रकार - और राजकीय लिखित तीन प्रकार CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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किसी साधन में जिसे सिद्ध करना ज कर दिया जाता र कर विवाद का । १६८ ॥ देश -- झूठा प्रमाण मा:) के अनुसार झूठी गवाही देने गुण दण्ड का भागी । १६ ९ ॥ के विषय में कहता लिखित ' का निर्माण ॥ १७० ॥
॥ १७१ ॥
क भेद से लिखित नः अपने हाथ से और सभी प्रकार की सिद्धि देश भः 1 २. दान, ६. दास, ७, ऋण । १७२ ॥ प्रकार का है चीन चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २ ९ ७ शासन के लिये, द्वितीय सूचना के लिये, तृतीय निर्णय के जिसमें प्रथमे लिये है । ' साक्षिमद्रिक्थ्यभिमतं भागपत्रं सु॑भक्तियुक् ॥ १७३ ॥
सिद्धिकृच्चान्यथा पित्रा कृतमप्यकृतं स्मृतम् । * जो भाग ' पत्र ' ( बटवारे का लेख पत्र ) साक्षी से हो और जिसमें घनवालेँ, दाबाद ( पट्टीदारों ) से स्वीकृत, भलीभांति से विभाग का विषय निश्चित किया हुआ हो वह माननीय होता है । अन्यथा पिता से किया हुआ भी
भागपत्र अमाननीय होता है ।
" दायादाभिमतं दान क्रय - विक्रय पत्रकम् ॥ १७४ ॥
स्थावरस्य ग्रामपादिसाक्षिकं सिद्धिकृत् स्मृतम् । और दानपत्र, क्रय ( खरीदना ) पत्र, विक्रय ( बेंचना ) पत्र यदि स्थावर संपत्तिविषयक हो, तो पट्टीदारों द्वारा स्वीकृत, प्रामाधिपति आदि की
साक्षी से युक्त, हो तो माननीय होता है अन्यथा अमाननीय होता है ।
' राज्ञा ' स्वहस्तसंयुक्तं स्वमुद्रा चिह्नितं तथा ॥ १७५ ॥
राजकीयं स्मृतं लेख्यं प्रकृतिभिश्च मुद्रितम् । साधनत्तम लेख्य के लक्षण - राजा के द्वारा अपने हाथ से लिखा हुआ या अपनी मुद्रा ( मुहर ) से या मन्त्री आदि के द्वारा मुद्रा से मुद्रित लिखित
को राजकीय लिखित कहते हैं ।
निवेश्य कालं वर्ष च मासं पक्षं तिथिं तथा ॥ १७६ ॥
वेलां प्रदेशं विषयं स्थानं जात्याकृती वयः ।
साध्यं प्रमाणं द्रव्यं च संख्यां नाम तथात्मनः ॥ १७७ ॥
राज्ञां च क्रमशो नाम निवासं साध्यनाम च ।
क्रमात् पितॄणां नामानि पीडामाहर्तृदायकौ ॥ १७८ ॥
क्षमालिङ्गानि चान्यानि पक्षे सङ्कीर्त्य लेखयेत् ।. पक्ष ( दावा ) में काल, वर्ष मास, पक्ष, तिथि, समय, प्रदेश, विषय ( जिला ), स्थान ( ग्राम ), जाति, आकार, अवस्था, साध्य, प्रमाण, ग्रन्य, संख्या और अपना नाम लिखकर क्रमशः राजा का नाम तथा निवास और " साध्य का नाम, पिता- पितामहादि का नाम, अपना कष्ट, उपार्जन करने वाला और दान देने वाला इन दोनों का नाम, क्षमा के चिह्न इसके अतिरिक्त अन्यान्य भी जो आवश्यक हों उन्हें कह कर लिखावे । यत्रैतानि न लिख्यन्ते होनं लेख्यं तदुच्यते ॥ १७६ ॥ '
भिन्नक्रमं व्युत्क्रमार्थ प्रकीर्णार्थं निरर्थकम् ।. CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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२ ९ ८ शुक्रनीति: अतीतकाललिखितं न स्यात्तत् साधनक्षमम् अप्रगल्भेन च स्त्रिया बलात्कारेण ॥ १८० ॥
यत् कृतम् । होता है । साधनायोग्य लेख्य के लक्षण - जिसमें ये सब बातें न लिखी होता ह ' हीनलेख्य ' कहलाते हैं अर्थात् अप्रामाणिक होते हैं 1 । और हो वे पत्र नीय न लिखा गया हो, या विपरीत अर्थ को प्रकट करने जो सिलसिलेवार को प्रकट करने वाला, निरर्थक, समय बीत जाने पर लिखा वाला हुआ , बिखरे हो वह हुये प्रमाण नर्थ के योग्य नहीं होता है I । और जो नासमझी से लिखा जातिव हुआ या जबरदस्ती से लिखाया हुआ हो वह भी अप्रामाणिक हुआ या होता स्त्री द्वारा है । लिखा सकते हैं । सद्भिर्लेख्यैः साक्षिभिश्च भोगैदिव्यैः प्रमाणताम् ॥ १८१ ॥ नहीं रहनेवा
व्यवहारे नरो याति चेहामुत्राश्नुते सुखम् | जियों के वि अच्छे लेख से फल का निर्देश - मनुष्य निर्दोष लिखित प्रमाणों से, साथी के द्वारा, कब्जा होने से, दिव्य परीक्षादि प्रमाणों से व्यवहार में प्रामाणिकता को प्राप्त करता है । और इसलोक में तथा परलोक में सुख भोग करता है । साक्षी स्वेतरः कार्यविज्ञानी यः स साक्षी त्वनेकधा ॥। १८२ ॥ बलात्कार या विशेष परीक्षा दृष्टार्थश्च श्रुतार्थश्च कृतश्चैवाऽकृतो द्विधा! साक्षी के लक्षण और भेद का निर्देश - जो अपना सम्बन्धी न हो एवं कार्य ( विवाद विषय ) को जाननेवाला हो, वह सांक्षी ( गवाह ) मानने योग्य. होता है । साक्षी अनेक प्रकार का होता है । कोई आंखों से प्रत्यक्ष देखने वाला और कोई केवल सुनने वाला होता है । कृत और भकृत भेद से साक्षी दो प्रकार के होते हैं अर्थात् वादी द्वारा उपस्थित किया हुआ ' कृत ' और राजा द्वारा बालादि उपस्थित किया हुआ ' अकृत ' होता है । बोलने झूठ अथिप्रत्यर्थि सान्निध्यादनुभूतं तु प्राग् यथा ॥ १८३ ॥ बान्धव स्नेह
दशनैः श्रवणैर्येन स साक्षी तुल्यवाग् यदि । की आशा स वादी या प्रतिवादी के समीप रहने से जैसा पहले देखने या सुनने से सकते हैं अ मुकदमे के विषय का अनुभव हुआ हो उसी के अनुरूप यदि कहने वाला हो प्रकार का अ तो वह साक्षी कहलाने योग्य होता है । सम्बन्धी य यस्य नोपहता बुद्धिः स्मृतिः श्रोत्रं च नित्यशः ॥ १८४ ॥।
सुदीर्घेणापि कालेन स वै साक्षित्वमर्हति । बहुत समय बीत जाने पर भी जिसकी बुद्धि स्मरण शक्ति, और श्रवण श्रेणी ( शक्ति न क्षीण हो वही सचमुच सांक्षी देने योग्य होता है । एक व्यक्ति क अनुभूतः सत्यवाग् यः सैकः साक्षित्वमर्हति ॥ १८५ ॥ की साक्षी न
द्वेष करने वाल उभयानुमतः साक्षी भवत्ये कोऽपि धर्मवित् । जिसने अनुभव किया हो और सत्य बोलने वाला हो वही साक्षी के योग्य CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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॥ १८० ॥
लिखी हो वे पत्र जो सिलसिलेवार , बिखरे हुये अर्थ हुआ हो वह प्रमाण या स्त्री द्वारा लिखा
होता है ।
- ॥ १८१ ॥
प्रमाणों से, साक्षी र में प्रामाणिकता नोग करता है ॥ १८२ ॥
बन्धन हो एवं ब ) मानने योग्य यक्ष देखने वाला भेद से साक्षी दो ' और राजा द्वारा १८३ ॥ खने या सुनने से कहने वाला हो ॥ १८४ ॥
ति, और श्रवण १८५ ॥ साक्षी के योग्य चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपण प्रकरणम् २६६ कोई धर्मज्ञ साक्षी अकेले वादी - प्रतिवादी दोनों के लिये मान-होता है । और
नीय होता है ।
यथाजाति यथावर्णं सर्वे सर्वेषु साक्षिणः ॥ १८६ ॥
गृहिणो न पराधीनाः सूरयश्चाप्रवासिनः ।
युवानः साक्षिणः कार्याः स्त्रियः स्त्रीषु च कीर्तिताः ॥ १८७ ॥
जाति और वर्ण के अनुसार सभी वर्णों में सभी वर्ण के लोग साक्षी हो सकते हैं । और गृहस्थ, किसी के अधीन न रहनेवाले, विद्वान, परदेश में नहीं रहनेवाले, युवावस्थावाले जो हों वे साक्षी बनाने योग्य होते हैं । और क्षियों के विवाद में स्त्रियों की साक्षी लेनी चाहिये ।
साहसेषु च सर्वेषु स्तेय संग्रहणेषु च ।
arreus यो पारुष्ये न परीक्षेत साक्षिणः ॥ १८८ ॥
साक्षी की विशेष परीक्षा न करने के विषय - सभी डांका, चोरी और बलात्कार या अपहरण, कठोर भाषण और कठोर दण्ड इन सबों में साक्षी की विशेष परीक्षा नहीं की जाती है । इनमें चाहे जो भी साक्षी दे सकता है ।
बालोऽज्ञानादसत्यात् त्री पापाभ्यासाच्च कूटकृत् ।
विब्रूयादबान्धवः स्नेहाद् वैरनिर्यातनादरिः ॥ १८६ ॥
अभिमानाच्च लोभाच्च विजातिश्च शठस्तथा ।
उपजीवनसङ्कोचाद् भृत्यश्चैते ह्यसाक्षिणः ॥ १६० ॥
नार्थसम्बन्धिनो विद्या यौनसम्बन्धिनोऽपि न । बालादिकों को साक्षो योग्य न होने का निर्देश- -बालक अज्ञान से, स्त्री झूठ बोलने का अभ्यास होने से, जालसाज निरन्तर जालसाजी करने से, बान्धव स्नेह से, शत्रु शत्रुता साधने से, हीन जातिवाला अपनी संमान - वृद्धि की भाशा से, शठ लोभ से, नौकर जीविका चले जाने के भय से विरुद्ध बोल सकते हैं अतः ये सब साक्षी मानने के योग्य नहीं होते हैं । और किसी प्रकार का अर्थ ( धन ) सम्बन्ध रखनेवाले, साथ पढ़नेवाले और जमाई आदि
सम्बन्धी ये सब भी साक्षी बनाने योग्य नहीं होते हैं ।
श्रेण्यादिषु च वर्गेषु कश्चिच्चेद् द्वेष्यतामियात् ॥ १ ९ १ ॥
तस्य तेभ्यो न साक्ष्यं स्याद् द्वेष्टारः सर्व एव ते । श्रेणी ( एक जाति के कारीगरों के समूह ) आदि वर्गों से यदि किसी एक व्यक्ति के प्रति उक्त वर्ग द्वेषी हो जाय तो उस वर्ग के किसी भी व्यक्ति ' साक्षी नहीं माननी चाहिये, क्योंकि एकता होने से उस वर्ग के सभी
द्वेष करनेवाले हो जाते हैं ।
न कालहरणं कार्यं राज्ञा साक्षिप्रभाषणे ॥ १ ९ २ ॥
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३०० शुक्रनीति: M अर्थिप्रत्यर्थिसान्निध्ये साध्यार्थेऽपि च सन्निधौ । साक्षी लेने में राजा को कालक्षेप न करने का निर्देश लेने में राजा समय न बितावे जव कि वादी प्रतिवादी समीप -- साक्षी की सा और उन दोनों के समक्ष व्यवहार देखने में भी देरी न करे ॥ में उपस्थित हो ) ( साक्षियों प्रत्यक्षं वादयेत् साक्ष्यं न परोक्षं कथंचन बातों को कभ नाङ्गीकरोति यः साक्ष्यं दण्डयः स्याद् ॥ १६३ ॥
देशितो यदि । प्रत्यक्ष साक्षी की साक्षी लेने का निर्देश — और वादी - प्रतिवादी के साक्षी ह में ही साक्षी की साक्षी सदा लेनी चाहिये, परोक्ष में कभी भी नहीं समय यदि आज्ञा देने पर भी साक्षी देने को साक्षी न तैयार होता है । और होता है । तो वह दण्डनीय साक्षियो यः साक्षान्नैव निर्दिष्टो नाहूतो नैव देशितः ॥ १ ९ ४ ॥ पुराणोक ब्रूयान्मिथ्येति तथ्यं वा दण्डः सोऽपि नराधमः । और पुर दण्ड्य और नीच साक्षी के लक्षण — जो विचारपति के समक्ष साक्षी देने के लिये उपस्थित न किया गया हो या बुलाया न गया हो अथवा आदेश नं भय दिलावे प्राप्त किया हो वह.. नराधम चाहे झूठ या सच ही कहे फिर भी दण्डनीयही तुम होता है । यां सुना है । द्वैधे बहूनां वचनं समेषु गुणिनां वचः ॥ १६५ ॥:
तत्राधिकगुणानां च गृह्णीयाद्वचनं सदा । जो लि जहां पर बहुत से साक्षियों के वचनों में विभिन्नता होने से सत्यासस्य निर्णय में संशय हो जाय वहाँ पर अधिक संख्यकवालों की बात माने । ' यदि समान संख्यावालों में विभिन्नता हो तो उनमें से जिधर गुणी पुरुष हो जो सा उनके वचन माने एवं यदि गुणियों के वचनों में विभिन्नता जिस विषय में पास करता हो तो जो अधिक गुणी हों उनकी ही वात माने । वाक्य वेद म यत्रा नियुक्तो s पीक्षेत शृणुयाद्वापि किञ्चन ॥ १ ९ ६ ॥ पृष्ठस्तत्रापि स ब्रूयाद् ' यथादृष्टं यथाश्रुतम् । कोई व्यक्ति बिना नियुक्त किये हुये भी यदि कुछ देखें या सुर्वे तो उस सत्य.. स वर्णों में साक्ष
विषय में पूछे जाने पर वह जैसा देखा या सुना हो कहें ।
विभिन्नकाले यज्ज्ञातं साक्षिभिश्चांशतः पृथक् ॥ १६७ ॥
एकैकं ' वादयेत्तत्र ' विधिरेष सनातनः । एक २ से साक्षी को कथन करने का निर्देश - जहां पर विभिन्न १ सेनुर्ध्वो आस्मा समयों में विभिन्न रे साक्षियों ने विवाद के विभिन्न २ विषयों की जो कु का जानकारी प्राप्त की हो, तो उसे जानने के लिये वहां पर प्रत्येक साक्षियों की साक्षी लेना चाहिये । यह सनातन कर्त्तव्य है । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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धौ । - साक्षी की प में साक्षी उपस्थितहो, - ॥ १६३ ॥
तो यदि । -प्रतिवादी के समय भी नहीं । और है तो वह दण्डनीय ॥ १ ९ ४ ॥ माधमः । समक्ष साक्षी देने हो अथवा आदेश र भी दण्डनीय हो ॥ १६५ ॥
। होने से सत्यासत्य की बात माने । धर गुणी पुरुष हो वा जिस विषय में ॥ १ ९ ६ ॥ । या सुनें तो उस ॥ १६७ ॥
पर विभिन नयों की जो कुछ साक्षियों की प्रत्येक चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपण प्रकरणम् ३०१. स्वभावोक्तं वचस्तेषां गृह्णीयान्न बलात् कचित् ॥ १६८ ॥
• लेने के प्रकारों का निर्देश - स्वाभाविक रीति से कहे हुये उन साक्षी के वचनों को ग्रहण करे । किसी के दबाव से उनकी कही हुई । ( साक्षियों ) । शवों को कभी न माने उक्ते तु साक्षिणा साध्ये न प्रष्टव्यं पुनः पुनः ।
साक्षी द्वारा साक्षी दे चुकने के बाद पुनः बुलाकर बारम्बार न पूछे ।
आहूय साक्षिणः पृच्छेत्रियम्य शपथैर्भृशम् ॥ १ ९९ ॥
पौराणैः सत्यवचन- धर्ममाहात्म्य कीर्तनैः । ! साक्षियों को बुलाकर विशेष रूप से ईश्वर का शपथ ( सौगन्द ) खिलाकर
पुराणोक सत्य बोलने के धर्म का माहात्म्य वर्णन कर उनसे पूछे ।
अनृतस्यातिदोषैश्च भृशमुत्त्रासयेच्छनैः ॥ २०० ॥
और पुराणोक्त झूठ बोलने में अत्यन्त दोषों को दिखाकर धीरे २ अत्यन्त भय दिलावे । देशे काले कथं कस्मात् क दृष्टं वा श्रुतं त्वया । तुमने किस देश में और किस समय में कैसे, किस कारण से क्या देखा
यां सुना है । इसे पूंछे ।
• लिखितं लेखितं यत्तद् वद सत्यं तदेव हि ॥। २०१ ॥
जो लिखा गया या लिखाया हुआ हो वही सत्य २ कहो ।
सत्यं साक्ष्यं ब्रुवन् साक्षी, लोकानाप्नोति पुष्कलान् ।
इह चानुत्तमां कीर्तिं वागेषा ब्रह्मपूजिता ॥ २०२ ॥
जो साक्षी साक्षी देते समय सत्य बोलता है वह उत्तम लोकों को प्राप्त करता है । और लोक में सर्वोत्तम कीर्त्ति को प्राप्त करता है । यह वाक्य वेद में भी प्रशंसित है । '. सत्येन पूयते साक्षी धर्मः सत्ये वर्धते । तस्मात् सत्यं हि वक्तव्यं सर्ववर्णेषु साक्षिभिः ॥ २०६ ' सस्य से साक्षी पूजित हो जाता है । सत्य से धर्म बढ़ता है । इससे सभी वर्णों में साक्षी को सत्य ही बोलना चाहिये ।
, आत्मंत्र ह्यात्मनः साक्षी गतिरात्मैव ह्यात्मनः ।
मावमं स्थास्त्वमात्मानं नृणां साक्षित्वमुत्तमम् ॥ २०४ ॥
आत्मा ही अपना साक्षी है, और आत्मा ही अपनी गति है । इसलिये रेतुयों का उत्तम साथी इस अपनी आत्मा का तुम विरस्कार मत करो ।
मन्यते वै पापकारी न कश्चित् पश्यतीति माम् ।
1. तां देवाः प्रपश्यन्ति तथा अन्तरपूरुषः ॥ २०५ ॥
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३०२ शुक्रनीति: पाप करने वाला व्यक्ति यह समझता है कि कोई पाप नहीं देख रहा है किन्तु यह ठीक नहीं है क्योंकि उसे देवता करते हुये मुझको अन्तरात्मा देखते रहते हैं । लोग एवं उसको कुशल सुकृतं यत्त्वया किञ्चिज्जन्मान्तरशतैः कृतम् । जालसाज तत्सर्वं तस्य जानीहि यं पराजयसे | मृषा || २०६ || केवल लेख समाप्नोषि च तत्पापं शतजन्मकृतं सदा । सैकड़ों जन्मों में तपस्या करके तुमने जिन पुण्यों का उपार्जन केवल उस व्यक्ति को प्राप्त हो जावेगें, जिसको तुम झूठ बोलकर और उस पराजित पुरुष के सैकड़ों जन्मों के सभी पापों को
-जान को ।
साक्षिणं श्रावयेदेवं सभायामरहोगतम् ॥
दद्याद्देशानुरूपं तु कालं साधनदर्शने ।
उपाधि वा समीक्ष्यैव दैवराजकृतं सदा ॥
इस प्रकार से सभा में सबके समक्ष साक्षी को अवश्य साधन प्रमाण ) दिखाने के लिये जो समय दे वह देश चाहिये । अथवा दैव तथा राजा के द्वारा की हुई दुर्घटना का रखकर समय दे । विनष्टे लिखिते राजा साक्षिभोगैर्विचारयेत् । किया है वे पराजित कर दोगे । भय, अथव प्राप्त करोगे ये केवल साक्ष
सकता है ।
२०० ॥।
२०८ ॥ केबल सुना देवे । और में आकर के अनुरूप होना दस्ती कब्ज भी सदा विचार होने से के लिखित के नष्ट हो जाने पर साक्षी एवं भोग ( कब्जा ) के आधार अनुि पर विचार करे । व्यवहारों लेख साक्षिविनाशे तु सद्भोगादेव चिन्तयेत् ॥ २०६ । नहीं उपसि लेख और साक्षी न मिलने पर भोग से ही विचार करने का निर्देश- उपस्थित और जहां पर लेख तथा साक्षी दोनों नष्ट हो गये हों वहां पर सज्जनकृत भोग ( कज्जा ) देखकर ही विचार करे । विपरी सगोगाभावतः साक्षिलेखतो विमृशेत् सदा । से व्यवहार और जहां पर सज्जनकृत कब्जा नहीं है वहां पर साक्षी तथा लेख के लोकधर्म
द्वारा सदा विचार करना चाहिये ।
केवलेन च भोगेन लेखेनापि च साक्षिभिः ॥ २१० ॥
कार्य न चिन्तयेद्राजा लोकदेशादिधर्मतः । राजा लोक तथा देश आदि के धर्म का विचार कर केवल भोग ( कक्षा ) प्रामा लेख या साक्षी के आधार पर ही मुकदमे का फैसला न कर देवे । बरिक भोग विच्छेद ह यथासंभव सभी के आधार पर विचार करे ॥। उसके सम कुशला लेख्यबिम्बानि कुर्वन्ति कुटिलाः सदा ॥ २११ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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करते हुये सुहको ता लोग एवं उसको ॥ २०६ ॥
। उपार्जन किया है वे र पराजित कर दोगे को प्राप्त करोगे इसे ॥ २०७ ॥
॥। २०८ ॥ न्य सुना देवे । और श के अनुरूप होना का भी सदा विचार कब्जा ) के आधार ॥ २०६ ॥
करने का निर्देश-पर सज्जनकृत भोग साक्षी तथा लेख के । २१० ॥ भोग ( कडा ) कर देवे । बल्कि दा ॥ २११ ॥
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३०३ तस्मान्न लेख्यसामर्थ्यात् सिद्धिरैकान्तिकी मता । और कुटिलों द्वारा बनावटी लेख कर लेने का निर्देश - निपुण कुशलों लोग सदा किसी लिखावट का तद्नुरूप नकल कर लेते हैं । इसलिये जालसाज आवक लेख के अरधार पर फैसला करना पूर्णरूप से उचित नहीं माना गया है 1 स्नेह लोभ भयक्रोधः कूटसाक्षित्वशङ्कया ॥ २१२ ॥
केवलैः साक्षिभिर्नैव कार्य सिध्यति सर्वदा । केवल साक्षियों से ही कार्यसिद्धि के न करने का निर्देश – स्नेह, लोभ, मग अथवा क्रोधवश होकर भी मनुष्य झूठी साक्षी दे सकता है, इस शंका से केवल साक्षी के आधार पर भी सदा अभियोग का उचित निर्णय नहीं हो
सकता है ।
अस्वामिकं स्वामिकं वा भुङ्क्ते यद् बलदर्पतः ॥ २१३ ॥
इति शङ्कितभोगेन कार्य सिध्यति केवलैः । केवल भोगों से ही कार्यसिद्धि न होने का निर्देश - अपने वल के घमण्ड मैं आकर भी मनुष्य चाहे अपनी वस्तु हो या दूसरे की किन्तु उसपर जवर -दस्ती कब्जा कर सकता है । इस लिये भोग ( कब्जा ) के विषय में भी सन्देह
होने से केवल उसी के आधार पर ही फैसला नहीं किया जा सकता है ।
शङ्कितव्यवहारेषु शङ्कयेदन्यथा नह ॥ २१४ ॥
अन्यथा शङ्कितान् सभ्यान् दण्डयेच्चौरवन्नृपः अनुचित शंका उपस्थित करनेवाले को दण्ड देने का व्यवहारों ( मुकदमों ) में उचित शंका हो चुकी है उनमें पुनः वहीं उपस्थित करनी चाहिये । यदि कोई सभा ( जूरी आदि )
उपस्थित करे तो राजा उसे चोर के समान दण्ड दे ।
अन्यथा शङ्कनान्नित्यमनवस्था प्रजायते ॥
लोको विभिद्यते धर्मो व्यवहारश्च हीयते ॥
निर्देश - जिन विपरीत शङ्का विपरीत शङ्का २१५ ॥ विपरीत शङ्का करने से अनवस्था होने का निर्देश - विपरीत शङ्का करने व्यवहार में अनवस्था उत्पन्न होने से जल्दी निर्णय न हो सकेगा । और
लोकधर्मं बिगड़ जावेगा तथा व्यवहार का क्रम भी टूट जायगा ।
सागमो दीर्घकालञ्च निराक्रोशो निरन्तरः ॥ २१६ ॥
प्रत्यर्थिसन्निघानश्च भुक्तो भोगः प्रमाणवत् । प्रामाणिक भोग के लक्षण - आगम ( लेख ) के सहित, और दीर्घकाल का भोग ( कब्जा ) प्रामाणिक होता है और यदि स्वामी का अपनी वस्तु से विच्छेद हो गया हो या उसने एकदम से उसे छोड़ दिया हो और प्रतिवादी उसके समीप ही रहता हो तो वहां पर कब्जा प्रामाणिक माना जाता है । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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३१४ शुक्रनीतिः सम्भोगं कीर्तयेद्यस्तु केवलं नागमं कचित् ॥। भोगच्छलापदेशेन विज्ञेयः स तु तस्करः । २१७ ॥ भाषि केवल भोग बतानेवाले को चोर समझने का निर्देश- जो ग्राम की भलीभांति कब्जा ही दिखाता है किन्तु लेख नहीं दिखाता है केवल अपना वेदपाठी का कब्जा कहलाता है अत एव उसे चोर समझना चाहिये । वह छलपूर्वक दण्डनीय है । अर्थात् वह आगमेऽपि बलं नैव भुक्तिः स्तोकाऽपि यत्र नो ॥ उपेक्षा केवक आगम ( लेख ) के भी प्रबल न होने का निर्देश – जहाँ पर २१६ थोड़ा ॥ भी यदि कोई कब्जा नहीं है वहाँ पर लेख का केवल प्रमाण माननीय नहीं होता है । दे और को यं कचिद्दश वर्षाणि सन्निधौ प्रेक्षते धनी । हो जाय भुज्यमानं परैरर्थं न स तं लब्धुमर्हति ॥ २१६ ॥ अब
जो किसी अपनी वस्तु को समीप में स्वयं रहता हुआ दूसरे के द्वारा भोग संचेपतः का करते हुये देखकर भी नहीं आपत्ति करता है और इस भांति से यदि व्यतीत हो जाय तो स्वामी उस वस्तु को पाने का अधिकारी नहीं होता
वर्षाणि विंशतिर्यस्य भूर्भुक्ता तु परैरिह ।
। सति राज्ञि समर्थस्य तस्य सेह न सिर्ध्यात ॥ २२० ॥
जिसकी जमीन को कोई दूसरा वीस वर्ष से भोग रहा हो किन्तु रहने पर भी वह आपत्ति नहीं करता है तो राजा के रहते हुये भी वह इस लोक में पुनः उक्त भूमि को नहीं प्राप्त कर सकता है ।
1. अनागमं तु यो भुङ्क्ते बहून्यब्दशतान्यपि ।
चौरदण्डेन तं पाएं दण्डयेत् पृथिवीपतिः ॥ २२१ ॥
१० वर्ष है । त्रिविध किसी वस्त समर्थ ( लेख, क व्यक्ति लेना चाहत प्रथम-जिस भूमि को बिना लिखित प्रमाण के कोई कई सौ वर्षों से भोग रहा का उत्तर न हो किन्तु जब उसके वस्तुतः स्वामी का पता लग जाय तो राजा कब्जा करने- शपथ ये क चाले उस पापी को चोर. की भाँति दण्ड दे । अनागमाऽपि याभुक्तिर्विच्छे दो पर मोमिता । षष्टिवर्षात्मिका साऽपहर्तुं शक्या न केनचित् ॥ २२२ ॥ युक्ति
शास्त्र और ६० वर्ष से भोग में आती हुई वस्तु को किसी के द्वारा न छीने जा योजना सकने का निर्देश — किसी वस्तु पर बिना लेख के जो किसी का कब्जा हो, और को स्वामी का उस वस्तु से विच्छेद हो या उसने एकदम से छोड़ दिया ६० वर्ष व्यतीत हो जाने पर उसे पुनः उस कब्जा करनेवाले से कोई नहीं छुड़ा सकता ।
आधिः सीमा बालधनं निक्षेपोपनिधिस्तथा ।
राजस्वं श्रोत्रियस्वं च न भोगेन प्रणश्यति ॥ २२३ ॥
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