शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 391–400

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 391–400

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॥ २१७ ॥

-जो केवल अपना । वह छलपूर्वक -हिये अर्थात् बद्द ॥ २१८ ॥

जहाँ पर थोड़ा भी होता है ॥ २१६ ॥

सरे के द्वारा भोग से यदि १० वर्ष नहीं होता है ॥ २२० ॥

हो किन्तु समर्थ भी वह व्यक्ति I २२१ ॥ र्षो से भोग रहा जा कब्जा करने ॥ २२२ ॥

द्वारा न छीने जा. का कब्जा हो, और दिया हो तो से कोई दूसरा २२३ ॥ चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपण प्रकरणम् ३०५ आदिका केवल भोग से नष्ट न होने का निर्देश - आधि ( धरोहर ) आधि, सीमा, बालक का धन, गिरवी रखी हुई वस्तु, स्त्री का धन, राजधन, ग्राम की धन इनपर कब्जा होने से ही कोई नहीं प्राप्त कर सकता है ।

वेदपाठी का उपेक्षां कुर्वतस्तस्य तूष्णीम्भूतस्य तिष्ठतः ।

काले विपन्ने पूर्वोके तत्फलं नाप्नुते धनी ॥ २२४ ॥

उपेक्षादि कारण से स्वामी को उसके फल प्राप्त न होने का निर्देश - और यदि कोई स्वामी अपनी वस्तु पर किसी के कब्जे को देखकर भी उपेक्षा कर दे और कोई आपत्ति न करे इस भाँति से यदि ऊपर लिखित समयं भी व्यतीत हो जाय तो वह पुनः उस वस्तु को पाने का अधिकारी नहीं हो सकता । भोगः संक्षेपतश्वोक्तस्तथा दिव्यमथोच्यते । अब दिव्य कहने का निर्देश --- यहां तक ' भोग ' ( कब्जा ) के विषय में

संचेपतः कहा गया है और अब ' दिव्य ' का वर्णन करते हैं ।

प्रमादाद्धनिनो यत्र त्रिविधं साधनं न चेत् ॥ २२५ ॥

अर्थचापह्नुते वादी तत्रोक्तस्त्रिविधो विधिः । त्रिविध साधन के अभाव में तीन प्रकार की विधियों का निर्देश - यदि किसी वस्तु के स्वामी के प्रमाद से जिस मुकदमे में पूर्वोक्त तीन प्रकार के ( लेख, कब्जा, साक्षी ) साधन न हो सकें और वादी उसकी वस्तु को ले लेना चाहता हो तो वहां पर तीन प्रकार की विधि कही हुई है है ॥ चोदनाप्रतिकालश्च युक्तिलेशस्तथैव च ॥ २२६ ॥

तृतीयः शपथः प्रोक्तस्तैरेवं साधयेत् क्रमात् । प्रथम - चोदनाप्रतिकाल ( बारम्बार प्रेरणा करने पर भी बादी के चचन का उत्तर न देना ), द्वितीय - युक्तिलेश ( युक्तियों का प्रयोग ), तृतीय-शपथ ये क्रम से तीन प्रकार के कहे हुये साधनों से कार्य सिद्धि करे । विशिष्टतर्किता या च शास्त्रशिष्टाविरोधिनी ॥ २२७ ॥

योजना स्वार्थसंद्धिचै सा युक्तिस्तु न चान्यथा । युक्ति के लक्षण — उत्तम प्रकार से जिस पर तर्क किया गया हो और जो शान और शिष्ट पुरुषों के अविरुद्ध हो ऐसी स्वार्थसिद्धि के लिये बनाई गई

योजना को ' युक्ति ' कहते हैं । अन्य रीति से बनी हुई हो तो नहीं ।

दानं प्रज्ञापनं भेदः सम्प्रलापः क्रिया च या ॥। २२८ ॥

चित्तापनयनं चैव हेतवो हि विभावकाः । कार्यसाधक हेतु के लक्षण देना, समझाना, फोड़ना, उत्तम प्रकार का लोभ दिलाना, मनको अपनी ओर आकर्षित करना इन सब से रहस्य का पता लगने से ये सब ' विभावक ' हेतु कहलाते हैं । २० शु ० CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 392

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३०६- शुक्रनीति: अभीक्ष्णं चोद्यमानोपि प्रतिहन्यान्न तद्वचः ॥ त्रिचतुःपञ्चकृत्वो वा परतोऽर्थं स दाप्यते । " २२३ ॥ विशुद्ध वह धन ग्रहण करने योग्य प्रतिवादी के लक्षण - बार - बार प्रेरणा है । अन्य भी जो प्रतिवादी के वचन को न काटे अर्थात् कोई उत्तर न करने पर चार या पांच बार करने पर भी उत्तर न देना उस प्रतिवादी दे ऐसा तीन, धन दिलानेवाला हो जाता है अर्थात् वादी का अभियोग से चादो को दिव्या सत्य होने से उसका विजय हो जाता हैं । अग्नि, वि युक्तिष्वप्यसमर्थासु दिव्यैरेनं विमर्दयेत् ॥ २३० ॥ किया है ।

यस्माद्देवैः प्रयुक्तानि दुष्करार्थे महात्मभिः । जहां पर युक्ति भी असमर्थ हो, वहां पर एवं दुष्कर कर्म के लिये दिव्य करने का निर्देश — जहां पर युक्तियों से काम न चल सकता हो वहाँ पर दिग् शाली इनमहैं । शपथ का प्रयोग करना उचित होता है क्योंकि साधन - विहीन व्यवहार है । साधा में 1 कठिनाई आने पर महात्मा देवताओं ने दिव्य शपथों का प्रयोग माने जाते

किया था ।

परस्परविशुद्धयर्थं तस्माद्दिव्यानि नामतः ॥ २३१ ॥

सप्तर्षिभिश्च भिस्सार्थे स्वीकृतान्यात्मशुद्धये । : इससे वादी - प्रतिवादी की परस्पर विशुद्धि के लिये ही ये ' दिव्यशपथ ' है, जिसे अन्न - हरण रूप दोष उपस्थित होने पर आत्मशुद्धि के लिये सप्तर्षियों ने अग्नि भी स्वीकार किया था । को हाथ म स्व महत्वाच यो दिव्यं न कुर्याज्ज्ञानदर्पतः ॥ २३२ ॥ हुये अंगा

वसिष्ठाद्याश्रितं नित्यं स नरो धर्मतस्करः । तेल में से दिव्य को न मानने पर ' धर्मतस्कर ' होने का निर्देश — जो अपने बड़प्पन अत्यन्त त और ज्ञान के घमण्ड से दिव्य शपथों को नहीं ग्रहण करता है, जिसे कि न जले । वशिष्ठादि महर्षियों ने भी सदा ग्रहण किया था । वह मनुष्य ' धर्मतस्कर ' ( धर्म का चोर ) है । प्राप्ते दिव्येऽपि न शपेद् ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः ॥ २३३ ॥ गर

संहरन्ति च धर्मार्थ तस्य देवा । न संशयः । से काले स जो ज्ञान - दुर्बल ( मूर्ख ) ब्राह्मण समय आने पर दिव्यशपथ ग्रहण नहीं न हो तो कर दूसरी करता है । उसके धर्म और अर्थ को देवता लोग निःसन्देह हरण कर लेते हैं । की परीक्षा यस्तु स्वशुद्धिमन्विच्छन् दिव्यं कुर्यादतन्द्रितः ॥ २३४ ॥।

विशुद्ध लभते कीर्ति स्वर्ग चैवान्यथा नहि । दिव्य को स्वीकार करनेवाले के उत्तम फलों का निर्देश - अपनी विशुदि है जल की इच्छा रखनेवाला जो मनुष्य आलस्य छोड़कर दिव्यशपथ ग्रहण करता | CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 393

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। २२६ ॥ - प्रेरणा करने पर न दे ऐसा तीन दी से वादी, य होने से को उसका २३० ॥ कर्म के लिये दिग्प हो वहां पर दिम्य न - विहीन व्यवहार पथ का प्रयोग । २३१ ॥ ' दिव्यपथ ' हैं, लिये सप्तर्षियों ने । २३२ ॥ - जो अपने बड़प्पन करता है, जिसे कि नुष्य ' धर्मतस्कर ' ॥ २३३ ॥

यशपथ ग्रहण नहीं

रण कर लेते हैं ।

८ ॥ २३४ ॥

- अपनी विशुद्धि करता है थ ग्रहण चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३०७ होकर लोक में कीति तथा परलोक में स्वर्ग निश्चय प्राप्त करता

वह विशुद्ध नहीं प्राप्त करता है ।

है । अन्यथाअनिर्विषं घटतोयं धर्माधर्मौ च तण्डुलाः ॥

शपथाचैत्र निर्दिष्टा मुनिभिर्दिव्यनिर्णये । दिव्य - निर्णय में पदार्थों का निर्देश - दिव्य परीक्षा द्वारा अग्नि, विष, तुला, जल, धर्म - अधर्मं, चावल और शपथ इन

किया है ।

पूर्वं पूर्वं गुरुतरं कार्यं दृष्ट्वा नियोजयेत् ॥

लोकप्रत्ययतः प्रोक्तं सर्वं दिव्यं गुरु स्मृतम् । इनमें उत्तर की अपेक्षा पूर्व - पूर्व के दिव्य चावल आदि २३५ ॥ निर्णय करने में सब का निर्देश २३६ ॥ अधिक महत्व-शाली हैं । इनका प्रयोग यथायोग्य कार्य की गुरुता देखकर ही किया जाता है । साधारणतया लोगों का विश्वास होने से सभी दिव्य शपथ गौरवपूर्ण

जाते हैं ।

तप्तायोगोलकं धृत्वा गच्छेन्नव पदं करे ॥ २३७ ॥

तप्ताङ्गारेषु वा गच्छेत् पद्भयां सप्त पदानि हि ।

तप्ततैलगतं लोहमाषं हस्तेन निर्हरेत् ॥ २३८ ॥

सुतप्तलोहपत्रं वा जिह्वया सँलिदपि । अग्निदिव्य के प्रकार का निर्देश - तपाने से लाल हुये लोहे के गोले को हाथ में लेकर कुछ दूर चले यदि हाथ में जलने का न चिह्न हो या जलते हुये अंगारों पर ७ पग नंगे पैरों से चले किन्तु पैर न जले किंवा खौलते हुये तेल में से लोहे के उरदों को हाथ से निकाले किन्तु हाथ न जले अथवा अत्यन्त तपाने से लाल हुये लोह के पत्तरों को जीभ से चाटे पर जीभ नजले 1 गरं प्रभक्षयेद्धस्तैः कृष्णसर्प समुद्धरेत् ॥ २३ ९ ॥ कृत्वा स्वस्य तुलासाम्यं हीनाधिक्यं विशोधयेत् । गर तथा घट दिव्य के प्रकार का निर्देश - विष का भक्षण करे या हाथ से काले सर्प को बांबी आदि में से निकालते समय डॅसे जाने पर विष का असर न हो तो निर्दोष जानना चाहिये । और तुला ( तराजू ) पर एक तरफ बैठ कर दूसरी तरफ बांट रखकर तौलने पर होन या अधिक होने के द्वारा विशुद्धि

की परीक्षा करे ।

स्वेष्टदेवस्नपनजमद्यादुदकमुत्तमम् ॥ २४० ॥

यावन्नियमितः कालस्तावदप्सु निमज्जयेत् । जल दिव्य के प्रकार का निर्देश - अपने इष्टदेव को स्नान कराये गये CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 394

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३०८ शुक्रनीति: उत्तम जल ( चरणामृत का पान करके शपथ ग्रहण करे कि अपराध नहीं किया है यदि किया हो तो वह नाश कर दें । मैंने असुक । तक का नियम किया गया हो उतने समय तक जल में डबकर जिसने समय इससे वह निर्दोष समझा जाता है । पड़े रहना । वि अधर्मधर्ममूर्तीनामदृष्टहरणं तथा ॥ २४१ ॥ कर अप

कर्षमात्रांस्तण्डुलांश्च चर्वयैश्च विशङ्कितः । जब तक धर्माधर्मं मूर्ति एवं तण्डुल दिव्यों के प्रकार का निर्देश - अधर्म और धर्म की मूर्तियों में से किसी एक को आंखों में पट्टी बांधकर उठाना, यदि धर्म की परीक्षाओ मूर्त्ति उठाता है तो निर्दोष अन्यथा दोषी सम्ना जाता है । एक रुपये भर चावलों को निःशङ्क होकर चबाने | यदि दोषी होता है तो सुख निकलने लगता है, यह लोकप्रसिद्ध है । रक स्पर्शयेत् पूज्यपादांश्च पुत्रादीनां शिरांसि च ॥ २४२ ॥ अतः क

धनानि संस्पृशेद् द्राक् तु सत्येनापि शपेत्तथा ।

दुष्कृतं प्राप्नुयां यद्यत् सर्वं नश्येन्तु सत्कृतम् ॥ २४३ ॥

( प्रतिव शपथ दिव्य के प्रकार का निर्देश - पूज्य गुरुजनों के चरणों या पुत्रादियों अनुमति के मस्तकों किंवा अपने धर्मो का शीघ्र स्पर्श करे । यह भी दिव्यशपथ है इससे अपराधी का नाश एवं उसके पुत्र और धन का नाश हो जाता है । और सत्य का भी शपथ खावे जो इस प्रकार से है कि यदि मैं अपराधी होऊं तो मुझे आज पाप लगे और सारा सुकृत ( पुण्य ) मेरा नष्ट हो जाय ।

सहस्रेऽपहृते चाग्निः पादोने च विषं स्मृतम् ।

त्रिभागोने घटः प्रोक्तो वर्धे च सलिलं तथा ॥ २४४

_ तदर्धे च ह्यष्टमांशे च तण्डुलाः ।

षोडशांशे च शपथा एवं दिव्यविधिः स्मृतः ॥ २४५

अपराध - तारतम्य से दिव्यतारतम्य का निर्देश - एक सहस्र शि अपराधी जिनका ॥ को दिख पक्ष की ॥ मुद्रा का यदि अपहरण हुआ हो तो अग्निपरीक्षा, चौथाई भाग से न्यून सहस्र अपहृत पर हो तो विषपरीक्षा, तृतीयांश - हीन सहस्त्र हो तो तुलापरीक्षा, आधा सहस्र हो! किंवा तो जलपरीक्षा, सहस्र का चतुर्थांश हो तो धर्माधर्मपरीक्षा, सहस्र का अट अन्यथा मांश हो तो तण्डुलपरीक्षा, सहस्र का षोडशांश अपहृत हो तो शपथ ( सौगन्ध ) खाना, इस प्रकार से परीक्षा करनी चाहिये । ' तक्ष एषां संख्या निकृष्टानां मध्यानां द्विगुणा स्मृता । की माश चतुर्गुणोत्तमानां च कल्पनीया परीक्षकैः ॥ २४६ ॥ तप्त लौह

यह संख्या निकृष्ट दिष्य परीक्षाओं की है, मध्यमों की इससे दुगुनी कर उत्तमों की चौगुनी संख्या की कल्पना परीक्षकों द्वारा करनी चाहिये । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 395

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कि मैंने | जितने असुक समय बकर पढ़े रहना ॥ २४१ ॥

-अधर्म और धर्म ना, यदि धर्म की 1 एक रुपये भर तो सुख से रक २४२ ॥ २४३ ॥ चरणों या पुत्रादियों दिव्यशपथ है इससे जाता है । और अपराधी होऊं तो

जाय ।

२४४ ॥

॥ २४५ ॥

सहस्र मुद्रा का न सहस्र अपहृत , आधा सहस्र हो सहस्र का भट्ट डत हो तो शपथ ॥ २४६ ॥

इससे दुगुनी और चाहिये । चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपण प्रकरणम् २०६

शिरोवर्त्ती यदा न स्यात्तदा दिव्यं न दीयते ।

अभियोक्ता शिरःस्थाने दिव्येषु परिकीर्त्यते ॥ २४७ ॥

दिव्य के निषेध का निर्देश – जब तक दिव्य शपथ खानेवाला शिर हिला अपनी स्वीकृति न दे तब तक दिव्य शपथ नहीं दिलानी चाहिये । अथवा कर जब तक शिरःस्थानी अभियोक्ता ( वादी ) न उपस्थित हो तब तक ( परोक्ष में ) अभियुक्त ( प्रतिवादी ) को दिव्य शपथ नहीं दिलानी चाहिये । ' दिग्य परीक्षाओं में बादी को उपस्थित रहना चाहिये ' ऐसा विद्वान लोग कहते हैं ।

अभियुक्ताय दातव्यं दिव्यं श्रुतिनिदर्शनात् ।

न कश्चिदभियोक्तारं दिव्येषु विनियोजयेत् ॥ २४८ ॥

वेद की आज्ञा होने से प्रतिवादी को ही दिव्य शपथ दिलाना चाहिये, अतः कोई वादी को दिव्य शपथ न दिलावे । इच्छया वितरः कुर्यादितरो वर्त्तयेच्छिरः । यदि प्रतिवादी की इच्छा से वादी दिव्य शपथ ग्रहण करे तो दूसरा ( प्रतिवादी ) ही वादी के सम्मुख उपस्थित रहे अथवा शिर हिला कर

अनुमति दे ।

पार्थिवैः शङ्कितानां च निर्दिष्टानां च दस्युभिः ॥ २४६ ॥

आत्मशुद्धिपराणां च दिव्यं देयं शिरो बिना । शिर के बिना दिव्य के अधिकारी का निर्देश - राजा को जिन पर अपराधी होने का सन्देह हो गया हो किंवा डांकू आदि ने अपराध करने में जिनका नाम - निर्देश किया हो अथवा जो स्वयम् अपनी शुद्धि ( निर्दोषिता ) को दिखाना चाहते हों, उनको दिव्य शपथ दिलाना चाहिये, उस में विरोधी

. पक्ष की उपस्थिति या शिर हिलाकर अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं है ।

परदाराभिशापे च ह्यगम्यागमनेषु च ॥ २५० ॥

महापातकशस्ते च दिव्यमेव न चान्यथा । परस्त्री गमन का अभियोग लगने पर या अगम्या स्त्री के साथ गमन का किंवा ब्रह्महत्यादि का अभियोग लगने पर ही दिव्य शपथ का विधान है ।

अभ्यथा साधारण अभियोगों में दिव्य शपथ नहीं दिलाना चाहिये ।

चौर्याभिशङ्कायुक्तानां तप्तमाषो विधीयते ॥ २५१ ॥

तस माष दिव्य के अधिकारी का निर्देश - जिनके ऊपर चोरी के अभियोग की आशङ्का हो उनके लिये उपरि लिखित ' तप्तमाष ' ( खौलते हुये तेल में पड़े तप्त छौड़ के उरर्दों का हाथ से निकालना ) संज्ञक दिव्य शपथ का विधान है ।

प्राणान्तिकविवादे तु विद्यमानेऽपि साधने ।

दिव्यमालम्बते वादी न पृच्छेत्तत्र साधनम् ॥ २५२ ॥

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पृष्ठ 396

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३१० शुक्रनीति: वादी के दिव्य को स्वीकार करने पर फिर साधन न पूछने जहां पर प्राण का संकट उपस्थित हो ऐसे विवाद में भले ही साधन का निर्देश- साच विद्यमान हो किन्तु अभियुक्त दिव्य शपथ का आश्रय ले सकता ( प्रमाण ) जहाँ पर वादी साधन के विषय में किसी प्रकार का प्रश्न नहीं कर सकता है है । वहां पर लिये ग करना चा

सोपधं साधनं यत्र तद्राज्ञे श्रावितं यदि ।

शोधयेत्तत्तु. दिव्येन राजा धर्मासनस्थितः ॥ २५३ ॥

यदि किसी विवाद में ( प्रमाण ) जाली हो और उसकी सूचना राजा को मिल जावे तो धर्मासन पर बैठा हुआ राजा दिव्य शपथ द्वारा उसकी परीक्षा करे । स्था यन्नामगोन्त्रैर्यल्लेख्यतुल्यं लेख्यं यदा भवेत् | सङ्घ ), अगृहीतधने तत्र कार्यो दिव्येन निर्णयः || २५४ || की जाति भाषापत्रिका होने पर दिव्य से शोधन करने का निर्देश – रूपया न दिया ग लेने पर भी यदि उसके नाम - गोत्र के साथ ऋणपत्र का सचमुच कोई जाही ( अथवा लेख तैयार करके रूपये की नालिश कर दे तो वहां पर राजा सत्यासत्य का किये हुय निर्णय दिव्य शपथ द्वारा करे । में, खरीद मानुषं साधनं न स्यात्तत्र दिव्यं प्रदापयेत् | एवं कब्ज लौकिक साधन के अभाव में दिव्य देने का निर्देश - जहाँ पर कोई लौकिक प्रमाण न मिले वहां पर दिव्य शपथ दिलाना चाहिये । अरण्ये निर्जने रात्रात्रन्तर्वेश्मनि साहसे ॥ २५५ ॥ विव

स्त्रीणां शीलाभियोगेषु सर्वार्थापवेषु च । उत्सव त प्रदुष्टेषु प्रमाणेषु दिव्यैः कार्यं विशोधनम् ॥ २५६ ॥ प्रमाण म

जङ्गल, निर्जन स्थान, रात्रि, घर के भीतरी भाग, डोंका पड़ना आदि भी प्रमाण साहस कर्म, और स्त्रियों के आचरण इन सबों के विषय से सम्बद्ध अभियोग में और जहां पर सम्पूर्ण अर्थ का रहस्य न ज्ञात होता हो एवं प्रमाण दूषित होने से माननीय न होने पर दिव्य शपथ द्वारा अपराधी की परीक्षा द्वार करनी चाहिये । निर्देश-महापापाभिशापेषु निक्षेपहरणेषु च । आदि दिव्यैः कार्य ' परीक्षेत राजा सत्स्वपि साक्षिषु ॥ २५७ ॥ पर दिव्य

यद्यपि साक्षी भले ही हों तो भी राजा बदे २ अपराधों एवं हड़प कर जाने इत्यादि अभियोगों में दिव्य शपथ द्वारा परीक्षा निर्णय करे । प्रथमा यत्र भिद्यन्ते साक्षिणश्च तथा परे । परेभ्यश्च तथा चान्ये तं वादं शपथैनयेत् II ॥ २५८ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri धरोहर के जाता है लेकर ही मात प्रतिवादी ॥

पृष्ठ 397

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का निर्देश साधन ( प्रमाण सकता है वहां ) पर

कता है ।

॥। २५३ ॥

- सूचना राजा को पथ द्वारा उसकी । २५४ ॥ निर्देश- -रूपया न चमुच कोई नाही राजा सत्यासत्य का — जहाँ पर कोई

| २५५ ॥

। २५६ ॥

डाँका पड़ना आदि सम्बद्ध अभियोग एवं प्रमाण दूषित पराधी की परीक्षा ॥ २५७ ॥

एवं धरोहर के परीक्षा लेकर ही | २५८ ॥ चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३११ साक्षी के भेदन को प्राप्त हो जाने पर शपथों से निर्णय करने का निर्देश -पर प्रथम, मध्यम तथा निकृष्ट श्रेणी के सभी साक्षी दूसरों के द्वारा फोड़ जहां गये हों वहां पर दिव्य शपथ के द्वारा अभियोग का निर्णय लिये करना चाहिये । स्थावरेषु विवादेषु पूगश्रेणिगणेषु च । दत्तादत्तेषु भृत्यानां स्वामिनां निर्णये सति || २५६ ||:

विक्रयादानसम्बन्धे क्रीत्वा धनमनिच्छति ।

साक्षिभिर्लिखितेनाथ भुक्त्या चैतान् प्रसाधयेत् ॥ २६० ॥

स्थावर ( अचल संपत्ति - विषयक विवाद और पूग ( जाति - विशेष का सह ), श्रेणि ( विभिन्न जातियों का सङ्घ ) और गण ( एक ही प्रकार की जाति का सङ्घ ) - विषयक विवाद एवं भृत्यों को वेतन ( तनखाह ) दिया गया या नहीं तथा किसी वस्तु का स्वामी कौन है इसके निर्णय में ( अथवा दी हुई वस्तु के दिये जाने पर किंवा भृत्य और स्वामी परस्पर किसी किये हुये निर्णयविषयक विवाद में ) एवं बेची हुई वस्तु के न देने के सम्बन्ध में, खरीदने के बाद पुनः उसे न लेने की इच्छा करने पर साक्षी, लेखपत्र एवं कब्जा के आधार पर इन सबों का निर्णय करे ।

विवाहोत्सव द्यूतेषु विवादे समुपस्थिते ।

साक्षिणः साधनं तत्र न दिव्यं न च लेख्यकम् ॥ २६१ ॥

विवाहादिकों में साक्षा को ही निर्णय - साधन होने का निर्देश - विवाह, उत्सव तथा द्यूत ( जुआ ) विषयक विवाद उपस्थित होने पर साक्षी ही मुख्य प्रमाण माना जाता है | वहां पर दिव्य शपथ नहीं लिया जाता है एवं लिखित भी प्रमाण नहीं माँगा जाता है । द्वारमार्गक्रिया भोग्यजलवाहादिषु तथा 1 भुक्तिरेव तु गुर्वीं स्यान्न दिव्यं न च साक्षिणः ॥ २६२ ॥

द्वार और मार्ग करने इत्यादियों में भोग को ही प्रमाण मानने का निर्देश - द्वार और मार्ग का बनाना, भोग में भाने वाली वस्तु एवं जल के प्रवाह आदि के अभियोग में ( भुक्ति = कब्जा ) ही सर्वश्रेष्ठ प्रमाण माना जाता है वहां पर दिव्य शपथ नहीं लिया जाता है और साक्षी को भी प्रमाण नहीं माना नाता 1

यद्येके मानुषीं ब्रूयादन्यो ब्रूयात्तु दैविकीम् ।

मानुषीं तत्र गृह्णीयान्न तु दैवीं क्रियां नृपः ॥ २६३ ॥

मानुषी और दैविकी क्रियाओं की व्यवस्था का निर्देश - यदि वादी-G प्रतिवादी में एक मानुषी क्रिया ( प्रमाण ) के विषय में कहे और दूसरी CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 398

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३१२ शुक्रनीति: दैविकी क्रिया ( दिव्य शपथ ) के विषय में कहे तो वहाँ • क्रिया को ग्रहण करे किन्तु दैवी क्रिया को कदापि नहीं ग्रहण करे पर राजा । मानुषी छोक ( प्र यद्येक देशप्राप्ताऽपि क्रिया विद्येत मानुषी । में प्रवृत्त सा श्राह्मा न तु पूर्णादि दैविकी वदतां नृणाम् ॥ २६४ ॥

भले ही मानुषी क्रिया अभियोग के एक ही अंश की पुष्टि करती उसी को ही ग्रहण करे । पूर्ण अंश की पुष्टि करने वाली देवी क्रिया हो किन्तु वालों की बात को न माने । के कहने जब प्रमाणैर्हेतुचरितैः शपथेन नृपाज्ञया वादिसंप्रतिपत्त्या चा निर्णयः षड्विधः स्मृतः ॥ २६५ ६ प्रकार के निर्णय का निर्देश - १ प्रमाण ( साक्षी, लेख आदि ), ३ आचरण, ४ शपथ, ५ राजा की आज्ञा, ६ वादी की सम्मति इन ६ के द्वारा सम्पन्न किये जाने से निर्णय ६ प्रकार का होता है । लेख्यं यत्र न विद्येत न भुक्तिर्न च साक्षिणः । लगता है व्याप्त हो ॥। ( विवाद २ हेतु प्रकारों जोन न च दिव्यावतारोऽस्ति प्रमाणं तत्र पार्थिवः ॥ २६६ ॥ को निर्दोष

सब के अभाव में निश्चय करने में राजा के प्रमाण होने का निर्देश - जहाँ उन ( भ पर लेख, मुक्ति ( कब्जा ), साक्षी एवं दिव्य शपथ का भी अवसर इनमें से अनुसा कोई भी प्रमाण न उपस्थित किया गया हो वहाँ पर राजा ही का निर्णय प्रमाण माना जाता है । लगता है निश्चेतुं ये न शक्याः स्युर्वादाः संदिग्धरूपिणः । सीमाद्यास्तत्र नृपतिः प्रमाणं स्यात् प्रभुयेतः ॥ २६७ ॥ अघ

जो सीमा आदि के विवाद सन्दिग्ध रूप होने से निश्चय रूप से निर्णय और उस नहीं किये जा सकते हैं वहाँ पर राजा ही प्रमाण होता है क्योंकि वह प्रभु है । अधर्म क

स्वतन्त्रः साधयन्नर्थान् राजाऽपि स्याच्च किल्बिषी ।

धर्मशास्त्राऽविरोधेन ह्यर्थशास्त्रं विचारयेत् ॥ २६८ ॥

धर्मशास्त्र के अविरोधपूर्वक राजा को नीतिशास्त्र को विश्वारने का निर्देश- घिग स्वतन्त्र रूप से ( विना प्रमाण के ) विवादों का निर्णय करता हुआ राजा निर्देश-पापी होता है अतः धर्मशास्त्र के विरोध से बचता हुआ राजा अर्थशास्त्र का दण्ड न्या विचार करे अर्थात् धर्मशास्त्रानुसार निर्णय करे । ( जुर्माना राजामात्यप्रलोभेन व्यवहारस्तु दुष्यति । रहता है लोकोऽपि व्यवते धर्मात्कूटार्थे प्रवर्तते ॥ २६ ९ ॥ विवाद होने के कारणों का निर्देश- - राजा तथा अमास्य ( मस्त्री ) के .लोमाधिक्य से व्यवहार ( सुकदमा ) का निर्णय दोषयुक्त होता है । और दुबा CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 399

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पर राजा मानुषी

करे ।

- ॥ २६४ ॥

ष्टि करती हो किन्तु ची क्रिया के कहने - ॥ २६५ ॥

आदि ), २ हेतु नति इन ६ प्रकारों ॥ २६६ ॥

का निर्देश - नहीं नी अवसर इनमें से जा ही का निर्णय -: ॥ २६७ ॥

जय रूप से निर्णय योंकि वह प्रभु है ।

विषी ।

२६८ ॥

बारने का निर्देश करता हुआ राजा राजा अर्थशास्त्र का २६ ९ ॥ बाध्य ( मन्त्री ) दे होता है । और चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३१३ प्रजायें ) भी यथेच्छ व्यवहार करने लगते हैं एवं कपटपूर्ण कार्यों छोक ( हैं । में प्रवृत्त होने लगते प्रवर्तते अतिकामक्रोध लोभैर्व्यवहारः कर्तृ नथो साक्षिणश्च सभ्यान् राजानमेव च ॥ २७० ॥

नोत्यतस्तु तन्मूलं छित्त्रा तं विमृशं नयेत् । जब काम, क्रोध तथा लोभ की अधिकता मनुष्य का व्यवहार होने ता है तब वह फैलते २ क्रमशः कर्त्ता, साक्षी, सभ्य और राजा में मी व्याप्त हो जाता है अतः राजा उसके मूल कारण कामादि को दूर कर व्यवहार

( विवाद ) का विवेकपूर्वक विचार कर निर्णय करे ।

अनर्थं चार्थवत् कृत्वा दर्शयन्ति नृपाय ये ॥ २७१ ॥

अविचिन्त्य नृपस्तथ्यं मन्यते तैनिदर्शितः ।

स्वयं करोति तद्वृत्तौ भुज्यतेऽष्टगुणं त्वम् ॥ २७२ ॥

जो न्यायालय के अधिकारी पुरुष अनिष्ट को इष्ट की भांति करके ( दोषी को निर्दोष बताकर ) राजा को दिखाते या बताते हैं । और जो बिना विचारे उन ( अधिकारियों ) के द्वारा प्रदर्शित विषय को सभ्य मानता है और उसी के अनुसार स्वयं व्यवहार करता है अर्थात् विवाद का निर्णय करता है । तो वैसा करने पर उन सर्वो को राजा तथा अधिकारी पुरुषों को अठगुना पाप लगता है ।

अधर्मतः प्रवृत्तं तं नोपेतेरन् सभासदः ।

उपेक्ष्यमाणाः सनृपा नरकं यान्त्यघोमुखाः ॥ २७३ ॥

अधर्म में प्रवृत्त हुये राजा की सभासद को उपेक्षा न करने का निर्देश-और उस तरह से व्यवहार करते हुये उस राजा को जो न्यायाधिकारी पुरुष अधर्म करने से नहीं रोकते हैं तो राजा के सहित वे सभी नरक को जाते हैं ।

धिग्दण्डस्त्वथ वाग्दण्डः सभ्यायन्त्तौ तु तावुभौ ।

अर्थदण्डवधावुक्तौ राजायत्तावुभावपि ॥ २७४ ॥

विग्दण्ड और वाग्दण्ड इन दोनों को सभासदों के अधीन होने का निर्देश - और किसी को धिकार या डांट - फटकार का दण्ड देना ये दोनों दण्ड न्यायसभा के सदस्यों के अधीन रहते हैं किन्तु किसी को अर्थ दण्ड ( जुर्माना ) या व दण्ड देना ये दो दण्ड तो केवल राजा ही के अधीन रहता है ।

तीरितं चानुशिष्टं च यो मन्येत विधर्मतः ।

द्विगुणं दण्डमादाय पुनस्तत्कार्यमुद्धरेत् ॥ २७५ ॥

दुबारा कार्य के आरम्भ करने में कारण का निर्देश - जो कोई विवाद करने CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 400 का मूल पृष्ठ
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३१४ शुक्रनीति: ' वाला यह समझे कि हमारे फैसले में निर्णय या आज्ञा जो युक्त हुई है अर्थात् नियम - विरुद्ध हुई है तो दूना दण्ड देकर हुई है वह अधर्म पर दिचार करवा सकता है । पुनः उस मुकदमे अन्या साक्षिसभ्यावसन्नानां दूषणं दर्शनं पुनः | कारागार स्वचर्चाविसितानां च प्रोक्तः पौनर्भवो विधिः ॥ लिये दण्ड पौनर्भव विधि के लक्षण - साक्षी तथा सभासदों के २७६ ॥ हार हुई और उन लोगों के द्वारा फैसले का बहिष्कार करने द्वारा जिनकी पर विचार किया जाता है या स्वयं ही विचार करने पर में पुनः सुकद प्रजा या सभासद आदि की त्रुटि हो गई हो तो भी पुनः विचार करना यदि उचि राजा के ऊपर होता है । का अनुव

अमात्यः प्राड्विवाको वा ये कुर्युः कार्यमन्यथा ।

तत् सर्वं नृपतिः कुर्यात्तान् सहस्रं तु दण्डयेत् ॥ २७७ ॥

मन्त्री आदि को नियमविरुद्ध फैसला करने पर अर्थदण्ड देने का निर्देश- जीवि यदि मन्त्री या प्राचिवाक ( जज ) कोई भी नियम विरुद्ध फैसला करे तो न होने क राजा स्वयं पुनः विचार कर दूसरा ' उचित फैसला करे और उन सर्वो के हो जाने प ऊपर १००० का अर्थदण्ड ( जुर्माना ) करे । का स्वामी नहि जातु विना दण्डं कश्चिन्मार्गेऽवतिष्ठते । बीज की प्र सन्दर्शिते सभ्यदोषे यदुद्धृत्य नृपो नयेत् ॥ २७८ ॥

क्योंकि बिना दण्ड के कोई कभी उचित मार्ग पर नहीं चल सकता । अस्तु, विवाद करनेवाले के द्वारा न्यायसभा के सदस्यों का दोष दिखाये जाने पिता का निर्देश पर उस दोष का निवारण करके राजा उचित फैसला करे । सर्वश्रेष्ठ प्रतिज्ञाभावनाद्वादी प्राड्विवेकादिपूजनात् । और उस जयपत्रस्य चादानाज्जयी लोके निगद्यते ॥ २७६ ॥ केवल अव

जयी के लक्षणों का निर्देश — वादी जिस विषय में दावा करता है उसको प्रमाणित करने से एवं प्राड्विवाक ( जज ) आदि के द्वारा सत्य बिवाद उपस्थित करने की प्रशंसा किये जाने पर तथा विजय पत्र ( डिग्री ) प्राप्त पिता करने से लोक में वादी विजयी माना जाता है । जितनी प सभ्यादिभिर्विनिणिक्तं विधृतं प्रतिवादिना । चाहिये । दृष्ट्वा राजा तु जयिने प्रदद्याज्जयपत्रकम् ॥ २८० ॥ चाहिये ।

जयी को जयपत्र देने के प्रकार का निर्देश- सभ्यादियों के द्वारा विचार की सस्यता निर्णीत हुई एवं प्रतिवादी द्वारा भी स्वीकृत जान कर राजा वादी को जयपत्र ( डिग्री ) दे । स्वत अन्यथा ह्यभियोक्तारं निरुध्याद् बहुवत्सरम् । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri