शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 411–420
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 411–420
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-: ।
म् ॥ १ ॥
छठे दुर्ग प्रकरण को जिसके मार्ग दुर्गम
- ।
न् ॥२ ॥
तरफ बहुत बड़ी ईंट, पत्थर तथा मिट्टी घ ' दुर्ग कहते हैं ।
म् ।
म् ॥ ३ ॥
कांटेदार वृक्षों के समूह 7 ) कहते हैं । जिसके दुर्ग ' कहते हैं ।
न् ।
म् ॥४ ॥
क बहुत दूर तक फैली दुर्ग ' कहते हैं । से पर जलाशय का
म् ।
म् ॥ ५ ॥
चतुर वीरों से व्या ' सैन्यदुर्ग ' कहते हैं । ते हों उसे ' सहादु '
म् ।
तम् ॥ ६ ॥
श्रेष्ठ ' ऐरिण ' हुई से चतुर्थाध्याये दुर्गनिरूपण प्रकरणम् ३२५ ' पारिधदुर्ग ' और उससे भी श्रेष्ठ ' वनदुर्ग ' उससे भी श्रेष्ठ ' धन्वदुर्ग ' उससे उससे श्रेष्ठ श्रेष्ठ ‘ जलदुर्ग ' उससे भी श्रेष्ठ ‘ गिरिदुर्ग ' माना गया है ।
सहाय सैन्यदुर्गे तु सर्व दुर्गंप्रसाधिके ।
ताभ्यां विनाऽन्यदुर्गाणि निष्फलानि महीभुजाम् ॥ ७ ॥
श्रेष्ठं तु सर्वदुर्गेभ्यः सेनादुर्गं स्मृतं बुधैः ।
तत्साधकानि चान्यानि तद्रक्षेन्नृपतिः सदा ॥ ८ ॥
सेनादुर्गं तु यस्य स्यात्तस्य वश्या तु भूरियम् । सहाय तथा सैन्य दुर्गों की सब दुर्गों की साधनता का निर्देश –वस्तुतः सब दुर्गों से श्रेष्ठ सेना ( सैम्य ) दुर्ग को विद्वानों ने माना है । और अन्य सारे दुर्ग तो इसके केवल साधनमात्र हैं । अतः राजा सदा इस ( सैन्य ) ' दुर्ग की रक्षा करे जिसके पास सेना ( सैन्य ) दुर्गं है उस ( राजा ) के लिये
यह सारी पृथ्वी अधीन हुई मानी जाती है ।
बिना तु सैन्यदुर्गेण दुर्गमन्यत्तु बन्धनम् ॥ १ ॥
आपत्कालेऽन्यदुर्गाणामाश्रयश्चोत्तमो मतः । आपत्काल में अन्य दुर्गों के आश्रय की उत्तमता का निर्देश - सैम्पदुर्ग को छोड़कर अन्य दुर्ग केवल बन्धनमात्र हैं । वास्तव में आपत्ति पड़ने पर ही अन्य दुर्गों का आश्रय लेना उत्तम माना गया है 1 एकः शतं योधयति दुर्गस्थोऽस्त्रधरो यदि ॥ १० ॥
शतं दशसहस्राणि तस्माद् दुर्गं समाश्रयेत् । अस्त्र धारण किया हुआ एक सैनिक अकेला ही यदि दुर्गं में स्थित होकर उड़े तो बाहर के १०० सैनिकों से लड़ सकता है । और हों तो १०००० सैनिकों से लड़ सकते हैं । इससे दुर्गं
उचित होता है 1 ।
शूरस्य सैन्यदुर्गस्य सर्वं दुर्गमिव स्थलम् ॥
युद्धसम्भारपुष्टानि राजा दुर्गाणि धारयेत् ।
धान्यवीरास्त्रपुष्टानि कोशपुष्टानि वै तथा ॥
अत्यन्त श्रेष्ठ दुर्ग के लक्षण - शूर - वीर सैन्य दुर्ग ( सभी स्थल दुर्ग की भांति दुर्मेंद्य हो जाते हैं । और राजा से परिपूर्ण अर्थात् भोजन के लिये अन्न, शूर - वीर सैनिक, ( खजाने ) से परिपूर्ण दुर्गों को सुसज्जित रक्खे । और ऐसे
सहायपुष्टं यद् दुर्गं तत्तु श्रेष्ठतरं मतम् ।
सहायपुष्टदुर्गेण विजयाँ निश्चयात्मकः ॥
यदि १०० सैनिक का आश्रय लेना ११ ॥ १२ ॥। सेना ) के लिये तो युद्ध की सामग्रियों अस्त्र - शस्त्र एवं कोष
ही दुर्गों में रहे ।
१३ ॥
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३२६ शुक्रनीति: युद्ध सहायक - सामग्रियों से परिपूर्ण दुर्ग से निश्चित विजय इसलिये युद्ध - सहायक उक्त सामग्रियों से परिपूर्ण जो होने का निर्देश-सर्वश्रेष्ठ हो जाता है । अथवा सहायक शूर - वीर एवं दुर्ग होता है । वही परिपूर्ण दुर्ग सर्वश्रेष्ठ होते हैं । उक्त रीति से सहायकों अनुकूल बान्धओं से से परिपूर्ण राजा का विजय निश्चित रूप से होता है । दुर्ग रहने से यद्यत्सहायपुष्टं तु तत्सर्वं सफलं भवेत् । परस्परानुकूल्यं तु दुर्गाणां विजयप्रदम् ॥ १४ ॥ सेना
इति शुक्रनीतौ चतुर्थेऽध्याये दुर्गनिरूपणं में दुर्गनि नाम षष्ठं प्रकरणम् | प्र जो २ दुर्गे सहायकों से परिपूर्ण होते हैं वे सभी राजा होते हैं । दुर्गों का परस्पर एक दूसरे का सहायक होना होता है । इस प्रकार शुक्रनीति - भाषाटीका में चतुर्थाध्याय में निरूपणं नामक षष्ठ प्रकरण समाप्त हुआ । नामक के लिये फलम संयुक्त मन विजय देनेवाला कहते हैं । दुर्ग-सेना भेद से दो और ३ म आसुरी से स्वगर है वह ' स्व कहलाती दूसरी ( करके से से कोई भ पुरुष के ह योड़ी सेन CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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जय होने का निर्देश-दुर्ग होता है वही अनुकूल बान्धनों से परिपूर्ण दुर्ग रहने से * ॥ १४ ॥
ष्ठं प्रकरणम् । जा के लिये फा ना विजय देनेवाला दुर्ग-चतुर्थोऽध्याये सप्तमं प्रकरणम् ।
दौर्ग संक्षेपतः प्रोक्तं सैन्यं सप्तममुच्यते ।
सेना शस्त्रास्त्रसंयुक्त - मनुष्यादिगणात्मिका ॥ १ ॥
लेना - निरूपण प्रकरण के आरम्भ में सेना के लक्षण - इस प्रकार से संक्षेप मैं दुर्गं निरूपण प्रकरण का निरूपण किया गया । अब सप्तम ' सेनानिरूपण ' नामक प्रकरण कहता हूँ । शस्त्र ( तलवार आदि ), अस्त्र ( धनुष आदि ) से संयुक्त मनुष्य आदि ( पैदल सेना, हाथी, बोड़ा ) के समूह को ' सेना ' कहते हैं ।
स्वगमाऽन्यगमा चेति द्विधा सैव पृथक त्रिधा ।
दैव्यासुरी मानवी च पूर्व पूर्व बलाधिका ॥ २ ॥
सेना के भेदों का वर्णन - वह ( सेना ) १. स्वगमा और २. अन्यगमा भेद से दो प्रकार की होती है । पुनः इन दोनों के भी १. देवी, २. आसुरी और ३ मानवी भेद से ३ भेद होते हैं । इनमें पूर्व - पूर्व ( मानवी से आसुरी, आसुरी से दैवी ) सेना अधिक बलशालिनी होती है ।
स्वगमा या स्वयं गन्त्री यानगाऽन्यगमा स्मृता ।
पादातं स्वगमं चान्यद् रथाश्वगजगं त्रिधा ॥ ३ ॥
स्वगमा और अन्यगमा सेना के लक्षण - जो स्वयं गमन करनेवाली सेना होती ' है वह ' स्वगमा ' और जो अन्य द्वारा गमन करनेवाली होती है, वह ' अम्यगमा ' कहलाती है । उसमें पैदल सेना ' स्वगमा ' एक ही प्रकार की होती है किन्तु दूसरी ( अन्यगमा ) सेना अन्य अर्थात् रथ, घोड़ा और हाथी के द्वारा गमन करके से ३ प्रकार की होती है ।
सैन्याद्विना नैत्र राज्यं न धनं न पराक्रमः ।
बलिनो वशगाः सर्वे दुर्बलस्य च शत्रवः ॥ ४ ॥
भवन्त्यल्पजनस्यापि नृपस्य तु न किं पुनः । सैम्य के प्रभाव का निर्देश – सैन्य के बिना राज्य, धन और पराक्रम इनमें से कोई भी स्थिर नहीं रह सकता है । और जब कि सभी लोग बलवान पुरुष के ही वशीभूत होते हैं और दुर्बल पुरुष के शत्रु हो जाते हैं तब फिर
घोड़ी सेना रखनेवाले राजा के लोग शत्रु नहीं होते हैं अर्थात् अवश्य होते हैं ।
शारीरं हि बलं शौर्यबलं सैन्यबलं तथा ॥ ५ ॥
चतुर्थमात्रिकवलं पचमं घीबलं स्मृतम् ।
षष्ठमायुर्बलं स्वेतैरुपेतो विष्णुरेव सः ॥ ६ ॥
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३२८ शुक्रनीति: ६ प्रकार के बलों का निर्देश - १. शरीर का बल ३ सेना का बल, ४. अन का बल, ५. बुद्धि का बल, ६. २. शूरता का बढ ६ प्रकार के बल कहे हुये हैं जो इनसे युक्त होता है, वह आयु का चल, ये सा जाता है । विष्णु
न बलेन विनाप्यल्पं रिपुं जेतुं क्षमः सदा ।
देवासुरनरास्त्वन्योपायैर्नित्यं भवन्ति हि ॥ ७ ॥
बल के बिना लोग क्षुद्र ( साधारण ) शत्रु को भी सदा जीतने नहीं समर्थ हो सकते हैं क्योंकि देवता, असुर और मनुष्य भी बल पर अन्य ( सेना आदि ) उपायों से शत्रु जीतने के लिये करते हैं ।
बलमेव रिपोर्नित्यं पराजयकरं परम् ।
तस्माद्बलमभेद्यं तु धारयेद्यत्नतो नृपः ॥ ८ ॥
एकमात्र मनुष्य का बल ही शत्रु को पराजित करने में नि ही माना करने के को ' अस विपरीत के लिये न रहने गुर सेनापत स्वतन्त्र दिये हो निजी श समर्थ होता है । इसलिये राजा शत्रुओं के लिये दुर्धर्ष बल को यत्नपूर्वक धारण करे । सेनाबलन्तु द्विविधं स्वीयं मैत्रं च तद् द्विधा । कृ मौलसाद्यस्कभेदाभ्यां सारासारं पुनर्द्विधा ॥ ६ ॥ तथा कृ
२ प्रकार के सेनाबलों का निर्देश - सेना का बल दो प्रकार का होता है । स्वयंगुल जिसमें पहला - अपनी सेना का ( स्वीय ), दूसरा - मित्र की सेना का मिल्लादि दत्तवाह ( मैत्र ) बल है । इनमें से प्रत्येक मौल ( क्रमागत ) और साथस्क ( आधुनिक ) भेद से दो प्रकार के होते हैं । पुनः सार और असार भेद से भी दो प्रकार के होते हैं । अशिक्षितं शिक्षितं च गुल्मीभूतमगुल्मकम् । दत्तास्त्रादि स्वशस्त्रास्त्रं स्ववाहि दत्तवाहनम् ॥ १० ॥ श
इसमें शिक्षित - अशिक्षित, गुल्मीभूत - अगुल्मक, दत्तास्वादि - स्वशास्त्राल हुसै नीति स्ववाहि - दत्तवाहन इन भेदों से प्रत्येक दो २ प्रकार के होते हैं । प्रकार सौजन्यात् साधकं मैत्रं स्वीयं भृत्या प्रपालितम् | सकता मौलं बह्वन्दानुबन्धि साद्यस्कं यत्तदन्यथा ॥ ११ ॥ चलाया
मैत्र, स्वीय, मौल तथा साद्यस्क सेनाओं के लक्षण - मिन्नतावश बुद्ध कार्य का निर्वाह करनेवाले सैम्प को ' मैत्र ' एवं वेतन देकर रखे हुये को ' स्वीप ' कहते हैं । बहुत वर्षों से पास में रहनेवाली को ' मौल ' और इसके विपरीत अर्थात् तत्काल भर्ती की हुई सेना को ' साद्यस्क ' कहते हैं । चालों क सुयुद्धकामुकं सारमसारं विपरीतकम् । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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२. शूरता • आयु का बद वह का बल, दे विष्णु ही माना नदा ॥७ जीतने ॥ के लिये - भी चल न रहने लिये निस्य उद्योग
।
॥ ८ ॥
में नित्य नितान्स को यत्नपूर्वक धारण ॥६ ॥
प्रकार का होता है । पत्र की सेना का यस्क ( आधुनिक ) भी दो प्रकार के ॥ १० ॥
तास्त्रादि - स्वशखाख म् ॥ ११ ॥
मिन्नतावश युद्ध १ खे हुये को ' स्वीप ' इसके विपरीत चतुर्थाध्याये सेनानिरूपण प्रकरणम् ३२६ शिक्षितं व्यूहकुशलं विपरीतम शिक्षितम् ॥ १२ ॥
असार तथा शिक्षित - अशिक्षित सेनाओं के लक्षण - भली भांति युद्ध सार के लिये उत्सुक रहनेवाली सेना को ' सार ' और इसके विपरीत रहनेवाली करने ' ' कहते है । व्यूह - रचना में कुशल सेना को ' शिक्षित ' और इससे को असर विपरीत को ' अशिक्षित ' कहते ।
गुल्मीभूतं साधिकारि स्वस्वामिकमगुल्मकम् ।
दत्तात्रादि स्वामिना यत् स्वशस्त्रास्त्रमतोऽन्यथा ॥ १३ ॥
गुल्मीभूत, अगुल्म, दत्तास्वादि तथा स्वशस्त्रास्त्र सेनाओं के लक्षण– सेनापति के साथ रहनेवाली सेना को ' गुल्मीभृत ' और बिना सेनापति के स्वतन्त्र रहकर लड़नेवाली को ' अगुल्मक ' कहते हैं । स्वामी जिसको भवादि दिये हों उस सेना को ' दत्तास्वादि ' और इसके विपरीत जिसके पास अपना निजी शस्त्रास्त्र हों उसे ' स्वशस्त्रास्त्र ' कहते हैं ।
कृतगुल्मं स्वयंगुल्मं तद्वच्च दत्तवानम् ।
आरण्यकं किरातादि यत् स्वाधीनं स्वतेजसा ॥ १४ ॥
कृतगुल्म, स्वयंगुल्म, दत्तवाहन और आरण्यक सेनाओं के लक्षण-तथा कृतगुल्म ( स्वामी ने सेनापति से युक्त सेना में जिसकी गणना की है ), स्वयंगुल्म ( अपनी इच्छा से गुल्म का अधिपति बना हुआ सैम्य ) तथा दत्तवाहन सेना भी होती है । अपने तेज से स्वाधीन रहनेवाली कोल भिल्लादिकों की सेना को ' आरण्यक ' कहते हैं ।
उत्सृष्टं रिपुणा वापि भृत्यवर्गे निवेशितम् ।
भेदाधीनं कृतं शत्रोः सैन्यं शत्रुबलं स्मृतम् ॥ १५ ॥
उभयं दुर्बलं प्रोक्तं केवलं साधकं न तत् । शत्रुबल के तथा दुर्बल सेना के लक्षण - १ - जिसमें शत्रु के द्वारा निकाले. हुये सैनिक वेतन देकर रख लिये गये हों अथवा २ – जो शत्रु की सेना भेद-नीति से अपने अधीन कर ली गई हो, उसे ' शत्रुबल ' कहते हैं । ये दोनों प्रकार की सेनायें दुर्बल कही हुई हैं क्योंकि इनपर विश्वास नहीं किया जा सकता है । ये केवल नाममान को होती हैं इनसे युद्ध - कार्य वस्तुतः नहीं
चलाया जा सकता है ।
समैनिंयुद्धकुशलैर्व्यायामैर्नतिभिस्तथा ॥ १६ ॥
वर्धयेद्वाहुयुद्धार्थं भोज्यैः शारीरकं बलम् । सेना के शारीरिक बल बढ़ाने के उपाय- बाहुयुद्ध में कुशल अपने बराबर बालों के साथ कुश्ती लड़ा कर तथा ब्यायाम कराकर एवं गुरुजनों को प्रणाम CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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३३० शुक्रनीतिः करना सिखाकर तथा पौष्टिक भोजन खिलाकर शारीरिक बल को बढ़ाना चाहिये । बाहुयुद्ध के लिये सैनिकों मृगयाभिस्तु व्याघ्राणां के वर्धयेच्छूरसंयोगात् सम्यक् शस्त्रास्त्राभ्यासतः सदा ॥ १७ ॥
शौर्यबलं नृपः । शौर्यबल बढ़ाने के उपाय — और सदा व्याओं का शिकार, शस्त्र तथा अधों को चलाने का अभ्यास एवं शूरवीरों को सङ्गति कराकर सैनिकों को राजा बढ़ावे | के ' शौयवल ' सेनाबलं सुभृत्या तु तपोभ्यासैस्तथाऽस्त्रिकम् ॥ १८ ॥
वर्धयेच्छास्त्रचतुर - संयोगाद् घीबलं सदा । अवस्था सेनाबल, आस्चिकबल व बुद्धिबल बढ़ाने के उपाय – सुन्दर वेतन देकर के अ ' सेनाबल ' तथा तपस्या और अभ्यास कराकर अर्थात् दिव्यास्त्रों का प्रयोग और व तपस्था द्वारा बाण चलाने के अभ्यास के द्वारा कराकर ' आस्विकबल ' एवं अयं घोड़े, शास्त्र तथा राजनीति जानने में चतुर लोगों की सङ्गति कराकर ' बुद्धिबल ' को ३ मन्त्र
सदा बढ़ाना चाहिये ।
सत्क्रियाभिश्चिरस्थायि नित्यं राज्यं भवेद् यथा ॥ १६ ॥
स्वगोत्रे तु तथा कुर्यात्तदायुर्बलमुच्यते ।
यावद्गोत्रे राज्यमस्ति तावदेव स जीवति ॥ २० ॥
आयुर्बल के लक्षण - निस्य सत्कर्म करने के द्वारा जिस भांति से अपने वंश में राज्य चिरस्थायी हो उस भांति से राजा को करना चाहिये इसी को ' आयुर्बल ' कहते हैं । क्योंकि जब तक उसके वंश में राज्य बना रहता है तब तक ही वह जीवित रहता है । प्र चतुर्गुणं हि पादातमश्वतो धारयेत् सदा । निम्न र पद्ममांशांस्तु वृषभानष्टांशांश्च क्रमेलकान् ॥ २१ ॥ प्रति म
चतुर्थांशान् गजानुष्ट्रान् गजार्धांश्च रथान् सदा । लिये ३ रथात्तु द्विगुणं राजा बृहन्नालीकमेव च ॥ २२ ॥ लिये २
सेना में पदाति आदियों की संख्या का नियम - घुड़सवार सैनिकों से हज़ार, रूपये चौगुनी पैदल सेना एवं घुड़सवार सेना के पञ्चमांश के बरावर बैल, अष्टमांस लिये स ऊंट और ऊंट का चतुर्थांश हाथी, हाथी का अर्धांश रथ, और रथ का द्विपुण बृहन्नालीक ( तोप ) इन सब को राजा अपनी सेना के अन्तर्गत सदा रक्खे!.
पदातिबहुलं सैन्यं मध्याश्वं तु गजाल्पकम् ।
तथा वृषोष्ट्रसामान्यं रक्षेन्नागाधिकं नहि ॥ २३ ॥
राजा सेना में पैदल सिपाहियों को अधिक संख्या में, घोड़ों को मध्यसंख्या र में और हाथियों को थोड़ी संख्या में रक्खे । तथा बैल एवं ऊंटों की संख्या सुगमत साधारण रक्खे किन्तु हाथियों की संख्या अधिक न रक्खे । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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लिये सैनिकों के ॥ १७ ॥
र, शस्त्र तथा अक्षो नकों के ' शौर्य ' ८ ॥ १८ ॥
सुन्दर वेतन देकर पात्रों का प्रयोग शिकवल ' एवं कर ' बुद्धिबल ' को ॥ १६ ॥
। २० ॥ नांति से अपने वंश चाहिये इसी को ना रहता है तब । २१ ॥ 71 २२ ॥ चार सैनिकों से चर बैल, म ररथ का द्विगुण त सदा २३ ॥ को मध्यसंख्या ऊंटों की संख्या चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् सवयःसारवेषोश्चशस्त्रास्त्रं तु पृथक् शतम् लघुनालिकयुक्तानां पदातीनां शतन्त्रयम् अशीत्यवान् रथं चैकं बृहन्नालद्वयं तथा । उष्ट्रान् दश गजौ द्वौ तु शकटौ षोडषर्षभान् तथा लेखकषट्कं हि मन्त्रित्रितयमेव च । घारयेन्नृपतिः सम्यग् वत्सरे लक्षकर्षभाक् ३३१
।
॥ ४ ॥
|| २५ || ॥ २६ ॥
एक वर्ष में एक लक्ष १००००० ) मुद्रा की आयवाला राजा एक सी अवस्था के युवावस्थाचाले दृढ तथा उत्तम वेप ( वर्दी कवच ) वाले, ऊंचे कद के, अस्त्र - शस्त्रों से सुसज्जित ऐसे १०० पैदल सिपाहियों की एक पृथक् टुकड़ी और बन्दूकों से युक्त ३०० पैदल सिपाहियों की एक पृथक् टुकड़ी तथा ८० घोड़े, १ रथ, २ तोपें, १० ऊंट, २ हाथी, २ बैलगाड़ी, १६ बैल, ६ लेखक, ६ मन्त्री, इन सबों को एक सेना के अन्दर अच्छी तरह से रक्खे ।
सम्भारदान भोगार्थं धनं सार्धसहस्रकम् ।
लेखकार्ये शतं मासि मन्त्र्यर्थे तु शतत्रयम् ॥ २७ ॥
त्रिशतं दारपुत्रार्थे विद्वदर्थे शतद्वयम् ।
साद्यश्वपदगार्थं हि राजा चतुःसहस्रकम् ॥ २८ ॥
गजोष्ट्रवृषनालार्थ व्ययीकुर्याच्चतुःशतम् ।
शेषं कोशे धनं स्थाप्यं राज्ञा सार्धंसहस्रकप ॥ ६ ९ ॥
प्रतिवर्ष स्ववेशार्थ सैनिकेभ्यो धनं हरेत् । प्रतिमास में व्यय करने का प्रमाण- - और १ लाख मुद्रा का सालभर में निम्न रीति से व्यय करे जैसे - सामग्री, दान तथा स्वयं भोग करने के लिये प्रति मास १५०० ) डेढ हजार, लेखकों के लिये १०० ) एक सौ, मन्त्रियों के लिये ३०० ) तीन सौ, स्त्री- पुत्र के लिये ३०० ) तीन सौ विद्वानों के समान के लिये २०० ) दो सौ घुड़सवार, तथा पैदल सिपाहियों के लिये ४००० ) चार. हज़ार, ऊंट, बैल तथा बन्दूक चलानेवाले सिपाही - इनके लिये ४०० ) चार सौ रूपये प्रतिमास व्यय करे । और १५०० ) प्रतिवर्ष अपनी २ वदीं बनवाने के
लिये सैनिकों को दे । शेष धन को कोश में राजा सुरक्षित रक्खे ।
लोहसारमयश्वगमो मचकासनः ॥ ३० ॥
स्वान्दोलायितरूढस्तु मध्यमासनसारथिः ।
शस्त्रास्त्रसन्धायुदर इष्टच्छायो मनोरमः ॥ ३१ ॥
एवंविधो रथो राज्ञा रच्यो नित्यं सदश्वकः । राजा के रथ का वर्णन – कान्तिसार उत्तम लौह का बना हुआ, अस्यन्त सुगमता से फिरने वाले चक्कों से युक्त, शय्या के समान सुखपूर्वक बैठने के लिये CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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३३२ शुक्रनीति: स्थान वाला, एवं जिसमें शरीर स्वयम् हिंडोले पर बैठने के हो जाय ( अर्थात् सुन्दर कमानीदार ), और जिसके आगे की समान में सारथी के बैठने का स्थान हो तथा जिसके अन्दर तरफ एवं मनोनुकूल छाया हुआ - इस प्रकार का बना शस्त्र तथा अस्त्र जिसमें अच्छे २ घोड़े जुते हों, राजा सदा सैन्य में रक्खे हुआ मनोरम । रथ नीलतालुर्नीलजिह्वो वक्रदन्तो ह्यदन्तकः ॥ ३२ ॥
दीर्घद्वेषी क्रूरमदस्तथा पृष्ठ विधूकः ।
दशाष्टोननखो मन्दो भूविशोधनपुच्छकः ॥ ३३ ॥
एवंविधोऽनिष्टगजो विपरीतः शुभावहः आन्दोलित मध्य भाग मि भरे पड़े हो ' मिश्र ' सदा खले, कहे हुय ग उदर भ अनिष्ट तथा शुभप्रद गज का लक्षण - नील तालु और । जीमवाला २४ अंग दाँतोंवाला या बिना दांत का, दीर्घ काल तक द्वेष रखनेवाला, विश्वक, दे भाव से मद बहाने वाला, पीठ हिलानेवाला, १८ कम नखवाला, मन्दगामी और तक लटकनेवाली पूंछ से युक्त ऐसा हाथी अनिष्ट फल देनेवाला होता है पृथ्वी एवं भा इससे विपरीत लक्षणों से युक्त शुभ फल देनेवाला होता है । हाथ की भद्रो मन्द्रो मृगो मिश्रो गजो जात्या चतुर्विधः ॥ ३४ ॥
हाथी के ४ प्रकार - १. भद्र, २. सन्द्र, ३. मृग और 8. मिश्र मेद से गज की ४ जातियां होती हैं ।
मध्वाभदन्तः सबलः समाङ्गो वर्तुलाकृतिः ।
सुमुखोऽवयवश्रेष्ठो ज्ञेयो भद्रगजः सदा ॥ ३५ ॥
भद्रगज के लक्षण – मधु ( शहद ) के समान आभा से युक्त बलवान, अनुरूप अङ्गवाला, गोल आकारवाला, सुन्दर मुख एवं पानवाला गज ' भद्र ' संज्ञक सदा जानना चाहिये ।
स्थूलकुक्षिः सिंहदृक् च बृहत्त्वग्गलशुण्डकः ।
मध्यमावयवो दीर्घकायो मन्द्रगजः स्मृतः ॥ ३६ ॥
म भद्रगज की एवं लम्बाई दोतवाला, श्रेष्ठ -स चाल स जाता मन्द्रगज के लक्षण — जिसके पेट स्थूल, आँखें सिंह के समान, चमड़ा मोटा एवं गला और शूंद लम्बी, अवयव मध्यम आकार का एवं शरीर ' दीर्घ हो उसे ' मन्द्र ' संज्ञक गज समझना चाहिये । उ तनुकण्ठदन्तकर्णशुण्डः स्थूलाक्ष एव हि । है । इ सुहस्वाघरमेदस्तु वामनो मृगसंज्ञकः ॥ ३७ ॥ होता
मृगगज के लक्षण - जिसके कण्ठ, दांत, कान एवं शुंड पतले हो और आँखें स्थूल, ओष्ठ और टिङ्ग अत्यन्त छोटे तथा शरीर का आकार छोटा हो, उसे ' मृग ' संज्ञक गज जानना चाहिये । हैव एषां लक्ष्मैर्विमिलितो गजो मिश्र इति स्मृतः । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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समान आन्दोलित तरफ मध्य या अस्त्र भाग भरे पड़े हो मरथ सदा रखे, । ३२ ॥ ] ॥ ३३ ॥
नौर जीभवाछा, दे - विश्वकुल भाव से दगामी और पृथ्वी निवाला होता है एवं ॥ ३४ ॥
४. मिश्र भेद से ।३५ ॥ युक्त दांतोंवाला, सुख एवं श्रेष्ठ अङ्ग-। ३६ ॥ के समान, चमड़ा का एवं शरीर ३७ ॥ द पतले हों और कार छोटा हो, उसे चतुर्थाध्याये सेनानिरूपण प्रकरणम् ३३३ भिन्नं भिन्नं प्रमाणं तु त्रयाणामपि कीर्तितम् ॥ ३८ ॥
मिश्रगज के लक्षण – इन सब के कुछ २ लक्षण जिसमें मिलते हों उसे ' संज्ञक गज समझना चाहिये । उक्त तीनों गजों के प्रमाण भी भिन्न २ ' मिश्र कहे हुये हैं । गजमाने ह्यङ्गुलं स्यादष्टभिस्तु चतुर्विंशत्यङ्गुलैस्तैः ः करः प्रोक्तो गजमान में अंगुलादिकों का प्रमाण -गजों उदर भाग की चौड़ाई के समान चौड़ाई २४ अंगुलों का १ हाथ विद्वान लोग कहते हैं । यवोदरैः । मनीषिभिः को नापने १ अंगुल की
सप्तहस्तोन्नतिर्भद्रे ह्यष्टहस्त प्रदीर्घता ।
परिणाहो दशकर उदरस्य भवेत् सदा ॥
॥ ३६ ॥
के लिये जौ के होती है । ऐसे ४० ॥ भद्रगज के शरीर का मान - ' भद्रगज ' की ऊंचाई ७ हाथ की, लम्बाई ८ हाथ की तथा पेट का विस्तार १० हाथ का सदा होता है ।
प्रमाणं मन्दमृगयोस्तहीनं क्रमादतः ।
कथितं देव्यसाम्यं तु मुनिभिर्भद्रमन्द्रयोः ॥। ४१ ॥
मन्द्र तथा मृग गज का मान - मन्द्र और मृग की ऊंचाई का प्रमाण भद्रगज से क्रम से १-१ हाथ छोटा होता है अर्थात् मन्द्र की ऊंचाई ६ हाथ की एवं मृग की ५ हाथ की होती है किन्तु मुनियों ने भद्र और मन्द्र की लम्बाई समान ही बताई है ।
बृहदभ्रूगण्डफालस्तु घृतशीर्षगतिः सदा ।
गजः श्रेष्ठस्तु सर्वेषां शुभलक्षणसंयुतः ॥ ४२ ॥
सर्वश्रेष्ठ जिसके भौंह, गण्डस्थल तथा मस्तक बृहदाकार के हों एवं चाल सदा शीघ्रता से युक्त हो, ऐसा शुभ लक्षणों से युक्त हाथी सर्वश्रेष्ठ समझा जाता है |
पश्चयवाङ्गुलेनैव वाजिमानं पृथक् स्मृतम् ।
बाजी यश्चोत्तमोत्तमः ॥ ४३ ॥
उत्तमोत्तम चत्वारिंशाङ्गुलमुखो अश्व के लक्षण- घोड़ों का मान हाथियों के मान से भिन्न होता है । इसमें ५ जौ का १ अंगुरू माना जाता है । जिसका सुख ४० अंगुल का होता है, वह घोड़ा ' उत्तमोत्तम ' माना जाता है ।
षट्त्रिंशदङ्गुलमुखो ब्रुत्तमः परिकीर्तितः ।
द्वात्रिंशदकुलमुखो मध्यमः स उदाहृतः ॥ ४४ ॥
उत्तम तथा मध्यम अश्व के लक्षण- ३६ अंगुल का मुख जिसका होता है वह ' उत्तम ' तथा ३२ अंगुल का सुख हो तो ' मध्यम ' समझा जाता है । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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३३४ शुक्रनीति: अष्टाविंशत्यङ्गुलो यो मुखे नीचः प्रकीर्तितः । वाजिनां मुखमानेन सर्वावयवकल्पना नीच अश्व के लक्षण तथा अश्व के अवयवों की मान ॥ ४५ ॥
मुख २८ अगुल का होता है वह ' नीच ' घोड़ा समझा - कल्पना और जिसका के मुख के मान के द्वारा सम्पूर्ण अवयवों के मान की भी जाता है । और घोड़ों औच्चं तु मुखमानेन त्रिगुणं कल्पना की जाती है । परिकीर्तितम् । शिरोमणि समारभ्य पुच्छमूलान्तमेव तृतीयांशाधिकं दैर्घ्यं मुखमानाच्चतुर्गुणम् हि ॥ ४६ ॥ सु
| तथा मु परिणाहस्तूदरस्य त्रिगुणस्त्र्यङ्गुलाधिकः ॥ ४७ ॥ लेकर अ
अश्व की ऊंचाई और लम्बाई का प्रमाण - उक्त मुखमान से तिगुनी ऊंचाई ( रीढ़ ) कही हुई है । घोड़े की शिरोमणि भाग से लेकर पूंछ के मूल भाग लम्बाई मुखमान ले तृतीयांश अधिक चौगुनी होती है । और उदर का ३ अंगुल अधिक तिगुना होता है ।
साधारणमिदं मानमुच्यते विस्तरादथ ।
अष्टाविंशाङ्गुलमुखं पुरस्कृत्य यथा तथा ॥ ४८ ॥
शफोच्चं त्र्यङ्गुलं ज्ञेयं मणिबन्धोऽङ्गुलाधिकः । यह साधारण रूप से मान कहा गया, अब विस्तारपूर्वक कहा तक की पठ भाग विस्तार होती है लम्बाई होती है । जा रहा है । यदि २८ अंगुल प्रमाण मुखवाला नीच संज्ञक अश्व हो तो उसके खुर की ऊंचाई तीन ३ अंगुल प्रमाण की होती है और मणिबन्ध अर्थात् खुर का
' ऊपरी भाग १ अंगुल अधिक अर्थात् ४ अंगुल प्रमाण का होता है ।
चतुर्हस्ताङ्गुला जङ्घा त्र्यङ्गुलं जानु कीर्त्तितम् ॥ ४ ९ ॥
g चतुर्दशाङ्गुलावूरू कूर्परान्तं स्मृतो बुधैः । होता ह अष्टत्रिंशाङ्गुलं ज्ञेयं स्कन्धान्तं कूर्परादितः ॥ ५० ॥ रमणीय
और जंघा ४ हस्त के अंगुल प्रमाण की, जानु ३ अंगुल प्रमाण का कहा करु की कहा हुआ है । और कूर्पर के दूनी पर्यन्त दोनों ऊरु १४ अंगुल प्रमाण का परिमित पण्डितों ने कहा है । कूर्पर से लेकर स्कन्ध पर्यन्त ऊंचाई ३८ अंगुल की की होत होती है । चाहिये
प्रत्यगुरू मुखसमौ जङ्घोना पादमानतः ।
प्रोक्तोच्चता चाथ दैर्घ्यमुच्यते शास्त्रसङ्गतम् ॥ ५१ ॥
और पीछे के दोनों ऊरु मुख के समान अर्थात् २८ अंगुल प्रमाण के होते हैं । और पीछे की जंघा चौथाई मान से कम होती है । इस प्रकार से आ की ऊंचाई का वर्णन किया गया अब शास्त्र - संगत लम्बाई का वर्णन किया जा रहा है । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri