शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 401–410
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 401–410
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हुई है वह अधर्म र पुनः उस मुकदमे
।
: ॥ २७६ ॥
के द्वारा जिनकी पर पुनः मुकदमे रने में यदि राजा विचार करना उचित
था ।
त् ॥ २७७ ॥
ड देने का निर्देश-फैसला करे तो और उन सर्वो के ॥। २७८ ॥ नहीं चल सकता | दोष दिखाये जाने ॥ २७६ ॥
वा करता है उसको द्वारा सभ्य विवाद पत्र ( डिग्री ) प्राप्त ॥ २८० ॥
के द्वारा विवाद न कर राजावादी चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३१५ मिध्याभियोगसदृशर्हयेदभियोगिनम् ॥ २८१ ॥
अर्थात् झूठा विवाद उपस्थित करनेवाले वादी को बहुत वर्षों तक अन्यथा ( जेल ) में बन्द कर दे जो कि झूठा विवाद उपस्थित करने के.. कारागार दण्ड के अनुरूप हो । लिये
कामक्रोधौ तु संयम्य योऽर्थान् धर्मेण पश्यति ।
प्रजास्तमनुवर्तन्ते समुद्रमिव सिन्धवः ॥ २८२ ॥
प्रज्ञा की अनुकूलता करनेवाले राजा के गुणों का निर्देश — काम और क्रोध के ऊपर नियन्त्रण रखकर जो राजा विवाद का निर्णय करता है, प्रजायें उसी का अनुवर्त्तन करती हैं जैसे समुद्र का अनुवर्त्तन नदियां करती हैं ।
जीवतोरस्वतन्त्रः स्याज्जरयाऽपि समन्वितः ।
तयोरपि पिता श्रेयान् बीजप्राधान्यदर्शनात् ॥ २८३ ॥
जीवित रहते हुये माता - पिता के पुत्र को वृद्ध हो जाने पर भी स्वतन्त्र न होने का एवं उन दोनों में पिता की श्रेष्ठता का निर्देश- वृद्धावस्था से युक्त हो जाने पर भी पुत्र माता - पिता के जीवित रहते उसके सामने स्वतन्त्र संपत्ति का स्वामी नहीं हो सकता है । और उन दोनों ( माता - पिता ) के मध्य में बीज की प्रधानता मानने से पिता ही सर्वश्रेष्ठ माना जाता है । 1
अभावें बीजिनो माता तदभावे तु पूर्वजः ।
स्वातन्त्र्यं तु स्मृतं ज्येष्ठे ज्यैष्ठयं गुणवयः कृतम् ॥ २८४ ॥
पिता के अभाव में माता और माता के अभाव में भाई को श्रेष्ठ होने का निर्देश - पिता के अभाव में माता और माता के अभाव में ज्येष्ठ भाई सर्वश्रेष्ठ माना जाना है । क्योंकि सर्वत्र ज्येष्ठ ही में स्वतन्त्रता मानी गई है और उसकी ज्येष्ठता गुण तथा अवस्था दोनों ही के होने से मानी जाती है केवल अवस्था से नहीं ।
याः सर्वाः पितृपत्न्यः स्युस्तासु वर्तेत मातृवत् ।
स्वसमैकेन भागेन सर्वास्ताः प्रतिपालयन् ॥ २८५ ॥
पिता की सभी पत्नियों में मातृवद् व्यवहार करने का निर्देश - चाहे जितनी पिता की पत्नियाँ हों उनमें सगी माता के सदृश आदरभाव रखना चाहिये । और अपने समान एक २ भाग से उन सबों का पालन करना चाहिये ।
अस्वतन्त्राः प्रजाः सर्वाः स्वतन्त्रः पृथिवीपतिः ।
अस्वतन्त्रः स्मृतः शिष्य आचार्ये तु स्वतन्त्रता ॥ २८६ ॥
स्वतन्त्र - स्वतन्त्र का निर्णय - सभी प्रजायें अस्वतन्त्र ( पराधीन ) CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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३१६ शुक्रनीति: होती हैं । किन्तु केवल एक राजा स्वतन्त्र होता है । और जाता है । और आचार्य में स्वतन्त्रता मानी जाती है । शिष्य परतन्त्र माना अनुभव ( सुतस्य सुतदाराणां वशित्वमनुशासने । इसने अपह विक्रये चैव दाने च वशित्वं न सुते पितुः पुत्र और पुत्रवधुओं को पिता या श्वशुर की ॥ २८७ ॥
मानी गई है किन्तु समर्थ पुत्र के लिये बेंचने और आज्ञा मानने में पराधीनता की प्रतीक्षा की आवश्यकता नहीं मानी गई है । दान देने में पिता की आशा स्वतन्त्राः सर्व एवैते परतन्त्रेषु नित्यशः । हैं । और य अनुशिष्टौ विसर्गे वाऽविसर्गे चेश्वरा मताः भी सदा म परतन्त्र होने पर भी ये सभी पुत्र || २८८ || विषय में पिता के साथ मन्त्रणा करने, देने और न सदा देने में स्वतन्त्र स्वाधीन ही माने जाते हैं क्योंकि माने गये हैं । मणिमुक्ताप्रवालानां सर्वस्यैव पिता प्रभुः । विभाग स्थावरस्य तु सर्वस्य न पिता न पितामहः ॥ २६ ९ ॥ समान भाग स्वामित्व का निर्णय – मणि, सुक्ता ( मोती ) और मवाल ( मूंगा ) आदि का आधा संपूर्ण चल संपत्ति के ऊपर पिता का प्रभुत्व रहता है 1 । किन्तु संपूर्ण स्थावर ( कन्या क ( अचल ) संपत्ति के ऊपर पिता या पितामह का पूर्णं प्रभुख नहीं रहता है, हाँ आंशिक रूप से रहता है । स्वामी
भार्या पुत्रश्च दासश्च त्रय एवाधनाः स्मृताः । जाते हैं ।
यत्ते समधिगच्छन्ति यस्यैते तस्य तद्धनम् ॥ २६० ॥
पत्नी, पुत्र और नौकर ये तीनों ही क्रम से पति, पिता और स्वामी के रहते दम तक अधन ( धन के स्वामित्व से हीन ) माने गये हैं अत एव ये पुत्र म लोग जो कुछ भी धन कहीं से प्राप्त करते हैं वे सब जिनके परनी, पुत्र वा के लिये मा नौकर होते हैं उन्हीं के अधिकार में चले जाते हैं, इसी से ये ' अघन ' कहलाते भाग दे, हैं अर्थात् इनका अपना कोई अलग धन नहीं होता है ।
वर्तते यस्य यद्धस्ते तस्य स्वामी स एव न ।
अन्यस्वमन्यहस्तेषु चौर्याद्यैः किन्न दृश्यते ॥ २६१ ॥
जो धन जिनके हाथ में रहता है उस धन का स्वामी वही नहीं जाता है जैसे चोरी आदि कारणों से दूसरे का धन दूसरे के हाथ में क्या देखा जाता है किन्तु हाथ में रखा देखने मात्र से वह उस धन का स्वामी माना जाता 1 तस्माच्छाखत एव स्यात् स्वाम्यं नानुभवादपि । अंशह माना ( पुन्नी का नहीं धन के उ नही अन्त में सौदा अस्यापहृतमेतेन न युक्तं वक्तुमन्यथा ॥ २६२ ॥ केवल या बाद
इससे शास्त्रानुसार ही किसी धन का कोई स्वामी हो सकता है CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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शिष्य परतन्त्र माना : ॥ २८७ ॥
मानने में पराधीनता मैं पिता की आशा ॥ २८८ ॥
माने जाते हैं क्योंकि
माने गये हैं ।
: ॥ २८ ९ ॥
वाल ( मूंगा ) आदि किन्तु संपूर्ण स्थावर नव नहीं रहता है, ॥ २६० ॥
पिता और स्वामी के ये हैं अत एव वे नके परनी, पुत्र या ये ' अन ' कहलाते ॥ २६१ ॥
वही नहीं माना हाथ में क्या नका स्वामी नहीं पि ॥ २६२ ॥
सकता है केवल चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३१७ में रहना मात्र देखने ) से नहीं होता है । अन्यथा इसका धन अनुभव ( हाथ कर लिया यह कहना भी उचित नहीं हो सकता था । इसने अपहरण
विदिताऽर्थागमः शास्त्रे तथा वर्णः पृथक् पृथक् ।
शास्ति तच्छास्त्रधर्म्म यन्म्लेच्छानामपि तत्सदा ॥
पूर्वाचार्यैस्तु कथितं लोकानां स्थितिहेतवे । वर्णानुसार प्रत्येक वर्णों के पृथक् पृथक् अर्थार्जन के मार्ग शास्त्र हूँ । और ये जो शास्त्रोक्त धर्म अर्थार्जन के विषय में कहे हुये हैं वे भी सदा मान्य हैं । और पूर्वाचार्यों ने लोक की सदाचार- रचा के
विषय में अन्यत्र कहा है ।
समानभागिनः कार्याः पुत्राः स्वस्य च वै खियः ॥
स्वभागार्धहरा कन्या, दौहित्रस्तु तदर्धभाक् । विभाग- विचार - धनस्वामी अपने हिस्से में से स्त्री तथा पुत्र
समान भाग रक्खे । और अपना भी उन्हीं के समान भाग रक्खे ।
२६३ ॥
में प्रसिद्ध स्लेच्छों को लिये इसी २ ९ ४ ॥ का समान अपने भाग का आधा भाग कन्या ( अविवाहिता ) का एवं कन्या से आधा भाग दौहित्र
( कन्या का पुत्र ) का रक्खे ।
मृतेऽधिपेऽपि पुत्राद्या उक्तभागहराः स्मृताः ॥ २ ९ ५ ॥
स्वामी के मरने पर पुत्रादिक उक्त भाग के अनुसार सम्पत्ति के स्वामी माने जाते हैं ।
मात्रे दद्याच्चतुर्थांशं भगिन्यै मातुरर्धकम् ।
तदर्ध भागिनेयाय शेषं सवं हरेत् सुतः ॥ २६६ ॥
पुत्र माता के लिये अपने भाग का चतुर्थांश ( चौथाई ) भाग एवं बहिन के लिये माता के भाग से आधा भाग, भाक्षा के लिये बहिन के भाग से आधा भाग दे, और अन्त में अवशिष्ट सभी भागों को पुत्र स्वयम् ले ।
पुत्रो नप्ता धनं पत्नी हरेत् पुत्री च तत्सुतः ।
माता पिता च भ्राता च पूर्वालाभाच्च तत्सुतः ॥ २६७ ॥
अंशहारियों के क्रमनिर्णय का निर्देश – पुत्र, पौत्र, पत्नी, पुत्री, दौहित्र ( पुत्री का पुत्र ), माता, पिता और भाई यथाक्रम एक के अभाव में दूसरे धन के उत्तराधिकारी होते हैं । और पुत्रादि सभी के अभाव में भाई का पुत्र अन्त में उत्तराधिकारी होता है ।
सौदायिकं धनं प्राप्य स्त्रीणां स्वातन्त्र्यमिष्यते ।
विक्रये चैव दाने च यथेष्टं स्थावरेष्वपि ॥ २६८ ॥
सौदायिक धन में स्त्री की स्वतन्त्रता का निर्देश - सौदायिक ( न्याह के प्रथम या बाद में पति या पिता के गृह से मिले हुये ) घन को पाकर स्त्री स्वतन्त्रः CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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३१८ शुक्रनीतिः रूप से भोग सकती है, और चाहे वह स्थावर ( अचल सम्पत्ति किसीको बेच देने या दे देने में उसका इच्छानुसार व्यवहार हो तो मी नर्त्तक ऊढया कन्यया वापि पत्युः पितृगृहाच्च यत् । कर सकती है । यही विधि मातृपित्रादिभिर्दत्तं धनं सौदायिकं स्मृतम् ॥ २६६ भाषा भाग सौदायिक धन के लक्षण - विवाहिता या अविवाहिता कन्याको ॥ बॉट लेते ह पास से या पिता के गृह से माता - पिता के द्वारा दिये गये धन पति के कहते हैं । को ' सौदाविक ' पित्रादिधनसम्बन्धहीनं यद्यदुपार्जितम् | चोरों येन स काममश्नीयादविभाज्यं धनं हि तत् ॥ ३०० ॥ लोग दूसरे ह
अविभाज्य धन के लक्षण — पैतृक धन की सहायता के बिना जो - जो धन लेते राजा हैं को । जिसले उपार्जित किये जाते हैं वे सभी उस उपार्जनकर्त्ता के लिये यथेच्छ मोग्य होते हैं, क्योंकि उस प्रकार के धन का भाई आदि के द्वारा विभाग नहीं किया जा • सकता है । . जलतस्करराजाग्निव्यसने समुपस्थिते । लिये जो यस्तु स्वशक्त्या संरक्षेत्तस्यांशो दशमः स्मृतः ॥ ३०१ ॥ देवें ।
जलादिकों से धन की रक्षा करनेवाले को दशवाँ भाग प्राप्त करने का निर्देश - जो कोई व्यक्ति जल, चोर, राजा या अग्नि के द्वारा संकट में पड़े हुये किसी के वस्तु ( धन ) को अपनी शक्ति लगाकर यदि बचा लेता है तो उस धन के दशवें भाग के पाने का वह अधिकारी हो जाता है 1 व्याप हेमकारादयो यन्त्र शिल्पं सम्भूय कुर्वते । सुवर्ण, घा जैसा कार्य कार्यानुरूपं निर्वेशं लभेरंस्ते यथार्हतः ॥ ३०२ ॥
अंश में ल जहां पर कई सोनार आदि मिलकर किसी शिल्प का निर्माण करते हैं वहीं लोगों ने " पर कार्यानुरूप यथायोग्य वे सब मजदूरी को प्राप्त करते हैं । उनका भार संस्कर्ता तत्कलाभिज्ञः शिल्पी प्रोक्तो मनीषिभिः । शिल्पी के लक्षण - किसी कला का जानकार होते हुये उसकी त्रुटियों -को दूरकर सुधार करने वाले को विद्वान लोग ' शिल्पी ' कहते हैं । एवं हर्म्यं देवगृहं वापि वाटिकोपस्कराणि च ॥ ३०३ ॥। विधि बन
सम्भूय कुर्वतां तेषां प्रमुख्यो द्वयंशमर्हति । घनियों का भवन, देवमन्दिर, बावड़ी या गृहसम्बन्धी उपकरणों को मिलकर बनानेवाले कारीगरों के मध्य में जो प्रधान होता है वह वो भाग मजदूरी पाने का अधिकारी होता है । आपल नर्तकानामेव धर्मः सद्भिरेष उदाहृतः ॥ ३०४ ॥ मैं प्राप्तघ
तानज्ञो लभतेऽर्थार्धं गायनास्तु समशिनः । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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सम्पत्ति तो भी कर सकती है । 1 ॥ २६६ ॥
कन्याको पति के नको ' सौदायिक '
।
॥ ३०० ॥
विना जो - जो धन लिये यथेच्छ भोग्य विभाग नहीं किया : ॥ ३०१ ॥
प्राप्त करने का संकट में पड़े हुये लेता है तो उस । ३०२ ॥ र्माण करते हैं वहीं मिः । हुये उसकी त्रुटियों
- हैं ।
३०३ ॥
ची उपकरणों को वह दोभाष - ३०४ ॥ चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपण प्रकरणम ३१ ९ का धनविभागविषयक निर्देश - नाचनेवालों के लिये भी नर्त्तकादियों ने कही है । जैसे ताल का जाननेवाला अर्जित धन का यही विधि विद्वानों है शेष धन में गाने वाले सब लोग समान समान भाग में आधा भाग पाता
बाँट लेते हैं ।
परराष्ट्राद्धनं यत्स्याच्चौरैः स्वाम्याज्ञया हृतम् ॥ ३०५ ॥
राज्ञे षष्ठांशमुद्धृत्य विभजेरन् समांशकम् । चोरों का धनविभागविषयक निर्देश – अपने स्वामी की आज्ञा से चोर छोग दूसरे के राज्य में जाकर जो धन चुराकर लाते हैं उसमें से छठा भाग राजा को देने के बाद शेष धन को आपस में समान भाग से बाँट कर
लेते हैं ।
तेषां चेत् प्रसृतानां च ग्रहणं समवाप्नुयात् । ३०६ ॥
तन्मोक्षार्थं च यद्दत्तं वहेयुस्ते समांशतः । और यदि चोरी करने के बाद वे लोग पकड़ लिये जावें तो अपने छूटने के लिये जो द्रव्य खर्च हो उसको समान भाग से बाँट कर अपने - अपने हिस्से में से
दे देवें ।
प्रयोगं कुर्वते ये तु हेमधान्यरसादिना ॥ ३०७ ॥
समन्युनाधिकैरंशैर्लाभस्तेषां तथाविधः ।
समो न्यूनोऽधिको शो योऽनुक्षिप्तस्तथैव सः ॥ ३०८ ॥
व्यापारी आदियों का धनविभागविषयक निर्देश - जो लोग मिलकर सुवर्ण, धान्य तथा रसादि द्रव्य का कोई व्यवसाय करते हैं उन में जिसका जैसा कार्य हो और धन लगा हो उसके अनुरूप बराबर, न्यून या अधिक अंश में लाभांश में से उन्हें मिलता है । अर्थात् व्यवसाय के प्रारम्भ में उन लोगों ने सम, न्यून या अधिक अंश में जो द्रव्य लगाया हो उसी के अनुसार उनका भाग होता है ।
व्ययं दद्यात् कर्म कुर्याल्लाभं गृह्णीत चैव हि ।
वणिजानां कर्षकाणामेष एव विधिः स्मृतः ॥ ३०६ ॥
एवं वे तदनुसार व्यथ एवं कर्म करते हैं तथा लाभ भी प्राप्त करते हैं । यह विधि बनियों और कृपकों के लिये कही हुई है ।
सामान्यं याचितं न्यास आधिर्दीसश्च तद्धनम् ।
अन्वाहितं च निक्षेपः सर्वस्वं चान्वये सति ॥ ३१० ॥
आपत्स्वपि न देयानि नव वस्तूनि पण्डितैः । आपत्काल होने पर भी नवविध धर्मो को न देने का निर्देश - १. बटवारे प्राप्त धन, २. पुनः लौटा देने के लिये मांगकर लाया हुआ धन, ३. धरोहर CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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३२० शुक्रनीति: में रखा हुआ धन, ४. बन्धक रखा हुआ धन, ५. दाल ७. दूसरे के हाथ में रखने के लिये दिया हुआ धन, ८., ६. दास का धन संस्कार करने के लिये दिया हुआ द्रव्य, ९. सन्तान के रहने शिल्पी के हाथ मे ( संपूर्ण धन ) ये ९ प्रकार धन या वस्तु धापत्ति आने पर अपना सर्वस्व मूल हाथ बेच डालना या दे देना आदि कुछ भी नहीं करना चाहिये पर भी दूसरे के निर्देश-अदेयं यश्च गृह्णाति यश्चादेयं । हो तो कर्ज प्रयच्छति ॥ ३११ ॥ म दिलावे
तावुभौ चौरवच्छास्यौ दाप्यौ चोत्तमसाहसम् । उत्तम साइड निर्देश - यदि नहीं देने योग्य किसी वस्तु को जो कोई किसी से लेता है या किसी को देता है तो वे धनी ( ग्रहीता - दाता ) चौर की भाँति दण्डनीय होते हैं और उत्तम साहस दोनों नामक arafai
दण्ड ( जुर्माना ) देने के अधिकारी होते हैं । रक्षा करे ।
अस्वामिकेभ्यश्चौरेभ्यो विगृह्णाति धनं तु यः ॥ ३१२ ॥
अव्यक्तमेव क्रीणाति स दण्ड्यश्वौरवन्नृपैः । अस्वामिक धन को चोरों से लेनेवालों को दण्ड देने का निर्देश - जिस यदि वस्तु का वह स्वामी नहीं है उससे जो खरीदता है या चोरों से माल लेता राजा समझ है या गुप - चुप में किसी से माल खरीदता है वह राजा के द्वारा चोर की भाँति दिला दे ।
दण्डनीय होता है ।
ऋत्विग्याज्यमदुष्टं यस्त्यजेदनपकारिणम् ॥। ३१३ ॥
अदुष्टवर्त्विजं याग्यो विनेयौ तावुभावपि । लिखित का निर्देश-त्यागयोग्य ऋत्विज और याज्य के लक्षण - जो पुरोहित निर्दोष एवं कोई अपकार नहीं करनेवाले अपने यजमान का एवं जो यजमान निर्दोष तथा अनप- नष्ट हो जाय कारी पुरोहित का त्याग करता है तो वे दोनों दंडनीय होते हैं । भलीभांति स कर्जदार से द्वात्रिंशांशं षोडशांशं लाभं यण्ये नियोजयेत् ॥ ३१४ ॥
नान्यथा तद्वययं ज्ञात्वा प्रदेशाद्यनुरूपतः । राजा को ३२ वाँ या १६ वाँ लाभ पण्य में नियत करने का निर्देश- जो किस बनिया ( व्यवसायी ) विक्री के वस्तुओं पर जैसा प्रदेश या समय हो उसके मलीभांति स अनुरूप उस वस्तु के लाने में किये हुये व्यय को समझ कर ३२ वाँ या १६ व ही धर्म के जा भाग लाभ लेने की व्यवस्था करे, इससे अधिक लाभ न लेवे । वृद्धिं हित्वा ह्यर्धधनैर्वाणिज्यं कारयेत् सदा ॥ ३१५ ॥ खोटी व
व्यापारी के धन की व्यवस्था का निर्देश - ' मैं वृद्धि को नहीं ग्रहण करूंगा । ' धोकेबाजी स ऐसा कहकर और ' वाणिज्य में लब्ध आधा धन दूंगा ' इस प्रकार के स्वीकृत • दण्डनीय होत वचनों के द्वारा सदा वाणिज्य करावे । अथवा राजा वृद्धि सुनाफा छोड़कर मूल धन के आधे धन से सदा व्यापारी से व्यापार करावे । २१ शु CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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शिल्पी ६. दास का धन् के हाथ में पर अपना सर्वस्व ने पर भी दूसरे हिये । के ॥ ३११ ॥
त् । देने योग्य किसी ता है तो वे दोनों लम साहस नामक । ३१२ ॥ का निर्देश - जिस रौ से माल लेता द्वारा चोर की भाँति । ३१३ ॥ निर्दोष एवं कोई
निर्दोष तथा अनय--। ३१४ ॥
रने का निर्देश-समय हो उसके ३२ वाँया १६ 1 । ३१५ ॥ नहीं ग्रहण करूंगा ' प्रकार के स्वीकृत सुनाफा छोड़कर चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपण प्रकरणम् ३२१
मूलात्तु द्विगुणा वृद्धिगृहीता चाधमर्णिकात ।
तदोत्तमर्णमूलं तु दापयेन्नाधिकं ततः ॥ ३१६ ॥
से उत्तम को मूल ही दिलवाने का निर्देश -- यदि कर्ज देनेवाला महाजन मूल धन से द्विगुण धन सूद में ले चुका तो कर्जदार से महाजन के दिये हुये मूल धन को ही राजा दिलावे अधिक हो दिलावे |
धनिकाश्चक्रवृद्धयादिमिषतस्तु प्रजाधनम् ।
संहरन्ति ह्यतस्तेभ्यो राजा संरक्षयेत् प्रजाम् ॥ ३१७ ॥
घनी महाजन लोग चक्रवृद्धि ( सूद - दरसूद ) के व्याज से कर्जदार प्रजाओं का अधिकांश धन हर लेते हैं, अतः राजा उन महाजनों से प्रजा की भलीभांति रक्षा करे । समर्थः सन्न ददाति गृहीतं धनिकाद्धनम् राजा सन्दापयेत्तस्मात् सामदण्डविकर्षणैः यदि कोई समर्थ होकर भी धनिक से लिये हुये धन राजा समझा - बुझाकर या दण्ड का प्रयोग कर कर्जदार से दिला दे । लिखितं तु यदा यस्य नष्टं तेन प्रबोधितम् विज्ञाय साक्षिभिः सम्यक् पूर्ववद्दापयेत्तदा | ॥ ३१८ ॥
को नहीं देता है तो महाजन को धन ॥। ३१६ ॥ लिखित नष्ट हो जाने पर साक्षी के आधार पर उत्तमर्ण को धन दिलाने का निर्देश- जब जिस किसी के पास से किसी का लिखित नष्ट हो जाय और वह राजा को सूचित कर दे तो राजा भलीभांति समझकर पूर्व की भांति ( पुरनोट में लिखित की कर्जदार से द्रव्य दिला दे । अदत्तं यश्च गृह्णाति सुदत्तं पुनरिच्छति दण्डनीयावुभावेतौ धर्मज्ञेन महीक्षिता जो किसी द्वारा नहीं दी हुई वस्तु को किसी से ले ऋणपत्र ( पुरनोट ). साक्षियों के द्वारा भांति ) ही उसे ॥। ३२० ॥ लेता है और मछीमांति से दूसरे को दे दी गई वस्तु को पुनः लेना चाहता है तो वे दोनों धर्म के जानकार द्वारा दण्डनीय होते हैं । . कूटपण्यस्य विक्रेता स दण्डश्चौरवत् सदा । धोकेबाजी खोटी वस्तु बेचनेवाले को दण्ड देने का निर्देश- जो खोटी वस्तु या दण्डनीय से किसी वस्तु को बेचता है तो वह सदा राजा द्वारा चोर की भांति
होता है ।
दृष्ट्वा कार्याणि च गुणाच्छिल्पिनां भृतिमावहेत् ॥ ३२१ ॥
२१ शु ० CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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३२२ शुक्रनीति: शिल्पियों की मृति का विचार - कारीगरों के कार्य तथा उनकी मजदूरी या तनखाह देवे । गुण को देखकर पञ्चमांशं चतुर्थांशं तृतीयांशं तु कर्षयेत् । और य ' अर्ध वा राजताद्राजा नाधिकं तु दिने दिने ॥ ३२२ २४० व स्वर्णकार की भृति का विचार - राजा प्रतिदिन चांदी की ॥ होती है । पांचवां, चौथा, तीसरा या आधा भाग योग्यतानुसार कर रूप में विक्री में से किन्तु आधे से अधिक कर न लेवे । ग्रहण करे । विद्रुतं न तु हीनं स्यात् स्वर्ण पलशतं शुचि । उत्तम चतुःशतांशं रजतं ताम्म्रं न्यूनं शतांशकम् ॥ ३२३ ॥ ( जितना ह
१०० पल ( ४०० भर भर निर्दोष सोना गलाने पर तौल में 6 वाँ भाग होना चाहिये । निर्दोष चांदी ( १०० पल भर ) गलाने पर ४०० तथा तामा १०० वां अंश न्यून होना चाहिये ।
वङ्गं च जसदं सीसं हीनं स्यात् षोडशांशकम् ।
अयोऽष्टांशं त्वन्यथा तु दण्ड्यः शिल्पी सदा नृपैः ॥
रांगा, जस्ता और सीसा ( धातु विशेष गलाने पर १६ वां होना चाहिये । लोहा तो गलाने पर अष्टमांश हीन होना चाहिये । ( पूर्वोक्त मान से अधिक हीन होने पर ) गलानेवाला कारीगर राजा दण्डनीय होता है ।
सुवर्ण द्विशतांशं तु रजतं च शतांशकम् ।
हीनं सुघटिते कार्ये सुसंयोगे तु वर्धते ॥ ३२५
षोडशांशं त्वन्यथा हि दण्डयः स्यात् स्वर्णकारकः ।
संयोगघटनं दृष्ट्रा वृद्धि ह्रासं प्रकल्पयेत् ॥ ३२६
सुन्दर रीति से अलंकार आदि बनाये जाने में छीलने आदि कम नहीं वां तामा, ३२४ ॥ सुक्ष्म होती भाग कम अथवा अठगु अभ्यया द्वारा सा धातुओं विषय में य मूल्य से दुर ॥ लोगों क ॥ द्वारा निरूपि से सोना सम्भव है २०० वां अंश और चांदी १०० वां अंश तौल में हीन हो जाता है । सुन्दा रीति से टांका आदि देने में १६ वां अंश तौल में बढ़ जाता है । इससे अन्यमा तौल में न्यूनाधिक्य होने पर सुनार दण्डनीय होता है । और जिस प्रकार इति टाका आदि देने में मिलावट की जाती है उसी के अनुसार विचारक द्वारा सोने आदि की वृद्धि तथा ह्रास की कल्पना की जानी चाहिये । इस प्रक स्वर्णस्योत्तमकार्ये तु भृतिखिशांशकी मता । दोष नहीं कह षष्टशी मध्यकार्ये हीनकार्ये तदर्धकी ॥ ३२७ ॥
: बहु की बनवाई मजदूरी ३० वो भाग के इस प्रक बने हुये है तुल्य होती है । मध्यम बने हुये की ६० वां भाग तथा हीन १२० वां भाग के तुल्य मजदूरी होती है । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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था गुण को देखकर ॥ ३२२ ॥
दी को विक्री में से रूप में ग्रहण करे ॥ ॥ ३२३ ॥
रतौल में कम नही पर ४०० वो वंश
म् ।
दा नृपैः ॥ ३२४ ॥
१६ वां भाग कम चाहिये । अन्यया दीगर राजा द्वारा सदा ॥ ॥ ३२५ ॥
कारकः ।
न् ॥ ३२६ ॥
बने आदि से सोना हो जाता है । सुन्दा है । इससे अन्य I और जिस प्रकार विचारक द्वारा ३२७ ॥ ३० वां भाग के हीन बने हुये चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३२३ तदर्धा कटके ज्ञेया विद्रुते तु तदर्धी । और यदि केवल कड़ा ( हाथ में पहनने का आभूषण ) बनवाया हो तो वाँ भाग एवं केबल सोना गलवाने की मजदूरी ४८० वाँ भाग के तुल्य २४०
होती है ।
उत्तमे राजते वर्धा तदर्धा मध्यमे स्मृता ॥ ३२८ ॥
हीने तदर्धा कटके तदर्धा संप्रकीर्तिता । प्रकार के चाँदी के बने आभूषणादि की मजदूरी आधा भाग ( जितना हो तौल से उसकी आधी ), मध्यम की? था भाग तथा होन की
८ वाँ भाग एवं कड़ा की १६ वाँ भाग मजदूरी होती है ।
पादमात्रा भृतिस्ताम्रे वने च जसदे तथा ॥
missa वा समा वापि द्विगुणाऽष्टगुणाऽथवा तामा, रांगा तथा जस्ता की बनी वस्तुओं की मजदूरी सुह्य होती है और लोहे की बनी वस्तुओं की मजदूरी आधी,
अथवा अठगुनी होती है ।
धातूनां कूटकारी ' तु द्विगुणो दण्डमर्हति ॥
३२६ ॥. । ४ ये भाग के बराबर, दुगुनी ३३० ॥ धातुओं में मिलावट करने पर दूना दण्ड देने का निर्देश - धातुओं के विषय में यदि कोई मिलावट या जालसाजी किसी प्रकार की करे तो उसे मूल्य से दुगुना दण्ड ( जुर्माना ) देना पड़ता ' है 1
लोकप्रचारैरुत्पन्नो मुनिभिर्विधृतः पुरा ।
व्यवहारोऽनन्तपथः स वक्तुं नैव शक्यते ॥ ३३१ ॥
लोगों के नाना प्रकार के आचरणों से उत्पन्न हुआ तथा पूर्वकाल में मुनियों द्वारा निरूपित व्यवहार के मार्ग अनन्त हैं अतः उनका यथावत् वर्णन करना असम्भव है 1
उक्तं राष्ट्रप्रकरणं समासात् पञ्चमं तथा ।
अत्रानुक्ता गुणा दोषास्ते ज्ञेया लोकशास्त्रतः ॥ ३३२ ॥
इति शुकनीतौ राष्ट्रेऽन्त्यं चतुर्थेऽध्याये राजधर्मनिरूपणं नाम पश्चमं प्रकरणम् समाप्तम् । इस प्रकार से संक्षेप में पञ्चम राष्ट्रप्रकरण मैंने कहा । इसमें जो गुण या रोष नहीं कहे जा सके उन्हें लोक तथा अन्य ग्रन्थों से जान लेना चाहिये । इस प्रकार शुक्रनीति - भाषाटीका में राष्ट्रविषयक चतुर्थाध्याय में अन्तिम राजधर्मनिरूपण - नामक पञ्चम प्रकरण समाप्त हुआ । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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चतुर्थाध्यायस्य षष्ठं प्रकरणम् । उससे श्रेष्ठ उससे श्रेष्ठ
षष्ठं दुर्गप्रकरणं प्रवक्ष्यामि समासतः ।
खातकण्टकपाषाणैर्दुष्पथं दुर्गमैरिणम् ॥ १ ॥
दुर्ग - प्रकरण के आरम्भ में ऐरिण दुर्ग के लक्षण - अब छठे दुर्ग प्रकरण को संक्षेप से कहता हूँ । खाई ( गड्डे ), कांटों तथा पत्थरों से जिसके मार्ग दुवैक बने हों उसे ' ऐरिण ' दुर्गे कहते हैं । परितस्तु महाखातं पारिखं दुर्गमेव तत् । सहा इष्टकोपलमृद्भित्तिप्राकारं पारिधं स्मृतम् ॥ २ ॥ सब दुर्गे
पारिख तथा पारिध दुर्ग के लक्षण — और जिसके चारों तरफ बहुत बड़ी सारे दुर्ग खाईं हो उसे ‘ पारिख ' दुर्गं कहते हैं । जिसके चारों तरफ ईंट, पत्थर तथा मिट्टी दुर्ग की र से बनी बड़ी - बड़ी दिवालों का परकोटा बना हो उसे ' पारिध ' दुर्ग कहते हैं । ' यह सारी
महाकण्टक वृक्षौघैर्व्याप्तं तद्वनदुर्गमम् ।
जलाभावस्तु परितो धन्वदुर्गं प्रकीर्तितम् ॥ ३ ॥
वनदुर्ग तथा धन्व दुर्गं के लक्षण - जो बहुत बड़े - बड़े कांटेदार वृक्षों के समूह आप से चारों तरफ घिरा हुआ हो, उसे ' वनदुर्गम ' ( वनदुर्ग ) कहते हैं । जिसके छोड़कर चारों तरफ बहुत बहुत दूर तक मरुभूमि फैली हो उसे ' धन्वदुर्ग ' कहते हैं । अन्य दुर्ग
जलदुर्गं स्मृतं तज्ज्ञैरासमन्तान्महाजलम् ।
सुवारिपृष्ठोच्चघरं विविक्ते गिरिदुर्गमम् ॥ ४ ॥
जलदुर्गं तथा गिरिदुर्गं के लक्षण – जिसके चारों तरफ बहुत दूर तक फैली अख हुई जलराशि हो, उसे उस विषय के ज्ञाता लोग ' जलदुर्ग ' कहते हैं । से छड़े तो एकान्त में किसी पहाड़ी के ऊपर बना हो एवं उसके ऊपर जलाशय का भी हो तो १ प्रबन्ध हो तो उसे ' गिरिदुर्ग ' कहते हैं । उचित हो
अभेद्यं व्यूहविद्वीरव्याप्तं तत्सैन्यदुर्गमम् ।
सहायदुर्ग तब्ज्ञेयं शूरानुकूलबान्धवम् ॥ ५ ॥
सैम्यदुर्गं तथा सहायदुर्ग के लक्षण - व्यूह - रचना में चतुर वीरों से म होने से जो अभेद्य ( आक्रमण द्वारा अजेय ) हो उसे ' सैन्यदुर्ग ' जिसमे शूर एवं सदा अनुकूल रहनेवाले बान्धव लोग रहते हों उसे कहते हैं ।
पारिखादैरिणं श्रेष्ठं पारिघं तु ततो वनम् ।
ततो धम्बजलं तस्माद् गिरिदुर्गं ततः स्मृतम् ॥ ६
ऐरिणादि दुर्ग का तारतम्य - निर्देश—— कहते हैं । अस्य ' सहावदुर्य सभी स्थ से परिपूर्ण ( खजाने ॥ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri