शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 431–440

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 431–440

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किन्तु वह है । श्वेत दे ॥ ११२ ॥

दूर्यमणि केसमान है । कोई भी घोड़ा सुन्दर हो तो वह ॥। ११३ ॥ हो किंवा जो रूप

तः ।

नः ॥ ११४ ॥

सर्वत्र कृष्ण वर्ण है । 1 ॥ ११५ ॥

1 उठाकर चलता हो की मोर, हंस, श्रीतर, ( श्रेष्ठ चालवाला ) ते ॥ ११६ ॥

1 स्यन्त भोजन करके कष्ट न मालूम पड़े ॥। ११७ ॥ 1 तक का श्वेत विलक जाता है और कहा चतुर्थाध्याये सेनानिरूपण प्रकरणम् ३४५ संहम्याद्वर्णैजान् दोषान् स्निग्धवर्णो भवेद् यदि ११८ ॥ निश्ध वर्ण होने से सर्व वर्णगत दोष नाशकता का निर्देश — घोड़ा यदि ( चिकनाई लिये हुये ) वर्ण का हो तो वर्ण से होनेवाले. सारे दोषों स्निग्ध नष्ट कर डालता है । को

बलाधिकञ्च सुगतिर्महान् सर्वाङ्गसुन्दरः ।

नातिक्रूरः सदा पूज्यो भ्रमाद्यैरपि दूषितः ॥ ११६ ॥

आवर्त्तादिदोष ले दूषित होने पर भी पूजनीय अश्व के लक्षण - जो अधिक बलशाली, अच्छी चालवाला, ऊंचा, सर्वाङ्ग - सुन्दर, अस्यन्त बदमाश नहीं होने पर यदि भौंरी आदि दोषों से युक्त हो तो भी वह सदा पूजनीय होता है ।

वाजिनामत्यवहनात् सुदोषाः संभवन्ति हि ।

कृशो व्याधिपरीताङ्गो जायतेऽत्यन्तवाहनात् ॥ १२० ॥

अवाहितो भवेन्मन्दः सर्वकर्मसु निन्दितः ।

अपोषितो भवेत् क्षीणो रोगी चात्यन्तपोषणात् ॥। १२१ ॥

अश्वों के कृशत्वादि दोष उत्पन्न होने के कारण - यदि घोड़े अच्छे भी हों किन्तु अधिकतर सवारी न की जाय तो उसमें दोष उत्पन्न हो जाते हैं और अत्यन्त अधिक सवारी करने से भी घोड़े दुर्बल तथा रोगी हो जाते हैं अतः योग्यतानुसार उन्हें सवारी में लेना चाहिये । और बिना सवारी के भी घोड़े मन्द गत्तिवाले एवं किसी काम के नहीं रह जाते हैं । और बिना पौष्टिक खुराक के क्षीण तथा अधिक पौष्टिक भोजन कराने तथा तदनुरूप सवारी न करने से रोगी हो जाते हैं, अतः मात्रानुरूप खिलाना चाहिये । सुगति दुर्गतिर्नित्यं शिक्षकस्य गुणागुणैः । घोड़े की अच्छी तथा बुरी चाल होने में शिक्षक को कारणता का निर्देश -घोड़े में शिक्षक के गुण तथा दोष के द्वारा ही नित्य अच्छी या बुरी चाल हो

जाती है अर्थात् जैसा सिखानेवाला होता है वैसा घोड़ा बन जाता है ।

जान्वधश्चलपादः स्यादृजुकायः स्थिरासनः ॥ १२२ ॥

तुलाधृतखलीनः स्यात् काले देशे सुशिक्षकः ।

मृदुना नातितीक्ष्णेन कशाघातेन ताडयेत् ॥ १२३ ॥

घोड़ों के सुशिक्षक के लक्षण- घोड़े को सुन्दर रीति से सिखानेवाला सवार जानु ( घुटुओं ) ओंसे नीचे पैर को हिलाता हुआ, शरीर को सीधा रक्खे हुये, स्थिर आसन से बैठकर तुला की भांति लगाम को पकड़े हुए, काल तथा देश के अनुसार न अत्यन्त कठिन और न अत्यन्त कोमल चाबुक की मार से घोड़े को मार कर सिखावे । ताडयेन्मध्यघातेन स्थाने स्वश्वं सुशिक्षकः । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 432

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३४६ शुक्रनीति: षि कक्षयोर्हन्यात् स्खलिते पक्षयोस्तथा भीते कर्णान्तरे चैव श्रीवासून् मागगामिनि ॥ १२४ ॥

। . कुपिते बाहुमध्ये च भ्रान्तचित्ते तथोदरे उत्त अश्वः सन्ताडयते प्राज्ञैर्नान्यस्थानेषु च ॥ १२५ ॥ लिये १ म

अश्व - सुशिक्षक के कृत्यों का निर्देश - सुन्दर सिखानेवाला कर्हिचित् । उसका भ अच्छे घोड़ों को उचित स्थान पर चाबुक की मध्यम सचार अपने धनुषों का ज्यादा हिनहिनाता हो तो दोनों आँखें में फिसलने मार से मारे । जैसे यदि डर ( भड़कने ) पर दोनों कानों के बीच में विपरीत पर दोनों बगलों में, और , मार्ग से चलने ग्रीवा में, दोनों अगले पैरों को उठाकर खड़ा होने पर आगे के पैरों के मध्य में पर, मण्डल भ और भ्रान्त चित्त होने पर उदर में बुद्धिमान सवार घोड़े के मारे स्थानों में कभी भी न मारे । किन्तु अन्य अथवा हेषिते स्कन्धे स्खलिते जघनान्तरे ॥ १२६ ॥ मण्ड

. भीते वक्षःस्थलं हन्याद् वक्त्रमुन्मार्गगामिनि । बढ़ाता कुपिते पुच्छसंघाते भ्रान्ते जानुद्वयं तथा ॥ १२७ ॥।

अथवा अधिक हिनहिनाने पर कन्धे में, फिसलने पर जांघों के बीच में, डरने पर वचःस्थल में, कुमार्ग पर चलने पर मुख में, कुपित होने पर पूंछ की सन्धि के अन्त में, चित्त की भ्रान्ति होने पर दोनों जानुओं में मारे । नासकृत्ताडयेदश्वमकाले च विदेश | तथा चम्म अकालस्थानघातेन वाजिदोषान् वितन्वते ॥ १२८ ॥ शरद ऋत

अन्यथा ताडन करने से अनिष्ट - घोड़े को बार बार या असमय तथा वर्षा कुठांव में ( जहां नहीं मारना चाहिये, वहां पर ) नहीं मारना चाहिये क्योंकि असृमय तथा कुठांच में मारने से घोड़े में दोषों की वृद्धि हो जाती है । ऋतु तथ तावद् भवन्ति ते दोषा यावज्जीवत्यसौ हयः । दुष्टं दण्डेनाभिभवेन्नारोहेद्दण्डवर्जितः ॥ १२ ९ ॥ उस और वे दोष घोड़े में तब तक बने रहते हैं, जब तक घोढ़ा जीवित रहता बल, शर है । दुष्ट घोड़े को दण्ड देकर परास्त कर देवे, बिना दण्ड दिये उस पर सवारी देना आ न करे ।

गच्छेत् षोडशमात्राभिरुत्तमोऽश्वो धनुःशतम् ।

यथा यथा न्यूनगतिरश्वो हीनस्तथा तथा ॥ १३० ॥

उत्तम और हीन घोड़े की गति का प्रमाण – उत्तम घोड़ा १६ मात्रा का उच्चारण करते - करते १०० धनुष की दूरी तक पहुँच जाता है । जैसे २ डिकी थक देने का न्यून गति होती है वैसे २ वह हीन माना जाता है । उसके सहस्रचापप्रमितं मण्डलं गतिशिक्षणे । ' ब CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 433

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॥। १२४ ॥ 1 ॥ १२५ ॥

कर्हिचित् । नेवाला सचार अपने से मारे । जैसे यदि पर दोनों बगलों मार्ग में, से चलने पर 7 के पैरों के मध्य के मारे में, किन्तु अन्य ॥ १२६ ॥

न ॥। १२७ ॥

जांघों के बीच में, कुपित होने पर पूंछ लुओं में मारे ॥ ॥ १२८ ॥

न या असमय तथा रना चाहिये क्योंकि

जाती है ॥। १२ ९ ॥

घोड़ा जीवित रहता दिये उस पर सवारी ॥ १३० ॥

दा १६ मात्रा का है । जैसे २ जिसकी चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३४७. उत्तमं वाजिनो मध्यं नीचमर्थं तदर्धकम् ॥ १३१ ॥

मण्डलों के प्रमाणों का निर्देश – गतिकी शिक्षा देने में घोड़े के.. डिये उत्तमादि १ मण्डल का प्रमाण १००० धनुषों का होता है जो उत्तम होता है ( ५०० धनुषों का ) मण्डल मध्यम और उसका उसका आधा नीच होता है । धनुषों ( का ) मण्डल अल्पं शतधनुः प्रोक्तमत्यल्पं च तदर्धकम् । और १०० धनुर्षो का मण्डल अल्प और उसका आधा ( अत्यल्प होता है । मण्डल शतयोजनगन्ता स्याद्दिनैकेन यथा हयः ॥ गतिं संवर्धयेन्नित्यं तथा मण्डलविक्रमैः । भी आधा ( २५० ५० धनुषों का ) १३२ ॥ मण्डल के द्वारा गति बढ़ाने की शिक्षा से तब तक घोड़े की गति नित्य. बढ़ाता रहे कि जब तक वह एक दिन में १०० योजन ( ४०० ) तक न.

दौड़ लगाने लगे ।

सायं प्रातश्च हेमन्ते शिशिरे कुसुमागमे ॥ १३३ ॥

सायं ग्रीष्मे तु शरदि प्रातरश्वं वहेत् सदा । ऋतु के भेद से अश्वशिक्षा के समय में भेद का निर्देश - हेमन्त, शिशिर तथा वमन्तऋतु में सायंकाल तथा प्रातःकाल एवं ग्रीष्म में सायंकाल और

शरद् ऋतु प्रातःकाल घोड़े को शिक्षा देवे ।

वषासु न वहेदीषन्तथा विषमभूमिषु ॥ १३४ ॥

वर्षाऋतु में और विषम भूमि में घोड़े को चलाने का निषेध - और वर्षा ऋतु तथा विषम भूमि में घोड़े को थोड़ी भी दौड़ाने की शिक्षा न देवे । सुगव्याऽग्निर्बलं दाढ्यमारोग्यं वर्धते हरेः । उत्तमगति से अश्व के फल का निर्देश - उत्तम चाल से घोड़ों की जठराग्नि,. बल, शरीर की दृढ़ता तथा आरोग्य की वृद्धि होती है । अतः चाल की शिक्षा

देना आवश्यक है ।

भारमार्गपरिश्रान्तं शनैश्चङ्क्रामयेद्धयम् ॥ १३५ ॥

स्नेहं सम्पाययेत् पश्चाच्छ करासक्तुमिश्रितम् ।

हरिमन्थांश्च माषांश्च भक्षणार्थं मकुष्ठकान् ॥ १३६ ॥

शुष्कानाद्रश्च मांसानि सुस्वन्नानि प्रदापयेत् । थके हुये अश्व को धीरे २ चलाने का एवं उनके भक्षणार्थं हितकारक पदार्थ वेने का निर्देश — भारवहन तथा मार्ग चलने से थके हुये घोड़े को धीरे २ टहलावे उसके बाद शक्कर तथा सत्तू मिले हुये स्नेह ( घृत ) को पिलावे । और खाने के CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 434

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३४८ शुक्रनीति: लिये चने, उर्द तथा मोठ को दे चाहे वे सूखे हों या हरे ( भिगोये अच्छी तरह पकाये हुये मांस भी दे । हुये ) पर्व यद्यत्र स्खलितं गात्रं तत्र दण्डं न पातयेत् घो क मोच खाये अंग पर घोड़े को चाबुक न मारने ॥ १३७ ॥ भोजन

का निर्देश तथा मूंग घोड़े के किसी अंग में मोच हो जाय तो वहां पर चाबुक यदि कहीं नावतारितपल्याणं नहीं मारना चाहिये हयं मार्गसमागतम् । । दन्त्वा गुडं सलवणं बलसंरक्षणाय च ॥ १३८ ॥। घो

मार्ग से चलकर आये हुये घोड़े को गुड़ तथा लवण देने का निर्देश ३. रेचित मार्ग चलकर आये हुये घोड़ों को बिना जीन उतारे हुये ही बल करने के लिये लवण ( निमक ) के साथ गुड़ देना चाहिये ।

गत स्वेदस्य शान्तस्य सुरूपमुपतिष्ठतः ।

मुक्त पृष्ठादिबन्धस्य खलीनमवतारयेत् ॥ १३ ९

पसीना शान्त होने पर लगाम उतारने का निर्देश – पसीना एवं घोड़ा शान्त होकर अपनी स्वाभाविक अवस्था में स्थित हो जाय पीठ के बन्धन ( कसे हुये चारजामे ) को खोल कर लगाम निकाल

मर्दयित्वा तु गात्राणि पांसुमध्ये विवर्तयेत् ।

स्नानपानावगाहैश्च ततः सम्यक् प्रपोषयेत् ॥ १४०

की होती का संरक्षण घार ॥ गति सम सूख जाय प्रेरित हो तब उसके लेवे । आद ॥ कर घोड़े घोड़ों के अड़ों को मलकर फेरने का निर्देश — और घोड़े के सारे शरीर का विद्वान् य मर्दन ( खरहरा ) करके धूलि में लोटने की व्यवस्था कर दे । इसके बाद स्नान कराना, पानी पिलाना, नदी आदि में अवगाहन ( स्नान ) कराना रेचि आदि से उसे भलीभांति पुनः परिपुष्ट ( ताजा ) कर लेवे । गमन क

सर्वदोषहरोऽश्वानां मद्यजाङ्गलयो रसः ।

शक्त्या सम्पाययेत् क्षीरं घृतं वा वारिसक्तुकम् ॥ १४१ ॥

घोड़ों को मद्य व मांसरस देने का फल - घोड़ों के लिये मद्य तथा जंगली जीवों का मांसरस सर्वदोषनाशक ( लाभप्रद ) होता है 1 । शक्ति के अनुसार चौकड़ी दूध, घी या जल में घुला हुआ सत्तू पिलावे | पैर बिना अन्नं भुक्त्वा जलं पीत्वा तत्क्षणाद्वाहितो हयः । जिससे उत्पद्यन्ते तदाश्वानां कासश्वासादिका गदाः ॥ १४२ ॥

चारा आदि खिलाने के बाद तत्काल घोड़े की सवारी के दोष - यदि चारा खिलाने के बाद पानी पिलाकर फौरन घोड़े पर सवारी की जाय तो उससे घोड़े को खांसी तथा दमे की बीमारी हो जाती है । के समान यवाश्च चणकाः श्रेष्ठा मध्या भाषा मकुष्ठकाः । हुआ दौर नीचा मसूरा मुद्राश्च भोजनार्थ तु वाजिनः ॥ १४३ ॥

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भिगोये हुये ) एवं ॥ १३७ ॥

निर्देश- यदि कहाँ ही मारना चाहिये । 1 ॥ १३८ ॥

देने का निर्देश-ही बल का संरचन ॥ १३ ९ ॥ -पसीना सूख जाय हो जाय तब उसके निकाल लेवे । 1 ॥ १४० ॥

- के सारे शरीर का कर दे । इसके बाद ( स्नान ) कराना

म् ॥ १४१ ॥

ये मद्य तथा जंगली शक्ति के अनुसार 31 ॥ १४२ ॥

दोष - यदि चारा की जाय तो उससे ॥। १४३ ॥ चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३४६ घोड़ों के लिये उत्तम, मध्यम तथा नीच भोजनों का निर्देश — घोड़ों को के लिये जौ तथा चना देना उत्तम, उर्द तथा मोठ मध्यम और मसूर भोजन तथा मूंग का देना नीच माना जाता है । गतयः षड्विधा धाराऽऽस्कन्दितं रेचितं प्लुतम् ।. धौरीतकं वल्गितं च तासां लक्ष्म पृथक् पृथक् ॥ १४४ ॥

घोड़ों की ६ प्रकार की गति का नाम - निर्देश – १. धारा, २. आस्कन्दित, ३. रेचित, ४. प्लुत, ५. धौरीतक, ६. वल्गित इन भेदों से गति ६ प्रकार की होती है । अब उनके लक्षण पृथक् २ कहते हैं ।

धारागतिः सा विज्ञेया यातिवेगतरा मता ।

पाणितोदातिनुदितो यस्यां भ्रान्तो भवेद्धयः ॥ १४५ ॥

धारा गति के लक्षण – जो अत्यन्त वेग से युक्त गति हो उसे ' धारा ' गति समझनी चाहिये । इसमें सवार की एड़ी या चाबुक की मार से अत्यन्त प्रेरित होकर घोड़ा वेग से चक्कर या दौड़ लगाने लगता है ।

आकुचिताम्रपादाभ्यामुत्प्लुत्योत्प्लुत्य या गतिः ।

आस्कन्दिता च सा ज्ञेया गतिविद्भिस्तु वाजिनाम् ॥ १४६ ॥

आस्कन्दित गति के लक्षण - जिसमें अगले पैरों को सिकोड़े हुये उछल २ कर घोड़े की गति होती है उसे ' आस्कन्दित ' गति घोड़ों की गति जाननेवाले विद्वान् मानते हैं । ईषदुत्प्लुत्य गमनमखण्डं रेचितं हि तत् । रेचित गति के लक्षण — और घोड़ा जिसमें थोड़ा उछल २ कर अखण्ड

गमन करता है उसे ' रेचित ' कहते हैं ।

पादैश्चतुर्भिरुत्प्लुत्य मृगवत् सा प्लुता गतिः ॥ १४७ ॥

असंवलित पद्भ्यां तु सुव्यक्तं गमनं तुरम् ।

धौरीतकं च तब्ज्ञेयं रथसंवाहने वरम् ॥ १४८ ॥

प्लुत तथा धौरीतक गति के लक्षण – घोड़ा चारो पैरों से मृग के समान चौकड़ी भरकर जिसमें दौड़ता है उसको ' प्लुत ' गति कहते हैं । जिसमें दोनों पैर बिना सिकोड़े हुये उठाकर चलाये जांय, और शीघ्र सुन्दर गति हो,. जिससे रथ ( गाड़ी ) खींचने में अच्छाई हो, उसे ' धौरीतक ' गति कहते हैं ।

प्रसंवलित पद्भ्यां यो मयूरोद्धृतकन्धरः ।

दो लायितशरीरार्धकायो गच्छति वल्गितम् ॥ १४६ ॥

वल्गित गति के लक्षण – जिसमें घोड़ा सिकोड़े हुये दोनों पैरों से मयूर के समान गर्दन उठाये हुये और आधे शरीर को हिंडोले के समान हिलाता हुआ दौड़ता है उसको ' वल्गित ' गति कहते हैं CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 436

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३५० शुक्रनीति: परिणाहो वृषमुखादुदरे तु चतुर्गुणः । __सकत् त्रिगुणोच्चन्तु सार्धंत्रिगुणदीर्घता घोड बैल के मुखादि का प्रमाण वृष के मुख के ॥। १५० ॥ का विस्तार और ककुद् ( बैल के पीठ पर का टिल्ला प्रमाण से चोगुना परमायु ) के सहित गर वर्ष तक से तिगुना ऊंचा एवं सुख से उदर की लम्बान साढ़े तीन गुना उदर मुख तक की सप्ततालो वृषः पूज्यो गुणैरेभियुतो यदि । होना चाहिये । मानी ग पूज्य सप्तताल बल के लक्षण - जो सात ताल प्रमाण ऊंचा इन निम्न लिखित गुणों से युक्त हो तो वह बैल पूजनीय ( श्रेष्ठ होते हुये यदि दांत स्थायी न च वै मन्दः सुवोढा स्वङ्गसुन्दरः ) माना जाता है । घोडे की ॥ १५१ ॥

नातिक्रूरः सुपृच्च वृषभः श्रेष्ठ उच्यते । जाता है श्रेष्ठ बैल के लक्षण – जो चलते २ रुकनेवाला ( अड़ियल ) न हो और धीरे २ चलनेवाला भी न हो एवं सुन्दर वहन करनेवाला, सभी अझै से सुन्दर, अत्यन्त क्रूर ( बदमाश ) न हो और जिसकी पीठ सुन्दर हो, ऐसा दांत बैल श्रेष्ठ कहा जाता है । भाग में त्रिंशद्योजनगन्ता वा प्रत्यहं भारवाहकः के ६ दा ॥ १५२ ॥

नवतालश्च सुदृढः सुमुखोष्ट्र: प्रशस्यते । श्रेष्ठ ऊंट के लक्षण - जो प्रतिदिन ३० योजन ( १२० कोश ) तक चल सकनेवाला या भारवहन करनेवाला, नवताल - प्रमाण ऊंचा हो, एवं अत्यन्त और चौती मजबूत शरीरवाला तथा सुन्दर मुखवाला हो, ऐसा ऊंट प्रशस्त माना • जाता है । शतमायुर्मनुष्याणां गजानां परमं स्मृतम् ॥ १५३ ॥ पांच

मनुष्यगजयोर्बाल्यं यावद्विंशतिवत्सरम् । के अन्त नृणां हि मध्यमं यावत् षष्टिवर्ष वयः स्मृतम् ॥ १५४ ॥

अशीतिवत्सरं यावद् गजस्य मध्यमं वयः । मनुष्य और हाथियों की आयु तथा बाल्यादि अवस्था का प्रमाण - मनुष्यों और हाथियों की परम आयु १०० वर्ष तक की और बाल्यावस्था २० वर्ष तक की मानी गई है । और मनुष्यों की मध्यम ( जवानी से प्रौढावस्था तक ) तक क्रमशः में अवस्था ६० वर्ष तक की मानी जाती है किन्तु हाथियों की मध्यम

८० वर्ष तक की मानी गई है ।

चतुस्त्रिंशत्तु वर्षाणामश्वस्यायुः परं स्मृतम् ॥ १५५ ॥

पञ्चविंशतिवर्ष हि परमायुर्वृषोष्ट्रयोः 1 बाल्यमश्ववृषोष्ट्राणां पञ्चमं वत्सरं मतम् ॥ १५६ ॥

मध्यं यावत् षोडशाब्दं वाधक्यं तु ततः परम् । अवस्था फ फिर २१ तीन २ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 437

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: 1 ॥ १५० ॥

नाण से चीगुमा के सहित उपर गुना उदर सुख होना चाहिये । ऊंचा होते हुये यदि - श्रेष्ठ ) माना जाता है दरः ॥ १५१ ॥ ।

1 यल ) न हो और बाला, सभी अझै से ठ सुन्दर हो, ऐसा ८ ॥ १५२ ॥

1 २० कोश ) तक चल हो, एवं अत्यन्त ऊंट प्रशस्त माना ॥ १५३ ॥

I - ॥ १५४ ॥

} का प्रमाण- मनुष्यों विस्था २० वर्ष तक से प्रौढावस्था तक ) की मध्यम अवस्था ॥ १५५ ॥

॥ १५६ ॥

I चतुर्थाध्याये सेना निरूपण प्रकरणम् ३५१ घोड़ा, बल तथा ऊँट की आयु तथा अवस्थाओं का प्रमाण- घोड़े की ३४ वर्ष तक की मानी गई है । और बैल तथा ऊंटों की परमायु २५ परमायु की ही मानी जाती है । घोड़ा, बेल तथा ऊंट की बाल्यावस्था ५ वर्ष वर्ष तक ओर मध्यावस्था १६ वर्ष तक की होती है उसके बाद वृद्धावस्था तक की

मानी गई है ।

दन्तानामुद्गमैर्वणैरायुर्ज्ञेयं वृषाश्वयोः ॥ १५७ ॥

दांतों के द्वारा बैल व घोड़ों की अवस्था - ज्ञान का निर्देश - बैल तथा घोडे की अवस्था का ज्ञान उनके दांत निकलने तथा दांतों के वर्णं के द्वारा किया जाता है ।

अश्वस्य षट् सिता दन्ताः प्रथमाब्दे भवान्त हि ।

कृष्णलोहितवर्णास्तु द्वितीयेऽब्दे ह्यधोगताः ॥ १५८ ॥

दांतों द्वारा घोड़ों के प्रथम वर्ष का ज्ञान - घोड़ों के प्रथम वर्ष में ऊपरी भाग में सुफेद ६ दांत होते हैं । और दूसरे वर्ष में काले तथा लाल मिश्रित वर्णं के ६ दांत नीचे भाग में निकलते हैं ।

तृतीयेऽब्दे तु सन्दंशौ क्रमात् कृष्णौ षडब्दतः ।

तत्पार्श्ववत्तिनौ तौ तु चतुर्थे पुनरुद्गतौ ॥ १५ ९ ॥

तीसरे वर्ष में दो २ दांत ६ वर्ष तक क्रम से कृष्ण वर्ण के हो जाते हैं । और चौथे वर्ष में पुनः उक्त दाँतों के पार्श्व में दो दांत निकल आते हैं ।

अन्त्यौ द्वौ पञ्चमाब्दे तु संदंशौ पुनरुद्गतौ ।

मध्यपार्श्वान्तगौ द्वौ द्वौ क्रमात् कृष्णौ षडब्दतः ॥ १६० ॥

पांचवें वर्ष में अन्त में दो दांत फिर निकल आते हैं । मध्य तथा पार्श्व के अन्त भाग में दो २ दांत ६ वर्ष में क्रम से कृष्ण वर्ण के हो जाते हैं ।

नवमाब्दात् क्रमात् पीतौ तौ सितौ द्वादशाब्दतः ।

दशपादतस्तौ तु काचाभौ क्रमशः स्मृतौ ॥ १६१ ॥

नवें वर्ष से वे दोनों दांत क्रम से पीत वर्णं के तदनन्तर फिर १२ वें वर्ष तक में सुफेद हो जाते हैं । फिर १५ वें वर्ष तक वे दोनों कांच की भांति क्रमशः उज्ज्वल हो जाते 1

अष्टादशाब्दतस्तौ हि मध्वाभौ भवतः क्रमात् ।

शङ्खाभौ चैकविंशाब्दाच्चतुर्विंशाब्दतः सदा ॥ १६२ ॥

छिद्रं सवलनं पातो दन्तानां च त्रिके त्रिके । फिर १८ चे वर्ष तक वे दोनों मधु के समान वर्ण के क्रम से हो जाते हैं 1 फिर २१ वें वर्ष तक शङ्ख के समान वर्ण के हो जाते हैं पुनः २४ वें वर्ष तक तीन २ दांतों में छिद्र, संचलन ( हिलना ) तथा गिरना जारी हो जाता है । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 438

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३५२ शुक्रनीति: प्रोथे सुवलयस्तिस्रः पूर्णायुर्यस्य वाजिनः यथा यथा तु हीनास्ता हीनमायुस्तथा ॥ १६३ ॥

तथा । निन्दित घोड़ों के लक्षण - जिस घोड़े के प्रोथ बली पड़ी हुई हों उसकी आयु पूर्ण ( वृद्धि पूर्ण ) हुई ( मुखाद्य ) में स्पष्ट जैसे २ उक्त बलियों में कमी होती जाती है वैसे समझनी चाहिये । अ है २ उसकी समझनी चाहिये । आयु जानूत्पाता स्वोष्ठवाद्यो धूनपृष्ठो जलासनः ॥ १६४ गतिमध्यासनः पृष्ठपाती पश्चाद्गमोर्ध्वपात् । सर्पजिह्वश्वर्क्ष कान्तिर्भीरुरश्वोऽतिनिन्दितः सच्छिद्र भालतिलकी ॥ १६५ ॥

निन्द्य आश्रयकृत्तथा । जो घोड़ा जानुओं को उछालता हो, ओठों को बजाता हिलाता हो, जल में या चलते २ बैठ जाता हो, पीठ पर से सवार देता हो, पीछे की ओर घसकता हो, पैर ऊपर उठाता हो, सांप लपलपानेचाला, रीछ की भांति कान्तिवाला, और भड़कनेवाला स्वरूप होन हुई लिये झ तरह || हो, पीठ को गिरा के बने हैं । उन हो वह के लिये अत्यन्त निन्द्य होता है । और जिस घोड़े के भाल में छिद्रयुक्त तिलक हो वह बने रह निन्दनीय तथा आश्रयदाता स्वामी को नष्ट करनेवाला होता है । है । इस वृषस्याष्टौ सिता दन्ताश्चतुर्थेऽब्देऽखिलाः स्मृताः ॥ १६६ ॥

द्वावन्त्यौ पतितोत्पन्नौ पञ्चमेऽब्दे हि तस्य व । दाँतों द्वारा बैल व ऊंट के आयु की परीक्षा - बैल के चौथे वर्ष तक में सम्पूर्ण बैल सफेद ८ दांत निकल आते हैं, और ५ वें वर्ष में अन्त के दो दांत गिर कर पुनः का वर्ण उत्पन्न जाते हैं । को अपन हटाने क षष्ठे तूपान्त्यौ भवतः सप्तमे तत्समीपगौ ॥ १६७ ॥

अष्टमे पतितोत्पन्नौ मध्यमौ दशनो खलु । फाल का ६ ठें वर्ष में अन्त के समीप में स्थित दो दांत, ७ वें वर्ष में उसके समीप के दो दांत, और ८ वें वर्ष में मध्य के दो दांत क्रमसे गिरकर पुनः उत्पषा हो जाते हैं । : दण्ड मन से कृष्णपीतसिता रक्तशङ्खच्छायौ द्विके द्विके ॥ १६८ ॥ वादना

क्रमादब्दे च भवतश्चलनं पतनं ततः । से ताड उष्ट्रस्योक्तप्रकारेण वयोज्ञानं तु वा भवेत् ॥ १६६ ॥ करना

उसके बाद ८ वें वर्ष से दो - दो वर्ष के पश्चात् क्रम से दो - दो दांत काले पीले, श्वेत, रक्त तथा शंख वर्ण के हो जाते हैं । उसके बाद वे हिलने लगते हैं । और अन्त में गिर जाते हैं । और इसी प्रकार से ऊंटकी अवस्था का भी ज्ञान बैल किया जाता है । २३ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 439

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 439 का मूल पृष्ठ
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नः ॥ १६३ ॥ था । मुखाम ) में स्पष्ट समझनी उसकी चाहिये । और आयु हीन हुई नः ॥ १६४ ॥

- ॥ १६५ ॥

TI बजाता हो, पीठ से सवार को गिरा सांप की तरह श्रीम भड़कने वाला हो वह वयुक्त तिलक हो वह

है ।

ताः || १६६ ॥

व । थे वर्ष तक में सम्पूर्ण दांत गिर कर पुनः ॥ १६७ ॥

वर्ष में उसके समीप कर पुनः उत्पन्न हो ॥ १६८ ॥

॥ १६६ ॥

दो - दो दांत का द वे हिलने लगते हैं । वस्था का भी ज्ञान चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम्

प्रेरकाऽऽकर्षकमुखोऽङ्कुशो गजविनि ।

हस्तिपकै जस्तेन विनेयः सुगमाय हि ॥

अंकुश के लक्षण – गज को दमन करने के लिये अंकुश प्रेरणा करने के लिये नुकीला तथा उसी के साथ लगा स्वरूप ३५३ १७० || ( गजबाक ) का हुआ खींचने के. छिये का हुआ बनाना चाहिये । और इसी के द्वारा मार कर फीलवान अच्छी तरह से चलने की शिक्षा हाथी को दे ।

खलीनस्योर्ध्वखण्डौ द्वौ पार्श्वगौ द्वादशाङ्गुलौ ।

तत्पावन्तर्गताभ्यां तु सुदृढाभ्यां तथैव च ॥ १७१ ॥

बारका कर्षखण्डाभ्यां रज्ज्वर्थवलयैर्युतौ ।

एवंविधखलीनेन वशीकुर्यात्तु वाजिनम् ॥ १७२ ॥

घोड़ों की लगाम का वर्णन - लगाम के ऊपर दो खण्ड होते हैं जो लोहे के बने होते हैं और मुख के दोनों पार्श्व तक होते हैं एवं १२ अंगुल के होते हैं । उन्हीं पाश्र्व के अन्तर्गत अत्यन्त दृढ़ निवारण एवं आकर्षण ( खींचने ) के लिये दो खण्ड होते हैं एवं उनमें रज्जु ( डोरी ) बांधने के लिये कड़े. बने रहते हैं जिन्हें आवश्यकतानुसार सवार हाथ में लिये हुये खींचता रहता है । इस प्रकार के लगाम से घोड़े को अपने वश में करना चाहिये ।

नासिकाकर्षरवा तु वृषोष्ट्रं विनयेद् भृशम् ।

तीक्ष्णाप्रियः सप्तफालः स्यादेषां मलशोधने ॥ १७३ ॥

बैल व ऊँट को वश में करने का उपाय तथा उनके मल - शोधनार्थं दंताली का वर्णन - और नासिका में खींचने के लिये लगी हुई रस्सी से बैल तथा ऊँट को अपने वश में करना चाहिये । और इन सर्वो के मल ( लीद - गोबर आदि ) हटाने के लिये जो कुदारी होती है उसका अग्रभाग तीच्ण होता है तथा सात. फाल का होता है ।

सुताडनैर्विनेया हि मनुष्याः पशवः सदा ।

सैनिकास्तु विशेषेण न ते वै धनदण्डतः ॥ १७४ ॥

मनुष्य और पशुओं का ताडन द्वारा वश में करने का एवं सैनिकों को धन-दण्ड से दण्डित न करने का निर्देश - मनुष्य और पशु इनको सदा भलीभांति ताड़ना देकर ठीक रास्ते पर लाना चाहिये । और सैनिकों को तो विशेष रूप से ताडन का दण्ड देना चाहिये । उन्हें धन - दंड से दण्डित नहीं: करना चाहिये ।

अनूपे तु वृषाश्वानां गजोष्ट्राणां तु जाङ्गले ।

साधारणे पदातीनां निवेशाद्रक्षणं भवेत् ॥ १७५ ॥ २

बैल आदिकों के निवास का सुरक्षित स्थल - अनूप ( जलप्राय ) देश में २३ शु ० CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 440 का मूल पृष्ठ
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* ३५४ शुक्रनीति: लों तथा घोड़ों को, जाङ्गल देश में हाथियों तथा ऊँटों को ( स्थान ) में पैदल सैनिकों को रखने से उन्हें विशेष एवं साधारण देश शतं शतं योजनान्ते सैन्यं आराम मिलता है । यह श राष्ट्रे नियोजयेत् । कदापि राज्य में सौ - सौ योजन पर सेना रखने का निर्देश -राष्ट्र के अन्दर २ सौ ( १००-१०० ) योजन पर सैनिकों की एक टुकड़ी सेना रखनी एक चाहिये । गजोष्ट्रवृषभाश्वाः प्राक् श्रेष्ठाः सम्भारवाहने ५ १७६ ॥ स सर्वेभ्यः शकटाः श्रेष्ठा वर्षाकालं विना स्मृताः । पराक्रम बोल ले चलनेवालों का तारतम्य - प्रथम हाथी, बैल तथा घोड़े युद्ध. से युक्त सामग्री ढोने के लिये श्रेष्ट होते हैं । और वर्षा काल को छोड़कर शेष सम मैं सामग्री ढोने के लिये सबों से श्रेष्ठ बैलगाड़ी ही मानी जाती है 1 न चाल्पसाधनो गच्छेदपि जेतुमरिं लघुम् ॥ १७७ ॥

में शत्रु महताऽत्यन्तसाद्यस्कबलेनैव सुबुद्धियुक् । भी पुर राजा को छोटे भी शत्रु पर अल्प साधन से गमन करने का निषेध – छोटे शत्रु को भी जीतने के लिये थोड़ी सेना के साथ राजा कभी न जावे बुद्धि रखनेवाला राजा तो अत्यन्त नवीन भर्ती किये हुये सैनिकों

सेना के द्वारा ही उन्हें जीतने के लिये चढ़ाई करता है ।

अशिक्षितमसारं च सादभ्यस्कं तूलवच्च तत् ॥ १७८ ॥

युद्धं विनाऽन्यकार्येषु योजयेन्मतिमान् सदा । युद्ध से भिन्न कार्यों में अयोग्य सैनिकों को नियुक्ति का निर्देश -राजा अशिक्षित, असार ( विशेष श्रेष्ठ नहीं ), नवीन भर्ती की हुई की भांति अत्यन्त लघु ( तुच्छ ) मानी जाती है, अतः उसे युद्ध के

• अन्य कार्यों में आवश्यकता पड़ने पर नियुक्त करना चाहिये ।

विकर्तुं यततेऽल्पोऽपि प्राप्ते प्राणात्ययेऽनिशम् ॥ १७ ९

न पुनः किन्तु बलवान् विकार करणक्षमः । संग्राम में अधिक सेना की आवश्यकता का निर्देश- प्राण - संकट होने पर क्षुद्र बल - सम्पन्न सेना विपरीत आचरण करने के लिये सदा । सुन्दर की बड़ी करने स प्रवास से श बुद्धिमान सकती सेवा रुई अतिरिक्त स ॥ हो जा सेना क उपस्थित सेना म उद्यत हो कर कर जाती है किन्तु बलवानों की सेना विपरीत आचरण करने के लिये नहीं समर्थ होती है । अपि बहुबलोऽशूरो न स्थातुं क्षमते रणे ॥ १८० ॥ र

सेना म किमल्पसाधनोऽशूरः स्थातुं शक्तोऽरिणा समम् । सैन्य शीघ्र म जब कि बहुत बल से सम्पन्न होता हुआ भी पराक्रमहीन राजा या लड़ाई के मदान में नहीं ठहर सकता है तब अल्प बल - सम्पन पराक्रमहीन CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri