शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 441–450
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 441–450
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एवं साधारण म मिलता देश है । - राष्ट्र के अन्दर ना रखनी एक
चाहिये ।
५१७६ ॥
।ः । बैल तथा घोड़े युद्ध-छोड़कर शेष समय
है ।
- ॥ १७७ ॥
का निषेध - छोटे कभी न जावे । सुन्दर ये सैनिकों की बड़ी ॥ १७६ ॥
II का निर्देश - बुद्धिमशन की हुई सेवा सं युद्ध के अतिरिक ाम् ॥ १७ ९ ॥ प्राण - संकट उपस्थित लिये सदा उद्यत हो के लिये नहीं समर्थ ॥ १८० ॥
जमम् । या सैन बहीन राजा - सम्पद्म पराक्रमद्दीन चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३५५ के साथ युद्ध में ठहरने के लिये क्या समर्थ हो सकता है अर्थात् वह शत्रु
कदापि नहीं ।
सुसिद्धाल्पबन्तः शूरो विजेतुं क्षमते रिपुम् ॥ १८१ ॥
महान् सुसिद्धबलयुक् शूरः किन्न विजेष्यति । सन्नद्ध सेना का माहात्म्य - जब सुन्दर शिक्षित थोड़ी भी सेना से युक्त पराक्रमी राजा शत्रु को जीतने में समर्थ होता है, तब सुन्दर शिक्षित बड़ी सेना
से युक्त होकर वह क्या नहीं जीत सकेगा अर्थात् अवश्य जीतेगा ।
मौला शिक्षितसारेण गच्छेद्राजा रणे रिपुम् ॥ १८२ ॥
प्राणात्ययेऽपि मौलं न स्वामिनं त्यक्तुमिच्छति । मौल सेना की प्रशंसा - राजा पुरानी शिक्षितों में श्रेष्ठ सेना के साथ युद्ध में शत्रु के सम्मुख लड़ने के लिये जावे, क्योंकि प्राण - संकट उपस्थित होने पर
भी पुरानी खास सेना कभी स्वामी का साथ नहीं छोड़ना चाहती है ।
वाग्दण्डपरुषेणैव भृतिहासेन भीतितः ॥ १८३ ॥
नित्यं प्रवासायासाभ्यां भेदोऽवश्यं प्रजायते । सेना में अवश्य भेद होने के कारण -सदा वाणी या दण्ड की कठोरता करने से, किंवा तनखाह कम कर देने से, या अधिक भय दिलाने से, एवं निरन्तर प्रवास ( परदेश ) में भेजते रहने से, तथा अधिक परिश्रम का कार्य कराते रहने से शत्रुओं द्वारा सेना में भेद अवश्य डाला जा सकता है अर्थात् फोड़ ली जा
सकती है अतः उक्त व्यवहार से बचना चाहिये ।
बलं यस्य तु सम्भिन्नं मनागपि जयः कुतः ॥ १८४ ॥
शत्रोः स्वस्यापि सेनाया अतो भेदं विचिन्तयेत् । सेना का भेद होने से अनिष्ट फल- जिसकी सेना में यदि थोड़ा भी भेद हो जाय तो उसे कहां से जय मिल सकता है । इससे अपनी तथा शत्रु की सेना के सम्बन्ध में भेद का विशेष ख्याल रक्खें, अर्थात् जिस प्रकार से शत्रु-सेना में भेद हो सके किन्तु अपनी सेना में न हो वैसा व्यवहार खूब विचार
कर करना चाहिये ।
यथा हि शत्रु सेनायाः भेदोऽवश्यं भवेत्तथा ॥ १८५ ॥
कौटिल्येन प्रदानेन द्राक् कुर्यान्नृपतिः सदा । राजा को शत्रु सेना में भेद अवश्य डालने का निर्देश - जिस प्रकार से शत्रु-सेना में भेद अवश्य पड़ जाय, वैसा कूटनीति से तथा धनादि देकर राजा को
शीघ्र मेद का प्रबन्ध सदा करते रहना चाहिये ।
सेवयाऽत्यन्तप्रबलं नत्या ' चारिं प्रसाधयेत् ॥ १८६ ॥
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३५६ शुक्रनीति: प्रबलं मानदानाभ्यां युद्धे तथा । मैया जयेत् समबलं भेदैः सर्वान् वशे नयेत् ॥ १८५ भाला शत्रुओं को साधने का प्रकार — अत्यन्त प्रबल ॥ पहला प्रदर्शन के द्वारा, साधारण प्रबल को दान ( द्रव्य देकर शत्रु को तथा सेवा तथा नम्रता-द्वारा और हीन बलवाले शत्रु का युद्ध के द्वारा, समान बलवाले सम्मान प्रदर्शन द्वारा एवं भेद के द्वारा सभी प्रकार के शत्रुओं को को मित्रता के म बनाना चाहिये । अपने अनुकूल राजा हों वह
शत्रुसंसाधनोपायो नान्यः सुबलभेदतः ।
तावत् परो नीतिमान् स्याद्यावत् सुबलवान् स्वयम् ॥ १८८ ॥
मित्रं तावच्च भवति पुष्टाग्नेः पवनो यथा । शत्रुओं को जीतने का भेद से अन्य उपाय न होने का निर्देश – सुशिक्षित धारा ( सेना में भेद डालने से बढ़ कर कोई दूसरा साधन शत्रु को अनुकूल बनाने नये २ ( जीतने ) का नहीं है । जब तक स्वयं राजा शिक्षित सेना से बलवान बना रहता है तब तक वह श्रेष्ठ नीतिमान माना जाता है । और तभी तक उसके सभी मित्र न बने रहते हैं । जैसे लोक में जब तक अग्नि ईंधन से परिपुष्ट रहती है तभी ( तोप तक वायु उसका मित्र बनकर बढ़ानेवाला बना रहता है । ईंधन से हीन होने.
पर बुझानेवाला हो जाता है ।
त्यक्तं रिपुबलं धार्यं न समूहसमीपतः ॥ १८६ ॥
पृथनियोजयेत् प्राग्वा युद्धार्थ कल्पयेच तत् । शत्रु की त्यागी हुई सेना को अपनी सेना में रखने का प्रकार निर्देश-शत्रु के द्वारा निकाली हुई या फोड़ ली गई शत्रु - सेना को अपनी सामूहिक ल सेना के समीप न रखकर पृथक् रखनी चाहिये । और युद्ध के समय अपनी तरफ सेना के अग्रभाग पर लड़ने के लिये नियुक्त करना चाहिये । हो, औ मैत्र्यमारात् पृष्ठभागे पार्श्वयोर्वा बलं न्यसेत् ॥ १६० ॥ बिन्दु
मित्र की सेना को अपनी सेना में रखने का प्रकार - निर्देश – और मिश्रठा आव - च रखनेवाली सेना को अपने समीप, पृष्ठ या पार्श्व भाग चाहिये ।
अस्यते क्षिप्यते यत्तु मन्त्रयन्त्राग्निभिश्च तत् ।
अस्त्रं तदन्यतः शस्त्रमसिकुन्तादिकं च यत् ॥
अखं तु द्विविधं ज्ञेयं नालिकं मान्त्रिकं तथा । में युद्धार्थ रखी मूल हुये हो अग्निच १ ९९ ॥ साथ ल इसे पैद अग्नि के द्वारा अस्त्र और शस्त्र के लक्षण और भेद - मन्त्र एवं यन्त्र तथा और जो फेंका जाता है । उसे ' अस्त्र ' कहते हैं । और इनसे अन्य तलवार CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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त् ॥ १५७ ॥
सेवा तथा नम्रता-तथा सम्मान प्रदर्शन लवाले को मित्रता के को अपने अनुकू स्वयम् ॥ १८८ ॥
निर्देश - सुशिक्षित को अनुकूल बनाने बलवान बना रहता तक उसके सभी मिश्र रिपुष्ट रहती है तभी ईंधन से हीन होने. = ॥ १६६ ॥
त् । का प्रकार - निर्देश-वो अपनी सामूहिक के समय अपनी ॥ १६० ॥
निर्देश - और मित्रता नाग में युद्धार्थ रखी त् ॥ १ ९ १ ॥ II अग्नि के द्वारा तथा और अन्य तलवार चतुर्थाध्याये सेनानिरूपण प्रकरणम् ३५७ आदि को ' शस्त्र ' कहते हैं । और अब दो प्रकार के होते हैं । उनमें से
भाला नालिक ( बन्दूक तोप ), दूसरा मान्त्रिक ।
पहला यदा तु मान्त्रिकं नास्ति नालिकं तत्र धारयेत् ॥ १६२ ॥
सह शस्त्रेण नृपतिर्विजयार्थं तु सर्वदा । मान्त्रिक अस्त्र के अभाव में नालिक अस्त्र का प्रयोग करने का निर्देश-विजय प्राप्ति के लिये सदा अस्त्र के साथ २ जहाँ पर मान्त्रिक अन न हों
राजा वहां पर नालिक अस्त्र सेना में रक्खे ।
लघुदीर्घाकारधाराभेदैः शस्त्रास्त्रनामकम् ॥ १ ९ ३ ॥
प्रथयन्ति नवं भिन्नं व्यवहाराय तद्विदः । tara के विद्वान लोग व्यवहार के लिये लघु तथा दीर्घ आकारों के धारा ( प्रयोग करने की रीति विशेष ) भेद से शस्त्र तथा अस्त्रों के नामों में
ये २ भेद प्रकाशित करते हैं ।
नालिकं द्विविधं ज्ञेयं बृहत्क्षुद्रविभेदतः ॥ १ ९ ४ ॥
नाक के २ प्रकारों का निर्देश - नालिक ( बन्दूक आदि ) अस्त्र - बृहत् ( तोप ) तथा क्षुद्र ( बन्दूक ) भेद से २ प्रकार का होता है । तिर्यगूर्च्चच्छिद्रमूलं नालं पञ्चवितस्तिकम् मूलाग्रयोर्लक्ष्यभेदि तिलबिन्दुयुतं सदा यन्त्राघाताग्निकृद् ग्रावचूर्णधृक्कर्णमूलकम् सुकाष्ठोपाङ्गनं च मध्याङ्गुलबिलान्तरम् स्वान्तेऽग्निचूर्णसंधातृशलाकासंयुतं दृढम् लघुनालिकमप्येतत् प्रधार्य पत्तिसादिभिः लघुनालिका ( बन्दूक ) के लक्षण - जिसमें नाल ऐसी तरफ से तिरछा ऊपर की ओर तक छिद्र हो और वह हो, और जिसके मूल तथा अग्रभाग में लचय को भेद करने | ॥ १ ९ ५ ॥
।
॥ १६६ ॥
| ॥ १६७ ॥
हो जिसमें मूल की ५ बालिश्त लम्बी में सहायक तिल-बिन्दु सदा लगे हों । यन्त्र द्वारा आघात होने पर अग्नि पैदा करनेवाले -प्रा - चूर्ण ( बारूद ) जिसके मूल के कर्ण भाग में भरे हुये हों । और जिसका मूल भाग, जो पकड़ने के लिये होता है, उसके अङ्ग - पाङ्ग सुन्दर काष्ठ के बने हुये हों । एवं नाल का छिद्र एक अंगुल चौड़ा हो । और जिसके भीतर अग्निचूर्ण ( बारूद ) भरा जाता हो और उसे भरने की शलाका भी जिसके साथ लगी हुई हो और जो दृढ़ हो, इसे लघु नालिक ( बन्दूक ) कहते हैं । इसे पैदल तथा घुड़सवार सैनिकों को रखना चाहिये ।
यथा यथा तु व्वक्सारं यथा स्थूलबिलान्तरम् ।
यथा दीर्घं बृहद्गोलं दूरभेदि तथा तथा ॥ १६८ ॥
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३५८ शुक्रनीति: मूलकीलभ्रमाल्लक्ष्यसमसंघाना । बृहन्नालिकसंज्ञं तत् काष्ठबुधनविनिर्मितम् ॥ १०६ ॥ न
प्रवाह्यं शकटाद्यैस्तु सुयुक्तं विजयप्रदम् । या अम बृहजालिक ( तोप ) के लक्षण - जैसे २ नाल की चार मोटी हो और किया जैसे २ छिद्र की चौड़ाई अधिक हो, जैसे २ नाल की लम्बाई जैसे २ गोले का आकार बड़ा हो, वैसे २ बृहद् नालिक ( तोप अधिक हो एवं लचय भेदन करनेवाली होती है 1 । और जिसके मूल भाग में लगी ) दूर तक को घुमाने से वह लक्ष्य के अनुरूप गोले को फेंकनेवाली होती हुई कील है । उसका मूल भाग काष्ठ का बना हुआ होता है । और बैलगाड़ी आदि से ही उसे ढोया जा सकता है 1 । यदि इसका उचित रीति से प्रयोग किया जाय तो देनेवाला होता है । सुवचिलवणात्पञ्चपलानि गन्धकात् पलम्
अन्तर्धूमविपक्कार्कस्नुह्याद्यङ्गारतः पलम् ।
शुद्धात संग्राह्य संचूर्ण्य संमील्य प्रपुटेद्रसैः ॥
स्नुर्काणां रसोनस्य शोषयेदातपेन च । पिष्ट्वा शर्करवच्चैतदग्निचूर्णं भवेत् भलु विजय मैनसि ॥ २०० ॥ नीली
मिलाक २०१ ॥ जलने ॥ २०२ ॥ II
अग्निचूर्ण ( बारूद ) बनाने का प्रकार - सोरा ५ पल ( २० तो ० ), में गोली गन्धक १ पल ( ४ तो ० ), आक तथा सेहुंड़ आदि के अन्तर्धूम द्वारा बड़े आगे ब हुये विशुद्ध कोयले १ पल लेकर सर्वो का चूर्ण एकत्र कर पुनः आक, सेहुंब तथा लहसुन के रस का पुट देकर धूप में सुखाकर चूर्ण करके रख ले । यही शर्करा ( बालू ) की भांति तैयार हुई वस्तु ' अग्निचूर्णं ' ( बारूद ) कहलाती है । सुवर्चिलवणाद्भागाः षड् वा चत्वार एव वा । नालास्त्रार्थाग्नि चूर्णे तु गन्धाङ्गारौ तु पूर्ववत् || २०३ || प अथवा नालास्त्र ( बन्दूक आदि ) के लिये जो बारूद बनाई जाती है के दण्ड उसमें सोरा ६ या ४ पल दे सकते हैं शेष गन्धक और अङ्गार ( कोयला ) मूल में पूर्ववत् डाल सकते हैं । आग ल गोलो लोहमयो गर्भगुटिकः केवलोऽपि वा । चला दे सीसस्य लघुनालार्थे ह्यन्यधातुभवोऽपि वा ॥ २०४ ॥
गोला बनाने का प्रकार - तोप का गोला लोहे का या उसके अम्बुर छोटी २ गोलियाँ भरी रहती हैं, दोनों प्रकार का होता है I । और बन्दूक के बा लिये सीसे की या धन्य धातु की बनी हुई बड़ी गोलियां या छर्रे होते हैं । का बन
लोहसारमयं वापि नालाखं त्वन्यधातुजम् ।
नित्यसम्मार्जनस्वच्छमस्त्रपातिभिरावृतम् ॥ २०५ ॥
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॥ १३६ ॥
। हर मोटी हो और बाई अधिक हो पूर्व ( तोप ) दूर तक में लगी हुई कील होती है । उसका आदि से ही उसे किया जाय तो विनय ॥ २०० ॥
॥ २०१ ॥
1 ॥ २०२ ॥
पल ( २० तो ० ) अन्तर्धूम द्वारा ज पुनः आक, सेहंद करके रख ले । यही
रूद ) कहलाती है ॥। २०३ ॥
द बनाई जाती है अङ्गार ( कोयला ) ॥ २०४ ॥
या उसके अन्दर है । और बन्दूक के
छरें होते हैं ॥। २०५ ॥
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३५६ नाकि की व्यवस्था का निर्देश – तोप या बन्दूक फौलाद ( उत्तम लौह ) अन्य धातु के बनाये जाते हैं । और उन्हें नित्य झाड़ -किया या जाता है तथा उसके पास चलानेवाले रहा करते हैं ।
अङ्गारस्यैव गन्धस्य सुत्रचिलवणस्य च ।
शिलाया हरितालस्य तथा सीसमलस्य च ॥
हिङ्गुलस्य तथा कान्तरजसः कर्पूरस्य च ।
जतोर्नी ल्याश्च सरलनिर्यासस्य तथैव च ॥
समन्यूनाधिकैरंशैरग्निचूर्णान्यनेकशः पोंछकर स्वच्छ २०६ ॥ २०७ ॥ कल्पयन्ति च तद्विदचाश्चन्द्रिका भादिमन्ति च ॥ २०८ ॥
बारूद बनाने के दूसरे अनेक प्रकारों का निर्देश — कोयला, गन्धक, सोरा, मैनसिल, हरताल, सीसा का किट, हिङ्गुल, कान्तिसार लौह, कपूर, लाख, नीली ( राल ), देवदारु का गोंद इन सर्वो के सम, न्यून और अधिक भाग-मिलाकर बनाने से नाना प्रकार की बारूद बनानेवाले बनाते हैं जिसमें से जलने पर चांदनी की भांति प्रकाश निकलता है । क्षिपन्ति चाग्निसंयोगाद् गोलं लते सुनालगम् । तोप के गोले को लक्ष्य पर फेंकने की रीति — चलानेवाले वन्दुक आदि में गोली - बारूद भरने के बाद आग लगाकर लक्ष्य पर छोड़ते हैं जिसकी विधि आगे बताई जा रही है | नाला शोधयेदादौ दद्यात्तत्राग्निचूर्णकम् ॥ २० ९ ॥
निवेशयेत्तद्दण्डेन नालमूले यथा दृढम् ।
ततः सुगोलकं दद्यात् ततः कर्णेऽग्निचूर्णकम् ॥ २१० ॥
कर्णचूर्णाग्निदानेन गोलं लक्ष्ये निपातयेत् । पहले बन्दूक या तोप को साफ करके उसमें बारूद डालकर लौह आदि के दण्ड से खूब ठूंस २ कर भर देवे उसके बाद इढ़ गोला या गोली नाल के. मूल में रख देवे तदनन्तर उसके पार्श्व के छिद्र में बारूद भरकर उसमें आग लगा देने के बाद उसके सहारे से गोला या गोली को
चला देवे ।
लक्ष्यभेदी यथा बाणो धनुर्ज्याविनियोजितः ॥
भवेत् तथा तु संघाय द्विहस्तश्च शिलीमुखः । बाण का लक्षण - धनुष की डोरी पर ऐसा निशाना रक्खे कि वह चलाने पर लय को भेद सके । और बाण का बनावे | लक्ष्य साध कर २१ ९ ॥ साध कर बाण दो हाथ प्रमाणः अष्टात्रा पृथुबुना तु गदा हृदयसम्मिता ॥ २१२ ॥
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३६० शुक्रनीति: पट्टिशः स्वसमो हस्तबुध्नश्वोभयतोमुखः गदा व पट्टिश के लक्षण - आठ पहलवाली, मूल में के बराबर ऊंची, दृढ़ दण्डीवाली ' गदा ' बनानी चाहिये । लम्बा तथा दोनों तरफ जिसके सुख हो एवं जो बीच में जाय ऐसा ' पट्टिश ' शस्त्र होता है । क विस्तारे चतुरङ्गुलः क्षुरप्रान्तो नाभिसमो दृढमुष्टिः सुचन्द्ररुक् खङ्गः प्रासश्चर्तुहस्तदण्ड बुघ्नः क्षुराननः दशहस्तमितः कुन्तः फालामः शङ्कुबुध्नकः । मोटी और और अपने हृदय य से बराबर उपयुक्त हाथ से पकड़ा ( चढ़ाई || २१३ || रहना । करना ॥ २१४ ॥ करने क
को भी । खड्ग - प्रासि और कुन्त ( भाला ) के लक्षण – कुछ टेढ़ा, एक तरक धारवाला, ४ अंगुल चौड़ा, छुरा के समान तोचण प्रान्त भागवाला, नामि · तक ऊंचा, डढ़ मूंडवाला एवं चन्द्रमा के समान स्वच्छ चमकनेवाला ऐसा यु ' खड्ग ' होता है । ४ हाथ लम्बे दण्ड के अग्रभाग में छुरे के समान तीचण सुख- कहते होकर हैं वाला ' प्रास ' नामक शस्त्र होता है । और जो १० हाथ लम्बे दण्ड के अग्रभाग में तीक्ष्ण फल से युक्त होता है और उस फल के मूल में कील लगी हुई होती है, ऐसा ' कुन्त ' ( भाला ) होता है । य चक्रं षड्ढस्तपरिधि क्षुरप्रान्तं सुनाभियुक् ॥ २१५ ॥ ' दैविक '
त्रिहस्तदण्डत्रिशिखो लौहरज्जुः सुपाशकः । एवं शत्र चक्र और पाश के लक्षण - जिसके घेरे की लम्बाई ६ हाथ की हो और चक्र की भांति गोलाकार होते हुये प्रान्त भाग छुरे के समान तीचण हो एवं बीच में जिसकी नाभि सुन्दर दृढ़ बनी हुई हो उसे ' चक्र ' ३ हाथ लम्बा दण्ड लगा हो और उसमें ३ शिखायें ( छोर
' तारों से बनी हों ऐसा ' पाश ' नामक शस्त्र होता है ।
गोधूम सम्मितस्थूलपत्रं लोहमयं दृढम् ॥
कवचं सशिरस्त्राणमूर्ध्वकाय विशोभनम् । कवच और टोप के लक्षण- - गेहूँ बराबर मोटे लोह के खने हुये शरीर के रक्षार्थं आवरण- विशेष ' कवच कहते हैं शिर को सुशोभित एवं सुरक्षित रखने का एक टोप भी लौह -तीक्ष्णानं करजं श्रेष्ठं लौहसारमयं दृढम् ॥ कहते हैं । जिसमें ) हों जो छोह के एक के २१६ ॥ छड़ पत्तरों द्वारा चहूगुण और इसके साथ का वि
पत्रों का होता है ।
२१७ ॥
करज के लक्षण -पक्के उत्तम लोह के बने हुये, दृढ़ एवं नख के समाव का य सम सीचग नुकीले शस्त्र को ' करज ' ( बघनख ) कहते हैं । समय
सुपुष्टसम्भारस्तथा षड्गुणमन्त्रवित् ।
बहुत्रसंयुतो राजा योद्धुमिच्छेत् स एव हि ॥ २ ९ ८ ॥
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मोटी और और अपने से हाथ बराबर से पकड़ा ८ ॥ २१३ ॥
॥। २१४ ॥ । टेढ़ा, एक तरफ भागवाला, नामि चमकनेवाला ऐसा समान तीचण सुख • दण्ड के अग्रभाग में = लगी हुई होती है, ॥ २१५ ॥
हाथ की हो और मान तीचण हो एवं कहते हैं । जिसमें ८ ) हों जो लोह के ॥ २१६ ॥
पत्तरों द्वारा और इसके साथ पत्रों का होता है ॥। २१७ ॥ एवं नख के समान ॥ २१८ ॥
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपण प्रकरणम् ३६१ अन्यथा दुःखमाप्नोति स्वराज्याद् भ्रश्यतेऽपि च । की इच्छा करने योग्य राजा का लक्षण - जो राजा युद्ध के लिये युद्ध सामग्रियों से परिपूर्ण और समयानुसार सन्धि, विग्रह ( युद्ध ), याम. उपयुक्त करना ), आसन ( अपने स्थान पर रहकर युद्ध के लिये तयार ( चढ़ाई ) द्वेध ( शत्रु के गोल में फूट डाल देना ) इन छः गुण एवं मन्त्रणा करना रहना इनका , जानकार, एवं बहुत से अस्त्र - शस्त्रादिकों से युक्त हो वही युद्ध करने की इच्छा रखे अन्यथा युद्ध करने पर वह दुःख पाता है और अपने राज्य
को भी खो बैठता है ।
आबिभ्रतोः शत्रुभावमुभयोः संयतात्मनोः ॥ २१६ ॥
अत्राद्यैः स्वार्थसिद्धयर्थं व्यापारो युद्धमुच्यते । युद्ध का सामान्य लक्षण - परस्पर शत्रुभाव रखते हुये निश्चल चित्त होकर दो व्यक्तियों का अस्त्रादिकों के द्वारा जो व्यापार होता है, उसे ' युद्ध '
कहते हैं ।
मन्त्राखैर्देविकं युद्धं नालाद्यत्रैस्तथाऽऽसुरम् ॥ २२० ॥
शत्रुबाहुसमुत्थं तु मानवं युद्धमीरितम् । युद्ध के भेद और लक्षण - मन्त्र के द्वारा अखों का प्रयोग जिसमें हो उसे ' दैविक ' युद्ध तथा तोप - बन्दूक आदि अस्त्रों के द्वारा प्रवृत्त युद्ध को ' भासुर ' एवं शस्त्र ( खड्गादि ) तथा बाहु द्वारा प्रवृत्त युद्ध को ' मानव एकस्य बहुभिः सार्धं बहूनां बहुभिव वा ॥ एकस्यैकेन वा द्वाभ्यां द्वयोर्वा तद्भवेत् खलु । और वह युद्ध एक का बहुतों के साथ, बहुतों का बहुतों
एक के साथ अथवा दो का दो के साथ होता है ।
कालं देशं शत्रुबलं दृष्ट्वा स्वीयबलं ततः ॥
उपायान् षड्गुणं मन्त्रं भवेच्च युद्धकामुकः ।
कहते हैं ।
२२१ ॥
के साथ, एक का २२२ ॥ काल, देश, शत्रु का तथा अपना बल, उपाय ( साम, दान, भेद, दण्ड ), सद्गुण ( सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैध, आश्रय ) और मन्त्र इन सब
का विचार करके ही युद्ध में प्रवृत्त होना चाहिये ।
शरद्धेमन्त शिशिर कालो युद्धेषु चोत्तमः ॥ २२३ ॥
वसन्तो मध्यमो ज्ञेयोऽघमो ग्रीष्मः स्मृतः सदा । युद्ध के लिये काल- विचार - युद्ध के लिये शरद, हेमन्त तथा शिशिर ऋतु का समय उत्तम होता है । वसन्त का मध्यम और ग्रीष्म का सदा अधम
समय होता है ।
वर्षासु न प्रशंसन्ति युद्धं साम स्मृतं तदा ॥ २२४ ॥
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३६२ शुक्रनीति: वर्षाकाल में युद्ध करना उचित नहीं होता है, उस साम ( किसी प्रकार की सन्धि ) रखना ही उचित होता है युद्धसम्भारसम्पन्नो यदाधिकबलो मनोत्साही सुशकुनोत्पाती नृपः । जिस समय राजा युद्ध की सामग्री से कालस्तदा पूर्ण संपन्न शुभः हो और मनमें युद्ध का उत्साह हो तथा अच्छे होने से समय । शत्रु के साथ युद्ध अंश हीन || २२५ ॥ की हुई अधिक बलशाली समय युद्ध करना शुभ फल देनेवाला होता है । शकुन दिखाई पड़ते हो उस और कार्येऽत्यावश्यके प्राप्ते कालो नो चेद्यदा शुभः । संतुष्ट की निधाय हृदि विश्वेशं गेहे भक्त्याऽन्वियात्तदा ॥ २२६ युद्ध कर यदि आवश्यक कार्यवश युद्ध करना अनिवार्य हो जाय ॥ शुभ फलप्रद समय उपस्थित न हो तो गृह में भक्तिपूर्वक और उस समय भगवान का हृदय में ध्यान धरकर युद्ध के लिये सन्नद्ध हो जाय । मन् न कालनियमस्तत्र गोत्रीविप्रविनाशने | परस्पर गौ, स्त्री और ब्राह्मण का विनाश यदि उपस्थित हो जाय तो उनके रचार्थ ' सन्धि ', युद्ध करने में किसी प्रकार के काल का नियम नहीं । अर्थात् उपरि लिखित चढ़ाई क नियमानुसार तत्काल युद्ध में प्रवृत्त हो जाय । के साथ यस्मिन् देशे यथाकालं सैन्यव्यायामभूमयः का आश्र ॥ २२७ ॥ टुकड़ी
परस्य विपरीताश्च स्मृतो देशः स उत्तमः । युद्ध के लिये उत्तम देश का लक्षण -जिस स्थान पर समयानुसार सैनिकों कहलाते को कवायद कराने के लिये योग्य भूमि हो और शत्रु के लिये विपरीत पढ़े तो वही स्थान युद्ध करने के लिये चुनना उत्तम होता है । सि आत्मनश्च परेषां च तुल्यव्यायामभूमयः ॥ २२८ ॥ भाव को
यत्र मध्यम उद्दिष्टो देशः शास्त्रविचिन्तकैः । मध्यम युद्ध - देश के लक्षण -- और जहां पर अपनी तथा शत्रु दोनों की सेनाओं के लिये कवायद करने योग्य भूमि हो उसे युद्ध शास्त्र के पण्डितों से चि मध्यम भूमि कही है । बनाया अरातिसैन्यव्यायामसुपर्याप्त महीतलः ॥ २२ ९ ॥ विचार आत्मनो विपरीतश्च स वै देशोऽधमः स्मृतः । अधम युद्ध - देश के लक्षण - जहां पर शत्रु की सेना के लिये कवायद करने योग्य पर्याप्त भूमि हो पर अपनी सेना के लिये विपरीत हो तो वह के या नाश देश युद्ध के लिये ' अधम ' कही गई है । रक्षा तथ स्वसैन्यात्तु तृतीयांशहीनं शत्रु ॥ २३० ॥
अशिक्षितमसारं वा साद्यस्कं स्वजयाय वै । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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है समय शत्रु के साथ । 1 : ॥ २२५ ॥
से अधिक बलशाली खाई पड़ते हो उस
शुभः ।
हा ॥ २२६ ॥
नाय और उस समय भगवान का हृदय 1 तो उनके रचार्थ नर्थात् उपरि लिखित ॥ २२७ ॥
1 समयानुसार सैनिकों लिये विपरीत पढ़े ॥ २२५ ॥
तथा शत्रु दोनों की त्र के पण्डितों ने ॥ २२ ९ ॥ के लिये कवायद विपरीत हो तो वह । २३० ॥ चतुर्थाध्याये सेना निरूपणप्रकरणम् ३६३ के लिये सेना का विचार — यदि अपनी सेना से हंख्या में तृतीय युद्ध अंश हीन शत्रु की सेना हो सो भी वह अशिक्षित, असार वा तरकाल में भर्ती
की हुई हो तो वहां पर युद्ध करने से अपना जय निश्चित होता है ।
पुत्रवत् पालितं यत्तु दानमानविवर्द्धितम् ॥ २३१ ॥
युद्धसम्भारसम्पन्नं स्वसैन्यं विजयप्रदम् । और यदि अपनी सेना पुत्र की भांति पाली हुई हो, तथा दान - मान से. संतुष्ट की हुई हो एवं युद्धोपयोगी सभी सामग्रियों से भरपूर हो तो उसे लेकर * करने से विजय निश्चित होता है । युद्ध सन्धि च विग्रहं यानमासनं च समाश्रयम् ॥ २३२ ॥ ·
द्वैधीभावं च संविद्यान्मन्त्रस्यैतांस्तु षड्गुणान् । मन्त्र के षड्गुणों के नामों का निर्देश – १. युद्धादिकाल उपस्थित होने पर परस्पर हाथी घोड़े आदि देकर सहायता आदि करने के नियम में बंध जाने को ‘ सम्धि ’, २. विरुद्ध आचरण द्वारा बैर भाव रखने को विग्रह, ३. शत्रु पर चढ़ाई करने को ' यान ', ४. शत्रु की उपेक्षा करके अपने स्थान पर युद्ध - सामग्री के साथ स्थित रहने को ' आसन ', ५. किसी से पीड़ित होने पर किसी प्रबल-का आश्रय लेने को ' समाश्रय ' ६. स्वार्थ सिद्धि के लिये सेना को टुकड़ी-टुकड़ी में रखने को ' द्वैधीभाव ' कहते हैं । और ये ही ६ मन्त्र के ' षड्गुण '
कहलाते हैं ।
याभिः क्रियाभिर्बलवान् मित्रतां याति वैरिषु ॥ २३३ ।
सा क्रिया सन्धिरित्युक्ता विमृशेत् तां तु यत्नतः । सन्धि के लक्षण - जिस क्रिया के द्वारा बलवान शत्रु निश्चित मित्रता
भाव को प्राप्त करे उसे ' सन्धि ' कहते हैं, इसका यश्नपूर्वक ख्याल रक्खे ।
विकर्षितः सन् वाऽधीनो भवेच्छत्रुस्तु येन वै । २३४ ॥
कर्मणा विग्रहस्तं तु चिन्तयेन्मन्त्रिभिर्नृपः । विग्रह के लक्षण -- जिस क्रिया से शत्रु पीड़ित किया जाय या अधीन बनाया जाय उसे ' विग्रह ' कहते हैं । राजा इसे मन्त्रियों के साथ खूब
विचार कर करे ।
शत्रुनाशार्थगमनं यानं स्वाभीष्टसिद्धये ॥ २३५ ॥
स्वरक्षणं शत्रुनाशो भवेत् स्थानात्तदासनम् । यान तथा आसन के लक्षण - अपनी अभीष्ट सिद्धि के लिये किसी शत्रु के नाशार्थं चढ़ाई करने को ' यान ' कहते हैं । जहां पर पड़े रहने से अपनी
रक्षा तथा शत्रु का नाश हो सके वहां पड़े रहने को ' आसन ' कहते हैं ।
यैर्गुप्तो बलबान् भूयाद् दुर्बलोऽपि सः आश्रयः ॥ २३६ ॥
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३६४ शुक्रनीति: द्वैधीभावः स्वसैन्यानां स्थापनं गुल्मगुल्मयोः आश्रय व द्वैधीभाव के लक्षण — जिसके । सबल हो जाय, ऐसे प्रवल किसी राजा का आश्रय द्वारा लेने रचित होकर पुर्यक -गुल्म- गुल्म ( टुकड़ी २ ) रूप में विभाजित करके अपनी को ' आश्रय ' कहते हैं श्री ' द्वैधीभाव ' कहते हैं । सेना रखने । सम को कांटा से बलीयसाभियुक्तस्तु आपन्नः नृपोऽनन्यप्रतिक्रियः ॥ २३७ ॥ उसी प्रक
सन्धिमन्विच्छेत् कुर्वाणः कालयापनम् | नही पछ सन्धि करने योग्य पुरुषों का निर्देश - अत्यन्त बलवान से मेल किये जाने पर कोई प्रतीकार का उपाय न होने से आपत्ति द्वारा आक्रमण ह। अच्छे समय की प्रतीक्षा करता हुआ उसले सन्धि कर ले | में पड़ा हुआ राजा सकता एक ' एवोपहारस्तु सन्धिरेष मतो हितः ॥ २३८ ॥
उपहारस्य भेदास्तु सर्वे ये मैत्रवर्जिताः । अति उपहार रूप सन्धि की सर्वश्रेष्ठता का निर्देश - उस समय केवल पर या न ( भेट ) देकर ' सन्धि ' करना ही हितकर होता है । मित्रता उपहार में दो ज भी सन्धि के प्रकार हैं वे सभी इस उपहार को छोड़कर जितने के ही भेद माने जाते हैं । अर्थात्
-इससे बढ़कर सन्धि के दूसरे प्रकार श्रेष्ठ नहीं हैं ।
अभियोक्ता बलीयस्त्वादलब्ध्वा न निवर्तते ॥ २३ ९
उपहारादृते यस्मात् सन्धिरन्यो न विदयते । आक्रमणकारी अत्यन्त बलवान होने से बिना भेंट पाये युद्ध नहीं होता है । अतः उपहार को छोड़कर अन्य कोई दूसरा सन्धि
नहीं है ।
शत्रोर्बलानुसारेण उपहारं प्रकल्पयेत् ॥ २४० ॥
सेवां वाऽपि च स्वीकुर्याद्दद्यात् कन्यां भुवं धनम् । यदि ॥ तो उनमें सुबह क से निवृत का उपाय बल नहीं मि के विपरी शत्रु के बलानुसार उपहार की कल्पना के भेद - शत्रु के बलानुसार उपहार की कल्पना की जाती है । जिसमें उसकी सेवा स्वीकार करनी पड़ती है किंषा अपनी कन्या, पृथ्वी ( राज्य का कुछ अंश ) या धन उपहार में देवा जो पड़ता है । फिर उस स्वसामन्तांश्च सन्धीयान् मन्त्रेणान्यजयाय वै ॥ २४१ ॥ विपरीत
सन्धिः कार्योऽप्यनार्येण सम्प्राप्योत्सादयेद्धि सः । कभी वि पार्श्ववर्ती अनार्थ राजा से भी सन्धि करने का निर्देश - शत्रु को जीतने - के लिये मन्त्रणा के द्वारा अपने पास के सामन्तों के साथ सन्धि कर ले । और सन्धि तो अनार्य ( ग्लेच्छ आदि ) के साथ भी कर लेनी चाहिये, क्योंकि विज्ञ सन्धि न करने पर समय पाकर नुकसान पहुँचा सकता है । शत्रु का CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri