शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 471–480

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 471–480

पृष्ठ 471

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३६१ ॥ - बालक श्री या चाहिये बल्कि तीन करता चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८५ मवासीनः शतानीकः सेनाकार्य विचिन्तयन् ॥ ३६७ ॥

सदैव व्युह सङ्केत वाद्यशब्दान्तवर्तिनः ।

सचरेयुः सैनिकाश्च राजराष्ट्रहितैषिणः ॥ ३६८ ॥

भेदितां शत्रुणा दृष्ट्वा स्वसेनां घातयेच्च ताम् । सेनापति के नित्य कृत्यों का निर्देश - जो सैकड़ों सेना का स्वामी हो वह, हुआ राजा किसी उच्च आसन पर बैठ कर अपनी सेना के कार्यों को सोच ३६२ ॥ रहे । और सदैव व्यूह के संकेतानुसार बाज के बजने के अन्दर रहकर कार्य करते हुये, राजा तथा राष्ट्र के हित चाहनेवाले सैनिक युद्ध में इधर - उधर यम केवल धर्म- संचार करते रहें । तथा राजा शत्रु के द्वारा यदि अपनी सेना को फुटी हुई

को नष्ट करने ( खिलाफ ) समझे तो उले नष्ट कर दे ।

प्रत्य कर्मणि कृते योधैर्दद्याद्धनं च तान् ॥ ३६ ९ ॥

३६३ ॥ पारितोष्यं वाधिकारं ' क्रमतोऽर्ह नृपः सदा । भारी कार्य करनेवाले को पारितोषिक देने का निर्देश— और राजा सैनिकों ने भी बलवान द्वारा कोई नवीन उत्तम पराक्रम कार्य किये जाने पर उनको योग्य पारितोषिक.

और कूटयुद्ध के रूप में धन - प्रदान तथा अधिकार की वृद्धि सदा कर देवे ।

देस्यका संहार जलान्नवृणसंरोधे शत्रून् संपीडय यत्नतः ॥ ३७० ॥

३६४ ॥ पुरस्ताद्विषमे देशे पश्चाद्धन्यात्तु वेगवान् । शत्रु को नष्ट करने का उपाय - प्रथम जल, अन्न तथा तृण आदि को ३६५ ॥ शन्नु - सेना के पास जाने से रोक कर यत्नपूर्वक पीड़ा पहुँचावे तत्पश्चात् विषम ( संकटपूर्ण ) स्थान में प्राप्त हुये शत्रु के ऊपर बड़े वेग से हमला करके उसे बदन होकर, मार से, नमस्कार व - प्रदर्शन करने • शत्रु के छिद्र वसर मिले तब की ३६६ ॥ शत्रु

डाले ।

कूटस्वर्णमहादानैर्भेदयित्वा द्विषद्बलम् ॥ ३७१ ॥

नित्यविभसं सुप्तं प्रजागरकृतश्रमम् ।

विलोभ्यापि परानीकमप्रमत्तो विनाशयेत् ॥ ३७२ ॥

शत्रु की सेना में भेद करने का प्रकार - शत्रु की सेना को बनावटी सोने राशि देकर फोड़ लेने ( मिला लेने ) के बाद अथवा शत्रु की सेना को निस्य के द्वारा भय की शङ्का न मानकर बेखबर सोई हुई अथवा ज्यादा जागते रहने से क्लान्त. हुई देखकर स्वयं बढ़ी सावधानी के साथ उसका विनाश को आरो कर देवे | पमानन करके तत्सहायबलं नैव व्यसनाप्तमपि कचित् । व्याल कार्य को नह विपत्ति में पड़ी हुई शत्रु की मिन्न - सेना की रक्षा करने का निर्देश -और शत्रु की सहायता करने के लिये आई हुई किसी मित्र - सेना को कहीं २५ शु ० CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 472

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३८६ शुक्रनीति: व्यसन में पड़ी हुई देखकर भी नष्ट न करे, बल्कि उसकी ओर मिला ले । रक्षा करके अपनी स्वसमीपतरं राज्यं नान्यस्माद् ग्राहयेत् कचित् राज्य के समीपवर्ती राज्य की रक्षा करने ॥ ३७३ ॥

अत्यन्त समीपवर्ती राज्य को किसी दूसरे के द्वारा का निर्देश और अपने उसकी रक्षा करके अपनी ओर मिला रहने दे । हड़प न करने दे, बल्कि मध्य तथा क्षणं युद्धाय सज्जेत क्षणं चापसरेत् पुनः । विचार कर अकस्मान्निपतेद् दूराद्दस्युत् प्रथम युवरा परितः सदा ॥ ३७४ ॥

क्षणभर में अचानक युद्ध के लिये उद्यत हो जाय फिर उणभर में बुद्ध से विरत हो जाय और पुनः दूर से एकाएक डाकुओं की भांति आकर चारों तरफ से धावा बोल दे! रूप्यं हेम च कुप्यं च यो यज्जयति तस्य तत् । तरपश्चा दद्यात् कार्यानुरूपं च हृष्टो योधान् प्रहर्षयन् ॥ ३७५ ॥ राजा से नि

और यदि कोई सैनिक कभी चांदी, सोना और इनके अतिरिक्त तांबा आदेश लिख आदि जो भी जीत कर लावे तो अन्य सैनिकों को प्रसन्न करता हुआ प्रसन्न आदेश बता चित्त से कार्यानुरूप उसी ( सैनिक ) को उक्त धन को देवे । उसको राज विजित्य च रिपूनेवं समादद्यात् करं तथा । राजा को स राज्यांशं वा सर्वराज्यं नन्दयीत ततः प्रजाः ॥ ३७६ ॥

शत्रु को जीतने पर शत्रु की प्रजा को प्रसन्न रखने का निर्देश - इस प्रकार से राजा शत्रु को जीत कर योग्यतानुसार उससे कर ( मालगुजारी ) ग्रहण ग्राम स करे । और कभी २ योग्यतानुसार शत्रु के राज्य का आधा अंश या संपूर्ण का निर्देश-राज्य का ही अपहरण कर ले फिर शत्रु की प्रजा को हर प्रकार से कोखे । प्रसन्न रक्खे | होना चाहिय तूर्यमङ्गलघोषेण स्वकीयं पुरमाविशेत् । तत्प्रजाः पुत्रवत् सर्वाः पालयीतात्मसात्कृताः ॥ ३७७ ॥ सैनिको

नियोजयेन्मन्त्रिगणमपरे मन्त्रचिन्तने । पृथक् दूकान विजित राज्य के मन्त्रिमण्डल को बदलने का निर्देश — उसके बाद तुरही किसी सेना आदि बाज मङ्गलमय घोष ( शब्द ) के साथ अपनी राजधानी में विजय से लौट कर पुनः प्रवेश करे । और अपने अधीन बना ली गई शत्रु की सारी प्रजा को पुत्र की भांति पालन करे । और वहां पर ( जीते हुये राज्य में ) १००० मन्त्रचिन्तन ( सलाह देने के लिये प्राचीन मन्त्रिमण्डल को हटाकर नया सैनिकों वाल मन्त्रिमण्डल की नियुक्ति कर देवे । पाने पर वह देशे काले च पात्रे च ह्यादिमध्यावसानतः ॥ ३७८ ॥ इतनी सेना

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पृष्ठ 473

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वा करके अपनी ॥ ३७३ ॥

- और अपने करने दे, बल्कि ३७४ ॥ भर में युद्ध से कर चारो तरफ चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८७

भवेन्मन्त्रफलं कीदृगुपायेन कथं त्विति ।

मन्त्र्याद्यधिकृतः कार्यं युवराजाय बोधयेत् ॥ ३७६ ॥

मन्त्री आदियों के कृत्यों का निर्देश — देश, काल तथा पात्र में एवं आदि, मध्य तथा अन्त में, किस उपाय से मन्त्र का कैसा फल होगा, इन सब के विचार करने के लिये नियुक्त मन्त्री आदि अधिकारी पुरुष किसी कार्य को प्रथम युवराज के समक्ष ले जाकर उपस्थित करें ।

पश्चाद्राज्ञे तु तैः साकं युवराजो निवेदयेत् ।

राजा संशासयेदादौ युवराजं ततस्तु सः ॥ ३८० ॥

युवराजो मन्त्रिगणान् राजात्रे तेऽधिकारिणः ।

सदसत् कर्म राजानं बोधयेद्धि पुरोहितः ॥ ३८१ ॥

तत्पश्चात् उन सर्वो को साथ में लेकर युवराज उसी कार्य के विषय में राजा से निवेदन करे । और राजा उस पर प्रथम युवराज के पास अपना ३७५ ॥ आदेश लिखकर भेजे, उसके बाद युवराज मन्त्रिगणों को उक्त राजा का अतिरिक्त तांबा आदेश बतावें । और उक्त सभी अधिकारी वर्ग जो कुछ भला या बुरा कार्य हो ता हुआ प्रसन्न उसको राजा के आगे उपस्थित होकर समझावें एवं पुरोहित भी इसी भांति राजा को समझावे ।

ग्रामाद्वहिः समीपे तु सैनिकान् धारयेत् सदा ।

३७६ ॥ ग्राम्यसैनिक यो स्यादुत्तमर्णाधमर्णता ॥ ३८२ ॥

शइस प्रकार ग्राम से बाहर समीप में सैनिकों के टिकाने का तथा उनके निषिद्ध कार्यों गुजारी ) ग्रहण का निर्देश - ग्राम ( वस्ती ) के बाहर किन्तु समीप में हो राजा सदा सैनिकों शया संपूर्ण को रक्खे । किन्तु ग्रामीण तथा सैनिकों का परस्पर लेन - देन का व्यवहार नहीं हर प्रकार से होना चाहिये ।

सैनिकार्थं तु पण्यानि सैन्ये सन्धारयेत् पृथक् ।

नैकत्र वासयेत् सैन्यं वत्सरं तु कदाचन ॥ ३८३ ॥

३७७ ॥ सैनिकों के लिये सेना की छावनी के शन्दर सामान खरीदने के लिये पृथक् दूकान लगवानी चाहिये । और एक ही स्थान पर सालभर तक कभी भी बाद तुरही किसी सेना को नहीं रहने देना चाहिये ।

बानी में विजय सेनासहस्रं सज्जं स्यात् क्षणात् संशासयेत्तथा ।

शत्रु की सारी संशासयेत् स्वनियमान् सैनिकानष्टमे दिने ॥ ३८४ ॥

हु राज्य में ) १००० सैनिकों को शिक्षा देने के नियमों का निर्देश - १००० एक हजार हटाकर नया सैनिकों बाली भी सेना को इस भांति से शिक्षा देनी चाहिये कि जिससे आदेश पाने पर वह एक क्षण में ही युद्ध के लिये अपने को सुसज्जित कर लें । अर्थात् ७६ ॥ इतनी सेना हर वक्त तैयार खड़ी रहें । और हर आठवें दिन ( सप्ताह ) भने CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 474

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३८५ शुक्रनीति: पर अथवा दिन के आठवें भाग में ( शाम को ४ बजे के उनके लिये नियत नियमों की शिक्षा देनी चाहिये । लगभग सैनिकों को ( अयनपर चण्डत्वमाततायित्वं राजकार्ये बिलम्बनम् | द्वारा लक्ष्य अनिष्टोपेक्षणं राज्ञः स्वधर्म परिवर्जनम् ॥ ३६५ ॥

त्यजन्तु सैनिका नित्यं संल्लापमपि वाऽपरैः । नृपाज्ञया विना ग्रामं न विशेयुः कदाचन ॥ ३८६ ॥ प्रात: -सैनिकों के लिये त्याज्य कर्म - जैसे अत्यन्त कोप प्रातः सैनि

का कार्य करना, राज - कार्य करने में देरी करना, राजा करना के अनिष्ट , आततायीपन जाति, आ उपेक्षा करना, अपने धर्म का त्याग करना, और दूसरों के साथ बातचीत होने की करना, इन सर्वो को सैनिक नित्य ही छोड़ दिया करें । और बिना राजा की और आज्ञा के कभी भी किसी ग्राम के अन्दर प्रवेश न करें । ( मासिक स्वाधिकारिगणस्यापि ह्यपराधं दिशन्तु नः । प्रमाण ) मित्रभावेन वर्तध्वं स्वामिकृत्ये सदाऽखिलैः ॥ ३८७ ॥

सैनिकों के लिये कर्त्तव्य कर्म - और अपने २ अधिकारी गण द्वारा किये गये अपराधों को मुझ ( राजा ) से कहें । स्वामी ( राजा ) के किसी कार्य के भृत्यो उपस्थित होने पर उसे सब लोग मित्र भाव से परस्पर मिलकर किया करें ।

सूज्ज्वलानि च रक्षन्तु शस्त्रास्त्रवसनानि च ।

अन्नं जलं प्रस्थमात्रं पात्रं बह्नन्नसाधकम् ॥ ३८८ ॥

और अपने २ शस्त्र, अस्त्र तथा पानों को खूब साफ रक्खें, एवं अपने अन्न तथा जल एक - एक प्रस्थ ( सेर २ ) भर और अन्न पकाने का पात्र रक्खें, जिसमें प्रस्थ भर से अधिक अन्न पकाया जा सके ।

शासनादन्यथाचारान् विनेष्यामि यमालयम् ।

भेदायिता रिपुधनं गृहीत्वा दर्शयन्तु माम् ॥ ३८ ९ ॥

नौकरों के सदा लिखे हुये रसीद दे द पास शिक्षि बढ़ा हो चुके हो के अभ्यास चाहिये । आज्ञा के विरुद्ध आचरण करने पर दण्ड देने का निर्देश - मेरी इस शत्रु आज्ञाओं के विरुद्ध आचरण करनेवालों को मैं यमपुरी पहुँचा दूंगा ( सार सेना बुराई डालूंगा ) । और जो शत्रु से धन लेकर मुझसे फूट कर उससे मिल गये है । उन सैनिकों को पकड़ लाकर मुझे दिखायें, मैं उन्हें मृत्यु दण्ड दूंगा । सैनिकैरभ्यसेन्नित्यं व्यूहाद्यनुकृतिं नृपः । तथाऽयनेऽयने लक्ष्यमत्रपातैर्विभेदयेत् ॥ ३ ९ ० ॥ मार सैनिकों के साथ प्रतिदिन व्यूहों का अभ्यास करने का निर्देश- नाग असद्गुणों करावे, तथा प्रत्येक हैं एवं कौन प्रतिदिन सैनिकों द्वारा व्यूह - रचना करने का अभ्यास CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 475

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) सैनिकों को ३६५ ॥ ३८६ ॥ , आततायीपन अनिष्ट होने की साथ बातचीत बिना राजा की ३६७ ॥ बाणों द्वारा किये किसी कार्य के मिलकर सदा ३८८ ॥ एवं अपने पास का पात्र बड़ा चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८६ अयनपर ( ६-६ महीने पर अथवा प्रत्येक मार्ग से बाणादि अस्त्र प्रहार द्वारा लक्ष्य का भेदन ( चाँद मारी ) करावे ।

सायं प्रातः सैनिकानां कुर्यात सङ्गणनं नृपः ।

जात्याकृतित्रयोदेशग्रामवासान् विमृश्य च ॥ ३६१ ॥

प्रातः सायं सैनिकों की गणना करने का निर्देश - राजा प्रतिदिन सायं-प्रातः सैनिकों की गणना भली भाँति करे, जिसमें साथ २ प्रत्येक सैनिकों की जाति, आकार, अवस्था, देश तथा ग्राम में निवास का पूर्ण विचार भी हो । कालं भृत्यवधिं देयं दत्तं भृत्यस्य लेखयेत् । और नौकरी की सीमा रूप काल ( नौकरी कब प्रारम्भ की ), देय ( मासिक या वार्षिक वेतन पाने का प्रमाण ), दत्त ( दिया हुआ वेतन का

प्रमाण ) इन सबों को विचार कर लिख ले ।

कति दत्तं हि भृत्येभ्यो वेतनं पारितोषिकम् ॥ ३ ९ २ ॥

तत्प्राप्तिपनं गृह्णीयाद् दद्याद् वेतनपत्रकम् । भृत्यों के प्राप्ति - पत्र को ग्रहण कर वेतन - पत्र देने का निर्देश - और नौकरों के लिये कितनी तनखाह या इनाम दिया गया है, इसको पाने के लिये लिखे हुये अन्नापत्र को लेकर उसको वेतन या पारितोषिक चुकताकर देने की

रसीद दे देवें ।

सैनिकाः शिक्षिता ये ये तेषु पूर्णा भृतिः स्मृता ॥ ३ ९ ३ ॥

व्यूहाभ्यासे नियुक्ता ये तेष्वर्धा भृतिमावहेत् । शिक्षित सैनिकों को पूर्ण वेतन देने का निर्देश- जो २ सैनिक शिक्षित हो चुके हों उनको पूरा वेतन देना चाहिये । और जो अभी व्यूह ( कवायद ) के अभ्यास करने में लगे हुये ( सीख रहे ) हैं उनको आधा वेतन देना ३५ ९ ॥ नर्देश- मेरी इम दूंगा ( मार मिल गये हों,

दूंगा ।

३ ९ ० ॥

चाहिये ।

असत्कर्त्ताश्रितं सैन्यं नाशयेच्छयोगतः ॥ ३ ९ ४ ॥

शत्रु से मिलकर सेना को नष्ट करने का निर्देश – शत्रु से मिलकर जो सेना बुराई कर रही है, उसे नष्ट कर दे ।

नृपस्यासद्गुणरताः के गुणद्वेषिणो नराः ।

असद्गुणोदासीनाः के हन्यात्तान् विसृशन्नृपः ॥ ३ ९ ५ ॥

सुखासक्तांस्त्यजेद् भृत्यान् गुणिनोपि नृपः सदा । मार डालने या स्याज्य नौकरों के लक्षण- - नौकरों में कौन राजा के निर्देश- राजा असद्गुणों में प्रवृत्ति रखने वाले हैं और कौन उनके सद्गुणों से द्वेष रखनेवाले वे, तथा प्रत्येक हैं एवं कौन राजा के असद्गुणों में प्रवृत्ति रखने पर उपेक्षा रखते हैं, इन सब CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 476

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३ ९ ० शुक्रनीति: का भली प्रकार से विचार करके उन सर्वो को राजा मार डाले । और सदा सुख भोगने में आसक्त रहनेवाले ऐसे गुणवान राजा निकाल देवें ( न रखे ) नौकरों को मी सुस्वान्तलोकविश्वस्ता योज्यास्त्वन्तःपुरादिषु ॥ ३ ९ ६ ॥ अथवा धार्याः सुस्वान्तविश्वस्ता घनादिव्ययकर्मणि । का च अन्तःपुरादिक में रखने योग्य भृत्य के लक्षण - अच्छे अन्तःकरणवाले राज्य ३२ वां भाग एवं लोक में विश्वास करने योग्य पुरुषों को रनिवास ( महल ) आदि में परं ऐसे ही लोगों को धनादि के व्यय कार्य ( खजाञ्ची के कार्य ) में नौकर रखें । " छीनकर तथा हि लोकविश्वस्तो बाह्यकृत्ये नियुज्यते ॥ ३६७ ॥

अन्यथा योजितास्ते तु परिवादाय केवलम् । और लोक में विश्वास के पान जो हों उन्हें ही राजकार्य में नियुक्त करे । शत्रु - सं इससे अन्यथा ( अविश्वासी ) पुरुष नियुक्त किये जाने पर वे केवल निन्दा सूद तबतक करानेवाले होते हैं । ( उनसे कार्य नहीं हो पाता है ) । हो जाय, उ शत्रुसम्बन्धिनो ये ये भिन्ना मन्त्रिगणादयः ॥ ३६८ ॥

नृपदुर्गुणतो नित्यं हृतमाना गुणाधिकाः । स्वकार्यसाधका ये तु सुभृत्या पोषयेच्च तान् || ३६६ | सदाचा अच्छी वेतन देकर पालने योग्य भृत्यों के लक्षण – शत्रुसंबन्धी जो जो अपनी महत्त मन्त्रिगण आदि फोद लिये गये हों या शत्रु राजा के दुर्गुणों से अधिक गुणवान ! तो प्रथम उस होते हुये भी जिनके संमान छीन लिये गये हों किन्तु अपने कार्य को सिद्ध करने लगे त करनेवाले हों तो ऐसे लोगों को अच्छी वेतन देकर राजा को पालन - पोषण करना चाहिये ।

लोभेनासेवनाद्भिन्नास्तेष्वर्धा भृतिमावहेत् ।

शत्रुत्यक्तान् सुगुणिनः सुभृत्या पालयेन्नृपः ॥ ४०० ॥

शत्रु के भृत्यों के वेतन का विचार — जो लोभ के वशीभूत होकर कार्य को उपेक्षा भाव से करते हैं ऐसे शत्रु के फोड़ लिये गये दृश्यों को आधा दे । और शत्रु से निकाले गये सुन्दर गुणवान पुरुषों को अच्छा देकर राजा पालन करे ।

परराष्ट्रे हृते दद्याद् भृतिं भिन्नावधिं तथा ।

दद्यादर्धा तस्य पुत्रे स्त्रियै पादमितां किल ॥ ४०१ ॥

पहरेदार अहोरात्र ( सेवा- नियुक्ति करे बेतन वेतन पहरेदार अपने २ भाग पहरा देंवे राज्य व्युत किये राजा के पुत्रादि की व्यवस्था का निर्देश- यदि किसी करें । अर्थात राजा का राज्य छीन ले तो उसे बिना किसी काल की सीमा निश्चित किये ही जागीर आदि जीविकार्थ दे दें । और उसके पुत्र के लिये आधा तथा स्त्री के लिये राजा का चतुर्थांश वृत्ति निश्चित कर दें । इसी प्र CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 477

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३६१ और राजा

करों हृतराज्यस्य पुत्रादौ सद्गुणे पादसंमितम् ।

को भी दद्याद्वा तद्राज्यतस्तु द्वात्रिंशांशं प्रकल्पयेत् ॥ ४०२ ॥

३ ९ अथवा यदि पराजित राजा का पुन्नादि सद्गुण संपन्न हों तो हृत ६ ॥ का चतुर्थांश वृत्ति में देना उचित है किन्तु यदि पुत्र निर्गुण हो तो अन्तःकरणवाडे राज्य ३२ वां भाग हृतराज्य से निकाल कर दे । आदि में एवं

नौकर रखें ।

६७ ॥

में नियुक्त करे । केवल निन्दा सूद हृतराज्यस्य निचितं कोशं भोगार्थमाहरेत् ।

छीनकर ले लिये गये राज्य के खजाने को अपने भोग के लिये ले लेवे ।

कौसीदं वा तद्धनस्य पूर्वोक्ता प्रकल्पयेत् ॥ ४०३ ॥

तद्धनं द्विगुणं यावन्न तदूर्ध्वं कदाचन । शत्रु- संचित धन की व्यवस्था का निर्देश- -अथवा खजाने के आधे धन का तबतक देता रहे विजित राजा को, जब तक लिये हुये धन से द्विगुणन

हो जाय, उसके बाद कभी नहीं दे ।

३६८ ॥ स्वमहन्त्वद्योतनार्थं हृतराज्यान् प्रधारयेत् ॥ ४०४ ॥

प्राङ्मानैर्यदि सद्वृत्तान् दुर्वृत्तांस्तु प्रपीडयेत् । ६ & || सदाचारी शत्रु का पालन और असदाचारी को कष्ट पहुँचाने का निर्देश-बंबन्धी जो जो अपनी महत्ता दिखाने के लिये विजित राजा यदि अच्छा व्यवहार करती हो अधिक गुणवान तो प्रथम उसके साथ संमान- पूर्ण व्यवहार करे किन्तु जब वह बुरा व्यवहार

कार्य को सिद्ध करने लगे तो उसको हर तरह से कष्ट पहुँचावे ।

पालन - पोषण अष्टधा दशधा वापि कुर्याद् द्वादशधापि वा ॥ ४०५ ॥

यामिकार्थमहोरात्रं यामिकान् वीक्ष्य नान्यथा । पहरेदारों की व्यवस्था - पहरेदारों की संख्या देखकर तदनुसार उनके लिये अहोरात्र ( १ दिन रात ) के ८, १० या १२ भाग करके उस पर उनकी

न ०० होकर ॥ सेवा. नियुक्ति करे, इससे अन्यथा न करे ।

यों को वेतन आदौ प्रकल्पितानंशान् भजेयुर्यामिकास्तथा ॥ ४०६ ॥

अच्छा वेतन आद्यः पुनस्त्वन्तिमांशं स्वपूर्वांशं ततोऽपरे । पहरेदार लोग प्रारम्भ में नियत किये हुये समय विभाग के अनुसार अपने २ भाग पर पहरा दें । और इस भांति से दें कि पहले भाग पर जो ०१ ॥ पहरा दें वे हो अन्तिम भाग पर भी दें और अपने पूर्व अंश को अन्य पूर्ण

यदि किसी करें । अर्थात् इस तरह से पहरे का क्रम हो कि किसी को क्लेश न हो ।

श्चित किये हीलिये पुनर्वा योजयेत्तद्वदाद्येऽन्त्यं चान्तिमे ततः ॥ ४०७ ॥

यात्री के स्वपूर्वांशं द्वितीयेऽह्नि द्वितीयादिक्रमागतम् । इसी प्रकार से प्रथम तथा अन्त के भाग का निश्चय करके पहरे का क्रम CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 478

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३६२ शुक्रनीति: बदल देवे । दूसरे दिन वह अपने पूर्वभाग पर पहरा देवे भाग पर पहरा देता था और जो पूर्वभाग पर पहरेदार था और जो अन्तिम होते हैं, पर पहरा देने लगे । वह अन्तिम भाग ग्रहण करन चतुभ्यैस्त्वधिकान् नित्यं यामिकान् योजयेद्दिने दिनों तक युगपद्योजयेद् दृष्ट्वा बहून् वा कार्यगौरवम् । ॥ ४०८ ॥

एक दिन में 8 से अधिक पहरेदारों को एक स्थान पर चाहिये, कार्य की गुरुता देखकर एक स्थान पर 8 से अधिक नियुक्त व करना शीघ्र भी पहरेदारों को एक साथ नियुक्त किया जा सकता है । तथा वचन चतुरूनान् यामिकांस्तु कदा नैव नियोजयेत् ॥ ४०६ ॥ तथा बन्धु

४ से कम पहरेदारों को कहीं भी कभी नहीं नियुक्त करना चाहिये । एवं राज्यन यद्रक्ष्यमुपदेश्यं यदादेश्यं यामिकाय तत् । तत्समक्षं हि सर्व स्याद्यामिकोऽपि च तत्तथा ॥ ४१० ॥ जैसे

जो कोई वस्तु रक्षा करने की हो या कोई बात किसी को समझानी यो कहनी हो तो उसके लिये पहरेदारों को आदेश दे देना चाहिये । क्योंकि सभी नहीं होते कार्य पहरेदारों के समक्ष ही होते हैं अतः वह भी उसके विषय में जानकर व्यवहार क वैसा ही करने की शिक्षा देगा । कीलकोष्ठे तु स्वर्णादि रक्षेन्नियमितावधि | क्योि स्वांशान्ते दर्शयेदन्ययामिकं तु यथार्थकम् ॥ ४११ ॥ अधिकार

नियमित कालतक सीकड़ - ताले लगे हुये कमरे में रखे हुए स्वर्ण आदि करने में की रक्षा पहरेदार करता रहे । अपना पहरा समाप्त होने पर रक्षणीय वस्तु को वजन की ( ताला बन्द है इत्यादि को ) ठीक २ दूसरे पहरेदार को दिखाकर पहरे का भार उसे देदे । क्षणे क्षणे यामिकानां कार्यं दूरात् सुबोधनम् | नीति क्षण २ पर पहरेदारों का यह कार्य है कि वे दूर से सर्वो को सावधान निर्देश -रहने का उपदेश दिया करे । निकालने सत्कृतान्नियमान् सर्वान् यदा सम्पालयेन्नृपः ॥ ४१२ ॥ उद्धार कर

हो सकता तदैव नृपतिः पूज्यो भवेत् सर्वेषु नान्यथा । राजा के पूज्य होने के कारणों का निर्देश- - राजा जब सुम्दर सभी नियमों का अच्छी तरह पालन करता है । तभी वह राजा संब लोगों में पूजनीय तेजो माना जाता है, अन्यथा नहीं । होने का यस्यास्ति नियतं कर्म नियतः सग्रहो यदि ॥। ४१३ ॥ तथा तेज नियतोऽसद्ग्रहत्यागो नृपत्वं सोऽश्नुते चिरम् । उसके चिरस्थायी राजा के लक्षण - जिस राजा के सभी कार्य नियत रूप से CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 479

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 479 का मूल पृष्ठ
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और जो अन्तिम अन्तिम भाग ॥ ४०५ ॥

नियुक्त करना भी पहरेदारों ४०६ ॥

चाहिये ।

४१० ॥

समझानी यो | क्योंकि सभी विषय में जानकर ३११ ॥ हुए स्वर्ण आदि णीय वस्तु को चाकर पहरे का को सावधान ४१२ ॥ सभी नियमों में पूजनीय -१३ ॥ नियत रूप से चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३ ९ ३ हैं, और अच्छे विषयों के ग्रहण करने में आदर तथा असहिषयों के होते ग्रहण करने में अनादर रखना नियत रूप से होता है, वही राजा बहुत

दिनों तक राजपद का भोग करता है ।

यस्यानिमितं कर्म साधुत्वं वचनं त्वपि ॥ ४१४ ॥

सदैव कुटिलः सख्युः स्वपदाद् द्राग् विनश्यति । शीघ्र पदभ्रष्ट होनेवाले राजा के लक्षण - जिसके सभी कार्य, साधुता तथा वचन अनियमित रहते हैं और जो कुटिल होता है वह अपने मित्रों तथा बन्धुओं एवं राजपद से शीघ्र भ्रष्ट हो जाता है अर्थात् बन्धुओं से विच्छेद

एवं राज्यनाश प्राप्त करता है ।

नापि व्याघ्रगजाः शक्ता मृगेन्द्र शासितुं यथा ॥ ४१५ ॥

न तथा मन्त्रिणः सर्वे नृपं स्वच्छन्दगामिनम् । जैसे व्याघ्र तथा गज आदि सिंह के ऊपर शासन करने के लिये समर्थ नहीं होते हैं, वैसे ही सभी मन्त्री आदि अधिकारी वर्ग स्वच्छन्द ( मनमानी ) यवहार करनेवाले राजा के ऊपर शासन करने के लिये समर्थ निभृताधिकृतास्तेन निःसारत्वं हि तेष्वतः ॥ गजो निबध्यते नैव तूलभारसहस्रकैः । क्योंकि वे मन्त्री आदि उस राजा से सभी तरह अधिकार पद पर आरूढ़ किये गये होते हैं अतः राजा के करने में निःसार ( शक्ति रहित ): रहते हैं । लोक में भी रूई वजन की पुइनियों से हाथी बाँधी जाती नहीं देखी जाती है 1 उद्धर्तु द्राग् गजः शक्तः पङ्कलग्नं गजं बली ॥ नीतिभ्रष्टनृपं त्वन्यनृप उद्धरणक्षमः । नीतिभ्रष्ट राजा को भी अदप राजा का उद्धार करने निर्देश - जैसे किसी दलदल में फंसी हुई हाथी को बलवान

नहीं होते हैं ।

४१६ ॥

से पालित तथा समक्ष वे शासन के भारी से भारी ४१७ ॥ में समर्थ होने का हाथी ही शीघ्र निकालने में समर्थ होती है, वैसे ही नीतिमार्ग से विचलित हुये राजा का उद्धार करने ( नीति पर लाने में उसी के समान कोई दूसरा राजा हो समर्थ

हो सकता है ।

बलवन्नृपभृत्येऽल्पेऽपि श्रीस्तेजो यथा भवेत् ॥ ४१८ ॥

न तथा हीननृपतौ तन्मन्त्रिष्वपि नो तथा । तेजोहीन राजा से बलवान् राजा के साधारण भृश्य का भी तेजस्वी होने का निर्देश - बलवान राजा के साधारण भृत्य में भी जैसी श्री ( शोभा ) तथा तेज होता है वैसी श्री तथा तेज न तो हीन ( साधारण ) राजा में और न उसके मन्त्री आदि में भी होती है । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 480 का मूल पृष्ठ
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३६४ शुक्रनीति: हि नृपतेर्बलवत्तरम् बहुसूत्रकृतो रज्जुः सिंहाद्याकर्षणक्षमः । ॥ ४१३ ॥ धार्मिक होन

राजा से बढ़कर बहुमत की महत्ता का निर्देश — बहुतों का ऐकमध्थ शिक् सर्वश्रेष्ठ होत ही राजा से भी अधिक बलवान होता है अर्थात् उसके आगे है क्योंकि बहुत लरों की बनी रस्सी सिंहादि को भी खींच राजा झुक जाता होती है । लाने में समर्थ मनु अ हीनराराज्यो रिपुभृत्यो न सैन्यं धारयेद् बहु ॥ ४२० ॥. निर्देश - रा

कोशवृद्धिं सदा कुर्यात् स्वपुत्राद्यभिवृद्धये । ( माना ), हीन - राज्य राजा के आचरणों का निर्देश - साधारण राज्यवाला पूर्व श्लोकों में भृत्यवाला क्षुद्र राजा अपने पास बहुत सेना न रक्खे, बल्कि वह सदा अपने दुर पुत्रादि का अभ्युदय होने के निमित्त कोशवृद्धि ( खजाने में द्रव्य जमा )

करता रहे ।

क्षुधया निद्रया सर्वमशनं शयनं शुभम् ॥ ४२१ ॥

भवेद्यथा तथा कुर्यादन्यथाऽऽशु दरिद्रकृत् ।

दिशाऽनया व्ययं कुर्यान्नृपो नित्यं न चान्यथा ॥ ४२२ ॥

धर्मनीतिविहीना ये दुर्बला अपि वै नृपाः ।

सुधर्मबलयुग् राज्ञा दण्डयास्ते चौरवत् सदा ॥ ४२३ ॥

शुक्रन सार का नि वहन करने शुक्रनी राजा के दरिद्र हो जाने के कारणों का निर्देश- - जब भूख लगे तब भोजन हुई नीति और जब नींद लगे तब शयन करना ये सब राजा के लिये शुभ फलप्रद होते. व्यवहार क हैं । अन्यथा भोजन - शयन से शीघ्र दरिद्रता आ जाती है । इस रीति से राजा को कुमति है व्यय करना चाहिये कि वह शीघ्र दरिद्र न हो जाय, अतः इससे अन्य रीति का आश्रय करना अनुचित है । जो धर्म तथा नीति से विहीन और दुर्बल राजा इति शुक्र हैं, उनको धर्म तथा वल से युक्त राजा सदा चोर की भांति दण्ड दे । सर्वधर्मावनान्नीचनृपोऽपि श्रेष्ठतामियात् । जो क उत्तमोऽपि नृपो धर्मनाशनान्नीचतामियात् || ४२४ || मन्दभाग्य धार्मिक नीच राजा को भी श्रेष्ठ होने का निर्देश- सम्पूर्ण राज - धर्मों की रक्षा ( पालन ) करते रहने से नीच ( क्षुद्र ) भी राजा श्रेष्ठता को प्राप्त हो जाता है और उद्यम भी राजा राजधर्मों की रक्षा न करने से नीचता को प्राप्त हो जाता है । धर्माधर्मप्रवृत्तौ तु नृप एव हि कारणम् । स हि श्रेष्ठतमो लोके नृपत्वं यः समाप्नुयात् ॥ ४२५ ॥ की

धर्म तथा अधर्म की प्रवृधि में राजा की ही कारणता का निर्देश- लोगों धर्म तथा अधर्म में प्रवृशि में होने में कारण राजा ही होता है अर्थात् राजा के CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri