शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 461–470
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 461–470
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।
नयाः ॥ २६८
॥
परस्पर किंवा अनबन हो सेनापति और अनवन हो जायउस
सर्वदा ।
|| २६६ ॥
के तथा अपने बीच गुणों में जो उचित व का हरण उपस्थित ॥ ३०० ॥
- स्त्री तथा ब्राह्मण के नाश उपस्थित होते 1 तो उसका देवगण ॥ ३०१ ॥
का निर्देश - प्रमा उत्तम किंवा हीनः करता हुआ उसके ॥ ३०२ ॥
मुख मोड़नेवाला जिस भांति से सर्व ३०३ ॥ चतुर्थाध्याये सेनानिरूपण प्रकरणम् II आपकाल में ब्राह्मण का क्षत्रिय धर्म करने का निर्देश - आपत्ति पड़ने पर ( जीविका का अभाव होने पर ) क्षत्रियोचित जीविका द्वारा जीवन धारण करते हुये ब्राह्मण का जीवित रहना भी लोक में उत्तम माना जाता है क्योंकि क्षत्रिय की उत्पत्ति ब्राह्मण से हुई है अतः ब्राह्मण के लिये उन्त्रिय कर्म करना
विरुद्ध नहीं है ।
अधर्मः क्षत्रियस्यैष यच्छय्यामरणं भवेत् ॥ ३०४ ॥
विसृजन् श्लेष्मपित्तानि कृपणं परिदेवयन् । शय्या पर पड़े २ क्षत्रिय को मरने का निषेध - क्षत्रिय के लिये तो यही अधर्म की बात है कि - शय्या पर पड़े २ कफ तथा पित्त को शरीर से अलग
करते २ और दीनों की भांति विलाप करते २ मर जाना ।
अविक्षतेन देहेन प्रलयं योऽधिगच्छति ॥ ३०५ ॥
क्षत्रियो नास्य तत् कर्म प्रशंसन्ति पुराविदः । उक्त प्रकार से बिना क्षत - विक्षत हुये शरीर से जो प्राण छोड़ता है उस
क्षत्रिय के इस कर्म की प्रशंसा इतिहासवेत्ता लोग नहीं करते हैं ।
न गेहे मरणं शस्तं क्षत्रियाणां विना रणात् ॥ ३०६ ॥
शौण्डीराणामशौण्डीरमधमं कृपणं च यत् । रण छोड़ कर घर में क्षत्रिय को मरने का निषेध - -रण को छोड़ कर घर में मरना क्षत्रियों के लिये अच्छा नहीं है । गर्वशाली चत्रियों के लिये उक्त प्रकार से दीन - हीन अवस्था में ( घर पर ) मरना उनके गर्व को नष्ट
करनेवाला और पापजनक होता है ।
कदनं कृत्वा ज्ञातिभिः परिवारितः ॥ ३०७ ॥
शस्त्रास्त्रैः सुविनिर्भिन्नः क्षत्रियो वधमहति । युद्ध में शत्रु को न मार सकने पर बन्धुओं के साथ युद्ध में लड़ते २ मर जाने से क्षत्रियों की परम कर्त्तव्यता का निर्देश - युद्ध में शत्रुओं को यदि न मार सका तो अपने ज्ञाति - वर्ग से युक्त होकर शस्त्रास्त्रों से क्षत - विक्षत होकर
वध को प्राप्त हो जाना चत्रियों के लिये उचित है ।
आहवेषु मिथोऽन्योऽन्यं जिघांसन्तो महीक्षितः ॥ ३०८ ॥
युध्यमानाः परं शक्त्या स्वर्ग यान्त्यपराङ्मुखाः । युद्ध में पीछे पैर न हटाने तथा लवकर मर जाने की प्रशंसा - जो चत्रिय राजा लोग युद्ध में परस्पर एक दूसरे पर घातक प्रहार करते हुये पूरी शक्ति से अन्त तक लड़ते हैं और पीछे पैर नहीं हटाते हुये मर जाते हैं वे सीधे स्वर्ग को
जाते हैं ।
भर्तुरर्थे च यः शूरो विक्रमेद्वाहिनीमुखे ॥ ३०६ ॥
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३७६ शुक्रनीति: भयान्न विनिवर्तेत तस्य स्वर्गो ह्यनन्तकः । स्वामी के निमित्त करने का फल – जो शूर - वीर स्वामी के लिये बिना ह के आगे रहकर लड़ता हुआ पराक्रम दिखलाता है और डरकर निमित्त सेना नाश करने य नहीं जाता है बल्कि वहीं मर जाता है, उसको अनन्तकाल लड़ाई से भाग मिलता है । तक स्व प आहवे निहतं शूरं न शोचेत कदाचन ॥ ३१० निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यः पूतो याति सुलोकताम् । ॥ युद्ध में वीरगति पाये हुये के लिये शोक करने का निषेध हुये शूर के लिये कभी शोक नहीं करना चाहिये । क्योंकि - युद्ध वह सब
- छूटकर पवित्र होने से सुन्दर लोक को चला जाता है ।
वराप्सरःसहस्राणि । शूरमायोधने हृतम् ॥ ३११ ॥
त्वरमाणाः प्रधावन्ति मम भर्ता भवेदिति । मरकर सूर्यम में मरे संन्यासी दूस पाप से I आतताय के लिये उद्यत युद्ध में शूरतापूर्वक मरने का फल - युद्ध में शूरता के साथ लड़कर मरे करनी चाहिय हुये योद्धा के तरफ उत्तम २ हजारों अप्सरायें तेजी से दौड़ पड़ती हैं और चाहती हैं कि यह हमारा ही प्रिय स्वामी बने दूसरी का नहीं । मुनिभिर्दीर्घतपसा प्राप्यते यत् पदं महत् ॥ ३१२ ॥ शत्रु द्वा
युद्धाभिमुखनिहतैः शूरैस्तद् द्रागवाप्यते । निरर्थकता क युद्ध में वीरगति पाने पर मुनिदुर्लभ लोक की सुगमता से प्राप्ति का निष्पाप, पति निर्देश - मुनि लोग दीर्घकाल तक भी तपस्या के द्वारा जिस बड़े पद ( लोक ) पूछना चाहिय को प्राप्त करते है, युद्ध में सम्मुख होकर लड़ने से मारे गये शूर - वीर लोग झ शीघ्रता से उसी ( पद ) को प्राप्त कर लेते हैं । व एतत्तपश्च पुण्यं च धर्मचैव सनातनः ॥ ३१३ । चित्र - वि चत्वार आश्रमास्तस्य यो युद्धे न पलायते । उपवनों में व जो युद्ध में नहीं भागता है, उसके लिये वही तप, पुण्य, सनातन धर्म होते हैं ।
तथा चारों आश्रमों के अनुकूल धर्माचरण करना होता है ।
न हि शौर्यात् परं किंचित् त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥ ३१४ ॥
शूरः सर्वं पालयति शूरे सर्वे प्रतिष्ठितम् | जनों की शूरता की प्रशंसा सर्वोत्तमता का निर्देश - शूरता से बढ़कर कोई वस्तु उत्तम निर्णय करने नहीं है, क्योंकि शूर व्यक्ति ही सब लोगों का पालन कर सकता है, और शूर करते हैं । में ही सब कुछ प्रतिष्ठित रहता है । C चराणामचरा अन्नमदंष्ट्रा दंष्ट्रिणामपि ॥ ३१५ ॥ ६
अपाणयः पाणिमतामन्नं शूरस्य कातराः । ग प्राणियों के अन्न का विचार -चर जीवों के लिये अचर ( स्थावर ) पदार्थ, ३ बड़े २ दाइवाले जीवों के लिये बिना दाढ़वाले जीव, हाथ - पैरवाले जीवों के CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३७७ लिये बिना हाथ का जीव और शूरों के लिये कायर पुरुष अन्न ( भक्षणीय या
निमित्त सेना नाश करने योग्य ) होते हैं ।
बाई से भाग द्वाविमौ पुरुषौ लोके सूर्यमण्डलभेदिनौ ॥ ३१६ ॥
तक स्वर्ग परिब्राड् योगयुक्तो यो रणे चाभिमुखं हतः । २० ॥ सूर्यमण्डल भेदन करनेवाले दो पुरुषों का निर्देश - संसार में दो ही पुरुष मरकर सूर्यमण्डल का भेदन करनेवाले कहे जाते हैं, एक योगसाधन - सम्पन्न
- युद्ध में मरे संभ्यासी दूसरा रण में संमुख लड़कर मरनेवाला शूर - वीर ।
सब पापों से आत्मानं गोपयेच्छक्तो वघेनाप्याततायिनः ॥ ३१७ ॥
सुविधाह्मणगुरोर्युद्धे श्रुतिनिदर्शनात् । १ ॥ · आततायी ब्राह्मण के गुरु को मारने का निर्देश - समर्थ पुरुष युद्ध में मारने के लिये उद्यत सुन्दर विद्वान ब्राह्मण तथा गुरु का भी वध करके अपनी रक्षा
लड़कर मरे करनी चाहिये क्योंकि ऐसा वेद का वचन मन्वादि स्मृतियों में मिलता है ।
दती हैं और आचार्या वै कारुणिकाः प्राज्ञाश्चापापदर्शिनः ॥ ३१८ ॥
नैते महाभये प्राप्ते सम्प्रष्टव्याः कथंचन । RII शत्रु द्वारा संकट आ पड़ने पर आचार्य धर्मशास्त्रियों द्वारा उपाय पूछने की निरर्थकता का निर्देश – शत्रु से महान भय उपस्थित होने पर जो दयालु, से प्राप्ति का निष्पाप, पण्डित और आचार्य हैं, इन सर्वो से प्रतीकार का उपाय कभी नहीं
पद ( लोक ) पूछना चाहिये । क्योंकि इनके द्वारा उचित उपाय बताना असम्भव है ।
-वीर छोग प्रासादेषु विचित्रेषु गोष्ठीषूपवनेषु च ॥ ३१६ ॥
कथा विचित्राः कुर्वाणाः पण्डितास्तत्र शोभना । ३ । चित्र - विचित्र बने हुये राजभवनों में तथा गोष्ठियों ( सभाओं ) में और उपवनों में बैठकर चिचित्र २ कथाओं का वर्णन करते हुये पण्डितगण सुशोभित
सनातन धर्म होते हैं ।
बहून्याश्चर्य रूपाणि कुर्वाणा जनसंसदि ॥ ३२० ॥
३१४ ॥ ईड्यास्ते चोपसन्धाने पण्डितास्तत्र शोभनाः । • जनों की सभा में बहुत से आश्चर्यजनक कार्यों को करते हुये और तत्व के वस्तु उत्तम निर्णय करने में प्रशंसित होनेवाले जो पण्डित हैं वे वहाँ पर शोभा प्राप्त
और शूर करते हैं ।
परेषां विवरज्ञाने मनुष्यचरितेषु च ॥ ३२१ ॥
॥ हस्त्यश्वरथचर्यासु खरोष्ट्राजाविकर्मणि ।
गोधनेषु प्रतोलीषु स्वयंवर मुखेषु च ॥ ३२२ ॥
चर ) पदार्थ, अन्नसंस्कारदोषेषु पण्डितास्तत्र शोभनाः । जीवों के शत्रुओं के छिद्र जानने में और मनुष्यों के चरित्र, हाथी, घोड़े और रथ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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३७८ शुक्रनीति: सम्बन्धी एवं गदहा, ऊँट, बकरा, भेड़ा के सम्बन्धी कार्यों को जानने गोधन, गली, स्वयंवर आदि तथा अन्न पकाने के सम्बन्धी जो पण्डित हैं, उनकी उन उन विषयों में शोभा होती है | बातों में पंडितों से राय लेनी चाहिये । पण्डितान् पृष्ठतः कृत्वा परेषां गुणवादिनः अरेश्चित्तगुणान् ज्ञात्वा न सैन्ये भङ्गशङ्कया विधीयतां तथा नीतिर्यथा वध्यो भवेत् परः G जिससे शत्रु मारा जा सके ऐसी नीति पर चलने का गुण की प्रशंसा करनेवाले पण्डितों को पीछे करके ( अर्थात् दोषों में, किंवा ज के जानने अतः में जीवन - र इन्हीं सब रक्षार्थी हो को ॥ ३२३ रहता है और ॥ | ॥ ३-४ ॥ निर्देश मित्रत - शत्रुओं के निर्देश - और उनकी बातों पर ध्यान न देकर के ) शत्रु के मनोभावों को समझकर और युद्ध में सेना जाता है, वह जायगी इसकी आशङ्का छोड़कर वैसी नीति से कार्य करना चाह उखड़ पात्र बना रह शत्रु मारा जा सके । आततायित्वमापन्नो ब्राह्मणः शूद्रवत् स्मृतः । 8 मित्र की नाततायिवघे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन ॥ ३२५ ॥ मित्र को आप
आततायी ब्राह्मण को शूद्रवत् जानकर मारने में दोषाभाव का निर्देश— लोक में अप आततायी के भाव को प्राप्त किया हुआ ब्राह्मण शूद्रवत् अतः वैसे आततायी ब्राह्मण के मारने में मारनेवाले को होता है । उद्यम्य शखमायान्तं भ्रूणमध्याततायिनम् । निहत्य भ्रूणहा न स्यादहत्त्वा भ्रूणहा भवेत् आततायी बालक को भी मारने में दोषाभाव का निर्देश शस्त्र को उठाकर आते हुये आततायी बालक को भी मारकर जा सकता है बल्कि उसे नहीं मारने से वह भ्रूणहत्या का जाता है ।
उद्यतेषुमथो दृष्ट्वा ब्राह्मणं क्षत्रबन्धुवत् ।
यो हन्यात् समरे क्रुद्धं युध्यन्तमपलायितम् ॥
ब्रह्महत्या न तस्य स्यादिति धर्मेषु निश्चयः । समझा जाता है । कोई दोष नहीं शरणाग शरण में रक्ष || ३२६ ॥ १४ इन्द्र के – मारने के लिये भ्रूणहा नहीं कहा पापभागी समझा दुराचार चारी क्षत्रिय भागी नहीं ह ३२७ || युद्ध में क्षत्रिय की भांति लड़ते हुये ब्राह्मण को मारने में दोषाभाव का जब च निर्देश — जो युद्ध में बाणादि लिए क्रुद्ध होकर क्षत्रिय की भांति युद्ध करते लगें तब भी हुये और पीठ न दिखाते हुये ( लड़ाई से सुख नहीं मोड़ते हुए ) ब्राह्मण को देख कर मार डालता है । तो उसे ब्रह्महत्या का पाप नहीं लगता है । यह धर्म-शास्त्रों में निर्णीत हो चुका है । उत्तम, से होने वाल अपसरति यो युद्धाज्जीवितार्थी नराधमः ॥ ३२८ ॥
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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३७६ नने में, किंवा जीवन्नेव मृतः सोऽपि भुङ्क्ते राष्ट्रकृतं त्वघम् । 1 के जाननेमें जीवन रक्षार्थं युद्ध से भाग जाने पर दोष का निर्देश – जो नराधम जीवन तः इन्हीं सब को रक्षार्थी होकर युद्ध से भाग जाता है वह जीता हुआ भी मृत्यु तुल्य हो
है और राज्य भर का किया हुआ सभी पाप अकेला भोगता है ।
२३ ॥ रहता मित्र वा स्वामिनं त्यक्त्वा निर्गच्छति रणाश्च यः ॥ ३२६ ॥
सोऽन्ते नरकमाप्नोति सजीवो निन्द्यतेऽखिलैः । --४ ॥ मित्र तथा स्वामी को छोड़ कर युद्धक्षेत्र से भाग आने पर दोष का श- शत्रुओं के निर्देश — और जो मित्र तथा स्वामी को छोड़कर लड़ाई से निवृत्त होकर भाग नकी बातों पर जाता है, वह जब तक जीवित रहता है तब तक सभी लोगों की निन्दा का
में सेना उखड़ पात्र बना रहता है तथा मरने पर नरक को प्राप्त होता है ।
चाहिये जिससे मित्रमापद्गतं दृष्ट्वा सहायं न करोति यः ॥ ३३० ॥
अकीर्ति लभते सोऽत्र मृतो नरकमृच्छति । मित्र की सहायता न करने से दोषभागी होने का निर्देश जो अपने २५ ॥ मित्र को आपत्ति में पड़ा हुआ देखकर भी सहायता नहीं करता है, वह इस का निर्देश- लोक मैं अपयश को प्राप्त करता है और मरने के बाद नरक को प्राप्त करता है । झा जाता है । विस्रम्भाच्छरणं प्राप्तं संत्यजति दुर्मतिः ॥ ३३१ ॥
ई दोष नहीं स याति नरके घोरे यावदिन्द्राश्चतुर्दश । शरणागत को लौटा देने में घोर नरक - प्राप्ति का निर्देश - विश्वास करके शरण में रक्षार्थ आये हुये को जो दुष्टबुद्धि वाला मनुष्य लौटा देता है, वह:
२६ ॥ १४ इन्द्र के बदलने तक घोर नरक में निवास करता है ।
रने के लिये सुदुर्वृत्तं या क्षत्रं नाशयेयुस्तु ब्राह्मणाः ॥ ३३२ ॥
दा नहीं कहा युद्धं कृत्वापि शस्त्रास्त्रैर्न तदा पापभाजिनः । भागी समझा दुराचारी क्षत्रिय को मार डालने का निर्देश - यदि किसी अत्यन्त दुरा-चारी क्षत्रिय को ब्राह्मण लोग शस्त्रास्त्रों से युद्ध करके मार डालें तो वे पाप-भागी नहीं हो सकते हैं । २७ ॥ दोषाभाव का युद्ध करते खर्गे ह्मण को देख है । यह धर्म-हीनं यदा क्षत्रकुलं नीचैर्लोकः प्रपीड्यते ॥ ३३३ ॥
तदापि ब्राह्मणा युद्धे नारायेयुस्तु तान् द्रुतम् । जब क्षत्रिय समाज को हीनबलवाला समझ कर नीच लोग पीड़ित करने
तब भी ब्राह्मण लोग युद्ध में लड़कर उन सब को शीघ्र नष्ट कर देवें ।
उत्तमं मान्त्रिकास्त्रेण नालिकास्त्रेण मध्यमम् ॥ ३३४ ॥
शस्त्रैः कनिष्ठं युद्धन्तु बाहुयुद्धं ततोऽघमम् । उत्तम, मध्यम, कनिष्ठ तथा अधम युद्ध के लक्षण - मन्त्र द्वारा प्रयुक्त अख ८ ॥ से होने वाले युद्ध को उत्तम, नालिकास्त्रों ( बन्दूक - तोप ) से होने वाले को CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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२८० शुक्रनीति: - मध्यम, शस्त्रों से होने वाले को कनिष्ठ और बाहु से कहते हैं । होनेवाले युद्ध को मन्त्रेरित महाशक्तिबाणाद्यैः शत्रुनाशनम् मान्त्रिकास्त्रेण तद्युद्धं सर्वयुद्धोत्तमं ॥ ३३५ स्मृतम् । सर्वोत्तम युद्ध के लक्षण -- जिल में मन्त्र से अभिमन्त्रित - महाशक्तिशाली बाणादि द्वारा शत्रु का नाश किया करके - से होने वाले युद्ध सब युद्धों में उत्तम कहा जाता जाता है, ऐसे है । नालाग्निचूर्णसंयोगाल्लक्ष्ये गोलनिपातनम् ॥ ३३६ नालिकास्त्रेण तद्युद्धं महाह्रासकरं रिपोः । नालिकास्त्र युद्ध का लक्षण - जिसमें तोप या बन्दूक की नाल भर कर आग लगाने के द्वारा लचयस्थान पर गोली या गोला छोड़ा ऐसे नालिकास्त्र द्वारा होने वाले युद्ध को शत्रुओं के लिये महाद्दास करने वाला माना जाता है । अध के सा ८ - जुल च ॥ I श छोटे हुये मान्त्रिकास बाहुयुद्ध के प्रहारों युद्ध ॥ ७ से शूद्र क का प्रयोग श न में चारून त जाता है क ( हानि ) के युद्ध कुन्तादिशस्त्रसङ्घातै रिपूणां नाशनं च यत् ॥ ३३७ ॥। सेना के आगे
शस्त्रयुद्धं तु तज्ज्ञेयं नालाखाऽभावतः सदा । सेना को दोन शस्त्रयुद्ध का लक्षण — जिसमें सदा नालाख का अभाव होने से केवल फूट करा दि भाला आदि शस्त्र समूहों के द्वारा शत्रुओं का नाश किया जाता है उसे शस्त्र- करना चाहिय -युद्ध समझना चाहिये । स कर्षणैः सन्धिमर्माणां प्रतिलोमानुलोमतः ॥ ३३८ ॥
बन्धनैर्घातनं शत्रोर्युक्त्या तद् बाहुयुद्धकम् । बाहुयुद्ध का लक्षण - कौशल के साथ शत्रु के सन्धिस्थान तथा मर्म- सामने से औ स्थानों को पीड़ित करने से तथा उल्टा तथा सीधे ढङ्ग से बाहुओं द्वारा बांधने सेना के आधे से जहां पर आघात पहुँचाया जाता है, उसे ' बाहुयुद्ध ' कहते हैं । भांश को ल वामपाणिकचोत्पीडा भूमौ निष्पेषणं बलात् ॥ ३३६ ॥ ७
मूर्ध्नि पादप्रहरणं जानुनोदरपीडनम् । मालूराकारया मुष्टया कपोले दृढताडनम् || ३४० || युद्ध होन कफोणिपातोऽप्यसकृत्सर्वतस्तलताडनम् । I शत्रु के मं जालेन युद्धे भ्रमणं नियुद्धं स्मृतमष्टधा ॥ ३४१ ॥ सेना के साथ
बाहुयुद्ध के ८ प्रकारों का निर्देश - बाहुयुद्ध आठ प्रकार का होता है । युद्ध में प्रवृत्त जैसे १ - बायें हाथ से बालों को पकड़ना, २ - जबरदस्ती भूमि में पटक कर रगढ़ना, ३ - सिर में पैर से प्रहार करना, ४ - घुटने से पेट को दबाना, ५ - बेल E के समान दृढ मुक्कों से कपोल में कठिन प्रहार करना, ६- बारंबार केहनी को प बलपूर्वक गिराना, ७ - सभी प्रकार से चपेटा द्वारा प्रहार करन ५ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८१ युद्ध को अधम के साथ शत्रुओं के छिद्र देखने की इच्छा से बाहुयुद्ध में घूमना । ८ - घुल
३३५ चतुर्भिः क्षत्रियं हन्यात् पश्चभिः क्षत्रियाधमम् ।
॥ षड्भिर्वैश्यं सप्तभिस्तु शूद्रं सङ्करमष्टभिः ॥ ३४२ ॥
करके शत्रुतानि युञ्जीत न मित्रेषु कदाचन ।. ऐसे मान्त्रिका छोड़े हुये बाहुयुद्ध के ८ प्रकारों को मित्रों के लिये प्रयोग का निषेध - उक्त बाहु-युद्ध के प्रहारों में से 8 से क्षत्रिय को, ५ से क्षत्रियों में अधम को, ६ से वैश्य को 19 से शूद्र को, ८ से संकीर्ण जाति वालों को मारे । उक्त ८ प्रकार के प्रहारों ३३६ ॥ का प्रयोग शत्रुओं के लिये करे मित्रों के लिये कभी न करे । नाल में बाहर छोड़ा जाता है, दास ( हानि ) सेना ३७ ॥ सेना फूट नालास्त्राणि पुरस्कृत्य लघूनि च महान्ति च ॥ ३४३ ॥
तत्पृष्ठगांश्च पादातान् गजाश्वान् पार्श्वयोः स्थितान् ।
कृत्वा युद्धं प्रारभेत भिन्नामात्यबलारिणा ॥ ३४४ ॥
युद्ध के समय सेना की रचना - – छोटे - बड़े नालाखों ( तोप बन्दूकों ) को के आगे रखकर तथा पैदल सेना को पीछे और घोड़ों तथा हाथियों की को दोनों वगलों में रख कर जिसके मन्त्रियों तथा सेनाओं के बीच में करा दिया गया हो ऐसे शत्रु के साथ राजा को युद्ध प्रारम्भः होने से केवल करना चाहिये ।
है उसे शत्र साम्मुख्येन प्रपातेन पाश्र्वभ्यामपयानतः ।
युद्धानुकूलभूमेस्तु या बल्ला भस्तथाविधम् ॥ ३४५ ॥
३८ ॥ सैन्यान प्रथमं सेनपैर्युद्धमीरितम् युद्ध के अनुकूल जैसी भूमि जहां पर मिले वहां पर उसके अनुसार कभी. न तथा मर्म सामने से और कभी अगल - बगल से हमला करके या कभी हट करके सर्वप्रथम द्वारा बांधने सेना के आधे भाग के साथ सेनापतियों का सेनापत्तियों के साथ सेना के
1 अद्धांश को लेकर युद्ध करना कहा है ।
३६ ॥ अमात्यगोषितैः पश्चादमात्यैः सह तद्भवेत् ॥ ३४६ ॥
नृपसङ्गोपितैः पश्चात् स्वतः प्राणात्यये च तत् । ४० ॥ युद्ध होने का क्रम - उसके पश्चात् मंत्रियों के अधीन रहनेवाली सेनाओं का शत्रु के मंत्रियों साथ युद्ध होना तत्पश्चात् राजा के अधीन में रहनेवाली-२१ ॥ सेना के साथ युद्ध होना और अन्त में प्राणसंकट होने पर स्वयं राजा का
का होता है । युद्ध में प्रवृत्त होना उचित कहा गया है ।
में पटक कर दीर्घावनि परिश्रान्तं क्षुत्पिपासाहितश्रमम् ॥ ३४० ॥
बाना, ५ - वेल व्याधिदुभिक्षकरकैः पीडितं दस्युभिद्रुतम् ।
केहुनी को पङ्कपांसुजलस्कन्तं व्यस्तं श्वासातुरं तथा । ३४८ ॥
प्रहार करना, प्रसुप्तं भोजने व्यग्रमभूयिष्ठमसंस्थितम् । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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३८२ शुक्रनीति: घोराग्निभयवित्रस्तं वृष्टिवातसमाहतम् एवमादिषु जातेषु व्यसनैश्व समाकुलम् ॥ ३४ ९ ॥ । वृद्धि करके •• स्त्र सैन्यं साधु रक्षेत्त परसैन्यं विनाशयेत् सेना के उपद्भुत होने पर लड़ने का || ३५० || रक्षा करता से थकी हुई, भूख - प्यास के सारे परेशान हुई निर्देश रोग — बहुत दूर से चलकर आने से,, दुर्भिद तथा वफ के की मार से पीड़ित, डाकुओं लूटी मारी गई, कीचड़ ओड़ो और अ लथपथ हुई, व्याकुल तथा हांफती हुई, सोई हुई, भोजन , धूल करने तथा नल से से पिलाकर - स्वरूप संख्यावाली ( सेना की छोटी टुकड़ी ), दुर्गतिग्रस्त भयंकर में को युद्ध में - लपटों से डरी हुई, वर्षा तथा आंधी से घबढ़ाई हुई इत्यादि , आग की , दुर्घटनाओं के उत्पन्न होने से अत्यन्त व्याकुल हुई अपनी सेना की तो भलीभांति से करे किन्तु यदि शत्रु की ऐसी सेना हो तो उसे नष्ट कर दे । रचा युद्ध में बलस्य व्यसनानीह यान्युक्तानि मनीषिभिः । बन्दूक या ख मुख्य भेदो हि तेषां तु पाषिष्ठो विदुषां मतः ॥ ३५१ ॥ सैनिक बाण
सेना में फूट डालने में पाप का निर्देश -- इस शास्त्र में विद्वानों ने जितने ' सेना के विषय में दुःखदायक उपायों को कहा है, उनमें भेद ( परस्पर फूट - डालना ) को ही मुख्य एवं अस्यन्त पापपूर्ण सर्वो ने माना है । भिन्ना हि सेना नृपतेर्दुःसन्देहा भवत्युत । हाथी प चढ़े हुये रथ मौला हि पुरुषव्याघ्र! किमु नानासमुत्थिता ॥ ३५२ ॥ अकेले से, श
फूट जानेवाली सेना के दुःखदायिनी होने का निर्देश - हे पुरुष. • श्रेष्ठ! नाना प्रकार के नवीन सैनिकों से भरी हुई भी सेना जब फूट पड़ जाने से इस संसार में राजा के लिये दुःखदायिनी हो जाती है तब भछा पुरानी खास सेना में फूट पड़ने पर क्या कहना है, वह तो अत्यन्त दुःखदायिनी हो जाती है ॥
उपायान् षड्गुणं मन्त्रं शत्रोः स्वस्यापि चिन्तयेत् ।
धर्मयुद्धैः कूटयुद्धैर्हन्यादेव रिपुं सदा ॥ ३५३ ॥
सामादि का ध्यान रखते हुये युद्ध करने का निर्देश - - राजा सदा - तथा अपने द्वारा कृत सामादि उपायों की एवं सम्ध्यादि षड्गुणों तथा का ध्यान रखता हुआ धर्मयुद्ध या कूटयुद्ध के द्वारा जैसे भी हो विनाश करे ।
याने सपादभृत्या तु स्वभृत्यान् वर्धयन्नृपः ।
स्वदेहं गोपयेद् युद्धे चर्मणा कवचेन च ॥ १५४ ॥
शत्रु युद्ध में युद्धधर्म का मन्त्रणा को, एवं नए शत्रु का तुम्हारे अधी किये हुये, को देखते ह के अन्य कार्यों शत्रु पर चढ़ाई करते समय सेना को तनख्वाह बढ़ाने का निर्देश - शत्रु ऊपर प्रहार में सवाबी ऊपर चढ़ाई करने के समय अपने नौकरों या सैनिकों की तनख्वाह CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरण ३८३ ३४ ९ ॥ करके उन्हें खुश करता हुआ युद्ध में ढाल तथा कवच से अपने शरीर की. वृद्धि रहे ।
३५० ॥ रक्षा करता पाययित्वा मदं सम्यक् सैनिकान्छौर्यवर्धनम् ।
से चलकर जाने उत्तेजितांश्च निर्द्वैधान् मन्त्रान् युद्धे नियोजयेत् ॥ ३५५ ॥
बर्फ के मो और अपने सैनिकों को शूरता बढ़ानेवाले मद ( शराब ) को अच्छी तरह ल करने तथा नल से से पिलाकर उत्तेजित करने के बाद मरने का सन्देह नहीं करनेवाले उन वीरों भयंकर में व्य को युद्ध में नियुक्त करे । दि आग को नालिकास्त्रेण खड्गाद्यैः संनिकैः पातयेदरीन् । दुर्घटनाओं के लीभांति कुन्तेन सादी बाणेन रथगो गजगोऽपि च ॥ ३५६ ॥
से रक्षा युद्ध में नालास्त्र ( बन्दूक तोप ) आदियों की योजना — पैदल सैनिक बन्दूक या खड्ग आदि से, घुड़सवार भाले से, रथ और हाथी पर सवार हुये सैनिक बाण से शत्रुओं पर प्रहार करें । ॥ ३५१ ॥ गजो गजेन यातव्यस्तुरगेण तुरङ्गमः
दानों ने जितने ।
रथेन च रथो योज्यः पत्तिना पत्तिरेव च ॥ ३५७ ॥
( परस्पर फू एकेनैकश्च शस्त्रेण शस्त्रमस्त्रेण वाऽस्त्रकम् । हाथी पर सवार सैनिक हाथीवालों से, घुड़सवार घुड़सवारों से, रथ पर चढ़े हुये रथवालों से एवं पैदल सैनिक - पैदल सैनिकों से युद्ध करें और अकेला-३५२ || अकेले से, शस्त्रवाला - शस्त्रवालों से एवं अखवाला सैनिक भस्ववालों से लड़े । श - हे पुरुष फूट पड़ जाने भला पुरानी दुःखदायिनी न् । ३५३ सदा ॥ शत्रु के न च हन्यात् स्थलारूढं न क्लीबं न कृताञ्जलिम् ॥ ३५८ ॥
न मुक्तकेशमासीनं न तवास्मीतिवादिनम् ।
न सुप्तं न विसन्नाहं न नग्नं न निरायुधम् ॥ ३५६ ॥
न युध्यमानं पश्यन्तं युध्यमानं परेण च ।
पिबन्तं न च भुञ्जानमन्यकार्याकुलं न च ॥ ३६० ॥
न भीतं न परावृत्तं सतां धर्ममनुस्मरन् । युद्ध में प्रहार करने के अयोग्य सैनिकों के लक्षण - सज्जन पुरुषों के तथा मन्त्रणा युद्धधर्म का ध्यान रखनेवाला सैनिक अपने से नीचे किसी जगह खड़े हुये 7 हो शत्रु का को, एवं नपुंसक, हाथ जोड़े हुये, शिर के बाल बिखरे हुये, बैठे हुये ' मैं तुम्हारे अधीन हूँ ' ऐसा कहते हुये, सोये हुये, लड़ाई के योग्य वेष नहीं धारण किये हुये, नग्न, शस्त्ररहित, नहीं लड़ते हुये, दूसरे के साथ होते हुये युद्ध को देखते हुये, जलपानादि करते हुये, भोजन करते हुये, युद्ध के अतिरिक्त ५४ ॥ शत्रु के अम्य कार्यों में व्यस्त हुये, डरे हुये एवं युद्ध से विमुख हुये, ऐसे सैनिकों के निर्देश- ऊपर प्रहार नहीं करे । वाह में सवाची CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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३८४ शुक्रनीति: वृद्धो बालो न हन्तव्यो नैव स्त्री केवलो यथायोग्यं हि संयोज्य निघ्नन् धर्मो न नृपः ॥ ३६१ ॥
हीयते । वृद्ध बालकादि राजा को मारने का निषेध - जो केवल अकेला बचा हुआ राजा हो इन सर्वो को नहीं वृद्ध, बालक स्त्री या उनके साथ यथायोग्य व्यवहार करके उन्हें केवल अपने मारना चाहिये वविक राजा धर्म से च्युत नहीं कहा जाता है । अधीन करता हुआ सेनापत धर्मयुद्धे तु कूटे वै न सन्ति नियमा अमी राजा किसी न युद्धं कूटसदृशं नाशनं बलवद्रिपोः ॥ ३६२ ॥ रहे । और
बलवान शत्रु के नाशार्थं कूटयुद्ध की महत्ता । करते हुये, युद्ध के लिये कहे हुये हैं, कूटयुद्ध – ये सब नियम केवल घर्म- संचार करते के लिये कूटयुद्ध के समान कोई दूसरा के लिये युद्ध नहीं नहीं । है बलवान शत्रु को नष्ट करने ( खिलाफ ) 1 रामकृष्णेन्द्रादिदेवैः कूट मे बाहतं पुरा ॥ ३६३ ॥
कूटेन निहतो बालिर्यवनो नमुचिस्तथा । क्योंकि प्राचीनकाल में राम, कृष्ण तथा इन्द्रादि देवताओं ने भी बलवान भारी क असुरों के साथ लड़ने में कूटयुद्ध का ही आश्रय लिया था, और कूटयुद्ध के द्वारा कोई न द्वारा ही उन सबों ने क्रम से बालि, कालयवन तथा नमुचि दैत्य का
किया था ।
प्रफुल्लवदनेनैव तथा कोमलया गिरा ॥ ३६४ ॥
अङ्गीकृतापराधेन सेवादानन तिस्तवैः ।
उपकारैः स्वाशयेन दिव्यैर्विश्वासयेत् परम् ॥ ३६५ ॥
क्षुरधारेण मनसा रिपोरिछद्रं सुलक्षयेत् । शत्रु के छिद्र को भली प्रकार देखने का निर्देश - प्रफुल्ल वदन रूप में धन-: संहार शत्रु को शत्रु सेना के ( संकटपूर्ण ) होका, मार डाले । कोमल वाणी से, अपराध को स्वीकार करने से, सेवा से, दान से, नमस्कार करने से, गुणों की प्रशंसा करने से, उपकार करने से, अच्छा भाव - प्रदर्शन करने से एवं दिव्य शपथ खाकर ऊपर से शत्रु का विश्वास अपने ऊपर जमावे किन्तु मन में छुरे के समान धार रखकर ( नाश का उपाय करता हुआ ) शत्रु के ि शत्रु की ( नाश करने का अवसर ) को ढूंढता रहे । अर्थात् जब अवसर मिले तब. की राशि देव मार गिरावे । शत्रु के द्वारा अवमानं पुरस्कृत्य मानं कृत्वा तु पृष्ठतः ॥ ३६६ ॥ रहने से क्ल
स्वकार्यं साधयेत् प्राज्ञः कार्यध्वंसो हि मूर्खता । कर देवे । कार्य को नष्ट न करने का निर्देश- बुद्धिमान मनुष्य अपमान को आगे करके रखकर और सम्मान को पीछे रखकर ( मानापमान का ख्याल न विपत्ति जिस भांति से हो सके ) अपने कार्य को सिद्ध करे 1 । क्योंकि कार्य को नष्ट और शत्रुक करना ही मूर्खता है । २५ श CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri