लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 381–390

लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 381–390

पृष्ठ 381

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अध्याय ७७ ] शिवमन्दिरोंके निर्माणका फल " शिवमन्दिरके उपलेपन आदिका माहात्म्य ३७ ९

अश्वमेधफलं प्राप्य रुद्रलोकं स गच्छति ।

मध्याह्ने शिवतीर्थेषु स्नात्वा भक्त्या सकृन्नरः ॥

गङ्गास्नानसमं पुण्यं लभते नात्र संशयः ।

अस्तं गते तथा चार्के स्नात्वा गच्छेच्छिवं पदम् ॥

पापकञ्चुकमुत्सृज्य शिवतीर्थेषु मानवः ।

द्विजास्त्रिषवणं स्नात्वा शिवतीर्थे सकृन्नरः ॥

शिवसायुज्यमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ।

पुराथ सूकरः कश्चित् श्वानं दृष्ट्वा भयात्पथि ॥

प्रसङ्गाद्वारमेकं तु शिवतीर्थेऽवगाह्य च ।

मृतः स्वयं द्विजश्रेष्ठा गाणपत्यमवाप्तवान् ॥

यः प्रातर्देवदेवेशं शिवं लिङ्गस्वरूपिणम् ।

पश्येत्स याति सर्वस्मादधिकां गतिमेव च ॥

मध्याह्ने च महादेवं दृष्ट्वा यज्ञफलं लभेत् ।

सायाह्ने सर्वयज्ञानां फलं प्राप्य विमुच्यते ॥

मानसैर्वाचिकैः पापैः कायिकैश्च महत्तरैः ।

तथोपपातकैश्चैव पापैश्चैवानुपातकैः ॥

सङ्क्रमे देवमीशानं दृष्ट्वा लिङ्गाकृतिं प्रभुम् ।

मासेन यत्कृतं पापं त्यक्त्वा याति शिवं पदम् ॥

अयने चार्धमासेन दक्षिणे चोत्तरायणे ।

विषुवे चैव सम्पूज्य प्रयाति परमां गतिम् ॥

प्रदक्षिणात्रयं कुर्याद्यः प्रासादं समन्ततः ।

सव्यापसव्यन्यायेन मृदुगत्या शुचिर्नरः ॥

पदे पदेऽश्वमेधस्य यज्ञस्य फलमाप्नुयात् ।

वाचा यस्तु शिवं नित्यं संरौति परमेश्वरम् ॥

सोऽपि याति शिवं स्थानं प्राप्य किं पुनरेव च ।

कृत्वा मण्डलकं क्षेत्रं गन्धगोमयवारिणा ॥

मुक्ताफलमयैश्चूर्णैरिन्द्रनीलमयैस्तथा 1 पद्मरागमयैश्चैव स्फाटिकैश्च सुशोभनैः ॥

तथा मारकतैश्चैव सौवर्णै राजतैस्तथा ।

तद्वर्णैर्लोकिकैश्चैव चूर्णैर्वित्तविवर्जितैः ॥

YA YA YA YA YA YA YA YA AYA हे श्रेष्ठ मुनियो! शिवतीर्थोंमें प्रात: काल स्नान करके ५५ वह मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त करके रुद्रलोकको जाता है । मध्याह्नकालमें शिवतीर्थोंमें एक बार भी भक्तिपूर्वक स्नान करके मनुष्य गंगास्नानके समान पुण्य प्राप्त करता ५६ है; इसमें सन्देह नहीं है । सूर्यके अस्त हो जानेपर शिवतीर्थोंमें स्नान करके मनुष्य पापकंचुक छोड़कर शिवपद प्राप्त ५७ करता है । हे द्विजो! शिवतीर्थोंमें एक बार भी त्रिस्रवण ( तीनों कालोंमें ) स्नान करके मनुष्य शिवसायुज्य प्राप्त ५८ कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये । हे श्रेष्ठ द्विजो! पूर्वकालमें कोई सुअर मार्गमें कुत्तेको देखकर डरके मारे संयोगवश शिवतीर्थमें गिर पड़ा और वह एक ५ ९ बार डुबकी लगाकर स्वयं मर गया; इससे उसने गणाधिपति पदको प्राप्त किया ॥ ५४–५९ ॥ ६० जो प्रातःकाल लिङ्गस्वरूपी देवदेवेश्वर शिवका दर्शन करता है, वह सबसे उच्च पद प्राप्त करता है; मध्याह्नमें महादेवका दर्शन करके वह यज्ञका फल प्राप्त ६१ करता है और सायंकाल दर्शन करके सभी यज्ञोंका फल प्राप्तकर मानसिक तथा वाचिक पापों, बड़े - से - बड़े शारीरिक ६२ पापों, उपपातकों और अनुपातकोंसे मुक्त हो जाता है । सूर्यकी सभी संक्रान्तियोंमें लिङ्गके आकारवाले महादेव प्रभु ईशानका दर्शन करके मनुष्य महीनेभरमें किये गये पापका त्याग ६३ करके शिवलोकको जाता है । दक्षिणायन ( कर्कसंक्रान्ति ) तथा उत्तरायण ( मकरसंक्रान्ति ) तथा विषुवत् ( मेष - तुला ) -६४ | संक्रान्तिमें अर्धमासपर्यन्त विधिवत् शिवकी पूजा करके मनुष्य परम गति प्राप्त करता है ॥ ६०-६४ ॥ ६५ पवित्रावस्थामें जो मनुष्य सव्य- अपसव्य - विधिसे अर्थात् सोमसूत्रका उल्लंघन किये बिना धीमी गति से चारों ओरसे शिवालयकी तीन प्रदक्षिणा करता है, वह ६६ प्रत्येक पदपर अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त करता है । जो [ मनुष्य ] वाणीसे नित्य परमेश्वर शिवका जप ६७ करता है, वह भी शिवलोकको जाता है; उसे पाकर [ उसके लिये ] फिर क्या शेष रह जाता है ॥ ६५-६६१ / २ ॥ महाभागो! गन्ध तथा गोमय - मिश्रित जलसे ६८ मण्डलाकार क्षेत्र बनाकर उसमें मोती, इन्द्रनील, पद्मराग, स्फटिक, मरकत, स्वर्ण तथा रजत ( चाँदी ) - के अति ६ ९ | सुन्दर चूर्णोंके द्वारा अथवा धनके अभावमें उसी वर्णके

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३८० आलिख्य कमलं भद्रं दशहस्तप्रमाणतः सकर्णिकं महाभागा महादेवसमीपतः तत्रावाह्य महादेवं नवशक्तिसमन्वितम् पञ्चभिश्च तथा षड्भिरष्टाभिश्चेष्टदं परम् पुनरष्टाभिरीशानं दशारे दशभिस्तथा श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । । लौकिक चूर्णोंके द्वारा महादेवके समीप कर्णिकासहित ॥ ७० दस हाथ परिमापका शुभ कमल बनाकर वहाँ पाँच, छ:, । आठ तथा नौ वाम आदि शक्तियोंके सहित परम इष्ट प्रदान करनेवाले महादेवका आवाहन करके पुनः आठ ॥ ७१ शक्तियोंसहित ईशानका आवाहन करके दस कोणोंमें दस । शक्तियोंके सहित एवं उसके बाहर दस शक्तियोंके सहित पुनर्बाह्ये च दशभिः सम्पूज्य प्रणिपत्य च ॥ ७२ शिवजीका पूजन करके तथा उन्हें प्रणाम करके देवदेवके निवेद्य देवदेवाय क्षितिदानफलं लभेत् शालिपिष्टादिभिर्वापि पद्ममालिख्य निर्धनः पूर्वोक्तमखिलं पुण्यं लभते नात्र संशयः द्वादशारं तथालिख्य मण्डले पद्ममुत्तमम् रत्नचूर्णादिभिश्चूर्णैस्तथा द्वादशमूर्तिभिः । मण्डलस्य च मध्ये तु भास्करं स्थाप्य पूजयेत्

ग्रहैश्च संवृतं वापि सूर्यसायुज्यमुत्तमम् ।

एवं प्राकृतमप्यार्यां षडस्त्रं परिकल्प्य च ॥

मध्यदेशे च देवेशीं प्रकृतिं ब्रह्मरूपिणीम् ।

दक्षिणे सत्त्वमूर्तिं च वामतश्च रजोगुणम् ॥

अग्रतस्तु तमोमूर्ति मध्ये देवीं तथाम्बिकाम् ।

पञ्चभूतानि तन्मात्रापञ्चकं चैव दक्षिणे ॥

कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव तथा बुद्धीन्द्रियाणि च ।

उत्तरे विधिवत्पूज्य षडस्त्रे चैव पूजयेत् ॥

आत्मानं चान्तरात्मानं युगलं बुद्धिमेव च ।

अहङ्कारं च महता सर्वयज्ञफलं लभेत् ॥

एवं वः कथितं सर्वं प्राकृतं मण्डलं परम् ।

अतो वक्ष्यामि विप्रेन्द्राः सर्वकामार्थसाधनम् ॥

गोचर्ममात्रमालिख्य मण्डलं गोमयेन तु ।

चतुरस्त्रं विधानेन चाद्भिरभ्युक्ष्य मन्त्रवित् ॥

अलङ्कृत्य वितानाद्यैश्छत्रैर्वापि मनोरमैः ।

बुदबुदैरर्धचन्द्रैश्च हैमैरश्वत्थपत्रकैः ॥

* जितने स्थानपर एक हजार गौएँ और दस बैल बिना कहलाता है — गवां शतं सैकवृषं यत्र तिष्ठत्ययन्त्रितम् । लिये उसे निवेदित करनेसे पृथ्वीदानका फल प्राप्त होता ॥ ७३ है । निर्धन [ भक्त ] शालि चावलके चूर्ण आदिसे भी कमल बनाकर [ पूजन करके ] पूर्वोक्त समस्त पुण्य प्राप्त

करता है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ६७ – ७३१ / २ ॥

॥ ७४ मण्डलमें रत्नोंके चूर्ण आदिसे अथवा अन्य चूर्णोंसे बारह दलोंवाला उत्तम कमल बनाकर मण्डलके ॥ ७५ मध्यमें बारह मूर्तियोंके साथ सूर्यको स्थापित करके ग्रहोंसे घिरे हुए सूर्यकी पूजा करनी चाहिये; इससे वह [ भक्त ] ७६ उत्तम सूर्यसायुज्य प्राप्त करता है ॥ ७४-७५ १/२ 11 इसी प्रकार प्राकृत मण्डल बनाकर उसमें छ: दलोंवाला कमल बनाकर इसके मध्य भागमें आर्या ७७ ब्रह्मरूपिणी देवेशी प्रकृति, दाहिनी ओर सत्त्वमूर्ति, बायीं ओर रजोगुण, सामने तमोमूर्ति, मध्यमें देवी ७८ अम्बिका, दक्षिणमें पाँच भूतों तथा पाँच तन्मात्राओं और उत्तरमें पाँच कर्मेन्द्रियों तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियोंकी विधिवत् ७ ९ पूजा करके उस षट्दलकमलमें आत्मा - अन्तरात्मा इन दोनोंकी, बुद्धिकी तथा महत्सहित अहंकारकी पूजा करनी चाहिये; इससे वह समस्त यज्ञोंका फल प्राप्त करता ८० है । [ हे मुनियो! ] इस प्रकार मैंने आप लोगोंको सम्पूर्ण उत्तम प्राकृत मण्डल बता दिया ॥ ७६ - ८० १/२ ॥ ८१ हे श्रेष्ठ विप्रो! अब मैं सम्पूर्ण कामनाओंको सिद्ध करनेवाले साधनका वर्णन करूँगा । मन्त्रको जाननेवाला [ भक्त ] विधानपूर्वक गायके गोबरसे गोचर्म * के बराबर ८२ चौकोर मण्डल बनाकर जलसे अभ्युक्षण ( छिड़काव ) करके उसे वितान आदि अथवा मनोहर छत्रोंसे, स्वर्णनिर्मित ८३ | अर्धचन्द्राकार बुद्बुदोंसे, सुवर्णमय पीपलकी पत्तियोंसे, बाँधे इधर - उधर स्वच्छन्दतापूर्वक विचरण कर सकें, उतना स्थान गोचर्म । तत्क्षेत्रं दशगुणितं गोचर्म परिकीर्तितम् ॥ ( पराशरस्मृति १२।४६ )

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अध्याय ७७ ] शिवमन्दिरोंके निर्माणका फल

सितैर्विकसितैः पद्म रक्तैर्नीलोत्पलैस्तथा ।

मुक्तादामैर्वितानान्ते लम्बितैस्तु सितैर्ध्वजैः ॥

सितमृत्पात्रकैश्चैव सुश्लक्ष्णैः पूर्णकुम्भकैः ।

फलपल्लवमालाभिर्वैजयन्तीभिरंशुकैः ॥

पञ्चाशद्दीपमालाभिर्धूपैः पञ्चविधैस्तथा ।

पञ्चाशद्दलसंयुक्तमालिखेत्पद्ममुत्तमम् ॥

तत्तद्वर्णैस्तथा चूर्णैः श्वेतचूर्णैरथापि वा ।

एकहस्तप्रमाणेन कृत्वा पद्मं विधानतः ॥

कर्णिकायां न्यसेद्देवं देव्या देवेश्वरं भवम् ।

वर्णानि च न्यसेत्पत्रे रुद्रैः प्रागाद्यनुक्रमात् ॥

प्रणवादिनमोऽन्तानि सर्ववर्णानि सुव्रताः ।

सम्पूज्यैवं मुनिश्रेष्ठा गन्धपुष्यादिभिः क्रमात् ॥

ब्राह्मणान् भोजयेत्तत्र पञ्चाशद्विधिपूर्वकम् ।

अक्षमालोपवीतं च कुण्डलं च कमण्डलुम् ॥

आसनं च तथा दण्डमुष्णीषं वस्त्रमेव च ।

दत्त्वा तेषां मुनीन्द्राणां देवदेवाय शम्भवे ॥

महाचरुं निवेद्यैवं कृष्णं गोमिथुनं तथा ।

अन्ते च देवदेवाय दापयेच्चूर्णमण्डलम् ॥

यागोपयोगद्रव्याणि शिवाय विनिवेदयेत् ।

ओङ्काराद्यं जपेद्धीमान् प्रतिवर्णमनुक्रमात् ॥

एवमालिख्य यो भक्त्या सर्वमण्डलमुत्तमम् ।

यत्फलं लभते मर्त्यस्तद्वदामि समासतः ॥

साङ्गान् वेदान् यथान्यायमधीत्य विधिपूर्वकम् ।

इष्ट्वा यज्ञैर्यथान्यायं ज्योतिष्टोमादिभिः क्रमात् ॥

ततो विश्वजिदन्तैश्च पुत्रानुत्पाद्य तादृशान् । शिवमन्दिरके उपलेपन आदिका माहात्म्य ३८१ खिले हुए श्वेत कमलों तथा लाल कमलों और नीलकमलोंसे, ८४ वितानके किनारे लटकती हुई मोतियोंकी मालाओंसे, श्वेत ध्वजोंसे, श्वेत मिट्टीके पात्रोंसे, मनोहर जलपूरित घड़ोंसे, ८५ फल - पल्लव - मालाओंसे, वैजयन्तियोंसे, अंशुकों ( रेशमी वस्त्र ) - से, पचास दीप मालाओंसे तथा पाँच प्रकारके [ सुगन्धित ] धूपोंसे अलंकृत करके पचास दलोंसे युक्त ८६ । उत्तम कमल बनाये । इस प्रकार विविध रंगके चूर्णोंसे अथवा सफेद चूर्णोंसे विधानपूर्वक एक हाथ परिमापका ८७ कमल बनाकर [ उसकी ] कर्णिकामें देवीसहित देवेश्वर शिवकी स्थापना करे । हे सुव्रतो! [ कमलके ] पत्रोंमें पूर्व दिशा आदिके क्रमसे रुद्रोंके साथ [ अकार आदि ] वर्णों को ८८ स्थापित करे, जो आदिमें प्रणव ( ॐ ) तथा अन्तमें नमः से युक्त हों । हे श्रेष्ठ मुनियो! इस प्रकार [ भक्त ] क्रमसे गन्ध, ८ ९ पुष्प आदिसे पूजन करके वहाँ विधिपूर्वक पचास ब्राह्मणोंको भोजन कराये । तत्पश्चात् उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको जपमाला, ९ ० यज्ञोपवीत, कुण्डल, कमण्डलु, आसन, छड़ी, पगड़ी तथा वस्त्र प्रदान करके देवदेव शम्भुको महाचरु निवेदित करके एक काली गाय तथा काला वृषभ प्रदान करे; ९ १ अन्तमें चूर्णनिर्मित मण्डल तथा पूजनके उपयोगके द्रव्योंको देवदेव शिवको समर्पित कर दे और आदिमें ९ २ ' ओम् ' लगाकर बुद्धिमान् [ भक्त ] प्रत्येक वर्णको अनुक्रमसे जपे ॥ ८१ – ९ ३ ॥ ९ ३ [ हे विप्रो! ] इस प्रकार जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक उत्तम सम्पूर्ण मण्डल बनाकर जिस फलको प्राप्त करता है, उसे मैं संक्षेपमें बता रहा हूँ । समुचित रूपसे विधिपूर्वक ९ ४ अंगोंसहित वेदोंका अध्ययन करके विधानके अनुसार क्रमसे ज्योतिष्टोम आदिसे लेकर विश्वजित्तक सभी ९ ५ यज्ञोंको करके अपने सदृश पुत्रोंको उत्पन्न करके पत्नीसहित वानप्रस्थ - आश्रममें प्रविष्ट होकर अग्निकर्म करके; पुनः हे द्विजो! चान्द्रायण आदि सभी व्रत सम्पन्न करके और वानप्रस्थाश्रमं गत्वा सदारः साग्निरेव च॥९ ६ इसके बाद सभी क्रियाओंका त्याग करके ब्रह्मविद्याका चान्द्रायणादिकाः सर्वाः कृत्वा न्यस्य क्रिया द्विजाः । अध्ययनकर यत्नपूर्वक ज्ञान प्राप्तकर पुनः उस ज्ञानके द्वारा ब्रह्मविद्यामधीत्यैव ज्ञानमासाद्य यत्नतः ॥ ९ ७ ज्ञेयका दर्शन करके वह योगी जो फल पाता है, उस ज्ञानेन ज्ञेयमालोक्य योगी यत्काममाप्नुयात् । फलको वह सम्पूर्ण वर्णमण्डलके दर्शनमात्रसे प्राप्त कर

तत्फलं लभते सर्वं वर्णमण्डलदर्शनात् ॥ ९ ८ । लेता है ॥ ९ ४ – ९ ८ ॥

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३८२ येन केनापि वा मर्त्यः प्रलिप्यायतनाग्रतः उत्तरे दक्षिणे वापि पृष्ठतो वा द्विजोत्तमाः चतुष्कोणं तु वा चूर्णैरलङ्कृत्य समन्ततः पुष्पाक्षतादिभिः पूज्य सर्वपापैः प्रमुच्यते यस्तु गर्भगृहं भक्त्या सकृदालिप्य सर्वतः चन्दनाद्यैः सकर्पूरैर्गन्धद्रव्यैः समन्ततः विकीर्य गन्धकुसुमैर्धूपैर्धूप्य चतुर्विधैः श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । हे श्रेष्ठ द्विजो! जिस किसी भी प्रकार शिवालयको ॥ ९९ लीपकर सामने, पीछे, उत्तरमें तथा दक्षिणमें चतुष्कोण मण्डल बनाकर उसे चारों ओरसे चूर्णोंसे सजाकर । अक्षत आदिसे पूजन करके मनुष्य सभी पापोंसे पुष्प, मुक्त ॥ १०० हो जाता है । जो [ मनुष्य ] एक बार भी भक्तिपूर्वक । गर्भगृहको चन्दन आदि तथा कपूरसहित गन्धद्रव्योंसे चारों ओरसे लीपकर सभी ओर सुगन्धित पुष्प बिखेरकर ॥ १०१ चार प्रकारके धूपोंसे उसे धूपित करके भगवान् ईशान । ( शिव ) की प्रार्थना करता है, वह शिवलोकको जाता प्रार्थयेद्देवमीशानं शिवलोकं स गच्छति ॥ १०२ है । वह मनुष्य वहाँ सौ करोड़ कल्पोंतक महान्

तत्र भुक्त्वा महाभोगान् कल्पकोटिशतं नरः ।

स्वदेहगन्धकुसुमैः पूरयञ्छिवमन्दिरम् ॥

क्रमाद् गान्धर्वमासाद्य गन्धर्वैश्च सुपूजितः ।

क्रमादागत्य लोकेऽस्मिन् राजा भवति वीर्यवान् ॥

आदिदेवो महादेवः प्रलयस्थितिकारकः ।

सर्गश्च भुवनाधीशः सर्वव्यापी सदाशिवः ।

शिवब्रह्मामृतं ग्राह्यं मोक्षसाधनमुत्तमम् ॥

व्यक्ताव्यक्तं सदा नित्यमचिन्त्यमर्चयेत्प्रभुम् ॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सुखोंको भोगकर अपने देहरूपी सुगन्धित पुष्पोंसे शिवमन्दिरको पूरित करता हुआ क्रमसे गन्धर्वलोक १०३ पहुँचकर वहाँ गन्धर्वोंसे भलीभाँति पूजित होता है, [ पुन: ] क्रमसे इस लोकमें आकर पराक्रमी राजा होता है ॥ ९९ – १०४ ॥ १०४ वे सदाशिव आदिदेव, महादेव, सृष्टि- पालन-संहार करनेवाले, जगत् के स्वामी तथा सर्वव्यापी हैं । शिवरूपी ब्रह्मसे [ मोक्षसुखरूपी ] अमृतको ग्रहण करना १०५ चाहिये और मोक्षके साधनस्वरूप उत्तम, व्यक्त, अव्यक्त, नित्य तथा अचिन्त्य प्रभुका सदा अर्चन करना १०६ | चाहिये ॥ १०५-१०६ ॥ उपलेपनादिकथनं नाम सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ' उपलेपनादिकथन ' नामक सतहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७७ ॥

अठहत्तरवाँ अध्याय शिवाचारके परिपालनमें अहिंसाधर्मकी महिमा एवं शिवभक्तिका माहात्म्य सूत उवाच

वस्त्रपूतेन तोयेन कार्यं चैवोपलेपनम् ।

शिवक्षेत्रे मुनिश्रेष्ठा नान्यथा सिद्धिरिष्यते ॥

आपः पूता भवन्त्येता वस्त्रपूताः समुद्धृताः ।

अफेना मुनिशार्दूला नादेयाश्च विशेषतः ॥

तस्माद्वै सर्वकार्याणि दैविकानि द्विजोत्तमाः ।

अद्भिः कार्याणि पूताभिः सर्वकार्यप्रसिद्धये ॥

सूतजी बोले- हे श्रेष्ठ मुनियो! शिवक्षेत्रमें वस्त्रके द्वारा छाने हुए पवित्र जलसे ही उपलेपन - कार्य करना १ चाहिये; अन्यथा सिद्धि नहीं मिलती है । हे श्रेष्ठ मुनियो! विशेषकर नदीसे ग्रहण किया गया फेनरहित जल, जो पुनः वस्त्रसे छाना गया हो — ऐसा जल पवित्र होता २ है ॥ १-२ ॥ अतः हे उत्तम द्विजो! समस्त कार्योंकी सिद्धि ३ । लिये सभी देवकार्योंको पवित्र जलसे करना चाहिये ।

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अध्याय ७८ ] शिवाचारके परिपालनमें अहिंसाधर्मकी महिमा एवं शिवभक्तिका माहात्म्य ३८३

जन्तुभिर्मिश्रिता ह्यापः सूक्ष्माभिस्तान्निहत्य तु ।

यत्पापं सकलं चाद्भिरपूताभिश्चिरं लभेत् ॥

सम्मार्जने तथा नृणां मार्जने च विशेषतः ।

अग्नौ कण्डनके चैव पेषणे तोयसङ्ग्रहे ॥

हिंसा सदा गृहस्थानां तस्माद्धिंसां विवर्जयेत् ।

अहिंसेयं परो धर्मः सर्वेषां प्राणिनां द्विजाः ॥

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन वस्त्रपूतं समाचरेत् ।

तद्दानमभयं पुण्यं सर्वदानोत्तमोत्तमम् ॥

तस्मात्तु परिहर्तव्या हिंसा सर्वत्र सर्वदा ।

मनसा कर्मणा वाचा सर्वदाहिंसकं नरम् ॥

रक्षन्ति जन्तवः सर्वे हिंसकं बाधयन्ति च ।

त्रैलोक्यमखिलं दत्त्वा यत्फलं वेदपारगे ॥

तत्फलं कोटिगुणितं लभतेऽहिंसको नरः ।

मनसा कर्मणा वाचा सर्वभूतहिते रताः ॥

दयादर्शितपन्थानो रुद्रलोकं व्रजन्ति च ।

स्वामिवत्परिरक्षन्ति बहूनि विविधानि च ॥

ये पुत्रपौत्रवत्स्नेहाद्रुद्रलोकं व्रजन्ति ते ।

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन वस्त्रपूतेन वारिणा ॥

कार्यमभ्युक्षणं नित्यं स्नपनं च विशेषतः ।

त्रैलोक्यमखिलं हत्वा यत्फलं परिकीर्त्यते ॥

शिवालये निहत्यैकमपि तत्सकलं लभेत् ।

शिवार्थं सर्वदा कार्या पुष्पहिंसा द्विजोत्तमाः ॥

यज्ञार्थं पशुहिंसा च क्षत्रियैर्दुष्टशासनम् ।

विहिताविहितं नास्ति योगिनां ब्रह्मवादिनाम् ॥

यतस्तस्मान्न हन्तव्या निषिद्धानां निषेवणात् ।

सर्वकर्माणि विन्यस्य संन्यस्ताद् ब्रह्मवादिनः ॥

जल सूक्ष्म कीटाणुओंसे युक्त रहता है, अतः निश्चय ४ ही अपवित्र जलसे देवकार्य करनेपर वही सारा पाप होता है, जो उन्हें मारनेसे होता है । झाड़ू लगाने, सफाई करने, विशेष करके अग्निकर्ममें, कूटने- पीसनेमें तथा ५ जलके संग्रहमें गृहस्थ मनुष्योंसे हिंसा हो जाती है, अत: हिंसासे बचना चाहिये । हे द्विजो! सभी प्राणियोंके प्रति ६ यह अहिंसा [ भाव ] सबसे बड़ा धर्म है, अतः पूर्ण प्रयत्नसे वस्त्रसे पवित्र किया हुआ ( छाना हुआ ) जल प्रयोग करना चाहिये ॥ ३–६ / २ 11 ७ वह दान पुण्यप्रद तथा सभी दानोंमें उत्तमोत्तम है, जो अभय देनेवाला होता है, अतः सभी जगह सर्वदा हिंसाका त्याग करना चाहिये । मन - वाणी तथा ८ कर्मसे जो किसीकी हिंसा नहीं करता अर्थात् उन्हें | दुःख नहीं पहुँचाता, ऐसे अहिंसक व्यक्तिकी सभी ९ प्राणी सदा रक्षा करते हैं और हिंसकको कष्ट पहुँचाते हैं । वेदके पारगामी विद्वान्‌को सम्पूर्ण त्रिलोकका दान देकर मनुष्य जो फल पाता है, उसका १० करोड़ों गुना फल अहिंसक मनुष्य प्राप्त करता है ॥ ७ – ९ १ / २ ॥ मन, वचन तथा कर्मसे सभी प्राणियोंके हितमें ११ संलग्न और दयादृष्टिके मार्गपर चलनेवाले रुद्रलोकको जाते हैं । जो लोग स्वामीके समान विभिन्न प्राणियोंको अपने पुत्र - पौत्रके समान समझकर स्नेहपूर्वक उनकी रक्षा १२ करते हैं, वे रुद्रलोकको जाते हैं । अतः पूरे प्रयत्नसे वस्त्रसे पवित्र किये गये जलके द्वारा सदा अभ्युक्षण १३ तथा विशेषरूपसे स्नान कराना चाहिये । सम्पूर्ण त्रिलोकका संहार करनेपर जो [ पापका ] फल कहा गया है, उस सम्पूर्ण पापको मनुष्य शिवालयमें मात्र एक प्राणीकी १४ हत्या करके प्राप्त करता है ॥ १० - १३ १ / २ ॥ हे श्रेष्ठ द्विजो! शिवके निमित्त सदा पुष्पहिंसा की १५ जानी चाहिये । यज्ञके लिये पशुहिंसा दुष्ट शासन है; यह क्षत्रियोंके द्वारा की जा सकती है । ब्रह्मवादी योगियोंके लिये [ कोई ] विधिनिषेध नहीं है । अतः निषिद्धका सेवन १६ । करनेपर भी वे वध्य नहीं हैं । सभी कर्मोंका त्याग करके संन्यास

पृष्ठ 386

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३८४ न हन्तव्याः सदा पूज्याः पापकर्मरता अपि पवित्रास्तु स्त्रियः सर्वा अत्रेश्च कुलसम्भवाः ब्रह्महत्यासमं पापमात्रेयीं विनिहत्य च । स्त्रियः सर्वा न हन्तव्याः पापकर्मरता अपि

न यज्ञार्थं स्त्रियो ग्राह्याः सर्वैः सर्वत्र सर्वदा ।

सर्ववर्णेषु विप्रेन्द्राः पापकर्मरता अपि ॥

मलिना रूपवत्यश्च विरूपा मलिनाम्बराः ।

न हन्तव्याः सदा मत्र्त्यैः शिववच्छङ्कया तथा ॥

वेदबाह्यव्रताचाराः श्रौतस्मार्तबहिष्कृताः ।

पाषण्डिन इति ख्याता न सम्भाष्या द्विजातिभिः ॥

न स्प्रष्टव्या न द्रष्टव्या दृष्ट्वा भानुं समीक्षते ।

तथापि ते न वध्याश्च नृपैरन्यैश्च जन्तुभिः ॥

प्रसङ्गाद्वापि यो मर्त्यः सतां सकृदहो द्विजाः ।

रुद्रलोकमवाप्नोति समभ्यर्च्य महेश्वरम् ॥

भवन्ति दुःखिताः सर्वे निर्दया मुनिसत्तमाः ।

भक्तिहीना नराः सर्वे भवे परमकारणे ॥

ये भक्ता देवदेवस्य शिवस्य परमेष्ठिनः ।

भाग्यवन्तो विमुच्यन्ते भुक्त्वा भोगानिहैव ते ॥

पुत्रेषु दारेषु गृहेषु नॄणां भक्तं यथा चित्तमथादिदेवे । सकृत्प्रसङ्गाद्यतितापसानां तेषां न दूर: परमेशलोकः ॥ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । लिये हुए ब्रह्मवादी लोगोंका वध नहीं करना चाहिये वे ; ॥ १७ । पापकर्ममें लगे रहनेपर भी सदा पूज्य हैं ॥ १४–१६१ %, ॥ अत्रिके कुलमें उत्पन्न सभी स्त्रियाँ पवित्र होती हैं । अत्रिवंशकी स्त्रीकी हत्या करनेपर ब्रह्महत्याके समान पाप ॥ १८ लगता है, अतः पापकर्ममें रत होनेपर भी उन स्त्रियोंकी हत्या नहीं करनी चाहिये । सभी लोगोंको चाहिये कि यज्ञहेतु सर्वत्र सर्वदा स्त्रियोंको ग्रहण न करें; हे विप्रेन्द्रो! १ ९ सभी वर्णोंकी स्त्रियाँ चाहे वे पापकर्ममें रत हों, मलिन हों, रूपवती हों, कुरूप हों अथवा मलिन वस्त्रोंवाली हों, मनुष्योंके द्वारा वध्य नहीं हैं; उनमें शिवभाव रखना २० | चाहिये ॥ १७–२० ॥ वेदविरुद्ध व्रत तथा आचारवाले और श्रुति तथा स्मृतिसे विमुख लोग पाखण्डी कहे गये हैं । द्विजातियोंको २१ उनके साथ बातचीत नहीं करनी चाहिये, उनका स्पर्श नहीं करना चाहिये और उन्हें देखना नहीं चाहिये; उन्हें देखने पर सूर्यका दर्शन करना चाहिये; फिर भी राजाओं २२ तथा अन्य प्राणियोंको चाहिये कि उनका वध न करें ॥ २१-२२ ॥ द्विजो! मनुष्य सज्जनोंके संसर्गवश एक बार भी २३ महेश्वरका पूजन ' करके रुद्रलोक प्राप्त कर लेता है । हे श्रेष्ठ द्विजो! सभी दयारहित लोग तथा परमकारण २४ शिवमें भक्तिसे हीन सभी मनुष्य दुःख भोगते हैं । जो लोग देवदेव परमेष्ठी शिवके भक्त हैं, वे भाग्यशाली हैं और इस लोकमें सुखोंको भोगकर मुक्त हो जाते २५ हैं ॥ २३–२५ ॥ जैसे [ गृहस्थ ] मनुष्योंका चित्त पुत्रों, स्त्रियों तथा घरोंमें आसक्त रहता है, उसी प्रकार उनका चित्त यदि यतियों तथा तपस्वियोंके सान्निध्यसे एक बार भी आदिदेवमें लग जाय तो परमेश्वरका लोक उनके लिये २६ | दूर नहीं है ॥ २६ ॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भक्तिमहिमावर्णनं नामाष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ' भक्तिमहिमावर्णन ' नामक अठहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७८ ॥

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अध्याय ७ ९ ] शिवपूजासे सभीका कल्याण, शिवपूजाकी विधि " " दीपदानकी महिमा ३८५ * £ * £££ उन्यासीवाँ KKKKKKKK अध्याय शिवपूजासे सभीका कल्याण, शिवपूजाकी विधि एवं शिवमन्दिरमें दीपदानकी महिमा ऋषय ऊचुः

कथं पूज्यो महादेवो मर्त्यैर्मन्दैर्महामते ।

अल्पायुषैरल्पवीर्यैरल्पसत्त्वैः प्रजापतिः ॥

संवत्सरसहस्त्रैश्च तपसा पूज्य शङ्करम् ।

न पश्यन्ति सुराश्चापि कथं देवं यजन्ति ते ॥

सूत उवाच

कथितं तथ्यमेवात्र युष्माभिर्मुनिपुङ्गवाः ।

तथापि श्रद्धया दृश्यः पूज्यः सम्भाष्य एव च ॥

प्रसङ्गाच्चैव सम्पूज्य भक्तिहीनैरपि द्विजाः ।

भावानुरूपफलदो भगवानिति कीर्तितः ॥

उच्छिष्टः पूजयन् याति पैशाचं तु द्विजाधमः ।

सङ्क्रुद्धो राक्षसं स्थानं प्राप्नुयान्मूढधीर्द्विजाः ॥

अभक्ष्यभक्षी सम्पूज्य याक्षं प्राप्नोति दुर्जनः ।

गानशीलश्च गान्धर्वं नृत्यशीलस्तथैव च ॥

ख्यातिशीलस्तथा चान्द्रं स्त्रीषु सक्तो नराधमः ।

मदार्तः पूजयन् रुद्रं सोमस्थानमवाप्नुयात् ॥

गायत्र्या देवमभ्यर्च्य प्राजापत्यमवाप्नुयात् ।

ब्राह्मं हि प्रणवेनैव वैष्णवं चाभिनन्द्य च ॥

श्रद्धया सकृदेवापि समभ्यर्च्य महेश्वरम् ।

रुद्रलोकमनुप्राप्य रुद्रैः सार्धं प्रमोदते ॥

संशोध्य च शुभं लिङ्गममरासुरपूजितम् ।

जलैः पूतैस्तथा पीठे देवमावाह्य भक्तितः ॥

दृष्ट्वा देवं यथान्यायं प्रणिपत्य च शङ्करम् ।

कल्पिते चासने स्थाप्य धर्मज्ञानमये शुभे ॥

वैराग्यैश्वर्यसम्पन्ने सर्वलोकनमस्कृते ।

ओङ्कारपद्ममध्ये तु सोमसूर्याग्निसम्भवे ॥

ऋषिगण बोले - हे महामते! मन्दबुद्धिवाले, अल्प आयुवाले, अल्प पराक्रमवाले तथा अल्प सामर्थ्यवाले १ मनुष्योंको प्रजापति महादेवकी पूजा किस प्रकार करनी २ चाहिये? हजार वर्षोंतक तपस्याके द्वारा शंकरकी पूजा करके देवता भी उनका दर्शन नहीं कर पाते; तो फिर वे [ मनुष्य ] भगवान् शिवकी पूजा कैसे करें? ॥ १-२ ॥ सूतजी बोले – हे श्रेष्ठ मुनियो! आपलोगोंने यथार्थ बात कही है, फिर भी श्रद्धापूर्वक [ शिवकी ] पूजा करनेपर उनका दर्शन हो सकता है और उनसे सम्भाषण किया जा सकता है । हे द्विजो! प्रसंगवश भक्तिहीन लोगोंके द्वारा भी पूजित होकर वे भगवान् उनके भावके अनुरूप फल देनेवाले कहे गये हैं । ३-४ ॥ हे द्विजो! उच्छिष्ट अधम ब्राह्मण शिवकी पूजा करके पिशाचलोकको जाता है और क्रोधमें भरकर पूजन करनेवाला मूढबुद्धि राक्षसका स्थान ( लोक ) प्राप्त करता ३ है । अभक्ष्य [ भोजन ] -का भक्षण करनेवाला दुष्ट मनुष्य [ शिवकी ] पूजा करके यक्षलोक प्राप्त करता है और ४ नृत्य - गान करनेवाला उनकी पूजा करके गन्धर्वलोक प्राप्त करता है । प्रसिद्धिका इच्छुक और स्त्रियोंमें आसक्त नराधम ५ बुधलोक प्राप्त करता है । मदोन्मत्त व्यक्ति रुद्रकी पूजा ६ । करता हुआ सोमलोक प्राप्त करता है॥५–७ ॥ [ रुद्र ] गायत्री [ मन्त्र ] द्वारा शिवका पूजन करके ७ मनुष्य प्रजापतिलोकको और प्रणवके द्वारा पूजन करके ब्रह्मलोक तथा विष्णुलोकको प्राप्त करता है । श्रद्धापूर्वक ८ एक बार भी महेश्वरका पूजन करके मनुष्य रुद्रलोकमें पहुँचकर रुद्रोंके साथ आमोद - प्रमोद करता है ॥ ८ - ९ ॥ ९ देवताओं तथा असुरोंसे पूजित शुभ लिङ्गको पवित्र जलसे स्वच्छ करके पीठमें भक्तिपूर्वक शिवका आवाहन १० करके उन्हें देखकर विधिपूर्वक प्रणाम करके धर्मज्ञानमय, ११ उत्तम, वैराग्य - ऐश्वर्यसे सम्पन्न, सभी लोगोंसे नमस्कृत, ओंकार पद्मसे युक्त मध्यभागवाले तथा चन्द्र - सूर्य - अग्निसे १२ | उत्पन्न कल्पित आसनपर स्थापित करके रुद्र शम्भुको

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३८६ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग * 566666666666 पाद्यमाचमनं चार्घ्यं दत्त्वा रुद्राय शम्भवे स्नापयेद्दिव्यतोयैश्च घृतेन पयसा तथा दध्ना च स्नापयेद् रुद्रं शोधयेच्च यथाविधि ततः शुद्धाम्बुना स्नाप्य चन्दनाद्यैश्च पूजयेत् ॥ रोचनाद्यैश्च सम्पूज्य दिव्यपुष्पैश्च पूजयेत् बिल्वपत्रैरखण्डैश्च पद्मैर्नानाविधैस्तथा नीलोत्पलैश्च राजीवैर्नन्द्यावर्तैश्च मल्लिकैः । चम्पकैर्जातिपुष्पैश्च बकुलैः करवीरकैः शमीपुष्पैर्बृहत्पुष्पैरुन्मत्तागस्त्यजैरपि अपामार्गकदम्बैश्च भूषणैरपि शोभनैः ॥

दत्त्वा पञ्चविधं धूपं पायसं च निवेदयेत् ।

दधिभक्तं च मध्वाज्यपरिप्लुतमतः परम् ॥

शुद्धान्नं चैव मुद्गान्नं षड्विधं च निवेदयेत् ।

अथ पञ्चविधं वापि सघृतं विनिवेदयेत् ॥

केवलं चापि शुद्धान्नमाढकं तण्डुलं पचेत् ।

कृत्वा प्रदक्षिणं चान्ते नमस्कृत्य मुहुर्मुहुः ॥

स्तुत्वा च देवमीशानं पुनः सम्पूज्य शङ्करम् ।

ईशानं पुरुषं चैव अघोरं वाममेव च ॥

सद्योजातं जपंश्चापि पञ्चभिः पूजयेच्छिवम् ।

अनेन विधिना देवः प्रसीदति महेश्वरः ॥

वृक्षाः पुष्पादिपत्राद्यैरुपयुक्ताः शिवार्चने ।

गावश्चैव द्विजश्रेष्ठाः प्रयान्ति परमां गतिम् ॥

पूजयेद्यः शिवं रुद्रं शर्वं भवमजं सकृत् ।

स याति शिवसायुज्यं पुनरावृत्तिवर्जितम् ॥

अर्चितं परमेशानं भवं शर्वमुमापतिम् ।

सकृत्प्रसङ्गाद्वा दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥

पूजितं वा महादेवं पूज्यमानमथापि वा ।

दृष्ट्वा प्रयाति वै मर्त्यो ब्रह्मलोकं न संशयः ॥

श्रुत्वानुमोदयेच्चापि स याति परमां गतिम् ।

यो दद्याद् घृतदीपं च सकृल्लिङ्गस्य चाग्रतः ॥

सतां गतिमवाप्नोति स्वाश्रमैर्दुर्लभां स्थिराम् ।

दीपवृक्षं पार्थिवं वा दारवं वा शिवालये ॥

। पाद्य - आचमन - अर्घ्य प्रदान करके उन्हें दिव्य जलोंसे ॥ १३ स्नान कराना चाहिये । पुनः घी, दूध तथा दहीसे रुद्रको । स्नान कराना चाहिये एवं विधिपूर्वक स्वच्छ करना चाहिये । १४ तत्पश्चात् शुद्ध जलसे स्नान कराकर चन्दन आदिस पूजन करना चाहिये; पुनः रोचन आदिसे पूजन करके । ॥। १५ दिव्य पुष्पों, अखण्ड बिल्वपत्रों, अनेक प्रकारके पद्मों. नीलकमलों, रक्तकमलों, नन्द्यावर्तपुष्पों, मल्लिका, चम्पक, जातिपुष्पों, बकुलों, कनैरके पुष्पों, शमीपुष्पों, बृहत्पुष्पों, ॥ १६ धतूरके पुष्पों, अगस्त्यके उदित होनेपर खिलनेवाले पुष्पों, अपामार्ग - कदम्बके गुच्छों तथा सुन्दर आभूषणोंसे पूजन १७ करके पाँच प्रकारके धूप प्रदान करके पायस ( खीर ) निवेदित करना चाहिये । तदनन्तर दधिमिश्रित भात, मधु-१८ घृत मिला हुआ भात, पका हुआ अन्न और मूँगका पका हुआ अन्न — यह छः प्रकारका अन्न निवेदित करे; अथवा १ ९ पाँच प्रकारका घृतमिश्रित अन्न निवेदित करे; अथवा केवल एक आढ़क ( चार प्रस्थ ) शुद्ध चावल पकाये और उसे निवेदित करे । अन्तमें प्रदक्षिणा करके बार-२० बार नमस्कारकर देवता ईशानकी स्तुति करके पुनः शंकरजीकी विधिवत् पूजा करके ईशान, तत्पुरुष, अघोर, २१ वामदेव तथा सद्योजात मन्त्रोंका जप करते हुए इन पाँच । मन्त्रोंसे शिवकी पूजा करे । इस विधिसे [ पूजा करनेपर ] २२ देव महेश्वर प्रसन्न होते हैं ॥ १०- २२ ॥ हे श्रेष्ठ द्विजो! शिवपूजनमें उपयोग किये गये पुष्प, २३ पत्र आदिके साथ वृक्ष और गायें — ये सब परम गतिको प्राप्त होते हैं । जो एक बार भी शिव, रुद्र, शर्व, भव, २४ अजकी पूजा करता है; वह पुनर्जन्मरहित शिवसायुज्यको प्राप्त कर लेता है । एक बार अथवा प्रसंगवश भी पूजित परमेश्वर, भव, उमापतिका दर्शन करके मनुष्य सभी २५ पापोंसे मुक्त हो जाता है । पूजित किये गये अथवा पूजित होते हुए महादेवका दर्शनकर मनुष्य ब्रह्मलोकको जाता २६ है; इसमें सन्देह नहीं है॥२३–२६ ॥ जो [ शिवके सम्बन्धमें ] कुछ भी सुनकर उसका २७ अनुमोदन करता है, वह परमगति प्राप्त करता जो | शिवके समक्ष एक बार भी घृतका दीपक अर्पित करता २८ | है, वह वर्णाश्रमी लोगोंके लिये दुर्लभ स्थिर गति प्राप्त

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अध्याय ८० ] देवताओंका कैलासपुरी आकर उमासहित भगवान् शिवके दर्शन करना ३८७

दत्त्वा कुलशतं साग्रं शिवलोके महीयते ।

आयसं ताम्रजं वापि रौप्यं सौवर्णिकं तथा ॥ २ ९

शिवाय दीपं यो दद्याद्विधिना वापि भक्तितः ।

सूर्यायुतसमैः श्लक्ष्णैर्यानैः शिवपुरं व्रजेत् ॥ ३०

कार्तिके मासि यो दद्याद् घृतदीपं शिवाग्रतः ।

सम्पूज्यमानं वा पश्येद्विधिना परमेश्वरम् ॥ ३१

स याति ब्रह्मणो लोकं श्रद्धया मुनिसत्तमाः ।

आवाहनं सुसान्निध्यं स्थापनं पूजनं तथा ॥ ३२

सम्प्रोक्तं रुद्रगायत्र्या आसनं प्रणवेन वै ।

पञ्चभिः स्नपनं प्रोक्तं रुद्राद्यैश्च विशेषतः ॥ ३३

एवं सम्पूजयेन्नित्यं देवदेवमुमापतिम् ।

ब्रह्माणं दक्षिणे तस्य प्रणवेन समर्चयेत् ॥ ३४

उत्तरे देवदेवेशं विष्णुं गायत्रिया यजेत् ।

वह्नौ हुत्वा यथान्यायं पञ्चभिः प्रणवेन च ॥ ३५

स याति शिवसायुज्यमेवं सम्पूज्य शङ्करम् ।

इति सङ्क्षेपतः प्रोक्तो लिङ्गार्चनविधिक्रमः ॥ ३६

व्यासेन कथितः पूर्वं श्रुत्वा रुद्रमुखात्स्वयम् ॥ ३७ ।

करता है । शिवालय में मिट्टी अथवा लकड़ीका बना हुआ दीपवृक्ष ( दीवट ) प्रदान करके मनुष्य आगेके सौ कुलोंसहित शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है । जो विधान के अनुसार भक्तिपूर्वक लोहे, ताँबे, चाँदी अथवा सोनेका बना हुआ दीपक शिवको समर्पित करता है, वह दस हजार सूर्योंके समान देदीप्यमान विमानोंसे शिवलोकको जाता है । हे श्रेष्ठ मुनियो! जो कार्तिक महीनेमें शिवके सामने घृतका दीपक समर्पित करता है अथवा विधानके साथ पूजित होते हुए परमेश्वरका दर्शन श्रद्धापूर्वक करता है, वह ब्रह्मलोकको जाता है ॥ २७–३११ / २ ॥ [ शिवका ] आवाहन, उत्तम सान्निध्य, स्थापन तथा पूजन रुद्रगायत्री [ मन्त्र ] - द्वारा और आसन प्रणव-द्वारा बताया गया है । [ सद्योजात आदि ] पाँच मन्त्रोंसे तथा विशेषरूपसे रुद्रमन्त्रोंसे उनका स्नान बताया गया है । इस प्रकार देवदेव उमापतिकी पूजा नित्य करे । उनके दक्षिणमें ब्रह्माकी पूजा प्रणवसे करे और उत्तरमें देवदेवेश विष्णुकी पूजा गायत्री [ मन्त्र ] -से करे । विधिके अनुसार [ सद्योजात आदि ] पाँच मन्त्रोंसे तथा प्रणवसे अग्निमें होम करे । इस प्रकार शंकरकी भलीभाँति पूजा करके वह [ मनुष्य ] शिवसायुज्य प्राप्त करता है । [ हे ऋषियो! ] मैंने संक्षेपमें लिङ्गार्चनविधिका क्रम बता दिया; पहले स्वयं रुद्रके मुखसे इसे सुनकर व्यासजीने मुझको बताया था॥३२–३७ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवार्चनविधिर्नामैकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७ ९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ' शिवार्चनविधि ' नामक उन्यासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ९ ॥ अस्सीवाँ अध्याय देवताओंका कैलासपुरी आकर वहाँ विराजमान उमासहित भगवान् शिवके दर्शन करना तथा भगवान् शिवद्वारा देवताओंको ऋषय ऊचुः

कथं पशुपतिं दृष्ट्वा पशुपाशविमोक्षणम् ।

पशुत्वं तत्यजुर्देवास्तन्नो वक्तुमिहार्हसि ॥ १

सूत उवाच

पुरा कैलासशिखरे भोग्याख्ये स्वपुरे स्थितम् ।

समेत्य देवाः सर्वज्ञमाजग्मुस्तत्प्रसादतः ॥ २

पाशुपतव्रतका उपदेश प्रदान करना ऋषिगण बोले - – [ हे सूतजी! ] पशुपतिका दर्शन करके पशुपाशसे मुक्ति किस प्रकार होती है; देवताओंने पशुत्वका कैसे त्याग किया? इसे आप कृपा करके हम लोगोंको बतायें ॥ १ ॥

सूतजी बोले- पूर्वकालमें कैलास - शिखरपर भोग्य | नामक अपने पुरमें स्थित सर्वज्ञ शिवके पास सभी देवता

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३८८ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग हिताय सर्वदेवानां ब्रह्मणा च जनार्दनः । | उनकी कृपासे एक साथ मिलकर आये । सभी देवताओंके गरुडस्य तथा स्कन्धमारुह्य पुरुषोत्तमः ॥ ३ हितके लिये जनार्दन पुरुषोत्तम विष्णु भी गरुड़के जगाम देवताभिर्वै देवदेवान्तिकं हरिः । स्कन्धपर बैठकर ब्रह्मा तथा सभी देवताओंके साथ देवदेव शिवके पास पहुँचे ॥ २-३१ / २ ॥ सर्वे सम्प्राप्य देवस्य सार्धं गिरिवरं शुभम् ॥ ४ सेन्द्राः ससाध्याः सयमाः प्रणेमुर्गिरिमुत्तमम् । भगवान् वासुदेवोऽसौ गरुडाद् गरुडध्वजः । अवतीर्य गिरिं मेरुमारुरोह सुरोत्तमैः सकलदुरितहीनं सर्वदं भोगमुख्यं मुदितकुररवृन्दं नादितं नागवृन्दैः । मधुररणितगीतं सानुकूलान्धकारं पदरचितवनान्तं कान्तवातान्ततोयम् ॥

भवनशतसहस्त्रैर्जुष्टमादित्यकल्पै-र्ललितगतिविदग्धैर्हंसवृन्दैश्च भिन्नम् ।

धवखदिरपलाशैश्चन्दनाद्यैश्च वृक्षै-र्द्विजवरगणवृन्दैः कोकिलाद्यैर्द्विरेफैः ॥

क्वचिदशेषसुरद्रुमसङ्कुलं कुरबकैः प्रियकैस्तिलकैस्तथा । बहुकदम्बतमाललतावृतं गिरिवरं शिखरैर्विविधैस्तथा ॥

गिरेः पृष्ठे पुरं शार्वं कल्पितं विश्वकर्मणा ।

क्रीडार्थं देवदेवस्य भवस्य परमेष्ठिनः ॥

अपश्यंस्तत्पुरं देवाः सेन्द्रोपेन्द्राः समाहिताः ।

प्रणेमुर्दूरतश्चैव प्रभावादेव शूलिनः ॥

सहस्त्रसूर्यप्रतिमं महान्तं सहस्रशः सर्वगुणैश्च भिन्नम् । जगाम कैलासगिरिं महात्मा मेरुप्रभागे पुरमादिदेवः ॥ ततोऽथ नारीगजवाजिसङ्कुलं रथैरनेकैरमरारिसूदनः गणेशैश्च गिरीन्द्रसन्निभं महापुरद्वारमजो हरिश्च ॥ इन्द्र, साध्यगण तथा यमसहित सभी लोगोंने एक साथ शिवके गिरिश्रेष्ठ, शुभ तथा उत्तम पर्वतश्रेष्ठ मेरुपर आकर उस गिरिको प्रणाम किया । वे गरुड़ध्वज ॥ ५ भगवान् वासुदेव गरुड़से उतरकर उत्तम देवताओंके साथ मेरु पर्वतपर चढ़ गये; वह समस्त पापोंसे रहित, सबकुछ देनेवाला, उत्तम भोगोंसे युक्त, आनन्दित कुरर पक्षियोंसे समन्वित, हाथियोंकी ध्वनियोंसे निनादित, ६ मधुर गीतोंसे गुंजित, अन्य पर्वतोंके पृष्ठभागको अपने छायारूपी अन्धकारसे युक्त करनेवाला, पदचिह्नोंसे युक्त वन - प्रदेशवाला, सुन्दर हवाओं तथा जलसे परिपूर्ण, सूर्यके समान प्रदीप्त सैकड़ों - हजारों भवनोंसे युक्त, ७ मनोहर गतिवाले हंससमूहोंसे मण्डित, धव - खदिर-पलाश - चन्दन आदि वृक्षोंसे परिपूर्ण, उत्तम पक्षियोंके समूहोंसे युक्त, कोकिल आदि तथा भौंरोंसे शोभायमान, कहीं - कहीं बहुत - से दिव्य वृक्षोंसे भरा हुआ, कुरबक-प्रियक- तिलक पुष्पवृक्षोंसे सम्पन्न, बहुत - से कदम्ब-८ तमाल - लताओंसे घिरा हुआ तथा अनेक प्रकारके शिखरोंसे युक्त श्रेष्ठ पर्वत है ॥ ४–८ ॥ ९ [ इस ] पर्वतके पृष्ठपर देवदेव परमेश्वर शिवके विहारके लिये विश्वकर्माने एक शिवपुरका निर्माण किया है । इन्द्र तथा उपेन्द्रसहित सभी देवताओंने उस १० पुरको ध्यानपूर्वक देखा और शिवजीके प्रभावसे दूरसे ही उसे प्रणाम किया ॥ ९ -१० ॥ महात्मा आदिदेव [ विष्णु ] मेरुके एक भागमें [ स्थित ] हजारों सूर्योंके समान देदीप्यमान, हजारों तरहसे ११ । महान्, सभी गुणोंसे युक्त कैलासगिरिपर गये । तदनन्तर ब्रह्मा तथा देवशत्रुओंका विनाश करनेवाले विष्णु उस महान् पुरके द्वारपर पहुँचे; जो स्त्रियों, हाथियों, घोड़ों, अनेक रथों, गणों तथा गणेश्वरोंसे भरा हुआ था और १२ । महापर्वतके समान प्रतीत रहा था ॥ ११-१२ ॥