लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 501–510

लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 501–510

पृष्ठ 501

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अध्याय ९ ५ ] नृसिंहावतारके सन्दर्भमें भक्त प्रह्लादकी कथा ' महेश्वरके

स्तोष्यामस्त्वां कथं भासि देवदेव मृगाधिप ।

स्तुतोऽपि विविधैः स्तुत्यैर्भावैर्नानाविधैः प्रभुः ॥

न जगाम द्विजाः शान्तिं मानयन् योनिमात्मनः ।

यो नृसिंहस्तवं भक्त्या पठेद्वार्थं विचारयेत् ॥

श्रावयेद्वा द्विजान् सर्वान् विष्णुलोके महीयते ।

तदन्तरे शिवं देवाः सेन्द्राः सब्रह्मकाः प्रभुम् ॥

सम्प्राप्य तुष्टुवुः सर्वं विज्ञाप्य मृगरूपिणः ।

ततो ब्रह्मादयस्तूर्णं संस्तूय परमेश्वरम् ॥

आत्मत्राणाय शरणं जग्मुः परमकारणम् ।

मन्दरस्थं महादेवं क्रीडमानं सहोमया ॥

सेवितं गणगन्धर्वैः सिद्धैरप्सरसां गणैः ।

देवताभिः सह ब्रह्मा भीतभीतः सगद्गदम् ।

प्रणम्य दण्डवद्भूमौ तुष्टाव परमेश्वरम् ॥

ब्रह्मोवाच

नमस्ते कालकालाय नमस्ते रुद्र मन्यवे ।

नमः शिवाय रुद्राय शङ्कराय शिवाय ते ॥

उग्रोऽसि सर्वभूतानां नियन्तासि शिवोऽसि नः ।

नमः शिवाय शर्वाय शङ्करायार्तिहारिणे ॥

मयस्कराय विश्वाय विष्णवे ब्रह्मणे नमः ।

अन्तकाय नमस्तुभ्यमुमायाः पतये नमः ॥

हिरण्यबाहवे साक्षाद्धिरण्यपतये नमः ।

शर्वाय सर्वरूपाय पुरुषाय नमो नमः ॥

सदसद्व्यक्तिहीनाय महतः कारणाय ते ।

नित्याय विश्वरूपाय जायमानाय ते नमः ॥

जाताय बहुधा लोके प्रभूताय नमो नमः ।

रुद्राय नीलरुद्राय कद्रुद्राय प्रचेतसे ॥

शरभावतारका प्राकट्य ४ ९९ की स्तुति हम लोग कैसे करें? हे देवदेव! हे नृसिंह! २ ९ आप बहुत देदीप्यमान हो रहे हैं॥२१–२८२ ॥ हे द्विजो! विविध भावोंसे युक्त नानाविध स्तुतियोंसे प्रार्थना किये जानेपर भी वे प्रभु अपने सिंहरूपका ३० सम्मान करते हुए शान्त नहीं हुए । जो नृसिंह स्तुतिको भक्तिपूर्वक पढ़ता है अथवा इसके अर्थका चिन्तन करता है अथवा सभी द्विजोंको सुनाता है, वह ३१ विष्णुलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ २ ९ -३०१ / २ ॥ तत्पश्चात् इन्द्र तथा ब्रह्मासहित सभी देवता प्रभु ३२ शिवका ध्यान करके नृसिंहरूपधारी विष्णुके विषयमें सब कुछ कहकर उनकी स्तुति करने लगे । तदनन्तर परमेश्वरकी स्तुति करके ब्रह्मा आदि [ देवता ] अपनी ३३ रक्षाके लिये मन्दर पर्वतपर स्थित, उमाके साथ विहार करते हुए और गन्धर्वों, सिद्धों- अप्सराओंसे सेवित परमकारण महादेवकी शरणमें गये । भयभीत ब्रह्माजी देवताओंके साथ दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिरकर गद्गद ३४ वाणीमें परमेश्वरकी स्तुति करने लगे॥३१–३४ ॥ ब्रह्माजी बोले - [ हे शिव! ] आप कालान्तकको नमस्कार है । हे रुद्र! आप क्रोधरूपको नमस्कार है । आप मोक्षरूप रुद्र, शंकर तथा शिवको नमस्कार ३५ है । आप उग्र हैं, सभी प्राणियोंके नियन्ता हैं और हम भक्तोंके लिये कल्याणकारक हैं । दुःखका ३६ नाश करनेवाले शिव, शर्व तथा शंकरको नमस्कार है ॥ ३५-३६ ॥ आप सुखकर, विश्वरूप, विष्णु, ब्रह्माको नमस्कार ३७ है । आप अन्तक ( संहारकर्ता ) - को नमस्कार है; उमापतिको नमस्कार है । सुवर्णमय बाहुवाले तथा साक्षात् हिरण्यपतिको बार - बार नमस्कार है; शर्व, सर्वरूप तथा पुरुषको बार-३८ बार नमस्कार है । सत् - असत्रूपसे रहित और महत्तत्त्वके उत्पादक आपको नमस्कार है; आप नित्य, विश्वरूप तथा उत्पन्न होनेवालेको नमस्कार है । संसारमें अनेक ३ ९ रूपोंमें अवतार लेनेवाले और प्रभूतको नमस्कार है; आप रुद्र, नीलरुद्र, कद्रुद्र नामक मन्त्ररूप तथा प्रचेताको ४० नमस्कार है ॥ ३७–४० ॥

पृष्ठ 502

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५०० कालाय कालरूपाय नमः कालाङ्गहारिणे मीढुष्टमाय देवाय शितिकण्ठाय ते नमः महीयसे नमस्तुभ्यं हन्त्रे देवारिणां सदा ताराय च सुताराय तारणाय नमो नमः हरिकेशाय देवाय शम्भवे परमात्मने देवानां शम्भवे तुभ्यं भूतानां शम्भवे नमः शम्भवे हैमवत्याश्च मन्यवे रुद्ररूपिणे कपर्दिने नमस्तुभ्यं कालकण्ठाय ते नमः हिरण्याय महेशाय श्रीकण्ठाय नमो नमः भस्मदिग्धशरीराय दण्डमुण्डीश्वराय च नमो ह्रस्वाय दीर्घाय वामनाय नमो नमः नम उग्रत्रिशूलाय उग्राय च नमो नमः भीमाय भीमरूपाय भीमकर्मरताय ते अग्रेवधाय वै भूत्वा नमो दूरेवधाय च धन्विने शूलिने तुभ्यं गदिने हलिने नमः चक्रिणे वर्मिणे नित्यं दैत्यानां कर्मभेदिने सद्याय सद्यरूपाय सद्योजाताय ते नमः वामाय वामरूपाय वामनेत्राय ते नमः अघोररूपाय विकटाय विकटशरीराय ते नमः पुरुषरूपाय पुरुषैकतत्पुरुषाय वै नमः पुरुषार्थप्रदाना पतये परमेष्ठिने ईशानाय नमस्तुभ्यमीश्वराय नमो नमः ब्रह्मणे ब्रह्मरूपाय नमः साक्षाच्छिवाय ते श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग 95 । आप काल तथा कालरूपको नमस्कार है ; आप ॥ ४१ कालविनाशक, मीढुष्टम तथा भगवान् शितिकण्ठको नमस्कार है । आप महान्को तथा सदा देवशत्रुओंके । । संहार - कर्ताको नमस्कार है; तार ( प्रणवरूप ), सुतार ॥ ४२ तथा उद्धारकर्ताको नमस्कार है 1 । हरितवर्णके केशवाले . परमात्मस्वरूप, देवताओंके कल्याणकारक तथा [ समस्त ] । प्राणियोंके कल्याणकारक आप भगवान् शम्भुको नमस्कार ॥ ४३ है ॥ ४१–४३ ॥ आप पार्वतीके कल्याणकारक, यज्ञरूप, रुद्ररूप । तथा कपर्दीको नमस्कार है; आप कालकण्ठको नमस्कार ॥ ४४ है । सुवर्णमय वर्णवाले महेशको तथा श्रीकण्ठको नमस्कार है । भस्मसे लिप्त शरीरवाले तथा दण्ड । मुण्डीश्वरको नमस्कार । ह्रस्व ( लघु ), दीर्घ तथा ॥ ४५ वामनको नमस्कार है । भयानक त्रिशूल धारण करनेवाले तथा उग्र स्वभाववालेको बार - बार नमस्कार है । आप । भयंकर स्वरूपवाले तथा भयानक कर्ममें रत रहनेवाले ॥ ४६ भीमको नमस्कार है । सबसे आगे होकर [ शत्रुओंका ] । वध करनेवाले और दूर स्थानसे भी वध करनेवाले [ शिव ] - को नमस्कार है ॥ ४४-४७ ॥ ॥ ४७ आप धनुर्धारी, शूलधारी, गदाधारी, हलधारी, | चक्रधारी, कवचधारी तथा [ गजाननरूपसे ] सदा दैत्योंके ॥ ४८ कर्मका नाश करनेवाले [ शिव ] को नमस्कार है । आप सद्यमन्त्ररूप, सद्यरूप, सद्योजात अवतार स्वरूपको । नमस्कार है । वाम - मन्त्ररूप, सुन्दररूपवाले तथा सुन्दर ॥ ४ ९ नेत्रवाले आप [ शिव ] - को नमस्कार है । अघोरमन्त्ररूप, विकट रूपवाले तथा विकट शरीरवाले आप [ शिव ] -। को नमस्कार है । पुरुषरूपवाले तथा पुरुषोंमें एकमात्र ॥ ५० तत्पुरुष ( उत्तम पुरुष ) आपको नमस्कार है । पुरुषार्थं प्रदान करनेवाले, सबके स्वामी, परमेष्ठी तथा ईशानमन्त्ररूप । आप शिवको नमस्कार है । आप ईश्वरको बार - बार ॥ ५१ नमस्कार है । ब्रह्मरूपवाले तथा साक्षात् सगुण शिवरूपवाले आप ब्रह्मको नमस्कार है ॥ ४८ ८-५११ - / २ 11 । विश्वकी सृष्टि करनेवाले सर्वरूप प्रभु सर्वविष्णुर्नृसिंहस्य रूपमास्थाय विश्वकृत् ॥५२ | विष्णु नृसिंहका रूप धारण करके तथा जगत्‌के कल्याणके

पृष्ठ 503

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अध्याय ९ ५ ] नृसिंहावतारके सन्दर्भमें भक्त प्रह्लादकी कथा महेश्वरके KKKKKKKKKKKKKKKKK शरभावतारका प्राकट्य ५०१

हिरण्यकशिपुं हत्वा करजैर्निशितैः स्वयम् ।

दैत्येन्द्रैर्बहुभिः सार्धं हितार्थं जगतां प्रभुः ॥५३

सैंहीं समानयन् योनिं बाधते निखिलं जगत् ।

यत्कृत्यमत्र देवेश तत्कुरुष्व भवानिह ॥ ५४

उग्रोऽसि सर्वदुष्टानां नियन्तासि शिवोऽसि नः ।

कालकूटादिवपुषा त्राहि नः शरणागतान् ॥ ५५

शुक्रं तु वृत्तं विश्वेश क्रीडा वै केवलं वयम् ।

तवोन्मेषनिमेषाभ्यामस्माकं प्रलयोदयौ ॥ ५६

उन्मीलये त्वयि ब्रह्मन् विनाशोऽस्ति न ते शिव ।

सन्तप्ताः स्मो वयं देव हरिणामिततेजसा ॥ ५७

सर्वलोकहितायैनं तत्त्वं संहर्तुमिच्छसि । सूत उवाच विज्ञापितस्तथा देवः प्रहसन् प्राह तान् सुरान् ॥ ५८

अभयं च ददौ तेषां हनिष्यामीति तं प्रभुः ।

सोऽपि शक्रः सुरैः सार्धं प्रणिपत्य यथागतम् ॥ ५ ९

जगाम भगवान् ब्रह्मा तथान्ये च सुरोत्तमाः ।

अथोत्थाय महादेवः शारभं रूपमास्थितः ॥ ६०

ययौ प्रान्ते नृसिंहस्य गर्वितस्य मृगाशिनः ।

अपहृत्य तदा प्राणान् शरभः सुरपूजितः ॥ ६१

सिंहात्ततो नरो भूत्वा जगाम च यथाक्रमम् ।

एवं स्तुतस्तदा देवैर्जगाम स यथाक्रमम् ॥ ६२

यः पठेच्छृणुयाद्वापि संस्तवं शार्वमुत्तमम् ।

रुद्रलोकमनुप्राप्य रुद्रेण सह मोदते ॥ ६३

लिये अनेक प्रमुख दैत्योंसहित हिरण्यकशिपुको अपने तीक्ष्ण नखोंसे स्वयं मारकर सिंहरूपका सम्मान करते हुए सम्पूर्ण जगत्को सन्त्रस्त कर रहे हैं; हे देवेश! अब इस विषयमें जो उचित कार्य हो, उसे आप | करें ॥ ५२-५४ ॥ आप उग्र हैं, सभी दुष्टोंको नियन्त्रणमें रखनेवाले हैं और हम लोगोंके लिये कल्याणकारक हैं । कालकूट आदि शरीरसे हम शरणागतोंकी रक्षा कीजिये । हे विश्वेश! आपका आचरण शुद्ध है और हम लोग आपके क्रीड़ामात्र हैं । आपके उन्मेष तथा निमेषसे हम लोगों के प्रलय तथा उदय होते हैं । हे ब्रह्मन्! हे शिव! आपके उन्मीलन करनेपर भी आपका विनाश नहीं होता है । हे देव! अमित तेजवाले नृसिंहरूपधारी विष्णुके द्वारा हमलोग सन्तप्त हो रहे हैं; अतः सभी लोकोंके हितके लिये आप इस [ नृसिंहरूप ] - को समाप्त करनेका विचार करें ॥५५–५७ / २ ॥ सूतजी बोले- इस प्रकार प्रार्थना किये जानेपर प्रभु महादेवने उन देवताओंको अभयदान दिया और मुसकराते हुए उनसे कहा- ' मैं उनका संहार करूँगा । ' इसके बाद शिवको प्रणाम करके इन्द्र सभी देवताओंके साथ जैसे आये थे, वैसे ही चले गये और भगवान् ब्रह्मा तथा अन्य श्रेष्ठ देवता भी चले गये ॥ ५८-५९ १/२ ॥ तदनन्तर [ वहाँसे ] उठकर शरभका रूप धारणकर महादेवजी असुरभक्षक गर्वयुक्त नृसिंहके पास पहुँचे । तब प्राणोंका हरण करके वे शरभरूपधारी शिव देवताओं द्वारा पूजित हुए । तत्पश्चात् नृसिंहरूपसे मानवरूप होकर वे विष्णु [ वहाँसे ] चले गये । इस प्रकार उस समय देवताओंसे स्तुत होकर शिवजी भी [ अपने स्थानको ] चले गये ॥ ६०-६२ ॥ जो [ व्यक्ति ] शिवजीकी इस उत्तम स्तुतिको पढ़ता अथवा सुनता है, वह रुद्रलोक प्राप्त करके । [ भगवान् ] रुद्रके साथ आनन्दित रहता है ॥६३ ॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे नृसिंहलीलावर्णनं नाम पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ' नृसिंहलीलावर्णन ' नामक पंचानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ ५ ॥

पृष्ठ 504

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५०२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग छानबेवाँ अध्याय महेश्वरद्वारा वीरभद्रका आवाहन और नृसिंहके तेजको शमन करनेके लिये भगवान् भेजना, वीरभद्र तथा नृसिंहका संवाद, नृसिंहतेजको शान्त करना ऋषय ऊचुः

कथं देवो महादेवो विश्वसंहारकारकः ।

शरभाख्यं महाघोरं विकृतं रूपमास्थितः ॥ १

किं किं धैर्यं कृतं तेन ब्रूहि सर्वमशेषतः । सूत उवाच एवमभ्यर्थितो देवैर्मतिं चक्रे कृपालयः ॥ २

यत्तेजस्तु नृसिंहाख्यं संहर्तुं परमेश्वरः ।

तदर्थं स्मृतवान् रुद्रो वीरभद्रं महाबलम् ॥ ३ ।

आत्मनो भैरवं रूपं महाप्रलयकारकम् ।

आजगाम पुरा सद्यो गणानामग्रतो हसन् ॥ ४

साट्टहासैर्गणवरैरुत्पतद्भिरितस्ततः नृसिंहरूपैरत्युग्रैः कोटिभिः परिवारितः ॥ ५

तावद्भिरभितो वीरैर्नृत्यद्भिश्च मुदान्वितैः ।

क्रीडद्भिश्च महार्धीरैर्ब्रह्माद्यैः कन्दुकैरिव ॥ ६

अदृष्टपूर्वैरन्यैश्च वेष्टितो वीरवन्दितः ।

कल्पान्तज्वलनज्वालो विलसल्लोचनत्रयः ॥ ७

आत्तशस्त्रो जटाजूटे ज्वलद्बालेन्दुमण्डितः ।

बालेन्दुद्वितयाकारतीक्ष्णदंष्ट्राङ्कुरद्वयः ॥ ८

आखण्डलधनुः खण्डसन्निभभ्रूलतायुतः ।

महाप्रचण्डहुङ्कारबधिरीकृतदिङ्मुखः ॥ ९

नीलमेघाञ्जनाकारभीषणश्मश्रुरद्भुतः वादखण्डमखण्डाभ्यां भ्रामयंस्त्रिशिखं मुहुः ॥ १०

वीरभद्रोऽपि भगवान् वीरशक्तिविजृम्भितः ।

स्वयं विज्ञापयामास किमत्र स्मृतिकारणम् ॥ ११

आज्ञापय जगत्स्वामिन् प्रसादः क्रियतां मयि । भगवान् शिवका शरभावतार धारण एवं नृसिंहद्वारा शिवस्तुति ऋषिगण बोले – [ हे सूतजी! ] विश्वका संहार करनेवाले भगवान् महादेवने अत्यन्त भयंकर तथा विकृत शरभनामक रूप कैसे धारण किया और उन्होंने कौन - सा साहसपूर्ण कृत्य किया; यह सब पूर्णरूपसे बताइये ॥ ११२ ॥ सूतजी बोले- इस प्रकार देवताओंके प्रार्थना करनेपर कृपानिधान शिवने नृसिंहसंज्ञक तेजको नष्ट करनेका निश्चय किया और इसके लिये रुद्रने महाप्रलय करनेवाले अपने भैरवरूप महाबली वीरभद्रका स्मरण किया ॥ २-३१ / २ ॥ तब वे [ वीरभद्र ] गणोंके आगे होकर हँसते हुए शीघ्र ही वहाँ आये । वे करोड़ों श्रेष्ठ गणोंसे घिरे हुए थे, जो अट्टहास कर रहे थे, इधर - उधर उछल रहे थे, नृसिंहके रूपवाले थे तथा अत्यन्त उग्र थे । वे नृत्य कर हुए तथा महाधीर ब्रह्मा आदिके साथ गेंदकी भाँति खेलते हुए प्रसन्न वीरोंसे घिरे हुए थे । वे वीरवन्द्य [ वीरभद्र ] कभी न देखे गये अन्य वीरोंसे भी आवृत थे । वे [ वीरभद्र ] प्रलयाग्निकी ज्वालाके समान थे, वे तीन नेत्रोंसे विभूषित थे, वे शस्त्र धारण किये हुए थे, उनके जटाजूटमें देदीप्यमान बालचन्द्रमा शोभा दे रहा था, वे बालचन्द्रके समान आकारवाले अति शुभ्र तथा | तीक्ष्ण दो दाँतोंसे सुशोभित थे, वे इन्द्रधनुषके समान भौंहों युक्त थे, वे अपने महाप्रचण्ड हुंकारसे दिशाओंको वधिर बना दे रहे थे, वे नील मेघ तथा अंजनके समान आकारवाले भयंकर श्मश्रु ( दाढ़ी ) –से युक्त थे, वे अद्भुत रूपवाले थे और अपनी अपराजित भुजाओंसे विवादका शमन करनेवाले त्रिशूलको बार - बार घुमा रहे | थे | इस प्रकारकी वीरताकी शक्तिसे परिपूर्ण भगवान् वीरभद्रने स्वयं निवेदन किया— ' हे जगत्स्वामिन्! यहाँपर | मुझको स्मरण करनेका क्या कारण है? आज्ञा प्रदान

पृष्ठ 505

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अध्याय ९ ६ ] भगवान् महेश्वरद्वारा वीरभद्रका श्रीभगवानुवाच अकाले भयमुत्पन्नं देवानामपि भैरव ॥ १२

ज्वलितः स नृसिंहाग्निः शमयैनं दुरासदम् ।

सान्त्वयन् बोधयादौ तं तेन किं नोपशाम्यति ॥ १३

ततो मत्परमं भावं भैरवं सम्प्रदर्शय ।

सूक्ष्मं सूक्ष्मेण संहृत्य स्थूलं स्थूलेन तेजसा ॥१४

वक्त्रमानय कृत्तिं च वीरभद्र ममाज्ञया ।

इत्यादिष्टो गणाध्यक्षः प्रशान्तवपुरास्थितः ॥ १५

जगाम रंहसा तत्र यत्रास्ते नरकेसरी ।

ततस्तं बोधयामास वीरभद्रो हरो हरिम् ॥ १६

उवाच वाक्यमीशानः पितापुत्रमिवौरसम् । श्रीवीरभद्र उवाच जगत्सुखाय भगवन्नवतीर्णोऽसि माधव ॥ १७

स्थित्यर्थेन च युक्तोऽसि परेण परमेष्ठिना ।

जन्तुचक्रं भगवता रक्षितं मत्स्यरूपिणा ॥ १८

पुच्छेनैव समाबध्य भ्रमन्नेकार्णवे पुरा ।

बिभर्षि कूर्मरूपेण वाराहेणोद्धृता मही ॥ १ ९

अनेन हरिरूपेण हिरण्यकशिपुर्हतः ।

वामनेन बलिर्बद्धस्त्वया विक्रमता पुनः ॥ २०

त्वमेव सर्वभूतानां प्रभवः प्रभुरव्ययः ।

यदा यदा हि लोकस्य दुःखं किञ्चित्प्रजायते ॥ २१

तदा तदावतीर्णस्त्वं करिष्यसि निरामयम् ।

नाधिकस्त्वत्समोऽप्यस्ति हरे शिवपरायण ॥ २२

त्वया धर्माश्च वेदाश्च शुभे मार्गे प्रतिष्ठिताः ।

यदर्थमवतारोऽयं निहतः सोऽपि केशव ॥ २३

आवाहन " नृसिंहद्वारा शिवस्तुति ५०३ । कीजिये और मुझपर कृपा कीजिये॥४–११ / २ ॥ श्रीभगवान् बोले - हे भैरव! असमयमें देवताओंके समक्ष भय उत्पन्न हो गया है; वह नृसिंहरूपी अग्नि प्रज्वलित हो रही है; इस अति भयंकर अग्निको शान्त करो । उसे सान्त्वना देते हुए पहले समझाओ, यदि उससे वह शान्त नहीं होती है, तब मेरे महाभयंकर भैरवरूपको दिखाओ । हे वीरभद्र! मेरी आज्ञासे सूक्ष्मरूपको सूक्ष्म तेजसे तथा स्थूलरूपको स्थूल तेजसे विनष्ट करके उसके मुख तथा उसकी त्वचाको [ मेरे पास ] ले आओ ॥ १२-१४२ ॥ इस प्रकार आज्ञा प्राप्त किये हुए गणेश्वर वीरभद्र शान्तस्वरूप धारण करके वेगपूर्वक वहाँ पहुँच गये, जहाँ नृसिंह विराजमान थे । तदनन्तर भगवान् वीरभद्रने नृसिंहरूपधारी उन विष्णुको समझाया और जैसे पिता औरस पुत्रसे कहता है, उसी प्रकार ईशान [ वीरभद्र ] उनसे यह वचन कहने लगे ॥ १५-१६१ / २ ॥ श्री वीरभद्र बोले - हे भगवन्! हे माधव! आप तो जगत्‌के सुखके लिये अवतीर्ण हुए हैं; श्रेष्ठ ब्रह्माने [ संसारकी ] स्थितिके कार्यमें आपको लगाया है । पूर्वकालमें अपनी पूँछमें [ नावको ] बाँधकर विशाल | सागरमें भ्रमण करते हुए मत्स्यरूपधारी आप भगवान् [ विष्णु ] -ने जीव - समुदायकी रक्षा की थी । आप कूर्मके रूपसे जगत्को धारण करते हैं और वाराहरूपके द्वारा आपने पृथ्वीका उद्धार किया है । आपने इस सिंहरूपसे हिरण्यकशिपुका वध किया है । आपने वामनरूप धारणकर तीन पगोंद्वारा त्रिलोकीको मापकर बलिको बाँध लिया था ॥ १७–२० ॥ आप ही सभी प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाले, सबके स्वामी और अविनाशी हैं । जब- जब संसारपर कोई विपत्ति पड़ी है, तब - तब आपने अवतार लेकर उसे दुःखरहित किया है । हे हरे! हे शिवपरायण! आपसे बढ़कर अन्य कोई भी नहीं है । आपने [ समस्त ] धर्मों तथा वेदोंको उत्तम मार्गपर प्रतिष्ठित किया है । हे केशव! जिसके लिये आपने यह अवतार लिया है, वह । [ हिरण्यकशिपु भी ] आपके द्वारा मारा जा चुका है ।

पृष्ठ 506

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५०४ अत्यन्तघोरं भगवन्नरसिंहवपुस्तव उपसंहर विश्वात्मंस्त्वमेव मम सन्निधौ सूत उवाच इत्युक्तो वीरभद्रेण नृसिंहः शान्तया गिरा । ततोऽधिकं महाघोरं कोपं प्रज्वालयद्धरिः श्रीनृसिंह उवाच आगतोऽसि यतस्तत्र गच्छ त्वं मा हितं वद । इदानीं संहरिष्यामि जगदेतच्चराचरम् संहर्तुर्न हि संहारः स्वतो वा परतोऽपि वा शासितं मम सर्वत्र शास्ता कोऽपि न विद्यते मत्प्रसादेन सकलं समर्यादं प्रवर्तते अहं हि सर्वशक्तीनां प्रवर्तकनिवर्तकः यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा तत्तद्विद्धि गणाध्यक्ष मम तेजोविजृम्भितम् देवतापरमार्थज्ञा ममैव परमं विदुः मदंशाः शक्तिसम्पन्ना ब्रह्मशक्रादयः सुराः मन्नाभिपङ्कजाज्जातः पुरा ब्रह्मा चतुर्मुखः तल्ललाटसमुत्पन्नो भगवान् वृषभध्वजः रजसाधिष्ठितः स्त्रष्टा रुद्रस्तामस उच्यते श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । ' अतः हे भगवन्! हे विश्वात्मन्! हे नरसिंह! आप मेरी ॥ २४ उपस्थितिमें अपने इस अत्यन्त भयानक रूपको समेट लीजिये ॥ २१ - २४ ॥ सूतजी बोले – वीरभद्रके द्वारा शान्त वाणीमें इस | प्रकार कहे जानेपर नृसिंहरूपधारी विष्णुने पहलेसे भी ॥ २५ अधिक तथा महाभयानक कोपको प्रज्वलित किया ॥ २५ ॥ श्रीनृसिंह बोले— [ हे वीरभद्र! ] तुम जहाँसे आये हो, वहाँ चले जाओ; हितकी बात मत बोलो । मैं ॥ २६ इस समय इस चराचर जगत्का संहार कर डालूँगा ॥ संहारकर्ताका संहार अपनेसे अथवा दूसरेसे भी नहीं हो ॥ २७ सकता है । सभी जगह मेरा ही शासन है; अन्य कोई भी शासन करनेवाला नहीं है । मेरी कृपासे सम्पूर्ण जगत् । मर्यादायुक्त होकर क्रियाशील है; मैं ही सभी शक्तियोंका ॥ २८ प्रवर्तक तथा निवर्तक हूँ ॥ २६–२८ ॥ । हे गणाध्यक्ष! जो - जो विभूतिसम्पन्न, सत्त्वमय, ॥ २ ९ श्रीयुक्त तथा ऊर्जासे परिपूर्ण है, उसे मेरे ही तेजसे । परिवर्धित जानो । देवताओंके परम अर्थको जाननेवाले ॥ ३० । मेरे महान् सामर्थ्यको जानते हैं । शक्तिसम्पन्न ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवता मेरे ही अंश हैं । पूर्वकालमें चतुर्मुख ब्रह्मा । मेरे नाभिकमलसे उत्पन्न हुए थे और उनके ललाटसे ॥ ३१ भगवान् वृषभध्वज ( शिव ) उत्पन्न हुए थे । २ ९ –३१ ॥ । अहं नियन्ता सर्वस्य मत्परं नास्ति दैवतम् ॥ ३२ ब्रह्मा रजोगुणसे अधिष्ठित । रुद्र तमोगुणसे विश्वाधिकः स्वतन्त्रश्च कर्ता हर्ताखिलेश्वरः इदं तु मत्परं तेजः कः पुनः श्रोतुमिच्छति अतो मां शरणं प्राप्य गच्छ त्वं विगतज्वरः परमं भावमिदं भूतमहेश्वरः कालोऽस्म्यहं कालविनाशहेतु-र्लोकान् समाहर्तुमहं प्रवृत्तः मृत्योर्मृत्युं विद्धि मां वीरभद्र जीवन्त्येते मत्प्रसादेन देवाः सूत उवाच साहङ्कारमिदं श्रुत्वा हरेरमितविक्रमः विहस्योवाच सावज्ञं ततो विस्फुरिताधरः युक्त कहे जाते हैं । मैं सबका नियन्ता हूँ; मुझसे श्रेष्ठ । कोई देवता नहीं है । मैं सबसे बढ़कर हूँ, स्वतन्त्र हूँ, ॥ ३३ सबका स्रष्टा हूँ, संहार करनेवाला हूँ तथा सबका स्वामी । हूँ । मेरे इस [ नृसिंह नामक ] परम तेजके विषयमें कौन ॥ ३४ सुनना चाहता है? अतः मेरी शरण प्राप्त करके तुम | संतापरहित होकर [ यहाँसे ] जाओ; भूतोंके महेश्वर तुम मेरे इस परम भावको समझो ॥ ३२-३४ ॥ । मैं काल हूँ, मैं कालके भी विनाशका कारण हूँ । मैं लोकोंका संहार करनेमें प्रवृत्त हूँ । हे वीरभद्र! तुम ॥ ३५ मुझको मृत्युकी भी मृत्यु जानो; ये देवता भी मेरी । कृपासे जी रहे हैं ॥ ३५ ॥

। सूतजी बोले- विष्णुका यह अहंकारपूर्ण वचन || ३६ | सुनकर असीम पराक्रमवाले वीरभद्र स्फुरित ओठोंवाले

पृष्ठ 507

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अध्याय ९ ६ ] भगवान् महेश्वरद्वारा वीरभद्रका श्रीवीरभद्र उवाच

किं न जानासि विश्वेशं संहर्तारं पिनाकिनम् ।

असद्वादो विवादश्च विनाशस्त्वयि केवलः ॥ ३७

तवान्योन्यावताराणि कानि शेषाणि साम्प्रतम् ।

कृतानि येन केनापि कथाशेषो भविष्यति ॥ ३८

दोषं त्वं पश्य एतत्त्वमवस्थामीदृशीं गतः ।

तेन संहारदक्षेण क्षणात्सङ्क्षयमेष्यसि ॥ ३ ९

प्रकृतिस्त्वं पुमान् रुद्रस्त्वयि वीर्यं समाहितम् ।

त्वन्नाभिपङ्कजाज्जातः पञ्चवक्त्रः पितामहः ॥ ४०

सृष्ट्यर्थेन जगत्पूर्वं शङ्करं नीललोहितम् ।

ललाटे चिन्तयामास तपस्युग्रे व्यवस्थितः ॥ ४१

तल्ललाटादभूच्छम्भोः सृष्ट्यर्थं तन्न दूषणम् ।

अंशोऽहं देवदेवस्य महाभैरवरूपिणः ॥ ४२

त्वत्संहारे नियुक्तोऽस्मि विनयेन बलेन च ।

एवं रक्षो विदार्यैव त्वं शक्तिकलया युतः ॥ ४३

अहङ्कारावलेपेन गर्जसि त्वमतन्द्रितः ।

उपकारो ह्यसाधूनामपकाराय केवलम् ॥ ४४

यदि सिंह महेशानं स्वपुनर्भूत मन्यसे ।

न त्वं स्रष्टा न संहर्ता न स्वतन्त्रो हि कुत्रचित् ॥ ४५

कुलालचक्रवच्छक्त्या प्रेरितोऽसि पिनाकिना ।

अद्यापि तव निक्षिप्तं कपालं कूर्मरूपिणः ॥ ४६

हरहारलतामध्ये मुग्ध कस्मान्न बुध्यसे ।

विस्मृतं किं तदंशेन दंष्ट्रोत्पातनपीडितः ॥ ४७

वाराहविग्रहस्तेऽद्य साक्रोशं तारकारिणा ।

दग्धोऽसि यस्य शूलाग्रे विष्वक्सेनच्छलाद्भवान् ॥ ४८

आवाहन " नृसिंहद्वारा शिवस्तुति ५०५ होकर तिरस्कारपूर्ण भावसे हँसकर नृसिंहसे क लगे ॥ ३६ ॥

श्रीवीरभद्र बोले- क्या आप संहारकर्ता, पिनाकधारी विश्वेश्वर ( शिव ) - को नहीं जानते हैं? मिथ्या वाद-विवाद आपके लिये केवल विनाशस्वरूप ही है । जिस किसी प्रकारसे आपके द्वारा लिये गये विभिन्न अवतारोंमें कौन शेष रह गये हैं; अब तो केवल आप ही बचे हुए हैं । आप इस दोषको देखिये, जो आप इस दशाको प्राप्त हुए हैं । संहारमें दक्ष उन [ शिव ] -के द्वारा आप क्षणभरमें विनाशको प्राप्त हो जायँगे ॥ ३७–३९ ॥ आप प्रकृति हैं, रुद्र पुरुष हैं; आपमें [ सम्पूर्ण ] तेज समाहित है । पाँच मुखवाले पितामह ( ब्रह्मा ) आपके नाभिकमलसे प्रादुर्भूत हुए हैं । घोर तपस्यामें लीन उन्होंने पूर्वकालमें जगत्की सृष्टिके लिये अपने ललाटमें नीललोहित शंकरका चिन्तन किया । तब सृष्टिके लिये उनके ललाटसे शम्भु आविर्भूत हुए, अतः यह शिवका दूषण नहीं है । महाभैरवरूप देवदेव रुद्रका अंशस्वरूप मैं विनय तथा बलसे आपके संहारके लिये नियुक्त किया गया हूँ । इस प्रकार शक्तिकी कलासे युक्त आप इस राक्षसको विदीर्ण करके अहंकारके । वशीभूत होकर निरालस्य हो गर्जन कर रहे हैं । दुष्टोंके लिये किया गया उपकार केवल अपकारके लिये होता है । हे सिंह! यदि आप महेश्वरको अपनेसे बादमें उत्पन्न समझते हैं, तो यह आपका भ्रम है । आप न तो सृष्टिकर्ता हैं, न संहारकर्ता हैं और न तो किसी प्रकार स्वतन्त्र ही हैं; आप कुम्हारके चक्रकी भाँति शिवके द्वारा प्रेरित हैं ॥ ४०–४५१ % २ ॥ कूर्मरूपधारी आपका कपाल आज भी शिवके गलेके हारके मध्य स्थित है; हे मुग्ध! इसे आप क्यों नहीं याद कर रहे हैं? उनके अंशसे उत्पन्न तारकासुरशत्रु स्कन्दके द्वारा आक्रोशपूर्वक आपके वाराहविग्रहसे दाँत उखाड़ लिये जानेसे आपको बहुत कष्ट हुआ था; क्या इसे भी आप भूल गये हैं? विष्वक्सेनरूपसे आप उन रुद्रके त्रिशूलके अग्रभागसे छलपूर्वक जला दिये गये | थे ॥ ४६–४८ ॥

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श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग ५०६ 55555

दक्षयज्ञे शिरश्छिन्नं मया ते यज्ञरूपिणः ।

अद्यापि तव पुत्रस्य ब्रह्मणः पञ्चमं शिरः ॥

छिन्नं तमेनाभिसन्धं तदंशं तस्य तद्बलम् ।

निर्जितस्त्वं दधीचेन सङ्ग्रामे समरुद्गणः ॥

कण्डूयमाने शिरसि कथं तद्विस्मृतं त्वया ।

चक्रं विक्रमतो यस्य चक्रपाणे तव प्रियम् ॥

कुतः प्राप्तं कृतं केन त्वया तदपि विस्मृतम् ।

ते मया सकला लोका गृहीतास्त्वं पयोनिधौ ॥

निद्रापरवशः शेषे स कथं सात्त्विको भवान् ।

त्वदादिस्तम्बपर्यन्तं रुद्रशक्तिविजृम्भितम् ॥

शक्तिमानभितस्त्वं च ह्यनलस्त्वं च मोहितः ।

तत्तेजसोऽपि माहात्म्यं युवां द्रष्टुं न हि क्षमौ ॥

स्थूला ये हि प्रपश्यन्ति तद्विष्णोः परमं पदम् ।

द्यावापृथिव्या इन्द्राग्नियमस्य वरुणस्य च ॥

ध्वान्तोदरे शशाङ्कस्य जनित्वा परमेश्वरः ।

कालोऽसि त्वं महाकालः कालकालो महेश्वरः ॥

अतस्त्वमुग्रकलया मृत्योर्मृत्युर्भविष्यसि ।

स्थिरधन्वाक्षयो s वीरो वीरो विश्वाधिकः प्रभुः ॥

उपहस्ता ज्वरं भीमो मृगपक्षिहिरण्मयः ।

शास्ताशेषस्य जगतो न त्वं नैव चतुर्मुखः ॥

इत्थं सर्वं समालोक्य संहरात्मानमात्मना । नो चेदिदानीं क्रोधस्य महाभैरवरूपिणः वज्राशनिरिव स्थाणोस्त्वेवं मृत्युः पतिष्यति । सूत उवाच इत्युक्तो वीरभद्रेण नृसिंहः क्रोधविह्वलः

ननाद तनुवेगेन तं गृहीतुं प्रचक्रमे ।

अत्रान्तरे महाघोरं विपक्षभयकारणम् ॥

मैंने दक्षके यज्ञमें यज्ञरूपधारी आपकेसिरको ४ ९ काट दिया था । आपके पुत्र ब्रह्माका तमोमय कटा | उनका अंशभूत पाँचवाँ सिर आज भी विद्यमान है हुआ ; क्या | आप उन रुद्रके उस बलको नहीं जानते हैं? ऋषि ५० दधीचने संग्राममें ५१ | गये? हे कारण है बनाया — ५२ लोकोंको वशीभूत सात्त्विक ५३ [ विष्णु ] समन्वित सिर खुजलाते हुए आपको मरुद्गणोंसहित पराजित कर दिया था इसे आप कैसे भूल चक्रपाणे! आपका प्रिय चक्र उन्हींके पराक्रम ; आपने उसे कहाँसे प्राप्त किया, उसे किसने यह सब भी आप भूल गये! मैंने आपके सभी छीन लिया था और उस समय आप निद्राके होकर क्षीरसागरमें शयन करते रहे; आप ( पालकमूर्ति ) कैसे हो सकते हैं, आप -से लेकर तृणपर्यन्त सब कुछ रुद्रशक्तिसे है ॥ ४ ९ - ५३ ॥ ५४ मोहको प्राप्त आप तथा अग्नि दोनों ही रुद्रकी शक्तिसे सामर्थ्ययुक्त हैं; उनके तेजके प्रभावको देखनेमें आप दोनों ( विष्णु, अग्नि ) समर्थ नहीं हैं । जो स्थूल ५५ दृष्टिवाले हैं, वे ही विष्णुके परम पदको देखते हैं । स्वर्ग- पृथ्वीके वामनरूपसे, इन्द्रके जयन्तरूपसे, अग्निके ५६ कार्तिकेय रूपसे, धर्मराजके नारायणरूपसे, वरुणके भृगुरूपसे और चन्द्रमाके कलंकित उदरमें बुधरूपसे उत्पन्न होकर आप परमेश्वरके रूपमें प्रतिष्ठित हैं । ५७ आप काल, महाकाल एवं कालके भी काल महेश्वर i हैं; अतः आप शिवके अंशसे कालके भी काल होंगे । ५८ वे स्थिर धनुषवाले शिव अनश्वर, सबसे अधिक पराक्रमी, वीर, सर्वश्रेष्ठ तथा सबके स्वामी हैं । वे | रोगको नष्ट करनेवाले, भयानक तथा सुवर्णमय मृगाकार ॥ ५ ९ पक्षी ( शरभरूप ) हैं । सम्पूर्ण जगत्‌के शासक न तो आप हैं और न चतुर्मुख ब्रह्मा । इस प्रकार सब कुछ | सोचकर अपने रूपको पूर्णरूपसे समेट लीजिये, अन्यथा महाभैरवरूपी रुद्रके क्रोधका शरभरूपी वज्र ॥ ६० । आपकी मृत्यु बनकर उसी तरह गिरेगा. जैसे पर्वतपर वज्र गिरता है॥५४–५९ % २ ॥ सूतजी बोले- वीरभद्रके इस प्रकार कहने पर ६१ | नृसिंह क्रोधसे व्याकुल होकर गरजने लगे और तीव्र वेग

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९ ६ ] भगवान् महेश्वरद्वारा वीरभद्रका अध्याय

गगनव्यापि दुर्धर्षशैवतेजः समुद्भवम् ।

वीरभद्रस्य तद्रूपं तत्क्षणादेव दृश्यते ॥ ६२

न तद्धिरण्मयं सौम्यं न सौरं नाग्निसम्भवम् ।

न तडिच्चन्द्रसदृशमनौपम्यं महेश्वरम् ॥६३

तदा तेजांसि सर्वाणि तस्मिन् लीनानि शाङ्करे ।

ततोऽव्यक्तो महातेजा व्यक्ते सम्भवतस्ततः ॥६४

रुद्रसाधारणं चैव चिह्नितं विकृताकृति ।

ततः संहाररूपेण सुव्यक्तः परमेश्वरः ॥ ६५ ।

पश्यतां सर्वदेवानां जयशब्दादिमङ्गलैः ।

सहस्रबाहुर्जटिलश्चन्द्रार्धकृतशेखरः ॥ ६६

स मृगार्धशरीरेण पक्षाभ्यां चञ्चुना द्विजाः ।

अतितीक्ष्णमहादंष्ट्रो वज्रतुल्यनखायुधः ॥ ६७

कण्ठे कालो महाबाहुश्चतुष्पाद्वह्निसम्भवः ।

युगान्तोद्यतजीमूतभीमगम्भीरनिःस्वनः ॥ ६८

समं कुपितवृत्ताग्निव्यावृत्तनयनत्रयः ।

स्पष्टदंष्ट्रोऽधरोष्ठश्च हुङ्कारेण युतो हरः ॥६ ९

हरिस्तद्दर्शनादेव विनष्टबलविक्रमः ।

बिभ्रदौर्म्यं सहस्त्रांशोरधः खद्योतविभ्रमम् ॥ ७०

अथ विभ्रम्य पक्षाभ्यां नाभिपादेऽभ्युदारयन् ।

पादावाबध्य पुच्छेन बाहुभ्यां बाहुमण्डलम् ॥ ७१

भिदन्नुरसि बाहुभ्यां निजग्राह हरो हरिम् ।

ततो जगाम गगनं देवैः सह महर्षिभिः ॥ ७२

सहसैव भयाद्विष्णुं विहगश्च यथोरगम् ।

उत्क्षिप्योत्क्षिप्य सङ्ग्रह्य निपात्य च निपात्य च ॥ ७३

उड्डीयोड्डीय भगवान् पक्षाघातविमोहितम् ।

हरिं हरं तं वृषभं विश्वेशानं तमीश्वरम् ॥ ७४

आवाहन " " नृसिंहद्वारा शिवस्तुति ५०७ उसे पकड़नेका प्रयास करने लगे । इसी बीच विपक्षमें भय उत्पन्न करनेवाला, महाभयंकर, गगनव्यापी तथा दुर्धर्ष शिव- तेज उत्पन्न हुआ । उस क्षण वीरभद्रका जो रूप दिखायी पड़ा; वह न सुवर्णमय था, न चन्द्रमासे उत्पन्न था, न सूर्यसे उत्पन्न था, न अग्निसे उत्पन्न था, न विद्युत्के समान था और न चन्द्रके तुल्य था । वह शिवसे सम्बन्धित अनुपम रूप था । उस समय सभी तेज उस शिव- रूपमें विलीन हो गये; इससे वह महातेज अव्यक्तरूपमें स्थित हो गया और शरभ - नृसिंह - ये दो व्यक्तरूप प्रकट हुए ॥ ६०–६४ ॥ उस समय भयंकर आकृतिवाला तथा रुद्रके विशिष्ट चिह्नोंसे युक्त रूप प्रकट हुआ । तदनन्तर वे परमेश्वर महाप्रलयकालिक रूपसे व्यक्त ( प्रकट ) हो गये । हे द्विजो! सभी देवताओंके देखते - देखते जयशब्द आदि मंगलोंसे युक्त होकर वे शिव हजार भुजाओंवाले, जटाधारी, सिरपर अर्धचन्द्र धारण किये हुए, पशु आधा भाग शरीरसे, दो पंखोंसे तथा चोंचसे युक्त हो गये । उनके दाँत विशाल तथा अति तीक्ष्ण थे । वे वज्रतुल्य नखरूपी अस्त्रसे सुशोभित हो रहे थे । उनका कण्ठ कृष्णवर्णका था । वे चार भुजाओंवाले तथा चार पैरोंवाले और अग्निसे उत्पन्न प्रतीत हो रहे थे । वे युगके अन्तमें उत्पन्न मेघके समान भयंकर तथा गम्भीर ध्वनि कर रहे थे । उनके तीनों नेत्र क्रोधसे फैले हुए विशाल आगके गोले हो गये थे । उनके दाँत, अधर तथा ओष्ठ स्पष्ट दिखायी पड़ रहे थे । वे हर हुंकारसे युक्त थे ॥ ६५–६९ ॥ उन्हें देखते ही विष्णुका बल तथा पराक्रम नष्ट हो गया । वे सूर्यके सम्मुख खद्योत ( जुगुनू ) - के समान प्रकाश धारण किये हुए प्रतीत होने लगे । इसके बाद हररूप शरभने अपने पंखोंसे उन्हें जकड़कर नाभि तथा पैरको विदीर्ण करते हुए अपनी पूँछसे पैरोंको बाँधकर भुजाओंसे उनके भुजाओंको कसकर उनके वक्षपर प्रहार करते हुए उन हरिको अपनी भुजाओं में जकड़ लिया । तदनन्तर वे भगवान् [ शरभ ] जैसे गरुड़ सर्पपर आक्रमण करता है, | वैसे ही उड़ - उड़कर उन्हें ऊपरकी ओर उछालकर बार-

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श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग ५०८

अनुयान्ति सुराः सर्वे नमोवाक्येन तुष्टुवुः । ।

नीयमानः परवशो दीनवक्त्रः कृताञ्जलिः ॥ ७५

तुष्टाव परमेशानं हरिस्तं ललिताक्षरैः । श्रीनृसिंह उवाच नमो रुद्राय शर्वाय महाग्रासाय विष्णवे ॥ ७६

नम उग्राय भीमाय नमः क्रोधाय मन्यवे ।

नमो भवाय शर्वाय शङ्कराय शिवाय ते ॥ ७७

कालकालाय कालाय महाकालाय मृत्यवे ।

वीराय वीरभद्राय क्षयद्वीराय शूलिने ॥ ७८

महादेवाय महते पशूनां पतये नमः ।

एकाय नीलकण्ठाय श्रीकण्ठाय पिनाकिने ॥ ७ ९

नमोऽनन्ताय सूक्ष्माय नमस्ते मृत्युमन्यवे ।

पराय परमेशाय परात्परतराय ते ॥ ८०

परात्पराय विश्वाय नमस्ते विश्वमूर्तये ।

नमो विष्णुकलत्राय विष्णुक्षेत्राय भानवे ॥ ८१

कैवर्ताय किराताय महाव्याधाय शाश्वते ।

भैरवाय शरण्याय महाभैरवरूपिणे ॥ ८२

नमो नृसिंहसंहर्त्रे कामकालपुरारये ।

महापाशौघसंहर्त्रे विष्णुमायान्तकारिणे ॥ ८३

त्र्यम्बकाय त्र्यक्षराय शिपिविष्टाय मीढुषे ।

मृत्युञ्जयाय शर्वाय सर्वज्ञाय मखारये ॥ ८४

मखेशाय वरेण्याय नमस्ते वह्निरूपिणे ।

महाघ्राणाय जिह्वाय प्राणापानप्रवर्तिने ॥ ८५

त्रिगुणाय त्रिशूलाय गुणातीताय योगिने ।

संसाराय प्रवाहाय महायन्त्रप्रवर्तिने ॥ ८६

नमश्चन्द्राग्निसूर्याय मुक्तिवैचित्र्यहेतवे ।

वरदायावताराय सर्वकारणहेतवे ॥ ८७

कपालिने करालाय पतये पुण्यकीर्तये ।

अमोघायाग्निनेत्राय लकुलीशाय शम्भवे ॥ ८८

भिषक्तमाय मुण्डाय दण्डिने योगरूपिणे ।

मेघवाहाय देवाय पार्वतीपतये नमः ॥ ८ ९

बार उन्हें गिराकर पंखोंके आघातसे मूर्छित तथा डरे विष्णुको लेकर देवताओं तथा महर्षियोंके साथ आकाश- हुए मण्डलमें चले गये॥७०–७३१ / २ ॥ सभी देवता विष्णु तथा उन श्रेष्ठ [ शरभरूप] विश्वेश ईश्वरके पीछे - पीछे चलने लगे और ' नमः ' वाक्यसे उनकी स्तुति करने लगे । परवश होकर ले जाये जाते हुए विष्णु दीनमुख होकर हाथ जोड़कर ललित अक्षरोंद्वारा उन परमेश्वरकी स्तुति करने लगे ॥७४-७५१ / २ ॥ श्रीनृसिंह बोले- शर्व, महाग्रास ( जगत् जिनका ग्रास है ) तथा विष्णु ( सर्वव्यापी ) एवं रुद्रको नमस्कार है । उग्र तथा भीमको नमस्कार है । क्रोध तथा मन्युको नमस्कार है । आप भव, शर्व, शंकर तथा शिवको नमस्कार है । कालके भी काल, कालरूप, महाकाल, मृत्युरूप, वीर, वीरभद्र, पापके विनाशक, शूलधारी, महादेव, महान् तथा पशुपतिको नमस्कार है । एक, नीलकण्ठ, श्रीकण्ठ, पिनाकी तथा अनन्तको नमस्कार है । आप सूक्ष्मको नमस्कार है । आप मृत्युमन्यु ( मृत्यु ही जिसका क्रोध है ), पर, परमेश तथा परात्परतरको नमस्कार है । आप परात्पर, विश्व तथा विश्वमूर्तिको नमस्कार है । विष्णुकलत्र, विष्णुक्षेत्र तथा भा नमस्कार है । कैवर्त ( संसाररूपी सागरसे तारनेवाले ), किरात, महाव्याध, शाश्वत, भैरव, शरण्य ( शरणदाता ) तथा महाभैरवरूपको नमस्कार है । नृसिंहसंहर्ता, कामकालपुर ( कामदेव - यम - त्रिपुर ) - के शत्रु महापाशौघ - संहर्ता, विष्णुमायान्तकारी, त्र्यम्बक ( तीन नेत्रोंवाले ), त्र्यक्षर ( भूत, भविष्य, वर्तमानमें नाशरहित ), शिपिविष्ट, मीढुष, मृत्युंजय, शर्व, सर्वज्ञ, मखारि, | मखेश, वरेण्य, अग्निरूप, महाघ्राण, ( महानासिकावाले ), जिह्व ( बड़ी जिह्वावाले ) तथा प्राणापानप्रवर्ती ( प्राण-अपान वायुको गति देनेवाले ) -को नमस्कार है । त्रिगुण-त्रिशूल, गुणातीत, योगी, संसार, प्रवाह, महायन्त्रप्रवर्तीको । नमस्कार है । चन्द्र - अग्नि- सूर्य, मुक्ति - विचित्र्यहेतु, वरद, अवतार ( अभिमानियोंका पतन करनेवाले ), सर्वकारणहेतु, कपाली, कराल, पति, पुण्यकीर्ति, अमोघ, अग्निनेत्र, | लकुलीश, शम्भु ( कल्याण करनेवाले ), भिषक्तम,