लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 541–550

लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 541–550

पृष्ठ 541

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१०२ ] पार्वतीकी तपस्यासे प्रसन्न अध्याय

स एवं परमेशानः स्वयं च वरयिष्यति ।

वरदे येन सृष्टासि न विना यस्त्वयाम्बिके ॥

वर्तते नात्र सन्देहस्तव भर्ता भविष्यति ।

इत्युक्त्वा तां नमस्कृत्य मुहुः सम्प्रेक्ष्य पार्वतीम् ॥

गते पितामहे देवो भगवान् परमेश्वरः ।

जगामानुग्रहं कर्तुं द्विजरूपेण चाश्रमम् ॥

हो भगवान् शिवका उन्हें वरदान देना ५३ ९ हमलोग जिन देवाधिदेवके सेवक कहे जाते हैं, वे ७ परमेश्वर ही स्वयं आपका वरण करेंगे । हे वरदे! जिन्होंने आपका सृजन किया है और हे अम्बिके! जो आपके बिना रह नहीं सकते; वे [ शिवजी ] आपके पति होंगे; इसमें सन्देह नहीं है ' ॥ ३–७ / २ ॥ ८ ऐसा कहकर उन पार्वतीको नमस्कार करके बार-बार उनकी ओर देखकर पितामह ( ब्रह्मा ) - के चले जानेपर भगवान् परमेश्वर [ शिव ] अनुग्रह करनेके लिये ब्राह्मणके रूपमें उस आश्रममें गये ॥ ८ - ९ ॥ ९ द्विरूपसे उपस्थित महादेवको देखकर उन पार्वतीने उनकी दीप्ति आदिके द्वारा उन्हें भगवान् वृषभध्वज

सा च दृष्ट्वा महादेवं द्विजरूपेण संस्थितम् ।

प्रतिभाद्यैः प्रभुं ज्ञात्वा ननाम वृषभध्वजम् ॥ १०

सम्पूज्य वरदं देवं ब्राह्मणं छद्मनागतम् ।

तुष्टाव परमेशानं पार्वती परमेश्वरम् ॥ ११

अनुगृह्य तदा देवीमुवाच प्रहसन्निव ।

कुलधर्माश्रयं रक्षन् भूधरस्य महात्मनः ॥१२

क्रीडार्थं च सतां मध्ये सर्वदेवपतिर्भवः ।

स्वयंवरे महादेवि तव दिव्यसुशोभने ॥

आस्थाय रूपं यत्सौम्यं समेष्येऽहं सह त्वया ।

इत्युक्त्वा तां समालोक्य देवो दिव्येन चक्षुषा ॥

जगामेष्टं तदा दिव्यं स्वपुरं प्रययौ च सा ।

दृष्ट्वा हृष्टस्तदा देवीं मेनया तुहिनाचलः ॥

जानकर प्रणाम किया । ब्राह्मणके छद्मरूपमें आये हुए वरदाता महादेवकी पूजा करके पार्वतीने उन परमेशान १३ परमेश्वरकी स्तुति की ॥ १०-११ ॥ तदनन्तर देवीपर अनुग्रह करके शिवजी हँसते हुए बोले - ' हे महादेवि! सभी देवताओंका स्वामी मैं शिव महात्मा हिमालयके कुलधर्मकी परम्पराकी रक्षा करता १४ हुआ क्रीड़ा करनेके लिये सज्जनोंके मध्य तुम्हारे दिव्य तथा अतिसुन्दर स्वयंवरमें सौम्य रूप धारण करके तुमसे मिलूँगा ' ॥ १२-१३ / २ ॥ ऐसा कह करके उन्हें दिव्य दृष्टिसे देखकर १५ | शिवजी अपने अभीष्ट ( प्रिय ) दिव्य लोकको चले गये

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५४० श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग

आलिङ्ग्याघ्राय सम्पूज्य पुत्रीं साक्षात्तपस्विनीम् ।

दुहितुर्देवदेवेन न जानन्नभिमन्त्रितम् ॥ १६

स्वयंवरं तदा देव्याः सर्वलोकेष्वघोषयत् ।

अथ ब्रह्मा च भगवान् विष्णुः साक्षाज्जनार्दनः ॥ १७

शक्रश्च भगवान् वह्निर्भास्करो भग एव च ।

त्वष्टार्यमा विवस्वांश्च यमो वरुण एव च ॥ १८

वायुः सोमस्तथेशानो रुद्राश्च मुनयस्तथा ।

अश्विनौ द्वादशादित्या गन्धर्वा गरुडस्तथा ॥ १ ९

यक्षाः सिद्धास्तथा साध्या दैत्याः किंपुरुषोरगाः ।

समुद्राश्च नदा वेदा मन्त्राः स्तोत्रादयः क्षणाः ॥ २०

नागाश्च पर्वताः सर्वे यज्ञाः सूर्यादयो ग्रहाः ।

त्रयस्त्रिंशच्च देवानां त्रयश्च त्रिशतं तथा ॥ २१

त्रयश्च त्रिसहस्त्रं च तथान्ये बहवः सुराः ।

जग्मुर्गिरीन्द्रपुत्र्यास्तु स्वयंवरमनुत्तमम् ॥ २२

अथ शैलसुता देवी हैममारुह्य शोभनम् ।

विमानं सर्वतोभद्रं सर्वरत्नैरलङ्कृतम् ॥२३

अप्सरोभिः प्रनृत्ताभिः सर्वाभरणभूषितैः ।

गन्धर्वसिद्धैर्विविधैः किन्नरैश्च सुशोभनैः ॥ २४

वन्दिभिः स्तूयमाना च स्थिता शैलसुता तदा ।

सितातपत्रं रत्नांशुमिश्रितं चावहत्तथा ॥ २५

मालिनी गिरिपुत्र्यास्तु सन्ध्यापूर्णेन्दुमण्डलम् ।

चामरासक्तहस्ताभिर्दिव्यस्त्रीभिश्च संवृता ॥ २६

मालां गृह्य जया तस्थौ सुरद्रुमसमुद्भवाम् ।

विजया व्यजनं गृह्य स्थिता देव्याः समीपगा ॥ २७

मालां प्रगृह्य देव्यां तु स्थितायां देवसंसदि ।

शिशुर्भूत्वा महादेवः क्रीडार्थं वृषभध्वजः ॥ २८

उत्सङ्गतलसंसुप्तो बभूव भगवान् भवः ।

अथ दृष्ट्वा शिशुं देवास्तस्या उत्सङ्गवर्तिनम् ॥ २ ९

कोऽयमत्रेति सम्मन्त्र्य चुक्षुभुश्च समागताः ।

वज्रमाहारयत्तस्य बाहुमुद्यम्य वृत्रहा ॥ ३०

और इसके बाद वे भी चली गयीं । तब देवीको देखकर मैनासहित हिमालय साक्षात् तपस्विनी अपनी पुत्रीका आलिंगन करके, उनका मस्तक सूँघकर और उनकी पूजा करके अत्यन्त प्रसन्न हुए । तत्पश्चात् देवाधिदेव [ शिव ] - द्वारा अपनी पुत्रीको दिये गये संकेतको जानते हुए भी हिमालयने सभी लोकोंमें देवीके स्वयंवरकी न घोषणा कर दी ॥ १४–१६९ २ ॥ इसके अनन्तर ब्रह्मा, साक्षात् भगवान् जनार्दन विष्णु, ऐश्वर्यशाली इन्द्र, अग्निदेव, सूर्य, भग, त्वष्टा, अर्यमा, विवस्वान्, यम, वरुण, वायु, सोम, ईशान, सभी रुद्र, मुनिगण, दोनों अश्विनीकुमार, बारहों आदित्य, समस्त गन्धर्व, गरुड़, यक्ष, सिद्ध, साध्य, दैत्य, किंपुरुष, उरग, समुद्र, नद, वेद, मन्त्र, स्तोत्र आदि क्षण, नाग, पर्वत, सभी यज्ञ, सूर्य आदि ग्रह, वसु, रुद्र तथा आदित्य आदि तैंतीस देवताओंके भेद - प्रभेदरूप ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव ये तीन तीन सौ तथा तीन हजार तीन देवता तथा अन्य बहुत - से देवता पर्वतराजकी पुत्रीके अत्युत्तम स्वयंवरमें पहुँचे ॥ १७–२२ ॥ तदनन्तर पार्वती देवी स्वर्णनिर्मित तथा सभी | रत्नोंसे अलंकृत सर्वतोभद्र नामक उत्तम विमानपर आरूढ़ होकर नृत्य करती हुई अप्सराओं, सभी आभूषणोंसे विभूषित विविध गन्धर्वों, सिद्धों तथा परम सुन्दर किन्नरोंके साथ और बन्दीजनोंद्वारा स्तुत होती हुई वहाँ उपस्थित हुईं । [ उनकी सखी ] मालिनी रत्नकिरणोंसे मिश्रित श्वेत वर्णका सन्ध्याकालीन चन्द्रमण्डलसदृश छत्र [ उन ] पार्वतीके ऊपर लगाये हुए थी । वे पार्वती हाथोंमें चँवर लिये हुई दिव्य स्त्रियोंसे घिरी हुई थीं । | कल्पवृक्षके पुष्पोंसे निर्मित माला [ हाथमें ] लेकर जया [ नामक सखी ] खड़ी थी और विजया व्यजन ( पंखा ) लेकर देवीके समीप खड़ी थी ॥ २३ - २७ ॥ देवताओंकी सभामें [ अपने हाथमें ] माला लेकर | देवी पार्वतीके स्थित होनेपर भगवान् वृषभध्वज भव | महादेव क्रीड़ा करनेके लिये एक शिशुके रूपमें होकर देवीकी गोदमें सोये हुएकी भाँति स्थित हो गये । तब उनकी गोदमें स्थित शिशुको देखकर ' यहाँपर यह कौन | है ' - ऐसा विचार करके [ वहाँ ] उपस्थित देवतागण

पृष्ठ 543

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अध्याय १०२ ] पार्वतीकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् शिवका उन्हें वरदान देना ५४१

बाहुरुद्यमस्तस्य तथैव समुपस्थितः । क्षुब्ध हो उठे ॥ २८-२९ १ / २ ॥

स्तम्भितः शिशुरूपेण देवदेवेन लीलया ॥ ३१ ॥ वृत्रासुरका संहार करनेवाले इन्द्रने भुजा उठाकर उस

वज्रं क्षेप्तुं न शशाक बाहुं चालयितुं तथा ।

वह्निः शक्तिं तथा क्षेप्तुं न शशाक तथा स्थितः ॥ ३२

यमोऽपि दण्डं खड्गं च निरृतिर्मुनिपुङ्गवाः ।

वरुणो नागपाशं च ध्वजयष्टिं समीरणः ॥ ३३

सोमो गदां धनेशश्च दण्डं दण्डभृतां वरः ।

ईशानश्च तथा शूलं तीव्रमुद्यम्य संस्थितः ॥

रुद्राश्च शूलमादित्या मुशलं वसवस्तथा ।

मुद्गरं स्तम्भिताः सर्वे देवेनाशु दिवौकसः ॥

स्तम्भिता देवदेवेन तथान्ये च दिवौकसः ।

शिरः प्रकम्पयन् विष्णुश्चक्रमुद्यम्य संस्थितः ॥

तस्यापि शिरसो बालः स्थिरत्वं प्रचकार ह ।

चक्रं क्षेप्तुं न शशाक बाहूंश्चालयितुं न च ॥

पूषा दन्तान् दशन् दन्तैर्बालमैक्षत मोहितः ।

तस्यापि दशनाः पेतुर्दृष्टमात्रस्य शम्भुना ॥

[ शिशु ] -के ऊपर वज्र चलाना चाहा, किंतु उनका उठा ३४ हुआ वह बाहु वैसा ही रह गया । शिशुरूपधारी देवदेव [ शिव ] -के द्वारा लीलापूर्वक स्तम्भित कर दिये गये वे इन्द्र वज्र फेंकने तथा अपनी भुजा चलानेमें समर्थ नहीं हुए । [ इसी प्रकार ] अग्निदेव भी अपनी शक्ति चलानेमें समर्थ नहीं हुए और वैसे ही खड़े रह गये ॥ ३०-३२ ॥ ३५ हे श्रेष्ठ मुनियो! इसी प्रकार यम अपने दण्डको, निर्ऋति अपने खड्गको, वरुण अपने नागपाशको, वायुदेव अपने ध्वजदण्डको, सोम अपनी गदाको, दण्डधारियोंमें श्रेष्ठ कुबेर अपने दण्डको तथा ईशान अपने तीक्ष्ण त्रिशूलको उठाकर खड़े ही रह गये । सभी रुद्र शूलको, ३६ सभी आदित्य मुसलको तथा वसुगण मुद्गरको उठाये ही रह गये; सभी देवता शीघ्र ही महादेवके द्वारा स्तम्भित कर दिये गये । [ इसी प्रकार ] देवाधिदेवने अन्य देवताओंको भी स्तम्भित कर दिया ॥ ३३–३५१ / २ ॥ ३७ विष्णु [ अपने ] सिरको हिलाते हुए चक्र उठाकर खड़े रहे । उस बालकने उनके भी सिरको स्थिर कर दिया । वे [ विष्णु ] अपना चक्र फेंकने तथा बाहुओंको चलानेमें समर्थ नहीं हुए । पूषाने मोहित होकर अपने दाँतोंसे दाँतोंको किटकिटाते हुए उस बालककी ओर ३८ । देखा । शिवके देखनेमात्रसे ही उसके दाँत गिर गये ।

पृष्ठ 544

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५४२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग

बलं तेजश्च योगं च तथैवास्तम्भयद्विभुः ।

अथ तेषु स्थितेष्वेव मन्युमत्सु सुरेष्वपि ॥

ब्रह्मापरमसंविग्नो ध्यानमास्थाय शङ्करम् ।

बुबुधे देवमीशानमुमोत्सङ्गे तमास्थितम् ॥

स बुद्ध्वा देवमीशानं शीघ्रमुत्थाय विस्मितः ।

ववन्दे चरणौ शम्भोरस्तुवच्च पितामहः ॥

पुराणैः सामसङ्गीतैः पुण्याख्यैर्गुह्यनामभिः ।

स्रष्टा त्वं सर्वलोकानां प्रकृतेश्च प्रवर्तकः ॥

बुद्धिस्त्वं सर्वलोकानामहङ्कारस्त्वमीश्वरः ।

भूतानामिन्द्रियाणां च त्वमेवेश प्रवर्तकः ॥

तवाहं दक्षिणाद्धस्तात्सृष्टः पूर्वं पुरातनः ।

वामहस्तान्महाबाहो देवो नारायणः प्रभुः ॥

इयं च प्रकृतिर्देवी सदा ते सृष्टिकारण ।

पत्नीरूपं समास्थाय जगत्कारणमागता ॥

नमस्तुभ्यं महादेव महादेव्यै नमो नमः ।

प्रसादात्तव देवेश नियोगाच्च मया प्रजाः ॥

देवाद्यास्तु इमाः सृष्टा मूढास्त्वद्योगमोहिताः ।

कुरु प्रसादमेतेषां यथापूर्वं भवन्त्विमे ॥

सूत उवाच

विज्ञाप्यैवं तदा ब्रह्मा देवदेवं महेश्वरम् ।

संस्तम्भितांस्तदा तेन भगवानाह पद्मजः ॥

मूढास्थ देवताः सर्वा नैव बुध्यत शङ्करम् ।

देवदेवमिहायान्तं सर्वदेवनमस्कृतम् ॥

गच्छध्वं शरणं शीघ्रं देवाः शक्रपुरोगमाः ।

सनारायणकाः सर्वे मुनिभिः शङ्करं प्रभुम् ॥

सार्धं मयैव देवेशं परमात्मानमीश्वरम् ।

अनया हैमवत्या च प्रकृत्या सह सत्तमम् ॥

तत्र ते स्तम्भितास्तेन तथैव सुरसत्तमाः ।

प्रणेमुर्मनसा सर्वे सनारायणकाः प्रभुम् ॥

अथ तेषां प्रसन्नोऽभूद्देवदेवस्त्रियम्बकः ।

यथापूर्वं चकाराशु वचनाद् ब्रह्मणः प्रभुः ॥

| उसी प्रकार विभु शिवने सबके बल, तेज तथा योगको ३ ९ स्तम्भित कर दिया ॥ ३६- ३८१/२ ॥ इसके बाद क्रोधमें भरे हुए उन समस्त देवताओंके | स्तम्भित हो जानेपर अत्यन्त व्याकुल ब्रह्माने शंकरका ४० ध्यान करके यह जान लिया कि उमाकी गोद में वेभगवान् ईशान ही विराजमान हैं I । ईशानदेवको पहचानकर शीघ्र ४१ उन्हें उठाकर विस्मित हुए पितामहने शम्भुके चरणोंकी वन्दना की और प्राचीन सामगानों, उनके पवित्र नामों तथा ४२ । गुप्त नामोंके द्वारा उनकी स्तुति की ॥३ ९ -४११ / ३ ॥ [ ब्रह्माने कहा- ] आप समस्त लोकोंके स्रष्टा ४३ तथा प्रकृतिके प्रवर्तक हैं । आप सभी लोकोंकी बुद्धि एवं अहंकार हैं । आप ईश्वर हैं । हे ईश! आप ही सभी प्राणियोंकी इन्द्रियोंके प्रवर्तक हैं । हे महाबाहो! सर्वप्रथम ४४ आपके दाहिने हाथसे पुरातन मैं [ ब्रह्मा ] उत्पन्न हुआ हूँ और बायें हाथसे भगवान् प्रभु नारायण उत्पन्न हुए ४५ हैं । हे सृष्टिकारण! ये देवी प्रकृति सर्वदा आपकी पत्नीका रूप धारणकर जगत्की कारणभूता बनी हैं । हे महादेव! आपको नमस्कार है; महादेवीको बार - बार ४६ नमस्कार है । हे देवेश! मैंने आपकी कृपासे तथा आपके आदेशसे इन प्रजाओं तथा देवता आदिका सृजन किया ४७ है । आपके योगसे मोहित होकर ये देवगण अब मूढ़ताको प्राप्त हो गये हैं । अब आप इनपर अनुग्रह कीजिये, जिससे ये पूर्वकी भाँति हो जायँ ॥ ४२–४७ ॥ ४८ सूतजी बोले - [ हे ऋषियो! ] इस प्रकार देवदेव महेश्वरका स्तवन करके पद्मयोनि भगवान् ब्रह्माने उन [ शिव ] के द्वारा स्तम्भित किये गये देवताओंसे कहा— ४ ९ मूढ़ताको प्राप्त आप सभी देवताओंने सभी देवोंसे नमस्कृत होनेवाले यहाँ आये हुए देवदेव शंकरको नहीं पहचाना । ५० हे देवताओ! इन्द्र आदि आप सभी देवगण नारायणको, सभी मुनियोंको तथा मुझको साथ लेकर इन प्रकृतिस्वरूपा ५१ पार्वतीके साथ विराजमान सर्वश्रेष्ठ, प्रभु, देवेश, परमात्मा, ईश्वर शंकरकी शरणमें शीघ्र चलिये ॥ ४८- ५१ ॥ तब उन शिवके द्वारा वहाँपर स्तम्भित किये गये. ५२ नारायणसहित उन सभी श्रेष्ठ देवताओंने प्रभु [ शिव ] -को मनसे प्रणाम किया ॥ ५२ ॥

५३ इसके बाद देवदेव त्रिलोचन [ शिव ] उनपर

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१०२ ] पार्वतीकी तपस्यासे प्रसन्न अध्याय

तत एवं प्रसन्ने तु सर्वदेवनिवारणम् ।

देवेशो दिव्यं परममद्भुतम् ॥

वपुश्चकार

तेजसा तस्य देवास्ते सेन्द्रचन्द्रदिवाकराः ।

सब्रह्मकाः ससाध्याश्च सनारायणकास्तथा ॥

सयमाश्च सरुद्राश्च चक्षुरप्रार्थयन् विभुम् ।

तेभ्यश्च परमं चक्षुः सर्वदृष्टौ च शक्तिमत् ॥

ददावम्बापतिः शर्वो भवान्याश्च चलस्य च ।

लब्ध्वा चक्षुस्तदा देवा इन्द्रविष्णुपुरोगमाः ॥

सब्रह्मकाः सशक्राश्च तमपश्यन् महेश्वरम् ।

ब्रह्माद्या नेमिरे तूर्णं भवानी च गिरीश्वरः ॥

मुनयश्च महादेवं गणेशाः शिवसम्मताः ।

ससर्जुः पुष्पवृष्टिं च खेचराः सिद्धचारणाः ॥

हो भगवान् शिवका उन्हें वरदान देना ५४३ प्रसन्न हो गये और उन प्रभुने ब्रह्माके वचनानुसार ५४ / सबको पूर्वकी भाँति कर दिया ॥ ५३ ॥

इस प्रकार प्रसन्न हो जानेपर उन देवेश्वरने सभी देवताओंके द्वारा न देखे जा सकनेवाला, दिव्य तथा परम अद्भुत शरीर धारण किया ॥ ५४ ॥

तब उनके तेजसे इन्द्र, चन्द्र, सूर्य, ब्रह्मा, साध्यगण, ५५ नारायण, यम, सभी रुद्र आदिके सहित वे देवता प्रतिहत ( नष्ट ) दृष्टिवाले हो गये । तब उन लोगोंने प्रभुसे [ दिव्य ] दृष्टिके लिये प्रार्थना की । इसपर उमापति शर्वने उन्हें सब कुछ देखनेमें समर्थ दिव्य ५६ दृष्टि प्रदान की; साथ ही उन्होंने भवानी तथा हिमालयको भी दिव्य दृष्टि दी॥५५-५६२ ॥ तब दिव्य दृष्टि प्राप्त करके ब्रह्मा तथा शक्र-सहित इन्द्र, विष्णु आदि प्रधान देवताओंने उन महेश्वरका दर्शन किया । ब्रह्मा आदि देवताओं, भवानी ५७ ( पार्वती ), गिरीश्वर [ हिमालय ], मुनियों तथा शिवप्रिय गणेश्वरोंने शीघ्र ही महादेवको प्रणाम किया । आकाशचारी सिद्धों तथा चारणोंने [ उनपर ] पुष्पवृष्टि की, देवदुन्दुभियाँ बजने लगीं, मुनिगण प्रभुकी स्तुति करने लगे, प्रधान ५८ गन्धर्व गाने लगे तथा अप्सराएँ नाचने लगीं, सभी गणेश्वर आनन्दित हो उठे और अम्बा पार्वती भी आनन्दविभोर हो गयीं ॥ ५७–६०९ / २ ॥ उस समय आह्लादित देवी [ पार्वती ] ने त्रिदेवोंके ५ ९

देवदुन्दुभयो नेदुस्तुष्टुवुर्मुनयः प्रभुम् ।

जगुर्गन्धर्वमुख्याश्च ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ ६०

मुमुहुर्गणपाः सर्वे मुमोदाम्बा च पार्वती ।

तस्य देवी तदा हृष्टा समक्षं त्रिदिवौकसाम् ॥ ६१

पादयोः स्थापयामास मालां दिव्यां सुगन्धिनीम् । साधु साध्विति सम्प्रोच्य तया तत्रैव चार्चितम् ॥ ६२ | समक्ष उन शिवके चरणोंमें दिव्य तथा सुगन्धित माला

पृष्ठ 546

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५४४ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग 6 YE YE YE YE YE YE YE YE YE YE 95 96 95 96 95 96 96 Y । । समर्पित कर दी । ब्रह्मा - यक्ष - उरग - राक्षसोंसहित सहदेव्या नमश्चक्रुः शिरोभिर्भूतलाश्रितैः देवताओंने ' साधु - साधु ' कहकर वहाँपर सभी उन पार्वतीक द्वारा पूजित शिवको उन देवीसमेत पृथ्वीतलपर देवाः सयक्षोरगराक्षसाः ॥ ६३ । टेककर प्रणाम किया ॥ ६१-६३ ॥ मस्तक सर्वे सब्रह्मका पूर्वभागे उमास्वयंवरो नाम द्व्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०२ ॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे अन्तर्गत पूर्वभागमें ' उमास्वयंवर ' नामक एक सौ दोवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०२ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके ॥ एक ' सौ तीनवाँ अध्याय भगवान् शिव एवं पार्वतीके विवाहकी मांगलिक कथा तथा विवाहके अनन्तर भगवान् शिवका काशी- आगमन और पार्वतीको मुक्तिक्षेत्र काशीकी महिमा बताना सूत उवाच

अथ ब्रह्मा महादेवमभिवन्द्य कृताञ्जलिः ।

उद्वाहः क्रियतां देव इत्युवाच महेश्वरम् ॥

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ।

यथेष्टमिति लोकेशं प्राह भूतपतिः प्रभुः ॥

उद्वाहार्थं महेशस्य तत्क्षणादेव सुव्रताः ।

ब्रह्मणा कल्पितं दिव्यं पुरं रत्नमयं शुभम् ॥

अथादितिर्दितिः साक्षाद्दनुः कद्रुः सुकालिका ।

पुलोमा सुरसा चैव सिंहिका विनता तथा ॥

सिद्धिर्माया क्रिया दुर्गा देवी साक्षात्सुधा स्वधा ।

सावित्री वेदमाता च रजनी दक्षिणा द्युतिः ॥

स्वाहा स्वधा मतिर्बुद्धिर्ऋद्धिर्वृद्धिः सरस्वती ।

राका कुहूः सिनीवाली देवी अनुमती तथा ॥

धरणी धारणी चेला शची नारायणी तथा ।

एताश्चान्याश्च देवानां मातरः पत्नयस्तथा ॥

उद्वाहः शङ्करस्येति जग्मुः सर्वा मुदान्विताः ।

उरगा गरुडा यक्षा गन्धर्वाः किन्नरा गणाः ॥

सागरा गिरयो मेघा मासाः संवत्सरास्तथा ।

वेदा मन्त्रास्तथा यज्ञाः स्तोमा धर्माश्च सर्वशः ॥

हुङ्कारः प्रणवश्चैव प्रतिहाराः सहस्रशः ।

कोटिरप्सरसो दिव्यास्तासां च परिचारिकाः ॥

याश्च सर्वेषु द्वीपेषु देवलोकेषु निम्नगाः ।

ताश्च स्त्रीविग्रहाः सर्वाः सञ्जग्मुर्हृष्टमानसाः ॥

गणपाश्च महाभागाः सर्वलोकनमस्कृताः ।

उद्वाहः शङ्करस्येति तत्राजग्मुर्मुदान्विताः ॥

सूतजी बोले - [ हे ऋषियो! ] इसके बाद ब्रह्माने हाथ जोड़कर महादेव महेश्वरको प्रणाम करके यह १ कहा- ' हे देव! अब विवाह कीजिये'॥१ ॥

उन परमेष्ठी ब्रह्माका वह वचन सुनकर २ भूतपति शिवने लोकेश [ ब्रह्मा ] -से कहा — ' जो आपकी इच्छा हो ' ॥ २ ॥

३ हे सुव्रतो! ब्रह्माने महेशके विवाहके लिये उसी क्षण रत्नमय, दिव्य तथा सुन्दर नगरका निर्माण किया ॥ ३ ॥

४ इसके बाद अदिति, दिति, साक्षात् दनु, कद्रु ५ सुकालिका, पुलोमा, सुरसा, सिंहिका, विनता, सिद्धि, माया, क्रिया, साक्षात् देवी दुर्गा, सुधा, स्वधा, वेदमाता सावित्री, ६ रजनी, दक्षिणा, द्युति, स्वाहा, स्वधा, मति, बुद्धि, ऋद्धि, वृद्धि, सरस्वती, राका, कुहू, सिनीवाली, देवी अनुमती, ७ धरणी, धारणी, इला, शची, नारायणी - ये सब एवं अन्य सभी देवमाताएँ तथा देवपलियाँ ' शंकरका विवाह हो रहा ८ है ' - ऐसा सोचकर आनन्दमग्न होकर [ वहाँ ] गयीं । सभी उरग, गरुड़, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, गण, समुद्र, पर्वत, ९ मेघ, मास, संवत्सर, वेद, मन्त्र, यज्ञ, स्तोम, धर्म, हुंकार, प्रणव, हजारों प्रतिहार, करोड़ों दिव्य अप्सराएँ तथा उनकी १० परिचारिकाएँ और समस्त द्वीपों तथा देवलोकोंमें जो भी नदियाँ हैं, वे सब स्त्रीका रूप धारण करके प्रसन्नचित्त ११ होकर वहाँ गयीं । सभी लोकोंसे नमस्कृत महाभाग गणेश्वर भी यह शंकरका विवाह है ' - यह सोचकर प्रसन्नता से १२ । युक्त हो वहाँ आये ॥ ४ – १२ ॥

पृष्ठ 547

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अध्याय १०३ ] भगवान् शिव एवं पार्वतीके 36 36 36 36 36 36 36 36 35 फ्र

अभ्ययुः शङ्खवर्णाश्च गणकोट्यो गणेश्वराः ।

दशभिः केकराक्षश्च विद्युतोऽष्टाभिरेव च ॥ १३

चतुःषष्ट्या विशाखाश्च नवभिः पारयात्रिकः ।

षड्भिः सर्वान्तकः श्रीमान् तथैव विकृताननः ॥ १४

ज्वालाकेशो द्वादशभिः कोटिभिर्गणपुङ्गवः ।

सप्तभिः समदः श्रीमान् दुन्दुभोऽष्टाभिरेव च ॥ १५

पञ्चभिश्च कपालीशः षड्भिः सन्दारकः शुभः ।

कोटिकोटिभिरेवेह गण्डकः कुम्भकस्तथा ॥ १६

विष्टम्भोऽष्टाभिरेवेह गणपः सर्वसत्तमः ।

पिप्पलश्च सहस्रेण सन्नादश्च तथा द्विजाः ॥ १७

आवेष्टनस्तथाष्टाभिः सप्तभिश्चन्द्रतापनः ।

महाकेशः सहस्त्रेण कोटीनां गणपो वृतः ॥ १८

कुण्डी द्वादशभिर्वीरस्तथा पर्वतकः शुभः ।

कालश्च कालकश्चैव महाकालः शतेन वै ॥ १ ९

आग्निकः शतकोट्या वै कोट्याग्निमुख एव च ।

आदित्यमूर्धा कोट्या च तथा चैव धनावहः ॥ २०

सन्नामश्च शतेनैव कुमुदः कोटिभिस्तथा ।

अमोघः कोकिलश्चैव कोटिकोट्या सुमन्त्रकः ॥ २१

काकपादोऽपरः षष्ट्या षष्ट्या सन्तानकः प्रभुः ।

महाबलश्च नवभिर्मधुपिङ्गश्च पिङ्गलः ॥ २२

नीलो नवत्या देवेशः पूर्णभद्रस्तथैव च ।

कोटीनां चैव सप्तत्या चतुर्वक्त्रो महाबलः ॥ २३

कोटिकोटिसहस्राणां शतैर्विंशतिभिर्वृताः ।

तत्राजग्मुस्तथा देवास्ते सर्वे शङ्करं भवम् ॥ २४ ।

विवाहकी मांगलिक कथा ५४५ शंखके समान वर्णवाले गणेश्वर [ अपने ] करोड़ों गणोंके साथ पहुँचे । केकराक्ष दस करोड़ गणोंके साथ, विद्युत आठ करोड़ गणोंके साथ, विशाख चौंसठ करोड़ गणोंके साथ, पारयात्रिक नौ करोड़ गणोंके साथ, श्रीमान् सर्वान्तक छः करोड़ गणोंके साथ, विकृतानन भी छ: करोड़ गणोंके साथ, गणोंमें श्रेष्ठ ज्वालाकेश बारह | करोड़ गणोंके साथ, श्रीमान् समद सात करोड़ गणोंके साथ, दुन्दुभ आठ करोड़ गणोंके साथ, कपालीश पाँच करोड़ गणोंके साथ, उत्तम संदारक छ: करोड़ गणोंके साथ और गण्डक तथा कुम्भक करोड़ों - करोड़ों गणोंके साथ आये ॥ १३ - १६ ॥ द्विजो! सर्वश्रेष्ठ गणेश्वर विष्टम्भ आठ करोड़ गणोंके साथ और पिप्पल तथा सन्नाद एक - एक हजार करोड़ गणोंके साथ आये । आवेष्टन [ नामक गणेश्वर ] आठ करोड़ गणोंके साथ, चन्द्रतापन सात करोड़ गणोंके साथ और गणेश्वर महाकेश हजार करोड़ गणोंके साथ आये ॥ १७-१८ ॥ पराक्रमशाली [ गणेश्वर ] कुण्डी तथा शुभ पर्वतक बारह करोड़ गणोंके साथ और काल, महाकाल सौ करोड़ गणोंके साथ आये करोड़ गणोंके साथ तथा अग्निमुख एक साथ आये । उसी प्रकार आदित्यमूर्धा [ नामक गणेश्वर ] भी एक करोड़ आये ॥ १ ९ -२० ॥ सन्नाम तथा कुमुद सौ करोड़ कालक तथा । आग्निक सौ करोड़ गणोंके तथा धनावह गणोंके साथ गणोंके साथ आये । अमोघ, कोकिल तथा सुमन्त्रक करोड़ - करोड़ गणोंके साथ आये । दूसरे गणेश्वर काकपाद साठ करोड़ गणोंके साथ, प्रभुतासम्पन्न सन्तानक साठ करोड़ गणोंके साथ और महाबल, मधु, पिंग तथा पिंगल नौ करोड़ गणोंके साथ आये । नील, देवेश तथा पूर्णभद्र नब्बे करोड़ गणोंके साथ और महाबलशाली चतुर्वक्त्र सत्तर करोड़ गणोंके साथ आये । वे सभी देव अपने बीस सौ हजार करोड़ गणोंसे घिरे हुए वहाँ भगवान् शंकरके पास पहुँचे ॥ २१–२४ ॥

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-५४६ 55 भूतकोटिसहस्त्रेण प्रमथः कोटिभिस्त्रिभिः वीरभद्रश्चतुःषष्ट्या रोमजाश्चैव कोटिभिः करणश्चैव विंशत्या नवत्या केवलः शुभः पञ्चाक्षः शतमन्युश्च मेघमन्युस्तथैव च काष्ठकूटश्चतुःषष्ट्या सुकेशो वृषभस्तथा । विरूपाक्षश्च भगवान् चतुःषष्ट्या सनातनः तालकेतुः षडास्यश्च पञ्चास्यश्च सनातनः । संवर्तकस्तथा चैत्रो लकुलीशः स्वयं प्रभुः लोकान्तकश्च दीप्तास्यो तथा दैत्यान्तकः प्रभुः मृत्युहृत्कालहा कालो मृत्युञ्जयकरस्तथा विषादो विषदश्चैव विद्युतः कान्तकः प्रभुः । देवो भृङ्गी रिटिः श्रीमान् देवदेवप्रियस्तथा अशनिर्भासकश्चैव चतुःषष्ट्या सहस्रपात् । एते चान्ये च गणपा असंख्याता महाबलाः सर्वे सहस्त्रहस्ताश्च जटामुकुटधारिणः । चन्द्ररेखावतंसाश्च नीलकण्ठास्त्रिलोचनाः हारकुण्डलकेयूरमुकुटाद्यैरलङ्कृताः I ब्रह्मेन्द्रविष्णुसङ्काशा अणिमादिगुणैर्वृताः ॥

सूर्यकोटिप्रतीकाशास्तत्राजग्मुर्गणेश्वराः ।

पातालचारिणश्चैव सर्वलोकनिवासिनः ॥

तुम्बरुर्नारदो हाहा हूहूश्चैव तु सामगाः ।

रत्नान्यादाय वाद्यांश्च तत्राजग्मुस्तदा पुरम् ॥

ऋषयः कृत्स्नशस्तत्र देवगीतास्तपोधनाः । पुण्यान् वैवाहिकान् मन्त्रानजपुर्हृष्टमानसाः

तत एवं प्रवृत्ते तु सर्वतश्च समागमे ।

गिरिजां तामलङ्कृत्य स्वयमेव शुचिस्मिताम् ॥

पुरं प्रवेशयामास स्वयमादाय केशवः ।

सदस्याह च देवेशं नारायणमजो हरिम् ॥

भवानग्रे समुत्पन्नो भवान्या सह दैवतैः ।

वामाङ्गादस्य रुद्रस्य दक्षिणाङ्गादहं प्रभो ॥

मन्मूर्तिस्तुहिनाद्रीशो यज्ञार्थं सृष्ट एव हि ।

एषा हैमवती जज्ञे मायया परमेष्ठिनः ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । प्रमथ [ अपने ] हजार करोड़ भूतों तथा तीन करोड़ ॥ २५ गणोंके साथ आये । वीरभद्र चौंसठ करोड़ गणोंके साथ । और रोमज करोड़ों गणोंके साथ आये । करण बीस ॥ २६ करोड़ गणोंके साथ और केवल, शुभ, पंचाक्ष, शतमन्यु तथा मेघमन्यु भी नब्बे करोड़ गणोंके साथ आये । ॥ २७ काष्ठकूट, सुकेश तथा वृषभ चौंसठ करोड़ गणोंके साथ और भगवान् सनातन विरूपाक्ष भी चौंसठ करोड़ गणोंके साथ आये । इसी प्रकार तालकेतु, षडास्य, पंचास्य, ॥ २८ सनातन, संवर्तक, चैत्र, साक्षात् प्रभु लकुलीश, लोकान्तक । दीप्तास्य, प्रभु दैत्यान्तक, मृत्युहृत्, कालहा, काल, ॥ २ ९ मृत्युंजयकर, विषाद, विषद, विद्युत, प्रभु कान्तक, देव, भृंगी, रिटि, श्रीमान् देवदेवप्रिय, अशनि, भासक तथा ॥ ३० सहस्रपात् चौंसठ करोड़ गणोंके साथ आये । ये सब तथा अन्य असंख्य महाबली गणेश्वर भी वहाँ आये । वे सभी ॥ ३१ हजार हाथोंवाले, जटा - मुकुट धारण किये हुए, मस्तकपर चन्द्ररेखासे विभूषित, नीलकण्ठवाले, तीन नेत्रोंवाले, ॥ ३२ हार - कुण्डल - केयूर मुकुट आदिसे अलंकृत, ब्रह्मा-इन्द्र - विष्णुके समान प्रतीत होनेवाले, अणिमा आदि ३३ सिद्धियोंसे युक्त थे; करोड़ों सूर्योंके सदृश आभावाले पाताललोकमें विचरण करनेवाले तथा सभी लोकों में ३४ निवास करनेवाले वे गणेश्वर वहाँ आये । तुम्बुरु, नारद, हाहा, हुहू एवं साम गान करनेवाले भी रत्नों तथा ३५ वाद्ययन्त्रोंको लेकर उस पुरमें आये । २५ - ३५ ॥ देवताओंद्वारा स्तुत तथा तपोधन बहुत - से ऋषिगण ॥ ३६ प्रसन्नचित्त होकर विवाहसम्बन्धी पवित्र मन्त्रोंका उच्चारण करने लगे ॥३६ ॥

इस प्रकार पूर्णरूपसे सबके उपस्थित हो जानेपर ३७ विष्णुने स्वयं पवित्र मुसकानवाली पार्वतीको अलंकृत । करके तथा स्वयं उन्हें ला करके पुरमें प्रवेश कराया । ३८ तदनन्तर ब्रह्माने देवताओंके स्वामी नारायण विष्णुसे सभामें कहा - ' हे प्रभो! पहले आप इन रुद्रके बाएँ ३ ९ अंगसे भवानी तथा देवताओंके साथ उत्पन्न हुए और । मैं इनके दाहिने अंगसे उत्पन्न हुआ । मेरे अंशस्वरूप ४० | पर्वतराज हिमालय वास्तवमें इस यज्ञके लिये ही उत्पन्न

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अध्याय १०३ ] भगवान् शिव एवं पार्वतीके श्रौतस्मार्तप्रवृत्यर्थमुद्वाहार्थमिहागतः 1 अतोऽसौ जगतां धात्री धाता तव ममापि च ॥ ४१

अस्य देवस्य रुद्रस्य मूर्तिभिर्विहितं जगत् ।

क्ष्माबग्निखेन्दुसूर्यात्मपवनात्मा यतो भवः ॥ ४२

तथापि तस्मै दातव्या वचनाच्च गिरेर्मम ।

एषा ह्यजा शुक्लकृष्णा लोहिता प्रकृतिर्भवान् ॥ ४३

श्रेयोऽपि शैलराजेन सम्बन्धोऽयं तवापि च ।

तव पाद्मे समुद्भूतः कल्पे नाभ्यम्बुजादहम् ॥ ४४

मदंशस्यास्य शैलस्य ममापि च गुरुर्भवान् । सूत उवाच बाढमित्यजमाहासौ देवदेवो जनार्दनः ॥ ४५

देवाश्च मुनयः सर्वे देवदेवश्च शङ्करः ।

ततश्चोत्थाय विद्वान् सः पद्मनाभः प्रणम्य ताम् ॥ ४६ ।

पादौ प्रक्षाल्य देवस्य कराभ्यां कमलेक्षणः ।

अभ्युक्षदात्मनो मूर्ध्नि ब्रह्मणश्च गिरेस्तथा ॥ ४७

त्वदीयैषा विवाहार्थं मेनजा ह्यनुजा मम ।

इत्युक्त्वा सोदकं दत्त्वा देवीं देवेश्वराय ताम् ॥ ४८

स्वात्मानमपि देवाय सोदकं प्रददौ हरिः ।

अथ सर्वे मुनिश्रेष्ठाः सर्ववेदार्थपारगाः ॥ ४ ९

ऊचुर्दाता गृहीता च फलं द्रव्यं विचारतः ।

एष देवो हरो नूनं मायया हि ततो जगत् ॥ ५०

इत्युक्त्वा तं प्रणेमुश्च प्रीतिकण्टकितत्वचः ।

ससृजुः पुष्पवर्षाणि खेचराः सिद्धचारणाः ॥ ५१

देवदुन्दुभयो नेदुर्ननृतुश्चाप्सरोगणाः ।

वेदाश्च मूर्तिमन्तस्ते प्रणेमुस्तं महेश्वरम् ॥ ५२

1985 Lingamahapuran_Section_19_2_Front विवाहकी मांगलिक कथा ५४७ ! 6 ¥ ¥ 3 36 36 36 36 36 36 36 36 36 किये गये हैं । इन पार्वतीने परमेष्ठी [ शिव ] ********* - की मायासे हिमवान्की पुत्रीके रूपमें जन्म लिया है । अतः ये सभी लोकोंकी, आपकी तथा मेरी भी धात्री ( जननी ) हैं और श्रौतस्मार्त प्रवृत्तिके लिये विवाहके उद्देश्यसे यहाँ आये हुए ये रुद्र सबके धाता ( जनक ) हैं । चूँकि पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश, चन्द्र, सूर्य, आत्मा तथा पवन शिवके ही विग्रहस्वरूप हैं, अतः इन रुद्रदेवकी [ इन्हीं ] मूर्तियोंसे ही जगत् उत्पन्न हुआ है । तथापि हिमवान्के तथा मेरे वचनसे शुक्ल - कृष्ण - लोहित वर्णवाली मायारूपा इन पार्वतीको उन शिवके निमित्त प्रदान कर देना चाहिये; [ हे विष्णो! ] आप भी प्रकृतिरूप हैं । पर्वतराज साथ यह सम्बन्ध आपके लिये भी कल्याणप्रद है । मैं पद्मकल्पमें आपके नाभिकमलसे उत्पन्न हुआ था; अतः आप मेरे अंशस्वरूप इन हिमालयके तथा मेरे भी गुरु हैं ' ॥ ३७–४४१ / २ ॥ सूतजी बोले - [ हे ऋषियो! ] तब उन देवदेव जनार्दनने ब्रह्मासे कहा - ' ठीक है । ' तब देवतागण, सभी मुनि तथा देवदेव शिव प्रसन्न हो गये । तदनन्तर कमलके समान नेत्रवाले उन विद्वान् पद्मनाभ विष्णुने उठकर उन [ पार्वती ] को प्रणाम करके अपने हाथोंसे शिवके दोनों चरणोंको धोकर अपने, ब्रह्माके तथा हिमालयके सिरपर जल छिड़का । ' [ हे शिव! ] आपकी नित्यसम्बन्धिनी ये [ पार्वती ] विवाहविधिकी सिद्धिके लिये ही मेनासे उत्पन्न हुई हैं; ये मेरी छोटी बहन हैं'– ऐसा कहकर विष्णुने उन पार्वतीको देवेश्वरके लिये जलसहित समर्पित करके स्वयं अपनेको भी उन देवके लिये जलसहित समर्पित कर दिया ॥ ४५–४८९ / २ ॥ इसके बाद सभी वेदोंके अर्थोंमें पारंगत श्रेष्ठ मुनियोंने कहा - ' विचार करनेपर वस्तुतः ये महादेव शिव ही दाता, गृहीता, द्रव्य तथा फल सब कुछ हैं और इन्हींकी मायासे यह जगत् स्थित है ' - ऐसा कहकर प्रसन्नतासे रोमांचित उन सभीने शिवजीको प्रणाम किया ॥४ ९ -५० ९ / २ ॥ उस समय आकाशचारी सिद्धों तथा चारणोंने | पुष्पवृष्टि की, देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं और

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५४८

ब्रह्मणा मुनिभिः सार्धं देवदेवमुमापतिम् ।

देवोऽपि देवीमालोक्य सलज्जां हिमशैलजाम् ॥

न तृप्यत्यनवद्याङ्गी सा च देवं वृषध्वजम् ।

वरदोऽस्मीति तं प्राह हरिं सोऽप्याह शङ्करम् ॥

त्वयि भक्तिः प्रसीदेति ब्रह्माख्यां च ददौ तु सः ।

ततस्तु पुनरेवाह ब्रह्मा विज्ञापयन् प्रभुम् ॥

हविर्जुहोमि वह्नौ तु उपाध्यायपदे स्थितः ।

ददासि मम यद्याज्ञां कर्तव्यो ह्यकृतो विधि: ॥

तमाह शङ्करो देवं देवदेवो जगत्पतिः ।

यद्यदिष्टं सुरश्रेष्ठ तत्कुरुष्व यथेप्सितम् ॥

कर्तास्मि वचनं सर्वं देवदेव पितामह । श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । अप्सराएँ नृत्य करने लगीं । सभी वेदोंने शरीर धारण ५३ | करके ब्रह्मा तथा मुनियोंके साथ उन देवदेव उमापति महेश्वरको प्रणाम किया ॥ ५१-५२१ / २ ॥ लज्जासे भरी हुई देवी पार्वतीको देखकर शिव ५४ तृप्त नहीं होते थे और दूषणरहित शरीरवालीवे [ पार्वती ] भी देवदेव वृषभध्वजको देखकर तृप्त नहीं होती थीं । तब शिवने विष्णुसे कहा — ‘ मैं वरदाता हूँ । ’ ५५ इसपर उन्होंने भी शंकरसे कहा — ' आपमें मेरी भक्ति बनी रहे; मुझपर प्रसन्न होइये । ' तब शिवने उन्हें ब्रह्मत्व प्रदान किया । इसके बाद ब्रह्माने पुनः प्रभुसे प्रार्थना ५६ करते हुए कहा - ' मैं उपाध्याय ( आचार्य ) -के पदपर स्थित होकर अग्निमें हवन करता हूँ और यदि आप आज्ञा दें, तो जो विधि अभीतक नहीं की गयी है, उसे ५७ सम्पन्न करूँ ' ॥५३–५६ ॥ तब जगत् के स्वामी देवदेव शंकरने उन देव ब्रह्मासे कहा – ' हे सुरश्रेष्ठ! जो - जो अभीष्ट हो, उसे ततः प्रणम्य हृष्टात्मा ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ ५८ आप इच्छानुसार कीजिये । हे देवदेव! हे पितामह! मैं

हस्तं देवस्य देव्याश्च युयोज परमं प्रभुः ।

ज्वलनश्च स्वयं तत्र कृताञ्जलिरुपस्थितः ॥

श्रौतैरेतैर्महामन्त्रैर्मूर्तिमद्भिरुपस्थितैः 1 यथोक्तविधिना हुत्वा लाजानपि यथाक्रमम् ॥

आनीतान् विष्णुना विप्रान् सम्पूज्य विविधैर्वरैः ।

त्रिश्च तं ज्वलनं देवं कारयित्वा प्रदक्षिणम् ॥

मुक्त्वा हस्तसमायोगं सहितैः सर्वदैवतैः ।

सुरैश्च मानवैः सर्वैः प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥

ननाम भगवान् ब्रह्मा देवदेवमुमापतिम् ।

ततः पाद्यं तयोर्दत्वा शम्भोराचमनं तथा ॥

मधुपर्कं तथा गां च प्रणम्य च पुनः शिवम् ।

अतिष्ठद्भगवान् ब्रह्मा देवैरिन्द्रपुरोगमैः ॥

[ आपके ] समस्त वचनका पालन करूँगा ' ॥ ५७ %, ॥

तदनन्तर [ उन्हें ] प्रणाम करके प्रसन्नचित्त परम ५ ९ प्रभु लोकपितामह ब्रह्माने शिव तथा देवी [ पार्वती ] -के हाथोंको [ परस्पर ] मिला दिया । स्वयं अग्निदेव हाथ जोड़े हुए वहाँ उपस्थित हुए । [ साक्षात् ] मूर्तिमान् ६० होकर उपस्थित वैवाहिक श्रौत महामन्त्रोंके द्वारा यथोक्त विधिसे हवन करनेके अनन्तर विष्णुके द्वारा लाये गये ६१ लाजा ( धानका लावा ) का भी यथाक्रम हवन करके विविध गोदानोंसे विप्रोंकी पूजाकर पुनः तीन बार अग्निदेवकी प्रदक्षिणा कराकर उनके मिले F ६२ मुक्त कराकर भगवान् ब्रह्माने प्रसन्न मनसे सभी देवताओं, ऋषियों तथा मनुष्योंके साथ देवदेव उमापतिको प्रणाम किया॥५८–६२९ २ ॥ ६३ तत्पश्चात् उन दोनोंको पाद्य जल देकर और शम्भुको आचमन, मधुपर्क तथा गौ प्रदान करके पुनः | शिवको प्रणाम करके भगवान् ब्रह्मा, इन्द्र आदि ६४ । देवताओंके साथ स्थित हो बैठ गये ॥ ६३-६४ ॥