लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 551–560
लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 551–560
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अध्याय १०३ ] भगवान् शिव एवं पार्वतीके
भृग्वाद्या मुनयः सर्वे चाक्षतैस्तिलतण्डुलैः ।
सूर्यादयः समभ्यर्च्य तुष्टुवुर्वृषभध्वजम् ॥ ६५ ।
शिवः समाप्य देवोक्तं वह्निमारोप्य चात्मनि ।
तया समागतो रुद्रः सर्वलोकहिताय वै ॥ ६६
यः पठेच्छृणुयाद्वापि भवोद्वाहं शुचिस्मितः ।
श्रावयेद्वा द्विजान् शुद्धान् वेदवेदाङ्गपारगान् ॥ ६७
स लब्ध्वा गाणपत्यं च भवेन सह मोदते ।
यत्रायं कीर्त्यते विप्रैस्तावदास्ते तदा भवः ॥ ६८
तस्मात्सम्पूज्य विधिवत्कीर्तयेनान्यथा द्विजाः ।
उद्वाहे च द्विजेन्द्राणां क्षत्रियाणां द्विजोत्तमाः ॥ ६ ९
कीर्तनीयमिदं सर्वं भवोद्वाहमनुत्तमम् ।
कृतोद्वाहस्तदा देव्या हैमवत्या वृषध्वजः ॥ ७०
सगणो नन्दिना सार्धं सर्वदेवगणैर्वृतः ।
पुरीं वाराणसीं दिव्यामाजगाम महाद्युतिः ॥ ७१
अविमुक्ते सुखासीनं प्रणम्य वृषभध्वजम् ।
अपृच्छत् क्षेत्रमाहात्म्यं भवानी हर्षितानना ॥ ७२
अथाहार्धेन्दुतिलकः क्षेत्रमाहात्म्यमुत्तमम् ।
अविमुक्तस्य माहात्म्यं विस्तराच्छक्यते नहि ॥ ७३
वक्तुं मया सुरेशानि ऋषिसङ्घाभिपूजितम् ।
किं मया वर्ण्यते देवि ह्यविमुक्तफलोदयः ॥ ७४
पापिनां यत्र मुक्तिः स्यान्मृतानामेकजन्मना ।
अन्यत्र तु कृतं पापं वाराणस्यां व्यपोहति ॥ ७५
वाराणस्यां कृतं पापं पैशाच्यनरकावहम् ।
कृत्वा पापसहस्त्राणि पिशाचत्वं वरं नृणाम् ॥ ७६
न तु शक्रसहस्त्रत्वं स्वर्गे काशीपुरीं विना ।
यत्र त्रिविष्टपो देवो यत्र विश्वेश्वरो विभुः ॥ ७७
विवाहकी मांगलिक कथा ५४ ९ समस्त भृगु आदि मुनियों तथा सूर्य आदि ग्रहोंने अक्षतों तथा तिल - तण्डुलोंसे वृषभध्वजका अर्चन करके उनकी स्तुति की ॥ ६५ ॥
तत्पश्चात् वे रुद्र शिव ब्रह्मोक्त समस्त [ वैवाहिक ] कृत्य सम्पन्न करके तथा अग्निको अपनेमें आरोपित करके सभी लोकोंके हितके लिये उन पार्वतीके साथ वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ ६६ ॥
जो [ व्यक्ति ] पवित्र होकर प्रसन्नतापूर्वक शिवके विवाह - आख्यानको पढ़ता अथवा सुनता है अथवा वेद-वेदांगमें पारंगत शुद्ध द्विजोंको सुनाता है, वह गणपति - पद प्राप्त करके शिवके साथ आनन्दित होता है । जहाँ भी ब्राह्मणोंद्वारा इस विवाह - प्रसंगको कहा जाता है, वहाँ पर शिवजी विराजमान रहते हैं, इसमें सन्देह नहीं है । अतः हे द्विजो! विधिवत् उनकी पूजा करके इस आख्यानको अवश्य कहना चाहिये । हे उत्तम ब्राह्मणो! श्रेष्ठ द्विजों तथा क्षत्रियोंके विवाहमें इस अत्युत्तम सम्पूर्ण शिवविवाह-प्रसंगका कीर्तन करना चाहिये ॥ ६७-६९९ / २ ॥ तब विवाह कर लेनेके उपरान्त महाकान्तिसम्पन्न शिवजी [ अपने ] गणों, नन्दी तथा देवी पार्वतीके साथ दिव्य वाराणसीपुरीमें आये ॥ ७०-७१ ॥ इसके बाद हर्षयुक्त मुखमण्डलवाली भवानी अविमुक्त ( वाराणसी ) - में सुखपूर्वक आसीन वृषभध्वजको प्रणाम करके [ उस ] क्षेत्रका माहात्म्य पूछने लगीं ॥ ७२ ॥
तब अर्धचन्द्रको तिलकरूपमें धारण करनेवाले शिवजी उत्तम क्षेत्रमाहात्म्यका वर्णन करने लगे – ' हे सुरेशानि! मेरे द्वारा अविमुक्तक्षेत्रका माहात्म्य विस्तारपूर्वक नहीं कहा जा सकता है; यह क्षेत्र ऋषियोंद्वारा पूजित है । हे देवि! मैं अविमुक्तक्षेत्रमें होनेवाले पुण्यफलका वर्णन कैसे करूँ, जहाँपर मरनेवाले पापियोंकी एक ही जन्ममें मुक्ति हो जाती है । [ लोगोंद्वारा ] अन्यत्र किया गया पाप वाराणसीमें नष्ट हो जाता है और वाराणसीमें किया गया पाप पिशाचयोनिरूपी नरककी प्राप्ति करानेवाला होता है । हजारों पाप करके मनुष्योंके लिये पिशाचत्व श्रेष्ठ । है, किंतु काशीपुरीके बिना स्वर्गमें हजार बार इन्द्रपद
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५५० ओङ्कारेशः कृत्तिवासा मृतानां न पुनर्भवः उक्त्वा क्षेत्रस्य माहात्म्यं सङ्क्षेपाच्छशिशेखरः दर्शयामास चोद्यानं परित्यज्य गणेश्वरान् तत्रैव भगवान् जातो गजवक्त्रो विनायकः दैत्यानां विघ्नरूपार्थमविघ्नाय दिवौकसाम् । एतद्वः कथितं सर्वं कथासर्वस्वमुत्तमम् श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । । प्राप्त करना भी श्रेष्ठ नहीं है । जहाँपर भगवान् त्रिविष्टप ॥ ७८ विभु विश्वेश्वर तथा कृत्तिवास ओंकारेश [, | विराजमान हैं, उस काशीमें मरनेवालोंका पुनर्जन्म सदा ] नहीं होता ' ॥ ७३–७७१ / २ ॥ । इस प्रकार संक्षेपमें क्षेत्रका माहात्म्य कहकर ॥ ७ ९ गणेश्वरोंको विदा करके चन्द्रशेखरने पार्वतीको [ अपना ] उद्यान दिखाया । भगवान् गजानन विनायक दैत्योंको विघ्न उत्पन्न करनेके लिये तथा देवताओंका विघ्न दूर । करनेके लिये वहींपर उत्पन्न हुए थे । [ हे ऋषियो! ] ॥ ८० मैंने आपलोगोंको कथाका सम्पूर्ण उत्तम तथा सुन्दर तत्त्व संक्षेपमें बता दिया, जैसा कि मैंने व्यासजीकी कृपासे
यथाश्रुतं मया सर्वं प्रसादाद्वः सुशोभनम् ॥ ८१ । सुना था ॥ ७८-८१ ॥
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पार्वतीविवाहवर्णनं नाम त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ' पार्वतीविवाहवर्णन ' नामक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०३ ॥
एक सौ चारवाँ अध्याय गजाननका प्राकट्य करानेके लिये ऋषय ऊचुः
कथं विनायको जातो गजवक्त्रो गणेश्वरः ।
कथं प्रभावस्तस्यैवं सूत वक्तुमिहार्हसि ॥ १
सूत उवाच
एतस्मिन्नन्तरे देवाः सेन्द्रोपेन्द्राः समेत्य ते ।
धर्मविघ्नं तदा कर्तुं दैत्यानामभवन् द्विजाः ॥ २
असुरा यातुधानाश्च राक्षसाः क्रूरकर्मिणः ।
तामसाश्च तथा चान्ये राजसाश्च तथा भुवि ॥ ३
अविघ्नं यज्ञदानाद्यैः समभ्यर्च्य महेश्वरम् ।
ब्रह्माणं च हरिं विप्रा लब्धेप्सितवरा यतः ॥४
ततोऽस्माकं सुरश्रेष्ठाः सदाविजयसम्भवः ।
तेषां ततस्तु विघ्नार्थमविघ्नाय दिवौकसाम् ॥ ५
पुत्रार्थं चैव नारीणां नराणां कर्मसिद्धये ।
विघ्नेशं शङ्कर स्त्रष्टुं गणपं स्तोतुमर्हथ ॥ ६
इत्युक्त्वान्योऽन्यमनघं तुष्टुवुः शिवमीश्वरम् ।
नमः सर्वात्मने तुभ्यं सर्वज्ञाय पिनाकिने ॥ ७
देवताओंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति ऋषिगण बोले - [ हे सूतजी! ] गणोंके स्वामी गजानन विनायक कैसे उत्पन्न हुए; उनका प्रभाव कैसा है? इसे आप बतानेकी कृपा कीजिये ॥१ ॥
सूतजी बोले- हे द्विजो! इसी बीच इन्द्र तथा उपेन्द्रसहित देवतागण एकत्र होकर दैत्योंके धर्ममें विघ्न करनेके लिये प्रवृत्त हुए । हे विप्रो! [ वे विचार करने लगे कि ] असुर, यातुधान, क्रूर कर्मवाले राक्षस तथा पृथ्वीपर जो अन्य तमोगुणी तथा रजोगुणी लोग हैं, उन्होंने अविघ्नतापूर्वक कार्य करनेहेतु यज्ञ - दान आदिके द्वारा महेश्वर, ब्रह्मा तथा विष्णुकी सम्यक् पूजा करके अभीष्ट वर प्राप्त कर लिया है; अतः हे सुरश्रेष्ठो! । सर्वदा हम लोगोंका पराभव हो रहा है । इसलिये उनके विघ्नके लिये, देवताओंके अविघ्नके लिये, स्त्रियोंको | पुत्रप्राप्तिके लिये तथा पुरुषोंके कर्मकी सिद्धिके लिये आप सभीलोग विघ्नेश गणपतिके सृजनहेतु शंकरकी स्तुति कीजिये ॥२-६ ॥ आपसमें ऐसा कहकर वे [ देवता ] निष्पाप ईश्वर
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अध्याय १०४ ] गजाननका प्राकट्य करानेके अनघाय विरिञ्चाय देव्याः कार्यार्थदायिने । अकायायार्थकायाय हरेः कायापहारिणे कायान्तस्थामृताधारमण्डलावस्थिताय ते । कृतादिभेदकालाय कालवेगाय ते नमः कालाग्निरुद्ररूपाय धर्माद्यष्टपदाय च कालीविशुद्धदेहाय कालिकाकारणाय ते कालकण्ठाय मुख्याय वाहनाय वराय ते अम्बिकापतये तुभ्यं हिरण्यपतये नमः हिरण्यरेतसे चैव नमः शर्वाय शूलिने कपालदण्डपाशासिचर्माङ्कुशधराय च पतये हैमवत्याश्च हेमशुक्लाय ते नमः पीतशुक्लाय रक्षार्थं सुराणां कृष्णवर्त्मने पञ्चमाय महापञ्चयज्ञिनां फलदाय च पञ्चास्यफणिहाराय पञ्चाक्षरमयाय ते पञ्चधा पञ्चकैवल्यदेवैरर्चितमूर्तये पञ्चाक्षरदृशे तुभ्यं परात्परतराय ते षोडशस्वरवज्राङ्गवक्त्रायाक्षयरूपिणे कादिपञ्चकहस्ताय चादिहस्ताय ते नमः टादिपादाय रुद्राय तादिपादाय ते नमः लिये देवताओंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति ५५१ शिवकी स्तुति करने लगे - आप सर्वात्मा, सर्वज्ञ तथा ॥ ८ पिनाकधारीको नमस्कार है । निष्पाप, विशेष रूपसे ब्रह्माण्डकी रचना करनेवाले, देवी [ पार्वती ] -को तपस्याका फल प्रदान करनेवाले, कायारहित, प्रयोजनके लिये शरीर धारण करनेवाले, विष्णुकी कायाका अपहरण करनेवाले, ॥ ९ देहके भीतर अमृताधार - मण्डलमें विराजमान रहनेवाले आप [ शिव ] - को नमस्कार है । कृत ( सत्ययुग ) आदि । कालभेदोंको उत्पन्न करनेवाले तथा कालवेग आप ॥१० [ शिव ] - को नमस्कार है ॥ ७ – ९ ॥ कालाग्निके समान भयंकर रूपवाले, धर्म आदि आठ पदों ( स्थानों ) वाले, महाकालीको विशुद्ध ( गौर ) । देह करनेवाले तथा कालिका ( चण्डिका ) - की उत्पत्ति ॥ ११ करनेवाले आप [ शिव ] - को नमस्कार है ॥१० ॥
कालकण्ठ, प्रधानस्वरूप, वाहन ( कर्मफलकी प्राप्ति करानेवाले ) तथा सर्वश्रेष्ठ आप [ शिव ] - को । नमस्कार है । अम्बिकापति तथा हिरण्यपति आप [ शिव ] -॥१२ । को नमस्कार है ॥ हिरण्यरेता, असि - चर्म - अंकुश । है । पार्वतीपति, ॥ १३ [ अर्धनारीश्वररूप तथा देवताओंकी ११ ॥ शर्व, शूली और कपाल - दण्ड - पाश-धारण करनेवाले [ शिव ] - को नमस्कार सुवर्णके समान शुक्ल ( शुद्ध ), होनेके कारण ] पीत- शुक्ल वर्णवाले रक्षाके लिये अग्निरूपवाले आप । [ शिव ] - को नमस्कार है ॥ १२-१३ ॥ ॥ १४ तुरीयातीत, [ देवयज्ञ आदि ] पंच महायज्ञोंके कर्ताओंको फल देनेवाले, पंचमुख सर्पको हारके रूपमें धारण करनेवाले तथा पंचाक्षर [ मन्त्र ] - मय आप [ शिव ] -। को नमस्कार है । पाँच प्रकारसे [ रुद्र आदि ] पंच ॥ १५ । कैवल्य देवोंद्वारा पूजित मूर्तिवाले, पंचाक्षर मन्त्ररूप दृष्टिवाले तथा परात्परतर आप [ शिव ] - को नमस्कार है ॥ १४-१५ ॥ [ अकार आदि ] सोलह स्वरमय वज्रके समान ॥ १६ [ अभेद्य ] अंगों तथा मुखवाले, अक्षय रूपवाले, ' क ' से प्रारम्भ होनेवाले पाँच अक्षररूप हाथवाले, ' च ' आदि । [ पाँच वर्णरूप ] हाथवाले, ' ट ' आदि [ पाँच वर्णरूप ] पादिमेण्द्राय ॥ १७ । पादवाले, ' त ' आदि [ पाँच वर्णरूप ] पादवाले, ' प ' आदि यद्यङ्गधातुसप्तकधारिणे
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५५२ अ सान्तात्मरूपिणे साक्षात्क्षदन्तक्रोधिने नमः लवरेफहळाङ्गाय निरङ्गाय च ते नमः
सर्वेषामेव भूतानां हृदि निःस्वनकारिणे ।
भ्रुवोर सदासद्भिर्दृष्टायात्यन्तभानवे ॥
भानुसोमाग्निनेत्राय परमात्मस्वरूपिणे ।
गुणत्रयोपरिस्थाय तीर्थपादाय ते नमः ॥
तीर्थतत्त्वाय साराय तस्मादपि पराय ते ।
ऋग्यजुः सामवेदाय ओङ्काराय नमो नमः ॥
ओङ्कारे त्रिविधं रूपमास्थायोपरिवासिने ।
पीताय कृष्णवर्णाय रक्तायात्यन्ततेजसे ॥
स्थानपञ्चकसंस्थाय पञ्चधाण्डबहिः क्रमात् ।
ब्रह्मणे विष्णवे तुभ्यं कुमाराय नमो नमः ॥
अम्बायाः परमेशाय सर्वोपरिचराय ते ।
मूलसूक्ष्मस्वरूपाय स्थूलसूक्ष्माय ते नमः ॥
सर्वसङ्कल्पशून्याय सर्वस्माद्रक्षिताय ते ।
आदिमध्यान्तशून्याय चित्संस्थाय नमो नमः ॥
यमाग्निवायुरुद्राम्बुसोमशक्रनिशाचरैः दिङ्मुखे दिङ्मुखे नित्यं सगणैः पूजिताय ते ॥ सर्वेषु सर्वदा सर्वमार्गे सम्पूजिताय ते ।
रुद्राय रुद्रनीलाय कद्रुद्राय प्रचेतसे ।
महेश्वराय धीराय नमः साक्षात् शिवाय ते ॥
अथ शृणु भगवन् स्तवच्छलेन कथितमजेन्द्रमुखैः सुरासुरेशैः । श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । [ पाँच वर्णरूप ] मेढ्र ( लिंग ) वाले, ' य ' कारमय अंगसम्बन्धी ॥ १८ सात धातुओंको धारण करनेवाले आप रुद्रको नमस्वधी । है । श ष स वर्णमय आत्मरूपवाले तथा ' क्ष ' कारमय प्रलयरूप क्रोधवाले [ शिवको ] नमस्कार है । ल, व रेफ १ ९ ह, ळ - पाँच वर्णरूप हृदयोंवाले तथा निरंग आप [ शिव , ], -को नमस्कार है ॥ १६–१८ ॥ सभी प्राणियोंके हृदयमें अनाहत ध्वनि करनेवाले, भक्तोंके द्वारा भ्रुवोंके मध्य सदा दिखायी देनेवाले, २० अत्यन्त भानु ( सर्वप्रकाशक ), सूर्य - चन्द्र - अग्निरूप नेत्रवाले, परमात्म - स्वरूपी, तीनों गुणोंसे ऊपर स्थित तथा तीर्थरूप पादवाले आप [ शिव ] को नमस्कार है ॥ १ ९ -२० ॥ २१ तीर्थरूप तत्त्ववाले, सारस्वरूप ( तीर्थफलरूप ) और उस तीर्थफलके भी अधिष्ठाता आप [ शिव ] -को नमस्कार है । ऋक् - यजुः सामवेदस्वरूप तथा ओंकारस्वरूप २२ [ शिव ] - को बार- बार नमस्कार है ॥ २१ ॥
[ ब्रह्मा, विष्णु, हर ] तीन प्रकारके रूपको धारण करके प्रणवानन्तनादमें तुरीयरूपसे स्थित रहनेवाले, २३ पीत - कृष्ण - रक्त वर्णवाले, अपरिमित तेजवाले, ब्रह्माण्डके बाहर क्रमसे पाँच प्रकारसे [ जल आदि ] पाँच स्थानोंमें स्थित रहनेवाले और ब्रह्मा - विष्णु- कुमारस्वरूप आप २४ [ शिव ] - को बार- बार नमस्कार है॥२२-२३ ॥ अम्बिकाके परमेश्वर तथा सबके ऊपर विचरण करनेवाले आप [ शिव ] - को नमस्कार है । मूल सूक्ष्म २५ स्वरूपवाले तथा स्थूल - सूक्ष्मस्वरूप आप [ शिव ] -को नमस्कार है ॥२४ ॥
समस्त संकल्पोंसे रहित, सबसे रक्षित ( गुप्त ), आदि - मध्य - अन्तसे रहित तथा ज्ञानमें स्थित आप २६ [ शिव ] -को बार - बार नमस्कार है ॥२५ ॥
गणोंसहित यम, अग्नि, वायु, रुद्र, वरुण, सोम, इन्द्र तथा निशाचरोंके द्वारा दिशाओं- विदिशाओंमें नित्य । पूजित आप [ शिव ] - को नमस्कार है । सभी लोकों में २७ तथा सभी मार्गोमें सर्वदा पूजित आपको नमस्कार है । रुद्र, रुद्रनील, कद्रुद्र, प्रचेता, महेश्वर, धीर साक्षात् आप शिवको नमस्कार है ॥ २६-२७ ॥ • भगवन्! सुनिये; देवताओं तथा दैत्योंके स्वामी
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अध्याय १०५ ] विघ्ननाशक श्रीगणेशजीके प्राकट्यकी कथा मखमदनयमाग्निदक्षयज्ञ-क्षपणविचित्रविचेष्टितं क्षमस्व ॥ २८ सूत उवाच
यः पठेत्तु स्तवं भक्त्या शक्राग्निप्रमुखैः सुरैः ।
कीर्तितं श्रावयेद्विद्वान् स याति परमां गतिम् ॥ २ ९ ।
५५३ ब्रह्मा - इन्द्र आदिने मख, कामदेव, यम, अग्नि तथा दक्षयज्ञके विध्वंसरूपी आपके विचित्र क्रिया - कलापका वर्णन स्तुतिके बहाने किया है; आप क्षमा करें ॥ २८ ॥
सूतजी बोले- जो विद्वान् [ व्यक्ति ] इन्द्र, अग्नि आदि प्रधान देवताओंके द्वारा किये गये इस स्तवको भक्तिपूर्वक पढ़ता है अथवा [ दूसरोंको ] सुनाता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है ॥२ ९ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे देवस्तुतिर्नाम चतुरधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ' देवस्तुति ' नामक एक सौ चारवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०४ ॥
एक सौ पाँचवाँ अध्याय विघ्ननाशक श्रीगणेशजीके प्राकट्यकी कथा सूत उवाच
यदा स्थिताः सुरेश्वराः प्रणम्य चैवमीश्वरम् ।
तदाम्बिकापतिर्भवः पिनाकधृङ् महेश्वरः ॥ १ ।
ददौ निरीक्षणं क्षणाद्भवः स तान् सुरोत्तमान् ।
प्रणेमुरादराद्धरं सुरा मुदार्द्रलोचनाः ॥२
भवः सुधामृतोपमैर्निरीक्षणैर्निरीक्षणात् ।
तदाह भद्रमस्तु वः सुरेश्वरान् महेश्वरः ॥ ३ ।
वरार्थमीश वीक्ष्य ते सुरा गृहं गतास्त्विमे ।
प्रणम्य चाह वाक्पतिः पतिं निरीक्ष्य निर्भयः ॥ ४
सुरेतरादिभिः सदा ह्यविघ्नमर्थितो भवान् ।
समस्तकर्मसिद्धये सुरापकारकारिभिः ॥ ५
ततः प्रसीदताद्भवान् सुविघ्नकर्मकारणम् ।
सुरापकारकारिणामिहैष एव नो वरः ॥ ६
ततस्तदा निशम्य वै पिनाकधृक् सुरेश्वरः ।
गणेश्वरं सुरेश्वरं वपुर्दधार सः शिवः ॥ ७
गणेश्वराश्च तुष्टुवुः सुरेश्वरा महेश्वरम् ।
समस्तलोकसम्भवं भवार्तिहारिणं शुभम् ॥ ८
इभाननाश्रितं वरं त्रिशूलपाशधारिणम् ।
समस्तलोकसम्भवं गजाननं तदाम्बिका ॥ ९
सूतजी बोले - [ हे ऋषियो! ] शिवजीको प्रणाम करके जब सुरेश्वर लोग [ यथास्थान ] स्थित हो गये, तब अम्बिकापति, पिनाकधारी, भव महेश्वरने उन श्रेष्ठ देवताओंको क्षणभरमें दिव्य दृष्टि प्रदान की । तब अश्रुसे भीगे नेत्रवाले देवताओंने प्रसन्नतासे युक्त होकर आदरपूर्वक शिवको प्रणाम किया॥१-२ ॥ इसके बाद महेश्वर भवने सुधामृततुल्य दृष्टिसे देखकर सुरेश्वरोंसे कहा- ' आपलोगोंका कल्याण हो ' ॥ ३ ॥
तदनन्तर स्वामी शिवको देखकर निर्भय होकर बृहस्पतिने उन्हें प्रणाम करके कहा - ' हे ईश! ये देवता आपका दर्शन करके वरप्राप्तिके लिये आपके घर आये हुए हैं । देवताओंका अपकार करनेवाले दैत्यों आदि द्वारा निर्विघ्नतापूर्वक समस्त कर्मोंकी सिद्धिके लिये आप सदा प्रार्थित हैं । अतः आप देवताओंके अपकारी दैत्योंके विघ्नयुक्त कर्मका कारण बनिये और प्रसन्न होइये; यही हमलोगोंका वर है'॥४–६ ॥ तब यह सुनकर उन पिनाकधारी सुरेश्वर शिवने देवताओंके स्वामी गणेश्वरका शरीर धारण किया । तदनन्तर गणेश्वरों तथा [ ब्रह्मा आदि ] सुरेश्वरोंने समस्त लोकोंको उत्पन्न करनेवाले तथा संसारका कष्ट दूर करनेवाले शुभ [ गजाननरूपी ] महेश्वरकी स्तुति की ॥ ७-८ ॥ इसके बाद अम्बिका [ पार्वती ] - ने हाथीके समान | मुख धारण किये हुए और [ हाथोंमें ] त्रिशूल तथा पाश
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५५४ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग 66 96 96 96 96 96 96 96 96 ददुः पुष्पवर्षं हि सिद्धा मुनीन्द्रा- लिये हुए समस्त लोकोंके उत्पादक कल्याणकारी स्तथा खेचरा देवसङ्घास्तदानीम् । तदा तुष्टुवुश्चैकदन्तं सुरेशाः प्रणेमुर्गणेशं महेशं वितन्द्राः ॥ १०
तदा तयोर्विनिर्गतः सुभैरवः समूर्तिमान् ।
स्थितो ननर्त बालकः समस्तमङ्गलालयः ॥ ११
विचित्रवस्त्रभूषणैरलङ्कृतो गजाननः ।
महेश्वरस्य पुत्रकोऽभिवन्द्य तातमम्बिकाम् ॥ १२
जातमात्रं सुतं दृष्ट्वा चकार भगवान् भवः ।
गजाननाय कृत्यांस्तु सर्वान् सर्वेश्वरः स्वयम् ॥
आदाय च कराभ्यां च सुसुखाभ्यां भवः स्वयम् ।
आलिङ्ग्याघ्राय मूर्धानं महादेवो जगद्गुरुः ॥
तवावतारो दैत्यानां विनाशाय ममात्मज ।
देवानामुपकारार्थं द्विजानां ब्रह्मवादिनाम् ॥
यज्ञश्च दक्षिणाहीनः कृतो येन महीतले ।
तस्य धर्मस्य विघ्नं च कुरु स्वर्गपथे स्थितः ॥
गजाननको जन्म दिया ॥ ९ ॥
उस समय सिद्धों, मुनियों, आकाशचारियों तथा देवताओंने पुष्पवृष्टि की; तब सुरेश्वरोंने आलस्यरहित होकर एकदन्त महेश्वर गणेशको प्रणाम किया तथा १३ उनकी स्तुति की ॥१० ॥
उस समय उन शिवा - शिवसे उत्पन्न, विचित्र वस्त्र - आभूषणोंसे अलंकृत तथा सभी मंगलोंका आलय महेश्वर - पुत्र वह बालक गजानन मूर्तिमान् सुन्दर भैरवकी भाँति स्थित होकर पिता [ शिव ] तथा माताकी वन्दना १४ करके नृत्य करने लगा॥११-१२ ॥ उत्पन्न हुए पुत्रको देखकर भगवान् सर्वेश्वर भवने गजाननके लिये सभी [ जातकर्म आदि ] संस्कारोंको स्वयं किया ॥ १३ ॥
इसके बाद जगद्गुरु महादेव भवने स्वयं [ अपने ] १५ परम सुखदायक हाथोंसे उसे उठाकर, आलिंगन करके | तथा उसके सिरको सूँघकर कहा - ' हे मेरे पुत्र! तुम्हारा | अवतार दैत्योंके विनाशके लिये और देवताओं तथा ब्रह्मवादी द्विजोंके उपकारके लिये हुआ । जिसने पृथ्वीतलपर दक्षिणाविहीन यज्ञ किया है, तुम स्वर्गपथमें स्थित रहते जो १६ । हुए उसके धर्ममें विघ्न डालो । इस पृथ्वीतलपर
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अध्याय १०५ ] विघ्ननाशक श्रीगणेशजीके प्राकट्यकी कथा
अध्यापनं चाध्ययनं व्याख्यानं कर्म एव च ।
योऽन्यायतः करोत्यस्मिंस्तस्य प्राणान् सदा हर ॥
वर्णाच्च्युतानां नारीणां नराणां नरपुङ्गव ।
स्वधर्मरहितानां च प्राणानपहर प्रभो ॥
याः स्त्रियस्त्वां सदा कालं पुरुषाश्च विनायक ।
यजन्ति तासां तेषां च त्वत्साम्यं दातुमर्हसि ॥
त्वं भक्तान् सर्वयत्नेन रक्ष बालगणेश्वर ।
यौवनस्थांश्च वृद्धांश्च इहामुत्र च पूजितः ॥
जगत्त्रयेऽत्र सर्वत्र त्वं हि विघ्नगणेश्वरः ।
सम्पूज्यो वन्दनीयश्च भविष्यसि न संशयः ॥
मां च नारायणं वापि ब्रह्माणमपि पुत्रक ।
यजन्ति यज्ञैर्वा विप्रैरग्रे पूज्यो भविष्यसि ॥
त्वामनभ्यर्च्य कल्याणं श्रौतं स्मार्तं च लौकिकम् ।
कुरुते तस्य कल्याणमकल्याणं भविष्यति ॥
ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैः शूद्रैश्चैव गजानन ।
सम्पूज्य सर्वसिद्ध्यर्थं भक्ष्यभोज्यादिभिः शुभैः ॥
त्वां गन्धपुष्पधूपाद्यैरनभ्यर्च्य जगत्त्रये ।
देवैरपि तथान्यैश्च लब्धव्यं नास्ति कुत्रचित् ॥
अभ्यर्चयन्ति ये लोका मानवास्तु विनायकम् ।
ते चार्चनीयाः शक्राद्यैर्भविष्यन्ति न संशयः ॥
अजं हरिं च मां वापि शक्रमन्यान् सुरानपि ।
विघ्नैर्बाधयसि त्वां चेन्नार्चयन्ति फलार्थिनः ॥
ससर्ज च तदा विघ्नगणं गणपतिः प्रभुः ।
गणैः सार्धं नमस्कृत्वाप्यतिष्ठत्तस्य चाग्रतः ॥
तदाप्रभृति लोकेऽस्मिन् पूजयन्ति गणेश्वरम् ।
दैत्यानां धर्मविघ्नं च चकारासौ गणेश्वरः ॥
एतद्वः कथितं सर्वं स्कन्दाग्रजसमुद्भवम् ।
यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा सुखी भवेत् ॥
५५५ अन्यायपूर्वक अध्ययन, अध्यापन, व्याख्यान तथा [ अन्य ] १७ कर्म करता हो; उसके प्राणोंको तुम सदा हरते रहो । हे नरश्रेष्ठ! हे प्रभो! वर्णसे च्युत तथा अपने धर्मसे रहित १८ पुरुषों एवं स्त्रियोंके प्राणोंको हर लो । हे विनायक! जो स्त्रियाँ तथा पुरुष सदा कालरूप तुम्हारी पूजा करें, तुम उन्हें अपना साम्य प्रदान करो । हे बालगणेश्वर! तुम इस लोक १ ९ तथा परलोकमें पूजित होकर युवा और वृद्ध भक्तोंकी रक्षा सम्पूर्ण प्रयत्नसे करो । तुम तीनों लोकोंमें सर्वत्र विघ्नगणेश्वरके २० रूपमें पूजनीय तथा वन्दनीय होओगे; इसमें संशय नहीं है । हे पुत्र! जो [ विप्र ] मेरी, विष्णुकी तथा ब्रह्माकी पूजा करते हैं अथवा [ अग्निष्टोम आदि ] यज्ञोंके द्वारा यजन २१ करते हैं, उन ब्राह्मणोंके द्वारा भी सबसे पहले तुम पूज्य होओगे । तुम्हारी पूजा न करके जो कल्याणके लिये श्रौत-२२ स्मार्त - लौकिक कर्म करेगा, उसका मंगल अमंगलके रूपमें परिवर्तित हो जायेगा । हे गजानन! तुम समस्त कार्योंकी सिद्धिके लिये ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा २३ शूद्रोंके द्वारा शुभ भक्ष्य - भोज्य आदिसे भली - भाँति पूजाके योग्य होओगे । गन्ध, पुष्प, धूप आदिसे तुम्हारी पूजा किये २४ बिना तीनों लोकोंमें कहीं भी देवताओं तथा अन्य लोगोंसे भी कुछ नहीं प्राप्त हो सकता है । जो मानव विनायककी पूजा करेंगे, वे इन्द्र आदिके द्वारा भी पूजनीय होंगे; इसमें २५ सन्देह नहीं है । यदि फलकी इच्छा रखनेवाले तुम्हारी पूजा नहीं करते हों, तो वे चाहे ब्रह्मा, विष्णु, स्वयं मैं, इन्द्र अथवा २६ | अन्य देवता ही क्यों न हों, उन्हें तुम विघ्नोंसे बाधित करो ' ॥ १४ – २७ ॥ तब प्रभु गणपतिने विघ्नगणोंको उत्पन्न किया २७ और वे गणोंके साथ शिवजीको नमस्कार करके उनके आगे खड़े हो गये ॥ २८ ॥
२८ उसी समयसे लोग इस लोकमें गणपतिकी पूजा करने लगे और वे गणेश्वर दैत्योंके धर्ममें विघ्न डालने लगे । [ हे ऋषियो! ] मैंने आप लोगोंको स्कन्द २ ९ ( कार्तिकेय ) - के अग्रजकी उत्पत्तिका सम्पूर्ण आख्यान बता दिया । जो इसे पढ़ता है, सुनता है अथवा सुनाता ३० । है, वह सुखी हो जाता है ॥ २ ९ -३० ॥ पूर्वभागे विनायकोत्पत्तिर्नाम पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०५ ॥
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे अन्तर्गत पूर्वभागमें ' विनायकोत्पत्ति ' नामक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके
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५५६ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग 66666666 एक सौ छठा अध्याय दारुकासुरके विनाशके लिये भगवान् शिवद्वारा अपने शरीरसे काली तथा अष्टभैरवोंको प्रकट करना एवं शिवताण्डवनृत्यकी कथा ऋषय ऊचुः ऋषिगण बोले— [ हे सूतजी! ] हमलोगोंने स्कन्दके नृत्यारम्भः कथं शम्भोः किमर्थं वा यथातथम् । अग्रजका प्रादुर्भाव तो सुन लिया; अब आप हमलोगोंको वक्तुमर्हसि चास्माकं श्रुतः स्कन्दाग्रजोद्भवः सूत उवाच दारुकोऽसुरसम्भूतस्तपसा लब्धविक्रमः सूदयामास कालाग्निरिव देवान् द्विजोत्तमान् दारुकेण तदा देवास्ताडिताः पीडिता भृशम् ब्रह्माणं च तथेशानं कुमारं विष्णुमेव च यममिन्द्रमनुप्राप्य स्त्रीवध्य इति चासुरः स्त्रीरूपधारिभिः स्तुत्यैर्ब्रह्माद्यैर्युधि संस्थितैः बाधितास्तेन ते सर्वे ब्रह्माणं प्राप्य वै द्विजाः विज्ञाप्य तस्मै तत्सर्वं तेन सार्धमुमापतिम् सम्प्राप्य तुष्टुवुः सर्वे पितामहपुरोगमाः । ब्रह्मा प्राप्य च देवेशं प्रणम्य बहुधा नतः
दारुणो भगवान् दारुः पूर्वं तेन विनिर्जिताः ।
निहत्य दारुकं दैत्यं स्त्रीवध्यं त्रातुमर्हसि ॥
विज्ञप्तिं ब्रह्मणः श्रुत्वा भगवान् भगनेत्रहा ।
देवीमुवाच देवेशो गिरिजां प्रहसन्निव ॥
भवतीं प्रार्थयाम्यद्य हिताय जगतां शुभे ।
वधार्थं दारुकस्यास्य स्त्रीवध्यस्य वरानने ॥
अथ सा तस्य वचनं निशम्य जगतोऽरणि: ।
विवेश देहे देवस्य देवेशी जन्मतत्परा ॥
एकेनांशेन देवेशं प्रविष्टा देवसत्तमम् । न विवेद तदा ब्रह्मा देवाश्चेन्द्रपुरोगमाः । ॥ १ यथार्थरूपसे यह बतायें कि शम्भुके नृत्यका आरम्भ कैसे तथा किसलिये हुआ? ॥ १ ॥
सूतजी बोले – दारुक नामक एक दैत्य असुरोंमें । उत्पन्न हुआ । तपस्यासे पराक्रम प्राप्त करके कालाग्निके ॥ २ समान वह [ असुर ] देवताओं तथा उत्तम द्विजोंको पीड़ित करने लगा ॥२ ॥
। उस समय वह दारुक ब्रह्मा, ईशान, कुमार, विष्णु, ॥ ३ यम, इन्द्र आदिके पास पहुँचकर उन देवताओंको सताने । लगा, इससे वे देवता बहुत पीड़ित हुए । ' यह असुर ॥ ४ स्त्रीवध्य है ' - ऐसा सोचकर स्त्रीरूपधारी तथा युद्धके लिये स्थित उन स्तुत्य ब्रह्मा आदिके साथ वह असुर । युद्ध करने लगा ॥ ३४ ॥
॥ ५ हे द्विजो! तब उसके द्वारा बाधित किये गये वे सभी [ देवतागण ] ब्रह्माके पास पहुँचकर उनसे सब कुछ निवेदन करके पुनः उन [ ब्रह्माके ] साथ उमापतिके ॥ ६ यहाँ जाकर पितामहको आगे करके [ शिवकी ] स्तुति करने लगे । इसके बाद देवेशके निकट जाकर अत्यन्त ७ विनम्र होकर प्रणाम करके ब्रह्माने कहा — ‘ हे भगवन्! दारुक महाभयंकर है; हमलोग उससे पहले ही पराजित हो चुके हैं । स्त्री द्वारा वध्य उस दैत्य दारुकका संहार ८ करके आप हमलोगोंकी रक्षा कीजिये ' ॥ ५–७ ॥ ब्रह्माजीकी प्रार्थना सुनकर भगके नेत्रोंको नष्ट करनेवाले भगवान् देवेशने देवी गिरिजासे हँसते हुए ९ कहा — ‘ हे शुभे! हे वरानने! मैं सभी लोकोंके हितके | लिये इस स्त्रीवध्य दारुकके वधहेतु आज आपसे प्रार्थना १० करता हूँ'॥८ - ९ ॥ तब उनका वचन सुनकर संसारको उत्पन्न करनेवाली उन देवेश्वरीने जन्मके लिये तत्पर होकर शिवके शरीरमें ११ । प्रवेश किया TI । वे [ पार्वती ] देवताओंमें श्रेष्ठ देवेश्वरमें
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अध्याय १०६ ] भगवान् शिवद्वारा काली तथा
गिरिजां पूर्ववच्छम्भोर्दृष्ट्वा पार्श्वस्थितां शुभाम् ।
मायया मोहितस्तस्याः सर्वज्ञो ऽपि चतुर्मुखः ॥ १२
सा प्रविष्टा तनुं तस्य देवदेवस्य पार्वती ।
कण्ठस्थेन विषेणास्य तनुं चक्रे तदात्मनः ॥ १३
तां च ज्ञात्वा तथाभूतां तृतीयेनेक्षणेन वै ।
ससर्ज कालीं कामारिः कालकण्ठीं कपर्दिनीम् ॥ १४
जाता यदा कालिमकालकण्ठी जाता तदानीं विपुला जयश्रीः । देवेतराणामजयस्त्वसिद्धया तुष्टिर्भवान्याः परमेश्वरस्य ॥ १५ । जातां तदानीं सुरसिद्धसङ्घा
दृष्ट्वा भयाद्दुद्रुवुरग्निकल्पाम् ।
कालीं गरालङ्कृतकालकण्ठी-मुपेन्द्रपद्मोद्भवशक्रमुख्याः ॥ १६ ।
जातं नयनं सितांशुलेखा च शिरस्युदग्रा । कण्ठे करालं निशितं त्रिशूलं करे करालं च विभूषणानि ॥ १७
सार्धं दिव्याम्बरा देव्यः सर्वाभरणभूषिताः ।
सिद्धेन्द्रसिद्धाश्च तथा पिशाचा जज्ञिरे पुनः ॥ १८
आज्ञया दारुकं तस्या: पार्वत्याः परमेश्वरी ।
दानवं सूदयामास सूदयन्तं सुराधिपान् ॥ १ ९
संरम्भातिप्रसङ्गाद्वै तस्याः सर्वमिदं जगत् ।
क्रोधाग्निना च विप्रेन्द्राः सम्बभूव तदातुरम् ॥ २०
भवोऽपि बालरूपेण श्मशाने प्रेतसङ्कुले ।
रुरोद मायया तस्याः क्रोधाग्निं पातुमीश्वरः ॥ २१ ।
अष्टभैरवोंको प्रकट करना ५५७ अपने सोलहवें अंशसे प्रविष्ट हुईं; उस समय ब्रह्मा, इन्द्र आदि प्रधान देवता भी इसे नहीं जान पाये । मंगलमयी पार्वतीको पूर्ववत् शम्भुके समीप स्थित देखकर सब कुछ जाननेवाले ब्रह्मा भी उनकी मायासे मोहित हो गये थे ॥ १०-१२ ॥ उन देवदेवके शरीरमें प्रविष्ट हुईं उन पार्वतीने उनके कण्ठमें स्थित विषसे अपने शरीरको बनाया ॥ १३ ॥
इसके बाद उन पार्वतीको विषभूता जानकर कामशत्रु [ शिव ] ने अपने तीसरे नेत्रसे कालकण्ठी ( कृष्णवर्णके कण्ठवाली ) कपर्दिनी कालीको उत्पन्न किया ॥ १४ ॥
जब विषके कारण कृष्णवर्णके कण्ठवाली काली प्रादुर्भूत हुईं, उस समय विपुल विजयश्री भी उत्पन्न हुईं । अब असिद्धिके कारण दैत्योंकी पराजय निश्चित है, इससे भवानी तथा परमेश्वर [ शिव ] - को प्रसन्नता हुई ॥ १५ ॥
विषसे अलंकृत कृष्णवर्णके कण्ठवाली तथा अग्निके सदृश स्वरूपवाली उस प्रादुर्भूत कालीको देखकर सभी देवता, सिद्धगण और विष्णु - ब्रह्मा - इन्द्र आदि प्रधान देवता भी उस समय भयके कारण भागने लगे ॥ १६ ॥
उनके ललाटमें शिवकी भाँति [ तीसरा ] नेत्र था, मस्तकपर अति तीव्र चन्द्ररेखा थी, कण्ठमें [ कालकूट ] विष था, हाथमें विकराल तीक्ष्ण त्रिशूल था और वे [ सर्पोंके हार - कुण्डल आदि ] आभूषण धारण किये हुए थीं ॥ १७ ॥
कालीके साथ दिव्य वस्त्र धारण किये हुईं तथा सभी आभूषणोंसे विभूषित देवियाँ, सिद्धोंके स्वामी, सिद्धगण तथा पिशाच भी उत्पन्न हुए ॥ १८ ॥
तब उन पार्वतीकी आज्ञासे परमेश्वरी [ काली ] -ने सुराधिपोंको मारनेवाले असुर दारुकका वध कर दिया ॥ १ ९ ॥ हे श्रेष्ठ विप्रो! उनके अतिशय वेग तथा क्रोधकी अग्निसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याकुल हो उठा । तब ईश्वर भव भी मायासे बालरूप धारणकर उन कालीकी क्रोधाग्निको पीनेके लिये [ काशीमें ] श्मशानमें [ जाकर ]
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श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग ५५८
तं दृष्ट्वा बालमीशानं मायया तस्य मोहिता ।
उत्थाप्याघ्राय वक्षोजं स्तनं सा प्रददौ द्विजाः ॥
स्तनजेन तदा सार्धं कोपमस्याः पपौ पुनः I क्रोधेनानेन वै बालः क्षेत्राणां रक्षकोऽभवत् ॥
मूर्तयोऽष्टौ च तस्यापि क्षेत्रपालस्य धीमतः ।
एवं वै तेन बालेन कृता सा क्रोधमूर्च्छिता ॥
कृतमस्याः प्रसादार्थं देवदेवेन ताण्डवम् ।
सन्ध्यायां सर्वभूतेन्द्रैः प्रेतैः प्रीतेन शूलिना ॥
पीत्वा नृत्तामृतं शम्भोराकण्ठं परमेश्वरी ।
ननर्त सा च योगिन्यः प्रेतस्थाने यथासुखम् ॥
तत्र सब्रह्मका देवाः सेन्द्रोपेन्द्राः समन्ततः ।
प्रणेमुस्तुष्टुवुः कालीं पुनर्देवीं च पार्वतीम् ॥
एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तं ताण्डवं शूलिनः प्रभोः ।
योगानन्देन च विभोः ताण्डवं चेति चापरे ॥
रोने लगे ॥ २०-२१ ॥
२२ हे द्विजो! उन बालरूप ईशानको देखकर उनकी मायासे मोहित उन कालीने उन्हें उठाकर मस्तक सूँघकर अपना वक्षस्थित स्तन ग्रहण कराया ॥ २२ ॥
तब वे बालरूप शिव दूधके साथ उनका क्रोध भी २३ | पी गये और इस प्रकार वे इस क्रोधसे क्षेत्रोंकी रक्षा करनेवाले हो गये । उन बुद्धिमान् क्षेत्रपाल [ भैरव ] -की भी आठ मूर्तियाँ हो गयीं । इस प्रकार वे काली २४ | बालकके द्वारा क्रोधमूर्च्छित ( नष्ट संज्ञावाली ) कर दी गयीं ॥ २३-२४ ॥ इसके बाद प्रीतियुक्त देवदेव शिवने इन [ काली ] -की प्रसन्नताके लिये सन्ध्याकालमें श्रेष्ठ भूतों तथा २५ प्रेतोंके साथ ताण्डव [ नृत्य ] किया ॥ २५ ॥
शम्भुके नृत्यामृतका कण्ठपर्यन्त पान करके वे परमेश्वरी [ उस ] श्मशानमें सुखपूर्वक नाचने लगीं और २६ योगिनियाँ भी उनके साथ नाचने लगीं ॥ २६ ॥
वहाँपर ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्रसहित सभी देवताओंने सभी ओरसे कालीको तथा पुनः देवी पार्वतीको प्रणाम किया और उनकी स्तुति की ॥ २७ ॥
२७ [ हे ऋषियो! ] इस प्रकार मैंने संक्षेपमें शूलधारी प्रभुके ताण्डवनृत्यका वर्णन कर दिया; ' योगके आनन्दके कारण विभु [ शिव ] - का ताण्डव होता है ' – ऐसा अन्य २८ । लोग कहते हैं ॥ २८ ॥
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवताण्डवकथनं नाम षडधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ' शिवताण्डवकथन ' नामक एक सौ छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०६ ॥
एक सौ सातवाँ अध्याय शिवभक्त उपमन्युकी कथा तथा ऋषय ऊचुः
पुरोपमन्युना सूत गाणपत्यं महेश्वरात् ।
क्षीरार्णवः कथं लब्धो वक्तुमर्हसि साम्प्रतम् ॥
सूत उवाच
एवं कालीमुपालभ्य गते देवे त्रियम्बके ।
उपमन्युः समभ्यर्च्य तपसा लब्धवान् फलम् ॥
उमामहेश्वरद्वारा उसपर अनुग्रह करना ऋषिगण बोले — हे सूतजी! पूर्वकालमें उपमन्युने महेश्वरसे गणाधिप पद प्राप्त करके पुनः क्षीरसागरको १ कैसे प्राप्त किया; आप इस समय बतानेकी कृपा कीजिये ॥ १ ॥
सूतजी बोले - [ हे ऋषियो! ] इस प्रकार कालीको तपस्या के | उत्पन्न करके त्रिनेत्र शिवके चले जानेपर उपमन्युने २ । द्वारा उनकी पूजा करके फल प्राप्त किया था ॥२ ॥