लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 561–570
लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 561–570
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अध्याय १०७ ] शिवभक्त उपमन्युकी कथा तथा उमामहेश्वरद्वारा उसपर अनुग्रह करना ५५ ९
उपमन्युरिति ख्यातो मुनिश्च द्विजसत्तमाः ।
कुमार इव तेजस्वी क्रीडमानो यदृच्छया ॥
कदाचित्क्षीरमल्पं च पीतवान् मातुलाश्रमे ।
ईर्ष्यया मातुलसुतो ह्यपिबत् क्षीरमुत्तमम् ॥
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पीत्वा स्थितं यथाकामं दृष्ट्वा प्रोवाच मातरम् ।
मातर्मातर्महाभागे मम देहि तपस्विनि ॥
गव्यं क्षीरमतिस्वादु नाल्पमुष्णं नमाम्यहम् । सूत उवाच उपलालितैवं पुत्रेण पुत्रमालिङ्गय सादरम् ॥ दुःखिता विललापार्ता स्मृत्वा नैर्धन्यमात्मनः ।
स्मृत्वा स्मृत्वा पुनः क्षीरमुपमन्युरपि द्विजाः ।
देहि देहीति तामाह रोदमानो महाद्युतिः ॥
उञ्छवृत्त्यार्जितान् बीजान् स्वयं पिष्ट्वा च सा तदा ।
बीजपिष्टं तदालोड्य तोयेन कलभाषिणी ॥
एह्येहि मम पुत्रेति सामपूर्वं ततः सुतम् ।
आलिङ्गयादाय दुःखार्ता प्रददौ कृत्रिमं पयः ॥
पीत्वा च कृत्रिमं क्षीरं मात्रा दत्तं द्विजोत्तमः ।
नैतत्क्षीरमिति प्राह मातरं चातिविह्वलः ॥
दुःखिता सा तदा प्राह सम्प्रेक्ष्याघ्राय मूर्धनि ।
सम्मार्ण्य नेत्रे पुत्रस्य कराभ्यां कमलायते ॥
तटिनी रत्नपूर्णास्ते स्वर्गपातालगोचराः ।
भाग्यहीना न पश्यन्ति भक्तिहीनाश्च ये शिवे ॥
राज्यं स्वर्गं च मोक्षं च भोजनं क्षीरसम्भवम् ।
न लभन्ते प्रियाण्येषां नो तुष्यति सदा भवः ॥
£££££££ हे श्रेष्ठ द्विजो! ' उपमन्यु ' – इस नामसे प्रसिद्ध ३ एक मुनि थे; कुमारके समान तेजस्वी उन्होंने ¶¶¶¶KKKKKK किसी समय स्वेच्छानुसार खेलते हुए [ अपने ] मामाके आश्रममें थोड़ा - सा *********************** दूध पी लिया, तब ईर्ष्याके कारण उनके ४ मामाके पुत्रने उत्तम दुग्धका पान किया ॥ ३-४ ॥ तब इच्छानुसार दुग्ध पीकर उसे पासमें खड़ा देखकर उपमन्युने अपनी मातासे कहा - हे मातः! हे ५ महाभागे! हे तपस्विनि! आप मुझको गायका दुग्ध दीजिये, जो अत्यन्त स्वादिष्ट गर्म हो तथा अल्प न हो; मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ५१ / २ ॥ सूतजी बोले- इस प्रकार पुत्रके द्वारा स्नेह-पूर्वक कही गयी वह बात सुनकर माता आदरके साथ ६ पुत्रका आलिंगन करके दुःखित हो गयी और अपनी निर्धनताका स्मरणकर व्याकुल होकर विलाप करने लगी । द्विजो! बार - बार दूधका स्मरण करके महातेजस्वी उपमन्यु भी मातासे रोते हुए यही कहते थे- ' मुझे दो, ७ मुझे दो'॥६-७ ॥ तत्पश्चात् उंछवृत्ति ( फसल कट जानेके बाद खेतमें पड़े दानोंको बटोरना ) - से अर्जित बीजोंको स्वयं ८ पीसकर पुनः बीजके उस आटेको जलके साथ मिलाकर मधुरभाषिणी वह माता बोली, ' हे मेरे पुत्र! आओ, आओ । ' इसके बाद सान्त्वनापूर्वक पुत्रको पकड़कर ९ आलिंगन करके दुःखसे व्याकुल माताने उसे कृत्रिम दुग्ध दे दिया ॥ ८ - ९ ॥ तब माताके द्वारा दिये गये उस कृत्रिम दुग्धको १० पीकर द्विजश्रेष्ठ [ उपमन्यु ] -ने अति विह्वल होकर मातासे कहा - ' यह दूध नहीं है ' ॥ १० ॥
तब दुःखसे भरी हुई उस माताने बालककी ओर ११ देखकर उसका मस्तक सूँघकर अपने हाथोंसे पुत्रके कमलसदृश विशाल नेत्रोंको पोंछकर कहा - ' [ हे पुत्र! ] जो शिव प्रति भक्तिरहित हैं, वे भाग्यहीन लोग रत्नोंसे १२ | परिपूर्ण तथा स्वर्ग - पातालमें गोचर होनेवाली नदियोंको नहीं देख पाते हैं । शिवजी जिनके ऊपर सदा प्रसन्न नहीं रहते हैं, वे लोग राज्य, स्वर्ग, मोक्ष और दुग्धसे बने हुए १३ | भोजन तथा अन्य प्रिय वस्तुओंको नहीं प्राप्त कर सकते
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५६० श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
भवप्रसादजं सर्वं नान्यदेवप्रसादजम् ।
अन्यदेवेषु निरता दुःखार्ता विभ्रमन्ति च ॥
क्षीरं तत्र कुतोऽस्माकं महादेवो न पूजितः ।
पूर्वजन्मनि यद्दत्तं शिवमुद्यम्य वै सुत ॥
तदेव लभ्यं नान्यत्तु विष्णुमुद्यम्य वा प्रभुम् ।
निशम्य वचनं मातुरुपमन्युर्महाद्युतिः ॥
बालोऽपि मातरं प्राह प्रणिपत्य तपस्विनीम् ।
त्यज शोकं महाभागे महादेवोऽस्ति चेत्क्वचित् ॥
चिराद्वा चिराद्वापि क्षीरोदं साधयाम्यहम् । सूत उवाच तां प्रणम्यैवमुक्त्वा स तपः कर्तुं प्रचक्रमे ॥
तमाह माता सुशुभं कुर्विति सुतरां सुतम् ।
अनुज्ञातस्तया तत्र तपस्तेपे सुदुस्तरम् ॥
हिमवत्पर्वतं प्राप्य वायुभक्षः समाहितः ।
तपसा तस्य विप्रस्य विधूपितमभूज्जगत् ॥
प्रणम्याहुस्तु तत्सर्वे हरये देवसत्तमाः ।
श्रुत्वा तेषां तदा वाक्यं भगवान् पुरुषोत्तमः ॥
किमिदं त्विति सञ्चिन्त्य ज्ञात्वा तत्कारणं च सः ।
जगाम मन्दरं तूर्णं महेश्वरदिदृक्षया ॥
दृष्ट्वा देवं प्रणम्यैवं प्रोवाचेदं कृताञ्जलिः ।
भगवन् ब्राह्मणः कश्चिदुपमन्युरिति श्रुतः ॥
क्षीरार्थमदहत्सर्वं तपसा तं निवारय ।
एतस्मिन्नन्तरे देवः पिनाकी परमेश्वरः ।
शक्ररूपं समास्थाय गन्तुं चक्रे मतिं तदा ॥
अथ जगाम मुनेस्तु तपोवनं
गजवरेण सितेन सदाशिवः ।
सह सुरासुरसिद्धमहोरगै-रमरराजतनुं स्वयमास्थितः ॥
। हैं । शिवकी कृपासे ही सबकुछ प्राप्त होता है , अन्य १४ देवताओंकी कृपासे नहीं; अन्य देवताओंमें परायण रहनेवाले दुःखसे व्यथित होकर [ संसारचक्रमें ] भ्रमण । करते रहते हैं । हमलोगोंको दूध कैसे मिल सकता है १५ क्योंकि हमलोगोंने महादेवकी पूजा नहीं की है । हे; पुत्र! | शिवको उद्देश्य करके पूर्वजन्ममें जो कुछ समर्पित किया १६ जाता है, वही प्राप्त होता है; विष्णु अथवा अन्य देवताको उद्देश्य करके देनेपर कुछ नहीं प्राप्त होता है ' ॥ ११–१५२ ॥ १७ तब माताका वचन सुनकर महातेजस्वी बालक उपमन्यु भी तपस्विनी माताको प्रणाम करके बोला - ' हे महाभागे! शोकका त्याग करो; महादेवजी चाहे कहीं भी हों, मैं शीघ्र अथवा विलम्बसे क्षीरसमुद्रको प्राप्त कर १८ | लूँगा ' ॥ १६-१७२ ॥ सूतजी बोले - [ हे ऋषियो! ] उसे प्रणामकर वे [ उपमन्यु ] तप करनेके लिये प्रवृत्त हुए । तब माताने १ ९ पुत्रसे कहा - ' पूर्णरूपसे अत्यन्त शुभ तपस्या करो । ' उससे आज्ञा प्राप्त करके हिमवान् पर्वतपर जाकर २० वायुका आहार करते हुए एकाग्रचित्त होकर वे अति कठोर तप करने लगे ॥ १८-१९९ २ ॥ उस विप्रकी तपस्यासे [ सम्पूर्ण ] जगत् तप्त हो २१ उठा । तब सभी श्रेष्ठ देवताओंने विष्णुको प्रणाम करके वह बात बतायी । इसके बाद उनका वचन सुनकर २२ भगवान् पुरुषोत्तम ' यह क्या है ' - ऐसा सोचकर पुन: उसका कारण जानकर महेश्वरके दर्शनकी इच्छासे शीघ्रतापूर्वक मन्दर पर्वतपर गये ॥ २०-२२ ॥ २३ शिवको देखकर उन्हें प्रणाम करके विष्णुने हाथ जोड़कर यह कहा — ' हे भगवन्! उपमन्यु नामसे प्रसिद्ध किसी ब्राह्मणने दुग्धके लिये [ अपनी ] तपस्यासे सबको २४ । जला डाला; आप उसे रोकिये ' ॥ २३१/२ ॥ इसके अनन्तर पिनाकधारी देव परमेश्वरने इन्द्रका रूप धारणकर वहाँ जानेका विचार किया । तत्पश्चात् वे | सदाशिव देवराज [ इन्द्र ] -का रूप धारणकर श्वेत गजराजपर आरूढ़ होकर सुरों, असुरों, सिद्धों तथा महान् २५ । नागोंके साथ मुनिके तपोवनमें गये॥२४-२५ ॥
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अध्याय १०७ ] शिवभक्त उपमन्युकी कथा तथा उमामहेश्वरद्वारा उसपर 3 37 36 35 36 97 96 95 96 95 96 95 सहैव चारुह्य तदा द्विपं तं प्रगृह्य बालव्यजनं विवस्वान् । वामेन शच्या सहितं सुरेन्द्रं करेण चान्येन सितातपत्रम् ॥
रराज भगवान् सोमः शक्ररूपी सदाशिवः ।
सितातपत्रेण यथा चन्द्रबिम्बेन मन्दरः ॥
अनुग्रह करना ५६१ उनके साथ ही उस हाथीपर चढ़कर सूर्यदेव [ अपने ] बाएँ हाथमें बालव्यजन तथा दाएँ हाथमें श्वेत छत्र लेकर शचीसहित सुरेन्द्रकी सेवा कर रहे थे ॥ २६ ॥
२६ उस समय उमासहित शक्ररूपी भगवान् सदाशिव श्वेत छत्रसे उसी तरह सुशोभित हो रहे थे, जैसे चन्द्रबिम्बसे मन्दर [ पर्वत ] सुशोभित होता है ॥ २७ ॥
इस प्रकार इन्द्रका स्वरूप धारण करके परमेश्वर [ उस ] २७ उपमन्युपर अनुग्रह करनेके लिये उसके आश्रममें गये ॥ २८ ॥
हे मुनिवरो! इन्द्ररूपधारी उन परमेशान शिवको
आस्थायैवं हि शक्रस्य स्वरूपं परमेश्वरः ।
जगामानुग्रहं कर्तुमुपमन्योस्तदाश्रमम् ॥ २८
तं दृष्ट्वा परमेशानं शक्ररूपधरं शिवम् ।
प्रणम्य शिरसा प्राह मुनिर्मुनिवराः स्वयम् ॥ २ ९
पावितश्चाश्रमश्चायं मम देवेश्वरः स्वयम् ।
प्राप्तः शक्रो जगन्नाथो भगवान् भानुना प्रभुः ॥ ३०
एवमुक्त्वा स्थितं वीक्ष्य कृताञ्जलिपुटं द्विजम् ।
प्राह गम्भीरया वाचा शक्ररूपधरो हरः ॥
तुष्टोऽस्मि ते वरं ब्रूहि तपसानेन सुव्रत ।
ददामि चेप्सितान् सर्वान् धौम्याग्रज महामते ॥
एवमुक्तस्तदा तेन शक्रेण मुनिसत्तमः ।
वरयामि शिवे भक्तिमित्युवाच कृताञ्जलिः ॥
देखकर सिर झुकाकर प्रणाम करके मुनि [ उपमन्यु ] -ने स्वयं कहा- ' मेरा यह आश्रम पवित्र हो गया; क्योंकि ३१ देवताओंके स्वामी, जगत्पति, भगवान् प्रभु इन्द्र सूर्यके साथ [ यहाँ ] स्वयं आये हुए हैं ' ॥ २ ९ -३० ॥ ऐसा कहकर हाथ जोड़कर खड़े हुए द्विजको देखकर इन्द्ररूपधारी शिव गम्भीर वाणीमें बोले– ' हे सुव्रत! मैं तुम्हारे इस तपसे प्रसन्न हो गया हूँ; वर ३२ माँगो । हे [ ऋषि ] धौम्यके अग्रज! हे महामते! मैं [ तुम्हें ] समस्त अभीष्ट प्रदान करता हूँ ' ॥ ३१-३२ ॥ तब शक्ररूपी शिवके द्वारा ऐसा कहे जानेपर मुनिश्रेष्ठने हाथ जोड़कर कहा - ' मैं शिवमें भक्तिका वर ३३ | माँगता हूँ'॥३३ ॥
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५६२ ततो निशम्य वचनं मुनेः कुपितवत्प्रभुः प्राह सव्यग्रमीशानः शक्ररूपधरः स्वयम् ॥
मां न जानासि देवर्षे देवराजानमीश्वरम् ।
त्रैलोक्याधिपतिं शक्रं सर्वदेवनमस्कृतम् ॥
मद्भक्तो भव विप्रर्षे मामेवार्चय सर्वदा ।
ददामि सर्वं भद्रं ते त्यज रुद्रं च निर्गुणम् ॥
ततः शक्रस्य वचनं श्रुत्वा श्रोत्रविदारणम् ।
उपमन्युरिदं प्राह जपन् पञ्चाक्षरं शुभम् ॥
मन्ये शक्रस्य रूपेण नूनमत्रागतः स्वयम् ।
कर्तुं दैत्याधमः कश्चिद्धर्मविघ्नं च नान्यथा ॥
त्वयैव कथितं सर्वं भवनिन्दारतेन वै ।
प्रसङ्गाद्देवदेवस्य निर्गुणत्वं महात्मनः ॥
बहुनात्र किमुक्तेन मयाद्यानुमितं महत् ।
भवान्तरकृतं पापं श्रुता निन्दा भवस्य तु ॥
श्रुत्वा निन्दां भवस्याथ तत्क्षणादेव सन्त्यजेत् ।
स्वदेहं तं निहत्याशु शिवलोकं स गच्छति ॥
यो वाचोत्पाटयेज्जिह्वां शिवनिन्दारतस्य तु ।
त्रिः सप्तकुलमुद्धृत्य शिवलोकं स गच्छति ॥
आस्तां तावन्ममेच्छा या क्षीरं प्रति सुराधमम् ।
निहत्य त्वां शिवास्त्रेण त्यजाम्येतत्कलेवरम् ॥
पुरा मात्रा तु कथितं तथ्यमेव न संशयः ।
पूर्वजन्मनि चास्माभिरपूजित इति प्रभुः ॥
एवमुक्त्वा तु तं देवमुपमन्युरभीतवत् ।
शक्रं चक्रे मतिं हन्तुमथर्वास्त्रेण मन्त्रवित् ॥
भस्माधारान्महातेजा भस्ममुष्टिं प्रगृह्य च ।
अथर्वास्त्रं ततस्तस्मै ससर्ज च ननाद च ॥
दग्धुं स्वदेहमाग्नेयीं ध्यात्वा वै धारणां तदा ।
अतिष्ठच्च महातेजाः शुष्केन्धनमिवाव्ययः ॥
एवं व्यवसिते विप्रे भगवान् भगनेत्रहा ।
वारयामास सौम्येन धारणां तस्य योगिनः ॥
श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । तब मुनिका वचन सुनकर इन्द्रका रूप धारण ३४ करनेवाले प्रभु ईशान कुपितकी भाँति व्यग्रतापूर्वक | बोले- ' हे देवर्षे! तीनों लोकोंके अधिपति तथा सभी ३५ | देवताओंसे नमस्कार किये जानेवाले मुझ ईश्वर देवराज | इन्द्रको क्या तुम नहीं जानते हो? हे विप्रर्षे! तुम मेरे भक्त हो जाओ और सर्वदा मेरी ही पूजा करो, मैं तुम्हें ३६ | सब कुछ प्रदान करता हूँ, तुम्हारा कल्याण हो; तुम निर्गुण शिवका त्याग कर दो ' ॥ ३४–३६ ॥ ३७ तब इन्द्रका कर्णविदारक वचन सुनकर उपमन्युने पवित्र पंचाक्षरमन्त्रका जप करते हुए यह कहा— ' अब मैं समझता हूँ कि निश्चय ही कोई अधम दैत्य स्वयं ३८ इन्द्रके स्वरूपमें मेरे धर्ममें विघ्न डालनेके लिये यहाँ आया है; इसमें सन्देह नहीं है । शिवनिन्दापरायण आपने ३ ९ ही प्रसंगवश महात्मा देवदेव [ शिव ] -की निर्गुणता भी बतायी है । अधिक कहनेसे क्या लाभ; मैंने आज ४० अनुमान किया है कि पूर्वजन्ममें किया हुआ मेरा कोई महापाप अवश्य है, जिसके कारण मैंने शिवकी निन्दा ४१ सुनी है । जो शिवकी निन्दा सुनकर उसी क्षण उस [ शिवनिन्दक ] -को मारकर अपने शरीरको त्याग देता है, वह शिवलोकको जाता है । जो [ व्यक्ति ] वाणी ४२ शिवनिन्दा करनेवालेकी जीभ उखाड़ लेता है, वह [ अपनी ] इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करके शिवलोकको ४३ जाता है । दूधके लिये मेरी जो इच्छा है, वह अब दूर रहे; शिवके अस्त्रसे तुझ सुराधमका वध करके मैं [ अपने ] इस शरीरका भी त्याग कर दूँगा । माताने पहले ४४ जो कहा था, वह सत्य है; इसमें सन्देह नहीं है । हमलोगोंनै पूर्वजन्ममें शिवकी पूजा नहीं की थी ' ॥ ३७–४४ ॥ ४५ ऐसा कहकर निडरकी भाँति होकर मन्त्रवेत्ता उपमन्युने उन इन्द्रदेवको अथर्वास्त्रसे मार देनेका विचार ४६ किया । उस महातेजस्वीने भस्मके आधारसे एक मुट्ठी भस्म लेकर उसके लिये अथर्वास्त्रका सृजन किया और जोरसे ध्वनि की । तब आग्नेयी धारणाका ध्यान करके ४७ | अपने देहको सूखे ईंधनकी तरह जलाने के लिये वह अव्यय तेजस्वी खड़ा हो गया ॥ ४५–४७ ॥ ४८ उस विप्रके ऐसा निश्चय करनेपर भगके नेत्रको
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अध्याय १०७ ] शिवभक्त उपमन्युकी कथा तथा उमामहेश्वरद्वारा उसपर SKKKKKKKKKKKKKK अनुग्रह करना ५६३
अथर्वास्त्रं तदा तस्य संहृतं चन्द्रिकेण तु ।
कालाग्निसदृशं चेदं नियोगान्नन्दिनस्तथा ॥ ४ ९
स्वरूपमेव भगवानास्थाय परमेश्वरः ।
दर्शयामास विप्राय बालेन्दुकृतशेखरम् ॥५०
क्षीरधारासहस्त्रं च क्षीरोदार्णवमेव च ।
दध्यादेरर्णवं चैव घृतोदार्णवमेव च ॥५१
फलार्णवं च बालस्य भक्ष्यभोज्यार्णवं तथा ।
अपूपगिरयश्चैव तथातिष्ठन् समन्ततः ॥ ५२
उपमन्युमुवाच सस्मित भगवान् बन्धुजनैः समावृतम् । गिरिजामवलोक्य सस्मितां सघृणं प्रेक्ष्य तु तं तदा घृणी ॥ ५३
भुङ्क्ष्व भोगान् यथाकामं बान्धवैः पश्य वत्स मे ।
उपमन्यो महाभाग तवाम्बैषा हि पार्वती ॥ ५४
मया पुत्रीकृतोऽस्य दत्तः क्षीरोदधिस्तथा ।
मधुनश्चार्णवश्चैव दध्नश्चार्णव एव च ॥ ५५
आज्योदनार्णवश्चैव फललेह्यार्णवस्तथा ।
अपूपगिरयश्चैव भक्ष्यभोज्यार्णवः पुनः ॥ ५६
पिता तव महादेवः पिता वै जगतां मुने ।
माता तव महाभागा जगन्माता न संशयः ॥ ५७
अमरत्वं मया दत्तं गाणपत्यं च शाश्वतम् ।
वरान् वरय दास्यामि नात्र कार्या विचारणा ॥ ५८
एवमुक्त्वा महादेवः कराभ्यामुपगृह्य तम् ।
आघ्राय मूर्धनि विभुर्ददौ देव्यास्तदा भवः ॥ ५ ९
देवी तनयमालोक्य ददौ तस्मै गिरीन्द्रजा ।
योगैश्वर्यं तदा तुष्टा ब्रह्मविद्यां द्विजोत्तमाः ॥ ६०
सोऽपि लब्ध्वा वरं तस्याः कुमारत्वं च सर्वदा ।
तुष्टाव च महादेवं हर्षगद्गदया गिरा ॥ ६१
नष्ट करनेवाले भगवान् शिवने सोमधारणायोगसे उस योगी [ उपमन्यु ] - की [ आग्नेयी ] धारणाको रोक दिया । तब नन्दीके आदेश चन्द्रिक [ नामक गण ] - ने उसके कालाग्नि-सदृश अथर्वास्त्रका संहरण कर लिया ॥ ४८-४९ ॥ इसके बाद भगवान् परमेश्वरने बालचन्द्रमासे शोभित मस्तकवाले [ अपने ] स्वरूपको धारण करके विप्रको दिखाया ॥ ५० ॥
उस समय बालक [ उपमन्यु ] -के चारों ओर हजारों दुग्धधाराएँ, क्षीरसागर, मधुका समुद्र, दधिका सागर, घृतका सागर, फलका सागर, [ अन्य ] भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंका सागर तथा अपूपोंके पर्वत उपस्थित हो गये ॥ ५१-५२ ॥ तदनन्तर दयालु भगवान् [ शिव ] ने मुसकानयुक्त गिरिजाको देखकर तथा बन्धुजनोंसे घिरे हुए उपमन्युकी ओर दयापूर्वक देखकर मुसकराकर उससे कहा — ' हे मेरे पुत्र! तुम अपने बान्धवोंके साथ इच्छानुसार भोगोंका । उपभोग करो । हे उपमन्यो! हे महाभाग! देखो, ये पार्वती तुम्हारी माता हैं । मैंने आज तुम्हें अपना पुत्र बना लिया है और तुम्हें क्षीरसागर, मधुसागर, दधिसागर, घृत तथा ओदनका सागर, फलोंका सागर, लेह्य पदार्थोंका सागर, अपूपोंके पर्वत तथा भक्ष्यभोज्य पदार्थोंका सागर प्रदान किया है । हे मुने! सभी लोकोंके पिता महादेव तुम्हारे पिता हैं और जगज्जननी महाभागा पार्वती तुम्हारी माता हैं; इसमें सन्देह नहीं है । मैंने तुम्हें अमरत्व तथा शाश्वत गाणपत्य प्रदान कर दिया, अब तुम अन्य वरोंको भी माँग लो, मैं तुम्हें दूँगा; इसमें तुम्हें सन्देह नहीं करना चाहिये'॥५३-५८ ॥ ऐसा कहकर महादेव विभु शिवने उसे दोनों हाथोंसे उठाकर उसका सिर सूँघकर पुनः उसे देवी [ पार्वती ] को दे दिया ॥ ५ ९ ॥ हे श्रेष्ठ द्विजो! तब [ अपने ] पुत्रको देखकर गिरिराजपुत्री देवी [ पार्वती ] ने प्रसन्न होकर उसे योगैश्वर्य तथा ब्रह्मविद्या प्रदान की ॥ ६० ॥
उसने भी उन पार्वतीसे वर तथा शाश्वत कुमारत्व | प्राप्त करके हर्षके कारण गद्गद वाणीसे महादेवकी
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श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग ५६४ विरजेक्षणम् । । स्तुति की और इसके बाद हाथ जोड़कर विरजेक्षण वरयामास च तदा वरेण्यं डालनेवाले प्रणिपत्य पुनः पुनः ॥ ६२ ( सात्त्विकजनोंपर दृष्टि ) वरेण्य शिवको कृताञ्जलिपुटो भूत्वा
प्रसीद देवदेवेश त्वयि चाव्यभिचारिणी ।
श्रद्धा चैव महादेव सान्निध्यं चैव सर्वदा ॥ ६३
बार - बार प्रणाम करके वर माँगा - ' हे देवदेवेश! प्रसन्न होइए । हे महादेव! आपमें मेरी अव्यभिचारिणी श्रद्धा रहे तथा सर्वदा आपका सान्निध्य प्राप्त हो ' ॥ ६१–६३ ॥ तब उसके ऐसा कहनेपर शंकरजी हँसते हुए उस एवमुक्तस्तदा तेन प्रहसन्निव शङ्करः । विप्रको वांछित वर प्रदान करके वहींपर अन्तर्धान हो दत्त्वेप्सितं हि विप्राय तत्रैवान्तरधीयत ॥ ६४ । गये ॥६४ ॥
इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे उपमन्युचरितं नाम सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ‘ उपमन्युचरित ' नामक एक सौ सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०७ ॥
एक सौ आठवाँ अध्याय भगवान् श्रीकृष्णका गुरु उपमन्युके आश्रममें जाना और उनसे पाशुपतज्ञान प्राप्त करना तथा पाशुपतव्रतका माहात्म्य ऋषय ऊचुः ऋषिगण बोले — अक्लिष्ट कर्मवाले वासुदेव दृष्टोऽसौ वासुदेवेन कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा । | श्रीकृष्णने धौम्यके ज्येष्ठ भ्राता [ उपमन्यु ] -का दर्शन धौम्यग्रस्ततो लब्धं दिव्यं पाशुपतं व्रतम् ॥ १ किया था और उनसे दिव्य पाशुपतव्रत ग्रहण किया था । कथं लब्धं तदा ज्ञानं तस्मात्कृष्णेन धीमता । हे सूतजी! बुद्धिमान् श्रीकृष्णने उनसे यह ज्ञान कैसे वक्तुमर्हसि तां सूत कथां पातकनाशिनीम् ॥ २ | प्राप्त किया; उस पापनाशिनी कथाको बतानेकी कृपा
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अध्याय १०८ ] भगवान् श्रीकृष्णका गुरु उपमन्युके सूत उवाच
स्वेच्छया ह्यवतीर्णोऽपि वासुदेवः सनातनः ।
निन्दयन्नेव मानुष्यं देहशुद्धिं चकार सः ॥
पुत्रार्थं भगवांस्तत्र तपस्तप्तुं जगाम च ।
आश्रमं चोपमन्योर्वै दृष्टवांस्तत्र तं मुनिम् ॥
आश्रममें जाना पाशुपतव्रतका माहात्म्य ५६५ कीजिये ॥ १-२ ॥ सूतजी बोले - [ हे ऋषियो! ] सनातन वासुदेव ३ अपनी इच्छासे अवतीर्ण हुए थे, फिर भी उन्होंने मानवरूपकी निन्दा करते हुए देहशुद्धि की थी ॥ ३ ॥
भगवान् [ श्रीकृष्ण ] पुत्रप्राप्तिहेतु तप करनेके लिये उपमन्युके आश्रम में गये और उन्होंने वहाँ उन मुनिका दर्शन किया । हे द्विजो! उन धौम्याग्रजको ४ देखकर अत्यन्त सम्मानके साथ उनकी तीन बार
नमश्चकार तं दृष्ट्वा धौम्याग्रजमो द्विजाः ।
बहुमानेन वै कृष्णस्त्रिः कृत्वा वै प्रदक्षिणम् ॥ ५
तस्यावलोकनादेव मुनेः कृष्णस्य धीमतः ।
नष्टमेव मलं सर्वं कायजं कर्मजं तथा ॥ ६
भस्मनोद्धूलनं कृत्वा उपमन्युर्महाद्युतिः ।
तमग्निरिति विप्रेन्द्रा वायुरित्यादिभिः क्रमात् ॥ ७
दिव्यं पाशुपतं ज्ञानं प्रददौ प्रीतमानसः ।
मुनेः प्रसादान्मान्योऽसौ कृष्णः पाशुपते द्विजाः ॥
तपसा त्वेकवर्षान्ते दृष्ट्वा देवं महेश्वरम् ।
साम्बं सगणमव्यग्रं लब्धवान् पुत्रमात्मनः ॥
तदाप्रभृति तं कृष्णं मुनयः संशितव्रताः ।
दिव्याः पाशुपताः सर्वे तस्थुः संवृत्य सर्वदा ॥
प्रदक्षिणा करके श्रीकृष्णने उन्हें नमस्कार किया ॥ ४-५ ॥
उन मुनिके अवलोकनमात्रसे बुद्धिमान् श्रीकृष्णका सम्पूर्ण देहजनित तथा कर्मजनित मल नष्ट हो गया ॥ ६ ॥
८ हे विप्रेन्द्रो! महातेजस्वी उपमन्युने भस्मोद्धूलन करके प्रसन्नचित्त होकर क्रमसे अग्नि, वायु आदि मन्त्रोंके द्वारा उन्हें दिव्य पाशुपत ज्ञान प्रदान किया ॥ ७१२ ॥
हे द्विजो! मुनिकी कृपासे वे श्रीकृष्ण पाशुपतव्रतमें मान्य हो गये । [ अपनी ] तपस्यासे एक वर्षके ९ अन्तमें पार्वती तथा गणोंसहित अव्यग्र देव महेश्वरका दर्शन करके उन्होंने अपना पुत्र प्राप्त किया । उसी समयसे प्रशस्त व्रतवाले दिव्य मुनिगण तथा पशुपतिके सभी भक्त सदा उन कृष्णको घेरकर स्थित रहने १० | लगे ॥ ८ - १० ॥
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५६६ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
अन्यं च कथयिष्यामि मुक्त्यर्थं प्राणिनां सदा ।
सौवर्णी मेखलां कृत्वा आधारं दण्डधारणम् ॥ ११
सौवर्णं पिण्डिकं चापि व्यजनं दण्डमेव च ।
नरैः स्त्रियाथ वा कार्यं मषीभाजनलेखनीम् ॥ १२
क्षुराकर्त्तरिका चापि अथ पात्रमथापि वा ।
पाशुपताय दातव्यं भस्मोद्धूलितविग्रहैः ॥ १३ ।
सौवर्णं राजतं वापि ताम्रं वाथ निवेदयेत् ।
आत्मवित्तानुसारेण योगिनं पूजयेद् बुधः ॥ १४
ते सर्वे पापनिर्मुक्ताः समस्तकुलसंयुताः ।
यान्ति रुद्रपदं दिव्यं नात्र कार्या विचारणा ॥। १५
तस्मादनेन दानेन गृहस्थो मुच्यते भवात् ।
योगिनां सम्प्रदानेन शिवः क्षिप्रं प्रसीदति ॥ १६
राज्यं पुत्रं धनं भव्यमश्वं यानमथापि वा ।
सर्वस्वं वापि दातव्यं यदीच्छेन्मोक्षमुत्तमम् ॥ १७
अधुवेण शरीरेण ध्रुवं साध्यं प्रयत्नतः ।
भव्यं पाशुपतं नित्यं संसारार्णवतारकम् ॥ १८ ।
एतद्वः कथितं सर्वं सङ्क्षेपान्न च संशयः ।
यः पठेच्छृणुयाद्वापि विष्णुलोकं स गच्छति ॥ ९९ ।
[ हे ऋषियो! ] सदा सभी प्राणियोंकी मुक्तिके लिये मैं अन्य व्रतको भी बताऊँगा । सुवर्णमयी मेखला ( परिनालिका ) बनाकर उसके आधार, दण्डधारण ( जलनिवारक बाहरी भाग ), पिण्डिक ( लिङ्ग ), व्यजन दीक्षादण्ड - यह सब सोनेका बनाना चाहिये; साथ हो, मषीपात्रयुक्त लेखनी, छुरी सहित कैंची तथा जलपात्र भी स्वर्णमय बनाकर इन सभी सामग्रियोंको भस्मसे उद्धूलित शरीरवाले पुरुषोंके द्वारा या स्त्रीके द्वारा किसी पशुपति-भक्तको दे दिया जाना चाहिये । बुद्धिमान् व्यक्तिको चाहिये कि अपने धन- सामर्थ्यके अनुसार सोने, चाँदी अथवा ताँबेकी ही सामग्री समर्पित करे और उस योगीकी पूजा करे ॥ ११–१४ ॥ [ ऐसा दान करनेवाले ] वे सभीलोग सम्पूर्ण कुलसहित पापमुक्त होकर दिव्य रुद्रपदको जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये । अतः गृहस्थ इस दानके द्वारा संसार [ चक्र ] - से छूट जाता है । योगियोंके लिये यह दान करनेसे शिव शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं । यदि कोई उत्तम मोक्ष चाहता हो, तो उसे भव्य राज्य, पुत्र, धन, अश्व, यान - यहाँतक कि सर्वस्वका दान कर देना चाहिये । [ इस ] अनित्य शरीरसे भव्य, नित्य ( शाश्वत ) तथा संसार सागर से पार करनेवाले पाशुपतव्रतको प्रयत्नपूर्वक अवश्य सिद्ध करना चाहिये ॥ १५–१८ ॥ [ हे ऋषियो! ] मैंने संक्षेपमें आपलोगोंको यह सब बता दिया । जो इसे पढ़ता है अथवा सुनता है, वह विष्णुलोकको जाता है; इसमें संशय नहीं है ॥ १ ९ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पाशुपतव्रतमाहात्म्यवर्णनं नामाष्टोत्तरशततमोऽध्यायः ॥ १०८ ॥
॥इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ' पाशुपतव्रतमाहात्म्यवर्णन ' नामक एक सौ आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०८ ॥
॥ समाप्तश्चायं पूर्वभागः ॥ ॥ श्रीलिङ्गमहापुराणका पूर्वभाग पूर्ण हुआ ॥
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॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग ] पहला अध्याय भगवद्गुणगानकी महिमामें कौशिक ब्राह्मणकी कथा ऋषय ऊचुः
कृष्णस्तुष्यति केनेह सर्वदेवेश्वरेश्वरः ।
वक्तुमर्हसि चास्माकं सूत सर्वार्थविद्भवान् ॥ १
सूत उवाच
पुरा पृष्टो महातेजा मार्कण्डेयो महामुनिः ।
अम्बरीषेण विप्रेन्द्रास्तद्वदामि यथातथम् ॥ २
ऋषि बोले - हे सूतजी! समस्त देवताओं और ईश्वरोंके ईश्वर भगवान् कृष्ण इस लोकमें किससे सन्तुष्ट होते हैं? आप हम लोगोंको बतायें; आप सम्पूर्ण तत्त्वोंके ज्ञाता हैं ॥१ ॥
सूतजी बोले- हे विप्रवरो! पूर्वकालमें अम्बरीषने भी महातेजस्वी महामुनि मार्कण्डेयसे [ इस विषयमें ] पूछा था; मैं उसे यथार्थरूपसे बता रहा हूँ ॥२ ॥
अम्बरीष उवाच
मुने समस्तधर्माणां पारगस्त्वं महामते ।
मार्कण्डेय पुराणोऽसि पुराणार्थविशारदः ॥ ३
नारायणानां दिव्यानां धर्माणां श्रेष्ठमुत्तमम् ।
तत्किं ब्रूहि महाप्राज्ञ भक्तानामिह सुव्रत ॥
सूत उवाच
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा समुत्थाय कृताञ्जलिः ।
स्मरन्नारायणं देवं कृष्णमच्युतमव्ययम् ॥
अम्बरीष बोले- हे मुने! हे महामते! हे मार्कण्डेयजी! आप समस्त धर्मोके पूर्ण ज्ञाता, अत्यन्त पुरातन तथा पुराणतत्त्वोंके विद्वान् हैं ॥ ३ ॥
४ हे महाप्राज्ञ! नारायणके द्वारा निर्मित दिव्य धर्मोमें कौन - सा धर्म श्रेष्ठ तथा उत्तम है? हे सुव्रत! उसे आप यहाँपर भक्तोंके कल्याणार्थ बतायें ॥४ ॥
सूतजी बोले – उनका यह वचन सुनकर [ मार्कण्डेयजी ] उठ करके दोनों हाथ जोड़कर अविनाशी तथा अच्युत भगवान् नारायण कृष्णका स्मरण करते हुए ५ | कहने लगे ॥५ ॥
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५६८ मार्कण्डेय उवाच शृणु भूप यथान्यायं पुण्यं नारायणात्मकम् । स्मरणं पूजनं चैव प्रणामो भक्तिपूर्वकम् प्रत्येकमश्वमेधस्य यज्ञस्य सममुच्यते । य एकः पुरुषः श्रेष्ठः परमात्मा जनार्दनः
यस्माद् ब्रह्मा ततः सर्वं समाश्रित्यैवमुच्यते ।
धर्ममेकं प्रवक्ष्यामि यद्दृष्टं विदितं मया ॥
पुरा त्रेतायुगे कश्चित् कौशिको नाम वै द्विजः ।
वासुदेवपरो नित्यं सामगानरतः सदा ॥
भोजनासनशय्यासु सदा तद्गतमानसः ।
उदारचरितं विष्णोर्गायमानः पुनः पुनः ॥
विष्णोः स्थलं समासाद्य हरेः क्षेत्रमनुत्तमम् ।
अगायत हरिं तत्र तालवर्णलयान्वितम् ॥
मूर्च्छनास्वरयोगेन श्रुतिभेदेन भेदितम् ।
भक्तियोगं समापन्नो भिक्षामात्रं हि तत्र वै ॥
तत्रैनं गायमानं च दृष्ट्वा कश्चिद्विजस्तदा ।
पद्माख्य इति विख्यातस्तस्मै चान्नं ददौ तदा ॥
सकुटुम्बो महातेजा ह्युष्णमन्नं हि तत्र वै ।
कौशिको हि तदा हृष्टो गायन्नास्ते हरिं प्रभुम् ॥
शृण्वन्नास्ते स पद्माख्यः काले काले विनिर्गतः ।
कालयोगेन सम्प्राप्ताः शिष्या वै कौशिकस्य च ॥
सप्त राजन्यवैश्यानां विप्राणां कुलसम्भवाः ।
ज्ञानविद्याधिकाः शुद्धा वासुदेवपरायणाः ॥
तेषामपि तथान्नाद्यं पद्माक्षः प्रददौ स्वयम् । शिष्यैश्च सहितो नित्यं कौशिको हृष्टमानसः । श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग मार्कण्डेयजी बोले- हे राजन्! सम्यक् प्रकार सुनिये भक्तिपूर्वक [ अनुष्ठित किये गये ] भगवान् ॥ ६ । नारायणके स्मरण, पूजन और प्रणाम - इनमेंसे प्रत्येकको अश्वमेधयज्ञके समान फल प्रदान करनेवाला कहा जाता है; क्योंकि एकमात्र वे प्रभु जनार्दन ही परम पुरुष ॥ ७ परमात्मा हैं, जिनसे आश्रय लेकर ब्रह्माजी जगत्के स्रष्टा कहे जाते हैं । मैंने जो देखा है तथा जाना है, उसी एकमात्र धर्मका वर्णन करूँगा ॥ ६-८ ॥ ८ प्राचीनकालमें त्रेतायुगमें एक कौशिक नामवाले ब्राह्मण थे; वे नित्य - निरन्तर वासुदेवपरायण रहते हुए सामगानमें तल्लीन रहते थे ॥ ९ ॥
९ भगवान् विष्णुके उदार चरित्रका बार - बार गान हुए वे भोजन करने, बैठने तथा शयनमें सदा उन्हींमें अपना चित्त लगाये रहते थे ॥ १० ॥
१० परम पवित्रक्षेत्रस्थ भगवान् विष्णुके मन्दिरमें आकर ' ताल, स्वर और लयसे युक्त, मूर्च्छना और स्वरयोग, बृहद्रथन्तर आदि श्रुतिभेदसे अन्वित भगवान् ११ श्रीहरिका गान करते थे । इस प्रकार भक्तियोगमें सदा स्थित रहकर वे वहींपर भिक्षामात्र ग्रहण करते हुए रहते थे॥११-१२ ॥ १२ उस समय उन्हें वहाँ गाते हुए देखकर ' पद्माख्य ' ( पद्माक्ष ) - इस नाम से विख्यात किसी द्विजने उन्हें अन्न प्रदान किया । तब महातेजस्वी कौशिक अपने कुटुम्बसहित १३ उष्ण अन्नको ग्रहण करके प्रसन्नतापूर्वक प्रभु श्रीहरिका गुणगान करते हुए वहींपर स्थित हो गये ॥ १३-१४ ॥ १४ वह पद्माख्य भी सदा उसे सुनता रहता था और समय - समयपर वहाँसे चला भी जाता था । किसी समय कालयोगसे द्विज कौशिकके सात शिष्य वहाँ आये । वे १५ ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यकुलमें उत्पन्न; ज्ञान और विद्यासे परिपूर्ण; विशुद्ध मनवाले तथा भगवान् वासुदेवके अनन्य भक्त थे ॥ १५-१६ ॥ १६ स्वयं पद्माक्षने उन्हें भी अन्नादिसहित उपयोगी । पदार्थ प्रदान किये ॥ वे कौशिक प्रसन्नचित्त होकर अपने | शिष्योंके साथ वहींपर विष्णुमन्दिरमें प्रभु श्रीहरिका १७ । सम्यक् रूपसे सदा गुणगान करते रहते थे ॥ १७१/३ ॥