लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 591–600

लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 591–600

पृष्ठ 591

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अध्याय ५ ] विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान

वैष्णवान् पालयिष्यामि निहनिष्यामि शात्रवान् ।

लोकतापभये भीत इति मे धीयते मतिः ॥ ४२

श्रीभगवानुवाच यथेच्छं वै चक्रमेतत्सुदर्शनम् । एवमस्तु पुरा रुद्रप्रसादेन लब्धं वै दुर्लभं मया ॥ ४३

ऋषिशापादिकं दुःखं शत्रुरोगादिकं तथा ।

निहनिष्यति ते नित्यमित्युक्त्वान्तरधीयत ॥ ४४

सूत उवाच

ततः प्रणम्य मुदितो राजा नारायणं प्रभुम् ।

प्रविश्य नगरीं रम्यामयोध्यां पर्यपालयत् ॥ ४५

ब्राह्मणादींश्च वर्णांश्च स्वस्वकर्मण्ययोजयत् ।

नारायणपरो नित्यं विष्णुभक्तानकल्मषान् ॥ ४६

पालयामास हृष्टात्मा विशेषेण जनाधिपः ।

अश्वमेधशतैरिष्ट्वा वाजपेयशतेन च ॥ ४७

पालयामास पृथिवीं सागरावरणामिमाम् ।

गृहे गृहे हरिस्तस्थौ वेदघोषो गृहे गृहे ॥ ४८

नामघोषो हरेश्चैव यज्ञघोषस्तथैव च ।

अभवन्नृपशार्दूले तस्मिन् राज्यं प्रशासति ॥४ ९

नासस्या नातृणा भूमिर्न दुर्भिक्षादिभिर्युता ।

रोगहीनाः प्रजा नित्यं सर्वोपद्रववर्जिताः ॥ ५०

अम्बरीषो महातेजाः पालयामास मेदिनीम् ।

तस्यैवं वर्तमानस्य कन्या कमललोचना ॥ ५१

श्रीमती नाम विख्याता सर्वलक्षणसंयुता ।

प्रदानसमयं प्राप्ता देवमायेव शोभना ॥ ५२

तस्मिन् काले मुनिः श्रीमान्नारदोऽभ्यागतश्च वै ।

अम्बरीषस्य राज्ञो वै पर्वतश्च महामतिः ॥५३

तावुभावागतौ दृष्ट्वा प्रणिपत्य यथाविधि । अम्बरीषो महातेजाः पूजयामास तावृषी । ५४ ५८ ९ अर्चन आदिके द्वारा श्रेष्ठ देवताओंको तृप्त करूँगा, वैष्णवजनोंका पालन - पोषण करूँगा और शत्रुओंका संहार करूँगा, प्राणियोंको संताप देनेसे मैं भयभीत रहूँ- मेरी मति ऐसी भावनाको धारण करे ॥ ३ ९ -४२ ॥ श्रीभगवान् बोले — ' जैसी आपकी इच्छा है, वैसा ही होगा । प्राचीनकालमें मैंने भगवान् रुद्रकी । कृपासे यह दुर्लभ सुदर्शन चक्र प्राप्त किया है । यह आपके ऋषिशाप, दुःख, शत्रु, रोग आदिका सदा नाश करेगा ' – ऐसा कहकर वे अन्तर्धान हो गये ॥ ४३-४४ ॥ सूतजी बोले- तदनन्तर भगवान् नारायणको प्रणाम करके आनन्दसे युक्त राजा [ अम्बरीष ] रम्य अयोध्या नगरीमें प्रवेश करके प्रजापालन करने लगे । नारायणमें तत्पर रहनेवाले उन राजाने ब्राह्मण आदि वर्णोंको अपने - अपने कर्ममें लगाया । वे राजा अम्बरीष प्रसन्नचित्त होकर विशेष रूपसे निष्पाप विष्णुभक्तोंका पालन करने लगे । एक सौ अश्वमेधयज्ञ तथा एक सौ वाजपेययज्ञ करके वे सागरपर्यन्त इस पृथ्वीका पालन करनेमें तत्पर हो गये ॥ ४५- -४७१/२ ॥ उन नृपश्रेष्ठके राज्य - शासन करते रहनेपर घर-घरमें विष्णुका विग्रह स्थापित किया गया; घर - घरमें वेद - ध्वनि, विष्णु नामका घोष और यज्ञघोष होने लगा । भूमि फसलरहित, तृणविहीन और दुर्भिक्ष आदिसे युक्त नहीं रह गयी । सम्पूर्ण प्रजाएँ नित्य रोग तथा सभी प्रकारके विघ्नोंसे रहित हो गयीं । इस प्रकार महातेजस्वी अम्बरीष पृथ्वीका पालन करते थे॥४८–५०१२ ॥ इस प्रकार राज्य करते हुए उन राजाके यहाँ कमलके समान नेत्रोंवाली तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न एक कन्या उत्पन्न हुई, जो श्रीमती नामसे विख्यात हुई । देवकन्याके समान सुन्दर वह श्रीमती [ कुछ दिनोंमें ] कन्यादानके योग्य हो गयी । उस समय राजा अम्बरीषके यहाँ श्रीमान् नारदमुनि तथा महामति पर्वत– ये दोनों आये ॥ ५१–५३ ॥ उन दोनों ऋषियोंको आया हुआ देखकर उन्हें प्रणाम करके महातेजस्वी अम्बरीषने विधिपूर्वक उनका । पूजन - सत्कार किया ॥ ५४ ॥

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५ ९ ० कन्यां तां रममाणां वै मेघमध्ये शतह्रदाम् प्राह तां प्रेक्ष्य भगवान्नारदः सस्मितस्तदा केयं राजन् महाभागा कन्या सुरसुतोपमा श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग । मेघमें विद्युत्के समान प्रतीत होनेवाली ॥ कन्याको क्रीड़ा करती हुई देखकर भगवान् उस ५५ नारदने मुसकराकर राजासे कहा- हे राजन्! महाभाग्यशालिनी देवकन्याके सदृश तथा सभी शुभ लक्षणोंसे, सम्पन्न | यह बाला कौन है? हे धर्मधारियोंमें श्रेष्ठ! यह बताइये ॥ ५५-५६ ॥ । राजा बोले- हे विभो!! यह मेरी पुत्री है, जो श्रीमती ब्रूहि धर्मभृतां श्रेष्ठ सर्वलक्षणशोभिता ॥ ५६ नामसे प्रसिद्ध है । यह विवाह - कालको प्राप्त हो चुकी राजोवाच दुहितेयं मम विभो श्रीमती नाम नामतः प्रदानसमयं प्राप्ता वरमन्वेषते शुभा है, अतः यह सौभाग्यशालिनी वरका अन्वेषण कर रही है ॥ ५७ ॥

हे ऋषियो! राजाके ऐसा कहनेपर मुनिश्रेष्ठ नारद उसे प्राप्त करनेकी इच्छा करने लगे और हे श्रेष्ठ । मुनियो! इसी तरह पर्वतमुनि भी उसे पानेकी प्रबल ॥५७ कामना करने लगे ॥५८ ॥

राजाकी अनुमति प्राप्तकर धर्मात्मा नारदने उन्हें

इत्युक्तो मुनिशार्दूलस्तामैच्छन्नारदो द्विजाः ।

पर्वतोऽपि मुनिस्तां वै चकमे मुनिसत्तमाः ॥ ५८

अनुज्ञाप्य च राजानं नारदो वाक्यमब्रवीत् ।

रहस्याहूय धर्मात्मा मम देहि सुतामिमाम् ॥ ५ ९

पर्वतो हि तथा प्राह राजानं रहसि प्रभुः ।

तावुभौ सह धर्मात्मा प्रणिपत्य भयार्दितः ॥

उभौ भवन्तौ कन्यां मे प्रार्थयानौ कथं त्वहम् ।

करिष्यामि महाप्राज्ञ शृणु नारद मे वचः ॥

६० एकान्तमें बुलाकर यह बात कही- ' अपनी इस पुत्रीको मुझे दे दीजिये । ' पर्वतमुनिने भी राजासे एकान्तमें वैसा ही कहा ॥५ ९९ / २ ॥ तब भयसे व्याकुल राजाने उन दोनोंको एक साथ ६ ९ । प्रणाम करके कहा- आप दोनों ही मेरी कन्याकी

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अध्याय ५ ] विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान 55

त्वं च पर्वत मे वाक्यं शृणु वक्ष्यामि यत्प्रभो ।

कन्येयं युवयोरेकं वरयिष्यति चेच्छुभा ॥

तस्मै कन्यां प्रयच्छामि नान्यथा शक्तिरस्ति मे ।

तथेत्युक्त्वा ततो भूयः श्वो यास्याव इति स्म ह ॥

इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलौ जग्मतुः प्रीतिमानसौ ।

वासुदेवपरौ नित्यमुभौ ज्ञानविदां वरौ ॥

विष्णुलोकं ततो गत्वा नारदो मुनिसत्तमः ।

प्रणिपत्य हृषीकेशं वाक्यमेतदुवाच ह ॥

श्रोतव्यमस्ति भगवन्नाथ नारायण प्रभो ।

रहसि त्वां प्रवक्ष्यामि नमस्ते भुवनेश्वर ॥

ततः प्रहस्य गोविन्दः सर्वानुत्सार्य तं मुनिम् ।

ब्रूहीत्याह च विश्वात्मा मुनिराह च केशवम् ॥

त्वदीयो नृपतिः श्रीमानम्बरीषो महीपतिः ।

तस्य कन्या विशालाक्षी श्रीमती नाम नामतः ॥

परिणेतुमनास्तत्र गतोऽस्मि वचनं शृणु ।

पर्वतोऽयं मुनिः श्रीमांस्तव भृत्यस्तपोनिधिः ॥

तामैच्छत्सोऽपि भगवन्नावामाह जनाधिपः ।

अम्बरीषो महातेजाः कन्येयं युवयोर्वरम् ॥

लावण्ययुक्तं वृणुयाद्यदि तस्मै ददाम्यहम् ।

इत्याहावां नृपस्तत्र तथेत्युक्त्वाहमागतः ॥

आगमिष्यामि ते राजन् श्वः प्रभाते गृहं त्विति ।

आगतोऽहं जगन्नाथ कर्तुमर्हसि मे प्रियम् ॥

वानराननवद्भाति पर्वतस्य मुखं यथा ।

तथा कुरु जगन्नाथ मम चेदिच्छसि प्रियम् ॥

तथेत्युक्त्वा स गोविन्दः प्रहस्य मधुसूदनः ।

त्वयोक्तं च करिष्यामि गच्छ सौम्य यथागतम् ॥

५ ९ १ याचना कर रहे हैं; [ ऐसी स्थितिमें ] मैं क्या करूँ? हे ६२ | महाप्राज्ञ! हे नारद! आप मेरी बात सुनें और हे पर्वत! हे प्रभो! आप भी मेरा वचन सुनें, जिसे मैं कह रहा हूँ — ' मेरी यह सौभाग्यवती पुत्री आप दोनोंमेंसे जिस ६३ एकका वरण कर लेगी, उसे मैं अपनी कन्या दे दूँगा; इसके अतिरिक्त मेरा सामर्थ्य नहीं है ' ॥ ६०-६२१ / २ ॥ ६४ ' वैसा ही हो ' – यह कहनेके बाद ' हम दोनों कल पुनः आयेंगे ' – यह कहकर निरन्तर भगवान् विष्णुमें अनुरक्त रहनेवाले तथा ज्ञानियोंमें अग्रणी वे दोनों ६५ मुनिश्रेष्ठ प्रसन्नचित्त होकर वहाँसे चले गये॥६३-६४ ॥ तत्पश्चात् मुनिश्रेष्ठ नारदने विष्णुलोक पहुँचकर भगवान् हृषीकेशको प्रणाम करके यह वचन कहा— ६६ हे भगवन्! हे नाथ! हे नारायण! हे प्रभो! आपको कुछ सुनना है; इसे मैं आपको एकान्तमें बताऊँगा । हे भुवनेश्वर! आपको नमस्कार है ॥ ६५-६६ ॥ ६७ तदनन्तर परमात्मा गोविन्द सभी लोगोंको वहाँसे हटाकर हँस करके उन मुनिसे बोले - ' कहिये । ' तब मुनिने केशवसे कहा - ' मेरी बात सुनिये; श्रीमान् राजा ६८ अम्बरीष आपके भक्त हैं । श्रीमती नामसे विख्यात उनकी विशाल नेत्रोंवाली पुत्री है । मैं उससे विवाह ६ ९ करनेका इच्छुक हूँ । मैं वहाँ गया था । मेरा वचन सुनिये । आपके भक्त तपोनिधि श्रीमान् ये जो पर्वतमुनि हैं, वे भी उसे चाहते हैं । हे भगवन्! महातेजस्वी राजा ७० अम्बरीषने हम दोनोंसे कहा कि यह कन्या आप दोनोंमेंसे जिस सौन्दर्यसम्पन्नका पतिरूपमें वरण करेगी, उसे मैं कन्या अर्पण कर दूँगा । ' जब राजाने हम दोनोंसे ७१ ऐसा कहा, तब ' ठीक है; हे राजन्! मैं आपके घर कल प्रातःकाल आऊँगा ' – ऐसा कहकर मैं यहाँ आ गया । ' हे जगन्नाथ! अब मैं आपके पास आ गया हूँ; आप मेरा ७२ प्रिय कार्य कर दें । हे जगन्नाथ! यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं, तो जिस भी प्रकारसे पर्वतका मुख ७३ वानरके मुखके समान हो जाय, वैसा आप कर दें ' ॥ ६७-७३ ॥ तब मुसकराकर भगवान् मधुसूदनने ' ठीक है'— ७४ | ऐसा कहकर [ मुनि नारदसे ] कहा — हे सौम्य! आपने

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५ ९ २ श्रीलिङ्गमहापुराण 555555 [ उत्तरभाग

एवमुक्त्वा मुनिर्हृष्टः प्रणिपत्य जनार्दनम् ।

मन्यमानः कृतात्मानं तथायोध्यां जगाम सः ॥ ७५

गते मुनिवरे तस्मिन् पर्वतोऽपि महामुनिः ।

प्रणम्य माधवं हृष्टो रहस्येनमुवाच ह ॥ ७६

वृत्तं तस्य निवेद्याग्रे नारदस्य जगत्पतेः ।

गोलाङ्गूलमुखं यद्वन्मुखं भाति तथा कुरु ॥७७

तच्छ्रुत्वा भगवान् विष्णुस्त्वयोक्तं च करोमि वै ।

गच्छ शीघ्रमयोध्यां वै मा वेदीर्नारदस्य वै ॥ ७८

त्वया मे संविदं तत्र तथेत्युक्त्वा जगाम सः ।

ततो राजा समाज्ञाय प्राप्तौ मुनिवरौ तदा ॥ ७ ९

माङ्गल्यैर्विविधैः सर्वामयोध्यां ध्वजमालिनीम् ।

मण्डयामास पुष्पैश्च लाजैश्चैव समन्ततः ॥ ८०

अम्बुसिक्तगृहद्वारां सिक्तापणमहापथाम् ।

दिव्यगन्धरसोपेतां धूपितां दिव्यधूपकैः ॥ ८१

कृत्वा च नगरीं राजा मण्डयामास तां सभाम् ।

दिव्यैर्गन्धैस्तथा धूपै रत्नैश्च विविधैस्तथा ॥ ८२

अलङ्कृतां मणिस्तम्भैर्नानामाल्योपशोभिताम् ।

परार्ध्यास्तरणोपेतैर्दिव्यैर्भद्रासनैर्वृताम् ॥ ८३

कृत्वा नृपेन्द्रस्तां कन्यां ह्यादाय प्रविवेश ह ।

सर्वाभरणसम्पन्नां श्रीरिवायतलोचनाम् ॥ ८४

करसम्मितमध्याङ्गीं पञ्चस्निग्धां शुभाननाम् ।

स्त्रीभिः परिवृतां दिव्यां श्रीमतीं संश्रितां तदा ॥ ८५ ।

| जो कहा है, उसे मैं करूँगा; अब आप जैसे आये वैसे ही चले जाइये ॥ ७४ ॥ थे,

[ भगवान्के ] ऐसा कहनेपर वे मुनि प्रसन्नतापूर्वक जनार्दनको प्रणाम करके अपनेको धन्य मानते वहाँसे अयोध्या चले गये ॥ ७५ ॥ हुए

तत्पश्चात् उन मुनिश्रेष्ठके चले जानेपर महामुनि पर्वतने भी [ वहाँ पहुँचकर ] भगवान् माधवको प्रणाम करके उन [ राजा अम्बरीष ] - का सारा वृत्तान्त उनके सम्मुख एकान्तमें कहकर उनसे प्रसन्नतापूर्वक कहा— हे जगत्पते! नारदका मुख लंगूरके मुखकी भाँति लगने लगे, वैसा आप कर दें ॥ ७६-७७ ॥ यह सुनकर भगवान् विष्णुने कहा - ' आपके द्वारा कही गयी बात मैं अवश्य करूँगा, अब आप शीघ्र ही अयोध्या जाइये; किंतु आपके साथ मेरे इस वार्तालापके विषयमें नारदसे वहाँ मत कहियेगा । तब ' ठीक है'-ऐसा कहकर वे [ पर्वतमुनि ] चले गये ॥७८ ९ / २ ॥ तदनन्तर राजाने उन दोनों मुनिवरोंको आया हुआ जानकर अनेक प्रकारके मांगलिक पदार्थों, पुष्पों तथा लाजा ( लावा ) आदिके द्वारा एवं ध्वजा - तोरण आदि लगवाकर चारों ओरसे सम्पूर्ण अयोध्याको सजाया । भवनोंके द्वारोंको जलसे सिक्त करके, बाजारों तथा मार्गोंपर जलका छिड़काव कराकर, नगरीको दिव्य गन्ध, रस आदिसे युक्त तथा सुगन्धित धूपोंसे धूपित करके राजाने सम्पूर्ण अयोध्याको मण्डित किया । तदनन्तर राजाने उस स्वयंवर - सभाको विविध प्रकारके दिव्य गन्धों, धूपों तथा रत्नोंसे अलंकृत; मणिनिर्मित स्तम्भों तथा अनेकविध मालाओंसे सुशोभित एवं बहुमूल्य आस्तरणोंसे युक्त दिव्य सिंहासनोंसे आवृत करनेके पश्चात् सभी प्रकारके आभरणोंसे सुसज्जित, लक्ष्मीके समान विशाल नेत्रोंवाली, कृशोदरी, हाथ आदि पाँच अंगोंमें कोमलता धारण करनेवाली, मनोहर मुखमण्डलवाली और अनेक स्त्रियोंसे घिरी तथा संश्रित ( सहारा देकर ले जायी जाती हुई ) कन्या श्रीमतीको साथमें लेकर उस सभामें प्रवेश किया ॥ ७ ९ -८५ ॥

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अध्याय ५ ] विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान सभा च सा भूपपतेः समृद्धा मणिप्रवेकोत्तमरत्नचित्रा न्यस्तासना माल्यवती सुबद्धा तामाययुस्ते नरराजवर्गाः ॥ अथापरो ब्रह्मवरात्मजो हि त्रैविद्यविद्यो भगवान् महात्मा । सपर्वतो ब्रह्मविदां वरिष्ठो महामुनिर्नारद आजगाम ॥

तावागतौ समीक्ष्याथ राजा सम्भ्रान्तमानसः ।

दिव्यमासनमादाय पूजयामास तावुभौ ॥

उभौ देवर्षिसिद्धौ तावुभौ ज्ञानविदां वरौ ।

समासीनौ महात्मानौ कन्यार्थं मुनिसत्तमौ ॥

तावुभौ प्रणिपत्याग्रे कन्यां तां श्रीमतीं शुभाम् ।

सुतां कमलपत्राक्षीं प्राह राजा यशस्विनीम् ॥

अनयोर्यं वरं भद्रे मनसा त्वमिहेच्छसि ।

तस्मै मालामिमां देहि प्रणिपत्य यथाविधि ॥

एवमुक्ता तु सा कन्यास्त्रीभिः परिवृता तदा ।

मालां हिरण्यमयीं दिव्यामादाय शुभलोचना ॥

यत्रासीनौ महात्मानौ तत्रागम्य स्थिता तदा ।

वीक्ष्यमाणा मुनिश्रेष्ठौ नारदं पर्वतं तथा ॥

शाखामृगाननं दृष्ट्वा नारदं पर्वतं तथा ।

गोलाङ्गूलमुखं कन्या किञ्चित् त्राससमन्विता ॥

सम्भ्रान्तमानसा तत्र प्रवातकदली यथा ।

तस्थौ तामाह राजासौ वत्से किं त्वं करिष्यसि ॥

अनयोरेकमुद्दिश्य देहि मालामिमां शुभे ।

सा प्राह पितरं त्रस्ता इमौ तौ नरवानरौ ॥

मुनिश्रेष्ठं न पश्यामि नारदं पर्वतं तथा ।

अनयोर्मध्यतस्त्वेकमूनषोडशवार्षिकम् ॥

सर्वाभरणसम्पन्नमतसीपुष्पसन्निभम् दीर्घबाहुं विशालाक्षं तुङ्गोरस्थलमुत्तमम् ॥ ५ ९ ३ राजा अम्बरीषकी वह सभा वैभवमयी, अनेकविध श्रेष्ठ मणियों तथा रत्नोंसे चित्रित, उत्तम आसनोंसे सुशोभित, पुष्पमालाओंसे मण्डित और सुव्यवस्थित थी, ८६ उस सभामें वे राजागण आये ॥ ८६ ॥

तत्पश्चात् ब्रह्माके ज्येष्ठ पुत्र, वेदत्रयी विद्याके ज्ञाता, ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, ऐश्वर्यसम्पन्न तथा महान् आत्मावाले महामुनि नारद पर्वतमुनिसहित वहाँ आ गये ॥ ८७ ॥

८७ उन दोनोंको आया हुआ देखकर व्याकुल-चित्तवाले राजाने दिव्य आसन प्रदानकर उनकी पूजा ८८ की । देवर्षियोंमें विख्यात, ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ तथा महान् आत्मावाले वे दोनों मुनिवर कन्याप्राप्तिके लिये सम्यक् रूपसे आसनपर विराजमान हो गये ॥ ८८-८९ ॥ ८ ९ उन दोनोंके सम्मुख दण्डवत् प्रणाम करके राजाने मनोहर, कमलके समान नेत्रोंवाली तथा यशस्विनी उस ९ ० पुत्री श्रीमतीसे कहा - हे भद्रे! इन दोनोंमेंसे जिस वरको तुम मनसे चाहती हो, उसे प्रणाम करके यह माला ९ १ विधिपूर्वक उसे पहना दो ॥ ९ ० - ९ १ ॥ राजाके ऐसा कहने पर स्त्रियोंसे घिरी हुई सुन्दर नेत्रोंवाली वह कन्या सुवर्णमयी दिव्य माला लेकर, जहाँ ९ २ वे दोनों महात्मा बैठे थे, वहीं आकर उन मुनि-श्रेष्ठों नारद तथा पर्वतको देखती हुई वहीं स्थित हो ९ ३ गयी ॥ ९ २ - ९ ३ ॥ नारदको लंगूरके समान मुखवाला तथा पर्वतको वानरके समान मुखवाला देखकर वह कन्या कुछ डर-९ ४ सी गयी । व्याकुल चित्तवाली वह कन्या वायु - प्रकम्पित कदलीकी भाँति [ काँपती हुई ] वहाँ स्थित रही । तब ९ ५ उस राजाने उससे कहा – हे वत्से! तुम अब क्या करोगी? हे शुभे! इन दोनोंमेंसे किसी एकको चुनकर ९ ६ उसे माला पहना दो॥९ ४ - ९ ५१ / २ ॥ डरी हुई उस कन्या पितासे कहा- ये दोनों तो नरवानरकी आकृतिवाले हैं; मुनिश्रेष्ठ नारद तथा पर्वत ९ ७ तो मुझे दिखायी ही नहीं पड़ रहे हैं । [ अपितु ] इन दोनोंके मध्यमें सोलह वर्षसे थोड़ी कम आयुवाले, ९ ८ | समस्त आभरणोंसे सम्पन्न, अतसी - पुष्पके समान [ नील ]

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५ ९ ४

रेखाङ्कितकटिग्रीवं रक्तान्तायतलोचनम् ।

नम्रचापानुकरणपटुभ्रूयुगशोभितम् ॥

विभक्तत्रिवलीव्यक्तं नाभिव्यक्तशुभोदरम् ।

हिरण्याम्बरसंवीतं तुङ्गरत्ननखं शुभम् ।

पद्माकारकरं त्वेनं पद्मास्यं पद्मलोचनम् ॥

सुनासं पद्महृदयं पद्मनाभं श्रिया वृतम् ।

दन्तपंक्तिभिरत्यर्थं कुन्दकुड्मलसन्निभैः ॥

हसन्तं मां समालोक्य दक्षिणं च प्रसार्य वै ।

पाणिं स्थितममुं तत्र पश्यामि शुभमूर्धजम् ॥

सम्भ्रान्तमानसां तत्र वेपतीं कदलीमिव ।

स्थितां तामाह राजासौ वत्से किं त्वं करिष्यसि ॥

एवमुक्ते मुनिः प्राह नारदः संशयं गतः ।

कियन्तो बाहवस्तस्य कन्ये ब्रूहि यथातथम् ॥

बाहुद्वयं च पश्यामीत्याह कन्या शुचिस्मिता ।

प्राह तां पर्वतस्तत्र तस्य वक्षःस्थले शुभे ॥

किं पश्यसि च मे ब्रूहि करे किं वास्य पश्यसि ।

कन्या तमाह मालां वै पञ्चरूपामनुत्तमाम् ॥

वक्षःस्थलेऽस्य पश्यामि करे कार्मुकसायकान् ।

एवमुक्तौ मुनिश्रेष्ठौ परस्परमनुत्तमौ ॥

मनसा चिन्तयन्तौ तौ मायेयं कस्यचिद्भवेत् ।

मायावी तस्करो नूनं स्वयमेव जनार्दनः ॥

आगतो न यथा कुर्यात्कथमस्मन्मुखं त्विदम् ।

गोलाङ्गूलत्वमित्येवं चिन्तयामास नारदः ॥

पर्वतोऽपि यथान्यायं वानरत्वं कथं मम ।

प्राप्तमित्येव मनसा चिन्तामापेदिवांस्तथा ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण उत्तरभाग | कान्तिवाले, लम्बी भुजाओंवाले, विशाल नेत्रोंवाले ९९ / उन्नत तथा उत्तम वक्षःस्थलवाले, रेखायुक्त कटिप्रदेश, तथा ग्रीवावाले, रक्त प्रान्तभागसे युक्त विशाल नेत्रोंवाले झुके हुए धनुषके सदृश टेढ़ी भौहोंसे सुशोभित, [ [ उदरदेशमें ] पृथक् - पृथक् तीन वलियोंसे समन्वित, १०० | स्पष्ट नाभिसे युक्त सुन्दर उदरवाले, पीताम्बर धारण, | किये हुए, उन्नत तथा रत्नकी आभासे युक्त नखवाले मनोहर कमलके आकारसदृश हाथोंवाले, कमलके, १०१ | समान मुख तथा नेत्रोंवाले, सुन्दर नासिकावाले, पद्मसदृश | हृदयदेशवाले, पद्मके समान नाभिवाले, कान्तिमान्, कुन्द - कलीके समान दन्त - पंक्तियोंसे सुशोभित, सुन्दर १०२ केशोंवाले और मुझको देखकर मेरी ओर दाहिना हाथ फैलाकर हँसते हुए वहाँपर विराजमान इस [ अन्य व्यक्ति ] -को देख रही हूँ ॥ ९६–१०२ ॥ १०३ तब कदलीकी भाँति काँपते हुए वहाँपर खड़ी उस व्याकुल मनवाली कन्यासे राजाने कहा – हे वत्से! अब तुम क्या करोगी? ॥ १०३ ॥

१०४ उसके ऐसा कहने पर सन्देहमें पड़े नारदमुनिने कहा - हे कन्ये! उसकी कितनी भुजाएँ हैं; सही - सही बताओ । तब पवित्र मुसकानवाली उस कन्याने कहा— १०५ मैं [ उसके ] दो हाथ देख रही हूँ । इसके बाद पर्वतने उससे कहा - हे शुभे! तुम उसके वक्षःस्थलपर क्या देख रही हो और उसके [ बायें ] हाथमें क्या देख रही १०६ हो; मुझे बताओ । इसपर कन्या उनसे बोली- मैं उसके वक्षःस्थलपर सर्वश्रेष्ठ पंचरूप माला तथा हाथमें धनुष-१०७ बाण देख रही हूँ॥१०४–१०६१ / २ ॥ उसके द्वारा इस प्रकार कहे गये वे दोनों उत्तम मुनिश्रेष्ठ मनमें सोचते हुए परस्पर कहने लगे कि यह १०८ किसीकी माया हो सकती है । लगता है मायावी तथा तस्कर स्वयं जनार्दन ही [ कन्या प्राप्त करनेके लिये ] | निश्चितरूपसे यहाँ आया हुआ है; यदि ऐसा न होता, १० ९ तो मेरा यह मुख लंगूरके मुखके समान वह क्यों करता? - ऐसा नारदजी सोचने लगे । इसी प्रकार | पर्वतमुनि भी मनमें चिन्ता करने लगे कि मुझे यह ११० | वानरत्व कैसे प्राप्त हो गया? ॥१०७–११० ॥

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अध्याय ५ ] 36 35 36 36 36 36 36 35 36 विष्णुभक्त ततो राजा 363636363636363636 प्रणम्यासौ नारदं पर्वतं तथा । भवद्भ्यां किमिदं तत्र कृतं बुद्धिविमोहजम् स्वस्थौ भवन्तौ तिष्ठेतां यथा कन्यार्थमुद्यतौ । एवमुक्तौ मुनिश्रेष्ठौ नृपमूचतुरुल्बणौ त्वमेव मोहं कुरुषे नावामिह कथञ्चन । राजर्षि अम्बरीषका आख्यान ५ ९ ५ YE YA YA YA YA YA YA YA YA YA YEA तदनन्तर राजाने नारद तथा पर्वतको प्रणाम करके ॥ १११ । कहा- आप दोनोंने बुद्धि - विमोह उत्पन्न करनेवाला यह क्या कर दिया? कन्याको प्राप्त करनेके लिये तत्पर आप दोनों अब शान्तचित्त होकर बैठिये ॥ ११११ / २ ॥ ॥ ११२ राजाके ऐसा कहनेपर वे दोनों मुनिश्रेष्ठ कुपित होकर बोले- आप ही मोह कर रहे हैं; हम दोनों बिलकुल नहीं । आपकी यह पुत्री अब हम दोनोंमेंसे आवयोरेकमेषा ते वरयत्वेव मा चिरम् ॥ ११३ किसी एकका अविलम्ब वरण कर ले ॥ ११२-११३ ॥

ततः सा कन्यका भूयः प्रणिपत्येष्टदेवताम् ।

मायामादाय तिष्ठन्तं तयोर्मध्ये समाहितम् ॥

सर्वाभरणसंयुक्तमतसीपुष्पसन्निभम् दीर्घबाहुं सुपुष्टाङ्गं कर्णान्तायतलोचनम् पूर्ववत्पुरुषं दृष्ट्वा मालां तस्मै ददौ हि सा । अनन्तरं हि सा कन्या न दृष्टा मनुजैः पुनः ततो नादः समभवत् किमेतदिति विस्मितौ । तामादाय गतो विष्णुः स्वस्थानं पुरुषोत्तमः

पुरा तदर्थमनिशं तपस्तप्त्वा वराङ्गना ।

श्रीमती सा समुत्पन्ना सा गता च तथा हरिम् ॥

तावुभौ मुनिशार्दूलौ धिक्कृतावतिदुःखितौ ।

वासुदेवं प्रति तदा जग्मतुर्भवनं हरेः ॥

तावागतौ समीक्ष्याह श्रीमतीं भगवान् हरिः ।

मुनिश्रेष्ठौ समायातौ गूहस्वात्मानमत्र वै ॥

तथेत्युक्त्वा च सा देवी प्रहसन्ती चकार ह ।

नारदः प्रणिपत्याग्रे प्राह दामोदरं हरिम् ॥

प्रियं हि कृतवानद्य मम त्वं पर्वतस्य हि ।

त्वमेव नूनं गोविन्द कन्यां तां हृतवानसि ॥

तत्पश्चात् अपने इष्ट देवताको प्रणाम करके माला लेकर वह उठी और उसने उन दोनोंके बीच में ९ १४ समाहितचित्त होकर बैठे हुए, समस्त आभरणोंसे सुशोभित, अतसीपुष्पके समान श्याम वर्णवाले, लम्बी 1 भुजाओंवाले, पुष्ट अंगोंवाले तथा कर्णपर्यन्त विशाल ॥ ११५ । नेत्रोंवाले पूर्वसदृश पुरुषको देखकर उसे माला पहना दी । इसके बाद पुनः [ वहाँ उपस्थित ] मनुष्योंने उस कन्याको नहीं देखा ॥ ११४–११६ ॥ ॥ ११६ तब वे दोनों मुनि आश्चर्यचकित हो गये कि यह क्या हुआ? इसके बाद वहाँ [ लोगोंके बीच ] यह ध्वनि होने लगी कि उसे लेकर पुरुषोत्तम श्रीविष्णु अपने ॥ ११७ लोकको चले गये । पूर्वजन्ममें उस सुन्दर युवतीने उन भगवान्‌ के लिये निरन्तर तप करके [ इस जन्ममें ] ' श्रीमती ' नामवाली कन्याके रूपमें जन्म लिया और ११८ फिर वह श्रीविष्णुको प्राप्त हुई ॥ ११७-११८ ॥ तत्पश्चात् [ उस श्रीमतीके द्वारा ] तिरस्कृत किये गये वे दोनों मुनिश्रेष्ठ वासुदेव श्रीविष्णुके प्रति अत्यन्त ११ ९ दुःखित होकर उन श्रीहरिके भवन पहुँचे ॥११ ९ ॥ उन दोनोंको आया हुआ देखकर भगवान् श्रीहरिने श्रीमतीसे कहा कि मुनिश्रेष्ठ [ नारद तथा पर्वत ] आये १२० हैं, अतः तुम अपनेको यहाँ छिपा लो ॥१२० ॥

इस पर ' ठीक है ' - ऐसा कहकर उस देवीने हँसते हुए वैसा कर दिया । तब सम्मुख दण्डवत् प्रणाम १२१ करके नारदने दामोदर श्रीहरिसे कहा- आपने मेरा तथा पर्वतका प्रिय कार्य तो आज कर दिया; हे गोविन्द! हे सुरश्रेष्ठ! अपनी बुद्धिसे हम दोनोंको धोखा देकर तथा १२२ | विमोहित करके स्वयं आपने ही उस कन्याका हरण

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५ ९ ६ विमोह्यावां स्वयं बुद्ध्या प्रतार्य सुरसत्तम ।

इत्युक्तः पुरुषो विष्णुः पिधाय श्रोत्रमच्युत ।

पाणिभ्यां प्राह भगवान् भवद्भ्यां किमुदीरितम् ॥

कामवानपि भावोऽयं मुनिवृत्तिरहो किल ।

एवमुक्तो मुनिः प्राह वासुदेवं स नारदः ॥

कर्णमूले मम कथं गोलाङ्गूलमुखं त्विति ।

कर्णमूले तमाहेदं वानरत्वं कृतं मया ॥

पर्वतस्य मया विद्वन् गोलाङ्गूलमुखं तव ।

मया तव कृतं तत्र प्रियार्थं नान्यथा त्विति ॥

पर्वतोऽपि तथा प्राह तस्याप्येवं जगाद सः ।

शृण्वतोरुभयोस्तत्र प्राह दामोदरो वचः ॥

प्रियं भवद्भ्यां कृतवान् सत्येनात्मानमालभे ।

नारदः प्राह धर्मात्मा आवयोर्मध्यतः स्थितः ॥

धनुष्मान् पुरुषः कोऽत्र तां हृत्वा गतवान् किल ।

तच्छ्रुत्वा वासुदेवोऽसौ प्राह तौ मुनिसत्तमौ ॥

मायाविनो महात्मनो बहवः सन्ति सत्तमाः ।

तत्र सा श्रीमती नूनमदृष्ट्वा मुनिसत्तमौ ॥

चक्रपाणिरहं नित्यं चतुर्बाहुरिति स्थितः ।

तां तथा नाहमैच्छं वै भवद्भ्यां विदितं हि तत् ॥

इत्युक्तौ प्रणिपत्यैनमूचतुः प्रीतिमानसौ ।

कोऽत्र दोषस्तव विभो नारायण जगत्पते ॥

दौरात्म्यं तन्नृपस्यैव मायां हि कृतवानसौ ।

इत्युक्त्वा जग्मतुस्तस्मान्मुनी नारदपर्वतौ ॥

अम्बरीषं समासाद्य शापेनैनमयोजयत् ।

नारदः पर्वतश्चैव यस्मादावामिहागतौ ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग किया है ॥ १२१-१२२१ / २ ॥ उनके ऐसा कहनेपर परम पुरुष अच्युत भगवान् १२३ विष्णुने दोनों हाथोंसे अपने कान बन्द करके कहा-आप दोनोंने यह क्या कह दिया! अहो, यह तो वासनामय भाव है, जबकि आपलोग मुनिवृत्तिवाले १२४ | हैं | १२३१/२ ॥ [ भगवान्‌के द्वारा ] इस प्रकार कहे गये उन नारद मुनिने वासुदेवसे उनके कर्णमूलमें कहा- आपने मेरा १२५ मुख लंगूरके मुखके समान क्यों कर दिया? तब भगवान् उनके कर्णमूलमें बोले — हे विद्वन्! मैंने ही पर्वतका मुख वानर - जैसा और आपका मुख लंगूर जैसा १२६ कर दिया था; यह सब मैंने आपके हितके लिये ही किया था, इसके विपरीत नहीं ॥ १२४ - १२६ ॥ पर्वतने भी वही पूछा; तब उन विष्णुने उनसे भी १२७ वैसा ही कहा । इसके बाद भगवान् दामोदर श्रवण कर रहे उन दोनोंके समक्ष यह वचन बोले- मैं शपथपूर्वक सत्य कहता हूँ कि मैंने आप दोनोंका हित ही किया १२८ | है ॥ १२७१/२ ॥ तत्पश्चात् धर्मात्मा नारदने कहा- हम दोनोंके मध्यमें स्थित वह कौन धनुर्धारी पुरुष था, जो उस १२ ९। कन्याका हरण करके चला गया था? ॥ १२८ ९ / २ ॥ यह सुनकर वासुदेवने उन मुनिवरोंसे कहा-१३० ' बहुतसे श्रेष्ठ महात्मा लोग भी मायावी हैं । वहाँ निश्चित ही श्रीमतीने आप दोनों ऋषिसत्तमोंको देखकर ही अन्यका वरण किया होगा । मैं हाथमें चक्र धारण १३१ किये चार भुजाओंसे युक्त होकर स्थित रहता हूँ, यह तो आप दोनोंको विदित ही है; मैंने उसे प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं की है ' ॥ १२ ९ – १३१ ॥ १३२ भगवान्ने जब उनसे ऐसा कहा, तब उन दोनोंने प्रसन्न-चित्त होकर उन्हें प्रणाम करके कहा — हे विभो! हे नारायण! हे जगत्पते! इसमें आपका क्या दोष है; इसमें उस राजाकी १३३ ही धृष्टता है, उसीने यह माया रची है ॥ १३२ ९ २ ॥ ऐसा कहकर वे दोनों मुनि नारद तथा पर्वत वहाँसे । चल पड़े । अम्बरीषके यहाँ आकर नारद तथा पर्वतने उन्हें १३४ । शाप दे दिया । हम दोनों आये थे, फिर भी उसके बादमें

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अध्याय ५ ] विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान पश्चादन्यस्मै कन्यां त्वं दत्तवानसि । आहूय मायायोगेन तस्मात्त्वां तमो ह्यभिभविष्यति ॥ १३५

तेन चात्मानमत्यर्थं यथावत्त्वं न वेत्स्यसि ।

एवं शापे प्रदत्ते तु तमोराशिरथोत्थितः ॥ १३६

नृपं प्रति ततश्चक्रं विष्णोः प्रादुरभूत् क्षणात् ।

चक्रवित्रासितं घोरं तावुभौ तम अभ्यगात् ॥ १३७

ततः सन्त्रस्तसर्वाङ्गौ धावमानौ महामुनी ।

पृष्ठतश्चक्रमालोक्य तमोराशिं दुरासदम् ॥१३८

कन्यासिद्धिरहो प्राप्ता ह्यावयोरिति वेगितौ ।

लोकालोकान्तमनिशं धावमानौ भयार्दितौ ॥ १३ ९

त्राहि त्राहीति गोविन्दं भाषमाणौ भयार्दितौ ।

विष्णुलोकं ततो गत्वा नारायण जगत्पते ॥ १४०

वासुदेव हृषीकेश पद्मनाभ जनार्दन ।

त्राह्यावां पुण्डरीकाक्ष नाथोऽसि पुरुषोत्तम ॥ १४१

ततो नारायणश्चिन्त्य श्रीमाञ्छ्रीवत्सलाञ्छनः ।

निवार्य चक्रं ध्वान्तं च भक्तानुग्रहकाम्यया ॥ १४२

अम्बरीषश्च मद्भक्तस्तथैतौ मुनिसत्तमौ ।

अनयोरस्य च तथा हितं कार्यं मयाधुना ॥ १४३

आहूय तत्तमः श्रीमान् गिरा प्रह्लादयन् हरिः ।

प्रोवाच भगवान् विष्णुः शृणुतां मे इदं वचः ॥ १४४

ऋषिशापो न चैवासीदन्यथा च वरो मम ।

दत्तो नृपाय रक्षार्थं नास्ति तस्यान्यथा पुनः ॥ १४५

अम्बरीषस्य पुत्रस्य नप्तुः पुत्रो महायशाः ।

श्रीमान् दशरथो नाम राजा भवति धार्मिकः ॥ १४६

तस्याहमग्रजः पुत्रो रामनामा भवाम्यहम् ।

तत्र मे दक्षिणो बाहुर्भरतो नाम वै भवेत् ॥ १४७

शत्रुघ्नो नाम सव्यश्च शेषोऽसौ लक्ष्मणः स्मृतः ।

तत्र मां समुपागच्छ गच्छेदानीं नृपं विना ॥ १४८

५ ९ ७ किसी अन्यको बुलाकर आपने माया रचकर उसे अपनी कन्या दे दी है, अत: तमोगुण आपको आक्रान्त कर लेगा; इसके परिणामस्वरूप आप अपनी आत्माको यथार्थरूपमें बिलकुल नहीं जान पायेंगे ॥ १३३–१३५१ / २ ॥ [ मुनियोंके द्वारा ] यह शाप दे दिये जानेपर एक अन्धकारपुंज उत्पन्न हुआ और राजाकी ओर बढ़ा; तब उसी क्षण भगवान् विष्णुका चक्र प्रकट हो गया । उस चक्र द्वारा त्रस्त किया गया वह अन्धकारपुंज अब उन मुनियोंकी ओर चल पड़ा॥१३६-१३७ ॥ तत्पश्चात् सन्तप्त अंगोंवाले भागते हुए वे दोनों महामुनि अपने पीछे उस चक्र तथा भयानक अन्धकार-पुंजको देखकर कहने लगे – ' अहो, हम दोनोंने शीघ्र ही कन्यासिद्धि प्राप्त कर ली । ' भयभीत होकर लोकलोकान्तरमें निरन्तर दौड़ते हुए और ‘ त्राहि-त्राहि ' - ऐसा पुकारते हुए विष्णुलोक जाकर गोविन्दसे बोले - हे नारायण! हे जगत्पते! हे वासुदेव! हे हृषीकेश! हे पद्मनाभ! हे जनार्दन! हे पुण्डरीकाक्ष! हे पुरुषोत्तम! आप [ सबके ] स्वामी हैं; हम दोनोंकी रक्षा कीजिये ॥ १३८ - १४१ ॥ अम्बरीष मेरा भक्त है और वैसे ही ये दोनों मुनिश्रेष्ठ भी मेरे भक्त हैं, अतः इस [ अम्बरीष ] -का तथा इन दोनों [ मुनियों ] - का इस समय मुझे हित करना चाहिये - यह सोच करके भक्तोंपर कृपा करनेकी अभिलाषासे ऐश्वर्यसम्पन्न वक्ष: स्थलपर श्रीवत्स चिह्न धारण करनेवाले, नारायण, श्रीहरि भगवान् विष्णुने चक्र तथा तमोराशिका निवारण करके उस अन्धकारको बुलाकर वाणीसे उसे प्रसन्न करते हुए बोले – मेरी यह बात सुनो, यह ऋषिका शाप नहीं था, अपितु मेरा वरदान ही था, जिसे राजाकी रक्षाके लिये मैंने उन्हें प्रदान किया था; इसके विपरीत और कुछ भी नहीं है । इन राजा अम्बरीषके पुत्रके नातीके पुत्र महायशस्वी तथा ऐश्वर्यशाली ' दशरथ ' नामक धर्मात्मा राजा होंगे । मैं उन्हींके ' राम ' नामक ज्येष्ठ पुत्रके रूपमें अवतीर्ण होऊँगा । मेरा दाहिना हाथ उस समय भरत नामसे और बायाँ हाथ शत्रुघ्न नामसे प्रकट होंगे और ये शेषनाग । लक्ष्मणके रूपमें प्रसिद्ध होंगे । उस समय तुम मेरे पास

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५ ९ ८

मुनिश्रेष्ठौ च हित्वा त्वं इति स्माह च माधवः ।

एवमुक्तं तमो नाशं तत्क्षणाच्च जगाम वै ॥

निवारितं हरेश्चक्रं यथापूर्वमतिष्ठत ।

मुनिश्रेष्ठौ भयान्मुक्तौ प्रणिपत्य जनार्दनम् ॥

निर्गतौ शोकसन्तप्तौ ऊचतुस्तौ परस्परम् ।

अद्यप्रभृति देहान्तमावां कन्यापरिग्रहम् ॥

न करिष्याव इत्युक्त्वा प्रतिज्ञाय च तावृषी ।

योगध्यानपरौ शुद्धौ यथापूर्वं व्यवस्थितौ ॥

अम्बरीषश्च राजासौ परिपाल्य च मेदिनीम् ।

सभृत्यज्ञातिसम्पन्नो विष्णुलोकं जगाम वै ॥

मानार्थमम्बरीषस्य तथैव मुनिसिंहयोः ।

रामो दाशरथिर्भूत्वा नात्मवेदीश्वरोऽभवत् ॥

मुनयश्च तथा सर्वे भृग्वाद्या मुनिसत्तमाः ।

माया न कार्या विद्वद्भिरित्याहुः प्रेक्ष्य तं हरिम् ॥

नारदः पर्वतश्चैव चिरं ज्ञात्वा विचेष्टितम् ।

मायां विष्णोर्विनिन्द्यैव रुद्रभक्तौ बभूवतुः ॥

एतद्धि कथितं सर्वं मया युष्माकमद्य वै ।

अम्बरीषस्य माहात्म्यं मायावित्वं च वै हरेः ॥

यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वापि मानवः ।

मायां विसृज्य पुण्यात्मा रुद्रलोकं स गच्छति ॥

इदं पवित्रं परमं पुण्यं वेदैरुदीरितम् ।

सायं प्रातः पठेन्नित्यं विष्णोः सायुज्यमाप्नुयात् ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग ' आना और इस समय राजाको तथा इन मुनिवरोंको ५ १४ ९ / चले जाओ - उन माधवने [ उस अन्धकारसे ] ऐसा छोड़कर भगवान्के ऐसा कहनेपर वह अन्धकार उसी क्षण कहा । नष्ट हो गया और निवारित किया गया वह विष्णुचक्र पूर्वकी भाँति १५० व्यवस्थित हो गया ॥ १४२–१४९ १ / २ ॥ वे मुनिश्रेष्ठ भयसे मुक्त हो गये और जनार्दनको प्रणाम करके वहाँसे निकल गये । शोकसन्तप्त वे १५१ | दोनों मुनि आपसमें कहने लगे कि आजसे मृत्युपर्यन्त हम दोनों कन्यापरिग्रह ( विवाह ) नहीं करेंगे । ऐसा कहकर और प्रतिज्ञा करके वे दोनों ऋषि पूर्वकी भाँति १५२ गये ॥ करके १५३ चले दोनों योगध्यानपरायण तथा शुद्धविचारवाले हो १५० – १५२ ॥ राजा अम्बरीष भी भलीभाँति पृथ्वीका पालन अपने सेवकों तथा बन्धु - बान्धवोंसहित विष्णुलोक गये ॥ १५३ ॥

भगवान् विष्णु भी अम्बरीषके मानके लिये तथा मुनिश्रेष्ठोंके वचनकी रक्षाके लिये दशरथ - पुत्र १५४ राम हुए और वे प्रभु अपने स्वरूपको नहीं जान सके ॥ १५४ ॥

उन श्रीहरिको देखकर सभी मुनिगण, भृगु आदि १५५ मुनिश्रेष्ठ यह कहने लगे कि विद्वानोंको माया नहीं रचनी चाहिये ॥ १५५ ॥

नारद तथा पर्वत भी [ अपने द्वारा किये गये ] १५६ मूर्खतापूर्ण कार्यको दीर्घकालतक सोचकर तथा विष्णुको मायाकी निन्दा करके रुद्रभक्त हो गये ॥ १५६ ॥

[ हे मुनियो! ] मैंने अम्बरीषका माहात्म्य तथा १५७ श्रीहरिका मायावी होना - यह सब आपलोगोंको बता दिया । जो मनुष्य इसे पढ़ता, सुनता अथवा दूसरोंको सुनाता है वह विशुद्ध आत्मावाला होकर मायाका त्याग १५८ करके रुद्रलोकको प्राप्त होता है । जो वेदोंके द्वारा कहे गये इस परम पवित्र तथा पुण्यप्रद [ आख्यान ] - का | प्रतिदिन प्रातः तथा सायं पाठ करता है, वह विष्णुसायुज्य १५ ९ | प्राप्त करता है॥१५७–१५९ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे श्रीमत्याख्यानं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' श्रीमती - आख्यान ' नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥