लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 601–610

लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 601–610

पृष्ठ 601

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अध्याय ६ ] भगवान् विष्णुसे अलक्ष्मी ( ज्येष्ठा - दरिद्रा ) तथा लक्ष्मीका प्रादुर्भाव ५ ९९ छठा अध्याय भगवान् विष्णुसे अलक्ष्मी ( ज्येष्ठा - दरिद्रा ) तथा लक्ष्मीका प्रादुर्भाव एवं लक्ष्मी तथा दरिद्राके निवासयोग्य स्थानोंका वर्णन ऋषय ऊचुः

मायावित्वं श्रुतं विष्णोर्देवदेवस्य धीमतः ।

कथं ज्येष्ठासमुत्पत्तिर्देवदेवाज्जनार्दनात् ॥ १

वक्तुमर्हसि चास्माकं लोमहर्षण तत्त्वतः । सूत उवाच अनादिनिधनः श्रीमान् धाता नारायणः प्रभुः ॥ २

जगद्वैधमिदं चक्रे मोहनाय जगत्पतिः ।

विष्णुर्वै ब्राह्मणान्वेदान्वेदधर्मान् सनातनान् ॥३

श्रियं पद्मां तथा श्रेष्ठां भागमेकमकारयत् ।

ज्येष्ठामलक्ष्मीमशुभां वेदबाह्यान्नराधमान् ॥४

अधर्मं च महातेजा भागमेकमकल्पयत् ।

अलक्ष्मीमग्रतः सृष्ट्वा पश्चात्पद्मां जनार्दनः ॥ ५

ज्येष्ठा तेन समाख्याता अलक्ष्मीर्द्विजसत्तमाः ।

अमृतोद्भववेलायां विषानन्तरमुल्बणात् ॥ ६

अशुभा सा तथोत्पन्ना ज्येष्ठा इति च वै श्रुतम् ।

ततः श्रीश्च समुत्पन्ना पद्मा विष्णुपरिग्रहः ॥ ७

दुःसहो नाम विप्रर्षिरुपयेमेऽशुभां तदा ।

ज्येष्ठां तां परिपूर्णोऽसौ मनसा वीक्ष्य धिष्ठिताम् ॥ ८

लोकं चचार हृष्टात्मा तया सह मुनिस्तदा ।

यस्मिन् घोषो हरेश्चैव हरस्य च महात्मनः ॥ ९

वेदघोषस्तथा विप्रा होमधूमस्तथैव च ।

भस्माङ्गिनो वा यत्रासंस्तत्र तत्र भयार्दिता ॥ १०

पिधाय कर्णौ संयाति धावमाना इतस्ततः ।

ज्येष्ठामेवंविधां दृष्ट्वा दुःसहो मोहमागतः ॥ ११ ।

ऋषिगण बोले- देवोंके भी देव धीमान् विष्णुका मायावी होना तो हमलोगोंने सुन लिया । हे लोमहर्षण! अब आप हमलोगोंको यथार्थरूपसे यह बतायें कि देवदेव जनार्दनसे ज्येष्ठा ( अलक्ष्मी ) - की उत्पत्ति कैसे | हुई? ॥ ११२ ॥

सूतजी बोले- आदि तथा अन्तसे रहित, ऐश्वर्यशाली, प्रभुतासम्पन्न तथा जगत्के स्वामी नारायण विष्णुने प्राणियों को व्यामोहमें डालनेके लिये इस जगत्को दो प्रकारका बनाया है । उन महातेजस्वी विष्णुने ब्राह्मणों, वेदों, सनातन वैदिक धर्मों, श्री तथा श्रेष्ठ पद्माकी उत्पत्ति करके एक भाग किया और अशुभ तथा ज्येष्ठा अलक्ष्मी, वेदविरोधी अधम मनुष्यों तथा अधर्मका निर्माण करके एक दूसरा भाग किया ॥ २–४१ / २ ॥ हे श्रेष्ठ द्विजगण! भगवान् जनार्दनने पहले अलक्ष्मीका सृजन करके ही पद्मा ( लक्ष्मी ) - का सृजन किया है, इसीलिये अलक्ष्मी ज्येष्ठा कही गयी हैं । मृतकी उत्पत्ति के समय महाभयंकर विष निकलनेके पश्चात् पहले वे ज्येष्ठा अशुभ अलक्ष्मी उत्पन्न हुई, ऐसा सुना गया है । उसके अनन्तर विष्णुभार्या लक्ष्मी पद्मा आविर्भूत हुईं॥५–७ ॥ तब [ लक्ष्मी विवाहसे पूर्व ] दुःसह नामक विप्रर्षिने उस अशुभा ज्येष्ठाके साथ विवाह किया तथा उसको परिगृहीत देख स्वयंको परिपूर्ण माना; तब वे मुनि प्रसन्नचित्त होकर उसके साथ लोकमें विचरण करने लगे । हे विप्रो! जिस स्थानपर विष्णु तथा महात्मा शिवके नामका घोष तथा वेदध्वनि होती थी, हवनका धूम दीखता था अथवा अंगोंमें भस्म धारण किये हुए लोग रहते थे, वहाँपर वह अलक्ष्मी भयातुर होकर अपने दोनों कान बन्द करके इधर - उधर भागती हुई जाती थी । उस ज्येष्ठाको इस प्रकारके स्वभाववाली देखकर मुनि दुःसह उद्विग्न हो उठे॥८–११ ॥

पृष्ठ 602

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६०० श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग

तया सह वनं गत्वा चचार स महामुनिः ।

तपो महद्वने घोरे याति कन्या प्रतिग्रहम् ॥ १२

न करिष्यामि चेत्युक्त्वा प्रतिज्ञाय च तामृषिः ।

योगज्ञानपरः शुद्धो यत्र योगीश्वरो मुनिः ॥ १३

तत्रायान्तं महात्मानं मार्कण्डेयमपश्यत ।

प्रणिपत्य महात्मानं दुःसहो मुनिमब्रवीत् ॥१४

भार्येयं भगवन् मह्यं न स्थास्यति कथञ्चन ।

किं करोमीति विप्रर्षे ह्यनया सह भार्यया ॥ १५

प्रविशामि तथा कुत्र कुतो न प्रविशाम्यहम् । मार्कण्डेय उवाच शृणु दुःसह सर्वत्र अकीर्तिरशुभान्विता ॥ १६

अलक्ष्मीरतुला चेयं ज्येष्ठा इत्यभिशब्दिता ।

नारायणपरा यत्र वेदमार्गानुसारिणः ॥ १७

रुद्रभक्ता महात्मानो भस्मोद्धूलितविग्रहाः ।

स्थिता यत्र जना नित्यं मा विशेथाः कथञ्चन ॥ १८

नारायण हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष माधव ।

अच्युतानन्त गोविन्द वासुदेव जनार्दन ॥ १ ९

रुद्र रुद्रेति रुद्रेति शिवाय च नमो नमः ।

नमः शिवतरायेति शङ्करायेति सर्वदा ॥ २०

महादेव महादेव महादेवेति कीर्तयेत् ।

उमायाः पतये चैव हिरण्यपतये सदा ॥ २१

हिरण्यबाहवे तुभ्यं वृषाङ्काय नमो नमः ।

नृसिंह वामनाचिन्त्य माधवेति च ये जनाः ॥ २२

वक्ष्यन्ति सततं हृष्टा ब्राह्मणाः क्षत्रियास्तथा ।

वैश्याः शूद्राश्च ये नित्यं तेषां धनगृहादिषु ।

आरामे चैव गोष्ठेषु न विशेथाः कथञ्चन ॥ २३

ज्वालामालाकरालं च सहस्त्रादित्यसन्निभम् ।

चक्रं विष्णोरतीवोग्रं तेषां हन्ति सदाशुभम् ॥ २४

स्वाहाकारो वषट्कारो गृहे यस्मिन् हि वर्तते ।

तद्धित्वा चान्यमागच्छ सामघोषोऽथ यत्र वा ॥ २५

वेदाभ्यासरता नित्यं नित्यकर्मपरायणाः ।

वासुदेवार्चनरता दूरतस्तान् विसर्जयेत् ॥ २६

इसके बाद वे महामुनि उसके साथ घोर वनमें जाकर कठोर तप करने लगे । वे सोचने लगे कन्याका प्रतिग्रह भविष्यमें नहीं करूँगा - ऐसा कहकर और प्रतिज्ञा करके वे ऋषि योगज्ञानपरायण हो गये । [ किसी समय ] उन विशुद्धात्मा योगीश्वर मुनिने वहाँपर आते हुए मार्कण्डेयजीको देखा । उन महात्मा मुनिको प्रणाम करके ऋषि दुःसहने कहा — हे भगवन्! मेरी यह भार्या मेरे साथ कभी नहीं रहेगी । हे विप्रर्षे! मैं क्या करूँ; अपनी इस भार्याके साथ कहाँ जाऊँ और कहाँ न जाऊँ? ॥१२–१५१२ ॥ मार्कण्डेयजी बोले – हे दु: सह! सुनो, अकीर्ति सर्वत्र अशुभसे युक्त रहती है; यह अतुलनीय अलक्ष्मी ‘ ज्येष्ठा ’ – इस नामसे पुकारी जाती है ॥ १६१ / २ ॥ जहाँ नारायणके भक्त, वेदमार्गका अनुसरण करनेवाले, रुद्रभक्त, महात्मागण तथा भस्मसे अनुलिप्त शरीरवाले लोग सदा रहते हों, वहाँ तुम कभी भी प्रवेश मत करना । ‘ हे नारायण! हे हृषीकेश! हे पुण्डरीकाक्ष! हे माधव! हे अच्युतानन्त! हे गोविन्द! हे वासुदेव! हे जनार्दन! हे रुद्र! हे रुद्र! हे रुद्र! ' शिवको बार - बार नमस्कार है, शिवतरको | नमस्कार है, शंकरको सर्वदा नमस्कार है, हे महादेव! हे | महादेव! हे महादेव! - ऐसा कहते रहनेवाले; आप उमापति, हिरण्यपति, हिरण्यबाहु तथा वृषांकको सदा बार - बार नमस्कार है, हे नृसिंह! हे वामन! हे अचिन्त्य! हे माधव! - ऐसा जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र प्रसन्न | होकर नित्य बोलते रहते हैं; उनके धन - आदि गृहोंमें, | उद्यानमें तथा गोष्ठोंमें कभी भी प्रवेश मत करना; क्योंकि विकराल अग्नि - ज्वालाओं तथा हजारों सूर्योंके समान तेजोमय अत्यन्त उग्र विष्णुचक्र उन लोगोंके अमंगलका सदा नाश कर देता है ॥ १७–२४ ॥ जिस घरमें स्वाहाकार तथा वषट्कार होता हो तथा जहाँपर सामवेदकी ध्वनि होती हो, उसे छोड़कर अन्यत्र चले जाना । जो लोग नित्य वेदाभ्यासमें संलग्न हों, नित्यकर्ममें तत्पर हों तथा वासुदेवकी पूजामें रत हों, । उन्हें दूरसे ही त्याग देना ॥ २५-२६ ॥

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अध्याय ६ ] भगवान् विष्णुसे अलक्ष्मी (

अग्निहोत्रं गृहे येषां लिङ्गार्चा वा गृहेषु च ।

वासुदेवतनुर्वापि चण्डिका यत्र तिष्ठति ॥

दूरतो व्रज तान् हित्वा सर्वपापविवर्जितान् ।

नित्यनैमित्तिकैर्यज्ञैर्यजन्ति च महेश्वरम् ॥

तान् हित्वा व्रज चान्यत्र दुःसह त्वं सहानया । श्रोत्रिया ब्राह्मणा गावो गुरवोऽतिथयः सदा रुद्रभक्ताश्च पूज्यन्ते यैर्नित्यं तान् विवर्जयेत् । दुःसह उवाच यस्मिन् प्रवेशो योग्यो मे तद्ब्रूहि मुनिसत्तम त्वद्वाक्याद्भयनिर्मुक्तो विशान्येषां गृहे सदा मार्कण्डेय उवाच न श्रोत्रिया द्विजा गावो गुरवोऽतिथयः सदा यत्र भर्ता च भार्या च परस्परविरोधिनौ

सभार्यस्त्वं गृहं तस्य विशेथा भयवर्जितः ।

देवदेवो महादेवो रुद्रस्त्रिभुवनेश्वरः ॥

विनिन्द्यो यत्र भगवान् विशस्व भयवर्जितः । वासुदेवरतिर्नास्ति यत्र नास्ति सदाशिवः

जपहोमादिकं नास्ति भस्म नास्ति गृहे नृणाम् ।

पर्वण्यभ्यर्चनं नास्ति चतुर्दश्यां विशेषतः ॥

कृष्णाष्टम्यां च रुद्रस्य सन्ध्यायां भस्मवर्जिताः ।

चतुर्दश्यां महादेवं न यजन्ति च यत्र वै ॥

विष्णोर्नामविहीना ये सङ्गताश्च दुरात्मभिः । नमः कृष्णाय शर्वाय शिवाय परमेष्ठिने

ब्राह्मणाश्च नरा मूढा न वदन्ति दुरात्मकाः ।

तत्रैव सततं वत्स सभार्यस्त्वं समाविश ॥

वेदघोषो न यत्रास्ति गुरुपूजादयो न च ।

पितृकर्मविहीनांस्तु सभार्यस्त्वं समाविश ॥

ज्येष्ठा - दरिद्रा ) तथा लक्ष्मीका प्रादुर्भाव ६०१ जिनके घरमें अग्निहोत्र तथा शिवलिङ्गका पूजन २७ होता हो और जिनके घरोंमें वासुदेव तथा भगवती चण्डिकाकी मूर्ति विराजमान हो, समस्त पापोंसे रहित उन लोगोंको छोड़कर दूर चले जाना । हे दुःसह! जो २८ लोग नित्य तथा नैमित्तिक यज्ञोंके द्वारा महेश्वरकी आराधना करते हैं, उन्हें छोड़कर तुम इसके साथ ॥ २ ९ अन्यत्र चले जाना । जो लोग वैदिकों, ब्राह्मणों, गौओं, गुरुओं, अतिथियों तथा रुद्रभक्तोंकी नित्य KKKKKKKKKKKKKKKKKKKKKKK पूजा करते हैं, उनके पास मत जाना ॥ २७–२९ १ / २ ॥ दुःसह बोला - हे मुनिश्रेष्ठ! जिस स्थानमें मेरा ॥ ३० प्रवेश हो सके; उसे आप मुझे बतायें, जिससे आपके वचनसे मैं भयरहित होकर इनके घरमें सदा प्रवेश । करूँ ॥ ३० ९ / २ ॥ मार्कण्डेयजी बोले- जिसके घरमें वैदिकों, द्विजों, गौओं, गुरुओं तथा अतिथियोंकी पूजा न होती । हो और जहाँ पति - पत्नी एक - दूसरेके विरोधी हों, ॥ ३१ उसके घरमें तुम निर्भय होकर अपनी भार्याके साथ प्रवेश करो । जहाँपर देवाधिदेव महादेव तथा तीनों ३२ भुवनोंके स्वामी भगवान् रुद्रकी निन्दा होती हो, वहाँ तुम भयरहित होकर प्रवेश करो॥३१-३२१ / २ ॥ जहाँ भगवान् वासुदेवके प्रति भक्ति न हो; जहाँ ॥ ३३ सदाशिव न स्थापित हों; जहाँ मनुष्योंके घरमें जप - होम आदि न होता हो, भस्म - धारण न किया जाता हो, पर्वपर विशेष करके चतुर्दशी तथा कृष्णाष्टमी तिथिपर ३४ रुद्रपूजन न होता हो, लोग सन्ध्योपासनके समय भस्मधारण न करते हों; जहाँपर लोग चतुर्दशीके दिन ३५ महादेवका यजन न करते हों, जहाँ लोग विष्णुके नाम-संकीर्तनसे विमुख हों; जहाँ लोग दुष्टात्मावाले पुरुषोंके साथ रहते हों; जहाँ ब्राह्मण तथा विकृत मनवाले मनुष्य ॥ ३६ ' कृष्णको नमस्कार है, परमेष्ठी शर्वको नमस्कार है '. ऐसा नहीं कहते हों, वहींपर तुम अपनी भार्याके साथ सदा प्रवेश करो ॥ ३३–३७ ॥ ३७ जहाँ वेदध्वनि, गुरुपूजा आदि न होते हों, उन स्थानोंपर और पितृकर्म ( श्राद्ध आदि ) -से ३८ । विमुख लोगोंके यहाँ अपनी भार्यासहित निवास करो ।

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६०२ असफलता B. K. Mil रात्र रात्रौ गृहे यस्मिन् कलहो वर्तते मिथः । अनया सार्धमनिशं विश त्वं भयवर्जितः लिङ्गार्चनं यस्य नास्ति यस्य नास्ति जपादिकम् रुद्रभक्तिर्विनिन्दा च तत्रैव विश निर्भयः अतिथिः श्रोत्रियो वापि गुरुर्वा वैष्णवोऽपि वा न सन्ति यद्गृहे गावः सभार्यस्त्वं समाविश बालानां प्रेक्षमाणानां यत्रादत्त्वा त्वभक्षयन् भक्ष्याणि तत्र संहृष्टः सभार्यस्त्वं समाविश अनभ्यर्च्य महादेवं वासुदेवमथापि वा अहुत्वा विधिवद्यत्र तत्र नित्यं समाविश पापकर्मरता मूढा दयाहीनाः परस्परम् । गृहे यस्मिन् समासन्ते देशे वा तत्र संविश प्राकारागारविध्वंसा न चैवेड्या कुटुम्बिनी तद्गृहं तु समासाद्य वस नित्यं हि हृष्टधीः यत्र कण्टकिनो वृक्षा यत्र निष्पाववल्लरी ब्रह्मवृक्षश्च यत्रास्ति सभार्यस्त्वं समाविश

अगस्त्यार्कादयो वापि बन्धुजीवो गृहेषु वै ।

करवीरो विशेषेण नन्द्यावर्तमथापि वा ॥

मल्लिका वा गृहे येषां सभार्यस्त्वं समाविश कन्या च यत्र वै वल्ली द्रोही वा च जटी गृहे

बहुला कदली यत्र सभार्यस्त्वं समाविश ।

तालं तमालं भल्लातं तित्तिडीखण्डमेव च ॥

कदम्बः खादिरं वापि सभार्यस्त्वं समाविश । न्यग्रोधं वा गृहे येषामश्वत्थं चूतमेव वा श्रीलिङ्गमहापुराण उत्तरभाग फ्र | जिस घरमें रात्रि - वेलामें [ लोगोंके बीच ] परस्पर कलह होता हो, वहाँ तुम भयमुक्त होकर इसके साथ निरन्तर निवास करो ॥ ३८-३९ ॥ जिसके यहाँ शिवलिङ्गका पूजन न होता हो तथा जिसके यहाँ जप आदि न होते हों, अपितु रुद्रभक्तिकी निन्दा होती हो, वहीँपर तुम निर्भय होकर प्रवेश करो । जिस घरमें अतिथि, श्रोत्रिय ( वैदिक ), गुरु, विष्णुभक्त और गायें न हों, वहाँ तुम अपनी भार्यासहित निवास करो ॥ ४०-४१ ॥ जहाँ बालकोंके देखते रहनेपर उन्हें बिना दिये ही लोग भक्ष्य पदार्थ स्वयं खा जाते हों, उस स्थानपर तुम प्रसन्न होकर सपत्नीक प्रवेश करो । महादेव अथवा | भगवान् विष्णुका पूजन न करके तथा विधिपूर्वक हवन ॥ ३ ९ न करके जहाँ लोग रहते हों, वहाँ तुम सदा निवास

॥ ४० करो ॥ ४२-४३ ॥

। जिस घरमें या देशमें पापकृत्यमें संलग्न रहनेवाले, ॥ ४१ मूर्ख तथा दयाहीन लोग रहते हों, वहाँपर तुम प्रवेश । करो । घर और घरकी चहारदीवारीको तोड़नेवाली ॥ ४२ अर्थात् घरकी मान - मर्यादाको भंग करनेवाली, दुःशीलताके । कारण किसी भी प्रकार प्रसन्न न होनेवाली गृहिणी ॥ ४३ जिस घरमें हो, उस घरमें प्रसन्न मनसे सदा निवास करो ॥ ४४-४५ ॥ ॥ ४४ जहाँ काँटेदार वृक्ष हों, जहाँ निष्पाव ( सेम । आदि ) -की लता हो और जहाँ पलाशका वृक्ष हो, वहाँ ॥ ४५ तुम अपनी पत्नीसहित निवास करो । जिनके घरोंमें | ॥ ४६ अगस्त्य, आक आदि दूधवाले वृक्ष, बन्धुजीव ( गुलदुपहरिया ) -का पौधा, विशेषरूपसे करवीर, नन्द्यावर्त ४७ ( तगर ) और मल्लिकाके वृक्ष हों, उनके घरोंमें तुम । पत्नीके साथ प्रवेश करो । जिस घरमें अपराजिता, ॥ ४८ । अजमोदा, निम्ब, जटामांसी, बहुला ( नीलका पौधा ), केलेके वृक्ष हों, वहाँपर तुम सपत्नीक प्रवेश करो । जहाँ ४ ९ ताल, तमाल, भल्लात ( भिलावा ), इमली, कदम्ब और | खैरके वृक्ष हों, वहाँ तुम अपनी भार्याके साथ प्रवेश ॥ ५० । करो । जिनके घरोंमें बरगद, पीपल, आम, गूलर तथा

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६ ] भगवान् विष्णुसे अलक्ष्मी ( ज्येष्ठा अध्याय

उदुम्बरं वा पनसं सभार्यस्त्वं समाविश ।

यस्य काकगृहं निम्बे आरामे वा गृहेऽपि वा ॥ ५१

दण्डिनी मुण्डिनी वापि सभार्यस्त्वं समाविश । एका दासी गृहे यत्र त्रिगवं पञ्चमाहिषम् ॥ ५२

षडश्वं सप्तमातङ्गं सभार्यस्त्वं समाविश ।

यस्य काली गृहे देवी प्रेतरूपा च डाकिनी ॥ ५३

क्षेत्रपालोऽथ वा यत्र सभार्यस्त्वं समाविश ।

भिक्षुबिम्बं च वै यस्य गृहे क्षपणकं तथा ॥ ५४

बौद्धं वा बिम्बमासाद्य तत्र पूर्णं समाविश ।

शयनासनकालेषु भोजनाटनवृत्तिषु ॥ ५५

येषां वदति नो वाणी नामानि च हरेः सदा ।

तद्गृहं ते समाख्यातं सभार्यस्य निवेशितुम् ॥ ५६

पाषण्डाचारनिरताः श्रौतस्मार्तबहिष्कृताः ।

विष्णुभक्तिविनिर्मुक्ता महादेवविनिन्दकाः ॥ ५७

नास्तिकाश्च शठा यत्र सभार्यस्त्वं समाविश ।

सर्वस्मादधिकत्वं ये न वदन्ति पिनाकिनः ॥ ५८

साधारणं स्मरन्त्येनं सभार्यस्त्वं समाविश ।

ब्रह्मा च भगवान् विष्णुः शक्रः सर्वसुरेश्वरः ॥ ५ ९

रुद्रप्रसादजाश्चेति न वदन्ति दुरात्मकाः ।

ब्रह्मा च भगवान् विष्णुः शक्रश्च सम एव च ॥ ६०

वदन्ति मूढाः खद्योतं भानुं वा मूढचेतसः ।

तेषां गृहे तथा क्षेत्रे आवासे वा सदानया ॥ ६१

विश भुङ्क्ष्व गृहं तेषां अपि पूर्णमनन्यधीः ।

येऽश्नन्ति केवलं मूढाः पक्वमन्नं विचेतसः ॥६२

स्नानमङ्गलहीनाश्च तेषां त्वं गृहमाविश ।

या नारी शौचविभ्रष्टा देहसंस्कारवर्जिता ॥ ६३

- दरिद्रा ) तथा लक्ष्मीका प्रादुर्भाव ६०३ फ्र कटहल वृक्ष हों, उनके यहाँ तुम अपनी भार्याके साथ निवास करो । जिसके निम्बवृक्षमें, बगीचेमें अथवा घरमें कौवोंका निवास हो और जिसके घरमें दण्डधारिणी तथा कपालधारिणी स्त्री हो, उसके यहाँ तुम पत्नीसहित निवास करो ॥ ४६-५११ / ३ ॥ जिस घरमें एक दासी, तीन गायें, पाँच भैंसे, छ: घोड़े और सात हाथी हों, वहाँ तुम अपनी भार्यासहित प्रवेश करो । जिस घरमें प्रेतरूपा तथा डाकिनी काली-प्रतिमा स्थापित हो और जहाँ भैरव - मूर्ति हो, वहाँ तुम अपनी पत्नीके साथ प्रवेश करो । जिस घरमें भिक्षुबिम्ब आदि हो, वहाँ तुम यथेच्छ निवास करो । सोने, बैठने, भोजन तथा भ्रमणके समयोंमें जिनकी वाणी ( जिह्वा ) सदा भगवान् श्रीहरिके नामोंका उच्चारण नहीं करती, उनका घर सपत्नीक तुम्हारे निवास करनेके लिये मैं बता रहा हूँ ॥ ५२–५६ ॥ जहाँ दम्भपूर्ण आचारमें निरत रहनेवाले, श्रुति तथा स्मृतिसे विमुख रहनेवाले, विष्णुभक्तिसे विहीन, महादेवकी निन्दा करनेवाले, नास्तिक तथा शठ लोग हों, वहाँपर तुम पत्नीसहित निवास करो ॥५७१ / २ ॥ जो लोग भगवान् शिवको सबसे श्रेष्ठ नहीं कहते हैं और इन्हें साधारण समझते हैं, उनके यहाँ तुम भार्यासहित निवास करो । कलुषित मनवाले जो लोग ' ब्रह्मा, भगवान् विष्णु तथा सभी देवताओंके स्वामी इन्द्र – ये रुद्रके प्रसादसे आविर्भूत हैं ' – ऐसा नहीं कहते हैं और ब्रह्मा, भगवान् विष्णु तथा इन्द्रको इनके समान कहते हैं; साथ ही जो मूढ़ तथा अज्ञानी लोग सूर्यको खद्योत कहते हैं— उनके गृह, क्षेत्र तथा आवासमें तुम सदा इसके साथ निवास करो और पूर्ण रूपसे अनन्यबुद्धि होकर उनके घरमें भोग करो ॥ ५८-६ ११/२ ॥ जो मूर्ख तथा अज्ञानी लोग अकेले ही पका हुआ अन्न खाते हैं और स्नान आदि मंगलकार्योंसे विहीन । रहते हैं, उनके घरमें तुम प्रवेश करो । जो स्त्री

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६०४ सर्वभक्षरता नित्यं तस्या: स्थाने समाविश मलिनास्याः स्वयं मर्त्या मलिनाम्बरधारिणः मलदन्ता गृहस्थाश्च गृहं तेषां समाविश पादशौचविनिर्मुक्ताः सन्ध्याकाले च शायिनः सन्ध्यायामश्नुते ये वै गृहं तेषां समाविश अत्याशनरता मर्त्या अतिपानरता नराः द्यूतवादक्रियामूढाः गृहं तेषां समाविश ब्रह्मस्वहारिणो ये चायोग्यांश्चैव यजन्ति वा शूद्रान्नभोजनो वापि गृहं तेषां समाविश । मद्यपानरताः पापा मांसभक्षणतत्पराः परदाररता मर्त्या गृहं तेषां समाविश पर्वण्यनर्चाभिरता मैथुने वा दिवा रताः सन्ध्यायां मैथुनं येषां गृहं तेषां समाविश पृष्ठतो मैथुनं येषां श्वानवत् मृगवच्च वा जले वा मैथुनं कुर्यात्सभार्यस्त्वं समाविश रजस्वलां स्त्रियं गच्छेच्चाण्डालीं वा नराधमः कन्यां वा गोगृहे वापि गृहं तेषां समाविश बहुना किं प्रलापेन नित्यकर्मबहिष्कृताः रुद्रभक्तिविहीना ये गृहं तेषां समाविश शृङ्गैर्दिव्यौषधैः क्षुद्रैः शेफ आलिप्य गच्छति भगद्रावं करोत्यस्मात्सभार्यस्त्वं समाविश सूत उवाच इत्युक्त्वा स मुनिः श्रीमान्निर्मार्ण्य नयने तदा ब्रह्मर्षिर्ब्रह्मसङ्काशस्तत्रैवान्तद्धिमातनोत् दुःसहश्च तथोक्तानि स्थानानि च समीयिवान् श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग । । शौचाचारसे विमुख हो, देहशुद्धिसे रहित हो तथा ॥ ६४ [ भक्ष्याभक्ष्य ] पदार्थोंके भक्षणमें तत्पर रहती हो सभी घरमें । ॥ ६५ वस्त्र उनके । नहीं , उसके तुम नित्य निवास करो॥६२-६३१ / २ ॥ जो गृहस्थ मानव स्वयं मलिन मुखवाले , गन्दे धारण करनेवाले तथा मलयुक्त दाँतोंवाले हैं, घरमें तुम प्रवेश करो । जो लोग अपना पैर धोते, सन्ध्याके समय शयन करते हैं और ॥ ६६ सन्ध्यावेलामें भोजन करते हैं, उनके घरमें तुम निवास । करो । जो मूर्ख मनुष्य बहुत भोजन करते हैं, अत्यधिक पान करते हैं और जुआ - सम्बन्धी वार्ता करने तथा ॥ ६७ उसके खेलनेमें तत्पर रहते हैं, उनके घरमें तुम प्रवेश करो॥६४–६६१ / २ ॥ ॥ ६८ जो लोग ब्राह्मणके धनका हरण करते हैं, अपात्रोंका पूजन करते हैं और शूद्रोंका अन्न खाते हैं, । उनके घरमें तुम प्रवेश करो । जो मनुष्य मद्यपानमें ॥ ६ ९ संलग्न रहते हैं, पापपरायण हैं, मांस भक्षणमें तत्पर रहते हैं और परायी स्त्रियोंमें आसक्त रहते हैं, उनके । घरमें तुम निवास करो॥६७-६८१ / २ ॥ ॥ ७० जो लोग पर्वके अवसरपर भगवान्‌की पूजामें संलग्न नहीं रहते, दिनमें तथा सन्ध्याके समय मैथुन करते । हैं, उनके घरमें तुम निवास करो । जो लोग कुत्ते तथा ॥ ७१ मृगकी भाँति पीछेसे मैथुन करते हैं और जलमें मैथुन करते हैं, उनके यहाँ अपनी भार्यासहित तुम निवास करो ॥ जो नराधम रजस्वला स्त्रीके साथ अथवा चाण्डालीके ॥ ७२ साथ अथवा कन्याके साथ अथवा गोशालामें सम्भोग । करता है; उसके घरमें तुम निवास करो । अधिक कहनेसे क्या लाभ! जो लोग नित्यकर्मसे विमुख तथा रुद्रभक्तिसे ॥ ७३ रहित हैं, उनके घरमें तुम प्रवेश करो । कृत्रिम साधनोंसे । सम्पन्न होकर जो मनुष्य स्त्रीके पास जाता है और स्त्रीसंसर्ग करता है, उसके यहाँ तुम अपनी भार्यासहित प्रवेश करो ॥६ ९ –७३१ / २ ॥ ॥ ७४ सूतजी बोले- ऐसा कहकर वे ऐश्वर्यशाली तथा ब्रह्मतुल्य ब्रह्मर्षि [ मार्कण्डेय ] मुनि अपने नेत्र धोकर वहीं पर अन्तर्धान हो गये । तत्पश्चात् ॥ ७५ । [ मार्कण्डेयऋषिके द्वारा ] बताये गये स्थानों, विशेष

पृष्ठ 607

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६ ] भगवान् विष्णुसे अलक्ष्मी ( ज्येष्ठा अध्याय

विशेषाद्देवदेवस्य विष्णोर्निन्दारतात्मनाम् ।

सभार्यो मुनिशार्दूलः सैषा ज्येष्ठा इति स्मृता ॥ ७६

दुःसहस्तामुवाचेदं तडागाश्रममन्तरे ।

स्वत्वमत्र चाहं वै प्रवेक्ष्यामि रसातलम् ॥ ७७

आवयोः स्थानमालोक्य निवासार्थं ततः पुनः ।

आगमिष्यामि ते पार्श्वमित्युक्ता तमुवाच सा ॥ ७८

किमश्नामि महाभाग को मे दास्यति वै बलिम् ।

इत्युक्तस्तां मुनिः प्राह याः स्त्रियस्त्वां यजन्ति वै ॥ ७ ९

बलिभिः पुष्पधूपैश्च न तासां च गृहं विश ।

इत्युक्त्वा त्वाविशत्तत्र पातालं बिलयोगतः ॥ ८०

अद्यापि च विनिर्मग्नो मुनिः स जलसंस्तरे ।

ग्रामपर्वतबाह्येषु नित्यमास्तेऽशुभा पुनः ॥ ८१

प्रसङ्गाद्देवदेवेशो विष्णुस्त्रिभुवनेश्वरः ।

लक्ष्म्या दृष्टस्तया लक्ष्मीः सा तमाह जनार्दनम् ॥ ८२

भर्ता तो महाबाहो बिलं त्यक्त्वा स मां प्रभो ।

अनाथाहं जगन्नाथ वृत्तिं देहि नमोऽस्तु ते ॥ ८३

सूत उवाच

इत्युक्तो भगवान् विष्णुः प्रहस्याह जनार्दनः ।

ज्येष्ठामलक्ष्मीं देवेशो माधवो मधुसूदनः ॥ ८४

श्रीविष्णुरुवाच

ये रुद्रमनघं शर्वं शङ्करं नीललोहितम् ।

अम्बां हैमवतीं वापि जनित्रीं जगतामपि ॥ ८५

मद्भक्तान्निन्दयन्त्यत्र तेषां वित्तं तवैव हि ।

येऽपि चैव महादेवं विनिन्द्यैव यजन्ति माम् ॥ ८६

मूढा ह्यभाग्या मद्भक्ता अपि तेषां धनं तव ।

यस्याज्ञया ह्यहं ब्रह्मा प्रसादाद्वर्तते सदा ॥ ८७

ये यजन्ति विनिन्द्यैव मम विद्वेषकारकाः ।

मद्भक्ता नैव ते भक्ता इव वर्तन्ति दुर्मदाः ॥ ८८

- दरिद्रा ) तथा लक्ष्मीका प्रादुर्भाव ६०५ करके देवोंके भी देव विष्णुकी निन्दामें लगे रहनेवाले लोगोंके यहाँ वे मुनिश्रेष्ठ दुःसह अपनी भार्यासहित पहुँचे । किसी समय [ एक तड़ाग देखकर ] दुःसहमुनिने ये जो ज्येष्ठा नामसे कही गयी हैं, उनसे यह कहा— तुम इस तड़ागके तटपर आश्रम में स्थित पीपलवृक्षमें रहो; मैं रसातलमें प्रवेश करूँगा । अपने दोनोंके निवासयोग्य स्थान देखकर मैं तुम्हारे पास पुनः आ जाऊँगा । उनके ऐसा कहनेपर उस ( ज्येष्ठा ) - ने उनसे कहा - हे महाभाग! मैं क्या खाऊँगी; मुझे कौन बलि प्रदान करेगा? ॥ ७४–७८१ / २ ॥ उसके ऐसा कहनेपर मुनिने उससे कहा- जो स्त्रियाँ बलियों ( भोज्यपदार्थों ) तथा पुष्प - धूपसे तुम्हारा पूजन करती हैं, उनके घरमें तुम प्रवेश मत करना ॥ ७ ९ १ / २ ॥ ऐसा कहकर वे बिल - मार्गसे पातालमें प्रविष्ट हुए । वे मुनि आज भी उस जलसंस्तरमें निमग्न हैं और वह अशुभा अलक्ष्मी ग्राम, पर्वत आदि बाह्य स्थानोंमें | रह रही है ॥ ८०-८१ ॥ संयोगवश किसी समय उस अलक्ष्मीने देवोंके भी देवेश तथा तीनों लोकोंके स्वामी विष्णुको लक्ष्मीके साथ | देख लिया; तब अलक्ष्मीने उन जनार्दनसे कहा- हे प्रभो! हे महाबाहो! मेरे पति मुझे छोड़कर इस बिलमें प्रविष्ट हो गये हैं । हे जगन्नाथ! मैं अनाथ हूँ, अतः आप मुझे आजीविका प्रदान करें; आपको नमस्कार है ॥ ८२-८३ ॥ सूतजी बोले – [ ज्येष्ठाके द्वारा ] ऐसा कहे गये जनार्दन, देवेश्वर, माधव तथा मधुसूदन भगवान् विष्णु उस ज्येष्ठा अलक्ष्मीसे हँसकर कहने लगे ॥ ८४ ॥

श्रीविष्णु बोले- जो लोग अनघ शर्व, शंकर, नीललोहित भगवान् रुद्र तथा [ समस्त ] लोकोंको उत्पन्न करनेवाली माता पार्वतीकी और मेरे भक्तोंकी निन्दा करते हैं, उनका धन तुम्हारा ही है । जो लोग महादेवकी निन्दा करके मेरा पूजन करते हैं, मेरे वे भक्त निश्चय ही अज्ञानी तथा अभागे हैं; उनका भी धन तुम्हारा है । जिनकी आज्ञासे तथा कृपासे मैं ( विष्णु ) तथा ब्रह्मा सदा क्रियाशील रहते हैं, उनका तिरस्कार करके जो लोग मेरा पूजन करते हैं, | वे मेरे विद्वेषी हैं; वे मेरे भक्त बिलकुल नहीं हैं, अपितु

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६०६ तेषां गृहं धनं क्षेत्रमिष्टापूर्तं तवैव हि सूत उवाच इत्युक्त्वा तां परित्यज्य लक्ष्म्यालक्ष्मीं जनार्दनः जजाप भगवान् रुद्रमलक्ष्मीक्षयसिद्धये तस्मात्प्रदेयस्तस्यै च बलिर्नित्यं मुनीश्वराः विष्णुभक्तैर्न सन्देहः सर्वयत्नेन सर्वदा । अङ्गनाभिः सदा पूज्या बलिभिर्विविधैर्द्विजाः यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान् अलक्ष्मीवृत्तमनघो लक्ष्मीवाँल्लभते गतिम् श्रीलिङ्गमहापुराण. [ उत्तरभाग । । वे मदोन्मत्त हैं और मेरा भक्त होनेका पाखण्ड करते उनका भी घर, धन, खेत तथा इष्टापूर्त ( यज्ञ आदि हैं, तथा | तालाब, कुआँ खुदवानेका पुण्य कार्य ) सब कुछ तुम्हारा है ॥ ८५–८८१ % २ ॥ ॥ ८ ९ सूतजी बोले- ऐसा कहकर उन अलक्ष्मीको विदा करके भगवान् जनार्दन अलक्ष्मीके क्षयकी सिद्धिके लिये । लक्ष्मीके साथ रुद्रका जप करने लगे । अतः हे मुनीश्वरो! । सभी विष्णुभक्तोंको चाहिये कि वे पूर्ण प्रयत्नसे उस ॥ ९ ० अलक्ष्मीको नित्य निरन्तर बलि प्रदान करें; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये । हे द्विजो! सभी स्त्रियोंको अनेक प्रकारके बलि - उपचारोंसे सदा [ ज्येष्ठा - अलक्ष्मीकी ] ॥ ९ १ पूजा करनी चाहिये ॥ ८ ९ – ९ १ ॥ जो [ मनुष्य ] इस अलक्ष्मी - वृत्तान्तको पढ़ता है अथवा सुनता है अथवा श्रेष्ठ द्विजोंको सुनाता है, वह । पापरहित तथा लक्ष्मीवान् हो जाता है और [ शुभ ] गति ॥ ९ २ । प्राप्त करता है ॥ ९ २ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे अलक्ष्मीवृत्तं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' अलक्ष्मीवृत्त ' नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥

सातवाँ भगवान् विष्णुके अष्टाक्षर तथा द्वादशाक्षर ऋषय ऊचुः

किं जपान्मुच्यते जन्तुः सर्वलोकभयादिभिः ।

सर्वपापविनिर्मुक्तः प्राप्नोति परमां गतिम् ॥ १

अलक्ष्मी वाथ सन्त्यज्य गमिष्यति जपेन वै ।

लक्ष्मीवासो भवेन्मर्त्यः सूत वक्तुमिहार्हसि ॥ २

सूत उवाच

पुरा पितामहेनोक्तं वसिष्ठाय महात्मने ।

वक्ष्ये सङ्क्षेपतः सर्वं सर्वलोकहिताय वै ॥ ३

शृण्वन्तु वचनं सर्वे प्रणिपत्य जनार्दनम् ।

देवदेवमजं विष्णुं कृष्णमच्युतमव्ययम् ॥ ४

सर्वपापहरं शुद्धं मोक्षदं ब्रह्मवादिनम् ।

मनसा कर्मणा वाचा यो विद्वान् पुण्यकर्मकृत् ॥ ५

अध्याय मन्त्रजपकी महिमामें ऐतरेय ब्राह्मणकी कथा ऋषिगण बोले- किस [ मन्त्र ] - के जपसे प्राणी सम्पूर्ण सांसारिक भय आदिसे मुक्त हो जाता है और समस्त पापोंसे छूटकर परम गति प्राप्त करता? किस जपके द्वारा मनुष्य अलक्ष्मीका त्याग करके लक्ष्मीयुक्त हो जाता है; हे सूतजी! यह सब आप बतायें ॥१-२ ॥ सूतजी बोले- पूर्वकालमें पितामहने महात्मा वसिष्ठसे इस विषयमें जो बताया था, वह सब मैं सभी प्राणियोंके कल्याणके लिये संक्षेपमें बताऊँगा । आप सभी लोग जनार्दन, देवाधिदेव, अजन्मा, कृष्ण, अच्युत, अव्यय, समस्त पापोंको दूर करनेवाले, विशुद्ध, मोक्ष प्रदान करनेवाले तथा ब्रह्मवादी विष्णुको प्रणाम करके । [ मेरा ] वचन सुनें॥३-४९ / २ ॥

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७ ] भगवान् विष्णुके अष्टाक्षर तथा द्वादशाक्षर अध्याय जपेन्नित्यं प्रणम्य पुरुषोत्तमम् । नारायणं स्वपन्नारायणं देवं गच्छन्नारायणं तथा ॥ ६

नारायणं विप्रास्तिष्ठञ्जाग्रत्सनातनम् ।

उन्मिषन्निमिषन् वापि नमो नारायणेति वै ॥ ७

भोज्यं पेयं च लेह्यं च नमो नारायणेति च ।

अभिमन्त्र्य स्पृशन्भुङ्क्ते स याति परमां गतिम् ॥ ८

सर्वपापविनिर्मुक्तः प्राप्नोति च सतां गतिम् ।

अलक्ष्मीश्च मया प्रोक्ता पत्नी या दुःसहस्य च ॥ ९

नारायणपदं श्रुत्वा गच्छत्येव न संशयः ।

या लक्ष्मीर्देवदेवस्य हरेः कृष्णस्य वल्लभा ॥ १०

गृहे क्षेत्रे तथावासे तनौ वसति सुव्रताः ।

आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ॥ ११

इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा ।

किं तस्य बहुभिर्मन्त्रैः किं तस्य बहुभिर्व्रतैः ॥ १२

नमो नारायणायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः ।

तस्मात्सर्वेषु कालेषु नमो नारायणेति च ॥ १३

जपेत् स याति विप्रेन्द्रा विष्णुलोकं सबान्धवः ।

अन्यच्च देवदेवस्य शृण्वन्तु मुनिसत्तमाः ॥ १४

मन्त्रो मया पुराभ्यस्तः सर्ववेदार्थसाधकः ।

द्वादशाक्षरसंयुक्तो द्वादशात्मा पुरातनः ॥ १५

तस्यैवेह च माहात्म्यं सङ्क्षेपात्प्रवदामि वः ।

कश्चिद्विजो महाप्राज्ञस्तपस्तप्त्वा कथञ्चन ॥ १६

पुत्रमेकं तयोत्पाद्य संस्कारैश्च यथाक्रमम् ।

योजयित्वा यथाकालं कृतोपनयनं पुनः ॥ १७

अध्यापयामास तदा स च नोवाच किञ्चन ।

न जिह्वा स्पन्दते तस्य दुःखितोऽभूद् द्विजोत्तमः ॥ १८

मन्त्रजपकी महिमामें ऐतरेय ब्राह्मणकी कथा ६०७ जो पुण्य कर्म करनेवाला विद्वान् मन - वचन-कर्मसे पुरुषोत्तमको प्रणाम करके ' नमो नारायणाय'-इस मन्त्रका जप करता है; सोते, जागते, चलते, बैठते, भोजन करते, आँखें खोलते तथा मूँदते नारायणका स्मरण करता है; भोज्य, पेय तथा लेह्य पदार्थका स्पर्श करते ' हुए ' नमो नारायणाय ' - इस मन्त्र से अभिमन्त्रित करके उसे ग्रहण करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है और सभी पापोंसे मुक्त होकर सद्गति प्राप्त करता है ॥५–८९ २ ॥ मुनि दुःसहकी पत्नी जो मेरे द्वारा अलक्ष्मी कही गयी है, वह ' नारायण ' नामको सुनते ही वहाँसे भाग जाती है; इसमें संशय नहीं है और हे सुव्रतो! देवोंके भी देव भगवान् श्रीकृष्णकी प्रिया जो लक्ष्मी हैं, वे [ उस मनुष्यके ] घर, क्षेत्र, आवास तथा शरीरमें वास | करती_हैं॥९ -१०१ / २ ॥ सभी शास्त्रोंका सम्यक् अनुशीलन करके और बार - बार विचार करके यही एक निश्चय किया गया है कि सदा नारायणका ही ध्यान करना चाहिये । अनेक मन्त्रों तथा व्रतोंसे उस मनुष्यको क्या प्रयोजन; क्योंकि यह ' नमो नारायणाय ' मन्त्र सभी कामनाओंको सिद्ध करनेवाला है । अतः हे विप्रेन्द्रो! जो सभी समय ' नमो नारायणाय ' इस मन्त्रको जपता है, वह बन्धु - बान्धवोंसहित विष्णुलोकको प्राप्त होता | है ॥ ११–१३१ / २ ॥ हे मुनिश्रेष्ठो! अब आपलोग देवदेव भगवान् विष्णुके अन्य मन्त्रोंके माहात्म्यका श्रवण करें । मैंने पूर्वकालमें समस्त वेदार्थोंको सिद्ध करनेवाले, बारह वर्णोंसे युक्त, द्वादश आदित्यस्वरूप तथा सनातन मन्त्रका अभ्यास किया था; उसी मन्त्रका माहात्म्य मैं आपलोगोंको संक्षेपमें बता रहा हूँ ॥ १४-१५१२ ॥ किसी महामनीषी ब्राह्मणने तपस्या करके किसी तरह एक पुत्रको उत्पन्नकर क्रमानुसार उसके सभी संस्कार सम्पन्न किये; यथासमय उसके उपनयनके पश्चात् | उस द्विजने उसे अध्ययन कराया, किन्तु वह कुछ भी नहीं

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६०८ वासुदेवेति नियतमैतरेयो वदत्यसौ पिता तस्य तथा चान्यां परिणीय यथाविधि ॥ पुत्रानुत्पादयामास तथैव विधिपूर्वकम् वेदानधीत्य सम्पन्ना बभूवुः सर्वसम्मताः ऐतरेयस्य सा माता दुःखिता शोकमूर्च्छिता श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग । बोल पाता था । उसकी जिह्वा किसी भी शब्दका उच्चारण १ ९ नहीं करती थी, वह ऐतरेय नामक बालक केवल । । ' वासुदेवाय ' – इस मन्त्रको निरन्तर बोलता था । इससे ॥ २० वह द्विजश्रेष्ठ बहुत दुःखित हुआ ॥ १६–१८१ / २ ॥ । तब उसके पिताने दूसरी स्त्रीसे विधानके साथ विवाह करके उससे विधिपूर्वक पुत्र उत्पन्न किये । वे पुत्र वेदोंका अध्ययन करके सबके मान्य तथा सम्पत्तियुक्त हो गये ॥ १ ९ -२० ॥ ऐतरेयकी वह माता इससे अत्यन्त दुःखित तथा शोकाकुल होकर [ उससे ] बोली– ' मेरी सौतके पुत्र सम्पन्न हैं तथा वेदवेदांगमें पारंगत हैं; वे ब्राह्मणोंसे पूजित होते हुए अपनी माताको आनन्दित करते हैं । एक तुम हो जो मुझ अभागिनको उद्यमहीन पुत्र उत्पन्न हुए । अब तो मेरा मर जाना ही श्रेयस्कर है; जीवित रहना किसी भी तरह ठीक नहीं ' ॥ २१-२२१ / २ ॥ [ माता द्वारा ] ऐसा कहा गया वह ऐतरेय वहाँसे निकलकर यज्ञमण्डपमें गया । उसके पहुँचते ही [ वहाँ उपस्थित ] ऋत्विजोंको मन्त्र अवगत नहीं हुए । उस उवाच पुत्राः सम्पन्ना वेदवेदाङ्गपारगाः ॥ २१ ऐतरेयके वहाँ स्थित रहनेपर सभी ब्राह्मण मोहित हो

ब्राह्मणैः पूज्यमाना वै मोदयन्ति च मातरम् ।

मम त्वं भाग्यहीनायाः पुत्रो जातो निराकृतिः ॥

मात्र निधनं श्रेयो न कथञ्चन जीवितम् ।

इत्युक्तः स च निर्गम्य यज्ञवाटं जगाम वै ॥

तस्मिन् याते द्विजानां तु न मन्त्राः प्रतिपेदिरे ।

ऐतरेये स्थिते तत्र ब्राह्मणा मोहितास्तदा ॥

ततो वाणी समुद्भूता वासुदेवेति कीर्तनात् ।

ऐतरेयस्य ते विप्राः प्रणिपत्य यथातथम् ॥

पूजां चक्रुस्ततो यज्ञं स्वयमेव समागतम् ।

ततः समाप्य तं यज्ञमैतरेयो धनादिभिः ॥

सर्ववेदान् सदस्याह सषडङ्गान्स समाहितः ।

तुष्टुवुश्च तथा विप्रा ब्रह्माद्याश्च तथा द्विजाः ॥

ससर्जुः पुष्पवर्षाणि खेचराः सिद्धचारणाः ।

एवं समाप्य वै यज्ञमैतरेयो द्विजोत्तमाः ॥

मातरं पूजयित्वा तु विष्णोः स्थानं जगाम ह ।

एतद्वै कथितं सर्वं द्वादशाक्षरवैभवम् ॥

पठतां शृण्वतां नित्यं महापातकनाशनम् ।

जपेद्यः पुरुषो नित्यं द्वादशाक्षरमव्ययम् ॥

गये । तब वासुदेव इस नाम - मन्त्रके कीर्तनसे उसके २२ मुखसे मन्त्रमयी वाणी निकलने लगी । [ यह देखकर ] उन विप्रोंने प्रणाम करके यथाविधि ऐतरेयका पूजन २३ किया । तत्पश्चात् वहाँपर यज्ञदेव स्वयं ही उपस्थित हुए । तब उस यज्ञको पूर्ण करके उन विप्रोंके द्वारा वह २४ ऐतरेय धन आदिसे सम्मानित किया गया । उसने २५ एकनिष्ठ होकर छ: अंगोंसहित सभी वेदोंका उस विप्रसभामें कथन किया । [ तब हर्षित होकर ] सभी २६ ऋत्विज ब्राह्मण आदि तथा द्विजगण उसकी स्तुति करने लगे और सभी खेचर, सिद्ध एवं चारण उसके ऊपर २७ पुष्प - वृष्टि करने लगे॥२३–२७१ / ३ ॥ २८ हे द्विजश्रेष्ठो! इस प्रकार यज्ञ सम्पन्न करके वह ऐतरेय अपनी माताकी पूजा करके विष्णुलोक चला २ ९ गया । मैंने यह द्वादशाक्षर मन्त्रका महत्त्व आपलोगोंको बतला दिया । इसे पढ़ने तथा सुननेवालोंके महापापका ३० । नाश हो जाता है । जो मनुष्य इस अविनाशी द्वादशाक्षर