लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 611–620

लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 611–620

पृष्ठ 611

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अध्याय ८ ] शिवमहामन्त्रके जपसे ब्राह्मणपुत्र दुराचारी

स याति दिव्यमतुलं विष्णोस्तत्परमं पदम् ।

अपि पापसमाचारो द्वादशाक्षरतत्परः ॥ ३१

प्राप्नोति परमं स्थानं नात्र कार्या विचारणा ।

किं पुनर्ये स्वधर्मस्था वासुदेवपरायणाः ॥ ३२

दिव्यं स्थानं महात्मानः प्राप्नुवन्तीति सुव्रताः ॥ ३३

धुन्धुमूकका शिवगणत्वको प्राप्त करना ६० ९ मन्त्रका नित्य जप करता है, वह भगवान् विष्णुके अनुपम, दिव्य तथा परमपदको प्राप्त होता है । पाप करनेवाला भी यदि इस द्वादशाक्षर मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ) -के जपमें तत्पर रहता है, तो वह परम पद प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये, तो फिर हे सुव्रतो! जो लोग अपने धर्ममें स्थित रहते हुए वासुदेवपरायण हैं, उनकी बात ही क्या; वे महात्मा तो दिव्य स्थान ( विष्णुलोक ) अवश्य प्राप्त | करते हैं॥२८–३३ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे द्वादशाक्षरप्रशंसा नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' द्वादशाक्षरप्रशंसा ' नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥

आठवाँ अध्याय शिवमहामन्त्रके जपसे ब्राह्मणपुत्र दुराचारी धुन्धुमूकका शिवकी कृपासे शिवगणत्वको प्राप्त करना सूत उवाच

अष्टाक्षरो द्विजश्रेष्ठा नमो नारायणेति च ।

द्वादशाक्षरमन्त्रश्च परमः परमात्मनः ॥ १

मन्त्रः षडक्षरो विप्राः सर्ववेदार्थसञ्चयः ।

यश्चों नमः शिवायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः ॥ २

तथा शिवतरायेति दिव्यः पञ्चाक्षरः शुभः ।

मयस्कराय चेत्येवं नमस्ते शङ्कराय च ॥ ३

सप्ताक्षरोऽयं रुद्रस्य प्रधानपुरुषस्य वै ।

ब्रह्मा च भगवान् विष्णुः सर्वे देवाः सवासवाः ॥ ४

मन्त्रैरेतैर्द्विजश्रेष्ठा मुनयश्च यजन्ति तम् ।

शङ्करं देवदेवेशं मयस्करमजोद्भवम् ॥५

शिवं च शङ्करं रुद्रं देवदेवमुमापतिम् ।

प्राहुर्नमः शिवायेति नमस्ते शङ्कराय च ॥ ६

मयस्कराय रुद्राय तथा शिवतराय च ।

जप्त्वा मुच्येत वै विप्रो ब्रह्महत्यादिभिः क्षणात् ॥ ७

पुरा कश्चिद्विजः शक्तो धुन्धुमूक इति श्रुतः ।

आसीत्तृतीये त्रेतायामावर्ते च मनोः प्रभोः ॥ ८

सूतजी बोले- हे द्विजश्रेष्ठो! ' ॐ नमो नारायणाय ' यह अष्टाक्षर मन्त्र तथा द्वादशाक्षर मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ) – ये परमात्माके श्रेष्ठ मन्त्र हैं । किंतु हे विप्रो! ' ॐ नमः शिवाय ' - यह जो षडक्षर मन्त्र है, वह सभी वेदार्थोंका सारभूत है, उसी प्रकार ' शिवतराय ' तथा ' मयस्कराय ' - ये दिव्य तथा मंगलकारक पंचाक्षरमन्त्र सभी मनोरथोंको प्राप्त करानेवाले हैं और उसी तरह प्रधानपुरुष रुद्रका ' नमस्ते शङ्कराय'-यह सप्ताक्षर मन्त्र भी सभी मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला | है ॥ १–३२ ॥ हे द्विजश्रेष्ठो! ब्रह्मा, भगवान् विष्णु तथा इन्द्रसहित सभी देवता, श्रेष्ठ द्विजगण एवं मुनिलोग इन मन्त्रोंसे उन शंकर, देवदेवेश, मयस्कर तथा अजोद्भव शिवका यजन करते हैं और उन्हीं शिवको शंकर, रुद्र, । देवदेव तथा उमापति कहते हैं । नमः शिवाय, नमस्ते शङ्कराय, मयस्कराय, रुद्राय, शिवतराय - इन मन्त्रोंका जप करके विप्र ब्रह्महत्या आदि [ महापातकों ] -से क्षणभरमें मुक्त हो जाता है॥४–७ ॥ पूर्वकालमें प्रभु मनुके तीसरे आवर्त ( चतुर्युग ) -

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श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग ६१० मेघवाहनकल्पे वै ब्रह्मणः परमात्मनः

KKKKKKKKKKK ।

मेघो भूत्वा महादेवं कृत्तिवाससमीश्वरम् ॥ ९

बहुमानेन वै रुद्रं देवदेवो जनार्दनः ।

खिन्नोऽतिभाराद्रुद्रस्य निःश्वासोच्छ्वासवर्जितः ॥ १०

विज्ञाप्य शितिकण्ठाय तपश्चक्रेऽम्बुजेक्षणः ।

तपसा परमैश्वर्यं बलं चैव तथाद्भुतम् ॥ ११

लब्धवान् परमेशानाच्छङ्करात्परमात्मनः ।

तस्मात्कल्पस्तदा चासीन्मेघवाहनसंज्ञया ॥ १२

तस्मिन् कल्पे मुनेः शापाद् धुन्धुमूकसमुद्भवः ।

धुन्धुमूकात्मजस्तेन दुरात्मा च बभूव सः ॥१३

धुन्धुमूकः पुरासक्तो भार्यया सह मोहितः ।

तस्यां वै स्थापितो गर्भः कामासक्तेन चेतसा ॥ १४

अमावास्यामहन्येव मुहूर्ते रुद्रदैवते ।

अन्तर्वनी तदा भार्या भुक्ता तेन यथासुखम् ॥ १५

असूत सां च तनयं विशल्याख्या प्रयत्नतः ।

रुद्रे मुहूर्ते मन्देन वीक्षिते मुनिसत्तमाः ॥ १६

मातुः पितुस्तथारिष्टं स सञ्जातस्तथात्मनः ।

ऋषी तमूचतुर्विप्रा धुन्धुमूकं मिथस्तदा ॥ १७

मित्रावरुणनामानौ दुष्पुत्र इति सत्तमौ ।

वसिष्ठः प्राह नीचोऽपि प्रभावाद्वै बृहस्पतेः ॥ १८

पुत्रस्तवासौ दुर्बुद्धिरपि मुच्यति किल्विषात् ।

दुःखितो धुन्धुको सौ दृष्ट्वा पुत्रमवस्थितम् ॥ १ ९

जातकर्मादिकं कृत्वा विधिवत्स्वयमेव च ।

अध्यापयामास च तं विधिनैव द्विजोत्तमाः ॥ २०

तेनाधीतं यथान्यायं धौन्धुमूकेन सुव्रताः ।

कृतोद्वाहस्तदा गत्वा गुरुशुश्रूषणे रतः ॥ २१ ।

36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 35 35 96 95 36 36 9696969635 के त्रेतायुगमें कोई धुन्धुमूक नामक सामर्थ्यसम्पन्न द्विज | था ॥८ ॥

मेघवाहन कल्पमें परमात्मा शिवका मेघरूपी वाहन बनकर देवदेव जनार्दन विष्णुने अत्यन्त आदरके साथ उन महादेव कृत्तिवास ( व्याघ्रचर्मधारी ) ईश्वर रुद्रका वहन । किया था । तब रुद्रके अत्यधिक भारसे पीड़ित होनेके कारण वे श्वास - उच्छ्वाससे रहित हो गये । इसके बाद उन कमलनयन विष्णुने शितिकण्ठ शिवको उद्देश्य करके तपस्या की और अपनी तपस्याके द्वारा परमेश्वर तथा परमात्मा शंकरसे परम ऐश्वर्य और अद्भुत बल प्राप्त किया । इसीलिये वह कल्प मेघवाहन नामसे विख्यात हुआ ॥ ९ -१२ ॥ उस कल्पमें [ पूर्वजन्ममें किसी ] मुनिके शापके कारण धुन्धुमूकके यहाँ पुत्र उत्पन्न हुआ, धुन्धुमूकका वह । पुत्र [ पिताके दोषके कारण ] दुरात्मा हो गया । पूर्वकालमें वह धुन्धुमूक विरक्त होते हुए भी भार्यापर मोहित हो गया और उसने अमावास्या तिथिको दिनमें ही रुद्रदैवत मुहूर्तमें कामासक्त मनसे भार्याके साथ सुखपूर्वक संसर्ग किया और उसमें गर्भ स्थापित कर दिया । तत्पश्चात् हे मुनिश्रेष्ठो! | विशल्या नामक उस [ मुनिपत्नी ] - ने शनिकी दृष्टिवाले भयंकर मुहूर्तमें अत्यन्त कष्टपूर्वक एक पुत्रको जन्म दिया ॥ १३–१६ ॥ माता, पिता तथा अपने लिये अरिष्टकारी होकर उसने जन्म लिया था । हे विप्रो! मित्र एवं वरुण नामक श्रेष्ठ ऋषियोंने उस धुन्धुमूकसे कहा कि यह दुष्पुत्र है, किंतु वसिष्ठने उससे कहा कि तुम्हारा यह पुत्र नीच तथा दुर्बुद्धि होते हुए भी बृहस्पतिके प्रभावसे पापसे मुक्त हो जायगा॥१७–१८१ / २ ॥ द्विजश्रेष्ठ! ऐसी दशावाले पुत्रको देखकर वह धुन्धुमूक [ बहुत ] दु: खित हुआ । उसने विधिपूर्वक उसके जातकर्म आदि संस्कार करके स्वयं उसे सम्यक् प्रकारसे पढ़ाया । उस धुन्धुमूकके पुत्रने भलीभाँति अध्ययन किया । हे सुव्रतो! इसके बाद उसका विवाह कर दिया गया, तब वहाँसे जाकर वह गुरुसेवामें निरत हो गया ॥ १ ९ –२१ ॥

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अध्याय ८ ] शिवमहामन्त्रके जपसे ब्राह्मणपुत्र दुराचारी

अनेनैव मुनिश्रेष्ठा धौन्धुमूकेन दुर्मदात् ।

भुक्त्वान्यां वृषलीं दृष्ट्वा स्वभार्यावद्दिवानिशम् ॥ २२

एकशय्यासनगतो धौन्धुमूको द्विजाधमः ।

तथा चचार दुर्बुद्धिस्त्यक्त्वा धर्मगतिं पराम् ॥ २३

माध्वी पीता तया सार्धं तेन रागविवृद्धये ।

केनापि कारणेनैव तामुद्दिश्य द्विजोत्तमाः ॥ २४

निहता सा च पापेन वृषली गतमङ्गला ।

ततस्तस्यास्तदा तस्य भ्रातृभिर्निहतः पिता ॥ २५

माता च तस्य दुर्बुद्धेर्धोन्धुमूकस्य शोभना ।

भार्या च तस्य दुर्बुद्धेः श्यालास्ते चापि सुव्रताः ॥ २६

राज्ञा क्षणादहो नष्टं कुलं तस्याश्च तस्य च ।

गत्वासौ धौन्धुमूकश्च येन केनापि लीलया ॥ २७

दृष्ट्वा तु तं मुनिश्रेष्ठं रुद्रजाप्यपरायणम् ।

लब्ध्वा पाशुपतं तद्वै पुरा देवान् महेश्वरात् ॥ २८

लब्ध्वा पञ्चाक्षरं चैव षडक्षरमनुत्तमम् ।

पुनः पञ्चाक्षरं चैव जप्त्वा लक्षं पृथक्पृथक् ॥ २ ९

व्रतं कृत्वा च विधिना दिव्यं द्वादशमासिकम् ।

कालधर्मं गतः कल्पे पूजितश्च यमेन वै ॥ ३०

उद्धृता च तथा माता पिता श्यालाश्च सुव्रताः ।

पत्नी च सुभगा जाता सुस्मिता च पतिव्रता ॥ ३१

ताभिर्विमानमारुह्य देवैः सेन्द्रैरभिष्टुतः ।

गाणपत्यमनुप्राप्य रुद्रस्य दयितोऽभवत् ॥ ३२

तस्मादष्टाक्षरान्मन्त्रात्तथा वै द्वादशाक्षरात् ।

भवेत्कोटिगुणं पुण्यं नात्र कार्या विचारणा ॥ ३३

धुन्धुमूकका शिवगणत्वको प्राप्त करना ६११ Y Y Y Y Y Y Y Y Y Y हे द्विजश्रेष्ठो! इसी [ पूर्वोक्त दोष ] -के कारण वह धुन्धुमूकपुत्र किसी शूद्राको देखकर मदोन्मत्त होकर अपनी भार्याके समान उसके साथ दिन - रात भोग करके [ उसके पास ] पड़ा रहता था । वह द्विजाधम तथा दुर्बुद्धि अपनी परम धर्मगतिका त्याग करके उसके साथ शय्यापर स्थित होकर दुराचारमें रत रहता था । वह कामोद्दीपनके लिये उसके साथ मदिरा भी पीता था ॥ २२-२३१ / २ ॥ हे द्विजश्रेष्ठो! किसी कारणसे उस शूद्राके साथ उसका विरोध हो गया और उस पापीने अभद्र शूद्राको मार डाला । तब उसके भाइयोंने उस धौन्धुमूकके पिताको मार डाला, इसी प्रकार उन्होंने उस दुर्बुद्धिकी माता, सुन्दर पत्नी तथा उसके सालों ( पत्नीके भाइयों ) -| का भी वध कर दिया । हे सुव्रतो! इस प्रकार क्षणभरमें उसका कुल विनष्ट हो गया और उस शूद्राका सम्पूर्ण कुल भी राजाके द्वारा मार डाला गया ॥ २४ - २६१/२ ॥ तत्पश्चात् जिस किसी तरह वहाँसे निकलकर वह धौन्धुमूक पूर्वकालमें महेश्वर महादेवसे पाशुपतव्रत प्राप्त करके रुद्रजपमें तत्पर मुनिश्रेष्ठ बृहस्पतिके यहाँ प्रारब्धवश पहुँचकर उनसे सर्वश्रेष्ठ पंचाक्षर तथा षडक्षर मन्त्र ग्रहण करके और बादमें उस पंचाक्षर तथा षडक्षर मन्त्रको पृथक् पृथक् एक लाख बार जपकर और इस प्रकार दिव्य द्वादशमासिक व्रतको विधिपूर्वक करके अन्तमें [ आयुके समाप्त होनेपर ] मृत्युको प्राप्त हुआ | यमलोकमें यमराजके द्वारा वह बहुत सम्मानित । किया गया । हे सुव्रतो! इस प्रकार उसने [ शूद्रोंके द्वारा मारे गये ] अपने माता, पिता तथा सालोंका उद्धार कर दिया और सुन्दर मुसकानवाली उसकी पतिव्रता भार्या सौभाग्यवती हो गयी । उन सभीके साथ विमानमें बैठकर [ रुद्रलोक पहुँचकर ] इन्द्रसहित सभी देवताओंसे स्तुत होता हुआ वह गणाध्यक्ष बनकर भगवान् रुद्रका प्रिय हो गया ॥ २७-३२ ॥ अतएव अष्टाक्षर तथा द्वादशाक्षर मन्त्रोंसे यह | [ [ पं पंचाक्षरमन्त्र ] करोड़ों गुना अधिक पुण्यप्रद होता है;

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श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग ६१२

तस्माज्जपेद्धि यो नित्यं प्रागुक्तेन विधानतः ।

शक्तिबीजसमायुक्तं स याति परमां गतिम् ॥ ३४

एतद्वः कथितं सर्वं कथासर्वस्वमुत्तमम् ।

यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान् ॥ ३५

स याति ब्रह्मलोकं तु रुद्रजाप्यमनुत्तमम् ॥ ३६

। इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये । अतः जो मनुष्य पूर्वमें कहे गये * विधानके अनुसार आदिमें मायाबीज लगाकर इस मन्त्रका नित्य जप करता है, वह परम गति प्राप्त करता है ॥ ३३-३४ ॥ [ हे मुनियो! ] मैंने आपलोगोंसे यह उत्तम कथासार कह दिया, जो [ मनुष्य ] इस सर्वोत्कृष्ट रुद्रजपसम्बन्धी प्रसंगको पढ़ता है, सुनता है अथवा श्रेष्ठ द्विजोंको । सुनाता है, वह ब्रह्मलोक प्राप्त करता है ॥ ३५-३६ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागेऽष्टाक्षरप्रशंसा नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' अष्टाक्षरप्रशंसा ' नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८ ॥

नौवाँ अध्याय पशु, पाश एवं पशुपतिकी व्याख्या, पाशुपतयोगका माहात्म्य तथा पशुपाशमोक्षविवरण ऋषय ऊचुः

देवैः पुरा कृतं दिव्यं व्रतं पाशुपतं शुभम् ।

ब्रह्मणा च स्वयं सूत कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा ॥ १

पतितेन च विप्रेण धौन्धुमूकेन वै तथा ।

कृत्वा जप्त्वा गतिः प्राप्ता कथं पाशुपतं व्रतम् ॥ २

कथं पशुपतिर्देवः शङ्करः परमेश्वरः ।

वक्तुमर्हसि चास्माकं परं कौतूहलं हि नः ॥ ३

सूत उवाच

पुरा शापाद्विनिर्मुक्तो ब्रह्मपुत्रो महायशाः ।

रुद्रस्य देवदेवस्य मरुदेशादिहागतः ॥ ४

त्यक्त्वा प्रसादाद्रुद्रस्य उष्ट्रदेहमजाज्ञया ।

शिलादपुत्रमासाद्य नमस्कृत्य विधानतः ॥ ५

मेरुपृष्ठे मुनिवरः श्रुत्वा धर्ममनुत्तमम् ।

माहेश्वरं मुनिश्रेष्ठा ह्यपृच्छच्च पुनः पुनः ॥ ६

नन्दिनं प्रणिपत्यैनं कथं पशुपतिः प्रभुः ।

वक्तुमर्हसि चास्माकं तत्सर्वं च तदाह सः ॥ ७

तत्सर्वं श्रुतवान् व्यासः कृष्णद्वैपायनः प्रभुः ।

तस्मादहमनुश्रुत्य युष्माकं प्रवदामि वै ॥ ८

सर्वे शृण्वन्तु वचनं नमस्कृत्वा महेश्वरम् । ऋषिगण बोले- हे सूतजी! देवताओंने, ब्रह्माजीने तथा उत्कृष्ट कर्मोंवाले स्वयं विष्णुने पूर्वकालमें इस दिव्य एवं मंगलकारी व्रतको किया था । पतित विप्र धौन्धुमूकने भी इसे करके तथा मन्त्रका जप करके सद्गति प्राप्त की । यह पाशुपतव्रत कैसा है और वे परमेश्वर भगवान् शंकर पशुपति क्यों [ कहे जाते ] हैं? हमलोगोंको [ इस विषय के प्रति ] बड़ी जिज्ञासा है; आप हमें बतायें ॥ १-३ ॥ सूतजी बोले- पूर्वकालमें ब्रह्माजीके पुत्र महायशस्वी सनत्कुमार देवदेव रुद्रके शापसे मुक्त हुए थे । उन भगवान् रुद्रके ही अनुग्रहसे उष्ट्रदेहका त्याग करके वे मरुदेशसे यहाँ ( भारतवर्ष ) आ गये । पुनः ब्रह्माजीकी आज्ञासे शिलादपुत्र नन्दीके पास मेरुके शिखरपर पहुँचकर उन्हें विधानपूर्वक नमस्कार करके मुनिवरने उनसे सर्वश्रेष्ठ मोक्षधर्मका श्रवणकर पाशुपतव्रतके विषयमें पूछा । हे मुनिश्रेष्ठो! इन नन्दीको बार - बार प्रणाम करके सनत्कुमारने पूछा- प्रभु शिव पशुपति कैसे हुए - यह आप हमसे बतायें । तब उन नन्दीने उन्हें सब कुछ बता दिया । कृष्णद्वैपायन प्रभु व्यासने [ सनत्कुमारसे ] वह सब सुना और उन [ व्यासजी ] -से सुन करके अब मैं आपलोगोंसे वही प्रसंग कह रहा हूँ, | महेश्वरको नमस्कार करके सभी लोग उस वचनको सुनें ॥ ४–८१ / २ ॥ * पंचाक्षरमन्त्रका पूर्ण विधान श्रीलिङ्गमहापुराणके पूर्वभागके पचासीवें अध्यायमें वर्णित है ।

पृष्ठ 615

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अध्याय ९ ] पशु, पाश एवं पशुपतिकी व्याख्या पशुपाशमोक्षविवरण सनत्कुमार उवाच कथं पशुपतिर्देवः पशवः के प्रकीर्तिताः ॥ ९ कैः पाशैस्ते निबध्यन्ते विमुच्यन्ते च ते कथम् । शैलादिरुवाच सनत्कुमार वक्ष्यामि सर्वमेतद्यथातथम् ॥१०

रुद्रभक्तस्य शान्तस्य तव कल्याणचेतसः ।

ब्रह्माद्याः स्थावरान्ताश्च देवदेवस्य धीमतः ॥ ११

पशवः परिकीर्त्यन्ते संसारवशवर्तिनः ।

तेषां पतित्वाद्भगवान् रुद्रः पशुपतिः स्मृतः ॥ १२

अनादिनिधनो धाता भगवान् विष्णुरव्ययः ।

मायापाशेन बध्नाति पशुवत्परमेश्वरः ॥ १३

स एव मोचकस्तेषां ज्ञानयोगेन सेवितः ।

अविद्यापाशबद्धानां नान्यो मोचक इष्यते ॥ १४

तमृते परमात्मानं शङ्करं परमेश्वरम् ।

चतुर्विंशतितत्त्वानि पाशा हि परमेष्ठिनः ॥ १५

तैः पाशैर्मोचयत्येकः शिवो जीवैरुपासितः ।

पशूनेकश्चतुर्विंशतिपाशकैः ॥ १६ ।

स एव भगवान् रुद्रो मोचयत्यपि सेवितः ।

दशेन्द्रियमयैः पाशैरन्तःकरणसम्भवैः ॥ १७

भूततन्मात्रपाशैश्च पशून्मोचयति प्रभुः ।

इन्द्रियार्थमयैः पाशैर्बद्धा विषयिणः प्रभुः ॥ १८

आशु भक्ता भवन्त्येव परमेश्वरसेवया ।

भज इत्येष धातुर्वै सेवायां परिकीर्तितः ॥ १ ९

तस्मात्सेवा बुधैः प्रोक्ता भक्तिशब्देन भूयसी ।

ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं पशून् बद्धा महेश्वरः ॥ २०

त्रिभिर्गुणमयैः पाशैः कार्यं कारयति स्वयम् ।

दृढेन भक्तियोगेन पशुभिः समुपासितः ॥ २१

मोचयत्येव तान् सद्यः शङ्करः परमेश्वरः ।

भजनं भक्तिरित्युक्ता वाङ्मनःकायकर्मभिः ॥ २२

६१३ सनत्कुमार बोले – भगवान् शिव पशुपति कैसे हुए, कौन लोग पशु कहे गये हैं, वे किन पाशोंसे बाँधे जाते हैं और पुनः वे कैसे मुक्त होते हैं? ॥ ९९ २ ॥ शैलादि बोले – हे सनत्कुमार! मैं रुद्रभक्त, शान्तस्वभाव तथा कल्याणभावनासे युक्त चित्तवाले आपको यह सब यथार्थ रूपमें बताऊँगा । ब्रह्मासे लेकर स्थावर - जंगमपर्यन्त सभी मायावशवर्ती हैं और धीमान् देवदेव शिवके पशु कहे जाते हैं । उनका स्वामी होनेके कारण भगवान् रुद्र पशुपति कहे गये हैं । १०–१२ ॥ आदि तथा अन्तसे रहित, धारण करनेवाले, अव्यय, षडैश्वर्यसम्पन्न, सर्वव्यापक, परमेश्वर महेश्वर ही इन जीवोंको मोहाभिभूत पशुके समान मायापाशमें | बाँधते हैं तथा वे ही ज्ञानयोगसे आराधित होनेपर उन्हें मुक्ति देनेवाले भी हैं; क्योंकि अविद्यापाशमें बँधे जीवोंको मुक्ति देनेवाला परमात्मा परमेश्वर शंकरके अतिरिक्त कोई अन्य है ही नहीं ॥ १३-१४९ / २ ॥ चौबीस तत्त्व ही भगवान् परमेष्ठीके पाश हैं, वे एकमात्र शिव ही जीवोंके द्वारा आराधित होनेपर उन पाशोंसे मुक्त करते हैं । वे भगवान् रुद्र चौबीस पाशोंसे पशुओं ( जीवों ) को बाँधते हैं और वे ही सेवित होनेपर बन्धनमुक्त भी करते हैं । दस इन्द्रियों ( पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय ), अन्तःकरणजन्य भावों [ मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त ], शब्द आदि पाँच तन्मात्राओं तथा पृथ्वी आदि पाँच महाभूतों - इन समस्त विषयरूप पाशोंसे भगवान् शिव पशुओंको छुड़ाते हैं । इन इन्द्रियोंके विषयरूप पाशोंसे बँधे हुए विषयग्रस्त लोग परमेश्वर शिवकी सेवासे शीघ्र ही उनके भक्त हो जाते हैं॥१५- १८१/२ ॥ भज - यह धातु सेवा अर्थमें कही गयी है, अतः विद्वज्जनोंने सेवाको भक्ति शब्दसे सम्बन्धित बताया है । ब्रह्मा आदिसे लेकर तृणपर्यन्त सभी पशुओंको [ सत्त्व आदि ] तीनों गुणरूपी पाशोंसे बाँधकर महेश्वर स्वयं कार्य कराते हैं । पशुओंके द्वारा दृढ़ भक्तियोगसे सम्यक् आराधित होनेपर वे परमेश्वर शंकर उन्हें शीघ्र ही [ बन्धनसे ] छुड़ा देते हैं ॥ १ ९ –२११ / २ ॥ मन, वचन तथा कर्मसे [ प्रभुका ] भजन ही

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६१४ सर्वकार्येण हेतुत्वात्पाशच्छेदपटीयसी सत्यः सर्वग इत्यादि शिवस्य गुणचिन्तना ॥ रूपोपादानचिन्ता च मानसं भजनं विदुः वाचिकं भजनं धीराः प्रणवादिजपं विदुः

कायिकं भजनं सद्भिः प्राणायामादि कथ्यते ।

धर्माधर्ममयैः पाशैर्बन्धनं देहिनामिदम् ॥

मोचक: शिव एवैको भगवान् परमेश्वरः । चतुर्विंशतितत्त्वानि मायाकर्मगुणा इति कीर्त्यन्ते विषयाश्चेति पाशा जीवनिबन्धनात् । तैर्बद्धाः शिवभक्त्यैव मुच्यन्ते सर्वदेहिनः पञ्चक्लेशमयैः पाशैः पशून् बध्नाति शङ्करः । स एव मोचकस्तेषां भक्त्या सम्यगुपासितः अविद्यामस्मितां रागं द्वेषं च द्विपदां वराः वदन्त्यभिनिवेशं च क्लेशान् पाशत्वमागतान्

तमो मोहो महामोहस्तामिस्त्र इति पण्डिताः ।

अन्धतामिस्त्र इत्याहुरविद्यां पञ्चधा स्थिताम् ॥

ताञ्जीवान् मुनिशार्दूलाः सर्वांश्चैवाप्यविद्यया । शिवो मोचयति श्रीमान्नान्यः कश्चिद्विमोचकः

अविद्यां तम इत्याहुरस्मितां मोह इत्यपि ।

महामोह इति प्राज्ञा रागं योगपरायणाः ॥

द्वेषं तामिस्त्र इत्याहुरन्धतामिस्त्र इत्यपि ।

तथैवाभिनिवेशं च मिथ्याज्ञानं विवेकिनः ॥

तमसोऽष्टविधा भेदा मोहश्चाष्टविधः स्मृतः ।

महामोहप्रभेदाश्च बुधैर्दश विचिन्तिताः ॥

अष्टादशविधं चाहुस्तामिस्त्रं च विचक्षणाः ।

अन्धतामिस्त्रभेदाश्च तथाष्टादशधा स्मृताः ॥

अविद्ययास्य सम्बन्धो नातीतो नास्त्यनागतः ।

भवेद्रागेण देवस्य शम्भोरङ्गनिवासिनः ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग 36 36 35 96 96 95 96 96 96 96 96 । भक्ति कही गयी है । समस्त प्रपंचोंके पति विष्णुका २३ भी हेतु होनेके कारण वह भक्ति बन्धनको काटनेमें समर्थ है । वे सत्य हैं तथा सर्वव्यापी हैं - शिवके इन । गुणोंको जानने तथा उनके रूप और उपादानोंके ॥ २४ । चिन्तनको विद्वानोंने मानस भजन कहा 15555555 है और प्रणव ( ॐकार ) - के जप आदिको उन्होंने वाचिक भजन २५ कहा है, इसी प्रकार सत्पुरुषोंके द्वारा प्राणायाम आदिको कायिक भजन कहा जाता है ॥ २२–२४१ / २ ॥ धर्माधर्ममय पाशोंसे जीवोंका यह बन्धन होता ॥ २६ है और एकमात्र वे भगवान् परमेश्वर शिव ही [ उन पाशोंसे जीवोंको ] मुक्त करनेवाले हैं । चौबीस तत्त्व, ॥ २७ । मायाके गुण और शब्द आदि विषय- ये जीवको बाँध के कारण पाश कहे जाते हैं । उन पाशोंसे बँधे हुए सभी प्राणी शिवभक्तिके द्वारा ही मुक्त होते हैं 1 ॥ २८ [ अविद्या आदि ] पाँच क्लेशरूप पाशोंसे भी वे शिव । जीवोंको बाँधते हैं और वे ही भक्तिके द्वारा भलीभाँति ॥ २ ९ उपासित किये जानेपर पाशोंसे उन्हें मुक्त कर देते हैं ॥ २५–२८ ॥ मनुष्योंमें श्रेष्ठ लोग अविद्या, अस्मिता, राग, ३० द्वेष और अभिनिवेशको जीवोंको बाँधनेवाले [ पाँच ] क्लेश कहते हैं । पण्डितजन तम, मोह, महामोह, ॥ ३१ तामिस्र और अन्धतामिस्र - इन पाँच प्रकारसे अविद्या आदिको स्थित कहते हैं । हे मुनिश्रेष्ठो! केवल शिव ही उन समस्त जीवोंको अविद्यासे मुक्त कर सकते ३२ उन्हें मुक्त करनेवाला कोई दूसरा नहीं है । योगपरायण महाज्ञानियोंने अविद्याको तम, अस्मिताको मोह और रागको महामोह कहा है, इसी प्रकार विवेकयुक्त ३३ जनों द्वेषको तामिस्र और मिथ्या ज्ञानरूपी अभिनिवेशको अन्धतामिस्र बताया है ॥ २ ९ –३३१ / २ ॥ ३४ तम आठ भेद हैं । मोह आठ प्रकारका कहा गया है । विद्वानोंने महामोहके दस भेद बताये हैं । बुद्धिमान् लोगोंने तामिस्रको अठारह भेदोंवाला कहा है । अन्धतामिस्रके ३५ अठारह प्रकारके भेद बताये गये हैं । ३४-३५ ॥ सर्वान्तर्यामी देवदेव शिवका सम्बन्ध अविद्या ३६ | तथा रागसे न तो वर्तमानमें है, न पूर्वकालमें रहा है

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अध्याय ९ ] पशु, पाश एवं पशुपतिकी व्याख्या " पशुपाशमोक्षविवरण

कालेषु त्रिषु सम्बन्धस्तस्य द्वेषेण नो भवेत् ।

मायातीतस्य देवस्य स्थाणोः पशुपतेर्विभोः ॥

तथैवाभिनिवेशेन सम्बन्धो न कदाचन ।

शङ्करस्य शरण्यस्य शिवस्य परमात्मनः ॥

कुशलाकुशलैस्तस्य सम्बन्धो नैव कर्मभिः । भवेत्कालत्रये शम्भोरविद्यामतिवर्तिनः विपाकैः कर्मणां वापि न भवेदेव सङ्गमः । कालेषु त्रिषु सर्वस्य शिवस्य शिवदायिनः सुखदुःखैरसंस्पृश्यः कालत्रितयवर्तिभिः । स तैर्विनश्वरैः शम्भुर्बोधानन्दात्मकः परः आशयैरपरामृष्टः कालत्रितयगोचरैः धियांपतिः स्वभूरेष महादेवो महेश्वरः अस्पृश्यः कर्मसंस्कारैः कालत्रितयवर्तिभिः । भोगसंस्कारैर्भगवानन्तकान्तकः पुंविशेषपरो देवो भगवान् परमेश्वरः । चेतनाचेतनायुक्तप्रपञ्चादखिलात्परः लोके सातिशयत्वेन ज्ञानैश्वर्यं विलोक्यते शिवेनातिशयत्वेन शिवं प्राहुर्मनीषिणः प्रतिसर्गं प्रसूतानां ब्रह्मणां शास्त्रविस्तरम् उपदेष्टा स एवादौ कालावच्छेदवर्तिनाम् ॥ कालावच्छेदयुक्तानां गुरूणामप्यसौ गुरुः सर्वेषामेव सर्वेशः कालावच्छेदवर्जितः अनादिरेष सम्बन्धो विज्ञानोत्कर्षयोः परः स्थितयोरीदृशः सर्वः परिशुद्धः स्वभावतः आत्मप्रयोजनाभावे परानुग्रह एव हि प्रयोजनं समस्तानां कार्याणां परमेश्वरः प्रणवो वाचकस्तस्य शिवस्य परमात्मनः शिवरुद्रादिशब्दानां प्रणवोऽपि परः स्मृतः ६१५ और न तो भविष्यमें होगा । मायासे परे, देवताओंके ३७ भी देव, स्थाणु, पशुपति तथा सर्वैश्वर्यसम्पन्न उन शिवका सम्बन्ध द्वेषसे तीनों कालोंमें नहीं हो सकता । उसी प्रकार शरणदाता तथा कल्याणकारक परमात्मा ३८ शिवका सम्बन्ध अभिनिवेशसे भी कभी नहीं सम्भव है । पुण्य तथा पापकर्मोंसे भी अविद्याका अतिवर्तन ॥ ३ ९ करनेवाले उन शिवका सम्बन्ध तीनों कालोंमें नहीं है । कल्याण प्रदान करनेवाले सर्वरूप शिवका सम्बन्ध [ शुभाशुभ ] कर्मोंके फलसे भी तीनों कालोंमें नहीं ॥ ४० है ॥ ३६–४० ॥ वे बोधानन्दस्वरूप परम शिव तीनों कालोंमें विद्यमान रहनेवाले उन विनाशशील सुख - दुःखोंसे स्पर्श ॥ ४१ होनेयोग्य नहीं हैं । बुद्धिके स्वामी तथा स्वयं प्रकट । होनेवाले वे महादेव महेश्वर तीनों कालोंमें अनुभूत ॥ ४२ होनेवाली कामनाओंसे भी अस्पृश्य हैं । इसी प्रकार कालका विनाश करनेवाले भगवान् शिव तीनों कालोंमें वर्तमान कर्मसंस्कारों तथा भोगसंस्कारोंसे अस्पृश्य ॥ ४३ हैं ॥ ४१–४३ ॥ वे परमेश्वर भगवान् महादेव सम्पूर्ण जीवोंसे श्रेष्ठ ॥ ४४ । हैं और जड़ - चेतनरूप सम्पूर्ण सृष्टिप्रपंचसे परे हैं । जैसे संसारमें ज्ञान और ऐश्वर्यको अत्यन्त श्रेष्ठ रूपमें देखा । जाता है, वैसे ही अतिशय कल्याणरूप होनेसे ही ॥ ४५ मनीषियोंने महादेवको शिव कहा है ॥ ४४-४५ ॥ । प्रत्येक सर्गमें उत्पन्न होनेवाले तथा कालसीमामें ४६ बँधे सभी ब्रह्माओंको सम्पूर्ण शास्त्रोंका आरम्भमें उपदेश करनेवाले वे शिव ही हैं । कालसीमासे रहित वे सर्वेश्वर । शिव कालावच्छेदसे युक्त सभी गुरुओंके भी गुरु ॥ ४७ हैं ॥ ४६-४७ ॥ । देहमें विद्यमान जीव तथा ईश्वरका यह सेवक ॥ ४८ तथा सेव्यका सम्बन्ध अनादि है । स्वभावसे अत्यन्त निर्मल तथा विश्वरूप वे शिव माया - सम्बन्धसे रहित हैं ॥ [ नित्यानन्दस्वरूप होनेके कारण ] अपने प्रयोजनके अभाव में ॥ ४ ९ भी वे परमेश्वर शिव जीवके प्रति समस्त कार्योंका प्रयोजनरूप । अनुग्रह ॥ ४८-४९ ॥ ॥ ५० प्रणव उन परमात्मा शिवका वाचक है । यह प्रणव

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श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग ६१६

शम्भोः प्रणववाच्यस्य भावना तज्जपादपि ।

या सिद्धिः स्वपराप्राप्या भवत्येव न संशयः ॥ ५१

ज्ञानतत्त्वं प्रयत्नेन योगः पाशुपतः परः ।

उक्तस्तु देवदेवेन सर्वेषामनुकम्पया ॥ ५२

स होवाचैव याज्ञवल्क्यो यदक्षरं गार्ग्ययोगिनः । अभिवदन्ति स्थूलमनन्तं महाश्चर्यमदीर्घमलोहित-ममस्तकमासायमत एवो पुनारसमसङ्गमगन्धमरस-मचक्षुष्कमश्रोत्रमवाङ्मनोतेजस्कमप्रमाणमनुसुख-मनामगोत्रममरमजरमनामयममृतमोंशब्दममृत-मसंवृतमपूर्वमनपरमनन्तमबाह्यं तदश्नाति किञ्चन न तदश्नाति किञ्चन ॥५३ ॥

एतत्कालव्यये ज्ञात्वा परं पाशुपतं प्रभुम् ।

योगे पाशुपते चास्मिन् यस्यार्थः किल उत्तमे ॥ ५४

कृत्वोङ्कारं प्रदीपं मृगय गृहपतिं सूक्ष्ममाद्यन्तरस्थं संयम्य द्वारवा पवनपटुतरं नायकं चेन्द्रियाणाम् । वाग्जालैः कस्य हेतोर्विभसि तु भयं दृश्य नैव किंचि-देहस्थं पश्य शम्भुं भ्रमसि किमु परे शास्त्रजालेऽन्धकारे ॥ ५५

एवं सम्यग्बुधैर्ज्ञात्वा मुनीनामथ चोक्तं शिवेन ।

असमरसं पञ्चधा कृत्वाभयं चात्मनि योजयेत् ॥ ५६ ।

शिव - रुद्र आदि शब्दोंमें श्रेष्ठ कहा गया है । शिवके वाचक प्रणवके जपसे तथा उसकी भावनासे जो सिद्धि होती है, वह अन्य मन्त्रोंके जपसे प्राप्त नहीं होती है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५०-५१ ॥ देवदेव आदित्यरूपी शिवने [ याज्ञवल्क्यकी तपस्यासे प्रसन्न होकर ] सभीकी अनुकम्पासे ज्ञानतत्त्वरूप श्रेष्ठ पाशुपत योगका उपदेश उन्हें दिया था । तत्पश्चात् याज्ञवल्क्यने गार्गीसे कहा- हे गार्गि! अयोगी लोग नाशशून्य जो शिवतत्त्व है, उसे विराट्रूप, अनन्त तथा अत्यन्त आश्चर्यजनक बताते हैं, किंतु योगीलोग उसे अदीर्घ, अलोहित, मस्तक-विहीन, कभी अस्त न होनेवाला, अतएव नित्यानन्दरस-स्वरूप, स्पर्शशून्य, अगन्ध, अरस ( रसविहीन ), अचक्षुष्क ( नेत्रविहीन ), अश्रोत्र ( कर्णरहित ), मन तथा वाणीसे परे, अतेजस्क ( अदाहक ), अप्रमाण, सुखकारी, नाम तथा गोत्र से विहीन, मृत्युरहित, जराशून्य, अनामय ( रोगरहित ), अमृत ( मोक्षरूप ) ॐकार शब्दसे प्रतिपाद्य, सुधारूप, अनाच्छादित, पूर्वभागसे शून्य, अपरभागशून्य तथा अन्तरहित कहते हैं । वह ब्रह्म सब कुछ खाता है और वह ब्रह्म कुछ भी नहीं खाता है ॥ ५२-५३ ॥ इस उत्तम पाशुपतयोगमें जिस मनुष्यकी अभिरुचि होती है, वह इस श्रेष्ठ पाशुपत योगको जानकर अन्तकालमें परमेश्वरमें विलीन हो जाता है । ॐकाररूप दीपकको प्रज्वलित करके वायुसे भी अधिक वेगसे गति करनेवाले तथा इन्द्रियोंके स्वामी मनको भलीभाँति नियन्त्रित करके अन्तर्यामी, सूक्ष्म तथा सबके आदिस्वरूप उस परमात्माका अन्वेषण करो । तुम वाग्जालोंमें पड़कर किसलिये वृथा विवाद कर रहे हो । भय तो कुछ भी नहीं दिखायी दे रहा है । अत: तुम अपनी ही देहमें विद्यमान शम्भुको देखो; अन्धकारमय शास्त्रजालमें क्यों भटक रहे हो? इस प्रकार मुमुक्षुको चाहिये कि वह शिवजीके द्वारा मुनियोंके प्रति कहे गये उपदेशपर विद्वानोंके साथ भलीभाँति विचार करके आनन्दरूप आत्मस्वरूपको पंचकोशसे परे करके अभयरूपी मोक्ष प्राप्त करे ॥ ५४–५६ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे पाशुपतव्रतवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' पाशुपतव्रतवर्णन ' नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ ॥

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अध्याय १० ] उमापति शिवके माहात्म्यका वर्णन ६१७ * £ दसवाँ * * £££ * ££££££ अध्याय £££££ KKK ************** उमापति शिवके माहात्म्यका वर्णन तथा शिवके आदेशसे ही सृष्टि- पालन KKKKKKKKKKKKKKKKK आदि सभी कार्यों का संचालन **************** सनत्कुमार उवाच

भूय एव ममाचक्ष्व महिमानमुमापतेः ।

भवभक्त महाप्राज्ञ भगवन्नन्दिकेश्वर ॥ १

शैलादिरुवाच

सनत्कुमारसङ्क्षेपात्तव वक्ष्याम्यशेषतः ।

महिमानं महेशस्य भवस्य परमेष्ठिनः ॥ २

नास्य प्रकृतिबन्धोऽभूद्बुद्धिबन्धो न कश्चन ।

न चाहङ्कारबन्धश्च मनोबन्धश्च नोऽभवत् ॥ ३

चित्तबन्धो न तस्याभूच्छ्रोत्रबन्धो न चाभवत् ।

न त्वचां चक्षुषां वापि बन्धो जज्ञे कदाचन ॥ ४

जिह्वाबन्धो न तस्याभूद्छ्राणबन्धो न कश्चन ।

पादबन्धः पाणिबन्धो वाग्बन्धश्चैव सुव्रत ॥ ५

उपस्थेन्द्रियबन्धश्च भूततन्मात्रबन्धनम् ।

नित्यशुद्धस्वभावेन नित्यबुद्धो निसर्गतः ॥ ६

नित्यमुक्त इति प्रोक्तो मुनिभिस्तत्त्ववेदिभिः ।

अनादिमध्यनिष्ठस्य शिवस्य परमेष्ठिनः ॥ ७

बुद्धिं सूते नियोगेन प्रकृतिः पुरुषस्य च ।

अहङ्कारं प्रसूतेऽस्या बुद्धिस्तस्य नियोगतः ॥ ८

अन्तर्यामीति देहेषु प्रसिद्धस्य स्वयम्भुवः ।

इन्द्रियाणि दशैकं च तन्मात्राणि च शासनात् ॥ ९

अहङ्कारोऽतिसंसूते शिवस्य परमेष्ठिनः ।

तन्मात्राणि नियोगेन तस्य संसुवते प्रभोः ॥ १०

महाभूतान्यशेषेण महादेवस्य धीमतः ।

ब्रह्मादीनां तृणान्तं हि देहिनां देहसङ्गतिम् ॥ ११

महाभूतान्यशेषाणि जनयन्ति शिवाज्ञया ।

अध्यवस्यति सर्वार्थान् बुद्धिस्तस्याज्ञया विभोः ॥ १२

अन्तर्यामीति देहेषु प्रसिद्धस्य स्वयम्भुवः 1 स्वभावसिद्धमैश्वर्यं स्वभावादेव भूतयः ॥ १३

तस्याज्ञया समस्तार्थानहङ्कारोऽतिमन्यते ।

चित्तं चेतयते चापि मनः सङ्कल्पयत्यपि ॥ १४

श्रोत्रं शृणोति तच्छक्त्या शब्दस्पर्शादिकं च यत् ।

शम्भोराज्ञाबलेनैव भवस्य परमेष्ठिनः ॥ १५

सनत्कुमार बोले - हे शिवभक्त! हे महाप्राज्ञ! हे भगवन्! हे नन्दिकेश्वर! आप उमापति शिवजीकी महिमाका पुनः वर्णन कीजिये ॥१ ॥

शैलादि बोले - हे सनत्कुमार! मैं परमेष्ठी भगवान् महेश्वरकी सम्पूर्ण महिमाको आपसे संक्षेपमें ही कहूँगा । इन शिवजीको प्रकृतिका बन्धन तथा बुद्धिका बन्धन कभी नहीं हुआ, इसी प्रकार अहंकारबन्धन तथा मनोबन्धन भी इन्हें नहीं हुआ । उन्हें न तो चित्तका बन्ध हुआ और न तो श्रोत्रका बन्ध हुआ, उन्हें त्वचा और नेत्रका भी बन्ध कभी नहीं हुआ । हे सुव्रत! उन शिवको जिह्वा, घ्राण, पाद, हाथ, वाणी, जननेन्द्रिय और शब्द आदि पाँच गुणोंका भी कोई बन्धन नहीं हुआ । तत्त्ववेत्ता मुनियोंने नित्य शुद्ध स्वभावके कारण उन शिवको नैसर्गिकरूपसे नित्यबुद्ध तथा नित्यमुक्त बतलाया है॥२–६१ / २ | ॥ आदि, मध्य तथा अन्तसे रहित परमेष्ठी पुरुषरूप शिवकी आज्ञासे प्रकृति बुद्धिको उत्पन्न करती है और पुनः उन्हीं शिवके आदेशसे इस प्रकृतिकी बुद्धि अहंकारकी उत्पत्ति करती है । अन्तर्यामीरूपसे देहमें स्थित रहनेवाले प्रसिद्ध स्वयम्भू परमेष्ठी शिवके आदेशसे अहंकार दस इन्द्रियों, मन तथा शब्द आदि तन्मात्राओंको उत्पन्न करता है । उन्हीं धीमान् प्रभु महादेवके आदेशसे ये तन्मात्राएँ आकाशादि महाभूतोंको उत्पन्न करती हैं । तदनन्तर शिवकी आज्ञासे ये सब महाभूत ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त देहधारियोंके देहको उत्पन्न करते हैं । उन्हीं सर्वव्यापी शिवकी आज्ञासे बुद्धि समस्त अर्थोंका निश्चय करती है॥७–१२ ॥ देहोंमें अन्तर्यामीरूपसे प्रसिद्ध स्वयम्भू शिवका ऐश्वर्य स्वभावसिद्ध है और उनकी विभूतियाँ भी स्वभावसे ही हैं । उन्हीं शिवकी आज्ञासे अहंकार सभी अर्थोंका स्वायत्तीकरण करता है, चित्त स्मरण कराता है और मन संकल्प करता है । कान उन्हींकी शक्तिसे श्रवण करता है । उन्हीं परमेष्ठी प्रभु शम्भुके आज्ञाबलसे

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श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग ६१८

वचनं कुरुते वाक्यं नादानादि कदाचन ।

शरीराणामशेषाणां तस्य देवस्य शासनात् ॥

करोति पाणिरादानं न गत्यादि कदाचन ।

सर्वेषामेव जन्तूनां नियमादेव वेधसः ॥

विहारं कुरुते पादो नोत्सर्गादि कदाचन ।

समस्तदेहिवृन्दानां शिवस्यैव नियोगतः ॥

उत्सर्गं कुरुते पायुर्न वदेत कदाचन ।

जन्तोर्जातस्य सर्वस्य परमेश्वरशासनात् ॥

आनन्दं कुरुते शश्वदुपस्थं वचनाद्विभोः ।

सर्वेषामेव भूतानामीश्वरस्यैव शासनात् ॥

अवकाशमशेषाणां भूतानां सम्प्रयच्छति ।

आकाशं सर्वदा तस्य परमस्यैव शासनात् ॥

निर्देशेन शिवस्यैव भेदैः प्राणादिभिर्निजैः ।

बिभर्ति सर्वभूतानां शरीराणि प्रभञ्जनः ॥

निर्देशाद्देवदेवस्य सप्तस्कन्धगतो मरुत् ।

लोकयात्रां वहत्येव भेदैः स्वैरावहादिभिः ॥

नागाद्यैः पञ्चभिर्भेदैः शरीरेषु प्रवर्तते ।

अपदेशेन देवस्य परमस्य समीरणः ॥

हव्यं वहति देवानां कव्यं कव्याशिनामपि ।

पाकं च कुरुते वह्निः शङ्करस्यैव शासनात् ॥

भुक्तमाहारजातं यत्पचते देहिनां तथा ।

उदरस्थः सदा वह्निर्विश्वेश्वरनियोगतः ॥

सञ्जीवयन्त्यशेषाणि भूतान्यापस्तदाज्ञया ।

अविलङ्ख्या हि सर्वेषामाज्ञा तस्य गरीयसी ॥

चराचराणि भूतानि बिभर्त्येव तदाज्ञया ।

आज्ञया तस्य देवस्य देवदेवः पुरन्दरः ॥

जीवतां व्याधिभिः पीडां मृतानां यातनाशतैः ।

विश्वम्भरः सदाकालं लोकैः सर्वैरलङ्घयया ॥

देवान् पात्यसुरान् हन्ति त्रैलोक्यमखिलं स्थितः ।

अधार्मिकाणां वै नाशं करोति शिवशासनात् ॥

ही शब्द - स्पर्श आदि जो भी हैं, वे अपने - अपने १६ विषयोंमें व्यवहार करते हैं । उन्हीं भगवान् शिवके आदेशसे सभी देहधारियोंकी वाणी बोलनेका काम करती है; वह ग्रहण आदिका कार्य कभी नहीं करती । १७ उन्हीं शिव [ बनाये गये ] नियमसे ही सभी प्राणियों का हाथ ग्रहणका कार्य करता है, वह चलने - फिरनेका कार्य १८ कभी नहीं कर सकता । शिवके आदेशसे सभी प्राणिसमुदायका पैर गमनकार्य करता है, वह [ मल १ ९ आदिका ] उत्सर्जन कभी नहीं कर सकता । उन परमेश्वरके आदेशसे सम्पूर्ण प्राणिसमुदायका गुदास्थल उत्सर्जन - कार्य करता है, वह बोलनेका कार्य कभी नहीं २० करता । उन्हीं सर्वव्यापी ईश्वरके वचन तथा आदेशसे सभी प्राणियोंकी जननेन्द्रिय सदा आनन्द प्रदान करती २१ | है ॥ १३ – २० ॥ उन्हीं परमेश्वरके आदेशसे आकाश सभी प्राणियोंको २२ अवकाश प्रदान करता है । उन्हीं शिवके निर्देशसे अपने प्राण आदि भेदोंसे प्रभंजन ( वायु ) सभी प्राणियों के शरीरको धारण करता है । सात स्कन्धोंवाला मरुत् उन्हीं २३ देवदेवके निर्देशपर अपने आवह आदि भेदोंसे स्थित होकर लोकयात्रा करता है । यही वायु परम प्रभु शिवकी २४ आज्ञासे नाग आदि पाँच भेदोंसे शरीरोंमें विद्यमान रहता है ॥ २१ - २४ ॥ २५ शंकरकी आज्ञासे ही अग्नि देवताओंके लिये हव्य तथा पितरोंके लिये कव्यका वहन करती है और भोजनका परिपाक करती है । उदरमें स्थित अग्नि उन २६ विश्वेश्वरके ही आदेशसे प्राणियोंके द्वारा ग्रहण किये गये सम्पूर्ण आहारको पचाती है । जल उन्हींकी आज्ञासे २७ सभी प्राणियोंको जीवन प्रदान करता है । उनकी श्रेष्ठ आज्ञा सबके लिये अनुल्लंघनीय है । पृथ्वी उन्हींकी २८ | आज्ञासे चराचर जीवोंको धारण करती है और उन्हीं देव शिवकी आज्ञासे इन्द्र भी सभी प्राणियोंका पालन करते । यमराज भी उन्हीं शिवकी आज्ञासे जीवित प्राणियोंको २ ९ व्याधियोंसे तथा मृतलोगोंको सैकड़ों प्रकारकी यातनाओंसे कष्ट प्रदान करते हैं । तीनों लोकोंमें हर समय विद्यमान ३० | रहकर भगवान् विष्णु उन्हीं शिवकी सभी लोगोंके द्वारा