लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 671–680
लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 671–680
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अध्याय २४ ] न्यास एवं तत्त्वशुद्धिपूर्वक विविध उपचारोंसे भगवान् सदाशिवकापूजन ६६ ९ शुद्धदीपशिखाकारं भावयेद्भवनाशनम् । स्मरण करना चाहिये । इस प्रकार विधिपूर्वक समस्त कृत्य सम्पन्न करके अपने हृदयकमलमें शुद्ध दीपशिखाके आकारवाले भवनाशक शिवकी भावना करनी चाहिये और शिवलिङ्ग अथवा स्थण्डिलमें प्रभु सदाशिवकी
लिङ्गे च पूजयेद्देवं स्थण्डिले वा सदाशिवम् ॥ ३१ । पूजा करनी चाहिये॥२५–३१ ॥
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवार्चनविधिवर्णनं नाम त्रयोविंशतितमोऽध्यायः ॥ २३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' शिवार्चनविधिवर्णन ' नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २३ ॥
चौबीसवाँ अध्याय न्यास एवं तत्त्वशुद्धिपूर्वक विविध उपचारोंसे भगवान् सदाशिवका पूजन और शिवार्चाका माहात्म्य शैलादिरुवाच
व्याख्यां पूजाविधानस्य प्रवदामि समासतः ।
शिवशास्त्रोक्तमार्गेण शिवेन कथितं पुरा ॥ १
अथोभौ चन्दनचर्चितौ हस्तौ वौषडन्तेनाद्यञ्जलिं कृत्वा मूर्तिविद्याशिवादीनि जप्त्वा अङ्गुष्ठादि -कनिष्ठिकान्त ईशानाद्यं कनिष्ठिकादिमध्यमान्तं हृदयादितृतीयान्तं तुरीयमङ्गुष्ठेनानामिकया पञ्चमं तलद्वयेन षष्ठं तर्जन्यङ्गुष्ठाभ्यां नाराचास्त्रप्रयोगेण पुनरपि मूलं जप्त्वा तुरीयेणावगुण्ठ्य शिवहस्तमित्युच्यते ॥ २ शिवार्चना तेन हस्तेन कार्या ॥ ३ तत्त्वगतमात्मानं व्यवस्थाप्य तत्त्वशुद्धिं पूर्ववत् ॥ ४ क्ष्माम्भोऽग्निवायुव्योमान्तं पञ्चचतुः शुद्धकोट्यन्ते धारासहितेन व्यवस्थाप्य तत्त्वशुद्धिं पूर्वं कुर्यात् ॥ ५ शैलादि बोले - – [ हे सनत्कुमार! ] मैं शिवशास्त्रमें | कही गयी रीति से शिवपूजा - विधिका वर्णन संक्षेपमें कर रहा हूँ, जिसे पूर्व कालमें स्वयं शिवजीने कहा था ॥१ ॥
[ शिवस्नान और भस्मस्नानके पश्चात् ] दोनों हाथोंको चन्दनसे चर्चित करके अन्तमें ' वौषट् ' से युक्त मूलमन्त्रके द्वारा अंजलि बाँधकर मूर्ति, विद्या और अंगमन्त्रोंका जप करके अँगुष्ठसे कनिष्ठिकापर्यन्त ईशान आदि पाँच मन्त्रोंका न्यास करे । [ न्यासक्रम इस प्रकार है- ] पूर्वोक्त अंगमन्त्रोंमेंसे सद्योजातसे लेकर तीसरे अघोर मन्त्रोंका कनिष्ठिका, तर्जनी और मध्यमामें न्यास करे; चौथे मन्त्र ( तत्पुरुषमन्त्र ) - का अंगुष्ठमें और पाँचवें मन्त्रका अनामिकामें और छठे मन्त्रका दोनों हाथोंके दोनों तलोंमें न्यास करे । इसके पश्चात् तर्जनी तथा अंगुष्ठके योगसे नाराच अस्त्र मुद्रा बनाये और फिर मूलमन्त्र ( पंचाक्षरमन्त्र ) - का जप करके चतुर्थ मन्त्रसे | अवगुण्ठन करे; इसे ही शिवहस्त कहा जाता है, उसी हाथसे शिवपूजन करना चाहिये ॥ २-३ ॥ तत्त्वों में विद्यमान आत्माको व्यवस्थित करके पूर्वकी भाँति तत्त्वशुद्धि करनी चाहिये । पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाशपर्यन्त पंचकोशोंका अतिक्रमण करके अहंकार, महत्तत्त्व, प्रकृति और ब्रह्मका भी उल्लंघनकर शुद्धकोटि ( ब्रह्म ) के समीप अमृतधारासहित | सुषुम्णा मार्गसे अपनी आत्माको स्थापित करके सर्वप्रथम
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श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग ६७० तत्त्वशुद्धिः षष्ठेन सद्येन तृतीयेन फडन्ताद्धराशुद्धिः ॥ ६ षष्ठसहितेन सद्येन तृतीयेन फडन्तेन वारितत्त्वशुद्धिः ॥ ७ वाह्नेयतृतीयेन फडन्तेनाग्निशुद्धिः ॥ ८ वायव्यचतुर्थेन षष्ठसहितेन फडन्तेन वायुशुद्धिः ॥ ९ षष्ठेन ससद्येन तृतीयेन फडन्तेनाकाशशुद्धिः ॥ १० उपसंहृत्यैवं सद्यषष्ठेन तृतीयेन मूलेन फडन्तेन ताडनं तृतीयेन सम्पुटीकृत्य ग्रहणं मूलमेव योनिबीजेन सम्पुटीकृत्वा बन्धनं बन्धः ॥ ११ एवं क्षान्तातीतादिनिवृत्तिपर्यन्तं पूर्ववत्कृत्वा प्रणवेन तत्त्वत्रयकमनुध्याय आत्मानं दीपशिखाकारं पुर्यष्टकसहितं त्रयातीतं शक्तिक्षोभेणामृतधारां सुषुम्णायां ध्यात्वा ॥ १२ शान्त्यतीतादिनिवृत्तिपर्यन्तानां चान्तर्नादबिन्द्वकारो-कारमकारान्तं शिवं सदाशिवं रुद्रविष्णुब्रह्मान्तं सृष्टिक्रमेणामृतीकरणं ब्रह्मन्यासं कृत्वा पञ्चवक्त्रेषु पञ्चदशनयनं विन्यस्य मूलेन पादादिकेशान्तं महामुद्रामपि बद्ध्वा शिवोऽहमिति ध्यात्वा शक्त्यादीनि विन्यस्य हृदि शक्त्या बीजाङ्कुरा-नन्तरात्ससुषिरसूत्रकण्टकपत्रकेसरधर्मज्ञानवैराग्यै -श्वर्यसूर्यसोमाग्निवामा - ज्येष्ठा - रौद्रीकाली - कल - | । तत्त्वशुद्धि करनी चाहिये ॥ ४-५ ॥ तत्त्वशुद्धि इस प्रकार होती है — अन्तमें फट्से युक्त छठे ' नमो हिरण्यबाहवे ० ' मन्त्र, सद्योजातमन्त्र तथा तृतीय अघोरमन्त्रसे पृथ्वीतत्त्वकी शुद्धि होती है, फडन्त षष्ठ मन्त्रसहित सद्योजात जलतत्त्वकी शुद्धि होती है, तृतीय अघोरमन्त्रसे अग्नितत्त्वकी षष्ठ मन्त्रसहित वायुसम्बन्धी वायुतत्त्वकी शुद्धि होती है और षष्ठ तथा तृतीय अघोर - मन्त्र से होती है ॥ ६-१० ॥ और तृतीय अघोरमन्त्रसे फडन्त अग्निसम्बन्धी शुद्धि होती है, फडन्त चतुर्थ तत्पुरुषमन्त्रसे फडन्त सद्योजातसहित आकाशतत्त्वकी शुद्धि इस प्रकार पूर्वोक्तका उपसंहार करके सद्योजातमन्त्रके साथ षष्ठ ' नमो हिरण्यबाहवे ० ' और तृतीय ' अघोरेभ्यो ० ' मन्त्रके साथ फडन्त मूलमन्त्र [ पंचाक्षरी ] - से ताड़न करे । तृतीय [ अघोरेभ्यो ० ] मन्त्रसे सम्पुटित मूल [ पंचाक्षरी ] मन्त्रद्वारा ग्रहण करे T । योनि [ ह्रीं ] बीजद्वारा सम्पुटितकर मूल [ पंचाक्षरी ] - से दिग्बन्ध करे ॥ ११ ॥
इक्कीसवें अध्यायमें कहे गये क्षांतातीतादिसे निवृत्तिकलातक सब विधान पूर्ण करके प्रणवद्वारा ब्रह्मा, विष्णु, रुद्ररूप दीपशिखाकार आत्माका ध्यान करके शुद्ध चैतन्यरूपको मूलाधारादि पुर्यष्टकके साथ त्रयातीत [ विश्व तैजस, प्राज्ञादिसे परे ] स्वयंका कुण्डलिनीप्रबोध होनेसे सुषुम्णामें अमृतधारारूपमें ध्यान करे । इसी प्रकार नाद, बिन्दु, अकार, उकार तथा मकारका जिनमें अन्त होता है और जो रुद्र, विष्णु तथा ब्रह्मासे भी अतीत हैं, उन कल्याणकारी सदाशिवका शान्त्यातीता आदिसे निवृत्तिपर्यन्त [ पाँच ] कलाओंका ध्यान करके सृष्टिक्रमसे अमृतीकरण तथा ब्रह्मन्यासकर उनके पाँच मुखोंमें पन्द्रह नेत्रोंका न्यास करे और मूल मन्त्र ( पंचाक्षरमन्त्र ) -के द्वारा पादसे केशपर्यन्त न्यास करके ' महामुद्रा ' मैं शिव हूँ ' – ऐसा ध्यान करे, पुनः शक्ति आदिका न्यास करके हृदयाकाशमें शक्तिके साथ बीज, अंकुर, व्यवधानरहित छिद्र, सूत्र, कण्टक, पत्र, केसर और कर्णिकायुक्त कमलका ध्यान करके उसमें धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, सूर्य, चन्द्र, अग्निका तथा उसके
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अध्याय २४ ] न्यास एवं तत्त्वशुद्धिपूर्वक विविध उपचारोंसे भगवान्
विकरणीबलविकरणीबलप्रमथनीसर्वभूतदमनीः ।
केसरेषु कर्णिकायां मनोन्मनीमपि ध्यात्वा ॥ १३
आसनं परिकल्प्यैवं सर्वोपचारसहितं बहिर्योगोप-चारेणान्तःकरणं कृत्वा नाभौ वह्निकुण्डे पूर्ववदासनं परिकल्प्य सदाशिवं ध्यात्वा बिन्दुतोऽमृतधारां शिवमण्डले निपतितां ध्यात्वा ललाटे महेश्वरं दीपशिखाकारं ध्यात्वा आत्मशुद्धिरित्थं प्राणापानौ संयम्य सुषुम्णया वायुं व्यवस्थाप्य षष्ठेन तालुमुद्रां कृत्वा दिग्बन्धं कृत्वा षष्ठेन स्थानशुद्धिर्वस्त्रादि-दिपूतान्तरर्घ्यपात्रादिषु प्रणवेन तत्त्वत्रयं विन्यस्य तदुपरि बिन्दुं ध्यात्वा त्वम्भसा विपूर्य द्रव्याणि च विधाय अमृतप्लावनं कृत्वा पाद्यपात्रादिषु तेषामर्घ्यवदासनं परिकल्प्य संहितयाभिमन्त्रया-द्येनाभ्यर्च्य द्वितीयेनामृतीकृत्वा तृतीयेन विशोध्य चतुर्थेनावगुण्ठ्य पञ्चमेनावलोक्य षष्ठेन रक्षां विधाय चतुर्थेन कुशपुञ्जेनार्घ्याम्भसाभ्युक्ष्य आत्मानमपि द्रव्याणि पुनरर्थ्याम्भसाभ्युक्ष्य सपुष्पेण सर्वद्रव्याणि पृथक्पृथक् शोधयेत् ॥ १४ सद्येन गन्धं वामेन वस्त्रम् । अघोरेण आभरणं पुरुषेण नैवेद्यम् । ईशानेन पुष्पाणि अथाभिमन्त्रयेत् ॥ १५ शिवगायत्र्या शेषं प्रोक्षयेत् ॥ १६ पञ्चामृतपञ्चगव्यादीनि ब्रह्माङ्गमूलाद्यैरभिमन्त्रयेत् ॥ १७ पृथक्पृथङ्मूलेनार्घ्यं धूपं दत्त्वाचमनीयं च तेषामपि सदाशिवका पूजन ६७१ केसरोंमें वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली, कलविकरणी, बलविकरणी, बलप्रमथनी और सर्वभूतदमनीका तथा उसकी कर्णिकामें मनोन्मनी शक्तिका भी ध्यान करे ॥ १२-१३ ॥ बहिर्योगके उपचारसे अन्तःकरण सामग्री करके पूर्वोक्त प्रकारसे समस्त उपचारसहित आसन कल्पितकर नाभिमें वह्निकुण्डके मध्य पूर्वकी भाँति आसन परिकल्पित | करके उसके ऊपर सदाशिवका चिन्तनकर ललाटमें दीपशिखाके आकारवाले महेश्वरका ध्यान करके बिन्दुसे शिवमण्डलमें गिरती हुई अमृतधाराका ध्यान करे –— इस रूपसे आत्मशुद्धि होती है । प्राण तथा अपानको संयमित करके सुषुम्णाद्वारा वायुको व्यवस्थितकर षष्ठ मन्त्रसे खेचरी मुद्रा बनाकर षष्ठ मन्त्रसे ही दिग्बन्ध करे – इस प्रकारसे शरीरशुद्धि होती है । तदनन्तर वस्त्र आदिके द्वारा सम्यक् पोंछकर पवित्र किये गये अर्घ्यपात्र आदिमें प्रणवके द्वारा तत्त्वत्रयका न्यास करके उनके ऊपर बिन्दुका ध्यानकर जलसे पूर्ण करके पूजाद्रव्योंको व्यवस्थितकर अमृतप्लावन करके पाद्यपात्रोंमें तत्त्व आदिके लिये अर्घ्यकी भाँति आसनकी कल्पना करे; तत्पश्चात् संहितामन्त्रसे अभिमन्त्रित करके प्रथम मन्त्रसे उनका अभ्यर्चन, द्वितीय मन्त्रसे अमृतीकरण, तृतीय मन्त्रसे विशोधन, चतुर्थ मन्त्रसे अवगुण्ठन, पंचम मन्त्रसे अवलोकन और षष्ठ मन्त्रसे रक्षाविधान करे, इसके बाद चतुर्थ मन्त्रसे कुशकूर्चके द्वारा अपने ऊपर तथा द्रव्योंके ऊपर भी अर्घ्यजलसे अभ्युक्षण करके पुनः पुष्पयुक्त अर्घ्यजलसे सभी द्रव्योंका पृथक् - पृथक् शोधन करे ॥ १४ ॥
तत्पश्चात् सद्योजातमन्त्रसे गन्धको, वामदेवमन्त्रसे वस्त्रको, अघोरमन्त्रसे आभरणको, तत्पुरुषमन्त्रसे नैवेद्यको और ईशानमन्त्रसे पुष्पोंको अभिमन्त्रित करना चाहिये; शिवगायत्रीसे शेष अन्य द्रव्योंका प्रोक्षण करना चाहिये । पंचामृत, पंचगव्य आदि पदार्थोंके ब्रह्ममन्त्र, अंगमन्त्र, मूलमन्त्र ( पंचाक्षर बीजमन्त्र ) आदिसे अभिमन्त्रित करना चाहिये । पुनः पृथक् पृथक् उन गन्ध आदि | पूजोपचारोंको मूलमन्त्रके द्वारा अर्घ्य, धूप, आचमनीय
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श्रीलिङ्गमहापुराण | उत्तरभाग ६७२ धेनुमुद्रां च दर्शयित्वा कवचेनावगुण्ठ्यास्त्रेण रक्षां च विधाय द्रव्यशुद्धिं कुर्यात् ॥ १८ अर्ध्वोदकमग्रे हृदा गन्धमादायास्त्रेण विशोध्यं पूजाप्रभृतिकरणं रक्षान्तं कृत्वैवं द्रव्यशुद्धिं पूजासमर्पणान्तं मौनमास्थाय पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा सर्वमन्त्राणि प्रणवादिनमोऽन्ताज्जपित्वा पुष्पाञ्जलिं त्यजेन्मन्त्रशुद्धिरित्थम् ॥ १ ९ अग्रे सामान्यार्घ्यपात्रं पयसापूर्य गन्धपुष्पादिना संहितयाभिमन्त्र्य धेनुमुद्रां दत्त्वा कवचेनाव-गुण्ठ्यास्त्रेण रक्षयेत् । पूजां पर्युषितां गायत्र्या समभ्यर्च्य सामान्यार्घ्यं दत्त्वा गन्धपुष्पधूपाचमनीयं स्वधान्तं नमोऽन्तं वा दत्त्वा ब्रह्मभिः पृथक्पृथक् -पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा फडन्तास्त्रेण निर्माल्यं व्यपोह्य ईशान्यां चण्डमभ्यर्च्यासनमूर्तिं चण्डं सामान्यास्त्रेण
लिङ्गपीठं शिवं पाशुपतास्त्रेण विशोध्य मूर्ध्नि पुष्पं ।
निधाय पूजयेल्लिङ्गशुद्धिः ॥ २०
आसनं कूर्मशिलायां बीजाङ्कुरं तदुपरि ब्रह्मशिला-यामनन्तनालसुषिरे सूत्रपत्रकण्टककर्णिकाकेसर-धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यसूर्यसोमाग्निकेसरशक्तिं मनोन्मनीं कर्णिकायां मनोन्मनेनानन्तासनायेति समासेनासनं परिकल्प्य तदुपरि निवृत्त्यादिकलामयं षड्विधसहितं कर्मकलाङ्गदेहं सदाशिवं भावयेत् ॥ २१ उभाभ्यां सपुष्पाभ्यां हस्ताभ्यामङ्गुष्ठेन पुष्पमापीड्य । | आदि अर्पण करके उन्हें धेनुमुद्रा दिखाकर कवचसे अवगुण्ठन और अस्त्र - मन्त्रसे रक्षाविधान करके द्रव्यशुद्धि करनी चाहिये ॥ १५–१८ ॥ सर्वप्रथम हृदयमन्त्रके द्वारा अर्घ्यदकयुक्त गन्ध लेकर अस्त्रमन्त्रसे शोधन करके पूजनोपयोगी साधन सम्प्रोक्षणसे लेकर [ भूतापसारण, दिग्रक्षणादि ] रक्षाविधान करके ही द्रव्यशुद्धि करे; तब पूजासमर्पणके अन्ततक मौन धारण करके अन्तमें पुष्पांजलि ग्रहण करके आदिमें प्रणव तथा अन्तमें नमः से युक्त सभी पूजा-मन्त्रोंको जपकर पुष्पांजलि छोड़ देनी चाहिये – इस प्रकार मन्त्रशुद्धि होती है ॥ १ ९ ॥ अपने आगे सामान्य अर्घ्यपात्रको जलसे पूर्ण करके उसमें गन्ध - पुष्प आदि डालकर संहितामन्त्रसे उसे अभिमन्त्रित करे और धेनुमुद्रा दिखाकर कवचसे अवगुण्ठन करके अस्त्रमन्त्रसे रक्षा करे । पूर्व दिनके पूजित शिवलिङ्गकी गायत्रीसे अर्चना करके सामान्य अर्घ्य प्रदानकर स्वधा अथवा नमः अन्तमें लगाकर गन्ध, पुष्प, धूप, आचमनीय आदि उपचार अर्पित करके ब्रह्ममन्त्रोंसे पृथक् - पृथक् पुष्पांजलि प्रदान करे; इसके बाद फडन्त अस्त्रमन्त्रसे निर्माल्य उतारकर ईशान दिशामें चण्डका अर्ध्यचन करके आसनमूर्ति चण्डका सामान्य अस्त्रमन्त्रसे और लिङ्गपीठ ( योनि ) तथा शिवलिङ्गका पाशुपतास्त्रमन्त्रसे विशोधन करके लिङ्गके मस्तकपर पुष्प रखकर पूजन करे; इस प्रकार लिङ्गशुद्धि होती है ॥ २० ॥
तत्पश्चात् कूर्मपृष्ठके आसन और उसके ऊपर बीजांकुर, पुनः उसके ऊपर ब्रह्मशिलापर छिद्रयुक्त अनन्त नालके भीतर सूत्र, दल, कण्टक, कर्णिका, केसर, धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, सूर्य, चन्द्र, अग्नि, वामा आदि [ पूर्वकथित आठ ] शक्तियाँ और कर्णिकामें मनोन्मनसहित मनोन्मनीका ध्यान करे । पुनः ‘ अनन्तासनाय नमः ' - इस मन्त्रसे संक्षेपमें आसन कल्पित करके उसके ऊपर निवृत्ति आदि कलायुक्त षट्कोशसहित वेदमूर्ति सदाशिवका चिन्तन करे ॥ २१ ॥
तदनन्तर दोनों हाथोंमें पुष्प ग्रहणकर अंगुष्ठसे
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अध्याय २४ ] न्यास एवं तत्त्वशुद्धिपूर्वक विविध उपचारोंसे भगवान् आवाहनमुद्रया शनैः शनैः हृदयादिमस्तकान्तमारोप्य । हृदा सह मूलं प्लुतमुच्चार्य सद्येन बिन्दुस्था -नादभ्यधिकं दीपशिखाकारं सर्वतोमुखहस्तं व्याप्य-व्यापकमावाह्य स्थापयेत् ॥ २२ पूर्वहृदा शिवशक्तिसमवायेन परमीकरणममृतीकरणं हृदयादिमूलेन सद्येनावाहनं हृदा मूलोपरि वामेन स्थापनं हृदा मूलोपरि अघोरेण सन्निरोधं हृदा मूलोपरि पुरुषेण सान्निध्यं हृदा मूलेन ईशानेन पूजयेदिति उपदेशः ॥ २३ पञ्चमन्त्रसहितेन यथापूर्वमात्मनो देहनिर्माणं तथा देवस्यापि वह्नेश्चैवमुपदेशः ॥ २४ रूपकध्यानं कृत्वा मूलेन नमस्कारान्तमापाद्य स्वधान्तमाचमनीयं सर्वं नमस्कारान्तं वा स्वाहाकारा -न्तमर्घ्यं मूलेन पुष्पाञ्जलिं वौषडन्तेन सर्वं नमस्कारान्तं हृदा वा ईशानेन वा रुद्रगायत्र्या ॐ नमः शिवायेति मूलमन्त्रेण वा पूजयेत् ॥ २५ पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा पुनर्धूपाचमनीयं षष्ठेन पुष्पावसरणं विसर्जनं मन्त्रोदकेन मूलेन संस्नाप्य सर्वद्रव्या-भिषेकमीशानेन प्रतिद्रव्यमष्टपुष्पं दत्त्वैवमर्घ्यं च गन्धपुष्पधूपाचमनीयं फडन्तास्त्रेण पूजापसरणं शुद्धोदकेन मूलेन संस्नाप्य पिष्टामलकादिभिः ॥ २६ उष्णोदकेन हरिद्राद्येन लिङ्गमूर्ति पीठसहितां विशोध्य गन्धोदकहिरण्योदकमन्त्रोदकेन रुद्राध्यायं पठमानः नीलरुद्रत्वरितरुद्रपञ्चब्रह्मादिभिः नमः शिवायेति स्नापयेत् ॥ २७ सदाशिवका पूजन ६७३ पुष्पको दबाकर आवाहनमुद्राके द्वारा धीरे - धीरे हृदयसे मस्तकपर्यन्त आरोपण करके हृदयमन्त्रसहित मूलमन्त्र ( पंचाक्षरमन्त्र ) - को उच्च स्वरमें उच्चारित करके बिन्दुस्थानसे भी अधिक दीपशिखाकार और सभी ओर मुख तथा हाथ करके व्याप्त उन व्यापक परमेश्वरको सद्योजातमन्त्रसे आवाहितकर स्थापित करना चाहिये ॥ २२ ॥
पहले हृदयमन्त्रसे शिवशक्तिके तादात्म्यसे एकीकरण तथा अमृतीकरण करे; पुनः हृदयमन्त्रपूर्वक मूलमन्त्रसहित सद्योजातमन्त्रसे आवाहन करके हृदयमन्त्र तथा मूलमन्त्रयुक्त वामदेवमन्त्रसे स्थापन और इसी प्रकार हृदयमन्त्र एवं मूलमन्त्रसहित अघोर मन्त्रसे सन्निरोधन करे; इसके बाद हृदयमन्त्र तथा मूलमन्त्रसहित तत्पुरुषमन्त्रसे सान्निध्य करे । तदनन्तर हृदयमन्त्र और मूलमन्त्रयुक्त ईशानमन्त्रसे पूजन करे – यह उपदेश है । पूर्वमें जिस प्रकार पाँच मन्त्रोंसे अपना देहनिर्माण किया, उसी प्रकार देवता तथा अग्निका भी देहनिर्माण करना चाहिये - ऐसा उपदेश है । २३-२४ ॥ मूलमन्त्र ( ॐ नमः शिवाय ) - को नमस्कारान्त बोलकर सदाशिवके प्रतिबिम्बका ध्यान करके, आचमनीय देते समय मन्त्रको स्वधान्त अथवा सब कुछ नमस्कारान्त ही करे । अर्घ्यदानमें मूलमन्त्रको स्वाहान्त बोले, पुष्पांजलि वौषट्युक्त मूलमन्त्रसे अथवा सर्वत्र नमस्कारान्त हृदयमन्त्रसे, ईशानमन्त्रसे, रुद्रगायत्रीसे अथवा ' ॐ नमः शिवाय'-इस मूलमन्त्रसे पूजा करे । तत्पश्चात् पुष्पांजलि देकर धूप तथा आचमनीय अर्पण करे । इसके बाद षष्ठ मन्त्रसे पुष्पोंको उतारकर पूजाका विसर्जन करके मूलमन्त्रद्वारा शुद्ध जल, पंचामृत आदि द्रव्योंसे स्नान कराये । प्रत्येक द्रव्यके स्नानमें ईशानमन्त्रसे आठ - आठ पुष्पांजलि देकर अर्घ्य, गन्ध, पुष्प, धूप, आचमनीय आदि अर्पण करे; पुनः फडन्त अस्त्रमन्त्रसे पूजाद्रव्योंको [ शिवलिङ्गसे ] हटाकर पिसे हुए आमलक आदिसे युक्त शुद्ध जलसे मूलमन्त्रके द्वारा स्नान कराकर हरिद्रा आदिके चूर्णसे युक्त उष्ण जलसे पीठसहित शिवलिङ्गका शोधनकर गन्ध - हिरण्यसमन्वित | अभिमन्त्रित जलके द्वारा रुद्राध्यायका पाठ करते हुए एवं नीलरुद्र, त्वरितरुद्र, पंचब्रह्म तथा नमः शिवाय - इन मन्त्रोंसे
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६७४ श्रीलिङ्गमहापुराण | उत्तरभाग मूर्ध्नि पुष्पं निधायैवं न शून्यं लिङ्गमस्तकं कुर्यादत्र
श्लोकः ॥ २८
यस्य राष्ट्रे तु लिङ्गस्य मस्तकं शून्यलक्षणम् ।
तस्यालक्ष्मीर्महारोगो दुर्भिक्षं वाहनक्षयः ॥ २ ९
तस्मात्परिहरेद्राजा धर्मकामार्थमुक्तये ।
शून्ये लिङ्गे स्वयं राजा राष्ट्रं चैव प्रणश्यति ॥ ३०
एवं सुस्नाप्यार्घ्यं च दत्त्वा सम्मृज्य वस्त्रेण गन्धपुष्पवस्त्रालङ्कारादींश्च मूलेन दद्यात् ॥ ३१ धूपाचमनीयदीपनैवेद्यादींश्च मूलेन प्रधानेनोपरि पूजनं पवित्रीकरणमित्युक्तम् ॥ ३२ आरार्तिदीपादींश्चैव धेनुमुद्रामुद्रितानि कवचेनाव -गुण्ठितानि षष्ठेन रक्षितानि लिङ्गोपरि लिङ्गे च लिङ्गस्याधः साधारणं च दर्शयेत् ॥ ३३ मूलेन नमस्कारं विज्ञाप्यावाहनस्थापनसन्निरोध-सान्निध्यपाद्याचमनीयार्घ्यगन्धपुष्पधूपनैवेद्या-चमनीयहस्तोद्वर्तनमुखवासाद्युपचारयुक्तं ब्रह्माङ्ग-भोगमार्गेण पूजयेत् ॥ ३४ सकलध्यानं निष्कलस्मरणं परावरध्यानं मूलमन्त्रजपः । दशांशं ब्रह्माङ्गजपसमर्पणमात्म-निवेदनस्तुतिनमस्कारादयश्च गुरुपूजा च पूर्वतो दक्षिणे विनायकस्य ॥ ३५
आदौ चान्ते च सम्पूज्यो विघ्नेशो जगदीश्वरः ।
दैवतैश्च द्विजैश्चैव सर्वकर्मार्थसिद्धये ॥ ३६
यः शिवं पूजयेदेवं लिङ्गे वा स्थण्डिलेऽपि वा ।
स याति शिवसायुज्यं वर्षमात्रेण कर्मणा ॥ ३७ ।
। स्नान कराना चाहिये ॥ २५-२७ ॥
शिवलिङ्गके मस्तकपर पुष्प रखकर ही अभिषेक करना चाहिये; लिङ्गमस्तकको शून्य नहीं रखना चाहिये । | इस सम्बन्धमें यह श्लोक है— जिस राजाके राष्ट्रमें लिङ्गका मस्तक बिल्वपत्र या पुष्पसे शून्य रहता है, उसके यहाँ लक्ष्मीशून्यता, महारोग, दुर्भिक्ष तथा वाहनोंका क्षय होता है । अतः धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप चतुर्विधपुरुषार्थकी प्राप्तिके लिये राजाको चाहिये कि शिवलिङ्गके मस्तकको शून्य न रखे; लिङ्गके शून्य रहनेपर स्वयं राजा तथा राष्ट्र - दोनों ही नष्ट हो जाते हैं ॥ २८-३० ॥ इस प्रकार सम्यक् स्नान कराकर अर्घ्य अर्पण करके वस्त्रसे [ शिवलिङ्गको ] भलीभाँति पोंछकर मूलमन्त्रके द्वारा गन्ध, पुष्प, वस्त्र, अलंकार, धूप, आचमनीय, दीप, नैवेद्य आदि प्रदान करना चाहिये । शिवलिङ्गके मस्तकपर केवल प्रणवके द्वारा पूजनको पवित्रीकरण कहा गया है । आरती तथा दीप, धेनुमुद्रा बनाकर कवचसे अवगुण्ठनकर तथा षष्ठ मन्त्रसे रक्षण करके लिङ्गके मस्तकपर, लिङ्गके मध्य भागमें तथा लिङ्गके अधोभागमें प्रदर्शित करना चाहिये । मूल मन्त्रसे नमस्कार करके आवाहन, स्थापन, सन्निरोधन, सान्निध्य, पाद्य, आचमनीय, अर्घ्य, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमनीय, हस्तोद्वर्तन, मुखवास आदि उपचार निवेदित करके ब्रह्ममन्त्रस्वरूप पाद आदि अंगोंकी उपचार-क्रमसे पूजा करनी चाहिये॥३१–३४ ॥ पूजाके अनन्तर सकल ( सगुण ) ध्यान, निष्कल ( निर्गुण ) ध्यान, परावर ध्यान, मूलमन्त्रजप, ब्रह्ममन्त्र तथा अंगमन्त्रका दशांशजप, समर्पण, आत्मनिवेदन, स्तुति, नमस्कार आदि करके पूर्वभागमें गुरुपूजा तथा दक्षिण भागमें विनायक गणपतिकी पूजा करनी चाहिये । देवताओं तथा ब्राह्मणोंको समस्त मनोरथोंकी सिद्धिके लिये आदिमें तथा अन्तमें जगत् के स्वामी विघ्नेश्वर श्रीगणेशकी सम्यक् प्रकार पूजा करनी चाहिये ॥ ३५-३६ ॥ जो लिङ्ग अथवा स्थण्डिलमें शिवकी पूजा करता है, वह केवल एक ही वर्षमें अपने इस कर्मके 1985 Lingamahapuran_Section_23_1_Back
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अध्याय २५ ] शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड - मेखला
लिङ्गार्चकश्च षण्मासान्नात्र कार्या विचारणा ।
सप्त प्रदक्षिणाः कृत्वा दण्डवत्प्रणमेद्बुधः ॥ ३८
प्रदक्षिणक्रमपादेन अश्वमेधफलं शतम् ।
तस्मात्सम्पूजयेन्नित्यं सर्वकर्मार्थसिद्धये ॥ ३ ९
भोगार्थी भोगमाप्नोति राज्यार्थी राज्यमाप्नुयात् ।
पुत्रार्थी तनयं श्रेष्ठं रोगी रोगात्प्रमुच्यते ॥ ४०
यान् यांश्चिन्तयते कामांस्तांस्तान् प्राप्नोति मानवः ॥ ४१ ।
निर्माण हवन - विधानका वर्णन ६७५ प्रभावसे शिवसायुज्य प्राप्त कर लेता है । केवल शिवलिङ्गकी पूजा करनेवाला छ: मासमें ही शिवसायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये । बुद्धिमान् भक्तको चाहिये कि [ पूजाके अनन्तर ] सात प्रदक्षिणा करके दण्डवत् प्रणाम करे ॥ ३७-३८ ॥ प्रदक्षिणामें एक - एक पगके द्वारा सौ - सौ अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है । अतः समस्त मनोरथोंकी सिद्धिके लिये सम्यक् प्रकारसे [ भगवान् शिवकी ] नित्य पूजा करनी चाहिये । [ इस पूजनसे ] भोगकी अभिलाषा रखनेवाला भोग सुख प्राप्त करता है, राज्यकी कामना करनेवाला राज्य प्राप्त करता है, पुत्रकी इच्छा रखनेवाला उत्तम पुत्र प्राप्त करता है और रोगी रोगसे मुक्त हो जाता है । मनुष्य जिन - जिन मनोरथोंको सोचता है, उन्हें प्राप्त कर लेता है ॥ ३ ९ –४१ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे लिङ्गार्चनविधानं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' लिङ्गार्चनविधान ' नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २४ ॥
पचीसवाँ अध्याय शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड - मेखला - निर्माण, अरणिमन्थन, पात्रासादन, आज्यसंस्कार, अग्निसंस्कार तथा हवन - विधानका वर्णन शैलादिरुवाच
शिवाग्निकार्यं वक्ष्यामि शिवेन परिभाषितम् ।
जनयित्वाग्रतः प्राचीं शुभे देशे सुसंस्कृते ॥ १
पूर्वाग्रमुत्तराग्रं च कुर्यात्सूत्रत्रयं शुभम् ।
चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे कुर्यात्कुण्डानि यत्नतः ॥ २
नित्यहोमाग्निकुण्डं च त्रिमेखलसमायुतम् ।
चतुस्त्रिद्व्यङ्गुलायामा मेखला हस्तमात्रतः ॥ ३
हस्तमात्रं भवेत्कुण्डं योनिः प्रादेशमात्रतः ।
अश्वत्थपत्रवद्योनिं मेखलोपरि कल्पयेत् ॥ ४ ।
शैलादि बोले— [ हे सनत्कुमार! ] अब मैं शैव-अग्निकार्यका वर्णन करूँगा, जिसे [ स्वयं ] शिवजीने कहा है । सर्वप्रथम [ दिक्साधनके विधानसे ] पूर्व दिशाका निर्धारण करके शुभ तथा परिष्कृत भूमिपर पवित्र तीन सूत पूर्वाग्र तथा तीन सूत उत्तराग्र रखकर चतुष्कोणीय निर्मित की गयी भूमिमें यत्नपूर्वक कुण्ड बनाना चाहिये॥१-२ ॥ नित्यहोमके लिये तीन मेखलाओंसे युक्त अग्निकुण्ड होना चाहिये । तीनों मेखलाएँ एक हाथ प्रमाणकी तथा चार अँगुल, तीन अँगुल और दो अँगुल ऊँचाईकी बनानी चाहिये । कुण्ड एक हाथ प्रमाणका होना चाहिये तथा योनि प्रादेशमात्र ( अँगूठे तथा तर्जनी अँगुलीके बीच की दूरी ) होनी चाहिये । मेखलाके ऊपर अश्वत्थ ( पीपल ) -के पत्तेके आकारकी योनि बनानी चाहिये ॥ ३-४ ॥ 1985 Lingamahapuran_Section_23_2_Front
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६७६ 3 38 36 36 36 36 36 36 36 कुण्डमध्ये तु नाभिः स्यादष्टपत्रं सकर्णिकम् प्रादेशमात्रं विधिना कारयेद्ब्रह्मणः सुत षष्ठेनोल्लेखनं प्रोक्तं प्रोक्षणं वर्मणा स्मृतम् । नेत्रेणालोक्य वै कुण्डं षड्रेखाः कारयेद्बुधः प्रागायतेन विप्रेन्द्र ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः । उत्तराग्राः शिवा रेखाः प्रोक्षयेद्वर्मणा पुनः शमीपिप्पलसम्भूतामरणीं षोडशाङ्गुलाम् श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 35 36 36 36 36 35 36 36 36 36 36 36 36 35 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 । हे ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार! कुण्डके मध्यमें नाभि *** ॥ ५ होनी चाहिये; उसे विधिपूर्वक अष्टदलीय, कर्णिकायुक्त और प्रादेशमात्र प्रमाणकी निर्मित करानी चाहिये । 366 अस्त्रमन्त्रसे उल्लेखन करना कहा गया है तथा कवचमन्त्रसे ॥ ६ प्रोक्षण करना बताया गया है; बुद्धिमान्को चाहिये कि कुण्डको नेत्रमन्त्रसे देखकर छः रेखाएँ बनाये । हे विप्रेन्द्र! पूर्वाग्र तीन रेखाएँ ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वरस्वरूप ॥ ७ हैं और उत्तराग्र रेखाएँ शिवस्वरूप हैं । इसके बाद कवचमन्त्रसे पुनः प्रोक्षण करना चाहिये ॥५–७ ॥ । शमीगर्भस्थ पीपलके काष्ठकी बनी हुई सोलह मथित्वा वह्निबीजेन शक्तिन्यासं हृदैव तु ॥ ८ प्रक्षिपेद्विधिना वह्निमन्वाधाय यथाविधि तूष्णीं प्रादेशमात्रैस्तु याज्ञिकैः शकलैः शुभैः ॥
परिसम्मोहनं कुर्याज्जलेनाष्टसु दिक्षु वै ।
परिस्तीर्य विधानेन प्रागाद्येवमनुक्रमात् ॥
उत्तराग्रं पुरस्ताद्धि प्रागग्रं दक्षिणे पुनः । पश्चिमे अँगुल प्रमाणकी अरणीद्वारा वह्निबीज ( रं ) - से मन्थन । करके और हृदयमन्त्रसे शक्तिन्यास करके अग्नि उत्पन्न ९ करनी चाहिये । इसके बाद मौन होकर विधिपूर्वक उसे अग्निकुण्डमें रख देना चाहिये । विधानके अनुसार अग्न्याधान करके शान्तिपूर्वक प्रादेशप्रमाणके यज्ञसम्बन्धी १० शुभ काष्ठकी समिधाओंको उसपर प्राक् आदिके क्रमसे विधिपूर्वक व्यवस्थित करके जलके द्वारा आठों दिशाओंमें परिसम्मोहन करना चाहिये । पूरबमें उत्तराग्र, चोत्तराग्रं तु सौम्ये पूर्वाग्रमेव तु ॥ ११ दक्षिणमें पूर्वाग्र, पश्चिममें उत्तराग्र और उत्तरमें पूर्वाग्र
ऐन्द्रे चैन्द्राग्नमावाह्य याम्य एवं विधीयते ।
सौम्यस्योपरि चान्द्राग्नं वारुणाग्नमधस्ततः ॥
द्वन्द्वरूपेण पात्राणि बर्हिः ष्वासाद्य सुव्रत ।
अधोमुखानि सर्वाणि द्रव्याणि च तथोत्तरे ॥
तस्योपरि न्यसेद्दर्भाञ्छिवं दक्षिणतो न्यसेत् ।
पूजयेन्मूलमन्त्रेण पश्चाद्धोमं समाचरेत् ॥
प्रोक्षणीपात्रमादाय पूरयेदम्बुना पुनः ।
प्रादेशमात्रौ तु कुशौ स्थापयेदुदकोपरि ॥
प्लावयेच्च कुशाग्रं तु वसोः सूर्यस्य रश्मिभिः ।
विकीर्य सर्वपात्राणि सुसम्प्रोक्ष्य विधानतः ॥
प्रणीतापात्रमादाय पूरयेदम्बुना पुनः ।
अन्योदककुशाग्रैस्तु सम्यगाच्छाद्य सुव्रत ॥
कुश बिछाना चाहिये ॥ ८–११ ॥
१२ पूर्व दिग्भागमें इन्द्राग्निदैवतका आवाहन करके दक्षिण दिग्भागमें यामाग्नि, उत्तर दिग्भागमें चान्द्राग्नि और इसके बाद पश्चिम दिग्भागमें वारुणाग्निका आवाहन १३ किया जाता है । हे सुव्रत! पात्रोंको द्वन्द्वरूपमें अधोमुख करके कुशाओंपर रखकर तथा सभी द्रव्योंको उत्तर भागमें रखकर उसके ऊपर कुशोंको रख देना चाहिये । १४ दक्षिण भागमें शिवको स्थापित बाद मूलमन्त्रसे पूजन करना चाहिये हवन करना चाहिये ॥ १२ – १४ ॥ १५ तदनन्तर प्रोक्षणीपात्र लेकर चाहिये और फिर प्रादेशप्रमाणके १६ | ऊपर स्थापित कर देना चाहिये करना चाहिये; इसके , तत्पश्चात् विधिपूर्वक उसे जलसे भर देना दो कुशोंको जल । अग्नि तथा सूर्यकी किरणोंसे कुशाग्रको प्लावित करना चाहिये । तदनन्तर सभी पात्रोंको फैलाकर विधिपूर्वक प्रोक्षण करके १७ | प्रणीतापात्रको लेकर उसे पुनः जलसे पूर्ण करना 1985 Lingamahapuran_Section_23_2_Back
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अध्याय २५ ] शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड -हस्ताभ्यां नासिकं पात्रमैशान्यां दिशि विन्यसेत् । आज्याधिश्रयणं कुर्यात्पश्चिमोत्तरतः शुभम् ॥
भस्ममिश्रांस्तथाङ्गारान् ग्राहयेत्सकलेन वै ।
पश्चिमोत्तरतो नीत्वा तत्र चाज्यं प्रतापयेत् ॥
कुशानग्नौ तु प्रज्वाल्य पर्यग्निं त्रिभिराचरेत् ।
तान् सर्वांस्तत्र निःक्षिप्य चाग्रे चाज्यं निधापयेत् ॥
अङ्गुष्ठमात्रौ तु कुशौ प्रक्षाल्य विधिनैव तु ।
पर्यग्निं च ततः कुर्यात्तैरेव नवभिः पुनः ॥
पर्यग्निं च पुनः कुर्यात्तदाज्यमवरोपयेत् ।
अथापकर्षयेत्पात्रं क्रमेणोत्तरपश्चिमे ॥
संयुज्य चाग्निं काष्ठेन प्रक्षाल्यारोप्य पश्चिमे ।
आज्यस्योत्पवनं कुर्यात्पवित्राभ्यां सहैव तु ॥
पृथगादाय हस्ताभ्यां प्रवाहेण यथाक्रमम् ।
अङ्गुष्ठानामिकाभ्यां तु उभाभ्यां मूलविद्यया ॥
अभ्युक्ष्य दापयेदग्नौ पवित्रे घृतपङ्किते ।
सौवर्णं स्स्रुक्स्स्रुवं कुर्याद्रनिमात्रेण सुव्रत ॥
राजतं वा यथान्यायं सर्वलक्षणसंयुतम् ।
अथवा याज्ञिकैर्वृक्षैः कर्तव्यौ स्स्रुक्स्नुवावुभौ ॥
अरत्निमात्रमायामं तत्पोत्रे तु बिलं भवेत् ।
षडङ्गुलपरीणाहं दण्डमूलं महामुने ॥
तदर्थं कण्ठनालं स्यात्पुष्करं मूलवद्भवेत् ।
गोबालसदृशं दण्डं स्रुवाग्रं नासिकासमम् ॥
पुटद्वयसमायुक्तं मुक्ताद्येन प्रपूरितम् ।
षट्त्रिंशदङ्गुलायाममष्टाङ्गुलसविस्तरम् ॥
मेखला निर्माण हवन - विधानका वर्णन ६७७ चाहिये । हे सुव्रत! इसके बाद जलमें रखी अन्य १८ कुशाओंके द्वारा उसे भलीभाँति आच्छादित करके दोनों हाथोंसे नासिकापर्यन्त उस पात्रको उठाकर ईशान दिशामें स्थापित कर देना चाहिये ॥ १५-१७ ॥ १ ९ तत्पश्चात् वायव्य कोणमें शुभ आज्याश्रयण ( घृतस्थापन ) करना चाहिये । भस्मयुक्त अंगारोंको लेना चाहिये और उसे वायव्य दिशामें रखकर उसके ऊपर २० घृतको तपाना चाहिये । तदनन्तर कुशोंको अग्निमें प्रज्वलित करके तीन कुशोंसे पर्यग्निकरण करना चाहिये । फिर उन सभी कुशोंको उस कुण्डमें डालकर २१ घृतको अपने सम्मुख रख लेना चाहिये । इसके बाद अँगुष्ठप्रमाणके दो कुशोंको विधिवत् प्रक्षालित करके उन कुशोंसे तथा अन्य नौ कुशोंसे पर्यग्नि करनी चाहिये, २२ इसके बाद फिर पर्यग्नि करनी चाहिये । तदनन्तर घृतको अग्निपरसे उतार लेना चाहिये और घृतपात्रको क्रमसे उत्तर - पश्चिम दिशामें रख देना चाहिये ॥ १८-२२ ॥ २३ तदनन्तर उपवेषणकाष्ठद्वारा अग्निका संयोजन करके पश्चिम दिशामें रखकर उसे प्रक्षालित करके दोनों हाथोंकी अँगुष्ठ और अनामिका अँगुलियोंद्वारा २४ याज्ञिकोक्त पद्धतिके अनुसार दो पवित्रियोंको ग्रहण करके मूलमन्त्रके द्वारा आज्योत्पवन करना चाहिये । उसके बाद घृतसे भीगी हुई दोनों पवित्रियोंका अभ्युक्षण २५ करके उन्हें अग्निमें डाल देना चाहिये ॥ २३-२४१ / २ ॥ हे सुव्रत! सोने अथवा चाँदीका स्रुक् स्रुव बनाना चाहिये, जो एक हाथ लम्बा हो तथा सभी लक्षणोंसे २६ सम्पन्न हो अथवा यज्ञीय वृक्षोंसे ही स्रुक् - स्रुवाका निर्माण करना चाहिये ॥ २५-२६ ॥ स्रुव एक हाथ प्रमाणका और उसके मुखपर गहरा २७ गर्त होना चाहिये । हे महामुने! उस स्रुवका दण्डमूल छ: अंगुल चौड़ा और कण्ठनाल तीन अँगुल चौड़ा होना चाहिये । उसका मुख भी मूलकी भाँति बनाना चाहिये । २८ स्रुवका दण्ड गायकी पूँछके सदृश ऊपर मोटा और क्रमशः नीचेकी ओर पतला होना चाहिये; उसका अग्रभाग नासिकाके समान दो पुटोंसे युक्त तथा मुक्ता २ ९ आदिसे समन्वित होना चाहिये ॥ २७-२८१ / २ ॥
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६७८ उत्सेधस्तु तदर्थं स्यात्सूत्रेण समितं ततः सप्ताङ्गुलं भवेदास्यं विस्तरायामतः पुनः
त्रिभागैकं भवेदग्रं कृत्वा शेषं परित्यजेत् ।
कण्ठं च द्व्यङ्गुलायामं विस्तारं चतुरङ्गुलम् ॥
वेदिरष्टाङ्गुलायामा विस्तारस्तत्प्रमाणतः । तस्य मध्ये बिलं कुर्याच्चतुरङ्गुलमानतः बिलं सुवर्तितं कुर्यादष्टपत्रं सुकर्णिकम् । श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग । पूर्णाहुतिमें प्रयुक्त होनेवाला स्रुव छत्तीस अँगुल ॥ ३० लम्बा, आठ अँगुल चौड़ा और चार अँगुल मोटा बनाना चाहिये । सूतके द्वारा उसे सम कर लेना चाहिये । उस स्रुवका मुख सात अँगुल चौड़ा होना चाहिये और बारह ३१ अँगुल लम्बा होना चाहिये । स्रुव का कण्ठ दो अँगुल लम्बा और चार अँगुल चौड़ा होना चाहिये ॥ २ ९ - ३१ ॥ वेदी आठ अँगुल लम्बी तथा उतने ही प्रमाणकी ॥ ३२ अर्थात् आठ अँगुल चौड़ी होनी चाहिये । उसके मध्यमें चार अँगुल प्रमाणका गर्त बनाना चाहिये । गर्त पूर्णरूपसे गोल, अष्टदलयुक्त और सुन्दर कर्णिकामय निर्मित परितो बिलबाह्ये तु पट्टिकार्धाङ्गुलेन तु ॥३३ करना चाहिये । उस गर्तके बाहर चारों ओर आधे
तद्बाह्ये च विनिद्रं तु पद्मपत्रविचित्रितम् ।
यवद्वयप्रमाणेन तद्बाह्ये पट्टिका भवेत् ॥
वेदिकामध्यतो रन्ध्रं कनिष्ठाङ्गुलमानतः । खातं यावन्मुखान्तः स्याद् बिलमानं तु निम्नगम्
दण्डं षडङ्गुलं नालं दण्डाग्रे दण्डिकात्रयम् ।
अर्धाङ्गुलविवृद्धया तु कर्तव्यं चतुरङ्गुलम् ॥
त्रयोदशाङ्गुलायामं दण्डमूले घटं भवेत् ।
द्व्यङ्गुलस्तु भवेत्कुम्भो नाभिं विद्याद्दशाङ्गुलम् ॥
वेदिमध्ये तथा कृत्वा पादं कुर्याच्च द्व्यङ्गुलम् ।
पद्मपृष्ठसमाकारं पादं वै कर्णिकाकृतिम् ॥
गजोष्ठसदृशाकारं तस्य पृष्ठाकृतिर्भवेत् ।
अभिचारादिकार्येषु कुर्यात्कृष्णायसेन तु ॥
पञ्चविंशत्कुशेनैव स्रुक्स्स्रुवौ मार्जयेत्पुनः ।
अग्रमग्रेण संशोध्य मध्यं मध्येन सुव्रत ॥
मूलं मूलेन विधिना अग्नौ ताप्य हृदा पुनः ।
आस्थाली प्रणीता च प्रोक्षणी तिस्र एव च ॥
सौवर्णी राजती वापि ताम्री वा मृन्मयी तु वा ।
अन्यथा नैव कर्तव्यं शान्तिके पौष्टिके शुभे ॥
अँगुलप्रमाणकी पट्टिका, पट्टिकाके बाहर विकसित ३४ सुन्दर कमल और पुनः उसके बाहर दो यव- प्रमाणकी पट्टिकाकी रचना करनी चाहिये ॥ ३२ - ३४ ॥ वेदीके मध्यमें कनिष्ठा अँगुलिके प्रमाणसे मुखपर्यन्त ॥ ३५ गम्भीर प्रवाहवाला छिद्र होना चाहिये । दण्डका मूल छः अँगुल - प्रमाणका होना चाहिये, दण्डके अग्रभागमें चार के बीच आधे अँगुलकी वृद्धिसे तीन दण्डिकाएँ ३६ बनानी चाहिये । दण्डके अग्रभागमें तेरह अँगुल विस्तारमें घट ( शिर ) होना चाहिये, उसका कण्ठ दो ३७ अँगुल और नाभि अर्थात् मध्य भाग दस अँगुल होना चाहिये । वेदीके मध्यमें वैसे ही दस अँगुलकी पद्मपृष्ठके | आकारकी नाभि बनाकर दो अँगुल- प्रमाणका कर्णिकाके ३८ आकृतिसदृश पाद बनाना चाहिये । उस स्रुवके पृष्ठकी आकृति हाथीके ओष्ठके आकारसदृश होनी चाहिये । अभिचार आदि कर्मोंमें कृष्ण लौहसे स्रुक् स्रुवका ३ ९ निर्माण करना चाहिये । तदनन्तर पचीस कुशोंके द्वारा स्रुक् - स्रुवका मार्जन करना चाहिये । हे सुव्रत! [ स्रुक्-स्रुवके ] अग्रभागको कुशके अग्रभागसे, मध्यभागको ४० मध्य भागसे और मूलको मूलसे शोधित करके पुनः भलीभाँति हृदयमन्त्रका उच्चारण करके अग्निमें उन्हें ४ ९ तपाना चाहिये ॥ ३५ - ४० ९ २ ॥ आज्यस्थाली, प्रणीता और प्रोक्षणी - ये तीनों ही पात्र सोने, चाँदी, ताम्र अथवा मिट्टीके होने चाहिये । ४२ | शान्तिक तथा पौष्टिक शुभ कर्ममें अन्य धातुके पात्रोंका