लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 681–690

लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 681–690

पृष्ठ 681

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अध्याय २५ ] शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड- मेखला आयसी त्वभिचारे तु शान्तिके मृन्मयी तु वा । ££££££ षडङ्गुलं सुविस्तीर्णं पात्राणां मुखमुच्यते ॥ ४३

प्रोक्षणी द्व्यङ्गुलोत्सेधा प्रणीता द्व्यङ्गुलाधिका ।

आज्यस्थाली ततस्तस्या उत्सेधो द्व्यङ्गुलाधिकः ॥ ४४

************************************

यैः समिद्भिर्हुतं प्रोक्तं तैरेव परिधिर्भवेत् ।

मध्याङ्गुलपरीणाहा अवक्रा निर्व्रणाः समाः ॥ ४५ ।

द्वात्रिंशदङ्गुलायामास्तिस्रः परिधयः स्मृताः ।

द्वात्रिंशदङ्गुलायामैस्त्रिंशद्दभैः परिस्तरेत् ॥ ४६

चतुरङ्गुलमध्ये तु ग्रथितं तु प्रदक्षिणम् ।

अभिचारादिकार्येषु शिवाग्न्याधानवर्जितम् ॥ ४७

अकोमलाः स्थिरा विप्र सङ्ग्राह्यास्त्वाभिचारिके ।

समग्राः सुसमाः स्थूलाः कनिष्ठाङ्गुलसम्मिताः ॥ ४८

अवक्रा निर्व्रणाः स्निग्धा द्वादशाङ्गुलसम्मिताः ।

समिधस्थं प्रमाणं हि सर्वकार्येषु सुव्रत ॥ ४ ९

गव्यं घृतं ततः श्रेष्ठं कापिलं तु ततोऽधिकम् ।

आहुतीनां प्रमाणं तु स्रुवं पूर्णं यथा भवेत् ॥ ५० ।

अन्नमक्षप्रमाणं स्याच्छुक्तिमात्रेण वै तिलः ।

यवानां च तदर्धं स्यात्फलानां स्वप्रमाणतः ॥ ५१

क्षीरस्य मधुनो दध्नः प्रमाणं घृतवद्भवेत् ।

चतुःस्रुवप्रमाणेन स्रुचा पूर्णाहुतिर्भवेत् ॥ ५२

तदर्धं स्विष्टकृत्प्रोक्तं शेषं सर्वमथापि वा ।

शान्तिकं पौष्टिकं चैव शिवाग्नौ जुहुयात्सदा ॥ ५३

लौकिकाग्नौ महाभाग मोहनोच्चाटनादयः ।

शिवाग्निं जनयित्वा तु सर्वकर्मणि सुव्रत ॥ ५४ ।

निर्माण हवन - विधानका वर्णन ६७ ९ प्रयोग नहीं करना चाहिये । अभिचार ( जारण, मारण आदि ) - कर्ममें लौहकी और शान्तिकर्ममें मृत्तिकाकी आज्यस्थाली, प्रणीता और प्रोक्षणीपात्र प्रयुक्त करना चाहिये; इन पात्रोंका मुख छ: अँगुल चौड़ा होना चाहिये – ऐसा कहा जाता है । प्रोक्षणी दो अँगुल ऊँची, प्रणीता **************************** चार अँगुल ऊँची और आज्यस्थाली उससे भी दो अंगुल अधिक अर्थात् छः अँगुल ऊँची होनी चाहिये ॥ ४१–४४ ॥ जिन समिधाओंसे हवन बताया गया है, उन्हींसे परिधि बनानी चाहिये । मध्य अँगुलीतुल्य चौड़ी, सीधी व्रणरहित, सम तथा बत्तीस अँगुल लम्बी तीन परिधियाँ कही गयी हैं । चार अँगुलके बीच प्रदक्षिणक्रमसे ग्रथितरूपसे बत्तीस - बत्तीस अँगुल लम्बे तीस कुशोंसे परिस्तरण करना चाहिये । अभिचार आदि कार्योंमें शिवाग्न्याधानसे वर्जित कर्म करना चाहिये । हे विप्र! अभिचारकर्ममें कठोर और दृढ़ समिधाएँ लेनी चाहिये, किंतु शुभ कर्ममें पूर्णरूपसे सम, कनिष्ठा अँगुलिके सदृश मोटी, सीधी, व्रणरहित, कोमल तथा बारह अँगुल लम्बी समिधाएँ ग्रहण करनी चाहिये । हे सुव्रत! सभी कार्योंमें समिधाका यही प्रमाण सुनिश्चित किया गया है ॥ ४५ - ४ ९ ॥ हवनके लिये गोघृत श्रेष्ठ होता है, किंतु कपिला गोका घृत उससे भी श्रेष्ठ माना गया है । आहुतिका प्रमाण उतना ही है, जितनेमें स्रुव पूर्णरूपसे भरा हुआ हो । अन्न ( चरु ) -का प्रमाण एक अक्ष ( कर्ष ) तथा तिलका प्रमाण एक शुक्ति ( सीप ) होना चाहिये । जौका प्रमाण उसका आधा अर्थात् आधी शक्ति और फलोंका प्रमाण अपने इच्छानुसार होना चाहिये । दुग्ध, मधु और दहीका प्रमाण घृतके बराबर होना चाहिये । चार स्रुवसे स्रुक्को भरकर आहुति देनेसे पूर्णाहुति होती है । उसके आधे अर्थात् दो स्रुव - परिमाणके द्वारा अथवा अवशिष्ट भागद्वारा हवनको स्विष्टकृत् कहा गया है ॥ ५०–५२१२ ॥ शान्तिक और पौष्टिक कर्मोंमें सदा शिवाग्निमें ही हवन करना चाहिये, किंतु हे महाभाग! मोहन, उच्चाटन आदि [ अभिचार - कर्म ] -से सम्बन्धित हवन लौकिकाग्निमें

पृष्ठ 682

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श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग ६८०

सप्त जिह्वाः प्रकल्प्यैव सर्वकार्याणि कारयेत् ।

अथवा सर्वकार्याणि जिह्वामात्रेण सिध्यति ॥ ५५

शिवाग्निरिति विप्रेन्द्रा जिह्वामात्रेण साधकः ॥ ५६

ॐ बहुरूपायै मध्यजिह्वायै अनेकवर्णायै दक्षिणोत्तरमध्यगायै शान्तिकपौष्टिकमोक्षादि-फलप्रदायै स्वाहा ॥ ५७ ॐ हिरण्यायै चामीकराभायै ईशानजिह्वायै ज्ञानप्रदायै स्वाहा ॥ ५८ ॐ कनकायै कनकनिभायै रम्यायै ऐन्द्रजिह्वायै स्वाहा ॥ ५ ९ ॐ रक्तायै रक्तवर्णायै आग्नेयजिह्वायै अनेकवर्णायै विद्वेषणमोहनायै स्वाहा ॥ ६० ॐ कृष्णायै नैर्ऋतजिह्वायै मारणायै स्वाहा ॥ ६१ ॐ सुप्रभायै पश्चिमजिह्वायै मुक्ताफलायै शान्तिकायै पौष्टिकायै स्वाहा ॥ ६२ ॐ अभिव्यक्तायै वायव्यजिह्वायै शत्रूच्चाटनायै स्वाहा ॥ ६३ ॐ वह्नये तेजस्विने स्वाहा ॥ ६४

एतावद्वह्निसंस्कारमथवा वह्निकर्मसु ।

नैमित्तिके च विधिना शिवाग्निं कारयेत्पुनः ॥ ६५

निरीक्षणं प्रोक्षणं ताडनं च षष्ठेन फडन्तेन अभ्युक्षणं चतुर्थेन खननोत्किरणं षष्ठेन पूरणं समीकरणमाद्येन सेचनं वौषडन्तेन कुट्टनं षष्ठेन सम्मार्जनोपलेपने तुरीयेण कुण्डपरिकल्पनं निवृत्त्या त्रिभिरेव कुण्डपरिधानं चतुर्थेन कुण्डार्चनमाद्येन रेखाचतुष्टय-सम्पादनं षष्ठेन फडन्तेन वज्रीकरणं चतुष्पदा -पादनमाद्येन एवं कुण्डसंस्कारमष्टादशविधम् ॥ ६६ | होते हैं । हे सुव्रत! समस्त कर्मोंमें शिवाग्नि उत्पन्न करके सात जिह्वाओंकी कल्पना करके ही सभी कार्य करने चाहिये अथवा शिवाग्नि जिह्वामात्रसे ही सिद्ध हो जाती है, अतः हे विप्रेन्द्रो! साधकको चाहिये कि जिह्वामात्रसे ही समस्त कार्य सम्पन्न करे॥५३–५६ ॥ [ सात जिह्वाओंका स्वरूप इस प्रकार बताया जाता है — ] ॐ बहुरूपायै मध्यजिह्वायै अनेकवर्णायै दक्षिणोत्तरमध्यगायै शान्तिकपौष्टिकमोक्षादिफलप्रदायै स्वाहा । ॐ हिरण्यायै चामीकराभायै ईशानजिह्वायै ज्ञानप्रदायै स्वाहा । ॐ कनकायै कनकनिभायै रम्यायै ऐन्द्रजिह्वायै स्वाहा । ॐ रक्तायै रक्तवर्णायै आग्नेयजिह्वायै अनेकवर्णायै विद्वेषणमोहनायै स्वाहा । ॐ कृष्णायै नैर्ऋतजिह्वायै मारणायै स्वाहा । ॐ सुप्रभायै पश्चिमजिह्वायै मुक्ताफलायै शान्तिकायै पौष्टिकायै स्वाहा । ॐ अभिव्यक्तायै वायव्यजिह्वायै शत्रूच्चाटनायै स्वाहा- ये सात जिह्वामन्त्र हैं और ॐ वह्नये तेजस्विने स्वाहा - यह प्रधान मन्त्र है ॥ ५७ - ६४ ॥ इस विधिसे वह्निसंस्कार करना चाहिये । अथवा वह्निकार्योंमें और नैमित्तिक कर्ममें विधिपूर्वक शिवाग्नि उत्पन्न करनी चाहिये । [ उसकी विधि इस प्रकार है - ] फडन्त षष्ठ मन्त्रसे निरीक्षण, प्रोक्षण और ताड़न; चतुर्थ मन्त्रसे अभ्युक्षण; षष्ठ मन्त्रसे खनन तथा उत्किरण; आद्यमन्त्रसे पूरण तथा समीकरण; वौषडन्त आद्यमन्त्रसे सेचन; षष्ठ मन्त्रसे कुट्टन; तुरीय ( चतुर्थ ) मन्त्रसे सम्मार्जन तथा उपलेपन; अघोर, वामदेव और सद्योजात — इन तीन मन्त्रोंसे कुण्डपरिकल्पन; चतुर्थ मन्त्रसे कुण्डका परिधान ( मेखलाकरण ); आद्य ( प्रथम ) मन्त्रसे कुण्डका अर्चन फडन्त षष्ठ मन्त्रसे रेखाचतुष्टयकरण और प्रथम मन्त्रसे वज्रीकरण और ऐन्द्राग्न आदि चारों देवोंका स्थापन प्रथम मन्त्रसे - इस प्रकार अठारह प्रकारके इन कुण्डसंस्कारोंको करना

पृष्ठ 683

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अध्याय २५ ] शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड - मेखला

कुण्डसंस्कारानन्तरमक्षपाटनं षष्ठेन विष्टरन्यासमाद्येन ।

वज्रासने वागीश्वर्यावाहनम् ॥ ६७

ॐ ह्रीं वागीश्वरीं श्यामवर्णां विशालाक्षीं

यौवनोन्मत्तविग्रहाम् । ऋतुमतीं वागीश्वरशक्तिमा-वाहयामि ॥ ६८

ॐ वागीश्वरीं पूजयामि ॥ ६ ९

ॐ पुनर्वागीश्वरावाहनम् ॥ ७०

एकवक्त्रं चतुर्भुजं शुद्धस्फटिकाभं वरदाभयहस्तं परशुमृगधरं जटामुकुटमण्डितं सर्वाभरणभूषित मावाहयामि ॥ ७१ ॐ ईं वागीश्वराय नमः | आवाहनस्थापन-सन्निधानसन्निरोधपूजान्तं वागीश्वरीं सम्भाव्य गर्भाधानवह्निसंस्कारम् ॥ ७२ अरणीजनितं कान्तोद्भवं वा अग्निहोत्रजं वा ताम्रपात्रे शरावे वा आनीय निरीक्षणताडनाभ्युक्षणप्रक्षालन -माद्येन क्रव्यादाशिवपरित्यागोऽपि प्रथमेन वह्नेस्त्रैकारणं जठरभ्रूमध्यादावाह्याग्निं । वैकारणमूर्तावाग्नेयेन उद्दीपनमाद्येन पुरुषेण संहितया धारणा धेनुमुद्रां तुरीयेणावगुण्ठ्य जानुभ्यामवनिं गत्वा शरावोत्थापनं कुण्डोपरि निधाय प्रदक्षिणमावर्त्य तुरीयेणात्मसम्मुखां वागीश्वरीं गर्भनाड्यां गर्भाधानान्तरीयेण कमलप्रदानमाद्येन वौषडन्तेन कुशार्घ्यं दत्त्वा इन्धनप्रदानमाद्येन प्रज्वालनं गर्भाधानं च सद्येनाद्येन पूजनं पुंसवनं वामेन पूजनं द्वितीयेन सीमन्तोन्नयनमघोरेण तृतीयेन पूजनम् ॥ ७३ । निर्माण हवन - विधानका वर्णन ६८१ चाहिये ॥ ६५-६६ ॥ कुण्डसंस्कारके पश्चात् षष्ठ मन्त्रसे अक्षपाटन और प्रथम मन्त्रसे विष्टरन्यास करके वज्रासन ( हीरेके आसन ) - पर भगवती वागीश्वरीका आवाहन करना चाहिये । [ वागीश्वरीके आवाहनका मन्त्र इस प्रकार है — ] ॐ ह्रीं वागीश्वरीं श्यामवर्णां विशालाक्षीं यौवनोन्मत्तविग्रहाम् । ऋतुमतीं वागीश्वरशक्ति-मावाहयामि | वागीश्वरीं पूजयामि । इसके अनन्तर वागीश्वरका आवाहन करना चाहिये । [ मन्त्र इस प्रकार है - ] एकवक्त्रं चतुर्भुजं शुद्धस्फटिकाभं वरदाभयहस्तं परशुमृगधरं जटामुकुटमण्डितं सर्वाभरणभूषितमा-वाहयामि । ॐ ईं वागीश्वराय नमः । इस प्रकार आवाहन, स्थापन, सन्निधान तथा सन्निरोध पूजापर्यन्त करके वागीश्वरीको सत्कृतकर गर्भाधान, वह्निसंस्कार करना चाहिये ॥ ६७ – ७२ ॥ [ संस्कारविधि इस प्रकार है- ] अरणीसे उत्पन्न, सूर्यकान्तमणिसे उत्पन्न अथवा अग्निहोत्रसे उत्पन्न अग्निको ताम्रपात्र या मिट्टीके शराव ( कसोरा ) -में लाकर आद्यमन्त्रसे निरीक्षण, ताड़न, अभ्युक्षण तथा प्रक्षालन करके पुनः आद्य मन्त्रसे ही क्रव्यादांश तथा अशिवका परित्यागकर जठर और भ्रूमध्यसे वह्निके त्रैकारण ( त्रिवर्गसाधन ) - का आवाहन करके उस आवाहित मूर्तिमें वह्निमन्त्रसे उद्दीपन करके तत्पुरुषमन्त्रसहित आद्यमन्त्रके द्वारा धारणा तथा संहितामन्त्रसे धेनुमुद्रा प्रदर्शित करनी चाहिये । तत्पश्चात् चतुर्थ मन्त्रसे अवगुण्ठन करके दोनों घुटनोंको भूमिपर टेककर कसोरेको उठाकर कुण्डके ऊपर रखकर चतुर्थ मन्त्रसे प्रदक्षिणक्रमसे चारों ओर घुमाकर अपने सम्मुख विराजमान वागीश्वरीका ध्यान करके गर्भनालमें गर्भाधानकी रीतिसे वौषडन्त आद्यमन्त्रसे कमल प्रदान करके कुशार्घ्य देकर तथा प्रथम मन्त्रसे ईंधन देकर सद्योजातमन्त्रसे प्रज्वालन तथा गर्भाधान करना चाहिये । तदनन्तर प्रथम सद्योजातमन्त्रसे पूजन, वामदेवमन्त्रसे पुंसवन, उसी द्वितीय मन्त्रसे पुन: पूजन, अघोरमन्त्रसे सीमन्तोन्नयन और पुन: उसी तृतीय मन्त्रसे पूजन करना चाहिये ॥ ७३ ॥

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श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग ६८२ 36 96 95 96 96 96 96 96 96 96 अवयवव्याप्तिर्वक्त्रोद्घाटनं वक्त्रनिष्कृतिरिति तृतीयेन गर्भजातकर्मपुरुषेण पूजनं तुरीयेण षष्ठेन प्रोक्षणं सूतकशुद्धये चाग्निसूनुरक्षाकुशास्त्रेण वक्त्रे-णाऽग्नौ मूलमीशाग्रं नैर्ऋतिमूलं वायव्याग्रं वायव्य-मूलमीशाग्रमिति कुशास्तरणमिति पूर्वोक्तमिध्ममग्र-मूलघृताक्तं लालापनोदाय षष्ठेन जुहुयात् ॥ ७४ पञ्चपूर्वातिक्रमेण परिधिविष्टरन्यासोऽपि आद्येन विष्टरोपरि हिरण्यगर्भहरनारायणानपि पूजयेत् ॥ ७५ इन्द्रादिलोकपालांश्च पूजयेत् ॥ ७६ वज्रावर्तपर्यन्तानपि पूजयेत् ॥ ७७ वागीश्वरवागीश्वरीपूजाद्येनमुद्वास्य हुतं विसर्ज -येत् ॥ ७८ स्रुक्स्रुवसंस्कारमथो निरीक्षणप्रोक्षणताडना-भ्युक्षणादीनि पूर्ववत् स्रुक् स्रुवं च हस्तद्वये गृहीत्वा संस्थापनमाद्येन ताडनमपि स्स्रुक्स्स्रुवोपरि दर्भानुलेखनमूलमध्यमाग्रेण त्रित्वेन स्रुक्शक्तिं स्स्रुवमपि शम्भुं दक्षिणपार्श्वे कुशोपरि शक्तये नमः शम्भवे नमः ॥ ७ ९ ह्यन्तिसूत्रेण स्रुक्स्रुवौ तुरीयेण वेष्टयेदर्चयेच्च ॥ ८० धेनुमुद्रां दर्शयित्वा तुरीयेणावगुण्ठ्य षष्ठेन रक्षां विधाय स्रुक्स्स्रुवसंस्कारः पूर्वमेवोक्तः ॥ ८१ । पुनराज्यसंस्कारः पूर्वमेवोक्तः निरीक्षणप्रोक्षणताडना -क्षणादीनि पूर्ववत् ॥ ८२ आज्यप्रतापनमैशान्यां वा षष्ठेन वेद्युपरि विन्यस्य घृतपात्रं वितस्तिमात्रं कुशपवित्रं वामहस्ताङ्गुष्ठा- । अंगोंकी व्याप्ति, वक्त्रोद्घाटन और वक्त्रनिष्कृति तृतीय मन्त्रसे करना चाहिये । गर्भजातकर्म तत्पुरुषमन्त्रसे, पूजन चतुर्थ मन्त्रसे, सूतकशुद्धिके लिये प्रोक्षण षष्ठ मन्त्रसे और अग्निरूप पुत्रकी रक्षा कुशास्त्र मन्त्रसे करे । तत्पश्चात् वक्त्रमन्त्रसे अग्निकोणमें कुशमूल, ईशानमें कुशका अग्रभाग, नैर्ऋत्यमें ' कुशमूल, वायव्यमें अग्रभाग, वायव्यमें कुशमूल और ईशानमें अग्रभाग - इस भाँति पूर्वोक्त रीतिसे कुशास्तरण करके घृतमें भींगी हुई समिधाका अग्निकी लालानिवृत्तिके लिये षष्ठ मन्त्रसे हवन करना चाहिये ॥ ७४ ॥

वामदेव आदि चार मन्त्रोंसे परिधियुक्त विष्टरका स्थापन करके आद्यमन्त्रसे विष्टरके ऊपर ब्रह्मा, शिव तथा नारायणका पूजन करना चाहिये । इसी प्रकार इन्द्र आदि लोकपालों तथा वज्रसे लेकर त्रिशूलपर्यन्त उनके आठ आयुधोंकी भी पूजा करनी चाहिये । वागीश्वर तथा वागीश्वरीकी पूजा आदि करके इन वागीश्वरका उद्वासनकर होमद्रव्यका हवन करना चाहिये ॥ ७५ - ७८ ॥ इसके पश्चात् स्रुक् - स्रुवका संस्कार बताया जाता है - पूर्वकी भाँति निरीक्षण, प्रोक्षण, ताड़न, अभ्युक्षण आदि करके दोनों हाथोंमें स्रुक् - स्रुव ग्रहणकर प्रथम मन्त्रसे संस्थापन तथा ताड़न करके स्रुक् - स्रुवके ऊपर कुशके मूल, मध्य और अग्रभागसे तीन प्रकारसे अनुलेखन करके स्रुक्को शक्ति और स्रुवको शिव मानकर उन्हें दक्षिण भागमें कुशके ऊपर ' शक्तये नमः ', ' शम्भवे नमः ' – इन मन्त्रोंके द्वारा स्थापित करना चाहिये ॥ ७ ९ ॥ तदनन्तर समीपवर्ती सूत्रसे स्रुक् - स्रुवको चतुर्थ मन्त्रका उच्चारण करके वेष्टित करना चाहिये और पुनः अर्चन करना चाहिये । इसके बाद धेनुमुद्रा दिखाकर चतुर्थ मन्त्रसे अवगुण्ठन तथा षष्ठ मन्त्रसे रक्षाकर्म सम्पन्न करके स्रुक् -स्रुव संस्कार करना चाहिये ॥ ८०-८१ ॥ आज्यसंस्कार पूर्वमें बताया गया है, पूर्वकी भाँति निरीक्षण, प्रोक्षण, ताड़न, अभ्युक्षण आदि करना चाहिये । इसके बाद षष्ठ मन्त्रसे ईशानकोणमें घृतको तपाकर घृतपात्रको वेदीके ऊपर रखकर वितस्तिमात्र ( बारह

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अध्याय २५ ] शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड - मेखला नामिकाग्रं गृहीत्वा दक्षिणाङ्गुष्ठानामिकामूलं गृही- । त्वाग्निज्वालोत्पवनं स्वाहान्तेन तुरीयेण पुनः षड् दर्भान् गृहीत्वा पूर्ववत्स्वात्मसम्प्लवनं स्वाहान्तेनाद्येन कुशद्वयपवित्रबन्धनं चाद्येन घृते न्यसेदिति पवित्री -करणम् ॥ ८३

दर्भद्वयं प्रगृह्याग्निप्रज्वालनं घृतं त्रिधा वर्तयेत् ।

सम्प्रोक्ष्याग्नौ निधापयेदिति नीराजनम् ॥ ८४

पुनर्दर्भान् गृहीत्वा कीटकादि निरीक्ष्यार्येण सम्प्रोक्ष्य दर्भानग्नौ निधाय इत्यवद्योतनम् ॥ ८५ दर्भद्वयं गृहीत्वाग्निज्वालया घृतं निरीक्षयेत् ॥ ८६ । दर्भेण गृहीत्वा तेनाग्रद्वयेन शुक्लपक्षद्वयेनाद्येनेति कृष्णपक्षसम्पातनं घृतं त्रिभागेन विभज्य स्रुवेणैकभागेनाज्येनाग्नये स्वाहा द्वितीयेनाज्येन सोमाय स्वाहा आज्येन ॐ अग्नीषोमाभ्यां स्वाहा आज्येनाग्नये स्विष्टकृते स्वाहा ॥ ८७ पुनः कुशेन गृहीत्वा संहिताभिमन्त्रेण नमोऽन्तेनाभिमन्त्रयेत् ॥ ८८ अभिमन्त्र्य धेनुमुद्राप्रदर्शनकवचावगुण्ठनास्त्रेण रक्षाम् । अथ संस्कृते निधापयेद् आज्यसंस्कारः ॥ ८ ९ आज्येन स्रुग्वदनेन चक्राभिघारणं शक्तिबीजादी-शानमूर्तये स्वाहा । पूर्ववत्पुरुषवक्त्राय स्वाहा अघोरहृदयाय स्वाहा वामदेवाय गुह्याय स्वाहा

सद्योजातमूर्तये स्वाहा । इति वक्त्रोद्घाटनम् ॥ ९ ०

ईशानमूर्तये तत्पुरुषवक्त्राय स्वाहा तत्पुरुषवक्त्राय अघोरहृदयाय स्वाहा अघोरहृदयाय वामगुह्याय । निर्माण हवन - विधानका वर्णन ६८३ Y YA YA YA YA YA YA YA YA YA YE YE अंगुल ) KKKKKKKKK कुशाके पवित्रकका अग्रभाग अपने वाम ********** हस्तके अँगुष्ठ और अनामिकासे ग्रहण करके तथा दक्षिण हस्तके अँगुष्ठ और अनामिकासे पवित्रकका मूल ग्रहण करके स्वाहान्त चतुर्थ मन्त्रसे अग्निज्वालाका उत्प्लवन करना चाहिये । इसके बाद छ: कुश लेकर स्वाहान्त प्रथम मन्त्रसे पूर्वकी भाँति अपने देहमें सम्प्लवन करके दो कुशोंका पवित्रक बनाकर प्रथम मन्त्रसे उसे घृतमें डाल देना चाहिये - यह पवित्रीकरण है ॥ ८२-८३ ॥ घृतप्लुत दो दर्भ लेकर उसे प्रज्वलित करके घृतके ऊपर तीन बार घुमाये और पुनः सम्प्रोक्षण करके अग्निमें डाल दे — यह नीराजन है । पुनः दर्भोंको लेकर कीट आदि देख करके अर्घ्यजलसे सम्प्रोक्षण करके

दर्भोंको अग्निमें डाल देना चाहिये — यह अवद्योतन है ।

दो दर्भ लेकर अग्निमें प्रज्वलित करके घृतको देखे-यह निरीक्षण है ॥ ८४ - ८६ ॥

इसके बाद अन्य दर्भके साथ दो पवित्रक लेकर उनमें शुक्लपक्षद्वयकी भावना करे तथा उन दोनोंके सहित घृतको सद्योजातमन्त्रसे पृथक् कर दे, शेषको कृष्णपक्षकी भावनासे पृथक् करे; इस प्रकार घीको तीन भागोंमें विभक्त करके स्रुवद्वारा घृतके एक भागको ' अग्नये स्वाहा ', घृतके द्वितीय भागको ' सोमाय स्वाहा ' और घृतके तृतीय भागको ' अग्नीषोमाभ्यां स्वाहा ' तथा अवशिष्ट घृतको ' अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा ' - ऐसा कहकर होम करे ॥ ८७ ॥

तत्पश्चात् कुशयुक्त पवित्रक लेकर अन्तमें नमः लगाकर संहिता मन्त्रसे घृतको अभिमन्त्रित करना चाहिये । अभिमन्त्रित करके धेनुमुद्रा प्रदर्शित करे । कवचसे अवगुण्ठन और अस्त्रमन्त्रसे रक्षण करना चाहिये, इसके बाद संस्कारित पवित्रकोंको अग्निमें डाल देना चाहिये - यह आज्यसंस्कार है॥८८-८९ ॥ स्रुवमें भरकर लिये गये घृतसे शक्तिबीजमन्त्र ( ह्रीं ) - के द्वारा आहुति दे - यह चक्राभिघारण है । इस बाद ईशानमूर्तये स्वाहा, तत्पुरुषवक्त्राय स्वाहा, अघोरहृदयाय स्वाहा, वामदेवगुह्याय स्वाहा,

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श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग ६८४ सद्योजातमूर्तये स्वाहा इति वक्त्रसन्धानम् ॥ ९९ ईशानमूर्तये तत्पुरुषाय वक्त्राय अघोरहृदयाय वामदेवाय गुह्याय सद्योजाताय स्वाहा इति वक्त्रैक्यकरणम् ॥ ९ २

शिवाग्निं जनयित्वैवं सर्वकर्माणि कारयेत् ।

केवलं जिह्वया वापि शान्तिकाद्यानि सर्वदा ॥ ९ ३

गर्भाधानादिकार्येषु वह्नेः प्रत्येकमव्यय ।

दश आहुतयो देया योनिबीजेन पञ्चधा ॥ ९ ४

शिवाग्नौ कल्पयेद्दिव्यं पूर्ववत्परमासनम् ।

आवाहनं तथा न्यासं यथा देवे तथार्चनम् ॥ ९ ५

मूलमन्त्रं सकृज्जप्त्वा देवदेवं प्रणम्य च ।

प्राणायामत्रयं कृत्वा सगर्भं सर्वसम्मतम् ॥ ९ ६

परिषेचनपूर्वं च तदिध्ममभिघार्य च ।

जुहुयादग्निमध्ये ज्वलितेऽथ महामुने ॥ ९ ७

आघारावपि चाधाय चाज्येनैव तु षण्मुखे ।

आज्यभागौ तु जुहुयाद्विधिनैव घृतेन च ॥ ९ ८

चक्षुषी चाज्यभागौ तु चाग्नये च तथोत्तरे ।

आत्मनो दक्षिणे चैव सोमायेति द्विजोत्तम ॥ ९९

प्रत्यङ्मुखस्य देवस्य शिवाग्नेर्ब्रह्मणः सुत ।

अक्षि वै दक्षिणं चैव चोत्तरं चोत्तरं तथा ॥ १००

दक्षिणं तु महाभाग भवत्येव न संशयः ।

आज्येनाहुतयस्तत्र मूलेनैव दशैव तु ॥ १०१

चरुणा च यथावद्धि समिद्भिश्च तथा स्मृतम् ।

पूर्णाहुतिं ततो दद्यान्मूलमन्त्रेण सुव्रत ॥ १०२

सर्वावरणदेवानां पञ्चपञ्चैव पूर्ववत् ।

ईशानादिक्रमेणैव शक्तिबीजक्रमेण च ॥ १०३ ।

| सद्योजातमूर्तये स्वाहा – इन [ पाँच ] मन्त्रोंसे आहुति दे - यह वक्त्रोद्घाटन है । ईशानमूर्तये तत्पुरुषवक्त्राय स्वाहा, तत्पुरुषवक्त्राय अघोरहृदयाय स्वाहा, अघोरहृदयाय वामगुह्याय सद्योजातमूर्तये स्वाहा – इन मन्त्रोंसे आहुति दे – यह वक्त्रसन्धान है । ईशानमूर्तये तत्पुरुषाय वक्त्राय अघोरहृदयाय वामदेवाय गुह्याय सद्योजाताय स्वाहा - इस मन्त्रसे आहुति दे - यह वक्त्रैक्यकरण है॥९ ० – ९ २ ॥ इस प्रकार शिवाग्नि उत्पन्न करके समस्त कार्य सम्पन्न करने चाहिये अथवा केवल अग्निजिह्वासे भी शान्तिक आदि कार्य सदा करने चाहिये । हे अव्यय! गर्भाधान आदि प्रत्येक संस्कारोंमें योनिबीजसे अग्निमें दस - दस या पाँच - पाँच आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये ॥ ९ ३ - ९ ४ ॥ शिवाग्निमें पूर्वकी भाँति परम दिव्य आसन कल्पित करना चाहिये और उसपर देवका आवाहन, स्थापन तथा पूजन करना चाहिये । हे महामुने! मूलमन्त्रका एक बार जप करके देवदेवको प्रणामकर फिर तीन बार सर्वसम्मत सगर्भ प्राणायाम करके परिषेचनपूर्वक उस समिधाको आघारहोमको उद्देश्य करके प्रज्वलित अग्नि मध्यमें हवन करना चाहिये ॥ ९ ५ – ९ ७ ॥ स्रुवमें दो - दो आघारहोम - निमित्तक तथा आज्यभाग-होमनिमित्तक आहुतियाँ लेकर विधिपूर्वक सद्योजात आदि छः मन्त्ररूप मुखवाली अग्निमें उनका हवन करना चाहिये । हे द्विजश्रेष्ठ! अग्नये स्वाहा- ऐसा कहकर अपने उत्तरमें एवं सोमाय स्वाहा- ऐसा कहकर अपने दक्षिणमें नेत्रस्वरूप दोनों आज्यभागोंकी आहुतियाँ देनी चाहिये । हे ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार! हे महाभाग! पश्चिमकी ओर मुखवाले शिवाग्निरूप महादेवका दाहिना नेत्र उत्तरकी ओर तथा बायाँ नेत्र दक्षिणकी ओर होता है, इसमें सन्देह नहीं है॥९८–१००१ / २ ॥ घृत, चरु तथा समिधाओंसे मूलमन्त्रके द्वारा यथाविधि दस आहुतियाँ देनी चाहिये- ऐसा कहा गया है । हे सुव्रत! तदनन्तर मूल मन्त्रसे पूर्णाहुति प्रदान करनी चाहिये । ईशान आदि मन्त्रोंके क्रमसे तथा

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अध्याय २६ ] शिवलिङ्गमें अघोरार्चनकी

प्रायश्चित्तमघोरेण स्वेष्टान्तं पूर्ववत्स्मृतम् ।

त्रिप्रकारं मया प्रोक्तमग्निकार्यं सुशोभनम् ॥ १०४

यथावसरमेवं हि कुर्यान्नित्यं महामुने ।

जीवितान्ते लभेत्स्वर्गं लभते अग्निदीपनम् ॥ १०५

नरकं चैव नाप्नोति यस्य कस्यापि कर्मणः ।

अहिंसकं चरेद्धोमं साधको मुक्तिकाङ्क्षकः ॥ १०६

हृदिस्थं चिन्तयेदग्निं ध्यानयज्ञेन होमयेत् ।

देहस्थं सर्वभूतानां शिवं सर्वजगत्पतिम् ॥ १०७

तं ज्ञात्वा होमयेद्भक्त्या प्राणायामेन नित्यशः ।

बाह्यहोमप्रदाता तु पाषाणे दर्दुरो भवेत् ॥ १०८

विधि और उसका माहात्म्य ६८५ | शक्तिबीज ( ह्रीं ) - के क्रमसे सभी आवरण देवताओंके लिये पूर्वकी भाँति पाँच - पाँच आहुतियाँ देनी चाहिये । अघोरमन्त्रसे प्रायश्चित्तहोम तथा स्विष्टकृत्पर्यन्त पूर्वकी भाँति कहा गया है । इस प्रकार मैंने अत्यन्त सुन्दर तीन प्रकारके अग्निकार्यका वर्णन कर दिया ॥ १०१-१०४ ॥ हे महामुने! जो [ मनुष्य ] यथासमय नित्य इसे करता है, वह मृत्युके अनन्तर स्वर्ग प्राप्त करता है, अग्निके समान दीप्ति प्राप्त करता है । किसी भी प्रकारके कर्मके लिये उसे नरककी प्राप्ति नहीं होती है । त्रिवर्ग ( धर्म, अर्थ, काम ) - की इच्छावाला अहिंसक ( परनाशशून्य ) होम करे और मुक्तिकी इच्छावाला शिवाग्निको अपने हृदयमें स्थित समझकर चिन्तन करे एवं ध्यानयज्ञके द्वारा हवन करे । सभी प्राणियोंके देहमें स्थित तथा सम्पूर्ण जगत् के स्वामी उन शिवको जानकर प्राणायामके द्वारा भक्तिपूर्वक प्रतिदिन हवन करना चाहिये । शिवध्यानसे रहित होकर होम करनेवाला । पाषाणमें मेढक होता है ॥१०५–१०८ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवाग्निकार्यवर्णनं नाम पञ्चविंशतितमोऽध्यायः ॥ २५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' शिवाग्निकार्यवर्णन ' नामक पचीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २५ ॥

छब्बीसवाँ अध्याय शिवलिङ्गमें अघोरार्चनकी शैलादिरुवाच

अथवा देवमीशानं लिङ्गे सम्पूजयेच्छिवम् ।

ब्राह्मणः शिवभक्तश्च शिवध्यानपरायणः ॥ १

अग्निरित्यादिना भस्म गृहीत्वा ह्यग्निहोत्रजम् ।

उद्धूयेद्धि सर्वाङ्गमापादतलमस्तकम् ॥ २

आचामेद्ब्रह्मतीर्थेन ब्रह्मसूत्री ह्युदङ्मुखः ।

अथों नमः शिवायेति तनुं कृत्वात्मनः पुनः ॥ ३

देवं च तेन मन्त्रेण पूजयेत्प्रणवेन च ।

सर्वस्मादधिका पूजा अघोरेशस्य शूलिनः ॥४

सामान्यं यजनं सर्वमग्निकार्यं च सुव्रत ।

मन्त्रभेदः प्रभोस्तस्य अघोरध्यानमेव च ॥५

विधि और उसका माहात्म्य शैलादि बोले - [ हे सनत्कुमार! ] शिवभक्त ब्राह्मणको चाहिये कि भगवान् शिवके ध्यानमें तत्पर होकर शिवलिङ्गमें परमेश्वर शिवका विधिवत् पूजन करे । ' अग्निरिति ० ' - इस मन्त्रसे अग्निहोत्रजन्य भस्म लेकर पादतलसे मस्तकपर्यन्त सभी अंगोंमें उसे लगाये । इसके बाद उत्तराभिमुख हो ब्रह्मसूत्री होकर ब्रह्मतीर्थसे आचमन करे । तत्पश्चात् ' ॐ नमः शिवाय ' –इस मन्त्रसे अपने देहको शुद्ध करके मूलमन्त्र तथा प्रणवसे शिवका पूजन करना चाहिये; अघोरेश्वर शिवकी पूजा सबसे बढ़कर ॥ १-४ ॥ सुव्रत! समस्त पूजन तथा अग्निकार्य पूर्वकी भाँति हैं । उन प्रभुके मन्त्रोंमें भेद तथा भगवान् अघोरका

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श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग ६८६

अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः ।

सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥ ६

अघोरेभ्यः प्रशान्तहृदयाय नमः । अथ घोरेभ्यः सर्वात्मब्रह्मशिरसे स्वाहा । घोरघोरतरेभ्यः ज्वाला-मालिनीशिखायै वषट् । सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यः पिङ्गलकवचाय हुम् । नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः नेत्रत्रयाय वषट् । सहस्राक्षाय दुर्भेदाय पशुपतास्त्राय हुं फट् ।

स्नात्वाचम्य तनुं कृत्वा समभ्युक्ष्याघमर्षणम् ।

तर्पणं विधिना चार्घ्यं भानवे भानुपूजनम् ॥ ७

समं चाघोरपूजायां मन्त्रमात्रेण भेदितम् ।

मार्गशुद्धिस्तथा द्वारि पूजां वास्त्वधिपस्य च ॥ ८

कृत्वा करं विशोध्याग्रे स शुभासनमास्थितः ।

नासाग्रकमले स्थाप्य दग्धाक्षः क्षुभिकाग्निना ॥ ९

वायुना प्रेर्य तद्भस्म विशोध्य च शुभाम्भसा ।

शक्त्यामृतमये ब्रह्मकलां तत्र प्रकल्पयेत् ॥ १०

अघोरं पञ्चधा कृत्वा पञ्चाङ्गसहितं पुनः ।

इत्थं ज्ञानक्रियामेवं विन्यस्य च विधानतः ॥ ११

न्यासस्त्रिनेत्रसहितो हृदि ध्यात्वा वरासने ।

नाभौ वह्निगतं स्मृत्वा भ्रूमध्ये दीपवत्प्रभुम् ॥ १२

शान्त्या बीजाङ्कुरानन्तधर्माद्यैरपि संयुते ।

सोमसूर्याग्निसम्पन्ने मूर्तित्रयसमन्विते ॥ १३

वामादिभिश्च सहिते मनोन्मन्याप्यधिष्ठिते ।

शिवासनेत्ममूर्तिस्थमक्षयाकाररूपिणम् ॥ १४ ।

अष्टत्रिंशत्कलादेहं त्रितत्त्वसहितं शिवम् ।

अष्टादशभुजं देवं गजचर्मोत्तरीयकम् ॥ १५ ।

ध्यान अब कहा जायगा । मन्त्र इस प्रकार है. अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः । सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः । अघोरेभ्यः प्रशान्तहृदयाय नमः । अथ घोरेभ्यः सर्वात्मब्रह्मशिरसे स्वाहा । घोरघोरतरेभ्यः ज्वालामालिनीशिखायै वषट् । सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यः पिङ्गलकवचाय हुम् । नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः नेत्रत्रयाय वषट् । सहस्राक्षाय दुर्भेदाय पाशुपतास्त्राय हुं फट् - [ इन छः मन्त्रोंसे अंगन्यास करे ] । पूजाविधि इस प्रकार है — स्नान करके आचमनकर शरीरका मार्जन, अघमर्षण, तर्पण, विधिपूर्वक सूर्या तथा सूर्यपूजन पूर्वकी भाँति करे; अघोर पूजामें केवल मन्त्रका भेद है ॥ ५-७ ॥ मार्गशुद्धि, द्वारपूजा तथा वास्तुपतिकी पूजा करके पूजकको चाहिये कि पवित्र आसनपर बैठ जाय और सर्वप्रथम हाथ शुद्ध करके नासाग्रके पास करकमलमें भस्म स्थापित करके क्षुभिकाग्नि ( विरक्तिरूप अग्नि ) -से समस्त विषयोंको दग्ध करके उस भस्मको वायुसे प्रेरितकर पवित्र जलसे उसका शोधनकर ब्रह्ममय उस भस्ममें शक्तिसहित ब्रह्मकलाकी भावना करे ॥ ८-१० ॥ अघोरमन्त्रको पाँच भागोंमें विभक्त करके उसे पंचांगभस्मविलेपनयुक्त करना चाहिये । इस प्रकार ज्ञानयुक्त क्रियाका विधानपूर्वक न्यास करके अघोरमूर्तिसहित न्यास करना चाहिये और हृदयमें श्रेष्ठ आसनपर विराजमानरूपमें ध्यान करके नाभिमें अग्निके मध्य स्थित स्मरण करके भ्रूमध्यमें दीपशिखाके आकारवाले प्रभुका चिन्तन करना चाहिये ॥ ११-१२ ॥ शान्तिसहित बीज, अंकुर, अनन्त तथा धर्म आदिसे युक्त, सोम, सूर्य तथा अग्निसे सम्पन्न, तीन मूर्तियोंसे समन्वित; वामा आदि आठ शक्तियोंसे संयुक्त तथा मनोन्मनीसे भी अधिष्ठित शिवासनपर अघोरमूर्ति परमेश्वर शिवका इस प्रकार ध्यान करे कि वे आत्ममूर्तिमें स्थित हैं, अक्षयाकार स्वरूप हैं, अड़तीस कलाओंसे परिपूर्ण विग्रहवाले हैं, तीन तत्त्वोंसे युक्त हैं, अठारह भुजाओंसे सम्पन्न हैं, गजचर्मका उत्तरीय धारण

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अध्याय २६ ] शिवलिङ्गमें अघोरार्चनकी

सिंहाजिनाम्बरधरमघोरं परमेश्वरम् ।

द्वात्रिंशाक्षररूपेण द्वात्रिंशच्छक्तिभिर्वृतम् ॥ १६

सर्वाभरणसंयुक्तं सर्वदेवनमस्कृतम् ।

कपालमालाभरणं सर्पवृश्चिकभूषणम् ॥ १७

पूर्णेन्दुवदनं सौम्यं चन्द्रकोटिसमप्रभम् ।

चन्द्ररेखाधरं शक्त्या सहितं नीलरूपिणम् ॥ १८

हस्ते खड्गं खेटकं पाशमे रत्नैश्चित्रं चाङ्कुशं नागकक्षाम् । शरासनं पाशुपतं तथास्त्रं दण्डं च खट्वाङ्गमथापरे च ॥ १ ९ तन्त्र च घण्टां विपुलं च शूलं तथापरे डामरुकं च दिव्यम् । वज्रं गदां टङ्कमेकं च दीप्तं समुद्गरं हस्तमथास्य शम्भोः ॥ २०

वरदाभयहस्तं च वरेण्यं परमेश्वरम् ।

भावयेत्पूजयेच्चापि वह्नौ होमं च कारयेत् ॥ २१

होमश्च पूर्ववत्सर्वो मन्त्रभेदश्च कीर्तितः ।

अष्टपुष्पादि गन्धादि पूजास्तुतिनिवेदनम् ॥ २२

अन्तर्बलिं च कुण्डस्य वायेन विधानतः ।

मण्डलं विधिना कृत्वा मन्त्रैरेतैर्यथाक्रमम् ॥ २३

रुद्रेभ्यो मातृगणेभ्यो यक्षेभ्योऽसुरेभ्यो ग्रहेभ्यो राक्षसेभ्यो नागेभ्यो नक्षत्रेभ्यो विश्वगणेभ्यः क्षेत्रपालेभ्यः अथ वायुवरुणदिग्भागे क्षेत्रपालबलिं क्षिपेत् ॥

अर्घ्यं गन्धं पुष्पं च धूपं दीपं च सुव्रताः ।

नैवेद्यं मुखवासादि निवेद्यं वै यथाविधि ॥२४

विज्ञाप्यैवं विसृज्याथ अष्टपुष्पैश्च पूजनम् ।

सर्वसामान्यमेतद्धि पूजायां मुनिपुङ्गवाः ॥ २५

एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तमघोरार्चादि सुव्रत ।

अघोरार्चाविधानं च लिङ्गे वा स्थण्डिलेऽपि वा ॥ २६

स्थण्डिलात्कोटिगुणितं लिङ्गार्चनमनुत्तमम् ।

लिङ्गार्चनरतो विप्रो महापातकसम्भवैः ॥ २७

विधि और उसका माहात्म्य ६८७ किये हुए हैं, सिंहचर्मको वस्त्ररूपमें धारण किये हुए हैं, बत्तीस अक्षरोंके रूपमें बत्तीस शक्तियोंसे आवृत हैं, समस्त प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत हैं, सभी देवता उन्हें नमस्कार कर रहे हैं, वे नरमुण्डकी माला पहने हुए हैं, सर्पों तथा बिच्छुओंको आभूषणरूपमें धारण किये हुए हैं, पूर्णचन्द्रके समान उनका मुखमण्डल है, वे सौम्य स्वभाववाले हैं, करोड़ों चन्द्रमाके तुल्य कान्तिसे युक्त हैं, मस्तकपर चन्द्रकला धारण किये हुए हैं, शक्तिसहित सुशोभित हो रहे हैं, नीलवर्णवाले हैं, उनकी दाहिनी ओरकी आठ भुजाओंमें खड्ग खेटक-पाश - रत्नमय अंकुश - नागकक्षा - शरासनयुक्त पाशुपतास्त्र-दण्ड और खट्वांग तथा बायीं ओरकी आठ भुजाओंमें तन्त्री - घण्टा - विशाल शूल - दिव्य डमरू - वज्र - गदा - टंक और प्रदीप्त मुद्गर हैं । वे वरेण्य परमेश्वर शेष दो हाथोंमें वरद और अभय मुद्रा धारण किये हुए हैं - इस प्रकारकी भावना करनी चाहिये तथा उनकी पूजा करनी चाहिये और अन्तमें अग्निमें हवन करना चाहिये ॥ १३ – २१ ॥ सम्पूर्ण होमकर्म पूर्ववत् होता है, केवल मन्त्रोंमें भेद कहा गया है । अष्टपुष्पांजलि, गन्ध, पुष्पके साथ पूजा, स्तुति, निवेदन तथा कुण्डकी अन्तर्बलि ( होम ) वह्निपुराणोक्त विधानसे करना चाहिये । पुनः विधिपूर्वक मण्डलकी रचना करके यथाक्रम रुद्रेभ्यो मातृगणेभ्यो यक्षेभ्योऽसुरेभ्यो ग्रहेभ्यो राक्षसेभ्यो नागेभ्यो नक्षत्रेभ्यो विश्वगणेभ्यः क्षेत्रपालेभ्यः [ नमः ] – इन मन्त्रोंका उच्चारण करके वायव्य तथा पश्चिम दिशामें क्षेत्रपालबलि प्रदान करनी चाहिये । [ सूतजी बोले- ] हे सुव्रतो! तदनन्तर अर्घ्य, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, मुखवास आदि विधिपूर्वक निवेदित करना चाहिये । ये सब उपचार समर्पित करके अष्टपुष्पांजलियोंके द्वारा विसर्जनकर प्रार्थना करनी चाहिये । हे मुनिश्रेष्ठो! पूजामें यह सब सामान्य विधि है । [ शैलादि बोले- ] हे सुव्रत! इस प्रकार मैंने संक्षेपमें अघोरपूजनका विधान कहा 1 शिवलिङ्ग अथवा स्थण्डिलमें भी अघोरपूजनका विधान | है, किंतु स्थण्डिलकी अपेक्षा लिङ्गमें पूजन करोड़ों गुना

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श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग ६८८ पापैरपि न लिप्येत पद्मपत्रमिवाम्भसा । श्रेष्ठ होता है । लिङ्गार्चनमें संलग्न विप्र महापातकों के पुण्यं दर्शनात्स्पर्शनं वरम् ॥ २८ द्वारा लगनेवाले पापोंसे भी कमलके पत्रपर स्थित लिङ्गस्य दर्शनं अर्चनादधिकं नास्ति ब्रह्मपुत्र न संशयः एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तमघोरार्चनमुत्तमम् ॥ वर्षकोटिशतेनापि विस्तरेण न शक्यते ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे जलकी भाँति लिप्त नहीं होता है । लिङ्गका दर्शन पुण्यप्रद होता है, दर्शनसे अधिक उत्तम लिङ्गका स्पर्श । किंतु लिङ्गार्चनसे बढ़कर कुछ भी नहीं है, हे २ ९ ब्रह्मपुत्र! इसमें संशय नहीं है । इस प्रकार मैंने संक्षेपमें उत्तम अघोरार्चनका वर्णन कर दिया; करोड़ों वर्षोंमें भी विस्तार साथ इसका वर्णन नहीं किया ३० जा सकता है ॥ २२ - ३० ॥ अघोरार्चनवर्णनं नाम षड्विंशतितमोऽध्यायः ॥ २६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' अघोरार्चनवर्णन ' नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २६ ॥

सत्ताईसवाँ अध्याय राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले विजयमण्डलके निर्माण तथा पूजनकी विधि एवं जयाभिषेकका वर्णन; स्वायम्भुव मनु और विभिन्न देवताओंके जयाभिषेकका विवरण ऋषय ऊचुः प्रभावो नन्दिनश्चैव लिङ्गपूजाफलं श्रुतम् श्रुतिभिः सम्मितं सर्वं रोमहर्षण सुव्रत

जयाभिषेक ईशेन कथितो मनवे पुरा ।

हिताय मेरुशिखरे क्षत्रियाणां त्रिशूलिना ॥

तत्कथं षोडशविधं महादानं च शोभनम् ।

वक्तुमर्हसि चास्माकं सूत बुद्धिमतां वर ॥

सूत उवाच

जीवच्छ्राद्धं पुरा कृत्वा मनुः स्वायम्भुवः प्रभुः ।

मेरुमासाद्य देवेशमस्तवीन्नीललोहितम् ॥

तपसा च विनीताय प्रहृष्टः प्रददौ भवः ।

दिव्यं दर्शनमीशानस्तेनापश्यत्तमव्ययम् ॥

त्वा सम्पूज्य विधिना कृताञ्जलिपुटः स्थितः ।

हर्षगद्गदया वाचा प्रोवाच च ननाम च ॥

ऋषिगण बोले- हे रोमहर्षण! हे सुव्रत! हमलोगोंने । [ भगवान् ] नन्दीका प्रभाव तथा वेदप्रतिपादित लिङ्गपूजाका ॥ १ फल - यह सब [ आपसे ] सुन लिया ॥ १ ॥

त्रिशूलधारी महेश्वर शिवने क्षत्रियोंके कल्याणके लिये पूर्व कालमें मेरुपर्वतके शिखरपर स्वायम्भुव २ मनुको जयाभिषेकका उपदेश किया था, उसे बतायें; और हे बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ सूतजी! उत्तम षोडशविध महादानका विधान क्या है - यह सब आप कृपापूर्वक ३ हमलोगोंको बतायें॥२-३ ॥ सूतजी बोले - प्राचीन कालमें प्रभु स्वायम्भुव मनुने जीवच्छ्राद्ध करके मेरुशिखरपर पहुँचकर देवेश्वर नीललोहितका स्तवन किया था ॥ ४ ॥

४ तब उनकी तपस्यासे भगवान् शिव प्रसन्न हो गये और उन्होंने उन विनम्र मनुको दिव्य दृष्टि प्रदान की; ५ फलतः उन्होंने अव्यय शिवको देखा और उन्हें प्रणाम करके विधिवत् पूजा करके दोनों हाथ जोड़े हुए वे स्थित हो गये । मनुने शिवजीको पुनः प्रणाम किया और ६ । हर्षयुक्त गद्गद वाणीमें उनसे कहा — ॥५-६ ॥