श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1–10

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1–10

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॥ श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः ॥ 26 श्रीमद्भागवत महापुराण — [ प्रथम - खण्ड ] [ सचित्र, हिन्दी- व्याख्यासहित ] गीताप्रेस गोरखपुर GITA PRESS, GORAKHPUR गीताप्रेस, गोरखपुर

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॥ श्रीहरिः ॥ महर्षिवेदव्यास - प्रणीत श्रीमद्भागवतमहापुराण [ सचित्र, सरल हिन्दी - व्याख्यासहित ] ( प्रथम - खण्ड ) [ स्कन्ध १ से ८ तक ] त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

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गीताप्रेस, गोरखपुर ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

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सं ० २०७१ इक्यासीवाँ पुनर्मुद्रण १०,००० कुल मुद्रण ६, ९ २,७५० प्रकाशक गीताप्रेस, गोरखपुर - २७३००५ ( गोबिन्दभवन - कार्यालय, कोलकाता का संस्थान ) फोन: ( ०५५१ ) २३३४७२१, २३३१२५०; फैक्स: ( ०५५१ ) २३३६ ९९ ७ e - mail: booksales@gitapress.org website: www.gitapress. ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 5

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॥ श्रीहरिः ॥ द्वितीय संस्करणका नम्र निवेदन श्रीमद्भागवत साक्षात् भगवान्‌का स्वरूप है । इसीसे भक्त - भागवतगण भगवद्भावनासे श्रद्धापूर्वक इसकी पूजा - आराधना किया करते हैं । भगवान् व्यास - सरीखे भगवत्स्वरूप महापुरुषको जिसकी रचनासे ही शान्ति मिली; जिसमें सकाम कर्म, निष्काम कर्म, साधनज्ञान, सिद्धज्ञान, साधनभक्ति, साध्यभक्ति, वैधी भक्ति, प्रेमा भक्ति, मर्यादामार्ग, अनुग्रहमार्ग, द्वैत, अद्वैत और द्वैताद्वैत आदि सभीका परम रहस्य बड़ी ही मधुरताके साथ भरा हुआ है, जो सारे मतभेदोंसे ऊपर उठा हुआ अथवा सभी मतभेदोंका समन्वय करनेवाला महान् ग्रन्थ है — उस भागवतकी महिमा क्या कही जाय । इसके प्रत्येक अंगसे भगवद्भावपूर्ण पारमहंस्य ज्ञान - सुधा - सरिताकी बाढ़ आ रही है — ' यस्मिन् पारमहंस्यमेकममलं ज्ञानं परं गीयते । ' भगवान्‌के मधुरतम प्रेम - रसका छलकता हुआ सागर है— श्रीमद्भागवत । इसीसे भावुक भक्तगण इसमें सदा अवगाहन करते हैं । परम मधुर भगवद्रससे भरा हुआ ‘ स्वादु-स्वादु पदे - पदे ' ऐसा ग्रन्थ बस, यह एक ही है । इसकी कहीं तुलना नहीं है । विद्याका तो यह भण्डार ही है । ' विद्या भागवतावधिः ' प्रसिद्ध है । इस ' परमहंससंहिता ' का यथार्थ आनन्द तो उन्हीं सौभाग्यशाली भक्तोंको किसी सीमातक मिल सकता है, जो हृदयकी सच्ची लगनके साथ श्रद्धा - भक्तिपूर्वक केवल ' भगवत्प्रेमकी प्राप्ति ' के लिये ही इसका पारायण करते हैं । यों तो श्रीमद्भागवत आशीर्वादात्मक ग्रन्थ है, इसके पारायणसे लौकिक - पारलौकिक सभी प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं । इसमें कई प्रकारके अमोघ प्रयोगोंके उल्लेख हैं— जैसे ‘ नारायण - कवच ' ( स्क ० ६ अ ० ८ ) - से समस्त विघ्नोंका नाश तथा विजय, आरोग्य और ऐश्वर्यकी प्राप्ति; ‘ पुंसवन - व्रत ' ( स्क ० ६ अ ० १ ९ ) - से समस्त कामनाओंकी पूर्ति; ‘ गजेन्द्रस्तवन ' ( स्क ० ८ अ ० ३ ) से ऋणसे मुक्ति, शत्रुसे छुटकारा और दुर्भाग्यका नाश, ‘ पयोव्रत ' ( स्क ० ८ अ ० १६ ) - से मनोवांछित संतानकी प्राप्ति; ' सप्ताहश्रवण ' या पारायणसे प्रेतत्वसे मुक्ति । इन सब साधनोंका भगवत्प्रेम या भगवत्प्राप्तिके लिये निष्कामभावसे प्रयोग किया जाय तो इनसे भगवत्प्राप्तिके पथमें बड़ी सहायता मिलती है । श्रीमद्भागवतके सेवनका यथार्थ आनन्द तो भगवत्प्रेमी पुरुषोंको ही प्राप्त होता है । जो लोग अपनी विद्या-बुद्धिका अभिमान छोड़कर और केवल भगवत्कृपाका आश्रय लेकर श्रीमद्भागवतका अध्ययन करते हैं, वे ही इसके भावोंको अपने - अपने अधिकारके अनुसार हृदयंगम कर सकते I गीताप्रेसके द्वारा श्रीमद्भागवतके प्रकाशनका विचार लगभग चौबीस - पचीस वर्ष पहलेसे हो रहा था । परंतु कई कारणोंसे उसमें देर होती गयी । फिर पाठका प्रश्न आया । खोज आरम्भ हुई, टीकाओं और पुरानी प्रतियोंको देखा गया । अन्तमें पूज्यपाद गोलोकवासी श्रीमन्मध्वगौडसम्प्रदायाचार्य गोस्वामी श्रीदामोदरलालजी शास्त्री और गवर्नमेन्ट संस्कृत ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 6

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कॉलेजके भूतपूर्व प्रिंसिपल परम श्रद्धेय विद्वद्वर डॉ ० श्रीगोपीनाथजी कविराज, एम् ० ए ० से परामर्श किया गया । श्रीकविराज महोदयके परामर्श, प्रयत्न और परिश्रमसे काशीके सरकारी ‘ सरस्वती - भवन ' पुस्तकालयमें सुरक्षित प्रायः आठ सौ वर्षकी पुरानी प्रति देखी गयी और गीताप्रेसके विद्वान् शास्त्रियोंके द्वारा उससे पाठ मिलाया गया । इसके लिये हम श्रद्धेय श्रीकविराजजीके हृदयसे कृतज्ञ हैं । इसके पाठनिर्णयमें मथुराके प्रसिद्ध वैष्णव विद्वान् श्रद्धेय पं ० जवाहरलालजी चतुर्वेदीसे बड़ी सहायता मिली थी, एतदर्थ हम उनके कृतज्ञ हैं । इसी समय श्रीमद्भागवतके अनुवादकी बात भी चली और मेरे अनुरोधसे प्रिय श्रीमुनिलालजी ( वर्तमानमें श्रद्धेय स्वामी सनातनदेवजी ) - ने अनुवाद करना स्वीकार किया और भगवत्कृपासे उन्होंने सं ० १ ९ ८ ९ के आषाढ़ में उसे पूरा कर दिया । उक्त अनुवादका संशोधन श्रीवल्लभसम्प्रदायके महान् विद्वान् गोलोकवासी श्रद्धेय देवर्षि पं ० श्रीरमानाथजी भट्ट, अपने ही साथी पं ० श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्री और भाई हरिकृष्णदासजी गोयन्दकाके द्वारा करवाया गया । तदनन्तर संवत् १ ९९ ७ में श्रीमद्भागवतका अनुवादसहित पाठभेदकी पाद - टिप्पणियोंसे युक्त संस्करण दो खण्डोंमें प्रकाशित किया गया, जिसको भावुक पाठकोंने बहुत ही अपनाया । इसीके साथ - साथ मूल पाठका गुटका - संस्करण भी निकाला गया, जिसकी अबतक १,०८, २५० प्रतियाँ छप चुकी हैं । इसके अनन्तर संवत् १ ९९ ८ में ' कल्याण ' का ' भागवताङ्क ' प्रकाशित किया गया । इसमें अनुवादकी शैली कुछ बदल दी गयी । इस अनुवादका अधिकांश हमारे अपने ही पं ० श्रीशान्तनुविहारीजी द्विवेदी ( वर्तमानमें श्रद्धेय स्वामी श्रीअखण्डानन्दजी सरस्वती महाराज ) -ने किया । कुछ श्रीमुनिलालजी तथा पं श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्रीने भी किया । फिर द्वितीय महायुद्धके कारण कई तरहकी अड़चनें आ गयीं । श्रीमद्भागवतके ये दोनों खण्ड और ‘ श्रीभागवताङ्क ' दोनों ही अप्राप्य हो गये । पुनः प्रकाशनकी बात बराबर चलती रही, पर कुछ - न - कुछ अड़चनें आती ही रहीं । ' भागवताङ्क ' वाली नयी शैलीके अनुसार अनुवादमें संशोधन करना हमारे पं ० श्रीचिम्मनलालजी गोस्वामी, एम् ० ए ०, शास्त्रीने आरम्भ भी किया । परंतु अन्यान्य कार्योंमें अत्यधिक व्यस्त रहनेके कारण उनसे वह कार्य आगे नहीं बढ़ सका । गत फाल्गुनमें श्रद्धेय स्वामीजी श्री अखण्डानन्दजी महाराज गोरखपुर पधारे, यों ही प्रसंगवश बात चल गयी और उन्होंने कृपापूर्वक इस कामको करना स्वीकार कर लिया । तदनुसार कार्य आरम्भ हो गया और भगवत्कृपासे अब यह छपकर पाठकोंके सामने प्रस्तुत है । श्रद्धेय श्रीस्वामीजी महाराज महीनोंतक लगातार अथक परिश्रम करके यह कार्य नहीं करते तो आज इस रूपमें इसका प्रकाशित होना सम्भव नहीं था । इसलिये हमलोग तो स्वामीजी महाराजके कृतज्ञ हैं ही, भागवतके प्रेमी पाठकोंको भी उनका कृतज्ञ होना चाहिये । इस संस्करणमें अधिकांश अनुवाद ‘ भागवताङ्क ’ ( मुख्यतया पं ० श्रीशान्तनुविहारीजीके द्वारा अनुवादित ) - के अनुसार ही है । कुछ अनुवाद तथा बहुत - सी अन्य सामग्री पूर्वप्रकाशित श्रीमद्भागवतके दोनों खण्डों ( श्रीमुनिलालजीके द्वारा अनुवादित ) -के अनुसार भी है । ‘ भागवताङ्क ' के भावानुवादमें भी पं ० श्रीशान्तनुविहारीजीके साथ - साथ श्रीमुनिलालजी और पं ० श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्रीका कुछ हाथ था । उसी प्रकार इसमें भी ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 7

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है । इसीसे अनुवादकके रूपमें किन्हीं एक महानुभावका नाम नहीं दिया गया है । नाम - रूपके परित्यागी पूज्यद्वय संन्यासी महोदय ( श्रद्धेय श्रीअखण्डानन्दजी महाराज और श्रद्धेय श्रीसनातनदेवजी महाराज ) तो नाम न देनेसे प्रसन्न ही होंगे । हम तो इसको इन दोनों ही महानुभावोंका कृपाप्रसाद मानते हैं और दोनोंके ही कृतज्ञ हैं । पं ० श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्री सम्पादकीय विभागके सदस्य हैं । अतः उनके नामकी पृथक् आवश्यकता भी नहीं । पाठकोंकी जानकारीके लिये यह परिचय दिया गया है । वस्तुतः अनुवादक महोदयोंके लिये इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी । उन्होंने जो कुछ किया है, कृपापूर्वक ही किया है और उनकी कृपा तथा सद्भावना हमें सदा सहज ही प्राप्त है । इसमें श्लोकोंका केवल अक्षरानुवाद नहीं है, पाठकोंको श्लोकोंका भाव भलीभाँति समझानेके लिये श्लोकोंमें आये हुए प्रत्येक शब्दके भावकी पूर्ण रक्षा करते हुए छोटे - छोटे वाक्योंमें उनकी व्याख्या की गयी है, साथ ही बहुत विस्तार न हो, इसका भी ध्यान रखा गया है । इसे अनुवाद न कहकर ' सरल संक्षिप्त व्याख्या ' कहना अधिक उपयुक्त होगा । स्थान-स्थानपर, विशेष करके दशम स्कन्धमें कई जगह श्रीभगवान्‌की मधुर लीलाओंके रसास्वादनके लिये और लीलारहस्यको समझनेके लिये नयी - नयी टिप्पणियाँ भी दे दी गयी हैं, जिससे इसकी उपादेयता और सुन्दरता विशेष बढ़ गयी है । साथ ही आरम्भमें स्कन्दपुराणोक्त एक छोटा माहात्म्य, श्रीमद्भागवतकी पूजनविधि आदि सप्ताहपारायणकी विधि तथा आवश्यक सामग्रीकी सूची एवं अन्तमें स्कन्दपुराणोक्त भागवतमाहात्म्य और विस्तृत प्रयोगविधि दे दी गयी है, इसलिये पहले संस्करणकी अपेक्षा इसमें पृष्ठ भी बहुत बढ़ गये हैं । चित्र भी अधिक दिये गये हैं । ये कुछ इस संस्करणकी विशेषताएँ हैं । इसके पाठ - संशोधन, अनुवाद, प्रूफ - संशोधन आदिमें गोस्वामी श्रीचिम्मनलालजी और पं ० श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्रीने बड़ा काम किया है । सभी बातोंमें सावधानी रखी गयी है, तथापि इतने बड़े ग्रन्थकी छपाईमें जहाँ - तहाँ भूलें अवश्य रही होंगी । कृपालु पाठकोंसे प्रार्थना है कि उन्हें पाठ, अनुवाद या छपाईमें जहाँ भूल दिखलायी दे, कृपया वे व्योरेवार लिख दें, जिससे आगामी संस्करणमें यथायोग्य संशोधन कर दिया जाय । सहृदय पाठकोंसे प्रार्थना है कि असावधानतावश होनेवाली भूलोंके लिये वे क्षमा करें । अन्तमें निवेदन है कि यह सब जो कुछ हुआ है, इसमें भगवत्कृपा ही कारण है और सब तो निमित्तमात्र है । मैं अपना बड़ा सौभाग्य समझता हूँ और अपने प्रति श्रीभगवान्‌की बड़ी कृपा मानता हूँ, जिससे इधर कई महीने प्रायः श्रीमद्भागवतके ही पठन - चिन्तन आदिमें लगे | —हनुमानप्रसाद पोद्दार ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 8

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१- देवर्षि नारदकी भक्तिसे भेंट ॥ श्रीहरिः ॥ विषय - सूची प्रथम खण्ड श्रीमद्भागवतमाहात्म्य २ - भक्तिका दुःख दूर करनेके लिये नारदजीका उद्योग ३ - भक्तिके कष्टकी निवृत्ति ४ - गोकर्णोपाख्यान प्रारम्भ ५ - धुन्धुकारीको प्रेतयोनिकी प्राप्ति और उससे उद्धार ६ - सप्ताहयज्ञकी विधि प्रथम स्कन्ध १ - श्रीसूतजीसे शौनकादि ऋषियोंका प्रश्न २ - भगवत्कथा और भगवद्भक्तिका माहात्म्य ३ - भगवान्के अवतारोंका वर्णन ४ - महर्षि व्यासका असंतोष ५ - भगवान्के यश - कीर्तनकी महिमा और देवर्षि नारदजीका पूर्वचरित्र ६- नारदजीके पूर्वचरित्रका शेष भाग ७ - अश्वत्थामाद्वारा द्रौपदीके पुत्रोंका मारा जाना और अर्जुनके द्वारा अश्वत्थामाका मानमर्दन ८ - गर्भमें परीक्षित्की रक्षा, कुन्तीके द्वारा भगवान्‌की स्तुति और युधिष्ठिरका शोक ९ - युधिष्ठिरादिका भीष्मजीके पास जाना और भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति करते हुए भीष्मजीका प्राणत्याग करना ० श्रीकृष्णका द्वारका - गमन १०-११ - द्वारकामें श्रीकृष्णका राजोचित स्वागत १२ - परीक्षित्का जन्म १३ - विदुरजीके उपदेशसे धृतराष्ट्र और गान्धारीका वनमें जाना ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

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१४ - अपशकुन देखकर महाराज युधिष्ठिरका शंका करना और अर्जुनका द्वारकासे लौटना १५ - कृष्णविरहव्यथित पाण्डवोंका परीक्षित्को राज्य देकर स्वर्ग सिधारना १६ - परीक्षित्की दिग्विजय तथा धर्म और पृथ्वीका संवाद १७ - महाराज परीक्षित्द्वारा कलियुगका दमन १८ - राजा परीक्षित्को शृंगी ऋषिका शाप १ ९ - परीक्षित्का अनशनव्रत और शुकदेवजीका आगमन द्वितीय स्कन्ध १ - ध्यान - विधि और भगवान्‌के विराट्स्वरूपका वर्णन २ - भगवान्के स्थूल और सूक्ष्मरूपोंकी धारणा तथा क्रममुक्ति और सद्योमुक्तिका वर्णन ३ - कामनाओंके अनुसार विभिन्न देवताओंकी उपासना तथा भगवद्भक्तिके प्राधान्यका निरूपण ४ - राजाका सृष्टिविषयक प्रश्न और शुकदेवजीका कथारम्भ ५- सृष्टि वर्णन ६ - विराट्स्वरूपकी विभूतियोंका वर्णन ७ - भगवान्के लीलावतारोंकी कथा ८ - राजा परीक्षित्के विविध प्रश्न ९ - ब्रह्माजीका भगवद्धामदर्शन और भगवान्‌के द्वारा उन्हें चतुःश्लोकी भागवतका उपदेश १० - भागवतके दस लक्षण १ - उद्धव और विदुरकी भेंट तृतीय स्कन्ध २ - उद्धवजीद्वारा भगवान्‌की बाललीलाओंका वर्णन ३ - भगवान्के अन्य लीलाचरित्रोंका वर्णन ४ - उद्धवजीसे विदा होकर विदुरजीका मैत्रेय ऋषिके पास जाना ५- विदुरजीका प्रश्न और मैत्रेयजीका सृष्टिक्रम वर्णन ६ - विराट् शरीरकी उत्पत्ति ७- विदुरजीके प्रश्न ८ - ब्रह्माजीकी उत्पत्ति ९ - ब्रह्माजीद्वारा भगवान्की स्तुति ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 10

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१० - दस प्रकारकी सृष्टिका वर्णन ११ - मन्वन्तरादि कालविभागका वर्णन १२ - सृष्टिका विस्तार १३ - वाराह - अवतारकी कथा १४ - दितिका गर्भधारण १५ - जय - विजयको सनकादिका शाप १६ - जय - विजयका वैकुण्ठसे पतन १७ - हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्षका जन्म तथा हिरण्याक्षकी दिग्विजय १८ - हिरण्याक्षके साथ वराहभगवान्का युद्ध १ ९ - हिरण्याक्ष - वध २०- ब्रह्माजीकी रची हुई अनेक प्रकारकी सृष्टिका वर्णन २१ - कर्दमजीकी तपस्या और भगवान्‌का वरदान २२ - देवहूतिके साथ कर्दम प्रजापतिका विवाह २३ - कर्दम और देवहूतिका विहार २४ - श्रीकपिलदेवजीका जन्म २५ - देवहूतिका प्रश्न तथा भगवान् कपिलद्वारा भक्तियोगकी महिमाका वर्णन २६ - महदादि भिन्न - भिन्न तत्त्वोंकी उत्पत्तिका वर्णन २७ - प्रकृति - पुरुषके विवेकसे मोक्ष प्राप्तिका वर्णन २८ - अष्टांगयोगकी विधि २ ९ - भक्तिका मर्म और कालकी महिमा ३० - देह - गेहमें आसक्त पुरुषोंकी अधोगतिका वर्णन ३१ - मनुष्ययोनिको प्राप्त हुए जीवकी गतिका वर्णन ३२ - धूममार्ग और अर्चिरादि मार्गसे जानेवालोंकी गतिका और भक्तियोगकी उत्कृष्टत् वर्णन ३३- देवहूतिको तत्त्वज्ञान एवं मोक्षपदकी प्राप्ति चतुर्थ स्कन्ध १ - स्वायम्भुव - मनुकी कन्याओंके वंशका वर्णन २ - भगवान् शिव और दक्ष प्रजापतिका मनोमालिन्य ३ - सतीका पिताके यहाँ यज्ञोत्सवमें जानेके लिये आग्रह करना ****** ebook converter DEMO Watermarks *******