श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 11–20

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 11–20

पृष्ठ 11

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४ - सतीका अग्निप्रवेश ५ - वीरभद्रकृत दक्षयज्ञविध्वंस और दक्षवध ६ - ब्रह्मादि देवताओंका कैलास जाकर श्रीमहादेवजीको मनाना ७ - दक्षयज्ञकी पूर्ति ८ - ध्रुवका वन - गमन ९ - ध्रुवका वर पाकर घर लौटना १० - उत्तमका मारा जाना, ध्रुवका यक्षोंके साथ युद्ध ११ - स्वायम्भुव - मनुका ध्रुवजीको युद्ध बंद करनेके लिये समझाना १२ - ध्रुवजीको कुबेरका वरदान और विष्णुलोककी प्राप्ति १३ - ध्रुववंशका वर्णन, राजा अंगका चरित्र १४- राजा वेनकी कथा १५ - महाराज पृथुका आविर्भाव और राज्याभिषेक १६ - वंदीजनद्वारा महाराज पृथुकी स्तुति १७ - महाराज पृथुका पृथ्वीपर कुपित होना और पृथ्वीके द्वारा उनकी स्तुति करना १८- पृथ्वी - दोहन १ ९ - महाराज पृथुके सौ अश्वमेध यज्ञ २० - महाराज पृथुकी यज्ञशालामें श्रीविष्णुभगवान्‌का प्रादुर्भाव २१ - महाराज पृथुका अपनी प्रजाको उपदेश २२ - महाराज पृथुको सनकादिका उपदेश २३ - राजा पृथुकी तपस्या और परलोकगमन २४ - पृथुकी वंशपरम्परा और प्रचेताओंको भगवान् रुद्रका उपदेश २५ - पुरंजनोपाख्यानका प्रारम्भ २६ - राजा पुरंजनका शिकार खेलने वनमें जाना और रानीका कुपित होना २७ - पुरंजनपुरीपर चण्डवेगकी चढ़ाई तथा कालकन्याका चरित्र २८ - पुरंजनको स्त्रीयोनिकी प्राप्ति और अविज्ञातके उपदेशसे उसका मुक्त होना २ ९ - पुरंजनोपाख्यानका तात्पर्य ३० - प्रचेताओंको श्रीविष्णुभगवान्का वरदान ३१- प्रचेताओंको श्रीनारदजीका उपदेश और उनका परमपद - लाभ

पृष्ठ 12

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पञ्चम स्कन्ध १ - प्रियव्रत - चरित्र २ - आग्नीध्र - चरित्र ३ - राजा नाभिका चरित्र ४ - ऋषभदेवजीका राज्यशासन ५ - ऋषभजीका अपने पुत्रोंको उपदेश देना और स्वयं अवधूतवृत्ति ग्रहण करना ६ - ऋषभदेवजीका देहत्याग ७ - भरत - चरित्र ८ - भरतजीका मृगके मोहमें फँसकर मृगयोनिमें जन्म लेना ९- भरतजीका ब्राह्मणकुलमें जन्म १० - जडभरत और राजा रहूगणकी भेंट ११ - राजा रहूगणको भरतजीका उपदेश १२ - रहूगणका प्रश्न और भरतजीका समाधान १३ - भवाटवीका वर्णन और रहूगणका संशयनाश १४ - भवाटवीका स्पष्टीकरण १५ - भरतके वंशका वर्णन १६- भुवनकोशका वर्णन १७ - गंगाजीका विवरण और भगवान् शंकरकृत संकर्षणदेवकी स्तुति १८ - भिन्न - भिन्न वर्षोंका वर्णन १ ९ - किम्पुरुष और भारतवर्षका वर्णन २० - अन्य छः द्वीपों तथा लोकालोक - पर्वतका वर्णन २१ - सूर्यके रथ और उसकी गतिका वर्णन २२ - भिन्न - भिन्न ग्रहोंकी स्थिति और गतिका वर्णन २३- शिशुमारचक्रका वर्णन २४ - राहु आदिकी स्थिति, अतलादि नीचेके लोकोंका वर्णन २५ - श्रीसङ्कर्षणदेवका विवरण और स्तुति २६ - नरकोंकी विभिन्न गतियोंका वर्णन षष्ठ स्कन्ध

पृष्ठ 13

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१ - अजामिलोपाख्यानका प्रारम्भ २ - विष्णुदूतोंद्वारा भागवतधर्म - निरूपण और अजामिलका परमधामगमन ३ - यम और यमदूतोंका संवाद ४ - दक्षके द्वारा भगवान्की स्तुति और भगवान्‌का प्रादुर्भाव ५ - श्रीनारदजीके उपदेशसे दक्षपुत्रोंकी विरक्ति तथा नारदजीको दक्षका शाप ६ - दक्षप्रजापतिकी साठ कन्याओंके वंशका विवरण ७- बृहस्पतिजीके द्वारा देवताओंका त्याग और विश्वरूपका देवगुरुके रूपमें वरण ८ - नारायणकवचका उपदेश ९ - विश्वरूपका वध, वृत्रासुरद्वारा देवताओंकी हार और भगवान्‌की प्रेरणासे देवताओंका दधीचि ऋषिके पास जाना १० - देवताओंद्वारा दधीचि ऋषिकी अस्थियोंसे वज्रनिर्माण और वृत्रासुरकी सेनापर आक्रमण ११ - वृत्रासुरकी वीरवाणी और भगवत्प्राप्ति १२ - वृत्रासुरका वध १३ - इन्द्रपर ब्रह्महत्याका आक्रमण १४ - वृत्रासुरका पूर्वचरित्र १५ - चित्रकेतुको अंगिरा और नारदजीका उपदेश १६ - चित्रकेतुका वैराग्य तथा संकर्षणदेवके दर्शन १७ - चित्रकेतुको पार्वतीजीका शाप १८ - अदिति और दितिकी सन्तानोंकी तथा मरुद्गणोंकी उत्पत्तिका वर्णन १ ९- पुंसवन - व्रतकी विधि सप्तम स्कन्ध १ - नारद - युधिष्ठिर - संवाद और जय - विजयकी कथा २ - हिरण्याक्षका वध होनेपर हिरण्यकशिपुका अपनी माता और कुटुम्बियोंको समझाना ३ - हिरण्यकशिपुकी तपस्या और वरप्राप्ति ४- हिरण्यकशिपुके अत्याचार और प्रह्लादके गुणों का वर्णन ५ - हिरण्यकशिपुके द्वारा प्रह्लादजीके वधका प्रयत्न ६ - प्रह्लादजीका असुर - बालकोंको उपदेश ७ - प्रह्लादजीद्वारा माताके गर्भमें प्राप्त हुए नारदजीके उपदेशका वर्णन ८ - नृसिंहभगवान्का प्रादुर्भाव, हिरण्यकशिपुका वध एवं ब्रह्मादि देवताओंद्वारा भगवान्की

पृष्ठ 14

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स्तुति ९ - प्रह्लादजीके द्वारा नृसिंहभगवान्की स्तुति १० - प्रह्लादजीके राज्याभिषेक और त्रिपुरदहनकी कथा ११ - मानवधर्म, वर्णधर्म और स्त्रीधर्मका निरूपण १२ - ब्रह्मचर्य और वानप्रस्थआश्रमोंके नियम १३ - यतिधर्मका निरूपण और अवधूत - प्रह्लाद - संवाद १४ - गृहस्थसम्बन्धी सदाचार १५ - गृहस्थोंके लिये मोक्षधर्मका वर्णन १- मन्वन्तरोंका वर्णन अष्टम स्कन्ध २- ग्राहके द्वारा गजेन्द्रका पकड़ा जाना ३ - गजेन्द्रके द्वारा भगवान्की स्तुति और उसका संकटसे मुक्त होना ४ - गज और ग्राहका पूर्वचरित्र तथा उनका उद्धार ५ - देवताओंका ब्रह्माजीके पास जाना और ब्रह्माकृत भगवान्की स्तुति ६ - देवताओं और दैत्योंका मिलकर समुद्रमन्थनके लिये उद्योग करना ७ - समुद्रमन्थनका आरम्भ और भगवान् शंकरका विषपान ८ - समुद्रसे अमृतका प्रकट होना और भगवान्का मोहिनी - अवतार ग्रहण करना ९ - मोहिनी - रूपसे भगवान्‌के द्वारा अमृत बाँटा जाना १०- देवासुर संग्राम ११ - देवासुर - संग्रामकी समाप्ति १२- मोहिनीरूपको देखकर महादेवजीका मोहित होना १३- आगामी सात मन्वन्तरोंका वर्णन १४ - मनु आदिके पृथक् - पृथक् कर्मोंका निरूपण १५ - राजा बलिकी स्वर्गपर विजय १६ - कश्यपजीके द्वारा अदितिको पयोव्रतका उपदेश १७ - भगवान्का प्रकट होकर अदितिको वर देना १८ - वामनभगवान्का प्रकट होकर राजा बलिकी यज्ञशालामें पधारना १ ९ - भगवान् वामनका बलिसे तीन पग पृथ्वी माँगना, बलिका वचन देना और शुक्राचार्यजीका उन्हें रोकना

पृष्ठ 15

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२० - भगवान् वामनजीका विराट्रूप होकर दो ही पगसे पृथ्वी और स्वर्गको नाप ले २१ - बलिका बाँधा जाना २२ - बलिके द्वारा भगवान्‌की स्तुति और भगवान्‌का उसपर प्रसन्न होना २३ - बलिका बन्धनसे छूटकर सुतललोकको जाना २४ - भगवान्के मत्स्यावतारकी कथा

पृष्ठ 16

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चतुःश्लोकी भागवत

अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत् परम् ।

पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥१ ॥

ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि ।

तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ॥२ ॥

यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु ।

प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ॥३ ॥

एतावदेव जिज्ञास्यंतत्त्व जिज्ञासुनाऽऽत्मनः ।

अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा ॥४ ॥

सृष्टिके पूर्व केवल मैं ही मैं था । मेरे अतिरिक्त न स्थूल था न सूक्ष्म और न तो दोनोंका कारण अज्ञान । जहाँ यह सृष्टि नहीं है, वहाँ मैं - ही - मैं हूँ और इस सृष्टिके रूपमें जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह भी मैं हूँ; और जो कुछ बच रहेगा, वह भी मैं ही हूँ ॥१ ॥ वास्तवमें न होनेपर

भी जो कुछ अनिर्वचनीय वस्तु मेरे अतिरिक्त मुझ परमात्मामें दो चन्द्रमाओंकी तरह मिथ्या ही प्रतीत हो रही है, अथवा विद्यमान होनेपर भी आकाश - मण्डलके नक्षत्रोंमें राहुकी भाँति जो मेरी प्रतीति नहीं होती, इसे मेरी माया समझनी चाहिये ॥२ ॥ जैसे प्राणियोंके पंचभूतरचित

छोटे - बड़े शरीरोंमें आकाशादि पंचमहाभूत उन शरीरोंके कार्यरूपसे निर्मित होनेके कारण प्रवेश करते भी हैं और पहलेसे ही उन स्थानों और रूपोंमें कारणरूपसे विद्यमान रहनेके कारण प्रवेश नहीं भी करते, वैसे ही उन प्राणियोंके शरीरकी दृष्टिसे मैं उनमें आत्माके रूपसे प्रवेश किये हुए हूँ और आत्मदृष्टिसे अपने अतिरिक्त और कोई वस्तु न होनेके कारण उनमें प्रविष्ट नहीं भी हूँ ॥३ ॥ यह ब्रह्म नहीं, यह ब्रह्म नहीं - इस प्रकार निषेधकी पद्धतिसे और

यह ब्रह्म है, यह ब्रह्म है - इस अन्वयकी पद्धतिसे यही सिद्ध होता है कि सर्वातीत एवं सर्वस्वरूप भगवान् ही सर्वदा और सर्वत्र स्थित हैं, वे ही वास्तविक तत्त्व हैं । जो आत्मा अथवा परमात्माकां तत्त्व जानना चाहते हैं, उन्हें केवल इतना ही जाननेकी आवश्यकता है ॥४ ॥

( श्रीमद्भा ० २।९।३२-३५ )

पृष्ठ 17

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श्रीमद्भागवत - माहात्म्य ( स्वयं श्रीभगवान्के श्रीमुखसे ब्रह्माजीके प्रति कथित )

श्रीमद्भागवतं नाम पुराणं लोकविश्रुतम् ।

शृणुयाच्छ्रद्धया युक्तो मम सन्तोषकारणम् ॥१ ॥

लोकविख्यात श्रीमद्भागवत नामक पुराणका प्रतिदिन श्रद्धायुक्त होकर श्रवण करना चाहिये । यही मेरे संतोषका कारण है ।

नित्यं भागवतं यस्तु पुराणं पठते नरः ।

प्रत्यक्षरं भवेत्तस्य कपिलादानजं फलम् ॥२ ॥

जो मनुष्य प्रतिदिन भागवतपुराणका पाठ करता है, उसे एक - एक अक्षरके उच्चारणके साथ कपिला गौ दान देनेका पुण्य होता है ।

श्लोकार्धं श्लोकपादं वा नित्यं भागवतोद्भवम् ।

पठते शृणुयाद् यस्तु गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ३ ॥

जो प्रतिदिन भागवतके आधे श्लोक या चौथाई श्लोकका पाठ अथवा श्रवण करता है, उसे एक हजार गोदानका फल मिलता है ।

यः पठेत् प्रयतो नित्यं श्लोकं भागवतं सुत ।

अष्टादशपुराणानां फलमाप्नोति मानवः ॥४ ॥

पुत्र! जो प्रतिदिन पवित्रचित्त होकर भागवतके एक श्लोकका पाठ करता है, वह मनुष्य अठारह पुराणोंके पाठका फल पा लेता है ।

नित्यं मम कथा यत्र तत्र तिष्ठन्ति वैष्णवाः ।

कलिबाह्या नरास्ते वै येऽर्चयन्ति सदा मम ॥ ५ ॥

जहाँ नित्य मेरी कथा होती है, वहाँ विष्णुपार्षद प्रह्लाद आदि विद्यमान रहते हैं । जो मनुष्य सदा मेरे भागवतशास्त्रकी पूजा करते हैं, वे कलिके अधिकारसे अलग हैं, उनपर कलिका वश नहीं चलता । वैष्णवानां तु शास्त्राणि येऽर्चयन्ति गृहे नराः । तु सर्वपापविनिर्मुक्ता भवन्ति सुरवन्दिताः ॥६ ॥

जो मानव अपने घरमें वैष्णवशास्त्रोंकी पूजा करते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त होकर देवताओंद्वारा वन्दित होते हैं ।

येऽर्चयन्ति गृहे नित्यं शास्त्रं भागवतं कलौ ।

आस्फोटयन्ति वल्गन्ति तेषां प्रीतो भवाम्यहम् ॥७ ॥

पृष्ठ 18

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जो लोग कलियुगमें अपने घरके भीतर प्रतिदिन भागवतशास्त्रकी पूजा करते हैं, वे [ कलिसे निडर होकर ] ताल ठोंकते और उछलते - कूदते हैं, मैं उनपर बहुत प्रसन्न रहता हूँ ।

यावद्दिनानि हे पुत्र शास्त्रं भागवतं गृहे ।

तावत् पिबन्ति पितरः क्षीरं सर्पिर्मधूदकम् ॥८ ॥

पुत्र! मनुष्य जितने दिनोंतक अपने घरमें भागवतशास्त्र रखता है, उतने समयतक उसके पितर दूध, घी, मधु और मीठा जल पीते हैं ।

यच्छन्ति वैष्णवे भक्त्या शास्त्रं भागवतं हि ये ।

कल्पकोटिसहस्राणि मम लोके वसन्ति ते ॥९ ॥

जो लोग विष्णुभक्त पुरुषको भक्तिपूर्वक भागवतशास्त्र समर्पण करते हैं, वे हजारों करोड़ कल्पोंतक ( अनन्तकालतक ) मेरे वैकुण्ठधाममें वास करते हैं ।

येऽर्चयन्ति सदा गेहे शास्त्रं भागवतं नराः ।

प्रीणितास्तैश्च विबुधा यावदाभूतसंप्लवम् ॥१० ॥

जो लोग सदा अपने घरमें भागवतशास्त्रका पूजन करते हैं, वे मानो एक कल्पतकके लिये सम्पूर्ण देवताओंको तृप्त कर देते हैं ।

श्लोकार्धं श्लोकपादं वा वरं भागवतं गृहे ।

शतशोऽथ सहस्रैश्च किमन्यैः शास्त्रसंग्रहैः ॥११ ॥

यदि अपने घरपर भागवतका आधा श्लोक या चौथाई श्लोक भी रहे, तो यह बहुत उत्तम बात है, उसे छोड़कर सैकड़ों और हजारों तरहके अन्य ग्रन्थोंके संग्रहसे भी क्या लाभ है?

न यस्य तिष्ठते शास्त्रं गृहे भागवतं कलौ ।

न तस्य पुनरावृत्तिर्याम्यपाशात् कदाचन ॥१२ ॥

कलियुगमें जिस मनुष्यके घरमें भागवतशास्त्र मौजूद नहीं है, उसको यमराजके पाशसे कभी छुटकारा नहीं मिलता ।

कथं स वैष्णवो ज्ञेयः शास्त्रं भागवतं कलौ ।

गृहे न तिष्ठते यस्य श्वपचादधिको हि सः ॥१३ ॥

इस कलियुगमें जिसके घर भागवतशास्त्र मौजूद नहीं है, उसे कैसे वैष्णव समझा जाय? वह तो चाण्डालसे भी बढ़कर नीच है!

सर्वस्वेनापि लोकेश कर्तव्यः शास्त्रसंग्रहः ।

वैष्णवस्तु सदा भक्त्या तुष्ट्यर्थं मम पुत्रक ॥१४ ॥

लोकेश ब्रह्मा! पुत्र! मनुष्यको सदा मुझे भक्ति - पूर्वक संतुष्ट करनेके लिये अपना सर्वस्व देकर भी वैष्णवशास्त्रोंका संग्रह करना चाहिये । यत्र यत्र भवेत् पुण्यं शास्त्रं भागवतं कलौ ।

पृष्ठ 19

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तत्र तत्र सदैवाहं भवामि त्रिदशैः सह ॥ १५ ॥

कलियुगमें जहाँ - जहाँ पवित्र भागवतशास्त्र रहता है, वहाँ - वहाँ सदा ही मैं देवताओंके साथ उपस्थित रहता हूँ ।

तत्र सर्वाणि तीर्थानि नदीनदसरांसि च ।

यज्ञाः सप्तपुरी नित्यं पुण्याः सर्वे शिलोच्चयाः ॥१६ ॥

यही नहीं - वहाँ नदी, नद और सरोवररूपमें प्रसिद्ध सभी तीर्थ वास करते हैं; सम्पूर्ण यज्ञ, सात पुरियाँ और सभी पावन पर्वत वहाँ नित्य निवास करते हैं ।

श्रोतव्यं मम शास्त्रं हि यशोधर्मजयार्थिना ।

पापक्षयार्थं लोकेश मोक्षार्थं धर्मबुद्धिना ॥१७ ॥

लोकेश! यश, धर्म और विजयके लिये तथा पापक्षय एवं मोक्षकी प्राप्तिके लिये धर्मात्मा मनुष्यको सदा ही मेरे भागवतशास्त्रका श्रवण करना चाहिये ।

श्रीमद्भागवतं पुण्यमायुरारोग्यपुष्टिदम् ।

पठनाच्छ्रवणाद् वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१८ ॥

यह पावन पुराण श्रीमद्भागवत आयु, आरोग्य और पुष्टिको देनेवाला है; इसका पाठ अथवा श्रवण करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ।

न शृण्वन्ति न हृष्यन्ति श्रीमद्भागवतं परम् ।

सत्यं सत्यं हि लोकेश तेषां स्वामी सदा यमः ॥१९ ॥

लोकेश! जो इस परम उत्तम भागवतको न तो सुनते हैं और न सुनकर प्रसन्न ही होते हैं, उनके स्वामी सदा यमराज ही हैं - वे सदा यमराजके ही वशमें रहते हैं — यह मैं सत्य - सत्य कह रहा हूँ ।

न गच्छति यदा मर्त्यः श्रोतुं भागवतं सुत ।

एकादश्यां विशेषेण नास्ति पापरतस्ततः । । २० ॥

पुत्र! जो मनुष्य सदा ही - विशेषतः एकादशीको भागवत सुनने नहीं जाता, उससे बढ़कर पापी कोई नहीं है ।

श्लोकं भागवतं चापि श्लोकार्थं पादमेव वा ।

लिखितं तिष्ठते यस्य गृहे तस्य वसाम्यहम् ॥२१ ॥

जिसके घरमें एक श्लोक, आधा श्लोक अथवा श्लोकका एक ही चरण लिखा रहता है, उसके घरमें मैं निवास करता हूँ ।

सर्वाश्रमाभिगमनं सर्वतीर्थावगाहनम् ।

न तथा पावनं नृणां श्रीमद्भागवतं यथा ॥२२ ॥

मनुष्यके लिये सम्पूर्ण पुण्य- आश्रमोंकी यात्रा या सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करना भी वैसा पवित्रकारक नहीं है, जैसा श्रीमद्भागवत है ।

पृष्ठ 20

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यत्र यत्र चतुर्वक्त्र श्रीमद्भागवतं भवेत् ।

गच्छामि तत्र तत्राहं गौर्यथा सुतवत्सला ॥२३ ॥

चतुर्मुख! जहाँ - जहाँ भागवतकी कथा होती है, वहाँ - वहाँ मैं उसी प्रकार जाता हूँ, जैसे पुत्रवत्सला गौ अपने बछड़ेके पीछे - पीछे जाती है ।

मत्कथावाचकं नित्यं मत्कथाश्रवणे रतम् ।

मत्कथाप्रीतमनसं नाहं त्यक्ष्यामि तं नरम् ॥ २४ ॥

जो मेरी कथा कहता है, जो सदा उसे सुननेमें लगा रहता है तथा जो मेरी कथासे मन-ही - मन प्रसन्न होता है, उस मनुष्यका मैं कभी त्याग नहीं करता ।

श्रीमद्भागवतं पुण्यं दृष्ट्वा नोत्तिष्ठते हि यः ।

सांवत्सरं तस्य पुण्यं विलयं याति पुत्रक ॥२५ ॥

पुत्र! जो परम पुण्यमय श्रीमद्भागवतशास्त्रको देखकर अपने आसनसे उठकर खड़ा नहीं हो जाता, उसका एक वर्षका पुण्य नष्ट हो जाता है ।

श्रीमद्भागवतं दृष्ट्वा प्रत्युथानाभिवादनैः ।

सम्मानयेत तं दृष्ट्वा भवेत् प्रीतिर्ममातुला ॥२६ ॥

जो श्रीमद्भागवतपुराणको देखकर खड़ा होने और प्रणाम करने आदिके द्वारा उसका सम्मान करता है, उस मनुष्यको देखकर मुझे अनुपम आनन्द मिलता है ।

दृष्ट्वा भागवतं दूरात् प्रक्रमेत् सम्मुखं हि यः ।

पदे पदेऽश्वमेधस्य फलं प्राप्नोत्यसंशयम् ॥२७ ॥

जो श्रीमद्भागवतको दूरसे ही देखकर उसके सम्मुख जाता है, वह एक - एक पगपर अश्वमेध यज्ञके पुण्यको प्राप्त करता है - इसमें तनिक भी संदेह नहीं है ।

उत्थाय प्रणमेद् यो वै श्रीमद्भागवतं नरः ।

धनपुत्रांस्तथा दारान् भक्तिं च प्रददाम्यहम् ॥ २८ ॥

जो मानव खड़ा होकर श्रीमद्भागवतको प्रणाम करता है, उसे मैं धन, स्त्री, पुत्र और अपनी भक्ति प्रदान करता हूँ ।

महाराजोपचारैस्तु श्रीमद्भागवतं सुत ।

शृण्वन्ति ये नरा भक्त्या तेषां वश्यो भवाम्यहम् ॥२९ ॥

हे पुत्र! जो लोग महाराजोचित सामग्रियोंसे युक्त होकर भक्तिपूर्वक श्रीमद्भागवतकी कथा सुनते हैं, मैं उनके वशीभूत हो जाता हूँ ।

ममोत्सवेषु सर्वेषु श्रीमद्भागवतं परम् ।

शृण्वन्ति ये नरा भक्त्या मम प्रीत्यै च सुव्रत ॥ ३० ॥

वस्त्रालङ्करणैः पुष्पैर्धूपदीपोपहारकैः ।