श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1041–1050
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1041–1050
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महाभागवत प्रह्लादजी उस वर्षके अन्य पुरुषोंके सहित निष्काम एवं अनन्य भक्तिभावसे उपासना करते हैं । ये प्रह्लादजी महापुरुषोचित गुणोंसे सम्पन्न हैं तथा इन्होंने अपने शील और आचरणसे दैत्य और दानवोंके कुलको पवित्र कर दिया है । वे इस मन्त्र तथा स्तोत्रका जप-पाठ करते हैं ॥७ ॥— ' ओंकारस्वरूप भगवान् श्रीनृसिंहदेवको नमस्कार है । आप अग्नि
आदि तेजोंके भी तेज हैं, आपको नमस्कार है । हे वज्रनख! हे वज्रदंष्ट्र! आप हमारे समीप प्रकट होइये, प्रकट होइये; हमारी कर्म - वासनाओंको जला डालिये, जला डालिये । हमारे अज्ञानरूप अन्धकारको नष्ट कीजिये, नष्ट कीजिये । ॐ स्वाहा । हमारे अन्तःकरणमें अभयदान देते हुए प्रकाशित होइये । ॐ क्षौम् ' || ८ || ' नाथ! विश्वका कल्याण हो, दुष्टोंकी बुद्धि शुद्ध हो, सब प्राणियोंमें परस्पर सद्भावना हो, सभी एक - दूसरेका हितचिन्तन करें, हमारा मन शुभ मार्गमें प्रवृत्त हो और हम सबकी बुद्धि निष्काम भावसे भगवान् श्रीहरिमें प्रवेश करे || ९ || प्रभो! घर, स्त्री, पुत्र, धन और भाई - बन्धुओंमें हमारी आसक्ति न हो; यदि हो तो केवल भगवान्के प्रेमी भक्तोंमें ही । जो संयमी पुरुष केवल शरीर - निर्वाहके योग्य अन्नादिसे सन्तुष्ट रहता है, उसे जितनी शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है, वैसी इन्द्रिय- लोलुप पुरुषको नहीं होती ॥१० ॥
यत्सङ्गलब्धं निजवीर्यवैभवं तीर्थं मुहुः संस्पृशतां हि मानसम् । हरत्यजोऽन्तः श्रुतिभिर्गतोऽङ्गजं को वै न सेवेत मुकुन्दविक्रमम् ॥११ यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुराः । हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणा मनोरथेनासति धावतो बहिः ॥१२ हरिर्हि साक्षाद्भगवान् शरीरिणा-मात्मा झषाणामिव तोयमीप्सितम् । हित्वा महांस्तं यदि सज्जते गृहे तदा महत्त्वं वयसा दम्पतीनाम् ॥१३ तस्माद्रजोरागविषादमन्यु-मानस्पृहाभयदैन्याधिमूलम् । हित्वा गृहं संसृतिचक्रवालं नृसिंहपादं भजताकुतोभयमिति ॥ १४ केतुमालेऽपि भगवान् कामदेवस्वरूपेण लक्ष्म्याः प्रियचिकीर्षया प्रजापतेर्दुहितॄणां ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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पुरुषायुषाहोरात्रपरिसंख्यानानां विध्वस्ता यासां व्यसवः पुत्राणां तद्वर्षपतीनां महापुरुषमहास्त्रतेजसोद्वेजितमनसां विनिपतन्ति || १५ || गर्भा संवत्सरान्ते उन भगवद्भक्तोंके संगसे भगवान् के तीर्थतुल्य पवित्र चरित्र सुननेको मिलते हैं, जो उनकी असाधारण शक्ति एवं प्रभावके सूचक होते हैं । उनका बार - बार सेवन करनेवालोंके कानोंके रास्तेसे भगवान् हृदयमें प्रवेश कर जाते हैं और उनके सभी प्रकारके दैहिक और मानसिक मलोंको नष्ट कर देते हैं । फिर भला उन भगवद्भक्तोंका संग कौन न करना चाहेगा? ॥११ ॥
जिस पुरुषकी भगवान्में निष्काम भक्ति है, उसके हृदयमें समस्त देवता धर्म - ज्ञानादि सम्पूर्ण सद्गुणोंके सहित सदा निवास करते हैं । किन्तु जो भगवान्का भक्त नहीं है, उसमें महापुरुषोंके वे गुण आ ही कहाँसे सकते हैं? वह तो तरह - तरहके संकल्प करके निरन्तर तुच्छ बाहरी विषयोंकी ओर ही दौड़ता रहता है ॥१२ ॥
जैसे मछलियोंको जल अत्यन्त प्रिय – उनके जीवनका आधार होता है, उसी प्रकार साक्षात् श्रीहरि ही समस्त देहधारियोंके प्रियतम आत्मा हैं । उन्हें त्यागकर यदि कोई महत्त्वाभिमानी पुरुष घरमें आसक्त रहता है तो उस दशामें स्त्री - पुरुषोंका बड़प्पन केवल आयुको लेकर ही माना जाता है; गुणकी दृष्टिसे नहीं ॥१३ ॥
अतः असुरगण! तुम तृष्णा, राग, विषाद, क्रोध, अभिमान, इच्छा, भय, दीनता और मानसिक सन्तापके मूल तथा जन्म - मरणरूप संसारचक्रका वहन करनेवाले गृह आदिको त्यागकर भगवान् नृसिंहके निर्भय चरणकमलोंका आश्रय लो ' ॥१४ ॥
केतुमालवर्षमें लक्ष्मीजीका तथा संवत्सर नामक प्रजापतिके पुत्र और पुत्रियोंका प्रिय करनेके लिये भगवान् कामदेवरूपसे निवास करते हैं । उन रात्रिकी अभिमानी देवतारूप कन्याओं और दिवसाभिमानी देवतारूप पुत्रोंकी संख्या मनुष्यकी सौ वर्षकी आयुके दिन और रातके बराबर अर्थात् छत्तीस - छत्तीस हजार वर्ष है और वे ही उस वर्षके अधिपति हैं । वे कन्याएँ परमपुरुष श्रीनारायणके श्रेष्ठ अस्त्र सुदर्शनचक्रके तेजसे डर जाती हैं; इसलिये प्रत्येक वर्षके अन्तमें उनके गर्भ नष्ट होकर गिर जाते हैं ॥१५ ॥
अतीव सुललितगतिविलासविलसित-रुचिरहासलेशावलोकलीलयाकिञ्चिदुत्तम्भित - सुन्दर भूमण्डलसुभगवदनारविन्दश्रिया रमां रमयन्निन्द्रियाणि रमयते ॥१६ ॥
तद्भगवतो मायामयं रूपं परमसमाधि - योगेन रमा देवी संवत्सरस्य रात्रिषु प्रजापतेर्दुहितृभिरुपेताहःसु च तद्भर्तृभिरुपास्ते इदं चोदाहरति ॥१७ ॥
ॐ ह्रां ह्रीं हूं ॐ नमो भगवते हृषीकेशाय सर्वगुणविशेषैर्विलक्षितात्मने आकूतीनां चित्तीनां चेतसां विशेषाणां चाधिपतये षोडशकलायच्छन्दोमयायान्नमयायामृतमयाय सर्वमयाय सहसे ओजसे बलाय कान्ताय कामाय नमस्ते उभयत्र भूयात् ॥१८ ॥
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स्त्रियो व्रतैस्त्वा हृषिकेश्वरं स्वतो ह्याराध्य लोके पतिमाशासतेऽन्यम् । तासां न ते वै परिपान्त्यपत्यं प्रियं धनायूंषि यतोऽस्वतन्त्राः ॥१९ स वै पतिः स्यादकुतोभयः स्वयं समन्ततः पाति भयातुरं जनम् । स एक एवेतरथा मिथो भयं नैवात्मलाभादधि मन्यते परम् ॥२० या तस्य ते पादसरोरुहार्हणं निकामयेत्साखिलकामलम्पटा । तदेव रासीप्सितमीप्सितोऽर्चितो यद्भग्नयाच्ञा भगवन् प्रतप्यते ॥२१ भगवान् अपने सुललित गति - विलास से सुशोभित मधुर - मधुर मन्द - मुसकानसे मनोहर लीलापूर्ण चारु चितवनसे कुछ उझके हुए सुन्दर भ्रूमण्डलकी छबीली छटाके द्वारा वदनारविन्दका राशि - राशि सौन्दर्य उँडेलकर सौन्दर्यदेवी श्रीलक्ष्मीको अत्यन्त आनन्दित करते और स्वयं भी आनन्दित होते रहते हैं ॥ १६ ॥ श्रीलक्ष्मीजी परम समाधियोगके द्वारा
भगवान्के उस मायामय स्वरूपकी रात्रिके समय प्रजापति संवत्सरकी कन्याओंसहित और दिनमें उनके पतियोंके सहित आराधना और वे इस मन्त्रका जप करती हुई भगवान्की स्तुति करती हैं ॥१७ ॥ ‘ जो इन्द्रियोंके नियन्ता और सम्पूर्ण श्रेष्ठ वस्तुओंके आकर हैं, क्रियाशक्ति,
ज्ञानशक्ति और संकल्प - अध्यवसाय आदि चित्तके धर्मों तथा उनके विषयोंके अधीश्वर हैं, ग्यारह इन्द्रिय और पाँच विषय - इन सोलह कलाओंसे युक्त हैं, वेदोक्त कर्मोंसे प्राप्त होते हैं तथा अन्नमय, अमृतमय और सर्वमय हैं - उन मानसिक, ऐन्द्रियक एवं शारीरिक बलस्वरूप परम सुन्दर भगवान् काम - देवको ' ॐ ह्रां ह्रीं हूं ' इन बीजमन्त्रोंके सहित सब ओरसे नमस्कार है ' ॥१८ ॥
' भगवन्! आप इन्द्रियोंके अधीश्वर हैं । स्त्रियाँ तरह - तरहके कठोर व्रतोंसे आपकी ही आराधना करके अन्य लौकिक पतियोंकी इच्छा किया करती हैं । किन्तु वे उनके प्रिय पुत्र, धन और आयुकी रक्षा नहीं कर सकते; क्योंकि वे स्वयं ही परतन्त्र हैं ॥ १ ९ ॥ सच्चा पति ( रक्षा करनेवाला या ईश्वर ) वही है, जो स्वयं सर्वथा निर्भय हो और दूसरे भयभीत लोगोंकी सब प्रकारसे रक्षा कर सके । ऐसे पति एकमात्र आप ही हैं; यदि एकसे अधिक ईश्वर माने जायँ, तो उन्हें एक - दूसरेसे भय होनेकी सम्भावना है । अतएव आप अपनी प्राप्तिसे बढ़कर और किसी लाभको नहीं मानते || २० || भगवन्! जो स्त्री आपके चरणकमलोंका पूजन ही चाहती है और किसी वस्तुकी इच्छा नहीं करती - उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं; किन्तु जो ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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किसी एक कामनाको लेकर आपकी उपासना करती है, उसे आप केवल वही वस्तु देते हैं । और जब भोग समाप्त होनेपर वह नष्ट हो जाती है तो उसके लिये उसे सन्तप्त होना पड़ता है ॥२१ ॥
मत्प्राप्तयेऽजेशसुरासुरादय-स्तप्यन्त उग्रं तप ऐन्द्रियेधियः । ऋते भवत्पादपरायणान्न मां विन्दन्त्यहं त्वद्धृदया यतोऽजित ॥२२ स त्वं ममाप्यच्युत शीर्ष्णि वन्दितं कराम्बुजं यत्त्वदधायि सात्वताम् । बिभर्षि मां लक्ष्म वरेण्य मायया क ईश्वरस्येहितमूहितुं विभुरिति ॥२३ रम्यके च भगवतः प्रियतमं मात्स्यमवताररूपं तद्वर्षपुरुषस्य मनोः प्राक्प्रदर्शितं स इदानीमपि महता भक्तियोगेनाराधयतीदं चोदाहरति || २४ || ॐ नमो भगवते मुख्यतमाय नमः सत्त्वाय प्राणायौजसे सहसे बलाय महामत्स्याय नम इति ॥२५ ॥
अन्तर्बहिश्चाखिललोकपालकै-रदृष्टरूपो विचरस्युरुस्वनः ।
स ईश्वरस्त्वं य इदं वशेऽनय-न्नाम्ना यथा दारुमयीं नरः स्त्रियम् ॥२६
यं लोकपालाः किल मत्सरज्वरा हित्वा यतन्तोऽपि पृथक् समेत्य च । पातुं न शेकुर्द्विपदश्चतुष्पदः सरीसृपं स्थाणु यदत्र दृश्यते ॥२७ अजित! मुझे पानेके लिये इन्द्रिय - सुखके अभिलाषी ब्रह्मा और रुद्र आदि समस्त सुरासुरगण घोर तपस्या करते रहते हैं; किन्तु आपके चरण - कमलोंका आश्रय लेनेवाले भक्तके सिवा मुझे कोई पा नहीं सकता; क्योंकि मेरा मन तो आपमें ही लगा रहता है ॥२२ ॥
अच्युत! आप अपने जिस वन्दनीय करकमलको भक्तोंके मस्तकपर रखते हैं, उसे मेरे सिरपर भी रखिये । वरेण्य! आप मुझे केवल श्रीलांछनरूपसे अपने वक्षःस्थलमें ही धारण करते हैं; सो आप सर्वसमर्थ हैं, आप अपनी मायासे जो लीलाएँ करते हैं, उनका रहस्य कौन जान सकता है? ॥२३ ॥
रम्यकवर्षमें भगवान्ने वहाँके अधिपति मनुको पूर्वकालमें अपना परम प्रिय मत्स्यरूप दिखाया था । मनुजी इस समय भी भगवान्के उसी रूपकी बड़े भक्तिभावसे उपासना करते हैं ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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और इस मन्त्रका जप करते हुए स्तुति करते हैं - ' सत्त्वप्रधान मुख्य प्राण सूत्रात्मा तथा मनोबल, इन्द्रियबल और शरीरबल ओंकारपदके अर्थ सर्वश्रेष्ठ भगवान् महामत्स्यको बार - बार नमस्कार है ' ॥२४-२५ ॥ प्रभो! नट जिस प्रकार कठपुतलियोंको नचाता है, उसी प्रकार आप ब्राह्मणादि नामोंकी डोरीसे सम्पूर्ण विश्वको अपने अधीन करके नचा रहे हैं । अतः आप ही सबके प्रेरक हैं । आपको ब्रह्मादि लोकपालगण भी नहीं देख सकते; तथापि आप समस्त प्राणियोंके भीतर प्राणरूपसे और बाहर वायु - रूपसे निरन्तर संचार करते रहते हैं । वेद ही आपका महान् शब्द है ॥२६ ॥
एक बार इन्द्रादि इन्द्रियाभिमानी देवताओंको प्राणस्वरूप आपसे डाह हुआ । तब आपके अलग हो जानेपर वे अलग - अलग अथवा आपसमें मिलकर भी मनुष्य, पशु, स्थावर-जंगम आदि जितने शरीर दिखायी देते हैं - उनमें से किसीकी बहुत यत्न करनेपर भी रक्षा नहीं कर सके ॥२७ ॥
भवान् युगान्तार्णव ऊर्मिमालिनि क्षोणीमिमामोषधिवीरुधां निधिम् । मया सहोरु क्रमतेऽज ओजसा तस्मै जगत्प्राणगणात्मने नम इति ॥२८ हिरण्मयेऽपि भगवान्निवसति कूर्मतनुं बिभ्राणस्तस्य तत्प्रियतमां तनुमर्यमा सह वर्षपुरुषैः पितृगणधिपतिरुपधावति मन्त्रमिमं चानुजपति ॥२९ ॥
ॐ नमो भगवते अकूपाराय सर्वसत्त्वगुणविशेषणायानुपलक्षितस्थानाय नमो वर्ष्मणे नमो भूम्ने नमो नमोऽवस्थानाय नमस्ते ॥३० ॥
यद्रूपमेतन्निजमाययार्पित-मर्थस्वरूपं बहुरूपरूपितम् । संख्या न यस्यास्त्ययथोपलम्भनात् तस्मै नमस्तेऽव्यपदेशरूपिणे ॥३१ जरायुजं स्वेदजमण्डजोद्भिदं
चराचरं देवर्षिपितृभूतमैन्द्रियम् ।
द्यौः खं क्षितिः शैलसरित्समुद्र-द्वीपग्रहर्क्षेत्यभिधेय एकः ॥३२
यस्मिन्नसंख्येयविशेषनाम-रूपाकृतौ कविभिः कल्पितेयम् । संख्या यया तत्त्वदृशापनीयते तस्मै नमः सांख्यनिदर्शनाय ते इति ॥ ३३ उत्तरेषु च कुरुषु भगवान् यज्ञपुरुषः कृतवराहरूप आस्ते तं तु देवी हैषा भूः सह ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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कुरुभिरस्खलितभक्तियोगेनोपधावति इमां च परमामुपनिषदमावर्तयति ॥३४ ॥
अजन्मा प्रभो! आपने मेरे सहित समस्त औषध और लताओंकी आश्रयरूपा इस पृथ्वीको लेकर बड़ी - बड़ी उत्ताल तरंगोंसे युक्त प्रलयकालीन समुद्रमें बड़े उत्साहसे विहार किया था । आप संसारके समस्त प्राणसमुदायके नियन्ता हैं; मेरा आपको नमस्कार है ' ॥२८ ॥
हिरण्मयवर्षमें भगवान् कच्छपरूप धारण करके रहते हैं । वहाँके निवासियोंके सहित पितृराज अर्यमा भगवानकी उस प्रियतम मूर्तिकी उपासना करते हैं और इस मन्त्रको निरन्तर जपते हुए स्तुति करते हैं ॥ २ ९ ॥ – ' जो सम्पूर्ण सत्त्वगुणसे युक्त हैं, जलमें विचरते रहनेके कारण जिनके स्थानका कोई निश्चय नहीं है तथा जो कालकी मर्यादाके बाहर हैं, उन ओंकारस्वरूप सर्वव्यापक सर्वाधार भगवान् कच्छपको बार - बार नमस्कार है ' ॥३० ॥
भगवन्! अनेक रूपोंमें प्रतीत होनेवाला यह दृश्यप्रपंच यद्यपि मिथ्या ही निश्चय होता है, इसलिये इसकी वस्तुतः कोई संख्या नहीं है; तथापि यह मायासे प्रकाशित होनेवाला आपका ही रूप है । ऐसे अनिर्वचनीयरूप आपको मेरा नमस्कार है ॥ ३१ ॥
एकमात्र आप ही जरायुज, स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, जंगम, स्थावर, देवता, ऋषि, पितृगण, भूत, इन्द्रिय, स्वर्ग, आकाश, पृथ्वी, पर्वत, नदी, समुद्र, द्वीप, ग्रह और तारा आदि विभिन्न नामोंसे प्रसिद्ध हैं || ३२ || आप असंख्य नाम, रूप और आकृतियोंसे युक्त हैं; कपिलादि विद्वानोंने जो आपमें चौबीस तत्त्वोंकी संख्या निश्चित की है - वह जिस तत्त्वदृष्टिका उदय होनेपर निवृत्त हो जाती है, वह भी वस्तुतः आपका ही स्वरूप है । ऐसे सांख्यसिद्धान्तस्वरूप आपको मेरा नमस्कार है ' ॥३३ ॥
उत्तर कुरुवर्षमें भगवान् यज्ञपुरुष वराहमूर्ति धारण करके विराजमान हैं । वहाँके निवासियोंके सहित साक्षात् पृथ्वीदेवी उनकी अविचल भक्तिभावसे उपासना करती और इस परमोत्कृष्ट मन्त्रका जप करती हुई स्तुति करती हैं— ॥३४ ॥
ॐ नमो भगवते मन्त्रतत्त्वलिङ्गाय यज्ञक्रतवे महाध्वरावयवाय महापुरुषाय नमः कर्मशुक्लाय त्रियुगाय नमस्ते ॥ ३५ ॥
यस्य स्वरूपं कवयो विपश्चितो गुणेषु दारुष्विव जातवेदसम् । मथ्नन्ति मथ्ना मनसा दिदृक्षवो गूढं क्रियार्थैर्नम ईरितात्मने ॥३६
द्रव्यक्रियाहेत्वयनेशकर्तृभि-र्मायागुणैर्वस्तुनिरीक्षितात्मने ।
अन्वीक्षयाङ्गातिशयात्मबुद्धिभि-र्निरस्तमायाकृतये नमो नमः ॥३७
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करोति विश्वस्थितिसंयमोदयं यस्येप्सितं नेप्सितमीक्षितुर्गुणैः । माया यथाऽयो भ्रमते तदाश्रयं ग्राव्णो नमस्ते गुणकर्मसाक्षिणे ॥३८ प्रमथ्य दैत्यं प्रतिवारणं मृधे यो मां रसाया जगदादिसूकरः । कृत्वाग्रदंष्ट्रे निरगादुदन्वतः क्रीडन्निवेभः प्रणतास्मि तं विभुमिति ॥३९ ‘ जिनका तत्त्व मन्त्रोंसे जाना जाता है, जो यज्ञ और क्रतुरूप हैं तथा बड़े - बड़े यज्ञ जिनके अंग हैं — उन ओंकारस्वरूप शुक्लकर्ममय त्रियुगमूर्ति पुरुषोत्तम भगवान् वराहको बार - बार नमस्कार है ' ॥३५ ॥
‘ ऋत्विजुगण जिस प्रकार अरणिरूप काष्ठखण्डोंमें छिपी हुई अग्निको मन्थनद्वारा प्रकट करते हैं, उसी प्रकार कर्मासक्ति एवं कर्मफलकी कामनासे छिपे हुए जिनके रूपको देखनेकी इच्छासे परमप्रवीण पण्डितजन अपने विवेकयुक्त मनरूप मन्थनकाष्ठसे शरीर एवं इन्द्रियादिको बिलो डालते हैं । इस प्रकार मन्थन करनेपर अपने स्वरूपको प्रकट करनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ३६ ॥ विचार तथा यम - नियमादि योगांगोंके साधनसे जिनकी बुद्धि
निश्चयात्मिका हो गयी है - वे महापुरुष द्रव्य ( विषय ), क्रिया ( इन्द्रियोंके व्यापार ), हेतु ( इन्द्रियाधिष्ठाता देवता ), अयन ( शरीर ), ईश, काल और कर्ता ( अहंकार ) आदि मायाके कार्योंको देखकर जिनके वास्तविक स्वरूपका निश्चय करते हैं ऐसे मायिक आकृतियोंसे रहित आपको बार - बार नमस्कार है ॥ ३७ ॥ जिस प्रकार लोहा जड होनेपर भी चुम्बककी
सन्निधिमात्रसे चलने - फिरने लगता है, उसी प्रकार जिन सर्वसाक्षीकी इच्छामात्रसे - जो अपने लिये नहीं, बल्कि समस्त प्राणियोंके लिये होती है - प्रकृति अपने गुणोंके द्वारा जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करती रहती है; ऐसे सम्पूर्ण गुणों एवं कर्मोंके साक्षी आपको नमस्कार है ॥३८ ॥
आप जगत्के कारणभूत आदिसूकर हैं । जिस प्रकार एक हाथी दूसरे हाथीको पछाड़ देता है, उसी प्रकार गजराजके समान क्रीडा करते हुए आप युद्धमें अपने प्रतिद्वन्द्वी हिरण्याक्ष दैत्यको दलित करके मुझे अपनी दाढ़ोंकी नोकपर रखकर रसातलसे प्रलयपयोधिके बाहर निकले थे । मैं आप सर्वशक्तिमान् प्रभुको बार - बार नमस्कार करती हूँ ' ॥३९ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे भुवनकोशवर्णनं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥१८ ॥
१. प्रा ० पा ० — व्यवधानमनन्यभक्ति । २. प्रा ० पा ० — शयान् तमो ग्रस ॐ । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथैकोनविंशोऽध्यायः किम्पुरुष और भारतवर्षका वर्णन श्रीशुक उवाच किम्पुरुषे वर्षे भगवन्तमादिपुरुषं तच्चरणसंनिकर्षाभिरतः अविरतभक्तिरुपास्ते ॥१ ॥
लक्ष्मणाग्रजं सीताभिरामं रामं परमभागवतो हनुमान् सह किम्पुरुषः आर्ष्टिषेणेन सह गन्धर्वैरनुगीयमानां परमकल्याणीं भर्तृभगवत्कथां समुपशृणोति स्वयं चेदं गायति ॥२ ॥
ॐ नमो भगवते उत्तमश्लोकाय नम आर्यलक्षणशीलव्रताय नम उपशिक्षितात्मन उपासितलोकाय नमः साधुवादनिकषणाय नमो ब्रह्मण्यदेवाय महापुरुषाय महाराजाय नम इति || ३ || यत्तद्विशुद्धानुभवमात्रमेकं स्वतेजसा ध्वस्तगुणव्यवस्थम् । प्रत्यक् प्रशान्तं सुधियोपलम्भनं ह्यनामरूपं निरहं प्रपद्ये ॥४ मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभोः । कुतोऽन्यथा स्याद्रमतः स्व आत्मनः सीताकृतानि व्यसनानीश्वरस्य ॥५ श्रीशुकदेवजी कहते हैं- राजन्! किम्पुरुषवर्षमें श्रीलक्ष्मणजीके बड़े भाई, आदिपुरुष, सीताहृदयाभिराम भगवान् श्रीरामके चरणोंकी सन्निधिके रसिक परम भागवत श्रीहनुमान्जी अन्य किन्नरोंके सहित अविचल भक्तिभावसे उनकी उपासना करते हैं ॥ १ ॥
वहाँ अन्य गन्धर्वोंके सहित आर्ष्टिषेण उनके स्वामी भगवान् रामकी परम कल्याणमयी गुणगाथा गाते रहते हैं । श्रीहनुमान्जी उसे सुनते हैं और स्वयं भी इस मन्त्रका जप करते हुए इस प्रकार उनकी स्तुति करते हैं ॥२ ॥
‘ हम ॐकारस्वरूप पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीरामको नमस्कार करते हैं । आपमें सत्पुरुषोंके लक्षण, शील और आचरण विद्यमान हैं; आप बड़े ही संयतचित्त, लोकाराधनतत्पर, साधुताकी परीक्षाके लिये कसौटीके समान और अत्यन्त ब्राह्मणभक्त हैं । ऐसे महापुरुष महाराज रामको हमारा पुनः पुनः प्रणाम है ' ॥३ ॥
' भगवन्! आप विशुद्ध बोधस्वरूप, अद्वितीय, अपने स्वरूपके प्रकाशसे गुणोंके ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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कार्यरूप जाग्रदादि सम्पूर्ण अवस्थाओंका निरास करनेवाले, सर्वान्तरात्मा, परम शान्त, शुद्ध बुद्धिसे ग्रहण किये जानेयोग्य, नाम - रूपसे रहित और अहंकारशून्य हैं; मैं आपकी शरणमें हू॥४ ॥
प्रभो! आपका मनुष्यावतार केवल राक्षसोंके वधके लिये ही नहीं है, इसका मुख्य उद्देश्य तो मनुष्योंको शिक्षा देना है! अन्यथा, अपने स्वरूपमें ही रमण करनेवाले साक्षात् जगदात्मा जगदीश्वरको सीताजीके वियोगमें इतना दुःख कैसे हो सकता था ॥ ५ ॥
न वै स आत्माऽऽत्मवतां सुहृत्तमः सक्तस्त्रिलोक्यां भगवान् वासुदेवः । न स्त्रीकृतं कश्मलमश्नुवीत न लक्ष्मणं चापि विहातुमर्हति ॥६ न जन्म नूनं महतो न सौभगं
न वाङ् न बुद्धिर्नाकृतिस्तोषहेतुः ।
तैर्यद्विसृष्टानपि नो वनौकस-श्चकार सख्ये बत लक्ष्मणाग्रजः ॥७
सुरोऽसुरो वाप्यथ वानरो नरः सर्वात्मना यः सुकृतज्ञमुत्तमम् । भजेत रामं मनुजाकृतिं हरिं भारतेऽपि य उत्तराननयत्कोसलान्दिवमिति ॥८ वर्षे आकल्पान्तमुपचितधर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्योपशमो भगवान्नरनारायणाख्य-परमात्मोपलम्भनमनुग्रहायात्मवतामनुकम्पया तपोऽव्यक्तगतिश्चरति ॥९ ॥
आप धीर पुरुषोंके आत्मा * और प्रियतम भगवान् वासुदेव हैं; त्रिलोकीकी किसी भी वस्तुमें आपकी आसक्ति नहीं है । आप न तो सीताजीके लिये मोहको ही प्राप्त हो सकते हैं और न लक्ष्मणजीका त्याग ही कर सकते हैं ॥६ ॥ आपके ये व्यापार केवल लोकशिक्षाके
लिये ही हैं । लक्ष्मणाग्रज! उत्तम कुलमें जन्म, सुन्दरता, वाक्चातुरी, बुद्धि और श्रेष्ठ योनि— इनमें से कोई भी गुण आपकी प्रसन्नताका कारण नहीं हो सकता, यह बात दिखानेके लिये ही आपने इन सब गुणोंसे रहित हम वनवासी वानरोंसे मित्रता की है || ७ || देवता, असुर, वानर अथवा मनुष्य — कोई भी हो, उसे सब प्रकारसे श्रीरामरूप आपका ही भजन करना चाहिये; क्योंकि आप नररूपमें साक्षात् श्रीहरि ही हैं और थोड़े कियेको भी बहुत अधिक मानते हैं । आप ऐसे आश्रितवत्सल हैं कि जब स्वयं दिव्यधामको सिधारे थे, तब समस्त उत्तरकोसलवासियोंको भी अपने साथ ही ले गये थे ' ॥ ८ ॥
भारतवर्षमें भी भगवान् दयावश नर - नारायणरूप धारण करके संयमशील पुरुषोंपर ****** ebook converter DEMO Watermarks *******