श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1031–1040
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1031–1040
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उस नदीके दोनों किनारोंकी मिट्टी उस रससे भीगकर जब वायु और सूर्यके संयोगसे सूख जाती है, तब वही देवलोकको विभूषित करनेवाला जाम्बूनद नामका सोना बन जाती है ॥२० ॥ इसे देवता और गन्धर्वादि अपनी तरुणी स्त्रियोंके सहित मुकुट, कंकण और
करधनी आदि आभूषणोंके रूपमें धारण करते हैं ॥२१ ॥
सुपार्श्व पर्वतपर जो विशाल कदम्बवृक्ष है, उसके पाँच कोटरोंसे मधुकी पाँच धाराएँ निकलती हैं; उनकी मोटाई पाँच पुरसे जितनी है । ये सुपार्श्वके शिखरसे गिरकर इलावृतवर्षके पश्चिमी भागको अपनी सुगन्धसे सुवासित करती हैं ॥ २२ ॥ जो लोग इनका मधुपान करते हैं,
उनके मुखसे निकली हुई वायु अपने चारों ओर सौ - सौ योजनतक इसकी महक फैला देती है ॥२३ ॥
एवं कुमुदनिरूढो यः शतवल्शो नाम वटस्तस्य स्कन्धेभ्यो नीचीनाः पयोदधिमधुघृत - गुडान्नाद्यम्बरशय्यासनाभरणादयः सर्व एव कामदुघा नदाः कुमुदाग्रात्पतन्तस्तमुत्तरे - णेलावृतमुपयोजयन्ति ॥२४ ॥ यानुपजुषाणानां न
कदाचिदपि प्रजानां वलीपलितक्लमस्वेद-दौर्गन्ध्यजरामयमृत्युशीतोष्णवैवर्ण्योपसर्गादय - स्तापविशेषा भवन्ति यावज्जीवं सुखं निरतिशयमेव || २५ || कुरङ्गकुररकुसुम्भवैकङ्कत्रिकूटशिशिर-पतङ्गरुचकनिषधशिनीवासकपिलशङ्खवैदूर्य-जारुधिहंसर्षभनागकालञ्जरनारदादयो विंशति - गिरयो मेरोः कर्णिकाया इव केसरभूता मूलदेशे परित उपक्लृप्ताः ॥२६ ॥ जठरदेवकूटौ मेरुं
पूर्वेणाष्टादशयोजनसहस्रमुदगायतौ द्विसहस्रं पृथुतुङ्गौ भवतः । एवमपरेण पवनपारियात्रौ दक्षिणेन कैलासकरवीरौ प्रागायतावेवमुत्तरतस्त्रिशृङ्गमकरावष्टभिरेतैः परिस्तृतोऽग्निरिव परितश्चकास्ति काञ्चनगिरिः || २७ || मेरोर्मूर्धनि भगवत आत्म-योनेर्मध्यत उपक्लृप्तां पुरीमयुतयोजनसाहस्रीं समचतुरस्रां शातकौम्भीं वदन्ति ॥२८ ॥
तामनु परितो लोकपालानामष्टानां यथादिशं यथारूपं तुरीयमानेन पुरोऽष्टावुपक्लृप्ताः ॥२९ ॥
इसी प्रकार कुमुद पर्वतपर जो शतवल्श नामका वटवृक्ष है, उसकी जटाओंसे नीचेकी ओर बहनेवाले अनेक नद निकलते हैं, वे सब इच्छानुसार भोग देनेवाले हैं । उनसे दूध, दही, मधु, घृत, गुड़, अन्न, वस्त्र, शय्या, आसन और आभूषण आदि सभी पदार्थ मिल सकते हैं । ये सब कुमुदके शिखरसे गिरकर इलावृतके उत्तरी भागको सींचते हैं || २४ || इनके दिये हुए पदार्थोंका उपभोग करनेसे वहाँकी प्रजाकी त्वचामें झुर्रियाँ पड़ जाना, बाल पक जाना, थकान होना, शरीरमें पसीना आना तथा दुर्गन्ध निकलना, बुढ़ापा, रोग, मृत्यु, सर्दी - गरमीकी पीड़ा, शरीरका कान्तिहीन हो जाना तथा अंगोंका टूटना आदि कष्ट कभी नहीं सताते और उन्हें जीवनपर्यन्त पूरा - पूरा सुख प्राप्त होता है ॥२५ ॥
राजन्! कमलकी कर्णिकाके चारों ओर जैसे केसर होता है – उसी प्रकार मेरुके मूलदेशमें उसके चारों ओर कुरंग, कुरर, कुसुम्भ, वैकंक, त्रिकूट, शिशिर, पतंग, रुचक, ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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निषध, शिनीवास, कपिल, शंख, वैदूर्य, जारुधि, हंस, ऋषभ, नाग, कालंजर और नारद आदि बीस पर्वत और हैं ॥२६ ॥ इनके सिवा मेरुके पूर्वकी ओर जठर और देवकूट नामके दो पर्वत
हैं, जो अठारह अठारह हजार योजन लंबे तथा दो - दो हजार योजन चौड़े और ऊँचे हैं । इसी प्रकार पश्चिमकी ओर पवन और पारियात्र, दक्षिणकी ओर कैलास और करवीर तथा उत्तरकी ओर त्रिशृंग और मकर नामके पर्वत हैं । इन आठ पहाड़ोंसे चारों ओर घिरा हुआ सुवर्णगिरि मेरु अग्निके समान जगमगाता रहता है ॥२७ ॥ कहते हैं, मेरुके शिखरपर बीचोबीच भगवान्
ब्रह्माजीकी सुवर्णमयी पुरी है - जो आकारमें समचौरस तथा करोड़ योजन विस्तारवाली है ॥२८ ॥ उसके नीचे पूर्वादि आठ दिशा और उपदिशाओंमें उनके अधिपति इन्द्रादि आठ
लोकपालोंकी आठ पुरियाँ हैं । वे अपने - अपने स्वामीके अनुरूप उन्हीं उन्हीं दिशाओंमें हैं तथा परिमाणमें ब्रह्माजीकी पुरीसे चौथाई हैं ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे भुवनकोशवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥१६ ॥
१. प्रा ० पा ० — मनुमादयन्ति । २. प्रा ० पा ० — यो ह्युप । ३. प्रा ० पा ० – मुखनिःश्वसितो । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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तत्र अथ सप्तदशोऽध्यायः गंगाजीका विवरण और भगवान् शंकरकृत संकर्षणदेवकी स्तुति श्रीशुक उवाच भगवतः साक्षाद्यज्ञलिङ्गस्य विष्णो - विक्रमतो वामपादाङ्गुष्ठनखनिर्भिन्नोर्ध्वाण्ड कटाहविवरेणान्तः प्रविष्ट या बाह्यजलधारा तच्चरणपङ्कजावनेजनारुणकिञ्जल्कोपरञ्जिता अखिलजगदघमलापहोपस्पर्शनामला साक्षाद् भगवत्पदीत्यनुपलक्षितवचोऽभिधीयमानातिमहता कालेन युगसहस्रोपलक्षणेन दिवो मूर्धन्यवततार यत्तद्विष्णुपदमाहुः || १ || यत्र ह वाव वीरव्रत औत्तानपादिः परमभागवतोऽस्मत्कुलदेवता - चरणारविन्दोदकमिति भगवद्भक्तियोगेन दृढं औत्कण्ठ्यविवशामीलितलोचनयुगलकुड्मल-यामनुसवनमुत्कृष्यमाण-क्लिद्यमानान्तर्हृदय विगलितामलबाष्पकलयाभिव्यज्यमानरोम - पुलककुलकोऽधुनापि परमादरेण शिरसा बिभर्ति ॥२ ॥
ततः सप्त ऋषयस्तत्प्रभावाभिज्ञा यां ननु तपस आत्यन्तिकी सिद्धिरेतावती भगवति सर्वात्मनि वासुदेवेऽनुपरतभक्तियोग लाभेनैवोपेक्षितान्यार्थात्मगतयो मुक्तिमिवागतां मुमुक्षव इव बहुमानमद्यापि जटाजूटैरुद्वहन्ति ॥३ ॥
ततोऽनेकसहस्रकोटि - विमानानीकसङ्कुलदेवयानेनावतरन्तीन्दुमण्डल - मावार्य ब्रह्मसदने निपतति ॥४ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - राजन्! जब राजा बलिकी यज्ञशालामें साक्षात् यज्ञमूर्ति भगवान् विष्णुने त्रिलोकीको नापनेके लिये अपना पैर फैलाया, तब उनके बायें पैरके अँगूठेके नखसे ब्रह्माण्डकटाहका ऊपरका भाग फट गया । उस छिद्रमें होकर जो ब्रह्माण्डसे बाहरके जलकी धारा आयी, वह उस चरणकमलको धोनेसे उसमें लगी हुई केसरके मिलनेसे लाल हो गयी । उस निर्मल धाराका स्पर्श होते ही संसारके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं, किन्तु वह सर्वथा निर्मल ही रहती है । पहले किसी और नामसे न पुकारकर उसे ' भगवत्पदी ' ही कहते थे । वह धारा हजारों युग बीतने पर स्वर्गके शिरोभागमें स्थित ध्रुवलोकमें उतरी, जिसे ' विष्णुपद ' भी कहते हैं ॥१ ॥ वीरव्रत परीक्षित्! उस ध्रुवलोकमें उत्तानपादके पुत्र परम भागवत ध्रुवजी रहते
हैं । वे नित्यप्रति बढ़ते हुए भक्तिभावसे ' यह हमारे कुलदेवताका चरणोदक है ' ऐसा मानकर आज भी उस जलको बड़े आदरसे सिरपर चढ़ाते हैं । उस समय प्रेमावेशके कारण उनका हृदय अत्यन्त गद्गद हो जाता है, उत्कण्ठावश बरबस मुँदे हुए दोनों नयनकमलोंसे निर्मल आँसुओंकी धारा बहने लगती है और शरीरमें रोमांच हो आता है ॥२ ॥
इसके पश्चात् आत्मनिष्ठ सप्तर्षिगण उनका प्रभाव जाननेके कारण ‘ यही तपस्याकी ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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आत्यन्तिक सिद्धि है ' ऐसा मानकर उसे आज भी इस प्रकार आदरपूर्वक अपने जटाजूटपर वैसे ही धारण करते हैं, जैसे मुमुक्षुजन प्राप्त हुई मुक्तिको । यों ये बड़े ही निष्काम हैं; सर्वात्मा भगवान् वासुदेवकी निश्चल भक्तिको ही अपना परम धन मानकर इन्होंने अन्य सभी कामनाओंको त्याग दिया है, यहाँतक कि आत्मज्ञानको भी ये उसके सामने कोई चीज नहीं समझते ॥३ ॥ वहाँसे गंगाजी करोड़ों विमानोंसे घिरे हुए आकाशमें होकर उतरती हैं और
चन्द्रमण्डलको आप्लावित करती मेरुके शिखरपर ब्रह्मपुरीमें गिरती हैं ॥४ ॥
तत्र चतुर्धा भिद्यमाना चतुर्भिर्नामभिश्चतुर्दिशमभिस्पन्दन्ती नदनदीपतिमेवाभि-निविशति सीतालकनन्दा चक्षुर्भद्रेति || ५ || सीता तु ब्रह्मसदनात्केसराचलादिगिरि-शिखरेभ्योऽधोऽधः प्रस्रवन्ती गन्धमादनमूर्धसु पतित्वान्तरेण भद्राश्ववर्षं प्राच्यां दिशि क्षारसमुद्रमभिप्रविशति ॥६ ॥
एवं माल्यवच्छिखरान्निष्पतन्ती ततोऽनुपरतवेगा केतुमालमभि चक्षुः प्रतीच्यां दिशि सरित्पतिं प्रविशति ॥७ ॥ भद्रा चोत्तरतो मेरुशिरसो निपतिता
गिरिशिखरागिरिशिखरमतिहाय शृङ्गवतः शृङ्गादवस्यन्दमाना उत्तरांस्तु कुरूनभित उदीच्यां दिशि जलधिमभिप्रविशति ॥८ ॥ तथैवालकनन्दा दक्षिणेन ब्रह्मसदनाद्बहूनि
गिरिकूटान्यतिक्रम्य हेमकूटाद्धैमकूटान्यतिरभसतररंहसा लुठयन्ती भारतमभिवर्षं दक्षिणस्यां दिशि जलधिमभिप्रविशति यस्यां स्नानार्थं चागच्छतः पुंसः पदे पदेऽश्वमेधराजसूयादीनां फलं न दुर्लभमिति ॥९ ॥
अन्ये च नदा नद्यश्च वर्षे वर्षे सन्ति बहुशो मेर्वादिगिरिदुहितरः शतशः ॥१० ॥
तत्रापि भारतमेव वर्षं कर्मक्षेत्रमन्यान्यष्ट वर्षाणि स्वर्गिणां पुण्यशेषोपभोगस्थानानि भौमानि स्वर्गपदानि व्यपदिशन्ति ॥११ ॥ एषु
पुरुषाणामयुतपुरुषायुर्वर्षाणां देवकल्पानां नागायुतप्राणानां वज्रसंहननबलवयोमोद-प्रमुदितमहासौरतमिथुनव्यवायापवर्गवर्षधृतैक - गर्भकलत्राणां तत्र तु त्रेतायुगसमः कालो वर्तते ॥१२ ॥
वहाँ ये सीता, अलकनन्दा, चक्षु और भद्रा नामसे चार धाराओं में विभक्त हो जाती हैं तथा अलग - अलग चारों दिशाओंमें बहती हुई अन्तमें नद - नदियोंके अधीश्वर समुद्रमें गिर जाती हैं ॥५ ॥
इनमें सीता ब्रह्मपुरीसे गिरकर कोसराचलोंके सर्वोच्च शिखरों में होकर नीचेकी ओर बहती गन्धमादनके शिखरोंपर गिरती है और भद्राश्ववर्षको प्लावित कर पूर्वकी ओर खारे समुद्रमें मिल जाती है || ६ || इसी प्रकार चक्षु माल्यवान्के शिखरपर पहुँचकर वहाँसे बेरोक-टोक केतुमालवर्षमें बहती पश्चिमकी ओर क्षारसमुद्रमें जा मिलती है ॥७ ॥ भद्रा मेरुपर्वतके
शिखरसे उत्तरकी ओर गिरती है तथा एक पर्वतसे दूसरे पर्वतपर जाती अन्तमें शृंगवान्के शिखरसे गिरकर उत्तरकुरु देशमें होकर उत्तरकी ओर बहती हुई समुद्रमें मिल जाती है || ८ || अलकनन्दा ब्रह्मपुरीसे दक्षिणकी ओर गिरकर अनेकों गिरिशिखरोंको लाँघती हेमकूट पर्वतपर पहुँचती है, वहाँसे अत्यन्त तीव्र वेगसे हिमालयके शिखरोंको चीरती हुई भारतवर्षमें ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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आती है और फिर दक्षिणकी ओर समुद्रमें जा मिलती है । इसमें स्नान करनेके लिये आनेवाले पुरुषोंको पद - पदपर अश्वमेध और राजसूय आदि यज्ञोंका फल भी दुर्लभ नहीं है ॥९ ॥
प्रत्येक वर्षमें मेरु आदि पर्वतोंसे निकली हुई और भी सैकड़ों नद- नदियाँ हैं ॥१० ॥
इन सब वर्षोंमें भारतवर्ष ही कर्मभूमि है । शेष आठ वर्ष तो स्वर्गवासी पुरुषोंके स्वर्गभोगसे बचे हुए पुण्योंको भोगनेके स्थान हैं । इसलिये इन्हें भूलोकके स्वर्ग भी कहते हैं ॥११ ॥ वहाँके देवतुल्य मनुष्योंकी मानवी गणनाके अनुसार दस हजार वर्षकी आयु होती
है । उनमें दस हजार हाथियोंका बल होता है तथा उनके वज्रसदृश सुदृढ़ शरीरमें जो शक्ति, यौवन और उल्लास होते हैं— उनके कारण वे बहुत समयतक मैथुन आदि विषय भोगते रहते हैं । अन्तमें जब भोग समाप्त होनेपर उनकी आयुका केवल एक वर्ष रह जाता है, तब उनकी स्त्रियाँ गर्भ धारण करती हैं । इस प्रकार वहाँ सर्वदा त्रेतायुगके समान समय बना रहता है ॥१२ ॥
यत्र ह देवपतयः स्वैः स्वैर्गणनायकै - र्विहितमहार्हणाः सर्वर्तुकुसुमस्तबकफलकिसलय श्रियाऽऽनम्यमानविटपलताविटपिभिरुपशुम्भमान-रुचिरकाननाश्रमायतनवर्षगिरिद्रोणीषु तथा चामलजलाशयेषु विकचविविधनव-वनरुहामोदमुदितराजहंसजलकुक्कुटकारण्डव'-सारसचक्रवाकादिभिर्मधुकरनिकराकृतिभिरुप - कूजितेषु जलक्रीडादिभिर्विचित्रविनोदैः सुललितसुरसुन्दरीणां हासलीलावलोकाकृष्टमनोदृष्टयः २ स्वैरं विहरन्ति ॥१३ ॥
कामकलिलविलास-नवस्वपि वर्षेषु भगवान्नारायणो महापुरुषः पुरुषाणां तदनुग्रहायात्मतत्त्वव्यूहेनात्मनाद्यापि संनिधीयते || १४ || इलावृते तु भगवान् भव एक एव पुमान्न ह्यन्यस्तत्रापरो निर्विशति भवान्याः शापनिमित्तज्ञो यत्प्रवेक्ष्यतः स्त्रीभाव - स्तत्पश्चाद्वक्ष्यामि || १५ || भवानीनाथैः स्त्रीगणार्बुदसहस्रैरवरुध्यमानो " भगवतश्चतु - र्मूर्तेर्महापुरुषस्य तुरीयां तामसी मूर्तिं प्रकृतिमात्मनः सङ्कर्षणसंज्ञामात्मसमाधिरूपेण संनिधाप्यैत - दभिगृणन् भव उपधावति ॥१६ ॥
वहाँ ऐसे आश्रम, भवन और वर्ष, पर्वतोंकी घाटियाँ हैं जिनके सुन्दर वन - उपवन सभी ऋतुओंके फूलोंके गुच्छे, फल और नूतन पल्लवोंकी शोभाके भारसे झुकी हुई डालियों और लताओंवाले वृक्षोंसे सुशोभित हैं; वहाँ निर्मल जलसे भरे हुए ऐसे जलाशय भी हैं; जिनमें तरह - तरहके नूतन कमल खिले रहते हैं और उन कमलोंकी सुगन्धसे प्रमुदित होकर राजहंस, जलमुर्ग, कारण्डव, सारस और चकवा आदि पक्षी तरह - तरहकी बोली बोलते तथा विभिन्न जातिके मतवाले भौंरे मधुर - मधुर गुंजार करते रहते हैं । इन आश्रमों, भवनों, घाटियों तथा जलाशयोंमें वहाँके देवेश्वरगण परम सुन्दरी देवांगनाओंके साथ उनके कामोन्मादसूचक हास-विलास और लीला - कटाक्षोंसे मन और नेत्रोंके आकृष्ट हो जानेके कारण जलक्रीडादि नाना प्रकारके खेल करते हुए स्वच्छन्द विहार करते हैं तथा उनके प्रधान - प्रधान अनुचरगण अनेक प्रकारकी सामग्रियोंसे उनका आदर - सत्कार करते रहते हैं ॥१३ ॥
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इन नवों वर्षोंमें परमपुरुष भगवान् नारायण वहाँके पुरुषोंपर अनुग्रह करनेके लिये इस समय भी अपनी विभिन्न मूर्तियोंसे विराजमान रहते हैं ॥१४ ॥ इलावृतवर्षमें एकमात्र भगवान्
शंकर ही पुरुष हैं । श्रीपार्वतीजीके शापको जाननेवाला कोई दूसरा पुरुष वहाँ प्रवेश नहीं करता; क्योंकि वहाँ जो जाता है, वही स्त्रीरूप हो जाता है । इस प्रसंगका हम आगे ( नवम स्कन्धमें ) वर्णन करेंगे ॥१५ ॥ वहाँ पार्वती एवं उनकी अरबों - खरबों दासियोंसे सेवित भगवान्
शंकर परम पुरुष परमात्माकी वासुदेव, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और संकर्षणसंज्ञक चतुर्व्यूह-मूर्तियोंमेंसे अपनी कारणरूपा संकर्षण नामकी तमः प्रधान चौथी मूर्तिका ध्यानस्थित मनोमय विग्रहके रूपमें चिन्तन करते हैं और इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए इस प्रकार स्तुति करते हैं * ॥१६ ॥
श्रीभगवानुवाच ॐ नमो भगवते महापुरुषाय सर्वगुण - सङ्ख्यानायानन्तायाव्यक्ताय नम इति ॥१७ ॥
भजे भजन्यारणपादपङ्कजं भगस्य कृत्स्नस्य परं परायणम् । भक्तेष्वलं भावितभूतभावनं भवापहं त्वा भवभावमीश्वरम् ॥१८ न यस्य मायागुणचित्तवृत्तिभि-र्निरीक्षतो ह्यण्वपि दृष्टिरज्यते । ईशे यथा नोऽजितमन्युरंहसां कस्तं न मन्येत जिगीषुरात्मनः ॥१९ असद्दृदृशो यः प्रतिभाति मायया क्षीबेव मध्वासवताम्रलोचनः । न नागवध्वोऽर्हण ईशिरे ह्रिया यत्पादयोः स्पर्शनधर्षितेन्द्रियाः ॥२० यमाहुरस्य स्थितिजन्मसंयमं त्रिभिर्विहीनं यमनन्तमृषयः । न वेद सिद्धार्थमिव क्वचित्स्थितं भूमण्डलं मूर्धसहस्रधामसु ॥२१ यस्याद्य आसीद् गुणविग्रहो महान् विज्ञानधिष्ण्यो भगवानजः यत्सम्भवोऽहं त्रिवृता स्वतेजसा
किल ।
वैकारिकं तामसमैन्द्रियं सृजे ॥२२
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एते वयं यस्य वशे महात्मनः स्थिताः शकुन्ता इव सूत्रयन्त्रिताः । महानहं वैकृततामसेन्द्रियाः सृजाम सर्वे यदनुग्रहादिदम् ॥२३ भगवान् शंकर कहते हैं — — ॐ जिनसे सभी गुणोंकी अभिव्यक्ति होती है, उन अनन्त और अव्यक्तमूर्ति ओंकारस्वरूप परमपुरुष श्रीभगवान्को नमस्कार है । ' ' भजनीय प्रभो! आपके चरणकमल भक्तोंको आश्रय देनेवाले हैं तथा आप स्वयं सम्पूर्ण ऐश्वर्योंके परम आश्रय हैं । भक्तोंके सामने आप अपना भूतभावन स्वरूप पूर्णतया प्रकट कर देते हैं तथा उन्हें संसारबन्धनसे भी मुक्त कर देते हैं, किन्तु अभक्तोंको उस बन्धनमें डालते रहते हैं । आप ही सर्वेश्वर हैं, मैं आपका भजन करता हूँ ॥ १७-१८ ॥ प्रभो! हमलोग क्रोधके आवेगको नहीं जीत सके हैं तथा हमारी दृष्टि तत्काल पापसे लिप्त हो जाती है । परन्तु आप तो संसारका नियमन करनेके लिये निरन्तर साक्षीरूपसे उसके सारे व्यापारोंको देखते रहते हैं । तथापि हमारी तरफ आपकी दृष्टिपर उन मायिक विषयों तथा चित्त की वृत्तियोंका नाममात्राको भी प्रभाव नहीं पड़ता । ऐसी स्थितिमें अपने मनको वशमें करनेकी इच्छावाला कौन पुरुष आपका आदर न करेगा? ॥१९ ॥ आप जिन पुरुषोंको मधु - आसवादि पानके कारण
अरुणनयन और मतवाले जान पड़ते हैं, वे मायाके वशीभूत होकर ही ऐसा मिथ्या दर्शन करते हैं तथा आपके चरणस्पर्शसे ही चित्त चंचल हो जानेके कारण नागपत्नियाँ लज्जावश आपकी पूजा करनेमें असमर्थ हो जाती हैं || २० || वेदमन्त्र आपको जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लयका कारण बताते हैं; परन्तु आप स्वयं इन तीनों विकारोंसे रहित हैं; इसलिये आपको ' अनन्त ' कहते हैं । आपके सहस्र मस्तकोंपर यह भूमण्डल सरसोंके दानेके समान रखा हुआ है, आपको तो यह भी नहीं मालूम होता कि वह कहाँ स्थित है || २१ || जिनसे उत्पन्न हुआ मैं अहंकाररूप अपने त्रिगुणमय तेजसे देवता, इन्द्रिय और भूतोंकी रचना करता हूँ – वे विज्ञानके आश्रय भगवान् ब्रह्माजी भी आपके ही महत्तत्त्वसंज्ञक प्रथम गुणमय स्वरूप हैं ॥२२ ॥ महात्मन्! महत्तत्त्व, अहंकार - इन्द्रियाभिमानी देवता, इन्द्रियाँ और पंचभूत आदि
हम सभी डोरीमें बँधे हुए पक्षीके समान आपकी क्रियाशक्तिके वशीभूत रहकर आपकी ही कृपासे इस जगत्की रचना करते हैं ॥२३ ॥
यन्निर्मितां कर्ह्यपि कर्मपर्वणीं मायां जनोऽयं गुणसर्गमोहितः । न वेद निस्तारणयोगमञ्जसा तस्मै नमस्ते विलयोदयात्मने ॥ २४ सत्त्वादि गुणोंकी सृष्टिसे मोहित हुआ यह जीव आपकी ही रची हुई तथा कर्मबन्धनमें बाँधनेवाली मायाको तो कदाचित् जान भी लेता है, किन्तु उससे मुक्त होनेका उपाय उसे सुगमतासे नहीं मालूम होता । इस जगत् की उत्पत्ति और प्रलय भी आपके ही रूप हैं । ऐसे ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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आपको मैं बार - बार नमस्कार करता हूँ ' ॥२४ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे सप्तदशोऽध्यायः ॥१७ ॥
१. प्रा ० पा ० — मोदमदमुदितराजहंसकलहंसजल ० । २. प्रा ० पा ० – लोकाः स्वैरं विहरन्ति । ३. प्रा ० पा ० – व्यूहैरात्मनाद्यापि । ४. प्रा ० पा ० – पश्चाद्वक्ष्यामः । ५. प्रा ० पा०— सहस्रैर्व्यवरुद्ध्ययमानो । * भगवान्का विग्रह शुद्ध चिन्मय ही है परन्तु संहार आदि तामसी कार्योंका हेतु होनेसे इसे तामसी मूर्ति कहते हैं । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथाष्टादशोऽध्यायः भिन्न - भिन्न वर्षोंका वर्णन श्रीशुक उवाच तथा च भद्रश्रवा नाम धर्मसुतस्तत्कुल- पतयः पुरुषा भद्राश्ववर्षे साक्षाद्भगवतो वासुदेवस्य प्रियां तनुं धर्ममयीं संनिधाप्येदमभिगृणन्त उपधावन्ति ॥१ ॥
हयशीर्षाभिधानां परमेण समाधिना भद्रश्रवस ऊचुः ॐ नमो भगवते धर्मायात्मविशोधनाय नम इति ॥२ ॥
अहो विचित्रं भगवद्विचेष्टितं घ्नन्तं जनोऽयं हि मिषन्न पश्यति ध्यायन्नसद्यर्हि विकर्म सेवितुं निर्हृत्य पुत्रं पितरं जिजीविषति ॥३ वदन्ति विश्वं कवयः स्म नश्वरं पश्यन्ति चाध्यात्मविदो विपश्चितः । तथापि मुह्यन्ति तवाज मायया सुविस्मितं कृत्यमजं नतोऽस्मि तम् ॥४ विश्वोद्भवस्थाननिरोधकर्म ते ह्यकर्तुरङ्गीकृतमप्यपावृतः । युक्तं' न चित्रं त्वयि कार्यकारणे सर्वात्मनि व्यतिरिक्ते च वस्तुतः ॥५ श्रीशुकदेवजी कहते हैं - राजन्! भद्राश्ववर्षमें धर्मपुत्र भद्रश्रवा और उनके मुख्य - मुख्य सेवक भगवान् वासुदेवकी हयग्रीवसंज्ञक धर्ममयी प्रिय मूर्तिको अत्यन्त समाधिनिष्ठाके द्वारा हृदयमें स्थापित कर इस मन्त्रका जप करते हुए इस प्रकार स्तुति करते हैं ॥१ ॥
भद्रश्रवा और उनके सेवक कहते हैं— ' चित्तको विशुद्ध करनेवाले ओंकारस्वरूप भगवान् धर्मको नमस्कार है ' ॥२ ॥
अहो! भगवान्की लीला बड़ी विचित्र है, जिसके कारण यह जीव सम्पूर्ण लोकोंका संहार करनेवाले कालको देखकर भी नहीं देखता और तुच्छ विषयोंका सेवन करनेके लिये पापमय विचारोंकी उधेड़ - बुनमें लगा हुआ अपने ही हाथों अपने पुत्र और पितादिकी लाशको ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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जलाकर भी स्वयं जीते रहनेकी इच्छा करता है || ३ || विद्वान् लोग जगत्को नश्वर बताते हैं और सूक्ष्मदर्शी आत्मज्ञानी ऐसा ही देखते भी हैं; तो भी जन्मरहित प्रभो! आपकी मायासे लोग मोहित हो जाते हैं । आप अनादि हैं तथा आपके कृत्य बड़े विस्मयजनक हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ || ४ || परमात्मन्! आप अकर्ता और मायाके आवरणसे रहित हैं तो भी जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय - ये आपके ही कर्म माने गये हैं । सो ठीक ही है, इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है । क्योंकि सर्वात्मरूपसे आप ही सम्पूर्ण कार्योंके कारण हैं और अपने शुद्धस्वरूपमें इस कार्य कारणभावसे सर्वथा अतीत हैं ॥५ ॥
वेदान् युगान्ते तमसा तिरस्कृतान् रसातलाद्यो नृतुरङ्गविग्रहः । प्रत्याददे वै कवयेऽभियाचते तस्मै नमस्तेऽवितथेहिताय इति ॥६ हरिवर्षे चापि भगवान्नरहरिरूपेणास्ते । तद्रूपग्रहणनिमित्तमुत्तरत्राभिधास्ये । रूपं महापुरुषगुणभाजनो महाभागवतो दैत्यदानव-तद्दयितं कुलतीर्थीकरणशीलाचरितः प्रह्लादोऽव्यव - धानानन्यभक्तियोगेन ' सह तद्वर्षपुरुषैरुपास्ते इदं चोदाहरति ॥७ ॥
ॐ नमो भगवते नरसिंहाय नमस्तेजस्तेजसे आविराविर्भव वज्रनख वज्रदंष्ट्र कर्माशयान् रन्धय े रन्धय तमो ग्रस ग्रस ॐ स्वाहा । अभयमभयमात्मनि भूयिष्ठा ॐ क्षौम् ॥८ ॥
स्वस्त्यस्तु विश्वस्य खलः प्रसीदतां ध्यायन्तु भूतानि शिवं मिथो धिया । मनश्च भद्रं भजतादधोक्षजे आवेश्यतां नो मतिरप्यहैतुकी ॥९ मागारदारात्मजवित्तबन्धुषु सङ्गो यदि स्याद्भगवत्प्रियेषु नः । यः प्राणवृत्त्या परितुष्ट आत्मवान् सिद्ध्यत्यदूरान्न तथेन्द्रियप्रियः ॥ १० आपका विग्रह मनुष्य और घोड़ेका संयुक्त रूप है । प्रलयकालमें जब तमःप्रधान दैत्यगण वेदोंको चुरा ले गये थे, तब ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर आपने उन्हें रसातलसे लाकर दिया । ऐसे अमोघ लीला करनेवाले सत्यसंकल्प आपको मैं नमस्कार करता हूँ ॥६ ॥
हरिवर्षखण्डमें भगवान् नृसिंहरूपसे रहते हैं । उन्होंने यह रूप जिस कारणसे धारण किया था, उसका आगे ( सप्तम स्कन्धमें ) वर्णन किया जायगा । भगवान्के उस प्रिय रूपकी ****** ebook converter DEMO Watermarks *******