श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1081–1090

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1081–1090

पृष्ठ 1081

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॥२२ ॥

यत्तद्-पुनरात्मानुस्मृतिमोषणं मायामय भोगैश्वर्यमेवानुति भगवतानधिगतान्योपायेन वरुणपाशैश्च सम्प्रतिमुक्तो गिरिदर्यां चापविद्ध इति होवाच ॥२३ ॥

याच्ञाच्छलेनापहृत - स्वशरीरावशेषितलोकत्रयो वितलके नीचे सुतल लोक है । उसमें महायशस्वी पवित्रकीर्ति विरोचनपुत्र बलि रहते हैं । भगवान्ने इन्द्रका प्रिय करनेके लिये अदितिके गर्भसे वटु - वामनरूपमें अवतीर्ण होकर उनसे तीनों लोक छीन लिये थे । फिर भगवान्‌की कृपासे ही उनका इस लोकमें प्रवेश हुआ । यहाँ उन्हें जैसी उत्कृष्ट सम्पत्ति मिली हुई है, वैसी इन्द्रादिके पास भी नहीं है । अतः वे उन्हीं पूज्यतम प्रभुकी अपने धर्माचरणद्वारा आराधना करते हुए यहाँ आज भी निर्भयतापूर्वक रहते ॥१८ ॥ राजन्! सम्पूर्ण जीवोंके नियन्ता एवं आत्मस्वरूप परमात्मा भगवान् वासुदेव - जैसे

पूज्यतम, पवीत्रतम पात्रके आनेपर उन्हें परम श्रद्धा और आदरके साथ स्थिर चित्तसे दिये हुए भूमिदानका यही कोई मुख्य फल नहीं है कि बलिको सुतल लोकका ऐश्वर्य प्राप्त हो गया । यह ऐश्वर्य तो अनित्य है । किन्तु वह भूमिदान तो साक्षात् मोक्षका ही द्वार है ॥१९ ॥ भगवान्का

तो छींकने, गिरने और फिसलनेके समय विवश होकर एक बार नाम लेनेसे भी मनुष्य सहसा कर्म - बन्धनको काट देता है, जब कि मुमुक्षुलोग इस कर्मबन्धनको योगसाधन आदि अन्य अनेकों उपायोंका आश्रय लेनेपर बड़े कष्टसे कहीं काट पाते हैं ॥२० ॥ अतएव अपने संयमी

भक्त और ज्ञानियोंको स्वस्वरूप प्रदान करनेवाले और समस्त प्राणियोंके आत्मा श्रीभगवान्को आत्मभावसे किये हुए भूमिदानका यह फल नहीं हो सकता ॥२१ ॥ भगवान्ने

यदि बलिको उसके सर्वस्वदानके बदले अपनी विस्मृति करानेवाला यह मायामय भोग और ऐश्वर्य ही दिया तो उन्होंने उसपर यह कोई अनुग्रह नहीं किया || २२ || जिस समय कोई और उपाय न देखकर भगवान्ने याचनाके छलसे उसका त्रिलोकीका राज्य छीन लिया और उसके पास केवल उसका शरीरमात्र ही शेष रहने दिया, तब वरुणके पाशोंमें बाँधकर पर्वतकी गुफामें डाल दिये जानेपर उसने कहा था ॥२३ ॥

नूनं बतायं भगवानर्थेषु न निष्णातो योऽसाविन्द्रो यस्य सचिवो मन्त्राय ' वृत एकान्ततो बृहस्पतिस्तमतिहाय ' स्वयमुपेन्द्रेणात्मानमयाचतात्मनश्चाशिषो नो एव तद्दास्यमतिगम्भीरवयसः कालस्य मन्वन्तरपरिवृत्तं कियल्लोकत्रयमिदम् ॥२४ ॥

यस्यानुदास्यमेवा - स्मत्पितामहः किल वव्रे न तु स्वपित्र्यं यदुताकुतोभयं पदं दीयमानं भगवतः परमिति भगवतोपर खलु स्वपितर ॥२५ ॥ तस्य

महानुभावस्यानुपथममृजितकषायः को वास्मद्विधः परिहीणभगवदनुग्रहः उपजिगमिष - तीति || २६ || तस्यानुचरितमुपरिष्टाद्विस्तरिष्यते यस्य भगवान् स्वयमखिलजगद्गुरुर्नारायणो द्वारि गदापाणिरवतिष्ठते निजजनानुकम्पितहृदयो येनाङ्गुष्ठेन पदा दशकन्धरो योजनायुतायुतं दिग्विजय उच्चाटितः ॥२७ ॥

ततोऽधस्तात्तलातले मयो नाम दानवेन्द्र - स्त्रिपुराधिपतिर्भगवता पुरारिणा ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1082

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त्रिलोकीशं चिकीर्षुणा निर्दग्धस्वपुरत्रयस्तत्प्रसादाल्लब्धपदो मायाविनामाचार्यो ६ महादेवेन परिरक्षितो विगतसुदर्शनभयो महीयते ॥ २८ ॥

‘ खेद है, यह ऐश्वर्यशाली इन्द्र विद्वान् होकर भी अपना सच्चा स्वार्थ सिद्ध करनेमें कुशल नहीं है । इसने सम्मति लेनेके लिये अनन्यभावसे बृहस्पतिजीको अपना मन्त्री बनाया; फिर भी उनकी अवहेलना करके इसने श्रीविष्णुभगवान्से उनका दास्य न माँगकर उनके द्वारा मुझसे अपने लिये ये भोग ही माँगे । ये तीन लोक तो केवल एक मन्वन्तरतक ही रहते हैं, जो अनन्त कालका एक अवयवमात्र है । भगवान्के कैंकर्यके आगे भला, इन तुच्छ भोगोंका क्या मूल्य है ॥२४ ॥ हमारे पितामह प्रह्लादजीने – भगवान्‌के हाथों अपने पिता हिरण्यकशिपुके मारे

जानेपर –—प्रभुकी सेवाका ही वर माँगा था । भगवान् देना भी चाहते थे, तो भी उनसे दूर करनेवाला समझकर उन्होंने अपने पिताका निष्कण्टक राज्य लेना स्वीकार नहीं किया ॥२५ ॥ वे बड़े महानुभाव थे । मुझपर तो न भगवान्‌की कृपा ही है और न मेरी

वासनाएँ ही शान्त हुई हैं; फिर मेरे जैसा कौन पुरुष उनके पास पहुँचने का साहस कर सकता है? ॥२६ ॥ राजन्! इस बलिका चरित हम आगे ( अष्टम स्कन्धमें ) विस्तारसे कहेंगे । अपने

भक्तोंके प्रति भगवान्का हृदय दयासे भरा रहता है । इसीसे अखिल जगत्के परम पूजनीय गुरु भगवान् नारायण हाथमें गदा लिये सुतल लोकमें राजा बलिके द्वारपर सदा उपस्थित रहते हैं । एक बार जब दिग्विजय करता हुआ घमंडी रावण वहाँ पहुँचा, तब उसे भगवान्ने अपने पैरके अँगूठेकी ठोकरसे ही लाखों योजन दूर फेंक दिया था ॥२७ ॥

सुतललोकसे नीचे तलातल है । वहाँ त्रिपुराधिपति दानवराज मय रहता है । पहले तीनों लोकोंको शान्ति प्रदान करनेके लिये भगवान् शंकरने उसके तीनों पुर भस्म कर दिये थे । फिर उन्हींकी कृपासे उसे यह स्थान मिला । वह मायावियोंका परम गुरु है और महादेवजीके द्वारा सुरक्षित है, इसलिये उसे सुदर्शन चक्रसे भी कोई भय नहीं है । वहाँके निवासी उसका बहुत आदर करते हैं ॥२८ ॥

ततोऽधस्तान्महातले काद्रवेयाणां सर्पाणां नैकशिरसां क्रोधवशो नाम गणः कुहकतक्षक - कालियसुषेणादिप्रधाना महाभोगवन्तः पतत्त्रिराजाधिपतेः पुरुषवाहादनवरतमुद्विजमानाः १ स्वकलत्रापत्यसुहृत्कुटुम्बसङ्गेन क्वचित्प्रमत्ता विहरन्ति ॥२९ ॥

ततोऽधस्ताद्रसातले दैतेया दानवाः पणयो नाम निवातकवचाः कालेया हिरण्यपुरवासिन इति विबुधप्रत्यनीका उत्पत्त्या महौजसो महासाहसिनो भगवतः सकललोकानुभावस्य हरेरेव तेजसा प्रतिहतबलावलेपार बिलेशया इव वसन्ति ये वै सरमयेन्द्रदूत्या वाग्भिर्मन्त्रवर्णा- भिरिन्द्राद्बिभ्यति ॥३० ॥

ततोऽधस्तात्पाताले नागलोकपतयो वासुकिप्रमुखाः शङ्खकुलिकमहाशङ्खश्वेत - धनञ्जयधृतराष्ट्र शङ्खचूडकम्बलाश्वतरदेवदत्ताय ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1083

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महाभोगिनो महामर्षा निवसन्ति येषामु ह वै पञ्चसप्तदशशतसहस्रशीर्षाणां फणासु विरचिता महामणयो रोचिष्णवः पातालविवरतिमिरनिकरं स्वरोचिषा विधमन्ति ॥३१ ॥

उसके नीचे महातलमें कद्रूसे उत्पन्न हुए अनेक सिरोंवाले सर्पोंका क्रोधवश नामक एक समुदाय रहता है । उनमें कुहक, तक्षक, कालिय और सुषेण आदि प्रधान हैं । उनके बड़े - बड़े फन हैं । वे सदा भगवान्के वाहन पक्षिराज गरुडजीसे डरते रहते हैं; तो भी कभी - कभी अपने स्त्री, पुत्र, मित्र और कुटुम्बके संगसे प्रमत्त होकर विहार करने लगते हैं ॥२९ ॥

उसके नीचे रसातलमें पणि नामके दैत्य और दानव रहते हैं । ये निवातकवच, कालेय और हिरण्यपुरवासी भी कहलाते हैं । इनका देवताओंसे विरोध है । ये जन्मसे ही बड़े बलवान् और महान् साहसी होते हैं । किन्तु जिनका प्रभाव सम्पूर्ण लोकोंमें फैला हुआ है, उन श्रीहरिके तेजसे बलाभिमान चूर्ण हो जानेके कारण ये सर्पोंके समान लुक - छिपकर रहते हैं तथा इन्द्रकी दूती सरमाके कहे हुए मन्त्रवर्णरूप * वाक्यके कारण सर्वदा इन्द्रसे डरते रहते हैं ॥ ३० ॥

रसातलके नीचे पाताल है । वहाँ शंख, कुलिक, महाशंख, श्वेत, धनंजय, धृतराष्ट्र, शंखचूड़, कम्बल, अश्वतर और देवदत्त आदि बड़े क्रोधी और बड़े - बड़े फनोंवाले नाग रहते हैं । इनमें वासुकि प्रधान हैं । उनमें से किसीके पाँच, किसीके सात, किसीके दस, किसीके सौ और किसीके हजार सिर हैं । उनके फनोंकी दमकती हुई मणियाँ अपने प्रकाशसे पाताल - -लोकका त सारा अन्धकार नष्ट कर देती हैं ॥३१ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे राह्वादिस्थितिबिलस्वर्गमर्यादा निरूपणं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥२४ ॥

१. प्रा ० पा ० – पारिषदभू ० । २. प्रा ० पा ० - भूय । ३. प्रा ० पा ० – तयोर्वीर्येण । * 1 ‘ आचतुर्थाद्भवेत्स्रावः पातः पंचमषष्ठयोः ' अर्थात् चौथे मासतक जो गर्भ गिरता है, उसे ‘ गर्भस्राव ’ कहते हैं तथा पाँचवें और छठे मासमें गिरनेसे वह ' गर्भपात ' कहलाता है । १. प्रा ० पा०— - परिक्षिप्तस्वर्लोकत्रयो । २. प्रा ० पा ० - यद्येतत्साक्षात्कारो । ३. प्रा ० पा ० — ऽन्यथेवेहोप ० । १. प्रा ० पा ० — मन्त्राय एकान्ततो वृतो बृह ० । २. प्रा ० पा ० - हायोपेन्द्रेणात्मान् माशिषो नो एव तदनुदास्यमति ० । ३. प्रा ० पा ० – ग्रहमुपजि ० । ४. प्रा ० पा ० – मुत्तरस्माद्विस्तरिष्यते यद्भगवान् । ५. प्रा ० पा ० - त्रिपुरारिणा त्रिलोक्यर्थं । ६. प्रा ० पा ० – मायानामाचार्यो । १. प्रा ० पा ० — मुद्विग्नमनसा स्वक ० । २. प्रा ० पा ० – हरेरिव । ३. प्रा ० पा ० — हतावलेपा बिलशया इव वसन्ति ये वै सुरमये ० । ४. प्रा ० पा ० – मर्षाः सन्ति । * एक कथा आती है कि जब पणि नामक दैत्योंने पृथ्वीको रसातलमें छिपा लिया, तब ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1084

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इन्द्रने उसे ढूँढ़नेके लिये सरमा नामकी एक दूतीको भेजा था । सरमासे दैत्योंने सन्धि करनी चाही, परन्तु सरमाने सन्धि न करके इन्द्रकी स्तुति करते हुए कहा था - ‘ हता इन्द्रेण पणयः शयध्वम् ' ( हॆ पणिगण! तुम इन्द्रके हाथसे मरकर पृथ्वीपर सो जाओ, इसी शापके कारण उन्हें सदा इन्द्रका डर लगा रहता है । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1085

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अथ पञ्चविंशोऽध्यायः श्रीसङ्कर्षणदेवका विवरण और स्तुति श्रीशुक उवाच तस्य मूलदेशे त्रिंशद्योजनसहस्रान्तर आस्ते या वै कला भगवतस्तामसी समाख्या-तान्त इति सात्वतीया द्रष्टृदृश्ययोः सङ्कर्षणमहमित्यभिमानलक्षणं यं सङ्कर्षण-मित्याचक्षते ॥१ ॥

यस्येदं क्षितिमण्डलं भगवतोऽनन्तमूर्तेः सहस्रशिरस एकस्मिन्नेव शीर्षणि ध्रियमाणं सिद्धार्थ इव लक्ष्यते ॥२ ॥ यस्य ह वा इदं

कालेनोपसंजिहीर्षतोऽमर्षविरचितरुचिर - भ्रमद्भुवोरन्तरेण साङ्कर्षणो नाम रुद्र एकादशव्यूहस्त्र्यक्षस्त्रिशिखं शूलमुत्तम्भयन् उदतिष्ठत् यस्याङ्घ्रिकमलयुगलारुण - विशदनखमणिषण्डमण्डलेष्वहिपतयः ॥३ ॥

सह सात्वतर्षभैरेकान्तभक्तियोगेनावनमन्तः स्व- वदनानि परिस्फुरत्कुण्डलप्रभामण्डित-गण्डस्थलान्यतिमनोहराणि प्रमुदितमनसः खलु विलोकयन्ति ॥४ ॥ यस्यैव हि

नागराजकुमार्य आशिष आशासाना - श्चार्वङ्गवलयविलसितविशदविपुलधवल-सुभगरुचिरभुजरजतस्तम्भेष्वगुरुचन्दनकुङ्कुम-पङ्कानुलेपेनावलिम्पमानास्तदभिमर्शनोन्मथित हृदयमकरध्वजावेशरुचिरललितस्मितास्तद-नुरागमदमुदितमदविघूर्णितारुणकरुणावलोक - नयनवदनारविन्दं विलोकयन्ति ॥५ ॥

सव्रीडं किल श्रीशुकदेवजी कहते हैं— राजन्! पाताललोकके नीचे तीस हजार योजनकी दूरीपर अनन्त नामसे विख्यात भगवान्‌की तामसी नित्य कला है । यह अहंकाररूपा होनेसे द्रष्टा और दृश्यको खींचकर एक कर देती है, इसलिये पांचरात्र आगमके अनुयायी भक्तजन इसे ' संकर्षण ' कहते हैं ॥ १ ॥

इन भगवान् अनन्तके एक हजार मस्तक हैं । उनमेंसे एकपर रखा हुआ यह सारा भूमण्डल सरसोंके दानेके समान दिखायी देता है ॥२ ॥

प्रलयकाल उपस्थित होनेपर जब इन्हें इस विश्वका उपसंहार करनेकी इच्छा होती है, तब इनकी क्रोधवश घूमती हुई मनोहर भ्रुकुटियोंके मध्यभागसे संकर्षण नामक रुद्र प्रकट होते हैं । उनकी व्यूहसंख्या ग्यारह है । वे सभी तीन नेत्रोंवाले होते हैं और हाथमें तीन नोकोंवाले शूल लिये रहते हैं ॥३ ॥ भगवान् संकर्षणके चरणकमलोंके गोल - गोल स्वच्छ और

अरुणवर्ण नख मणियोंकी पंक्तिके समान देदीप्यमान हैं । जब अन्य प्रधान - प्रधान भक्तोंके सहित अनेकों नागराज अनन्य भक्तिभावसे उन्हें प्रणाम करते हैं, तब उन्हें उन नखमणियोंमें ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1086

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अपने कुण्डलकान्तिमण्डित कमनीय कपोलोंवाले मनोहर मुखारविन्दोंकी मनमोहिनी झाँकी होती है और उनका मन आनन्दसे भर जाता है ॥४ ॥ अनेकों नागराजोंकी कन्याएँ विविध

कामनाओंसे उनके अंगमण्डलपर चाँदीके खम्भोंके समान सुशोभित उनकी वलयविलसित लंबी - लंबी श्वेतवर्ण सुन्दर भुजाओंपर अरगजा, चन्दन और कुंकुमपंकका लेप करती हैं । उस समय अंगस्पर्शसे मथित हुए उनके हृदयमें कामका संचार हो जाता है । तब वे उनके मदविह्वल सकरुण अरुण नयनकमलोंसे सुशोभित तथा प्रेममदसे मुदित मुखारविन्दकी ओर मधुर मनोहर मुसकानके साथ सलज्जभावसे निहारने लगती हैं || ५ || वे अनन्त गुणोंके सागर आदिदेव भगवान् अनन्त अपने अमर्ष ( असहनशीलता ) और रोषके वेगको रोके हुए वहाँ समस्त लोकोंके कल्याणके लिये विराजमान हैं ॥६ ॥

स एव भगवाननन्तोऽनन्तगुणार्णव आदिदेव उपसंहृतामर्षरोषवेगो लोकानां स्वस्तय आस्ते || ६ || ध्यायमानः मुनिगणैरनवरतमदमुदितविकृतविह्वललोचनः सुरासुरोरगसिद्धगन्धर्वविद्याधर-सुललितमुखरिकामृतेनाप्यायमानः स्वपार्षद - विबुधयूथपतीनपरिम्लानरागनवतुलसिका - मोदमध्वासवेन माद्यन्मधुकरव्रातमधुरगीतश्रियं वैजयन्तीं स्वां वनमालां नीलवासा एककुण्डलो हलककुदि कृतसुभगसुन्दरभुजो भगवान्माहेन्द्रो वारणेन्द्र इव काञ्चनीं कक्षामुदारलीलो बिभर्ति ॥ ७ ॥

य एष एवमनुश्रुतो ' ध्यायमानो मुमुक्षू-णामनादिकालकर्मवासनाग्रथितमविद्यामयं हृदयग्रन्थिं सत्त्वरजस्तमोमयमन्तर्हृदयं गत आशु निर्भिनत्ति तस्यानुभावान् र भगवान् स्वायम्भुवो नारदः सह तुम्बुरुणा सभायां ब्रह्मणः संश्लोकयामास ॥ ८ ॥

उत्पत्तिस्थितिलयहेतवोऽस्य कल्पाः सत्त्वाद्याः प्रकृतिगुणा यदीक्षयाऽऽसन् । यद्रूपं ध्रुवमकृतं यदेकमात्मन् नानाधात्कथमु ह वेद तस्य वर्त्म ॥९ देवता, असुर, नाग, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर और मुनिगण भगवान् अनन्तका ध्यान किया करते हैं । उनके नेत्र निरन्तर प्रेममदसे मुदित, चंचल और विह्वल रहते हैं । वे सुललित वचनामृतसे अपने पार्षद और देवयूथपोंको सन्तुष्ट करते रहते हैं । उनके अंगपर नीलाम्बर और कानोंमें केवल एक कुण्डल जगमगाता रहता है तथा उनका सुभग और सुन्दर हाथ हलकी मूठपर रखा रहता है । वे उदारलीलामय भगवान् संकर्षण गलेमें वैजयन्ती माला धारण किये रहते हैं, जो साक्षात् इन्द्रके हाथी ऐरावतके गलेमें पड़ी हुई सुवर्णकी शृंखलाके समान जान पड़ती है । जिसकी कान्ति कभी फीकी नहीं पड़ती, ऐसी नवीन तुलसीकी गन्ध और ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1087

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मधुर मकरन्दसे उन्मत्त हुए भौंरे निरन्तर मधुर गुंजार करके उसकी शोभा बढ़ाते रहते हैं || ७ || परीक्षित्! इस प्रकार भगवान् अनन्त माहात्म्य - श्रवण और ध्यान करनेसे मुमुक्षुओंके हृदयमें आविर्भूत होकर उनकी अनादिकालीन कर्मवासनाओंसे ग्रथित सत्त्व, रज और तमोगुणात्मक अविद्यामयी हृदयग्रन्थिको तत्काल काट डालते हैं । उनके गुणोंका एक बार ब्रह्माजीके पुत्र भगवान् नारदने तुम्बुरु गन्धर्वके साथ ब्रह्माजीकी सभामें इस प्रकार गान किया था ॥८ ॥

जिनकी दृष्टि पड़नेसे ही जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके हेतुभूत सत्त्वादि प्राकृत गुण अपने - अपने कार्यमें समर्थ होते हैं, जिनका स्वरूप ध्रुव ( अनन्त ) और अकृत ( अनादि ) है तथा जो अकेले होते हुए ही इस नानात्मक प्रपंचको अपनेमें धारण किये हुए हैं — उन भगवान् संकर्षणके तत्त्वको कोई कैसे जान सकता है ॥९ ॥

मूर्तिं नः पुरुकृपया बभार सत्त्वं

संशुद्धं सदसदिदं विभाति यत्र ।

यल्लीलां मृगपतिराददेऽनवद्या-मादातुं स्वजनमनांस्युदारवीर्यः ॥ १०

यन्नाम श्रुतमनुकीर्तयेदकस्मा-दार्तो वा यदि पतितः प्रलम्भनाद्वा । हन्त्यंहः सपदि नृणामशेषमन्यं कं शेषाद्भगवत आश्रयेन्मुमुक्षुः ॥११ मूर्धन्यर्पितमणुवत्सहस्रमूर्ध्ना भूगोलं सगिरिसरित्समुद्रसत्त्वम् । आनन्त्यादनिमितविक्रमस्य भूम्नः को वीर्याण्यधिगणयेत्सहस्रजिह्वः ॥१२ एवम्प्रभावो भगवाननन्तो दुरन्तवीर्योरुगुणानुभावः । मूले रसायाः स्थित आत्मतन्त्रो यो लीलया क्ष्मां स्थितये बिभर्ति ॥१३ एता ह्येवेह नृभिरुपगन्तव्या गतयो यथाकर्मविनिर्मिता यथोपदेशमनुवर्णिताः कामान् कामयमानैः || १४ || एतावतीर्हि राजन् पुंसः प्रवृत्तिलक्षणस्य धर्मस्य विपाकगतय उच्चावचा विसदृशा यथाप्रश्नं व्याचख्ये किमन्यत्कथयाम इति ॥१५ ॥

जिनमें यह कार्य - कारणरूप सारा प्रपंच भास रहा है तथा अपने निजजनोंका चित्त ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1088

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 1088 का मूल पृष्ठ
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आकर्षित करनेके लिये की हुई जिनकी वीरतापूर्ण लीलाको परम पराक्रमी सिंहने आदर्श मानकर अपनाया है, उन उदारवीर्य संकर्षण भगवान् ने हमपर बड़ी कृपा करके यह विशुद्ध सत्त्वमय स्वरूप धारण किया है ॥१० ॥ जिनके सुने सुनाये नामका कोई पीड़ित अथवा

पतित पुरुष अकस्मात् अथवा हँसीमें भी उच्चारण कर लेता है तो वह पुरुष दूसरे मनुष्योंके भी सारे पापोंको तत्काल नष्ट कर देता है - ऐसे शेषभगवान्‌को छोड़कर मुमुक्षु पुरुष और किसका आश्रय ले सकता है? ॥ ११ ॥ यह पर्वत, नदी और समुद्रादिसे पूर्ण सम्पूर्ण भूमण्डल

उन सहस्रशीर्षा भगवान्के एक मस्तकपर एक रजःकणके समान रखा हुआ है । वे अनन्त हैं, इसलिये उनके पराक्रमका कोई परिमाण नहीं है । किसीके हजार जीभें हों, तो भी उन सर्वव्यापक भगवान्के पराक्रमोंकी गणना करनेका साहस वह कैसे कर सकता है? ॥१२ ॥

वास्तवमें उनके वीर्य, अतिशय गुण और प्रभाव असीम हैं । ऐसे प्रभावशाली भगवान् अनन्त रसातलके मूलमें अपनी ही महिमामें स्थित स्वतन्त्र हैं और सम्पूर्ण लोकोंकी स्थितिके लिये लीलासे ही पृथ्वीको धारण किये हुए हैं ॥ १३ ॥

राजन्! भोगोंकी कामनावाले पुरुषोंकी अपने कर्मोंके अनुसार प्राप्त होनेवाली भगवान्की रची हुई ये ही गतियाँ हैं । इन्हें जिस प्रकार मैंने गुरुमुखसे सुना था, उसी प्रकार तुम्हें सुना दिया ॥१४ ॥ मनुष्यको प्रवृत्तिरूप धर्मके परिणाममें प्राप्त होनेवाली जो परस्पर

विलक्षण ऊँची - नीची गतियाँ हैं, वे इतनी ही हैं; इन्हें तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैंने सुना दिया । अब बताओ और क्या सुनाऊँ? ॥१५ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे भूविवरविध्युपवर्णनं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥२५ ॥

-१. प्रा ० पा ० – मनुश्रुतोऽभिध्याय ० । २. प्रा ० पा ० – कर्मणां वा ० । ३. प्रा ० पा०— भावमुद्वहन् भग ० । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1089

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अथ षड्विंशोऽध्यायः नरकोंकी विभिन्न गतियोंका वर्णन राजोवाच महर्ष एतद्वैचित्र्यं लोकस्य कथमिति ॥ १ ॥

ऋषिरुवाच त्रिगुणत्वात्कर्तुः १ श्रद्धया कर्मगतयः पृथग्विधाः सर्वा एव सर्वस्य तारतम्येन भवन्ति ॥२ ॥

अथेदानीं प्रतिषिद्धलक्षणस्याधर्मस्य तथैव कर्तुः २ श्रद्धाया वैसादृश्यात्कर्मफलं विसदृशं भवति या ह्यनाद्यविद्यया कृतकामानां तत्परिणामलक्षणाः सृतयः सहस्रशः प्रवृत्तास्तासां प्राचुर्येणानुवर्णयिष्यामः ॥ ३ ॥

राजोवाच नरका नाम भगवन् किं देशविशेषा अथवा बहिस्त्रिलोक्या आहोस्विदन्तराल इति ॥४ ॥

ऋषिरुवाच अन्तराल एव त्रिजगत्यास्तु दिशि दक्षिणस्या- मधस्ताद्भूमेरुपरिष्टाच्च जलाद्यस्यमग्निष्वा - त्तादयः पितृगणा दिशि स्वानां गोत्राणां परमेण समाधिना सत्या एवाशिष आशासाना निवसन्ति ॥ ५ ॥

यत्र ह वाव भगवान् पितृराजो वैवस्वतः स्वविषयं प्रापितेषु स्वपुरुषैर्जन्तुषु सम्परेतेषु यथाकर्मावद्यं दोषमेवानुल्लङ्घितभगवच्छासनः सगणो दमं धारयति ॥ ६ ॥

राजा परीक्षित्ने पूछा – महर्षे! लोगोंको जो ये ऊँची - नीची गतियाँ प्राप्त होती हैं, उनमें इतनी विभिन्नता क्यों है? ॥१ ॥

श्रीशुकदेवजीने कहा – राजन्! कर्म करनेवाले पुरुष सात्त्विक, राजस और तामस- -तीन प्रकारके होते हैं तथा उनकी श्रद्धाओंमें भी भेद रहता है । इस प्रकार स्वभाव और श्रद्धाके भेदसे उनके कर्मोंकी गतियाँ भी भिन्न - भिन्न होती हैं और न्यूनाधिकरूपमें ये सभी गतियाँ सभी कर्ताओंको प्राप्त होती हैं ॥ २ ॥

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पृष्ठ 1090

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इसी प्रकार निषिद्ध कर्मरूप पाप करनेवालोंको भी उनकी श्रद्धाकी असमानताके कारण समान फल नहीं मिलता । अतः अनादि अविद्याके वशीभूत होकर कामनापूर्वक किये हुए उन निषिद्ध कर्मोंके परिणाममें जो हजारों तरहकी नारकी गतियाँ होती हैं, उनका विस्तारसे वर्णन करेंगे ॥३ ॥

राजा परीक्षित्ने पूछा — भगवन्! आप जिनका वर्णन करना चाहते हैं, वे नरक इसी पृथ्वीके कोई देशविशेष हैं अथवा त्रिलोकीसे बाहर या इसीके भीतर किसी जगह हैं? ॥४ ॥

श्रीशुकदेवजीने कहा – राजन्! वे त्रिलोकीके भीतर ही हैं तथा दक्षिणकी ओर पृथ्वीसे नीचे जलके ऊपर स्थित हैं । इसी दिशामें अग्निष्वात्त आदि पितृगण रहते हैं, वे अत्यन्त एकाग्रतापूर्वक अपने वंशधरोंके लिये मंगलकामना किया करते हैं ॥५ ॥

-उस नरकलोकमें सूर्यके पुत्र पितृराज भगवान् यम अपने सेवकोंके सहित रहते हैं तथा भगवान्की आज्ञाका उल्लंघन न करते हुए, अपने दूतोंद्वारा वहाँ लाये हुए मृत प्राणियोंको उनके दुष्कर्मोंके अनुसार पापका फल दण्ड देते हैं ॥६ ॥

तत्र हैके नरकानेकविंशतिं गणयन्ति । अथ तांस्ते राजन्नामरूपलक्षणतो-ऽनुक्रमिष्यामस्तामिस्रोऽन्धतामिस्रो रौरवो महारौरवः कुम्भीपाकः कालसूत्रमसिपत्रवनं सूकरमुखमन्धकूपः कृमिभोजनः सन्दंशस्तप्तसूर्मिर्वज्रकण्टकशाल्मली वैतरणी पूयोदः प्राणरोधो विशसनं लालाभक्षः सारमेयादनमवीचिरयःपानमिति । किञ्च क्षारकर्दमो रक्षोगणभोजनः शूलप्रोतो दन्दशूकोऽवटनिरोधनः पर्यावर्तनः सूचीमुखमित्यष्टाविंशतिर्नरका विविध यातनाभूमयः ॥७ ॥

तत्र यस्तु परवित्तापत्यकलत्राण्यपहरति स हि कालपाशबद्धो यमपुरुषैरतिभयानकै- स्तामिस्रे नरके बलान्निपात्यते अनशनानुदपान-दण्डताडनसंतर्जनादिभिर्यातनाभिर्यात्यमानो जन्तुर्यत्र कश्मलमासादित एकदैव मूर्च्छामुपयाति तामिस्रप्राये ॥८ ॥ एवमेवान्धतामिस्रे यस्तु वञ्चयित्वा पुरुषं

दारादीनुपयुङ्क्ते यत्र शरीरी निपात्यमानो यातनास्थो वेदनया नष्टमतिर्नष्ट - दृष्टिश्च भवति यथा वनस्पतिर्वृश्यमानमूल - स्तस्मादन्धतामिस्रं तमुपदिशन्ति ॥ ९ ॥

यस्त्विह वा एतदहमिति ममेदमिति भूतद्रोहेण केवलं स्वकुटुम्बमेवानुदिनं प्रपुष्णाति स तदिह विहाय स्वयमेव तदशुभेन रौरवे निपतति || १० || ये त्विह यथैवामुना विहिंसिता जन्तवः परत्र यमयातनामुपगतं त एव रुरवो भूत्वा तथा तमेव विहिंसन्ति तस्माद् रौरवमित्याहू रुरुरिति सर्पादति क्रूरसत्त्वस्यापदेशः ॥ ११ ॥

परीक्षित्! कोई - कोई लोग नरकोंकी संख्या इक्कीस बताते हैं । अब हम नाम, रूप और लक्षणोंके अनुसार उनका क्रमशः वर्णन करते हैं । उनके नाम ये हैं - तामिस्र, अन्धतामिस्र, रौरव, महारौरव, कुम्भीपाक, कालसूत्र, असिपत्रवन, सूकरमुख, अन्धकूप, कृमिभोजन, सन्दंश, तप्तसूर्मि, वज्रकण्टकशाल्मली, वैतरणी, पयोद, प्राणरोध, विशसन, लालाभक्ष, सारमेयादन, अवीचि और अयःपान । इनके सिवा क्षारकर्दम, रक्षोगणभोजन, शूलप्रोत, ****** ebook converter DEMO Watermarks *******